Wednesday, June 19, 2013

दिन बहुरने के इंतजार में काला धन

http://web.archive.org/web/20140420082709/http://hindini.com/fursatiya/archives/4416

दिन बहुरने के इंतजार में काला धन

Black moneyआजकल बेचारे कालेधन की मरन है
कोई भी घपला होता है, काले धन पर तोहमत लगती है। ब्लैक मनी की थू-थू होती है.
जैसे नेता चमचे के बिना, महन्त चेले के बिना, आई.पी.एल. फ़िक्सिंग के बिना अधूरा लगता है वैसे ही कोई भी घपला काले धन की चर्चा के बिना अधूरा लगता है. घपला अगर कोई आधुनिक जटिल कविता है तो काला धन उसका आम जनता की समझ में आने वाला सरल अनुवाद है. घोटाला यदि कोई अबूझ सिद्धांत है तो काला धन उसकी सहज टीका है.
जैसे पार्टियां चंदे के बिना, नेता लफ़्फ़ाजी के बिना, लेखक अपनी उपेक्षा का रोना रोये बिना नहीं रह पाता वैसे ही दुनिया का कोई भी बड़ा धन्धा बिना काले धन के नहीं पनप सकता.
दुनिया में जितने भी मजबूत धन्धे हैं चाहे वह हथियार का हो, धर्म का हो या फ़िर शिक्षा का ही क्यों न हो, सबकी बुनियाद में काले धन की सीमेन्ट लगी है। काला धन न हो तो स्विस बैंक फ़ुस्स बैंक होकर रह जाये.
अपने देश में पिछले बीस सालों में जित्ता विकास हुआ है, काला धन उससे कई गुना ज्यादा बढ़ा है. गणित की भाषा में कहें तो किसी भी आधुनिक समाज का विकास उस समाज में मौजूद कालेधन की मात्रा का समानुपाती होता है.
इस सबके बावजूद कालेधन को लोग इज्जत की निगाह से नहीं देखते. कालाधन कमाने वाला तक खुलेआम उसकी आलोचना ही करता है. राजनीतिज्ञ चुनाव भले काले धन के सहारे लड़ें लेकिन सार्वजनिक रूप से कालेधन की ऐसी बुराई करते हैं जैसे वामपंथी, दक्षिणपंथियों की करते हैं, अमेरिकी क्यूबा की करते हैं, पाकिस्तान वाले भारत की करते तरह हैं.
अपने प्रति दुनिया का यह द्वंदात्मक इज्जतवाद देखकर बेचारे कालेधन के दिल पर क्या बीतती होगी. दुनिया के धोखे को देखकर उसका मन भी जिया खान की तरह लटककर निपट जाने का करता होगा. उसका भी मन करता होगा कि सरकारी गवाह बन जाये और सबकी पोल खोल दे कि कैसे तमाम लोगों से उसके अंतरंग संबंध रहे. कैसे लोगों ने उसका सहारा लिया, आगे बढ़े, और सहारा लिया लेकिन जब सफ़लता के किस्से सुनाने की बारी आयी तो श्रेय अपनी मेहनत, लगन और बुद्धि को दिया। कालेधन के योगदान की सरासर उपेक्षा कर दी.
यह वैसा ही है कि किसी देश के इतिहास में राजा रानियों के किस्से लिखे जायें लेकिन मेहनतकश जनता की कहानी गोलकर दी जाये.
लेकिन फ़िर कालाधन शायद यह सोचकर चुप रह जाता होगा कि अपराधी कोई भी हो लेकिन बुराई उसी की होनी है. बेइज्जती तो उसी की खराब होनी है.
इसके बाद शायद वह यह सोचकर चुपचाप अपनी करतूतों में जुट जाता होगा कि आजनहीं तो कल उसको वह इज्जत अवश्य मिलेगी जिसका वह हकदार है। उसको भी खुले आम उतनी ही स्वीकार्यता मिलेगी जितनी की आज समाज में जातिवाद, संकीर्णता, भाई भतीजावाद, भाग्यवाद और काहिली को मिली है.
काला धन सोचता होगा- जैसे बाकियों के दिन बहुरे क्या पता वैसे ही उसके भी बहुरैं.

