Tuesday, December 19, 2006

देश का पहला भारतीय तकनीकी संस्थान

http://web.archive.org/web/20110926073651/http://hindini.com/fursatiya/archives/219

काफ़ी दिनों के बाद आज मन किया फिर से अपने साइकिल यात्रा के किस्से सुनाने का। जिन साथियों को इससे पहले के किस्से पढ़ने का मन करे वे जिज्ञासु यायावर श्रेणी की पोस्टें देख सकते हैं।
गोलानी, अनूप, विवेक और उसका दोस्त
कलकत्ता से हम सबेरे ही सबेरे नाश्ता करके निकल लिये थे। हमारी अगली मंजिल थी खड़गपुर। खड़गपुर कलकत्ता से करीब १२० किमी दूर है। हम कलकत्ता से सबेरे निकलकर पैडलियाते हुये जब खड़गपुर पहुंचे तो रात हो चुकी थी। वहां आई.आई.टी.खड़गपुर में हमें रुकना था जहां कि हमारे कनपुरिया मोहल्ले के दोस्त विवेक बाजपेयी हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।

विवेक हमारे मोहल्ले गांधी नगर में ही रहते थे। हम दोनों ने एक साथ बी.एन.एस.डी. इंटरकालेज से इंटर किया था। मैं इंटर के तुरंत बाद इलाहाबाद मोनेरेको चला गया था। विवेक ने अगले साल अपनी मेहनत के बल पर आई.आई.टी. खड़गपुर में एडमिशन लिया। बाद में लगनपूर्वक प्रयास करके आई.आई.एम. से एम.बी.ए. किया। आज पता नहीं कहां है विवेक लेकिन अब जब यह पोस्ट लिख रहा हूं तो पुराने दिनों की याद सामने आ रही है।
हम लोग एक ही मोहल्ले में रहते थे। विवेक से परिचय हुआ तब हम लोग ग्याहरवीं में पढ़ते थे। हमारा स्कूल १२ बजे से होता था। हम विवेक के घर के पास ही बने पार्क में अक्सर क्रिकेट खेला करते थे। हमारे साथियों में राकेश मिश्रा और राकेश द्विवेदी भी होते थे। राकेश मिश्रा बाद में दरोगा बन गये और राकेश द्विवेदी आजकल दैनिक जागरण में हैं। अपने घर के अलावा जिस एक घर में मैंने अपना समय सबसे ज्यादा बिताया वह राकेश द्विवेदी के घर था। क्या विडम्बना है कि अपने ही शहर में रहते हुये भी अपने सबसे बेहतरीन समय के साथियों से रूबरू मुलाकात किये हुये महीने, साल गुजर जाते हैं।

उन दिनों मोबाइल का चलन तो था नहीं कि मिनट-मिनट की खबर लेते रहें। फोन भी विलासिता ही थे। संप्रेषण का माध्यम चिट्ठी-पत्री ही था। हमने काफ़ी पहले ही विवेक को अपने आने की सूचना दे दी थी। हमें कोई जवाब नहीं मिला था लेकिन विश्वास था कि वह वहां मिलेगा।

हमारे पहुंचते-पहुंचते रात हो गयी थी। मेस शायद बंद थी या देर हो जाने के कारण हमने हास्टल के पास ही बने ढाबों में खाना खाया। वापस आकर विवेक के कमरे में ही लेटे-लेटे बातें करते-करते हम कब सो गये हमें पता ही नहीं चला। विवेक अपने किसी दोस्त के कमरे में सोने चला गया।
गोलानी, विनय, विवेक और उसका दोस्त
सबेरे नास्ता करके हम आई.आई.टी. कैम्पस देखने निकले। तमाम जगह घूमते रहे। संस्थान की मुख्य इमारत के पास हमने फोटो भी खिंचवाई। आज जब मैं अपनी उन फोटुऒं को देख रहा था तो लग रहा था कि समय के साथ हमारे शरीर के ढांचे में कितना अतिक्रमण जमा हो गया है। मैं दुबला-पतला था जबकि आज मेरा वजन अस्सी-नब्बे के बीच झूलता रहता है। लेकिन लंबाई कुछ ढंके रहती है सचाई। विनय का तो चतुर्दिक विकास हो गया है। दिलीप गोलानी के बहुत दिन से दर्शन नहीं हुये। न जाने किस हाल में हो हमारा यायावर साथी!
पिछले दिनों खड़गपुर आई.आई.टी. के एक छात्र ने एक छात्रा की अश्लील फोटो बाजी.काम साइट के माध्यम से बेचने का प्रयास किया था। यह अपनी तरह का पहला मामला था। इसी क्रम में जानकारी देते चलें कि खड़गपुर का तकनीकी संस्थान अपने देश का पहला प्रौद्योगिकी संस्थान है।

सन १९४६ में बने उच्च तकनीकी शिक्षा आयोग ने यह सिफारिश की कि अमेरिका के मेसाट्यूट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी की तर्ज पर भारत में भी तकनीकी संस्थान स्थापित किये जायें। उन दिनों भारत के अधिकांश उद्योग कलकत्ता में थे इसलिये पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अनुरोध किया कि पहले तकनीकी संस्थान की स्थापना कलकत्ता में ही की जाये। परिणाम स्वरूप मई,१९५० में कलकत्ता में पूर्वी उच्च तकनीकी संस्थान की स्थापना हुई। बाद में जून, १९५० में इस तकनीकी संस्थान को कलकत्ता से १२० किमी दूर खड़गपुर के हिजली नामक एतिहासिक स्थान में स्थानान्तरित किया गया।
कलकत्ता में तकनीकी संस्थान ५, एस्प्लेनेड में बनाया गया। यह मेरे लिये सुखद सूचना सा है क्योंकि हमारी आयुध निर्माणियों का मुख्यालय बहुत दिनों तक ६, एस्प्लेनेड, कलकत्ता में रहा। आज भी हमारे विभाग के कुछ कार्यालय ६,एस्प्लेनेड, कलकत्ता में हैं।

हिजली एक ऐतिहासिक स्थल है। पहले यह हिजली बंदी ग्रह के रूप में जाना था(अब शहीद भवन)यहां अंग्रेजों के जमाने में राजनैतिक बंदी लाये जाते थे।यहां उन पर मुकदमा चलता था और उनको बंदी बनाकर रखा जाता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहां पर अमेरिकी की २०वीं वायुसेना कमान का मुख्यालय भी रहा।
सन १९५६ में खड़गपुर तकनीकी संस्थान के संस्थान के दीक्षांत समारोह में अपने उद्गार व्यक्त करते हुये भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा:-
ऐतिहासिक हिजली बंदी ग्रह जो भारत के बेहतरीन स्मारकों में से एक है अब भारत के नये भविष्य के रूप में बदल रहा है। यह चित्र मुझे उन परिवर्तनों का आभास कराता है जो कि भारत में हो रहे हैं।
हालांकि संस्थान की मुख्य इमारत की फोटुयें धुंधली हो गयीं हैं लेकिन भारतीय तकनीकी संस्थान,खड़गपुर की उन इमारत में नाम के नीचे लिखी हुयी मेरी याद में अभी भी एकदम ताजा है। वहां लिखा है:-


