Thursday, February 18, 2010

मेरे पंख कट गये हैं वरना मैं गगन को गाता

http://web.archive.org/web/20110905200601/http://hindini.com/fursatiya/archives/1257

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

36 responses to “मेरे पंख कट गये हैं वरना मैं गगन को गाता”

  1. arvind mishra
    श्रोत -नहीं स्रोत -कृपया इसे सुधार लें
    कवि शिरोमणि रमानाथ अवस्थी जी के तो कहने ही क्या
    संस्मरण भाव भीना है
  2. समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले'
    हमें तो साफ सुनाई दिया और साथ बहा ले गया. आपका बहुत आभार…आनन्द आ गया.
  3. गिरिजेश राव
    उन्हें सुनना सम्मोहक है।
    इस पोस्ट के लिए आभार। ऑडियो नहीं सुन पा रहा – धीमा कनेक्सन है लेकिन पंक्तियों को उनके स्वर से जोड़ गुनगुना सकता हूँ।
  4. suman
    nice
  5. सतीश पंचम
    अभी तो मैं पढ और गुन रहा हूं । बहुत अच्छा लगा यह गीत और उसकी बातें।
    आज तो नहीं पर जल्दी ही आपके ब्लॉग पर इनके गीतों को सर्च करते हुए खोजूंगा यह तय है।
    मेरी आज की शाम तो मुंबई के रीगल थियेटर में आराधना के नाम है। 1969 की आराधना फिल्म को थियेटर में 2010 में देखने जा रहा हूँ देखता हूं कैसा फील होता है :)
  6. suman
    nice…………………………………………………………………….
  7. प्रवीण पाण्डेय
    बहुत ही सुन्दर और मन को छूने वाला गीत है । कृपया और गीत डालें ।
  8. ज्ञानदत पाण्डेय
    रमानाथ अवस्थी जी को पढ़ना और गेय स्वर में वाचन करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। उनकी कविता – झील में भी रहता हूं, वीराने के सहारे – मुझे लगता है मानो मेरे मन की बात लिखी हो!
    कविता हो तो उनके जैसी हो! तरल। वर्ना ब्लॉगजगत में जो पढ़ने में आता है, उसमें कई कई गांठें होती हैं।
    यह ऑडियो पूरा न सुन पाये। नेट कनेक्शन और न्वायज के चलते।
  9. संजय बेंगाणी
    जोरदार!
    गीत सुना नहीं पढ़ लिया है.
  10. गौतम राजरिशी
    अवस्थी जी के दो-तीन गीत एक संकलन में हमारे पास भी हैं। एक अनुग्रह ये है कि यदि उनकी रिकार्डिंग डिजिटल फार्मेट हो तो हमें मेल में भेजने की कृपा करें प्लीज।
    आज सुबह से हम बिल्कुल फुरसतियामय हो रखे हैं कि ये चौथी पोस्ट पढ़ रहे हैं लगातार और एकदम तन्मयता से।
  11. kanchan
    रामनाथ अवस्थी जी की कुछ ही कविताएं पढ़ी हैं और बहुत प्रभावित हुई हूँ। उनके विषय में इतनी जानकारी देने एव इस गीत को बाँटने का धन्यवाद
  12. Saagar
    हुजूर से दरखवास्त कभी अपनी आवाज़ में भी कुछ सुनवाया जाये :)
  13. seema gupta
    behd sundar rochak prstuti..
    regards
  14. Ranjana
    उत्कृष्ट सार्थक लेखन की तो पहचान ही यही है कि यह निकलती एक ह्रदय और कलम से है…लेकिन बहकर असंख्य ह्रदय की बात बन जाती है….
    आपका कोटिशः आभार इस सुन्दर मुग्धकारी प्रविष्टि के लिए….
  15. Dr.Manoj Mishra
    रमानाथ जी की रचनाओं का मैं भी प्रशंसक हूँ ,बहुत मन से लिखी है आपनें यह पोस्ट .बहुत आनंद आया .कभी मौका मिला तो सस्वर सुनाऊंगा.
  16. dr anurag