6 responses to “दिन बहुरने के इंतजार में काला धन”

  1. sanjay jha
    @ गणित की भाषा में कहें तो किसी भी आधुनिक समाज का विकास उस समाज में मौजूद कालेधन की मात्रा का समानुपाती होता है.
    टापने वाला टाप्चिक लाइन है .
    प्रणाम.
  2. देवांशु निगम
    धन को काला सफ़ेद कहना रंगभेद है | धन धन होता है | कला सफ़ेद नहीं |
    कित्ते बाबा लोग इसी चक्कर में पेल दिए गए , पेलने वालों का अपना फायदा हुआ , बाबा जी की भी दुकान चला निकली | अब बताइए धन कहीं बुरा होता है ????
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..इतिहास में डुबकी और बिजली का टोका !!!
  3. काजल कुमार
    काले धन की इस आपाधापी में यह साइट http://www.icij.org/ चार चांद लगाती है
  4. प्रवीण पाण्डेय
    सच में कितनी घुटन होती होगी काले धन को।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..जो है, सो है
  5. arvind mishra
    फुरसतिया चोले की काली कमरी निकाल फेकी है -धडाधड पोस्ट जारी है !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं!
  6. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] दिन बहुरने के इंतजार में काला धन [...]

Tuesday, June 18, 2013

नदियां बड़ी तेज भन्नाई हुई हैं

http://web.archive.org/web/20140420081847/http://hindini.com/fursatiya/archives/4408

नदियां बड़ी तेज भन्नाई हुई हैं

Floodबारिश के मौसम में इंद्रदेव ने बरसने के लिये बादलों की ड्यूटी लगा दी. सबके हिस्से का पानी एलाट कर दिया. सबको समय पर नियत जगह पर बरसने की हिदायत दे दी.
पहले बादल जब बरसने के लिये निकलते थे तो विरहणियों के प्रेम संदेशे भी साथ लिये जाते थे. जैसे ट्रक के ड्राइवर केबिन में सवारी बैठाकर या कुछ छुटपुट लदाई करके चाय-पानी की कमाई कर लेते हैं, वैसे ही बादल लोग संदेशे लादकर कुछ कमा लेते थे. मोबाइल आ जाने -जाने उनका संदेशों का धंधा मंदा पड़ गया है. वे परेशान रहने लगे हैं. गुस्से में भन्नाये रहते हैं. भेजा कहीं के लिये जाता है, बरस कहीं और आते हैं. डांटे जाने पर कोई न कोई बहाना बना देते हैं. इंद्र देव भी बेचारे कोसते रहते हैं. उनको भी इन्ही बादलों से काम लेना है, स्थायी कर्मचारी हैं सब बादल, कोई गठबंधन तो है नहीं जो तोड़ देते.
इस बार भी कुछ बादल तो आदतन मुंबई के लिये फ़ूट लिये. उनको लगता है वहां सब हीरोइने ही रहती हैं. सोचते हैं उनको भिगोयेंगे. मजे करेंगे.
कुछ बादल दिल्ली फ़ूट लिये इस आशा में कि शायद मंत्रिमंडल फ़ेरबदल में कोई सीट मिल जाये. एयरपोर्ट पर ही पसर गये यह सोचकर कि यहीं से लोग उनको शपथग्रहण करवाने ले जायेंगे. एयरपोर्ट को बंदरगाह बना डाला.
कुछ बादल पहाड़ों की तरफ़ निकल लिये कि हिलस्टेशन पर तफ़रीह करने के बाद बरसेंगे.
बादलों को नीचे खाली जमीन दिखी. पहले वहां पेड़ हुआ करते थे. बादल खाली जमीन पर कब्जा करने के लालच में वहीं बरस पड़े. उनको भी पता है कि आज के जमाने में जमीन पर कब्जा करना सबसे फ़ायदे का धंधा है.
बादलों ने सोचा होगा कि जमीन पर कब्जा करके वे उसे ऊंचे भाव पर निकालेंगे लेकिन पहाड़ की ढलानों में उनके पांव फ़िसल गये और वे लुढकते-पुढकते, टूटते-फ़ूटते नीचे गिरते गये. उनके साथ मिट्टी,पहाड़, धरती भी धंसती गयी. बादलों का पानी नदियों में बदल गया.
नदियों ने जब पहाड़ों की हालत देखी तो वे गुस्से में बौखला गयीं. उनको यह देखकर बहुत गुस्सा आ गया कि लोगों ने पेड़ों को काटकर जमीन को नंगा कर दिया है, पक्के मकान बना लिये हैं, जंगल काट लिये हैं, पहाड़ को तबाह कर दिया है.
नदियां गुस्सा गयीं. अपना बुलडोजर लेकर हर जगह अतिक्रमण हटाने लगीं. जो भी उनके रास्ते में आया उसको धरासाई करते हुये वे हरहराती हुई आगे बढ रही हैं. खतरे के निशानों की अनदेखी करके उफ़ना रही हैं. हाहाकार मचा हुआ है. सब जगह छापा मार रही हैं.घर-घर में घुसकर वे तलाशी सी ले रही हैं कि लोगों ने पहाड़ के पेड़ काटकर कहां छिपाये हैं, क्या फ़र्नीचर बनवाये हैं. उनके हाल ऐसे हो रहे हैं:
flood1

