Tuesday, April 24, 2012

हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर

http://web.archive.org/web/20140419214321/http://hindini.com/fursatiya/archives/2894

हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर

दो दिन पहले अन्ना कमेटी की मीटिंग के दौरान एक साहब मीटिंग की कार्यवाही मोबाइल में नोट करते पकड़े गये। कमेटी के लोगों ने उनको मोबाइल पकड़कर बाहर कर दिया।
बाहर होते ही वे साहबान अपना मुंह लेकर मीडिया चैनल की तरफ़ भागे। कैमरे के सामने जाकर बयान जारी कर दिया- कमेटी में भेदभाव है। तानाशाही है। मनमानी है। कमेटी छोड़ दी हमने।
कमेटी के लोग भी अपना-अपना मुंह बयानों से लैस कर चैनलों की तरफ़ भागे। चैनलों पर पहुंचकर बयान-गोले दागने लगे। जानकारी दी कि वे साहबान मीटिंग की गुप्त कार्यवाही लीक कर रहे थे। मना किया गया तो माने नहीं। निकाल दिया तो चैनल पर आकर बयान देने लगे।
चैनल-चौपाल पर बहस छिड़ गयी। साहबान कमेटी की एक महिला को सरे कैमरा हड़काते हुये कह रहे थे- तुम होती कौन हो ये सवाल करने वाली। [ हम सोचने लगे कि क्या यहां मैथिली दद्दा को याद करना ठीक होगा- हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी]
करप्शन कमेटी के प्रवक्ताजी, जो श्रंगार के भीषण कवि भी हैं , उन साहबान के लिये अंगार बरसा रहे थे- इन्होंने कमेटी का विश्वास भंग किया।
विश्वास जी लम्बे-लम्बे बयान ऐसे जारी करते हैं जैसे बच्चे लोग लम्बी-लम्बी कवितायें रटकर सुना देते हैं। श्रंगार का यह दुलारा कवि बयान जारी करते समय बेइंतहा अश्रंगारिक लगता है।
साहबजी कमेटी के लोगों के बारे में देश की जनता को बताने लगे- ये लोग मनमानी करते हैं। हम शुरु से कोर कमेटी में हैं फ़िर भी आजतक हमको कभी बयान जारी करने का मौका नहीं दिया।
क्लास गोल करके पिक्चर देखने वाली आदत की तरह करप्शन विरोधी कमेटी के लोग मीटिंग छोड़कर चैनल की तरफ़ भगे चले आये।
भ्रष्टाचारियो के खिलाफ़ मोर्चा खोलने वालों ने एक दूसरे के खिलाफ़ गले खोल दिये। चैनलों पर बयान युद्ध शुरु हो गया। एक-दूसरे पर वक्तव्य के गोले दगने लगे।
वक्तव्य वासना के वसीभूत होकर लोग अपने-अपने हिस्से की सदाचार तपस्या खर्च करने लगे। टीवी चैनल पर आकर बयान जारी करने की इच्छा बड़ी जालिम इच्छा होती है। यह मुई जो न कराये।
चैनल पर फ़ुर्ती से बयान जारी हो रहे थे। लोग एक-दूसरे का बयान नोच रहे थे।
चैनल पर दूरी के चलते लोग मारपीट करने में असमर्थ थे। लेकिन बयान हिंसा में कोई ऐसा कोई पत्थर नहीं छूटा जिसे पलटा न गया हो [left no stone unturned]
हमें लगा कि देश में भयंकर हिंसा के इस माहौल में भी चैनलों पर अहिंसा बची हुई है।
इस पवित्र टीम से जुड़े लोगों ने देश के लिये सूचना का अधिकार जैसा पवित्र अधिकार लागू करने में पसीना बहाया है। गुप्त से गुप्त दस्तावेज की फ़ोटोकापी दस रुपये का पोस्टल आर्डर में लेने का अधिकार। उसी टीम के लोगों में इस बात पर बयान-नुचव्वल हो रही है कि मीटिंग की सूचना लीक करने का प्रयास किया गया। कल शायद यह भी तय हुआ कि मीटिंग में शामिल लोगों की तलाशी ली जायेगी। मोबाइल की अनुमति न होगी।