    नाइस पढ़कर हमने बहुत कोशिश की सुनने की.पर सफल नहीं हुए..उस ज़माने के लोग वाकई अच्छे थे .जैसे असल जीवन मे थे वैसा ही लिखते भी थे….
  17. काजल कुमार
    आज की गोष्ठियों में कहां किसी के पास समय है इतनी बात सुनने का. सब सुपरफ़ास्ट हो गया है साथ ही नौटंकिया गया है सो अलग… एसी दुर्लभ मिठाई बांटने के लिए साधुवाद. चले जाने के बाद जाने वालों की याद कहीं अधिक सालती है.
  18. वन्दना अवस्थी दुबे
    अनमोल खजाना है आपके पास. हम सब को इसी प्रकार लाभान्वित करते रहें . बार-बार सुनने की इच्छा हो, इतनी सुन्दर रचना. अवस्थी जी की आवाज़ तो अकम्पित, सधी हुए थी ही.
  19. Abhishek
    हमने तो पहली बार ही सुना अवस्थीजी को. बहुत अच्छा लगा सुनना. आभार इस परिचय के लिए.
  20. Arvind Chaturvedi अरविन्द चतुर्वेदी
    गीत शिरोमणि प.रमानाथ अवस्थी जी को सुनना एक ऐसाअनुभव है जिसे व्यक्त करना मुश्किल है.
    इंडिअन ओयल द्वारा आयोजित एक कवि सम्मेलन में उन्हें सुना था. शायद वह आखिरी बार का अनुभव था. उस कवि सम्मेलन में उन्होने विशेष फरमाइश पर यह गीत सुनाया था. साथ ही ‘ भीड़ में भी रहता हूं वीरान के सहारे …” ( ऊपर अपनी टिप्पणी में ज्ञानदत्त जी ने शायद भूलवश इसे -झील में भी रहता हूं…लिख दिया है).
    यह गीत कानपुर के एक कवि सम्मेलन में ( जब में कुल 12-13 वर्ष का था) सुना था. अब तक कानों में आवाज़ गूंजती है.
    पंडितजी का पढने का पना अन्दाज़ था.
    मेरे पंख …सुनकर भरपूर आनन्द आया. धन्यवाद.
  21. प्रवीण पाण्डेय
    कल से इस कविता को लगातार सुन रहा हूँ । मेरे मन की कथा कोई और गा रहा है । संबल मिल रहा है । कृतज्ञता व्यक्त करने के शब्द नहीं हैं ।
    मेरे पास वह नहीं है
    जो होना चाहिये था,
    मैं मुस्कराया तब भी
    जब रोना चाहिये था।
  22. Shiv Kumar Mishra
    कविता पाठ शुरू करने से पहले अवस्थी जी ने जो कुछ भी कहा, वह अद्भुत है. सच में निश्छल मन के थे वे.
    पूरा पाठ सुन पाया. अच्छी तरह से सुन पाया. अद्भुत पॉडकास्ट है.
  23. amrendra nath tripathi
    बस शुरुआत की वार्ता को लिख दीजिये , जो
    स्वयमेव काव्य है ! बाकी सब बहुत सुन्दर है !
  24. हिमांशु
    रमानाथ अवस्थी और रामावतार त्यागी दोनों मेरे अत्यन्त प्रिय गीतकार हैं । अक्सर अपनी बेकली, हतोत्साह के क्षणॊं, नैराश्य आदि में इनकी रचनायें धीर बनाती हैं ।
    आप इसलिये ही प्रिय हैं कि आपके पास इस सम्पदा का मूल्य संरक्षित है ! अवस्थी जी के स्वर में इस गीत को सुनना अत्यन्त प्रीतिकर है ! प्रारम्भ की ये पंक्तियाँ टंकित होने से छूट गयी हैं शायद -
    “मेरा वश कहीं जो चलता
    तेरे सामने मैं आता ।”
    आशा करूँ, आपके गीतागार में रामावतार त्यागी जी का स्वर भी होगा ! अभिप्सा मुखर है ।
  25. अमिताभ त्रिपाठी ’अमित’
    इस गीत को हमसे बाँटने के लिये आभार! शेष बातें शेष टिप्पणीकारों ने पहले ही कह दी हैं।
  26. aradhana
    बहुत दिन से लिंक ढूँढ़ रही थी इस ब्लॉग का. मिल नहीं रहा था, आज मिला है. इसके पहले चिट्ठाचर्चा में एक बार “टुकुर-टुकुर ताके बेइमनवा” का लिंक मिला था.