नदियां बड़ी तेज भन्नाई हुई हैं,
बारिश में उफ़नती,हरहराई हुई हैं. काट डाले हमने जंगल थोक में,
देखकर भयंकर तऊआई हुई हैं.
घरों में घुस के देख रहीं हैं सबके,
जो काटकर पेड़ कुर्सिंयां बनाई हुई हैं.
सारा अतिक्रमण ढहा रही हैं नदियां,
खुद का बुलडोजर लेकर आई हुई हैं.
सब लोग जीवनदायिनी नदियों का रौद्र रूप देखकर सहमे हुये हुयें है. बारिश का आशिकाना मौसम बहुतों के लिये कातिलाना, डरावना बना हुआ है. अपने किये की सजा भुगत रहे हैं हम लोग.
नदियों को सॉरी बोलने से वे सुनेंगी क्या?

8 responses to “नदियां बड़ी तेज भन्नाई हुई हैं”

  1. देवांशु निगम
    हमें नहीं लगता ऐसे मानेंगी नदियाँ | अब तो बाढ़ आय के ही मानी !!!!
    बाकी…
    नदियाँ बड़ी तेज़ भन्नाई हुई हैं ,
    और पूड़ियाँ तेल में ग़दर नही हुई हैं !!!!
    जय हो फुरसतिया बाबा की !!!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..हमार महल्ला !!!
  2. प्रवीण पाण्डेय
    सच में बहुत बुरी तरह से भन्नाई हैं।
  3. shikha varshney
    जो बोया है वही काटना होगा..
    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..गृह विज्ञान ..किसके लिए ?
  4. arvind mishra
    सारा अतिक्रमण ढहा रही हैं नदियां,
    खुद का बुलडोजर लेकर आई हुई हैं.
    जोरदार
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं!
  5. indian citizen
    कयामत ऐसे ही तो आयेगी.
    indian citizen की हालिया प्रविष्टी..पुलिस का रवैया
  6. indra
    घरों में घुस के देख रहीं हैं सबके,
    जो काटकर पेड़ कुर्सिंयां बनाई हुई हैं.
    ये तो व्यंग्य का बाप निकला! ;-)
  7. अंजना चौहान
    मौसम ए बरसात कातिलाना हुआ है
    रौद्र रूप नदियों का कहर ढाए हुआ है
    नदियों को पाट कर घर बनाने की जो की थी भारी भूल
    मिटा कर इनका नामोनिशां कर देंगी सब धूल ही धूल
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] नदियां बड़ी तेज भन्नाई हुई हैं [...]

गठबंधन तोड़ने के लिये मुशायरा

http://web.archive.org/web/20140420082419/http://hindini.com/fursatiya/archives/4392

गठबंधन तोड़ने के लिये मुशायरा

गठबंधनगठबंधन बस टूटने ही वाला है.उसे टूटने से कोई बचा नहीं सकता। अपरिहार्य है इसका टूटना –लगातार इस आशय की खबरें आ रही हैं।
लोग बेसब्री से इंतजार में हैं टूटने की घोषणा सुनने के लिये। लेकिन टूटने में देरी हो रही है।
पता चला कि गठबंधन में शामिल दल के प्रवक्ता गठबंधन टूटने के मौके पर बोलने के लिये शेर याद कर रहे हैं। टूटने की घड़ी को शायराना बनाना चाहते हैं। बारिश के मौके में मौसम आशिकाना हो गया है। शायद इसीलिये विदाई शायराना अंदाज में करने को उतावले हैं लोग।
मुशायरे के लिये तैयार होते शायर शेरवानी, अचकन, टोपी धारण करके तैयार होते हैं। गठबंधन तोड़ने के लिये नेता लोग शायरी रट रहे हैं। अपने चमचों को दौड़ा रहे हैं- जा बे कोई उम्दा शायरी जुगाड़कर ला, गठबंधन तोड़ना है।
एक छुटभैया दौड़ के गया और शायरी की किताब से एक ठो शेर नोट करके ले आया:
दुआ करते हैं जीने की
पर दवा करते हैं मरने की।
नेता जी बोले क्या ये किसी नर्सिंग होम का किस्सा है? डॉक्टर बचाने की कोशिश भी कर रहा है लेकिन सोच रहा है मरीज निपटे तो अगले को बिस्तर अलॉट करें।
नई साहब इसका मतलब है कि आपको समर्थन तो दे रहे हैं लेकिन चाहते हैं कि सरकार आपकी गिर जाये। नेता जी समझ गये। शेर रटन लगे।
इस बीच शेर लीक हो गया। अगली पार्टी के नेता जी ने चेले को दौड़ाया किसी शाइर से इसकी काट वाला शेर लेकर आओ फ़टाक से। चेला हांफ़ता हुआ शेर लाया:
हम दुआ भी करते हैं, दवा भी
पर दगा नहीं देते।
मतलब बताया कि ये गठबंधन पार्टी के शेर का जबाबी शेर है। नेता जी ने रट लिया। इस बीच किसी ने सुझाया कि कुछ और शेर याद कर लिये जायें ताकि मुकाबले में कमजोर न पड़ें। शेर इकट्ठा होने लगे। उसके मतलब भी नेताजी को समझाते जा रहे थे उनके चेले। देखिये कौन-कौन से शेर तैयार हो रहे हैं:
दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
फ़िर कभी जब दोस्त बन जाये तो शर्मिंदा न हों।