यह संस्थान राष्ट्र की सेवा के लिये समर्पित है।
देश और राष्ट्र के लिये समर्पण करने वाले अब अल्पमत में हैं और समर्पण भावना अब पुराने फैशन की चीजों मे शामिल हो गयी है। लेकिन इमारते हैं कि अपना रूप नहीं बदलती।

बहरहाल, हम दोपहर को खाना खाकर आगे के लिये चल दिये। रास्ते में कुछ समय लग गया और शाम होते-होते हम खड़गपुर से मात्र ३५ किमीं दूर बेल्दा कस्बे तक ही पहुंच पाये। बेल्दा पश्चिम बंगाल के मिदिनापुर जिले का एक कस्बा है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या ५ के पास स्थित है। यह राजमार्ग भारत सरकार की महत्वाकांक्षी स्वर्णचतुर्भुज योजना से जुड़ा है। बेल्दा से कुछ ही दूर पर उड़ीसा राज्य की सीमा शुरू होने के कारण इसे उड़ीसा का प्रवेश द्वार भी कहते हैं।

हम शाम को बेल्दा पहुंचे थे। खाना खाकर रात में वहीं एक मंदिर में रुक गये। उस दिन तारीख थी -१४ जुलाई, १९८३ ।
हमारी अगली मंजिल थी बालासोर!

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

14 responses to “देश का पहला भारतीय तकनीकी संस्थान”

  1. समीर लाल
    वाह, यायवरी का किस्सा फिर शुरु हुआ…अच्छा लगा.जारी रखें. आजकल तो खोये साथी अंतरजाल के माध्यम से जल्दी मिल जाते हैं, प्रयास करें सफलता मिलेगी.
  2. bhuvnesh
    सायकिल-श्रृंखला के पुन: शुरू करने के लिए धन्यवाद
    अच्छा लगा पढ़कर
  3. मनीष
    आज भी खड़गपुर के मुख्य भवन की इमारत वैसी ही दिखती है जैसे की श्वेत श्याम चित्र में दिख रही है। अच्छा लगा आपका ये विवरण पढ़कर ।
  4. Pratik Pandey
    अच्छा लेख है। इस शृंखला के पुराने लेख पढ़ने के लिए ऊपर दी हुई कड़ी पर क्लिक करने से जिज्ञासु यायावर आर्काइव नहीं खुल पा रही है। कृपया देखें।
  5. हिंदी ब्लॉगर
    बहुत अच्छी जानकारी मिली ये वृतांत पढ़ कर. बीच-बीच में इस सिरीज़ के लिए भी समय देते रहें.
  6. eswami
    आर्काईव्स ना खुलने की बिमारी नई थीम की है. आज ठीक कर दूंगा.
  7. साक्षात्कार « मुझे भी कुछ कहना है…..
    [...] कुछ कहना चाहते हो?— — हाँ, जो सफल हैं उनके लिये–  ”है ईश्वर मेहरबान उन पर, साथ मे उनके जग भी है,   मै थोडा सा पिछडा तो क्या, मन मे निश्चय तो अब भी है!   आज तो वे जीते सुख्न से उनके कल भी सुनहरे हैं,   होगा वक्त उन्ही का सब, कुछ तो अच्छे पल मेरे हैं!   काले सपनो को लिये खडी ये रात कभी तो जायेगी,   जिस दिन मुझको भी काम मिले वो सुबह कभी तो आयेगी!!!” —————————-      #**  हम जल्द से जल्द विकसित कहलाने की होड मे लगे हैं.हर तरफ बाजार, नफा और नुकसान की बातें हो रही है.हमारे देश मे जो व्यवसाय सबसे ज्यादा फल-फूल रहा है, वो है शिक्षा का. हर तरफ ‘इन्जीनीयरिंग’ और ‘एमबीए’की ‘डीग्रियों’की दूकाने खुल रही हैं और ज्यादातर बडी दूकानो के मालिक या तो राजनीतिज्ञ, या फिर राजनीति से पोषित लोग हैं. देश के जो चन्द प्रतिष्ठितसंस्थान है,उनमे उपलब्ध सीटों की संख्या पढने वालों की संख्या की तुलना मे बेहद कम है. आधे-आधे अँकों को लेकर मारा-मारी है.”केट” हर किसी के पकड मे नही आती और “गेट” भी हर कोई नही खोल पाता! केट और गेट के इस पार और उस पार वालों मे बहुत अन्तर है, चाहे कोई उस पार जाने मे जरा-सा ही मात खा गया हो. कहा जा रहा है कि रोजगार के अवसर और लोगों के लिये सुविधा बढ रही है. हाँ काम मिल रहा है बडे-बडे ‘शाॅपिंग माॅल्स’, ‘मल्टीप्लेक्स’ मे टाई-सूट-बूट पहन कर ‘वेलकम’,’मे आय हेल्प यू?’ और ‘थैन्क्यू’ कहने का!! या फिर किसी कम्पनी का प्रोडक्ट बेचने के लिये ‘सेल्स रीप्रेसेन्टिव’ बनने का. ये काम तो वो बिना डीग्री के भी कर लेगा,फिर डीग्रीयों की दूकाने लगाकर क्यों लूटा जा रहा है? कहते हैं कि कोई भी काम छोटा या बडा नही होता, तो शायद फिर इसी तरह बडे व्यवसायी बडे से बडे होते जायेंगे छोटे लोगों की मेहनत के बल पर!  **#   [...]
  8. रचना बजाज
    आपका ये लेख बहुत पसंद आया खासकर ये लाइनें:-
    देश और राष्ट्र के लिये समर्पण करने वाले अब अल्पमत में हैं और समर्पण भावना अब पुराने फैशन की चीजों मे शामिल हो गयी है। लेकिन इमारते हैं कि अपना रूप नहीं बदलती।
    और हां ये किसने कहा:-
    सन १९५६ में खड़गपुर तकनीकी संस्थान के संस्थान के दीक्षांत समारोह में अपने उद्गार व्यक्त करते हुये कहा…
  9. ‍अभिनव
    वाह वाह
  10. eswami
    ये चित्र तो जैसे अपने साथ अतीत में ही ले जाते हैं!
  11. फुरसतिया » बेल्दा से बालासोर
    [...] बेल्दा में हम एक मंदिर में रुके थे। सबेरे वहां से नाश्ता करके हम आगे के लिये चल दिये। थोड़ी ही देर में हम उड़ीसा राज्य की सीमा पर मौजूद थे। “उड़ीसा आपका स्वागत करता है” के पत्थर के दोनों तरफ खड़े दिलीप गोलानी और विनय अवस्थी के फोटो हमने खींचे थे। २३ साल पहले के खींचे फोटो में चेहरे पहचाने जा रहे हैं यह कम बड़ी बात नहीं है। ये फोटो क्लिक-III कैमरे से खींचे गये थे। लगभग तीन महीने तक ये रोल बिना डेवलप हुये हमारे पास रखे रहे। [...]
  12. SR Shankhala
    अच्छा लगा आपका ये विवरण पढ़कर
  13. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] पड़े 4..हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है 5.देश का पहला भारतीय तकनीकी संस्थान 6.उभरते हुये चिट्ठाकार 7.बेल्दा से [...]