    बहरहाल, मैंने बहुत सुना था अवस्थी जी के बारे में आज थोड़ा विस्तार से जाना. धन्यवाद !!
  27. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    मेरे पंख कट गये हैं
    वरना मैं गगन को गाता।
    निःशब्द !
  28. अजित वडनेरकर
    बहुत शानदार पॉडकास्ट। रमानाथ जी का शुरुआती कथ्य महत्वपूर्ण है। इसे कलमबद्ध कर पढ़वाइये। मंचीय कवियों की सतही आत्मप्रशंसा से हटकर अनुभवों का संसार होता था उनका कथ्य, जो उनके रचनासंसार को समझने में मदद करता रहा है।
    रमानाथ जी अद्भुत गीतकार थे।
  29. अशोक स्‍वतंत्र
    तुम्‍हीं हो जो संभाले हो
    वरना बुजुर्गों की निशानी कौन रखता है।
    सार्थक प्रयास है अवस्‍थी जी को सदा जीवित रखने का, साधुवाद
  30. अनूप भार्गव
    इतने सुन्दर गीत को बाँटने के लिये आभार …
  31. विजेंद्र एस विज
    अनूप जी …स्व. रमानाथ अवस्थी जी के बारे में आपके ब्लॉग पर पढ़कर बड़ा ही सुखद लगा..
    2005 में अशोक जी (चक्रधर) के एक कार्यक्रम के लिए मुझे अवस्थी जी की कविता “चन्दन है तो बरसेगा ही..”
    पर एक फ्लैश फिल्म जैसा कुछ करने का सौभाग्य मिला था..तब काफी कुछ जानकारी मुझे अशोक जी के
    माध्यम से उनके बारे में मिलीं..स्व. बच्चन साहब के वह काफी करीब थे ..उनकी शादी का कार्ड अशोक जी ने
    दिखाया..जो बच्चन साहब के चाणक्य पुरी दिल्ली के निवास पर सम्पन्न हुई थी..बड़ा रोचक किस्सा था..
    अवस्थी जी जितना खूबसूरत लिखते थे उतनी ही मधुर आवाज उनकी थी..जिससे उनकी सरलता, सहजता
    का अनुमान लगाया जा सकता है..सुखद बात तो यह है की वह हमारे ही जिले फतेहपुर उ.प्र. के थे..
    आपके माध्यम से उनके बारे में और जानकारी मिली..बहुत बहुत धन्यवाद..
    संभव हो तो उनके आडियो भी ब्लॉग में लगाएं..
    सादर,
    -विज
    -
  32. rajeshri panchal
    wonderful
  33. SHUAIB
    बहुत ही सुन्दर है गीत मगर सुनने से पढ़ना अच्छा लगा मुझे।
  34. Dr.Manoj Mishra
    आदरणीय शुक्ल जी ,
    आज आपनें मेरी सभी पोस्ट देखी-अपनी राय से अवगत कराया.
    इतनी व्यस्तता में आपनें इतना समय दिया मैं आपका बहुत आभारी हूँ.
    इसी तरह स्नेह बनाये रखियेगा,
    सादर.
    मनोज.
  35. जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे यह संसार मिला
    [...] दिन पहले रमानाथ अवस्थीजी के गीतों का कैसेट मिला तो उसी के साथ एक [...]
  36. rajendra awasthi.
    वाह सर जी,आज आपके माध्यम से पहली बार “पूज्य स्व.रमानाथ अवस्थी जी” की कुछ रचनाओं को पढ़ने का सुअवसर मिला, जैसे….”मेरे पंख कट गये हैं वरना मैं गगन को गाता” की प्रस्तुत पंक्तियों ने तो मेरे ह्रदय को हर् लिया है
    “मुझे सबने शक से देखा
    मैं किसको क्या बताता?
    मेरे पंख कट गये हैं
    वरना मैं गगन को गाता। ”
    वास्तव में उनकी प्रत्येक रचना मर्मस्पर्शी,सार गर्भित है सत्य कहूँ तो मेरे पास उचित शब्दों की गरीबी है इसलिए मै कितना भी कहूँ,कह नहीं पाउँगा………..
    आपको कोटि कोटि धन्यवाद…..
    rajendra awasthi. की हालिया प्रविष्टी..अंग्रेजी में हगीस हिंदी में हगासMy ComLuv Profile