अब इन तपस्वियों को कौन समझाये कि मोबाइल आये तो अभी कुछ साल हुये। आदमी अपना मन तो साथ लिये पैदा होता है। क्या उसकी भी तलाशी होगी। मीटिंग में शामिल होने वालों से कहा जायेगा- कृपया अपना दिल,दिमाग स्विच आफ़ करके मीटिंग में भाग लें।
जब जनता के लिये काम करने करने वालों की मीटिंगें भी गुप्त होने लगीं तब तो हो चुका। जनता के लिये लड़ाई के एजेंडे भी अगर स्विस बैंक के एकाउंट की तरह गुप्त रखे जायेंगे तो फ़िर क्या फ़ायदा। मजा नहीं आया भाई इस नाटक में। :)
जिस तेजी से इस घटना के मसले पर चैनलबाजी हुई उसका अगर नाट्य रूपान्तर किया जाये तो शायद इस तरह होगा:
भाई जान: ये भाईजी आप ये क्या टेप कर रहे हैं मोबाइल में। बंद करिये इसे। मीटिंग की कार्यवाही टेप मत करिये।
साहेबान: जनाब मैं तो बस ऐसे ही खेल रहा हूं मोबाइल से। मुझे तो इसे आपरेट करना नहीं आता।
भाईजान: मोबाइल आपरेट नहीं कर पाते तो एनजीओ कैसे चलायेंगे आगे चलकर?
साहेबान: अपन को एनजीओ की जरूरत नहीं। नेताजी ने अपन को पद देने का वायदा किया है।
भाईजान: तो फ़िर जाइये आप नेता जी के पास। यहां हमारा टाइम काहे को खोटा कर रहे हैं। चलिये निकलिये।
साहेबान: आप हमारी इस तरह बेइज्जती मत खराब करिये। मैंने शुरु से ये दुकान जमाने में पसीना बहाया है।
भाईजान: आप तो जनता की सेवा का सारा मौका हड़पना चाहते हैं। ऐसे नहीं चलेगा। अब आप निकलिये।
साहेबान: जा रहे हैं। मेरा भी परता नहीं पड़ता अब यहां। न कोई बयान न वक्तव्य। ऐसे कब तक कोई खटता रहेगा।
भाईजान: अरे जाइये, जाइये। बड़े आये बयान देने वाले। कोई चैनल वाला आपके सामने माइक तक नहीं डालेगा।
साहेबान: जा रहा हूं। और मैं भी देखता हूं कि कैसे चैनल वाले माइक नहीं लगाते मेरे सामने। मैं भी दिखा दूंगा कि कैसे बयान जारी किया है।
भाई जान: चलिये देखते हैं। हिम्मत है आ जा टीवी चैनल पर। सिट्टी-पिट्टी न गुम कर दी तो असल प्रवक्ता नहीं।
इसके बाद कमेटी के लोग मीटिंग समेटकर बाहर निकल लिये। बाहर ही चैनल वालों ने कमेटी वालों को उसई तरह घेर लिया जैसे रेलवे स्टेशन से निकलते यात्री को आटो वाले घेर लेते हैं।
इसके बाद टीवी चैनल वाले मीटिंग से निकले लोगों से सारे बयान चूस कर टीवी- थाली में रखकर हमारे सामने पेश करता है। हम चाय की चुस्की लेते हुये लोगों के बयान सुनते हैं। कल तक हाथों में हाथ लिये फोटो खिंचाते मुस्कराते लोग बयान जारी करते दीखते हैं- हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर। तुझे समाज सेवा का दूध न याद दिला तो नाम नहीं। :)
सूचना:फ़ोटो फ़्लिकर से साभार। ऊपर वाली फ़ोटों में हाथ ऊपर करके खड़े लोगों का हाथ नीचे करके खड़े साहब से बयानबाजी हो गयी। :)