Monday, December 18, 2006

हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है

http://web.archive.org/web/20110101193317/http://hindini.com/fursatiya/archives/218

हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है

पिछली पोस्ट में मैंने अपनी बहुत पहले की लिखी एक कविता कम तुकबंदी ज्यादा का जिक्र किया था। इसे हमने सालों पहले होली के मौके पर लिखा था। कुछ लोगों को यह कुछ पसंद आयी। अपने इस भ्रम की आड़ में मैं यह कविता यहां पूरी की पूरी पेश कर रहा हूं। जो लोग इसे पहले ही पढ़ चुके हैं आशा है वे इसे अन्यथा न लेंगे।
इतने दिन बाद इसे दुबारा पोस्ट करने का कारण आज का टाइम्स आफ इंडिया का संपादकीय है। इसमें हंसी की ताकत का जिक्र किया गया है। तमाम अध्ययनों से यह पता चला है कि अगर आप हंसते रहते हैं तो आपके शरीर में धनात्मक परिवर्तन होने की संभावनायें बढ़ जाती हैं।
तो पढ़िये यह कविता कम तुकबंदी ज्यादा। अगर आपको इसे पढ़ते एक क्षण के लिये भी हंसी या मुस्कान से साक्षात्कार होता है तो हमें अच्छा लगेगा! वैसे तो इसे होली के अवसर पर लिखा गया था लेकिन सच तो है कि हंसी किसी मौसम की मोहताज नहीं होती!


आज होली का त्योहार है,
हम सबकी खुशियों का विस्तार है
हर हाल में हंसने का आधार है हंसी का भी बहुत बड़ा परिवार है
कई बहने हैं जिनके नाम है-
सजीली, कंटीली, चटकीली, मटकीली
नखरीली और ये देखो आ गई टिलीलिली।
हंसी का सिर्फ एक भाई है
जिसका नाम है ठहाका,
टनाटन हेल्थ है, छोरा है बांका।
हंसी के मां-बाप ने
एक लड़के की चाह में
इतनी लड़कियां पैदा की
परिवार नियोजन कार्यक्रम की
ऐसी-तैसी कर दी।
हंसी की एक बच्ची है
जिसका नाम मुस्कान है,
अब यह अलग बात कि उसमें
हंसी से कहीं ज्यादा जान है।
एक बार हमने सोचा -
देंखे दुनिया में कौन
किस तरह हंसता है
इस हसीना के चक्कर में
कौन सबसे ज्यादा फंसता है।
मैंने एक साथी कहा
यार, जरा हंसकर दिखाओ
वो बोला -पहले आप।
मैं बोला मैं तो हंस लेता,
हंसता ही रहता
पर डरता हूं लोग बेहया कहेंगे
-बीबी घर गयी है ,फिर भी हंस रहा है
लगता है फिर कोई चक्कर चल रहा है।
इस बात को सब काम छोड़कर
वे मेरी बीबी को बतायेंगे
तलाक तो खैर क्या होगा
लेकिन वो मुझे हफ्तों डंटवायेंगे।
सो दादा यह वीरता आप ही दिखाइये
ज्यादा नहीं सिर्फ दो मिनट हंसकर बताइये
इतने में दादा के ढेर सारे आंसू निकल आये
पहले वो ठिठके ,शरमाये,हकलाये फिर मिनमिनाये
-हंसूंगा तो तुम्हारी भाभी भी सुन लेगी
बिना कुछ पूंछे वह मेरा खून पी लेगी
कहेगी-मैं हूं घर में
फिर यह खुश किस बात पर है
बीबी का डर, लाजो शरम
सब रख दिया ताक पर है।
वहां से निकला पहुंचा मैं आफिस, साहब से बोला
साहब ने मुझको था आंखो-आंखो में तोला
मैंने कहा -साहब जरा हंसने का तरीका बताइये
साहब लभभग चीखकर बोले
हमको ऊ सब लफड़ा में मत फंसाइये
हंसना है तो अपने दस्तखत में
हंसने का प्रपोजल बनाइये
बड़का साहब से अप्रूव कराइये
फिर जेतना मन करे हंसिये-हंसाइये
पर हमको तो बक्स दीजिये-जाइये।
बड़का साहब से पूंछा-
साहब आप गुनी है, ज्ञानी हैं
अनुभव-विज्ञानी है
खाये हैं खेले हैं
जिंदगी के देखे बहुत मेले हैं
हमको भी कुछ अनुभव-लाभ बताइये
हंसने का सबसे मुफीद तरीका बताइये
साहब बोले, अब तुम्हीं लोग हंसो यार
हमारी तो उमर निकल गई
अब हंसना है बिल्कुल बेकार।
तुम्हारे इत्ते थे तो हम भीं बहुत हंसते थे
पूरी दुनिया को अंगूठे पे रखते थे
तुम ऐसा करो पुरानी फाइलें पलट डालो
उनमें हंसी के रिकार्ड मिल जायेंगे
नमूने तो पुराने हैं पर ट्रेंड मिल जायेंगे।
फाइलें में कुछ न मिला
सब दे गई गयीं धोका
सोचा भाभियों से पूछ लें
होली का भी है मौका।
हमने कहा, भाभी जी जरा हंस कर दिखाइये
वे बोली भाई साहब ये तो बाहर गये हैं
आप ऐसा करें कि तीन दिन बाद आइये
मैंने कहा अरे उसमें भाई साहब कि क्या जरूरत!
आप कैसे हंसती हैं जरा बेझिझक बताइये।
वे बोली, नहीं भाई साहब अब हम
हर काम प्लानिंग से करते हैं
सिर्फ संडे को हंसते हैं
आप उसी दिन आइये
इनसे बतियाइये, नास्ता कीजिये
हमारी हंसी के नमूने ले जाइये।
अगर जल्दी है तो चौपाल चले जाइये
वहां लोग हंसते हैं, खिलखिलाते हैं
बात-बेबात ठहाके लगाते हैं
आप अगर जायें तो मेरे लिये भी
चुटकुले नोट कर लाइयेगा
क्योंकि अब तो ये पिटी-पिटाई सुनाते हैं
हंसाते हैं कम ज्यादा खिझाते हैं।
इस सब से मैं काफी निराश
फिर भी आशावान था थोड़ा
सोच -समझ कर मैंने स्कूटर अस्पताल को मोड़ा
डा.झटका से मिला हेलो-हाय की ,सीधे-सीधे पूंछा
यहां अस्पाताल में लोग किस तरह हंसते है
डा. लगभग चीख कर बोले -क्या बकते हैं?
यहां अभी तक मैंने ऐसा कोई केस नहीं देखा
आपको किसी और बीमारी का हुआ होगा धोखा
क्योंकि हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है
एक से दस, दस से सौ तक फैलती इसकी क्यारी है
एक बार फैलने पर इसका कोई इलाज नहीं होता
यह हर एक को अपनी गिरफ्त में ले लेती है
सारा वातावरण गुंजायमान होता है।
मैं बोला फिर भी हंसी का कोई मरीज आया तो
आप उसका इसका कैसे करेंगे?
इस लाइलाज समस्या से कैसे निपटेंगे?
डा.बोले -रोग कोई हो
इलाज हम एक ही तरीके से करते है
शुरुआत कुनैन के तीन डोज से करते हैं
फिर हम अपने यहां हर उपलब्ध खिलाते हैं
दवायें खत्म हो जाने के बाद
हम मरीज को सिविल हास्पिटल भिजवाते हैं
कुछ दिनों में मरीज की इच्छा शक्ति लौट आती है
उसकी तबियत अपने आप ठीक हो जाती है
सो आप चिंता मत कीजिये घर जाइये
भगवान का नाम जपिये चैन की बंशी बजाइये।
इसके बाद मैंने सोचा बच्चे तो मासूम होते हैं
कम से कम वे तो अंगूठा नहीं दिखायेंगे
न हंसें पर कहने पर जरूर मुस्करायेंगे
मैंने एक बच्चे को पकड़ा, गुदगुदाया
लेकिन यह क्या-
उसकी तो आंख से आंसू निकल आया।
वो बोला-अंकल, आजकल हम छिपकर,
बहुत किफायत से हंसते हैं
क्योंकि हम अपने नंबर कटने से बहुत डरते हैं
हर हंसी पर ‘सरजी’ प्रोजेक्ट वर्क बढ़ा देते हैं
ठहाके पर तो टेस्ट के नंबर घटा देते हैं
इससे मम्मी-पापा अलग परेशान होते हैं
कुछ देर स्कूल को कोसते हैं
फिर गुस्सा हम पर उतार देते हैं
इसीलिये हम अपनी हंसी का पूरा हिसाब रखते हैं
दिन भर में दो बार मुस्कराते हैं,
केवल एक बार हंसते हैं
ठहाका तो हफ्ते में सिर्फ एक बार लगाते हैं।
इतना सब सुनकर
हंसने के लिये मैं खुद गुदगुदी करता हूं
हंसी गले तक आती है फिर लौट जाती है
हंसी का कोई प्रायोजक नहीं मिलता है
अपने आप हंसना घाटे का सौदा लगता है
ऐसे में कौन किसे हंसाये ,किसे गुदगुदाये
सब अपने में व्यस्त हैं परेशान -हड़बड़ाये,
यही सब सोचकर मैंने अपनी कलम उठायी
होली का मौका मुफीद समझा और यह कविता सुनायी।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है”