शेर सुनते ही नेता जी बमक गये। गठबंधन तोड़ते समय फ़िर दोस्ती की बात करना बेवकूफ़ी की बात नहीं समझेंगे लोग?
अरे राजनीति में कौन स्थायी दोस्त/दुश्मन होता है साहब। इस शेर से आपका मुस्लिम वोट बैंक मजबूत होगा क्योंकि यह शेर एक बड़े मुस्लिम शायर ने कहा है।
नेता जी खुश होकर घूम-घूम कर शेर रटने लगे. तब तक एक और चेला लपक एक और शेर सुनाने लगा:
एक जरा सी बात पर वर्षों के याराने गये,
पर चलो अच्छा हुआ कुछ लोग पहचाने गये।
Universal_jointनेताजी चेले की तरफ़ देखकर गुर्राये- यहां हमारी सरकार दांव पर लगी है और तुमको ये जरा सी बात लग रही है। चेले ने सहमते हुये कहा -साहब शेरो शायरी में ऐसा ही होता है। आप डाल लीजिये अपनी जेब में। पढेंगे तो ऐसा लगेगा कोई शहादत वाली बात कह रहे हैं।
दूसरी तरफ़ के नेता जी भी गठबंधन तोड़ने के समय पढ़ने वाले शेर तैयार कर रहे हैं। उनको लगा कि राजनीति में किसी का कोई भरोसा नहीं है। क्या पता पत्ते कमजोर रह जाये और उनको पीछे हटकर गठबंधन बनाये रखने के लिये अनु्रोध करना पड़े। मंशा जाहिर करते ही उनके सामने वसीम बरेलवी साहब का शेर पेश किया गया:
शर्तें लगायी नहीं जाती दोस्तों के साथ,
कीजै मुझे कुबूल मेरी हर कमी के साथ।
नेता जी ने शेर नोट कर लिया लेकिन बोले इसकी दूसरी लाइन हम अपने हिसाब से सुधार के पढेंगे और कहेंगे:
शर्तें लगायी नहीं जाती दोस्तों के साथ,
तू है मुझे कुबूल तेरी हर कमी के साथ।
शागिर्दों ने नेताजी के शायरी के हुनर की दाद देते हुये वाह-वाह की। नेता जी ने सर पर हाथ ले जाकर सलाम करते हुये दाद कुबूल की।
एक समझदार शागिर्द ने सलाह दी। साहब अगर आप शेरो शायरी ही करते रहे तो कहीं हिन्दू वोट बैंक न बिदक जाये। इसलिये एकाध कविता भी याद कर लीजिये। अब कविता की खोज मजी जिसमें टूटने, बिखरने, धोखे बाजी और अलग होने के भाव हों। बड़ी मश्किल से एक कविता मिली:
जिस तट पर प्यास बुझाने से अपमान प्यास का होता हो,
उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा रह जाना बेहतर है।
मतलब जिसके समर्थन से सरकार बनाने में बेइज्जती खराब होती हो तो सरकार बनाने से अच्छा अपोजीशन में बैठना अच्छा है।
फ़ाइनल शेर दोनों दल वाले यही सोचकर आये हैं:
फ़साना जिसे अंजाम तक पहुंचाना न हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।
शेर बहुत इकट्ठा हो गये थे। अब दोनों दल के लोग गठबंधन तोड़ने के लिये निकल चुके हैं। कभी भी मंच पर आकर गठबंधन मुक्ति मुशायरा शुरु हो सकता है।
क्या पता गठबंधन टूटने पर लोग आपस में बधाई देते हुये कहें- वाह साहब, आपने तो गठबंधन लूट लिया।
उसके बाद टी.वी. इस मुद्दे पर चैनल चर्चा करेंगे। विषय होगा- कवियों/शायरों की मुख्यधारा में वापसी।

6 responses to “गठबंधन तोड़ने के लिये मुशायरा”