Monday, February 15, 2010

टुकुर-टुकुर देउरा निहारै बेईमनवा

http://web.archive.org/web/20140421162802/http://hindini.com/fursatiya/archives/1253

32 responses to “टुकुर-टुकुर देउरा निहारै बेईमनवा”

  1. Prashant(PD)
    लोक गीत सुनना हमेशा से ही अच्छा लगता है, सो ये भी बढ़िया लगा.. :)
    कुछ समझ में नहीं आया तो मिनिग भी मिल गया, अब और क्या चाहिए??
  2. anil kant
    [:)]
    अच्छा लगा
  3. वन्दना अवस्थी दुबे
    लोक-गीत किसी भी क्षेत्र-विशेष की पहचान होते हैं. अवधी बोली के लोकगीत तो वैसे भी बहुत लोकप्रिय हैं. यहां इस सुन्दर लोकगीत सुनवा के आपने हमारी जडें याद दिला दीं. बहुत सुन्दर. (वैसे मैने पहले ही सुन लिया था.)
  4. समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले'
    भावार्थ बड़ा मन लगा कर लिखे हैं. :)
    बढ़िया गीत रहा.
  5. संजय अनेजा
    शुक्ला जी, आनंद आ गया। अर्थ साथ देकर हम जैसॊं के लिये आसानी कर दी। आभार।
  6. amrendra nath tripathi
    .
    अति उत्तम ! ! !
    .
    उस दिन प्रदत्त लिंक के अनुसार जब पढ़ा था तभी मन बंध गया था , यहाँ
    तो सभी पक्ष जैसे स्पर्धा कर रहे हों – क्या चित्र , क्या गीत , क्या लोकगीत , क्या
    भावार्थ ,क्या ध्वनित वस्तु , क्या ध्वनन – शैली , क्या मार्मिकता , क्या सहजता ,
    क्या खिलंदडपना-सह-डपटपना(डहपटपना भी) , क्या लोकगीतजन्य बेबाकपना , आदि – आदि ……
    .
    यह चित्रकार भी उतना ही ‘फोक’ में फुका है गोया
    बिरहा-अगिनिया उकेर कर ही मानेगा !
    .
    और आपने जो भावार्थ लिखा है उसपर उड़न – तस्तरी की सही उड़ान
    है कि ”भावार्थ बड़ा मन लगा कर लिखे हैं. ” , यह मजाक
    नहीं है सच्चाई है ! और एक राज की बात यह भी है कि जब इतने छोटे – छोटे
    वाक्य होने लगें तो मान लीजिये भावुकता पैंयाँ – पैंयाँ चल रही है ! अनुभव जैसे
    अपने आदिम रूप में जाना चाह रहे हों … इस लोक – गीत का अभिप्रेत भी तो यही है !
    ऐसा भावार्थ उस अभिप्रेत का सहज-सरल-सजल-सरस साधन है ! इस मनोयोग-पूर्ण
    साधन को प्रणाम !
    .
    लोकगीत के कंटेंट पर बहुत कुछ कहा जा सकता है पर फिर कभी ! … आज इतनी देर तक
    जगता रहा , अब लगता है कि इस अच्छी पोस्ट को पढ़ना बदा था … आभार ,,,
  7. amrendra nath tripathi
    और हाँ !
    ई गौनई तौ कइउ
    बार सुनि डारेन !