21 responses to “हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर”

  1. देवांशु निगम
    ये तो ग़दर मच गया , रायता फ़ैल गया एकदम !!!!
    हम तो एक और बात पढ़े कि साहबान ने निकलते ही कह दिया कि समिति एक विशेष धर्म विरोधी है :) बताइए अभी तक समिति नहीं थी अब हो गयी |
    सही कहा आपने यहाँ सबको टीवी पे आने कि जल्दी है, अन्ना को भूल गए :) :) :)
    अंत की नाटिका मस्त लगी :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..सखी वे मुझसे लड़ के जाते…
  2. राजेन्द्र अवस्थी
    वाह आदरणिय, बहुत गज़ब आई.पी.एल. शब्दों के माध्यम से एक बार फिर आपने खेला है….आपने व्यंग के द्वारा जनसेवा करने का दम भरने वाले लोगों की सच्ची तस्वीर बहुत ही संतुलित शब्दों मे प्रस्तुत की है…सदा की तरह देश वासियों को संदेश देता हुआ लेख…मजेदार..।
  3. sanjaybengani
    सब ठीक है, बस ये बता दिजीये जब सारे लोग हाथ उठा रखे हैं ये महाशय हाथ नीचे किये क्या कर रहे है. कोई एकता ही नहीं… :)
  4. Anonymous
    @ वक्तव्य वासना ………सदाचार तपस्या??????????
    अग्नि ५ ……….. की मारक क्षमता……………………
    जय हो……..
    प्रणाम.
  5. सतीश सक्सेना
    @ कृपया अपना दिल,दिमाग स्विच आफ़ करके मीटिंग में भाग लें…
    गुरु,
    हम तो आपकी कथा सुनते, कभी यह समझ नहीं पाए कि दिमाग स्विच ऑफ़ करके एक तरफ रखें,बिजली खर्च होने दें,
    कई बार स्विच ऑन करना पड़ता है जब बात जमती सी नज़र आती है !
    फिर दिमाग कहता है अनूप गुरु हैं यार…
    काहे सीरयस लेते हो …
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..सब झूम उठे ….-सतीश सक्सेना
  6. aradhana
    श्रंगार के भीषण कवि’ आपकी उपमाओं और रूपकों का जवाब नहीं :)
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..क्योंकि हर एक दोस्त – – – होता है
  7. संतोष त्रिवेदी
    हम तो कह रहे हैं कि वह दिन भी जल्द आ जायेगा जब चैनल वाले बहस-कर्ताओं की आपसी गुत्थम-गुत्था को भी स्पोंसर करेंगे और उनको भुगतान भी देंगे.इससे चैनल की टीआरपी और माननीयों की साख दोनों बढ़ेगी !
    …अब भई जिसके इत्ता बूता हो वही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़े का बीड़ा उठावे,हमरे बस की तो ना है !
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..बने रहना कठिन है !
  8. आशीष श्रीवास्तव
    इस बार आपने बहुत बढ़िया शीर्षक रखा है “हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर”
    और व्यंग्य भी कमाल का है
    “उसी टीम के लोगों में इस बात पर बयान-नुचव्वल हो रही है कि मीटिंग की सूचना लीक करने का प्रयास किया गया।”
    सारे महत्वाकांक्षी लोग इकट्ठे हो रहे है …… हर कोई टीवी चैनल पर आना चाहता है जिसे रोकोगे वह यही करेगा…
    अब नीव का पत्थर कोई नहीं बनाना चाहता
    आशीष श्रीवास्तव
  9. आशीष श्रीवास्तव
    “अब नीव का पत्थर कोई नहीं बनना चाहता ” पढ़ा जाये वैसे आप तो स्वयं समझदार है :) :) :D
    –आशीष श्रीवास्तव
  10. sanjay aneja
    एक ठो गाना है, याद आ गया – http://www.youtube.com/watch?v=SkHqzLuPxK8
    ‘मुसलमानों के साथ भेदभाव’, ‘राजनीतिकरण’, ‘तुम हमें क्या निकालोगे, हमने ही छोड़ दी तुम्हारी कोर कमेटी’ ‘ये शाजिया है क्या?’ वगैरह जुमले ऐसे निकल रहे थे मुफ्ती साहब के मुंह से जैसे ममता दी की दुरंतो:)
    sanjay aneja की हालिया प्रविष्टी..A syndrome that is called …..(ladies, excuse me please this time) बवाल-ए-बाल
  11. प्रवीण पाण्डेय
    बैठकें गंभीर हो गयीं।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..एक लड़के की व्यथा
  12. arvind mishra
    समानांतर एक और काण्ड हुयी गवा है -सब लोग निहार चुके -जल्दी नहीं तो बस झंखना ही पड़ेगा :)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..हेट स्टोरी -एक "पर्दाफाश" फिल्म!
  13. Anonymous
    विश्वास जी लम्बे-लम्बे बयान ऐसे जारी करते हैं जैसे बच्चे लोग लम्बी-लम्बी कवितायें रटकर सुना देते हैं। श्रंगार का यह दुलारा कवि बयान जारी करते समय बेइंतहा अश्रंगारिक लगता है।
    यह अच्चा है सरजी
  14. विजय गौड़
    हमेशा की चुस्ती इस आलेख में उतनी नहीं| जाने क्यों ? हो सकता है मेरे पढने में ही कहीं कुछ एकाग्रता की kamI तो नहीं| खैर|
  15. satyavrat shukla
    मुझको तो अब लगने लगा है की सबकी अपनी अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हैं जिनकी पूर्ती लोग अन्ना जी के नाम से करना चाहते हैं ………और सभी एक दूसरे से आगे नज़र आना चाहते हैं |
    बहुत ही अच्छा व्यंग है ….या कहें की यथार्थ की चोट है ……कुछ लोगों को लोकप्रियता मिल गई और जो पहले से लोक प्रिय थे उन लोगों की लोकप्रियता बढ़ गई ….अगर ऐसा ही करते रे तो जल्दी ही अलोकप्रिय भी हो जायेंगे …..
    satyavrat shukla की हालिया प्रविष्टी..सोसिअल नेटवोर्किंग और नेता- "करना पड़ता है ….."
  16. dhiru singh
    अगर टीवी पर समाचार दिन में सिर्फ पहले की तरह एक घंटा आये तो कई समस्याए अपने आप ही खत्म हो जाए .
  17. anita
    कुछ महीने पहले सोचा न था कि अन्ना दिवाली के अनार सा चमक कर यूं फ़ुस्स हो जायेगा। बड़िया व्यंग…॥
  18. समीर लाल "पुराने जमाने के टिप्पणीकार"
    सभी मौका देख फसल काट लेते हैं..श्रृंगार क्या—व्यंग्यकार क्या…आपने भी हरियाते खेत पर हसिया चला ही लिया न!! :) जिओ रज्जा कनपुरिया इन जबलपुर!!
  19. pawan mishra
    ई साझे की सुई कब्बौ ना उठी. एक फिलिम आयी थी “चुप चुपके” जिसमे राजपाल यादव कहता है कि हमे सब कुछ आता है इसे कुछ नही. यही हाल तथाकथित टीम अन्ना का है एक दिन जरूर आयेगा जब अन्ना भी भरे मन से यहा से खसकेगे.
  20. G C Agnihotri
    जिस टी वी ने अन्ना को झाड पर चढ़ाया, उसी ने पहले कोर कमेटी फिर अन्ना को नेस्तनाबूद कर दिया. सत्यवचन, इलेक्ट्रानिक मीडिया वो भी टी वी वाला पूरा भस्मासुर है, हरजाई है. अब अन्ना में वो मजा कहाँ. बात तो नए मजे की है, अन्ना बिचारे पुराने कब तक नया वाला मजा देंगे
  21. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] हिम्मत है तो आ जा टीवी चैनल पर [...]