  1. देवांशु निगम
    :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..दास्तान-ए-इस्तीफ़ा
  2. arvind mishra
    दो चार और ठेल दिए चेलों को यहाँ से चुराने को सहज हो जाता !
    गरज कि काट दिए कशमकश के दिन ये दोस्त
    तुम जाने पे उतारू हो तो हम भी किनारा करते हैं :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..भारतीय समाज की विवशताएँ!
  3. विवेक रस्तोगी
    वाह जी वाह.. एक से एक शायरी..
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..एक और क्रेडिट कार्ड
  4. प्रवीण पाण्डेय
    यह यूनीवर्सल कपलिंग काश राजनीति में भी होती, अलग धुरों में। एक कानून बनना चाहिये कि बिना मुशायरा कोई गठबंधन टूटा न माना जाये।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मैकबुक मिनी
  5. amit kumar srivastava
    राजनीति में यूनिवर्सल कपलिंग कहाँ होती है !!वहां तो डव-टेल जॉइंट होता है । आसानी से जोड़ा और जब चाहा उसे आसानी से अलग कर लिया ।
  6. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] गठबंधन तोड़ने के लिये मुशायरा [...]

Monday, June 17, 2013

एक दिन में ठुंसे कई ’दिवस’

http://web.archive.org/web/20140420081813/http://hindini.com/fursatiya/archives/4402

एक दिन में ठुंसे कई ’दिवस’

पिताकल देश दुनिया भर में पिता दिवस मनाया गया. अखबारों में, सोशल मीडिया में और अभिव्यक्ति के अन्य मंचों पर लोगों ने अपनी-अपनी तरह अपने-अपने पिताओं को याद किया. सब जगह ’हैप्पी फ़ादर्स डे’ होता रहा. फ़ेसफ़ुक और ब्लॉग की दुनिया तो पितामय हो गयी. लोग फ़ुल भावुक हो गये.
पिता तो परिवार की धुरी होते हैं. इसलिये पिता को याद करना अच्छी बात है. साथ हों तो उनके और पास होना और अच्छी बात है. लेकिन , जैसा कुछ लोगों ने कहा भी, पिता को एक दिन में सीमित कर देना कहीं उनको बाकी दिनों से खारिज कर देना जैसा है.
बचपन से हम लोग तो केवल चार ठो ’डे’ जानते रहे. स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती और बाल दिवस. बाद में जैसे तरह-तरह के ’डे’ की बाढ़ सी आ गयी. जलजला आ गया. बाजार के बहकावे में आकर हर रोज तरह-तरह के ’डे’ मनाये जाने लगे हैं. जिस दिन जो ’डे’ होता है उस दिन उसको याद करके छुट्टी हो गयी. हर ’दिवस’ से जुड़ी कोई कहानी. दिन भर उसके लिये शुभकामनाओं का सिलसिला चलता. दिन बीतने के बाद ’रात गयी, बात गयी’ हो जाता मामला. अगले दिन कोई दूसरा दिन अपना झंडा गाड़े दिखता.
जिस तेजी से तरह-तरह के ’डे’ बढ़ते जा रहे हैं उससे लगता है कि आने वाले में समय में साल में दिन कम हो जायेंगे, ’डे’ बढ़ जायेंगे. एक-एक दिन में कई-कई दिन एडजस्ट करने पडेंगे. साल के दिनों की हालत रेलवे के जनरल डिब्बों सरीखी हो जायेगी. एक-एक सीट (दिन) में कई-कई ’दिवस’ ठुंसे हुये एक-दूसरे को धकियायेंगे. बाद में आया ’डे’ पहले वाले ’दिवस’ से कहेगा- भाईसाहब, जरा खिसक जाइये, हमको भी एडजस्ट कर लीजिये. दिन की सीट पर पहले से बैठा ’दिवस’ पहले थोड़ा कुनमुनाये शायद लेकिन फ़िर मन मारकर खिसक जायेगा. उसको पता है नहीं खिसकेंगे तो धकिया के खिसिया दिया जायेगा.
दिनों के हाल यह है कि ’एक अनार,सौ बीमार’ या फ़िर ’एक पीएम पद, सौ उम्मीदवार’
की तर्ज पर एक-एक दिन में कई-कई ’दिवस’ ठुंसने के लिये अर्जी दिये पड़े हैं. दिन बेचारा हलकान है सबको कैसे एडजस्ट करे.
जिस तेजी से ’दिवस’ की जनसंख्या बढ़ रही है उससे तो लगता है कि आने वाले समय में ’डे’ की जगह ’आवर’ मनाने का चलन बढ़े. एक दिन में चौबीस घंटे होते हैं सो चौबीस चोचले एडजस्ट हो जायेंगे एक दिन मे. क्या पता आने वाले समय में कोई कहे –यार, इन दो घंटों को साथ-साथ एडजस्ट कर दो, इनके आपस में ’इंटीमेट रिलेशन’ हैं. फ़िर ’जोड़ा घंटा’ यानि कि ’कपल आवर’ का चलन हो जाये बाजार में.
हम भी कहां की हांकने लगे. देखें कि आज कौन सा दिवस है. बधाई-सधाई दे कहीं चूक न जायें किसी को.

