Friday, July 19, 2013

ये क्या हो रहा है

http://web.archive.org/web/20140420081449/http://hindini.com/fursatiya/archives/4516

ये क्या हो रहा है

Mid day mealबिहार में दोपहर का भोजन खाने से 23 बच्चों की मौत हो गयी।

बच्चों की मौत की खबर आते ही मीडिया के संवाददाता ’मिड डे मील’ वाले स्कूलों की तरफ़ उसी तरह लपक लिये जैसे कांजी हाउस की दीवार टूटने पर जैसे मवेशी अदबदा के बाहर भागते हैं। कैमरा लिये वे बच्चों के स्कूलों के दोपहर के भोजन पर टूट पड़े। जैसे इनकमटैक्स वाले छापा मारते हैं तो घर के गद्दे,तकिया तक उधेड़ के देखते हैं वैसे ही मीडिया वाले स्कूलों में बंटने वाले सब्जी, दाल, चावल, राजमा को चीर-फ़ाड़ के देखने लगे। खाने में गंदगी, कीड़े, सड़न, गलन को कैमरे से जूम करके दिखाने लगे। जनता का सच जनता को चिल्ला-चिल्ला के दिखाने लगे।

स्कूल को निपटाने के बाद मीडिया ने अस्पताल की तरफ़ मुंह किया। वहां की दुर्दशा पर हमला बोल दिया। अस्पताल की गंदगी, थूक, पीक, कूड़ा-करकट और दुर्व्यवस्था को कैमरे की तलवार से टुकड़े-टुकड़े करके जनता के सामने पेश कर दिया। ’मिड डे मील’ और सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा कैमरे पर दिखाते हुये मीडिया को देखकर पुराने जमाने के राजा-महाराजा लोग याद आ गये जो किसी मरे हुये शेर के ऊपर लात और बंदूक टिकाकर शिकारी होने का गर्व चेहरे पर धारण करते थे।

दुर्घटना जिस राज्य में हुई उस राज्य के हाकिम के सुशासन के मंगलगीत मीडिया सालों से गाता आ रहा था। मीडिया को अचानक हुई इस दुर्घटना के बाद ही पता चला कि राज्य के सब स्कूलों में ऐसे ही ’मिड डे मील’ लापरवाही होती है। खाना खराब मिलता है। अस्पताल में कोई व्यवस्था नहीं है। सब गड़बड़ है। देश के नौनिहालों के भविष्य और जान से खिलवाड़ हो रहा है। अगर यह दुर्घटना न होती तो शायद मीडिया को पता ही न चल पाता कि दोपहर के भोजन में इत्ते लफ़ड़े हैं। अस्पतालों में इत्ती बदइंतजामी है।

अपने देश के मीडिया की इन मीडिया सुलभ अदाओं को देखकर महाभारत के धृतराष्ट्रजी याद आते हैं। किसी भी घटना के घट जाने का आभास होने पर वे मुंह ऊपर उचकाकर, अपनी दृष्टिवंचित आंखे मिचमिचाते हुये पूछते रहते थे- ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है।

मीडिया को सब पता है कि मिड डे मील में खाना कैसा बनता है, सरकारी अस्पतालों में गन्दगी रहती है। लेकिन वह उसको तबतक नहीं देखती जब तक वहां कोई दुर्घटना नहीं होती, उससे कोई सनसनी नहीं निकलती। वह गड़बड़ी के पास से गुजरती भी है तो गांधारी की तरह आंख में पट्टी बांधकर ताकि उसको वह सब न दिखे जो राजा धृतराष्ट्र को नहीं दिखता। गड़बड़ी की जगह कोई बड़ी दुर्घटना होते ही वही उसे वह दुर्योधन की तरह प्रिय हो जाती है। उसके प्रति उसके मन में वात्सल्य छलकता है। वह अपनी आंख की पट्टी उतार उतारकर उसे स्नेह से निहारती है ताकि वह दुर्घटना/सनसनी अजर अमर हो सके।
श्याम रुद्र पाठक’मिड डे मील’ दुर्घटना के बाद मीडिया कैमरा खाने पर चमकाते धृतराष्ट्र की तरह आंख मिचमिचाते पूछ रहा है -ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है।