  1. Laxmi N. Gupta
    सुकुल जी,
    आपका जवाब नहीं। बहुत धाकड़ कविता है। बाँटने के लिये धन्यवाद।
  2. अनुराग
    बहुत बढ़िया बीमारी के बारे में बताया. पर अनूप जी, अफसोस इस बात का है कि तरह-तरह के टीकाकरण (वैक्सिनेशन) की मदद से हमने इस बीमारी का समूल नाश (इर्राडिकेट) करने की ठान सी ली है.
    काश, इस बीमारी की महामारी फैले.
    बहुत सहज तरीके से लिखी रचना है, खास कर “टिलीलिली”.
  3. समीर लाल
    मान्यवर महाकवि महोदय,
    कृप्या अन्यथा न लें, मगर यह भी कैसी उम्र दराजी कि दराज से निकाल निकाल कर कविता पढ़वाई जा रही है. अगर सिर्फ़ लिंक भी देते तो हम जरुर जाते और गये ही थे. देखिये बुरा मत मानियेगा इसके लिये तीन स्माईली :) :) :)
    —वैसे सच तो यह है कविता इतनी बढियां है कि दो बार तो क्या, तीन चार बार भी छापेंगे तो भी लोग बार बार पढ़ेंगे, मुस्करायेंगे, ठहाके लगायेंगे-यह सब वैसे भी आजकल कहाँ नसीब है आमतौर पर.
  4. संजय बेंगाणी
    हँसना-हँसाना क्या इतना है जटील?!
    कोई बुका फाड़ हँसता,
    कोई मुस्कुराता कुटील.
    कोई खुशी में तो कोई गम से हँसता है.
    कविता खुब गुदगुदाएगी
    फुरसतिया के चंगुलमें क्यों फसता है?
    अन्यथा न ले. क्या करें कविता भी छूत की बिमारी है.
  5. प्रत्यक्षा
    हँसा तो दिया ,अब ये बताईये कि फूलों को डरा कर कहाँ भगा दिया । ठहाका ज़रा ज्यादा ज़ोर का लग गया क्या ? :-)
  6. प्रियंकर
    सुकुल जी महाराज,
    आपकी कविता तो खण्ड-काव्य को टक्कर दे रही है . लगता है बगल में रवीन्द्र सरोवर के लाफ़िंग क्लब के सदस्यों को इसकी एक कॉपी देनी पड़ेगी .
  7. ‍अभिनव
    कविता पढ़ कर आनंद आया, यायावरी का किस्सा भी बढ़िया लगा।
  8. Jagat Ram
    Bhut hi Achha, sach mai aaj hansi to gayab hi ho gaee hai

Saturday, December 16, 2006

इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े

http://web.archive.org/web/20110926015500/http://hindini.com/fursatiya/archives/217

इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े

लोग कहते हैं कि ‘असंभव’ शब्द मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है। एक स्वयंभू ज्ञानी को अपने शब्दकोश में ‘असंभव’ दिख गया तो महीनों परेशान रहा। उसको समझ में नहीं आ रहा था कि इतने ज्ञानी होने के बावजूद उसके शब्दकोश में मूर्खता कैसे आ गयी!
किसी ने उसे समझाया भी कि ये उसी तरह है जैसे दिल्ली में विकास के साथ झोपड़पट्टियां भी बढ़ती चली गयीं। यह भी कहा कि विकास और झोपड़पट्टियों का जिस तरह चोली-दामन का साथ है उसी तरह ज्ञानी और मूर्खता का अटूट संबंध है। लेकिन ज्ञानी के दिमाग से नेपोलियन का कहा अमर वाक्य भारत में अंग्रेजी सा धंसा रहा- असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।
विकास और झोपड़पट्टियों का जिस तरह चोली-दामन का साथ है उसी तरह ज्ञानी और मूर्खता का अटूट संबंध है।
ज्ञानी ने सोचा दिल्ली की झोपड़पट्टियों से तो सरकार और सुप्रीमकोर्ट निपटेगी लेकिन मैं अपने शब्दकोश के ‘असंभव’ शब्द से कैसे छुटकारा पाऊं! बाद में अपनी बुद्धि का प्रयोग करके उसने शुरुआती आधा शब्दकोश रद्दी में बेच दिया और ‘असंभव’ शब्द से मुक्ति पा गया। रद्दी बेचने से मिले पैसे से चुटकुले की किताब खरीद लाया और अब हंसने का अभ्यास कर रहा है।
शायद ऐसे ही किसी ज्ञानी को हंसता देखकर पंडित गिरिराज जोशी ने सोचा होगा कि दुनिया में सब लोग हंसें तो कैसा रहे!
यह काम उनको थोड़ा मुश्किल लगा तो इसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। जोशीजी बहुत विद्वान, मेहनती और अपनी धुन के पक्के हैं। जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं और ठने को पूरा करने तक सबको बेदम किये रहते हैं। इनकी क्षमताऒं का क्या कहना! कुंडलिया हो या हायकू , गज़ल हो या त्रिवेणी या साहित्य की कोई और विधा हर जगह इनके ‘चरण कमल’ वंदना-प्रस्तुत मिलेंगे। हर फटे में इनकी टांग दिखती है! या कहें जहां इनकी टांग दिखी वह जगह अपने को फटने के लिये प्रस्तुत कर देती है। या फिर यह कि किसी भी फटे को देख कर लोग अनायास पूछते हैं -जोशीजी यहां कब आये थे?
हर फटे में इनकी टांग दिखती है! या कहें जहां इनकी टांग दिखी वह जगह अपने को फटने के लिये प्रस्तुत कर देती है। या फिर यह कि किसी भी फटे को देख कर लोग अनायास पूछते हैं -जोशीजी यहां कब आये थे?
अब गिरिराज जोशी का नया शगल है भाई सागर चंद नाहर को हंसाना! गोया सागर कोई रोते हुये बच्चे हों और जोशी जी निदा फाजली जो कि कोई और काम न होने के कारण कह रहे हों:-
घर से मस्जिद बहुत दूर है चलो यूं कर लें
किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये।
कोई बच्चा रो रहा हो उसे तो हंसाना ठीक है लेकिन अपने हंसाने की जिद के कारण यह अच्छे खासे काम-काजी आदमी को रुलाना कहां तक जायज है? यह तो वैसे ही है जैसे परसाई जी लिखते हैं-


‘वन महोत्सव के उदघाटन के लिये जमीन तैयार करने के लिये सारे पेड़ काट दिये गये।’

पता चला कि सागर जी को गिरिराज जोशी जी कवितायें झेलाने का प्रयास कर रहे थे। सागरजी सीधे-साधे आदमी। सो सीधी-साधी भाषा में अनुरोध किया कि ये सुबुक-सुबुक वादी कवितायें मन सुनाया करो। इससे अच्छा कुछ ऐसा लिखो कि पढ़कर हंसी आये। बस इसी बात से गिरिराज जोशी ने एक और फटे में टांग फंसा ली और सागर भाई को हंसाने का ठेका ले लिया। अब खुद तो चूंकि वे कविता लिखने जैसा महान काम करते हैं। और महान व्यक्ति हंसाने जैसा ओछा काम कैसे कर सकता है।
लिहाजा गिरिराज जोशी ने इस काम के लिये मसखरे खोजना शुरू कर दिया। दो-तीन शो जोशीजी करा चुके हैं। उतने से सागर भाई को पता नहीं कैसा लगा लेकिन जोशी जी को मजा नहीं आया और वे कह रहे हैं-‘शो मस्ट गो आन।’ अभी हमें मजा नहीं आया। अभी सागर जी को और हंसाया जाये।