मेरी पसंद

पिता थोड़े दिन और जीना चाहते थे
वे हर मिलने वाले से कहते कि
बहुत नहीं दो साल तीन साल और मिल जाता बस।
वे जिंदगी को ऐसे माँगते थे जैसे मिल सकती हो
किराने की दुकान पर।
उनकी यह इच्छा जान गए थे उनके डॉक्टर भी
सब ने पूरी कोशिश की पिता को बचाने की
पर कुछ भी काम नहीं आया।
माँ ने मनौतियाँ मानी कितनी
मैहर की देवी से लेकर काशी विश्वनाथ तक
सबसे रोती रही वह अपने सुहाग को
ध्रुव तारे की तरह
अटल करने के लिए
पर उसकी सुनवाई नहीं हुई कहीं…।
1997 में
जाड़ों के पहले पिता ने छोड़ी दुनिया
बहन ने बुना था उनके लिए लाल इमली का
पूरी बाँह का स्वेटर
उनके सिरहाने बैठ कर
डालती रही स्वेटर
में फंदा कि शायद
स्वेटर बुनता देख मौत को आए दया,
भाई ने खरीदा था कंबल
पर सब कुछ धरा रह गया
घर पर ……
बाद में ले गए महापात्र सब ढोकर।
पिता ज्यादा नहीं 2001 कर जीना चाहते थे
दो सदियों में जीने की उनकी साध पुजी नहीं
1936 में जन्में पिता जी तो सकते थे 2001 तक
पर देह ने नहीं दिया उनका साथ
दवाएँ उन्हें मरने से बचा न सकीं ।
इच्छाएँ कई और थीं पिता की
जो पूरी नहीं हुईं
कई और सपने थे ….अधूरे….
वे तमाम अधूरे सपनों के साथ भी जीने को तैयार थे
पर नहीं मिले उन्हें तीन-चार साल
हार गए पिता
जीत गया काल ।
बोधिसत्व

11 responses to “एक दिन में ठुंसे कई ’दिवस’”

  1. सतीश सक्सेना
    फुरसतिया दिवस तो अक्सर हर दफ्तर में बरसों से मनाया जाता है ..
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर शिरोमणि अवार्ड में भाग लें -सतीश सक्सेना
  2. Rekha Srivastava
    विषय तो बड़ा सार्थक उठाया है वाकई अब रोज ही कोई न कोई दे खड़ा रहता है . क्योंकि आदमी दिन व दिन जागरूक होता जा रहा है और समय कम है तो फिर एक ही दिन याद करने का झंझट रहता है . किसी तरह से समय निकाल कर याद कर लिए जाय . कुछ तो ऐसे होते हैं कि जिनके बारे में लोगों को जानकारी ही नहीं होती है फिर क्या लिखें ? जैसे आटिज्म डे , और कोई लिखे भी तो उसको पढ़ने वाले नहीं होते हैं . इसलिए यही डे बढ़िया हैं . सब पिता को जानते हैं , माता को जानते हैं लेकिन अभी मेरी नजर में एक दिन बहुत महत्वपूर्ण है वह है ‘गंगा डे ‘ जिसमें ‘गंगा जी ‘ के उद्धार के लिए कुछ किया जाए और कुछ श्रम दान उनके लिए हो . जल प्रदूषण से कुछ मुक्ति मिले . इसमें सिर्फ फेसबुक पर लिख कर डाल देने वाली बात नहीं होनी चाहिए .
    Rekha Srivastava की हालिया प्रविष्टी..विश्व वयोवृद्ध दुर्व्यवहार विरोध दिवस !
  3. sharmila ghosh
    जी. सचमुच ही तमाम दिवसों की बाढ़ ही आ गयी है. बहुत सामयिक लेख है. धन्यवाद .
  4. arvind mishra
    काल बली !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं!
  5. प्रवीण पाण्डेय
    सच कहा आपने, बड़ी सोच में पड़ जाते हैं कि क्या करें, क्या नहीं।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मैकबुक मिनी
  6. प्रतिभा सक्सेना
    इतने सारे विशेष दिन कि कौन सा कब है यह भी ध्यान नहीं रहता .क्या फ़ायदा ऐसे दिन मनाने का . .और मातृ-पितृ-दिवस मुझे तो उन्हीं के जन्मदिन पर मनाया जाना अच्छा लगता है .
    वैसे जो जिसमे खुश !
  7. Atarman
    बहुत अच्छी कविता!
  8. समीर लाल "टिप्पणीकार"
    सन्नाट!! पसंद पंसदीदा रही!! :)
    समीर लाल “टिप्पणीकार” की हालिया प्रविष्टी..हरे सपने…एक कहानी..मेरी आवाज़ में..
  9. vijyan shankar
    बहुत अच्छा हांकते हैं , बात मन में गहरे तक उतर गई | बहुत आगे का सोच डालते हैं | “अनागत विधाता ” —-विज्ञान शंकर
  10. akanksha
    very good satire on modern generation
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] एक दिन में ठुंसे कई ’दिवस’ [...]