Thursday, April 19, 2012

अमेरिका के कुत्ते और दुनिया के गरीब

अमेरिका के कुत्ते और दुनिया के गरीब


आज सबेरे-सबेरे टेलीविजन देख रहे थे। तीन खबरें याद रहीं।
1. अमेरिका में कुत्तों के लिये एक टेलीविजन चैनल खुला।
2. भारत में अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण आज होगा।
3. कानपुर में एक प्रिंसिपल पर जान लेवा हमला।

टीवी चैनल के बारे में बताया गया कि ये फ़ालतू की टीआरपी दौड़ के चक्कर में नहीं फ़ंसेगा। न ही इसमें विज्ञापन होंगे। पांच डालर का यह चैनल उन कुत्तों के मनोरंजन के लिये होगा जिनके मालिकों के पास उनकी देखभाल का समय नहीं है। वे दफ़्तर चले जायेंगे तो उनके कुत्ते अपना टीवी चैनल देखकर मजे करेंगे। इस खबर का लोग अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण करेंगे। सबसे पहले तो यही लगा कि अमेरिका के कुत्तों की क्या ऐश है। या कहें कि अमेरिका में कुत्तों तक की ऐश है। क्या पता कोई चिढ़ा हुआ अमेरिकी कहे- अमेरिका में केवल कुत्तों की ही ऐश है। उनके मनोरंजन के लिये टीवी का भी इंतजाम है। पांच डालर मतलब अपने देश के पांच गरीबी रेखा वालों की दिहाड़ी( 30-32 रुपये बताई गयी थी न कुछ दिन पहले)।