चूंकि वे कविता लिखने जैसा महान काम करते हैं। और महान व्यक्ति हंसाने जैसा ओछा काम कैसे कर सकता है।लिहाजा गिरिराज जोशी ने इस काम के लिये मसखरे खोजना शुरू कर दिया।
आजकल यह जोशीजी का पूर्णकालिक कार्यक्रम हो गया है। किसी भी तरह सागर भाई को हंसाया जाये। वे नेट पर मिले हर शक्स से रो-रोकर विनती करते हैं- बस किसी तरह सागर भाई को हंसा दीजिये। उनकी आंख से निकले आंसू सामने वाले के की-बोर्ड को गीला कर देते हैं। एक बारगी तो लगता है कि अगर जोशीजी के सागर हंसाऒ अभियान को कुछ व्यवधान पहुंचा तो ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण दुनिया के तमाम शहरों के डूब जाने की भविष्यवाणी सच साबित होने के पहले ही जोशीजी के नयन-नीर से जलप्रलय हो जायेगी ! वे सागर जी को हंसाने के लिये उससे कम परेशान नहीं हैं जितना कि अमेरिका जैसे अतिसभ्य देशों का जी दुनिया के तमाम असभ्य देशों को सभ्य बनाने के लिये हलकान हैं।
लगता है कि अगर जोशीजी के सागर हंसाऒ अभियान को कुछ व्यवधान पहुंचा तो ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण दुनिया के तमाम शहरों के डूब जाने की भविष्यवाणी सच साबित होने के पहले ही जोशीजी के नयन-नीर से जलप्रलय हो जायेगी !
जैसे अमेरिका जैसे देश इराक जैसे देशों को सभ्य/लोकतांत्रिक देश बनाने के लिये उसकी हर तरह से बर्बादी कर रहे हैं उसी श्रद्धा से जोशीजी सागरजी को हंसाने में जुटे हैं। हर संभव उपाय कर रहे हैं। हर किसी आते-जाते को ठेका थमा रहे हैं कि सागरजी को हंसाऒ। अर्जुन को मछली की आंख की तरह उनकी आंखों के आगे केवल सागर चेहरा लहरा रहा है। वे सागर के सीने पर उठती हंसी की लहरों का प्रतिबिम्ब उनकें चेहरे पर देखना चाहते हैं।
अपने इस कार्य को वे युद्धस्तर पर करने का प्रयास कर रहे हैं। युद्धस्तर पर प्रयास करने के चलते वे अपने आप ‘प्रेम और युद्ध में सब जायज होता है’ की सुविधा का लाभ उठाने के अधिकारी हो गये हैं। कथनीय-अकथनीय, उचित-अनुचित की सांसारिक सीमाऒं से अपने आप को ऊपर उठाकर अपने दिमाग को अहमकपने की कक्षा में स्थापित कर लिया है। सागर को हंसाने के लिये वे दोस्त, साथी नहीं मसखरे खोज रहे हैं।
सागर को हंसाने के लिये वे दोस्त, साथी नहीं मसखरे खोज रहे हैं।
मसखरे का मतलब होता है भांड़, विदूषक, जोकर, हास्य पात्र। ये सारे कार्यकलाप आमने-सामने के होते हैं। चेहरे के हाव-भाव और शारीरिक क्रिया-कलापों के द्वारा जनसमुदाय को हंसाने का काम आमने-सामने का होता है। ब्लागिंग और भड़ैती में अंतर है। हम अभी ब्लागर की स्थिति से ऊपर नहीं उठ पाये हैं। भड़ैती करने में बहुत मेहनत लगती है। सारे शरीर की २०८ हड्डियों को हिलाना पड़ता है। इतनी मेहनत का न हमारे पास हुनर है न सामर्थ्य। न ही हमारे पास अभी इतनी सुविधायें हैं कि अपने चेहरे पर कुछ पोत-पात कर उछल-कूद करते हुये अपनी वीडियो कान्फ्रेंसिंग या यू-ट्यूब बनाकर दुनिया जहान को दिखायें जिसे देखकर सागर भाई को हंसी आये।
ब्लागिंग और भड़ैती में अंतर है। हम अभी ब्लागर की स्थिति से ऊपर नहीं उठ पाये हैं। भड़ैती करने में बहुत मेहनत लगती है। सारे शरीर की २०८ हड्डियों को हिलाना पड़ता है।
यह समस्या शायद सारे साथियों की रही होगी इसीलिये अभी तक जोशीजी को अपना अभियान अधूरा लग रहा है। हालांकि सागरजी ने लगभग हर पोस्ट में हंसने की बात कही लेकिन जोशी जी का दिल अभी भरा नहीं। वे कहते हैं अभी और हंसाऒ।
उनकी दिलचस्पी सागर चंद्र नाहर को हंसाने में कम मसखरेपन में ज्यादा है। लेकिन जैसा मैंने बताया कि मसखरापन आमने-सामने की चीज है। इसलिये यह इच्छा तो जोशीजी की पूरी होती नहीं दीखती। हमें इसका अफसोस है कि हम मसखरेपन की उनकी इच्छा पूरी करने की काबिलियत नहीं है।
हंसने की बात चली तो अपनी एक पुरानी कविता याद आई। यह मैंने हंसी के ऊपर लिखी थी। तमाम तरह की हंसियों की बात करते हुये लिखा था:-