Saturday, June 15, 2013

देवलोक में अवतार चर्चा

http://web.archive.org/web/20140331072111/http://hindini.com/fursatiya/archives/4387

देवलोक में अवतार चर्चा

मीटिंगदेवलोक में अगले अवतार की चर्चा हो रही है। किस देवता को अगले अवतार के रूप में भारत भूमि में भेजा जाये।
रोज-रोज भारत भूमि से पुकार आ रही हैं। भक्त परेशान हैं। भगवान से कातर शिकायत कर रहे हैं। कब आयेंगे हमारा उद्धार करने। कुछ शिकायतें तो इत्ती तीखी थीं कि कुछ भगवानों को एक बारगी तो भक्त पर गुस्सा आ गया. उनका मन हुआ कि भक्त को रगड़ दें मानहानि के लिये। लेकिन उनको ध्यान आया वे तो भगवान हैं। भगवान लोग भक्तों पर गुस्सा नहीं कर सकते। मानहानि पर रगड़ देने का अधिकार तो केवल न्यायाधीशों के लिये सुरक्षित है।
चर्चा का विषय यह था कि अगला अवतार किस रूप में होगा।
एक देवता ने सुझाव दिया- अगला अवतार फ़िर वाराहावतार, मत्स्यावतार की तरह बाघावतार के रूप में होना चाहिये। इससे पृथ्वीलोक में बाघों की संख्या भी बढेगी और साथ में जंगल भी। पृथ्वीलोक में पर्यावरण की रक्षा होगी।
यह सुनते ही उसके विरोधी देवता ने टोक दिया- मुझे पता है कि आप “बाघ बचाओ, पर्यावरण बचाओ” का अभियान चलाने वाली कंपनी को फ़ायदा पहुंचाने के लिये यह सुझाव दे रहे हैं। लेकिन आप अब देवलोक में हैं। पृथ्वीलोक वाली यह हरकतें छोड़ दीजिये। यहां निर्णय निष्पक्ष लिये जाते हैं। किसी लोभ-लालच में नहीं।
कई लोगों का कहना था कि अगला अवतार मनुष्य योनि में ही होना चाहिये। लेकिन बात इस बात पर अटक गयी कि अवतार किस जाति में हो। हर जाति का देवता अपनी जाति में अवतार के लिये झगड़ने लगा।
जातियों पर जब बात चली तो सुझाव आया कि अवतार का चुनाव जाति के आधार पर होना चाहिये। जिस जाति के लोग सबसे ज्यादा परेशान,बदहाल हों उस जाति में अवतार होना चाहिये। इसी बहाने जाति की हालत सुधर जायेगी। लेकिन लफ़ड़ा यह हुआ कि जातियों के बारे में देवलोक में पूरे आंकड़े नहीं थे। कुछ देवता जातियों की बदहाली आर्थिक आधार पर तय करने के लिये अड़े थे, कुछ लोगों का मानना था कि बदहाली सामाजिक आधार पर देखी जाये।
अभी जाति के हिसाब से अवतार पर बहस चल ही रही थी कि एक देवता, जो कि देवता बनने के पहले कम्युनिस्ट नेता था, ने चिल्लाते हुये कहा- अगला अवतार जाति के हिसाब से नहीं वर्ग के हिसाब से तय होना चाहिये। जाति के हिसाब से अवतार चुने जाने का मैं कड़ा विरोध करता हूं। अपनी बात कहते-कहते देवता ने अपनी जेब से एक लाल रूमाल निकाल कर झंडे की तरह फ़हरा दिया।
कुछ देवियों ने एतराज किया अगले अवतार के लिये किसी देवता को नहीं किसी देवी को भेजा जाये. उन्होंने पृथ्वीलोक में स्त्रियों की बिगड़ते हाल के किस्से भी सुनाये।
उनके एतराज से सभी देवता सहमत थे लेकिन सबकी चिंता यही थी कि इस समय पृथ्वीलोक में हाल बड़े बेहाल हैं। देवी ने अगर अवतार लिया तो उसकी सुरक्षा का जिम्मा कौन लेगा।
देवियों ने एतराज किया कि पृथ्वीलोक में इत्ते सारे पुराने देवता पहले से ही मौजूद हैं. उनको देवी अवतार का जिम्मा सौपा जाये। देवी को ताकतें दी जायें। अवतार के लिये देवी को ही भेजा जाये।
इस पर कुछ देवताओं ने कहा कि पुराने देवता अगर अपना काम ठीक से करते तो पृथ्वी लोक के हाल इतने खराब क्यों होते? वे तो बस मंदिरों में बैठे हैं। चढ़ावा ले रहे हैं। जमीनों में कब्जा करवाने में बाहुबली भक्तों की सहायता कर रहे हैं। देवी को अवतार के रूप में भेजने का रिस्क नहीं लेना चाहिये। देवी अवतार के साथ कहीं कुछ ऊंच-नीच हो गयी तो बेइज्जती खराब होगी देवलोक की।
इतने में एक देवता जो कि पृथ्वीलोक की खबरों पर निगाह रखता था ने देवसभा को बताया – आपके अवतार की पृथ्वीलोक में कोई जरूरत नहीं है। वे अपना भला करने के लिये अपना अगला प्रधानमंत्री चुनने में लगे हैं।जैसे ही उन्होने अगला प्रधानमंत्री चुन लिया उनके सारे कष्ट खत्म हो जायेंगे। देवलोक के अवतार की वहां कोई आवश्यकता ही नहीं है।
लेकिन अगर प्रधानमंत्री चुने जाने पर भी उनके कष्ट न खतम हुये तो क्या होगा? हम अपने भक्तों को फ़िर क्या जबाब देंगे? –एक जिम्मेदार से देवता ने सवाल किया।
अगर कष्ट न दूर हुये तो वे अपना अगला प्रधानमंत्री फ़िर चुनेंगे। वहां के सारे कष्टों का इलाज वहां का प्रधानमंत्री ही हो सकता है और कोई नहीं।
आगे की चर्चा के पहले ही बहस का संचालन करने वाले उद्घोषक ने “स्वल्पाहार-अंतराल” की घोषणा कर दी. सभागार में लगी स्क्रीन में उन कंपनियों के विज्ञापन चलने लगे जिन्होंने देवलोक में अवतार चर्चा का कार्यक्रम प्रायोजित किया था।
सभी देवगण अपने उत्तरीय, अंगवस्त्र संभाले हुये स्वल्पाहार के लिये हाल में पहुंच गये।
फ़ोटो फ़्लिकर से साभार!