हमें कोई अमेरिकी कुत्तों से जलन नहीं है। सबका अपना-अपना भाग्य है। भारत में भी ऐसे कुत्तों की कमी नहीं है। बस चैनल चालू होना है। होगा भी जल्दी ही। अमेरिकी फ़ैशन भारत आने में ज्यादा समय नहीं लेता। आ ही जायेगा जल्द ही। जब तक आयेगा तब तक लोग उसकी रिकार्डिंग से काम चलायेंगे। कुत्ता सबसे सम्माननीय पालतू जानवर माना जाता है। कुत्तों के बाद फ़िर बिल्लियों और दूसरे पालतू जानवरों का नम्बर आयेगा।

अग्नि-5 मिसाइल के बारे में बताया गया कि यह बहुत दूर तक मार कर सकती है। निशाना अचूक है। आप इसको बेफ़ालतू की ही बात मानेंगे लेकिन खुदा झूठ न बुलाये एक बार सोचा कि अपने यहां की तमाम चिरकुटैयां भी एक निशाना होंती। घपला/घोटाला, भुखमरी, करप्शन, गैरबराबरी और तमाम नीचतायें। उन पर दो चार मिसाइल छोड़ देते। कुछ तो कीमत वसूल होती इन मिसाइलों की।

कीमत वसूल होने की बात इसलिये कही कि दुनिया में सबसे ज्यादा पैसा हथियार बनाने पर खर्चा होता है। लेकिन सबसे कम उपयोग इनका ही होता है। कास्ट इफ़ेक्टिवनेस इंडेक्स के मामले में दुनिया के हथियार सबसे लचर साबित होंगे।
उधर नसरुद्दीन शाह जी टीवी पर बता रहे थे कि भारत में ’बहुत से लोगों’ को पीने के लिये साफ़ पानी भी नहीं मिलता। पानी बचेगा तो हम बचेगा।
अब भाई लोगों को पीने का साफ़ पानी न मिले न मिले लेकिन अग्नि मिसाइल तो मिल रही है। ’बहुत से लोग’ कोई अमेरिका के कुत्ते सरीखे भाग्यवान तो हैं नहीं जो उनके लिये विज्ञापन बनाने से ज्यादा परेशान हुआ जाये।
आखिरी खबर के बारे में बताया गया कि कानपुर में कुछ लोगों ने एक प्रिसिपल पर गोली चलाई। पहले गोली ड्राइवर को लगी। फ़िर प्रिंसिपल को। ड्राइवर मर भी गया। प्रिसिपल जिन्दा हैं।
खबर के शीर्षक में प्रिंसिपल पर हमले का जिक्र है। प्रिंसिपल घायल है लेकिन जिन्दा है। उस पर बाद में गोली लगी। ड्राइवर पर पहले गोली लगी और वह मारा भी गया। लेकिन खबर के शीर्षक से गायब है। शीर्षक में आने के लिये आदमी का प्रिसिंपल होना जरूरी है। ड्राइवर का मरना प्रिंसिपल के घायल होने के मुकाबले महत्वहीन है।
वैसे तो मनुष्य का जीवन अमूल्य होता है। जीवन का सम्मान किया जाना चाहिये। लेकिन भारत में (शायद अमेरिका में भी) करोड़ों लोग ऐसे होंगे जिन्होंने कुत्तों के लिये टीवी चैनल वाली खबर देखकर बिना कुछ सोचे कहा होगा- काश हम भी अमेरिका के कुत्ते होते।

बात बेवकूफ़ी ही है लेकिन मुझे ऐसा ही लग रहा है। आप पता नहीं क्या सोचें इस बारे में। :)
फ़ोटो फ़्लिकर से साभार।

अपडेट:

दो दिन पहले फ़ुरसतिया पर लिखे इस लेख को देखिये अखबार वालों किस बेदर्दी से अखबार में ठूंसा है। लेख के कई हिस्से मेले में भाई-बहनों की तरह बिछुड़ गये हैं। पहले अमित ने इसकी सूचना दी और बाद में ये फ़ोटो संतोष त्रिवेदी ने भेजी।

54 responses to “अमेरिका के कुत्ते और दुनिया के गरीब”