हंसी की एक बच्ची है
जिसका नाम मुस्कान है
अब यह अलग बात है
कि उसमें
हंसी से कहीं ज्यादा जान है।

आगे लिखा है-
हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है
एक से सौ सौ से हजार तक फैली इसकी क्यारी है।
लोग अपनों को हंसाने के लिये क्या-क्या जतन करते हैं:-


अपनी खुशी के साथ मेरा गम भी निबाह दो
इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े।

तो जोशी जी, अगर आप सागरजी को हंसाना चाहते हैं तो पहले खुद हंसना सीखिये। जब आप खुद हंसेंगे तो आपके साथ के लोग अपने-आप हंसेंगे। आप निर्मल मन से राजस्थान में हंसेंगे तो उसका ठहाका हैदराबाद में सागरजी के कंठ से फूटेगा।
लेकिन मुझे पता है कि जोशीजी मेरी बात मानेंगे नहीं। वे अपनी सागर जी को हंसाने के आयोजन में जुटे रहेंगे। जब तक वे खुद कोई नया शगूफा नहीं कर लेते तब तक इसी काम में दिल लगाये रहेंगे। वे अपनी कविताऒं की नोक पर सागर के भेजे से हंसी निकालने की कोशिश करते रहेंगे।
कल्पना कीजिये कि किसी दिन जोशीजी अपनी कविता के बारूदखाने के साथ सागरजी के पी.सी.ऒ. पर जाकर धमकाते हुये कहें-
जोशीजी:- सागर भाई, खबरदार! आप चारो तरफ़ हमारी कविताऒं से घिर चुके हैं। हिलने की कोशिश की मत करना।
सागरजी:- अगर हिले तो क्या कर लोगे?
जोशीजी:- अगर आपने हिलने की कोशिश की तो सारी की सारी कवितायें आपके भेजे में उतार दी जायेंगी और आपका सारा सुकून-चैन फोटोकापी मशीन से कापी हुये कागज फड़फड़ाता हुआ बाहर आ जायेगा।
सागरजी:-ये क्या मजाक है मेरे भाई? ये किस-किसको लेकर आये हो? जरा परिचय तो कराऒ।
जोशीजी:- हम मजाक करने नहीं आये हैं। हम आपको हंसाने आये हैं। ये हमारे साथ जो कवितायें आयी हैं उनके नाम हैं दोहा-चौपाई, सोरठा-कुंडलिया, हायकू-त्रिवेणी, गज़ल-शेर। एक से एक खतरनाक हथियार हैं मेरे साथ।
सागर:- जोशीजी , ये आप कवितायें लाये हैं या ‘नच-बलिये’कार्यक्रम की जोड़ियां! क्या सीटी बजाने के लिये सरोजखानजी और टांगे दिखाने के लिये मल्लिका सेहरावतजी को भी लाये हो?
जोशीजी:-सागरजी हम मजाक के मूड में नहीं हैं अभी। हम आपको हंसाने आये हैं। यह आपके हित में है कि आप तुरन्त हंसने लगें वर्ना अंजाम के आप खुद जिम्मेदार होंगे।
सागरजी:- जोशीजी हमने आप जैसे तमाम भांड़ देखें हैं। यहीं हैदराबाद की सड़क पर एक से एक विदूषक अपने तमाशे दिखाते रहते हैं। लेकिन हम चुपचाप अपनी फोटोकापी मशीन पर झुके सारा ध्यान इस बात पर लगाये रहते हैं कि कागज कहीं ड्रम में न फंस जाये। जब मुरैना वासी भुवनेश और आगरे वाले प्रतीक तक हमारे चेहरे की कोई शिकन तक नहीं हिला पाये आप क्या खाकर हमें हंसायेंगे। क्या सोचकर आये थे कि आपके आने से हम खुश होंगे, हंसने लगेंगे? बहुत बचकाना सोच है आपका।
जोशीजी:- अभी आपको हमारी ताकत का अन्दाजा नहीं है सागरजी! यहां से पचास-पचास ई-मेल दूर भी जब कोई ब्लागर चहकता है तो लोग कहते हैं बेटा, चहकना बंद करदे वरना गिरिराज आ जायेगा (और कविता की नोक पर टिप्पणियां ले जायेगा)। हमारे किसी भी मेसेंजर पर जाते ही लोग अपना शटर गिराकर आफलाइन हो जाते हैं। आप चुपचाप हंसने लगिये वर्ना हम कविता सुनाने लगेंगे।
सागरजी :-( अपने मस्तक पर टिप्पणियों की तरह चुहचुहा आये पसीने को पोछते हुये) ये कैसी जबरदस्ती है भाई! आज हमारा हंसने का मन नहीं है। हमारी फोटोकापी मशीन का टोनर अभी-अभी आपके भेजे की तरह साफ हो गया है और हमें नयी बोतल डालनी है। दिन भर का काम बाकी है। ऐसे में कोई कैसे हंस सकता है। आप ही बताइये।
यहां से पचास-पचास ई-मेल दूर भी जब कोई ब्लागर चहकता है तो लोग कहते हैं बेटा, चहकना बंद करदे वरना गिरिराज आ जायेगा
जोशीजी:- यह सब हम नहीं जानते। आपको हंसना है। हम आपको हंसाने आये हैं। यह बताने के लिये नहीं कि हंसा कैसे जाये। हम हंसाना जानते होते तो ‘लाफ्टर चैलेंज’ सिद्धूपाजी के सामने पूरे देश को हंसा रहे होते। आप तुरंत हंसना शुरू करते हैं या शुरू करूं हायकू से!
सागर:- अच्छा एक मिनट मैं जरा मुंह साफ करके आता हूं। आप ज़रा यहां बैठो और जब तक मैं वापस आऊं तब तक आप ग्राहक निपटाते रहो। फोन का बिल लेते रहो। फोटोकापी का रेट पचास पैसे प्रति कापी है। अगर कोई ९०% प्रतिशत वाली मार्कशीट की फोटोकापी कराये तो मुफ्त। आप ज़रा बैठो गद्दी पर मैं अभी दो मिनट में आया।
बाद में पता लगा कि सागरजी पीछे के रास्ते से निकलकर अपनी दुकान के बगल के पीसीऒ से अंतर्राष्ट्रीय काल मिलाकर समीरलालजी उनके चेले की शिकायत करते हुये पाये गये। समीरलालजी ने पता नहीं क्या कहा लेकिन यह देखा गया कि सागरजी अपनी दुकान को जोशीजी के ही रहमोकरम पर छोड़कर अपने घर की तरफ़ लपकते हुये पाये गये। जोशीजी उनकी दुकान पर ग्राहकों से जूझते हुये सोच रहे थे ऐसे में सागर भाई से हंसने के लिये जबरदस्ती करना कहीं ज्यादती तो नहीं है।
बाद में पता चला कि कुछ दिन बाद सागरजी ने जोशी के हंसाने के अभियान से तंग आकर अदालत की शरण ली। सागरजी ने अपनी गुहार में अदालत को बताया कि जोशीजी उनको जबरदस्ती हंसाने की कोशिश करके उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। वकील के रूप में उन्होंने भुवनेश शर्मा और प्रतीक को चश्मदीद गवाह के रूप में चुना।
अदालत ने इसे निजता के अधिकार के साथ-साथ मानवाधिकार का उल्लंघन भी माना और तुरंत जोशी को अदालत मे हाजिर होने का सम्मन जारी कर दिया।
जिस समय जोशीजी को अदालत का सम्मन मिला उस समय वे गूगल टाक पर अपने किसी नये बने मित्र को आनलाइन हायकू लेखन सिखा रहे थे। पहली लाइन पूरी कर चुके थे। दूसरी के चार अक्षर टाइप कर चुके थे। हायकू पूरा करते ही संभावित वाह-वाह मात्र आठ अक्षर दूर थे। लेकिन कोर्ट का सम्मन पाते ही उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। अधलिखे हायकू को मानीटर पर अकेला छोड़कर वे उसी तरह बाहर की तरफ़ लपके जिस तरह चुनाव जीता हुआ नेता आम जनता को अकेला छोड़कर शपथ ग्रहण करने के लिये लपकता है। अधूरा हायकू सरकार बदल जाने के कारण अधबने पुल सा अभिशप्त पड़ा अपने पूरे होने की बाट जोह रहा है।
अधूरा हायकू सरकार बदल जाने के कारण अधबने पुल सा अभिशप्त पड़ा अपने पूरे होने की बाट जोह रहा है।
राजस्थान से दिल्ली जाते हुये जोशीजी मुंह से कविता पंक्तियां शेफाली के फूल सी झर रही हैं। कविता सुनते ही पर्वत, नदी, वन, कूप, तड़ाग उनके सम्मान में रास्ता देकर उनके आगे जाने का माध्यम बन रहे हैं। मुझे अनायास हनुमानजी की लंका यात्रा याद आती है जिसका वर्णन करते हुये गोस्वामीजी ने लिखा है:-