    फुरै मा …
    जिउ अघाय गा !!!
  8. M Verma
    बहुत भाव विभोर कर देने वाली गीत सुनाने के लिये आभार
    बेहतरीन
  9. हिमांशु
    झट से जोड़ दिया आपने लोक संवेदना से ! अवधी का समृद्ध लोक-पक्ष उजागर हुआ यहाँ ।
    लवकुश जी की आवाज में इसे सुनना तो और भी आनन्ददायी है ।
    चित्र भी शानदार बनवाया है आपने ! चित्र का संप्रेषण जबरदस्त है !
    हर्ष हो आया है बहुत । अवधी-अमरेन्द्र तो आ ही रहे होंगे कलेजे लगाने इस प्रविष्टि को !
  10. Dr.Manoj Mishra
    बेहतरीन पोस्ट ,गीत तो हम सभी के तन-मन में बसा है,प्रस्तुति के लिए आपको बहुत धन्यवाद.
  11. ताऊ लठ्ठवाले
    …. उस नठिया को तो बस टुकुर-टुकुर ताकना है!
    लगता है बेचारे पर होली चढ्गई है.:)
    रामराम.
  12. ज्ञानदत पाण्डेय
    यह गाना बज नहीं रहा है। सो कितना टुकुर टुकुर ताकें!
    हमेशा की तरह उम्दा पोस्ट।
  13. विवेक सिंह
    सुन्दर ।
  14. Saagar
    यहाँ तो फाग रंग चढ़ा है… वैसे टेस्ट अच्छा है…. “जोगी जी धीरे -धीरे” वाला… यह फ्लेवर जरुरी था इस बसंत में.
  15. Ranjana
    उफ्फफ्फ्फ़ क्या कहूँ…..
    गीत ने तो मन बाँध ही लिया,पर उसकी जो विवेचना की है आपने….वाह !!!
    सचमुच यह गीत केवल चित्ताकर्षक ही नहीं बल्कि ग्रामीण परिवेश में परिवार के मध्य स्थित नारी की स्थिति भी बखूबी बयां करती है…
    “तोरे संग देउरा मनइहौं फगुनवा,
    मनइहौं फगुनवा,
    जइसै वीरनवा मनावैं सवनवां,
    भौजी तोरी मइया तू मोरो ललनवा,
    टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा| ”
    शील का जिस प्रकार से संवहन किया गया है इनमे…ओह्ह्ह !!! कमाल का है…
    लाजवाब पोस्ट है…लाजवाब…आपका बहुत बहुत आभार इस अद्भुद पोस्ट के लिए…कुछ न कहते हुए भी इस एक गीत के बहाने कितना कुछ कह दिया आपने…
  16. purushottam rana
    bahut he acha laga man karta hai chu lu un pao ko jo hame gyan ke sath sath sahi raste pe chalne ke prerna deta haimouka mele to es no par ek misscal jarur mareye aapse baat kar ke mujhe bahut hr khushi milega thanks …………….09804832572
  17. Abhishek
    बढ़िया !
  18. कार्तिकेय मिश्र
    लाजवाब.. देवर भाभी के आध सूत नाजुक रिश्ते को बहुत नये ढंग से छूती है आपकी यह पोस्ट!
    अबतक इस तरह के रिश्तों में हँसी ठिठोली ही मूल भाव उभर कर आता था, लेकिन इस पोस्ट से भौजाई की संशय में पड़ी मनोवृत्ति बड़े मुखर ढंग से सामने आई है..
    अवधी-भोजपुरी क्षेत्र में पला बढ़ा होने के बावजूद इस मनोविज्ञान पर आज तक गौर नहीं किया… अजीब बात है।
  19. कार्तिकेय मिश्र
    वैसे एक बात बताइये, ई देवर-भौजाई की ठिठोली काहे सूझ रही है,, फागुन का ही असर है या कोई और बात है..?
    ऑफ द रेकार्ड ही सही..
  20. jyotisingh
    shirshak ne hi man moh liya ,jahan aagaz hi itna khoobsurat hai aage kahne ki jaroort hi nahi mahsoos hui ,aapki kalam ki roshni to adbhut hai .
  21. Dipak Chaurasiya 'Mashal'
    किस किस बात की तारीफ करुँ??? माकूल चित्र की, कमाल के लोकगीत की या फिर उसके खूबसूरत निर्वहन की?
    तीनों ने मिलकर इसे एक महत्वपूर्ण पोस्ट बना दिया.. आभार इसे चर्चा में रखने पर..
    जय हिंद… जय बुंदेलखंड…
  22. काजल कुमार
    रचनात्मकता जटिल व दुरूह तो है किंतु है प्रकृति-प्रदत्त. और इस क्षेत्र में प्रकृति अत्यंत कृपण है. अनूप जी, दुखियों (अधिकांश) की इस ब्लागबस्ती में कुछ ही ब्लाग हैं जहां आकर मन वास्तव में ही प्रसन्न होता है.