8 responses to “देवलोक में अवतार चर्चा”

  1. देवांशु निगम
    मेरे हिसाब से अर्नब गोस्वामी ने अवतार ले लिया है :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..दास्तान-ए-इस्तीफ़ा
  2. arvind mishra
    मगर अगला अवतार तो तय है -कल्कि अवतार ? अच्छा तो आप उससे भी अगले अवतार की बात कर रहे हैं ?
    वैसे हिन्दी ब्लागजगत में इन्द्रपुरी से उबी कई देवियों ने अंतरिम अवतार लिया था मगर यहाँ से भी एक एक कर अन्यान्य कारणों से वापस जा रही हैं -भक्तगण दुखी हैं :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..भारतीय समाज की विवशताएँ!
  3. गिरीश बिल्लोरे मुकुल
    प्रभू ब्लागावतार कब लेगे गुरु जी
    गिरीश बिल्लोरे मुकुल की हालिया प्रविष्टी..अब अन्ना हाशिये पर हैं…….?
  4. गिरीश बिल्लोरे मुकुल
    वर्तनी मिस्टेक सुधार लीजिये प्रभो
    ब्लागावतार= ब्लागरावतार
    गिरीश बिल्लोरे मुकुल की हालिया प्रविष्टी..अब अन्ना हाशिये पर हैं…….?
  5. Panchhi
    Bitter truth of our society
    Interesting and Entertaining
    Panchhi की हालिया प्रविष्टी..Fathers Day Poem in Hindi
  6. प्रवीण पाण्डेय
    यह पढ़कर तो हम भी उलझ गये कि अवतार हो कि न हो, लीप अवतार सा कुछ।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मैकबुक मिनी
  7. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] देवलोक में अवतार चर्चा [...]
  8. Pritesh
    Yaha bade bade Danav baithe hai, wo bhi gurra ke kah rahe hai ki aane do kisi bhi Avtaar me kisi bhi devta ko…. karodo rupaye khila ke airport se hi ravana kar denge…..

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