  1. arvind mishra
    ईर्ष्या डाह द्वेष के कई प्रकार देखे हैं मगर यह श्वान द्वेष ?:)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..गंगा की गुहार
  2. राजेन्द्र अवस्थी
    आदरणिय, खिचाई लाजवाब है……साथ ही देश की समस्या को बहुत ही खूबसूरती के साथ उठाया है……आपके लेख पढ़ कर मुझे सदैव प्रेरणा मिलती है…
  3. विनीत कुमार
    इंडिया के कुत्ते तब तक यूट्यूब से काम चलाएं.
  4. विवेक रस्तोगी
    अवचेतन मन ईर्ष्या को जन्म देता है।
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..पिता परिवार से दूर और छोटे बच्चे पर उसका प्रभाव
  5. आशीष श्रीवास्तव
    दिनकर जी की एक पुरानी कविता याद आ गयी:
    श्वानों को मिलता वस्त्र दूध,भूखे बालक अकुलाते हैं।
    मां की हड्डी से चिपक ठिठुर,जाड़ों की रात बिताते हैं।
    आशीष श्रीवास्तव की हालिया प्रविष्टी..सरल क्वांटम भौतिकी: भौतिकी के अनसुलझे रहस्य
    1. आशीष श्रीवास्तव
      और यह कविता अमरीका के लिये भी सत्य है! भूख, गरीबी वहाँ भी है….
      आशीष श्रीवास्तव की हालिया प्रविष्टी..सरल क्वांटम भौतिकी: भौतिकी के अनसुलझे रहस्य
  6. प्रवीण पाण्डेय
    खबरें इतनी रोचक हो सकती हैं, नहीं मालूम था।
  7. सतीश सक्सेना
    आपके मन में, कुत्तों के प्रति जलन, की खबर शाम तक आपकी कालोनी के कुत्तों को लग चुकी होगी !
    जो कुत्ते ब्लॉग को पढ़ समझ लेते हैं उन्होंने एक एक्शन ग्रुप बनाया है और आपकी फोटुयें मुफ्त में बांटी गयी हैं …
    तनिक सावधान गुरु कही यह पंगा अधिक मंहगा न पड़ जाए !
    चिंतित हूँ आपके लिए !
    शुभकामनायें !
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..हम विदा हो जाएँ तो …-सतीश सक्सेना
  8. देवांशु निगम
    अरे बड़े जलवे हैं इन “कुत्तों” के यहाँ ..अभी कुछ दिनों पहले हमारे एक कलीग ने छुट्टी ली थी कि उनके कुत्ते की तबियत ना-साज़ थी ..बताओ अपने यहाँ ऐसा होता है भला | :) :) :)
    यहाँ पे कुत्ते खुले बैठते हैं कारों में, इंसान को सीट बेल्ट लगा के बैठना होता है .. :) :) :)
    एक और बात है , सारे गोरी कन्यायें कुत्ते बिल्लियों को ऐसे प्यार भरी नज़रों से देखती हैं , जलन कई गुना बढ़ जाती है :) :) :)
    फोटो बड़ी जानदार है !!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..सखी वे मुझसे लड़ के जाते…
  9. aradhana
    बात कुत्तों की नहीं, अमीरी-गरीबी की है. अगर आप अमीर हैं या अमीर के कुत्ते हैं, तो आपकी ऐश है और अगर आप गरीब हैं या गली के कुत्ते हैं, तो मरिये, खाज-खुजली से, भूख से, संक्रामक रोगों से, किसी अमीर की गाड़ी से या किसी सिरफिरे की गोली से.
    वैसे ऊपर वाली बात ज्यादा गंभीर हो गई. एक मजेदार बात. कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा कि अपने कुत्तों के लिए सनग्लासेज़ कहाँ से खरीदें? हम बड़े दुखी हुए और अपनी ‘गोली’ से बोले ‘प्यारी बेटू, हम तुम्हारे लिए सनग्लासेज़ तो नहीं खरीद सकते (अपने ही लिए बड़ी मुश्किल से खरीद पाए हैं) लेकिन, हम वादा करते हैं कि तुमको सन में ही नहीं ले जायेंगे :) ना बाहर निकलोगी, ना धूप लगेगी :)’
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..क्योंकि हर एक दोस्त – – – होता है
  10. देवेन्द्र पाण्डेय
    शीर्षक में आने के लिये आदमी का प्रिसिंपल होना जरूरी है। ड्राइवर का मरना प्रिंसिपल के घायल होने के मुकाबले महत्वहीन है।