  23. Alpana
    लवकुश दीक्षित का लिखा/गाया गीत बहुत ही बढ़िया लगा .
    लोक गीत सुनने का अपना ही आनंद है.
    बहुत ही सुंदर!आभार.
  24. Manish Kumar
    शुक्रिया इस लोकगीत को यहाँ साझा करने के लिए।
  25. बवाल
    तोरे संग देउरा मनइहौं फगुनवा,
    मनइहौं फगुनवा,
    जइसै वीरनवा मनावैं सवनवां,
    भौजी तोरी मइया तू मोरो ललनवा,
    टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा|
    बहुत ही वास्तविक और जीवंत यथार्थ का परिचय देती इस पोस्ट की एक एक विषय वस्तु। फ़ुरसतिया जी,
    बस इसीलिए लोग आपके मुरीद हुआ करते हैं।
    सुन्दर अति सुन्दर ! होली पर इससे आला बात नहीं कही जा सकती।
  26. गौतम राजरिशी
    हमारे मिथिलांचल में भी खूब मैथिली गीत हैं इस विषय-वस्तु पर। मेरे ख्याल से इस भाभी-देवर के रिश्ते पर यूपी और बिहार में सर्वाधिक लोक-गीत लिखे गये हैं।
    पिछले पोस्ट जो छूट गये थे पढ़ने जा रहा हूँ अब…
  27. Dr.Danda Lakhnavi
    इस लोक गीत को मंचों पर श्री लवकुश लवकुश दीक्षित से अनेक बार सुना ……..इसे जितनी बार सुनो आनन्द बढाता है। होली की बधाई……इस अवसर पर प्रकृति भी उल्लास से सराबोर है…..उसका एक रूप एक रचना आपको नज़रानाए अकीदत …………डॉ० डंडा लखनवी !
    नेचर का देखो फैशन शो
    -डॉ० डंडा लखनवी
    क्या फागुन की फगुनाई है।
    हर तरफ प्रकृति बौराई है।।
    संपूर्ण में सृष्टि मादकता -
    हो रही फिरी सप्लाई है।।1
    धरती पर नूतन वर्दी है।
    ख़ामोश हो गई सर्दी है।।
    भौरों की देखो खाट खाड़ी-
    कलियों में गुण्डागर्दी है।।2
    एनीमल करते ताक -झाक।
    चल रहा वनों में कैटवाक।।
    नेचर का देखो फैशन शो-
    माडलिंग कर रहे हैं पिकाक।।3
    मनहूसी मटियामेट लगे।
    खच्चर भी अपटूडेट लगे।।
    फागुन में काला कौआ भी-
    सीनियर एडवोकेट लगे।।4
    इस जेन्टिलमेन से आप मिलो।
    एक ही टाँग पर जाता सो ।।
    पहने रहता है धवल कोट-
    ये बगुला या सी0एम0ओ0।।5
    इस ऋतु में नित चैराहों पर।
    पैंनाता सीघों को आकर।।
    उसको मत कहिए साँड आप-
    फागुन में वही पुलिस अफसर।।6
    गालों में भरे गिलौरे हैं।
    पड़ते इन पर ‘लव’ दौरे हैं।।
    देखो तो इनका उभय रूप-
    छिन में कवि, छिन में भौंरे हैं।।7
    जय हो कविता कालिंदी की।
    जय रंग-रंगीली बिंदी की।।
    मेकॅप में वाह तितलियाँ भी-
    लगतीं कवयित्री हिंदी की।8
    वो साड़ी में थी हरी – हरी।
    रसभरी रसों से भरी- भरी।।
    नैनों से डाका डाल गई-
    बंदूक दग गई धरी – धरी।।9
    ये मौसम की अंगड़ाई है।
    मक्खी तक बटरफलाई है ।।
    धोषणा कर रहे गधे भी सुनो-
    इंसान हमारा भाई है।।10
    सचलभाष-0936069753
  28. बेचैन आत्मा
    …टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
    वाह! आपके ब्लॉग पर तो अनमोल खजाने हैं .
  29. RAJ SINH
    क्या बात है अनूप जी ! न जाने ये पोस्ट कैसे छूट गयी थी .देर से आये ………..टुकुर टुकुर निहारते :) .
  30. roop
    बहुत प्रभावी रचना है , अब जाकर पढ़ा . और गायन तो और भी सुस्वादु… वाह ..क्या कहना ! …
  31. Anonymous
    क्या कहू आपके लेखो का, मैं तो दीवाना हूँ तो सिर्फ आपकी कविताओ का |
    मैं तो सलाम करता हु आपके इस दिमाग को की कैसे करते हैं ये अद्भुत रचना
    मैं तो दीवाना हूँ तो सिर्फ आपकी कविताओ का || ;-)
  32. राजकिशोर
    बहुत बढ़िया भईय्या…मजा आ गया…पढ़ने से ज्यादा आनंद सुनने में आया…