जेहि गिरि चरन देहिं हनुमंता
चलेहु सो गा पाताल तुरंता।

इसका अर्थ यह लगाया गया कि हनुमानजी जिस पर्वत पर पैर रखते हैं वह तुरंत पाताल चला जाता है। मैं अभी तक इसी पर विश्वास करता था लेकिन जोशीजी की यात्रा के बारे में जानकर मुझे लगा कि हो न हो हनुमानजी भी बहुत बड़े कवि रहे हों और लंका जाते समय कविता मंत्र फूंकते जा रहे हों जिससे सामने आने वाले सारे पहाड़ उनके सम्मान में रास्ता दे देते हों।
बहरहाल, जोशी जी जब राजस्थान से हैदराबाद की तरफ़ प्रस्थान कर रहे थे तब दिल्ली के नाके पर राजधानी के नाके पर किसी तेज चैनेल की तेज निगाह में आ गये और कालान्तर में उसके हत्थे चढ़ गये। चैनेल वालों की खोजी निगाहों को लगा कि हो न यही वह ‘मिसिंग लिंक’ जिसका मानव विज्ञानी सदियों से इंतजार कर रहे हों। चैनेल वालों से जोशी जी ने बहुत कहा, समझाया। भाटियाजी का हवाला दिया, नीरज दीवान का नाम लिया लेकिन यह विश्वास दिलाने में सर्वथा असफल रहे कि वे कोई अजूबा आइटम नहीं हैं, साधारण ब्लागर हैं।
किसी भी चैनेल वाले के हाथ जब भी कोई अजूबा लगता है तो वे सबसे पहले उसका इंटरव्यू ले लेते हैं। जोशी जी के इंटरव्यू की भी तैयारी होने लगी। जोशीजी, अपने चेहरे पर कैमरा फोकस करते हुये फोटोग्राफर से बोले-जरा नीरज दीवानजी से बात कराऒ। कैमरामैन बोला- मिलाते हैं पहले जरा मुस्कराऒ।
इसके बाद क्या हुआ हमें अभी तक इसकी कोई खबर नहीं मिली है। जैसे ही पता चला हम आपको बतायेंगे।
इस बीच सागरजी आप बतायें आप कैसा महसूस कर रहे हैं!
मेरी पसंद
जिंदगी में बिखर कर संवर जाओगे
आंख से जो गिरे तो किधर जाओगे।
पानियों की कोई शक्ल होती नहीं
जिस भी बरतन में ढालेगा ढल जाओगे।
तुम तो सिक्के हो बस उसकी टकसाल के,
वो उछालेगा और तुम उछल जाओगे।
लाख बादल सही आसमानों के तुम,
जिंदगी की जमीं पे बिखर जाओगे।
मैं तो गम में भी हंसकर निकल जाउंगा
तुम तो हंसने की कोशिश में मर जाओगे।
मशवरा है कि डर छोड़ करके जियो
हर कदम मौत है तुम जो डर जाओगे।
एक कोशिश करो उसके होकर जियो
उसके होकर जियोगे संवर जाओगे।

डा. कन्हैया लाल नंदन

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

18 responses to “इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े”

  1. Pratik Pandey
    “चैनेल वालों की खोजी निगाहों को लगा कि हो न यही वह ‘मिसिंग लिंक’ जिसका मानव विज्ञानी सदियों से इंतजार कर रहे हों।”
    हा हा… बहुत ही ग़ज़ब लिखा है आपने। सभी चिट्ठाकारों की व्यथा मानो समवेत हो कर आपके मुख से निकल रही है। ख़ैर, लगता है कि आप ‘कविराज’ को शॉक ट्रीटमेंट दे रहे हैं। :)
  2. समीर लाल
    बहुत खुब और सटीक लेखन. अब कोई हंसे न हंसे या कोई रोये न रोये, गिरिराज तो निश्चित ही आपका जयकारा लगायेंगे और बाकी ब्लागर भी अब (शायद) कुछ आराम पायेंगे. :) प्रतीक का समर्थन करता हूँ:
    सभी चिट्ठाकारों की व्यथा मानो समवेत हो कर आपके मुख से निकल रही है

    हंसी की एक बच्ची है
    जिसका नाम मुस्कान है
    अब यह अलग बात है
    कि उसमें
    हंसी से कहीं ज्यादा जान है।

    -बड़ी सुनहरी कविता है.बधाई.
  3. अफ़लातून
    अनूपचा अनुभवी किसान ,
    इनकी बात का रखना ध्यान .
  4. Pramendra Pratap SIngh
    achachha kikha hai.
  5. eswami
    वैसे कवियों से सभी दुखी हैं – चिट्ठा चर्चा में भी कवितापाठ, टिप्पणियों मे भी कवितापाठ. हिंदी प्रेमियों को क्या कविताओं और भावनाओं की पेचिश के सिवा कुछ सूझता नहीं?
  6. जगदीश भाटिया
    बहुत सही…
    हंसा भी दिया और संदेश भी दे दिया :)
    नंदन जी की कविता खूब रही।
  7. संजय बेंगाणी
    जबरदस्त.
    आपका लिखा पढ़ने वाला न रो सकता है न हँस सकता है.
    सिर्फ पेट के किसी कोने में फूटती हँसी को दबा कर वाह वाह करता है…
    बहुत खुब. अब आपके लेख लम्बे नहीं लगते.
  8. गिरिराज जोशी
    हंसी की एक बच्ची है
    जिसका नाम मुस्कान है
    अब यह अलग बात है
    कि उसमें
    हंसी से कहीं ज्यादा जान है।

    अतिसुन्दर पंक्तियाँ. मजा आ गया.
    आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. मैने केवल इन पंक्तियों पर ध्यान दिया -
    1. जोशीजी बहुत विद्वान, मेहनती और अपनी धुन के पक्के हैं। जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं
    2. इनकी क्षमताऒं का क्या कहना! कुंडलिया हो या हायकू , गज़ल हो या त्रिवेणी या साहित्य की कोई और विधा हर जगह इनके ‘चरण कमल’ वंदना-प्रस्तुत मिलेंगे।
    3. वे कविता लिखने जैसा महान काम करते हैं।
    इन पंक्तियों को आत्मसात कर लिया -
    जोशी जी, अगर आप सागरजी को हंसाना चाहते हैं तो पहले खुद हंसना सीखिये। जब आप खुद हंसेंगे तो आपके साथ के लोग अपने-आप हंसेंगे। आप निर्मल मन से राजस्थान में हंसेंगे तो उसका ठहाका हैदराबाद में सागरजी के कंठ से फूटेगा।
    आपकी इस पंक्ति से मात्र असत्य झकलता है –
    मुझे पता है कि जोशीजी मेरी बात मानेंगे नहीं।
  9. ratna
    कविता जानदार और लेख शानदार है। बधाई।
  10. हिंदी ब्लॉगर
    नंदन जी की कविता प्रस्तुत करने के लिए विशेष धन्यवाद!
  11. पंकज बेंगाणी
    पहले शक था अब यकिन है।
    आपसे पंगा लेना ……. मतलब………….
  12. फुरसतिया » Blog Archive » हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है
    [...] मार्च 2005 « इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े [...]
  13. ‍अभिनव
    भगवन् धन्य हैं आप, हमारी शुभकामनाएँ स्वीकारें।
  14. श्रीश । ई-पंडित
    फुरसतिया जी की हर पोस्ट में हास्य क्या सभी नौ रस आ जाते हैं। इनकी रचनाएं हँसने के साथ-साथ सोचने को भी बाध्य करती हैं।
  15. brij
    bhai….yeh ‘tum toh hasney ki koshish mein mar jaogey” achcha laga….
    baaki poori ki poori blog post…sar ke oopar se nikal gayi….
    kaun si duniya ki bata kartey ho….
  16. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] चलताऊ चैनल चर्चा 2..जनकवि कैलाश गौतम 3..इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़े 4..हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है 5.देश [...]
  17. कविता-फ़विता, ब्लॉगर से मुलाकात और मानहानि
    [...] फ़िलहाल तो मुझे यह शेर याद आ रहा [...]