    ….और के बारे में तो पता नहीं लेकिन इस बार में दावे से कह सकता हूँ कि यह बात बेवकूफी वाली नहीं, कलेजा चीरने वाली लगती है। पता नहीं आप क्या सोचें मेरी बुद्धि के बारे में ! :)
  11. देवेन्द्र पाण्डेय
    उत्तर का उत्तर देने का विकल्प क्यों नही हैं ? सतीश जी को जो आपने बढ़िया उत्तर दिया वहाँ हमको इस्माइली बनाने का खूब मन कर रहा था।:)
  12. satyavrat shukla
    बहुत ही सही व्यंग है मौसा जी ….
    आप के लेख को पढ़ के मुझको भी अपनी पुराणी कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आगे ……
    कुछ कुत्ते एसी में सोते हैं, कुछ बच्चे भूखे रोते हैं
    कुछ चलते नित हैं गाडी पर, कुछ नंगे पैर पहाड़ी पर
    कुछ महिलाएं मजदूरी करती हैं ,कुछ ब्यूटीपार्लर में सवारती हैं
    कुछ महिलाएं दर दर भटक रहीं ,कुछ बच्चे रोते चिल्लाते
    कुछको पीने को दूध नहीं कुछ पेप्सी कोला पीने को पाते
    सब किस्मत और भारतीय व्यवस्था का खेल हैं …..तभी ये सारी समस्याएं जिनपर आपने तीक्ष्ण व्यंग किया है चरित्रार्थ हैं …….
    satyavrat shukla की हालिया प्रविष्टी..अब क्रांति का नाद करो
  13. संतोष त्रिवेदी
    हमको तो लगता है कि इस मायने में हम उन अमेरिकन कुत्तों से ज्यादा नसीब वाले है क्योंकि हमारे यहाँ हम सबके लिए कईठो चैनेल हैं और इस लिहाज़ से विकल्प और वैराइटी के मामले में हम कहीं आगे हैं.
    अग्नि का प्रक्षेपण भी लगता है,फालतूये का है,उसका कौनो यूज़ हमरे नेता बिना अमेरिकी कुत्तों से तस्दीक कराये,दागेंगे नहीं !
    …कुत्तों की सुविधा का ख़ास ध्यान रखते हुए अमेरिकन एयरपोर्ट पर ही कपडे उतार लिए जाते हैं,ताकि उन्हें नोचने-खरोचने में कौनो तकलीफ न हो,सीधे मांस का लोथड़ा उनके हलक में जाए !
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..तुम आओ तो आ जाओ !
  14. sanjay jha
    जिस कदर ‘सन-ग्लास’ लगा ये स्वान बबुआ बना दिख रहा है………..अपन को तो जलन हो रहा है और कहने
    का दिल करता है के ……………’काश अपन भी अमेरिकी …….. होते’……………
    ‘और आपके कॉस्ट एफ्फेक्टिवेनेस इंडेक्स से अपन १००% सहमत हैं……….रात भी टीवी पे कुछ वैज्ञानिक पेनेलिस्ट इसको लेकर गर्दा उरा रहे थे……………..
    कभी सुना था ‘हाथी बैठा भी हो तो कुत्ते से बरा होता है’……….तो जाहिर है के प्रिंसिपल के घायल होना महत्वपूर्ण है बनस्पति ड्राईवर के मर जाने के………………
    टिपण्णी में पुरने पोस्ट का लिंक देने के लिए अतरिक्त आभार……….
    प्रणाम.
  15. भारतीय नागरिक
    यहाँ तो इंसानों की कदर नहीं, और हम बात करते हैं विकास की, प्रगति की, मानवीय मूल्यों की.
    भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..प्रलय तो भारत ही में होगी …थोड़ा सा इंतजार करें….
  16. eswami
    गुरुदेव,
    काश आपने यह लेख लिखने से पहले कुछ रीसर्च और की होती तो लेख मौजिया/व्यंगिया होने के साथ साथ जानकारीप्रद भी होता.
    यहां तो आम तौर पर ही पालतू पशुओं के लिये बढिया सुविधाओं वाले होटेल बने हुए हैं .. जब व्यक्ति किसी काम से शहर से बाहर जाता है तो उनकी अनुपस्थिती में उनके पशु होटल में रहते हैं.उसी तरह से कुत्तों के पार्लर या ट्रिमिंग सेंटर भी बहुत आम हैं और अमूमन हर पेट स्टोर में हैं. कुत्तों के होटेल का विडियो टूर भी ले लीजिये इस साईट से – http://petshotel.petsmart.com/
    पालतू पशुओं पर अमरीकी २००७ की एक रिपोर्ट के अनुसार ४१ बिलियन खर्च करते थे हर साल -जी हाँ! यह आँकडा २०११ में ४८ बिलियन को पार कर गया था. http://articles.businessinsider.com/2012-01-03/news/30583431_1_vet-care-dental-care-pet-food
    DogTv.com – कुत्तों का चैनल पहले केलिफ़ोर्निया में लांच हुआ था और वहां सफ़ल होने के बाद देश भर में हुआ.
    इधर आप पांच डालर महीना के चैनल की खबर पर हैरान हो रहे हो उधर मेरी पत्नि के दफ़्तर का एक बंदा अपने बच्चे पैदा करने से पहले दो पिल्ले पाल कर टेस्टिंग कर रहा है कि बच्चे पैदा करना सही आईडिया रहेगा की नही! दुनिया रंग बिरंगी रे बाबा दुनिया रंग बिरंगी .. गरीब सोये नंगा, अमीरी नाचे नंगी :)
    eswami की हालिया प्रविष्टी..कटी-छँटी सी लिखा-ई
    1. aradhana
      यहाँ दिल्ली में पेट्स के होटल हैं या नहीं, नहीं मालूम, लेकिन डॉग बोर्डिंग की व्यवस्था यहाँ भी है. तीन सौ रु. प्रतिदिन से लेकर एक हज़ार रूपये प्रतिदिन तक के चार्ज पर. चार्ज इस पर निर्भर करता है कि ए.सी. है या नहीं, वे आपके पेट्स को कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध करायेंगे आदि.
      aradhana की हालिया प्रविष्टी..क्योंकि हर एक दोस्त – – – होता है
  17. सलिल वर्मा
    एक कुत्ते से दूसरे तक की दास्तान सुना दी आपने बरास्ता अग्नि… ये अग्नि वग्नि की आतिशबाजी तो इस बात का एहसास दिलाने के लिए है कि सरकार आपकी हिफाज़त का ख्नयाल रख रही है ऐसा भ्रम बना रहे.. वरना देश में अरबों की आतिशबाजी (चंद्रयान) का भी रिकार्ड है!!
    अगले जनम मोहे श्वान ही कीजो, वो भी अमेरिका में!!
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..तीन दशक और वह, जो शेष है!
  18. Kajal Kumar
    कुत्‍तों के लि‍ए, कुत्‍तों के कुत्‍तों के द्वारा…
  19. विनीता शर्मा
    अमरीका दादाभाई है . कुछ भी कर सकता है :)
  20. हरभजन सिंह बड़बोले
    ओय…….काश रब मेनू कुत्ता बना दित्तां…. :) :) :)
  21. विजय गौड़
    बेहतरीन रिपोर्टिंग है| प्रिंसिपल घायल है लेकिन जिन्दा है| मिसाइल एक हाथ में और दुसरा हाथ उस मुलायम मुलायम कुत्ते के गुदगुदी कर रहा है|
  22. dhiru singh
    अमरीकी कुत्तो के लिए तो सिर्फ एक ही है हमारे यहाँ तो कई है .
    dhiru singh की हालिया प्रविष्टी..कैसी कही
  23. sanjay aneja
    ‘शीर्षक में आने के लिए आदमी का प्रिंसीपल होना जरूरी है’ इस प्रस्तुति की वो कुनैन की गोली है जिसे खिलाने के लिए उसे गुलाब जामुन के बीच सेट किया गया और हम लोग उस बच्चे की तरह जो गुलाब जामुन खाकर गोली बाहर थूक देता है, यह कहकर की गुलाब जामुन का बीज था|
    ड्राइवर का मरना वो वजन नहीं पैदा कर सकता मीडिया वालों के लिए जो शीर्षक में प्रिंसिपल कर सकता है| मैंने भी अखबार की ऐसी ही एक खबर से एक पोस्ट बनाई थी – http://mosamkaun.blogspot.in/2010/04/blog-post_05.html
  24. gitanjali srivastava
    कुत्तों के प्रति आपकी भावनाएँ विशेषतया सराहनीय है| कितने आश्चर्य की बात है कि इंसान इंसान पर अत्यधिक खर्च करने के बावजूद कुत्तों का विशेष गुण वफ़ादारी इंसान में कायम रखने में असफल हुआ है| फिर जब कुत्ते में इंसान के गुण मौजूद हों तो इंसानों के समान उसका पालन पोषण करने में हर्ज ही क्या है |
    पोपत्चंद कह गए पोपटी से ऐसा कलयुग आएगा सोयेगा कुत्ता ऐसी में मानुष शोर मचाएगा |
    धन्यवाद |
  25. Abhishek
    सीरियस बात हो गयी :)
  26. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] अमेरिका के कुत्ते और दुनिया के गरीब [...]