आजकल दिल्ली में श्यामरुद्र पाठक ऊंची अदातलों की कार्यवाही भारतीय भाषाओं में किये जाने की मांग को लेकर नियमित अनशन पर रहते हैं। रोज गिरफ़्तार किये जाते हैं, छोड़े जाते हैं। फ़िर पकड़े जाते हैं , फ़िर छोड़े जाते हैं। मीडिया उनको देख नहीं पा रहा है। उसके कैमरे की नजर उन तक पहुंच नहीं पा रही है। वह इस इंतजार में है कि इस संबंध में कोई सनसनीपूर्ण दुर्घटना हो तो वह धृतराष्ट्रजी की तरह आंख मिचमिचाते हुये कैमरा चमकाते हुये तेज आवाज में चिल्लाते हुये पूछे -ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है।

12 responses to “ये क्या हो रहा है”

  1. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    जबरदस्त…।
    ऐसा ही चित्रण फेसबुकियों का भी होना मांगता है।
    कैसे-कैसे लोमहर्षक स्टेटस आ रहे हैं।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के लिए ब्लॉग बनाएँ
  2. प्रवीण पाण्डेय
    सबक लेने या देने का तत्व तो हो खबर में..
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..उथल पुथल में क्रम
  3. देवांशु निगम
    जो बिकता है बस वही दीखता है !!!
    वैसे बिहार में हुए इस काण्ड से ये भी पता चलता है की वहां खाना दिया जा तो रहा है कमसकम , अपने यहाँ तो महीने के राशन की तरह बाँट देते हैं , महीने की शुरुआत में आओ, ५-७ रुपये जो फीस है वो भरो, और राशन उठा कर चले जाओ |
    कितने ही स्कूलों में ऐसे बच्चे पढ़ रहे हैं जो इस दुनिया में अपना वजूद नहीं रखते , उनका नाम है रजिस्टर में , मास्टर साहब फीस भर देते हैं , फीस से ज्यादा का राशन मिल जाता है |
    पर ये सब मीडिया को तब दिखेगा जब इस टाइप का कोई घोटाला-फोटाला खुल के आएगा !!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..डीज़ल-पेट्रोल
  4. Anonymous
    हाँ तो दुर्घटना होने के बाद तो चले गए न.. क्या आप भी :P
    अब नेताओं की नौकरी भी तो बजानी है . कि यही देखते रहें .
  5. Shikha Varshney
    ये ऊपर वाली टिप्पणी हमारी है..शायद मीडिया के डर से जल्दी भाग गई :):)
  6. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    जो भी हो रहा है अच्छा तो नहीं ही हो रहा है..
  7. Gyandutt Pandey
    जिसे देखना है, वह धृतराष्ट्र है। जिसे करना है, वह दुर्योधन! :-(
    Gyandutt Pandey की हालिया प्रविष्टी..मन्दाकिनी नदी पर रोप-वे बनाने में सफल रही शैलेश की टीम
    1. sanjay jha
      :(:(:(
      प्रणाम.
  8. arvind mishra
    अभी तो दुखी हूँ स्तब्ध हूँ बस
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..कुछ छुट्टा तूफानी विचार -फेसबुक से संकलन!
  9. समीर लाल "टिप्पणीकार"
    मीडिया को देखकर पुराने जमाने के राजा-महाराजा लोग याद आ गये जो किसी मरे हुये शेर के ऊपर लात और बंदूक टिकाकर शिकारी होने का गर्व चेहरे पर धारण करते थे।
  10. mahendra mishra
    हमेशा मीडिया की आदत है कि घटना होने के पश्चात कैमरा हिलाने लगते हैं और जोर जोर से भोंपू बजाने लगते है और दस पांच दिन बाद शांत हो जाते हैं । बच्चों को कैसा खाना दिया जा रहा है अथवा कहीं उन्हें मिलावटी भॉजन तो नहीं दिया जा रहा है इसकी परख मीडिया या जिम्मेदारों द्वारा कभी नहीं की जाती है । आकस्मिक निरीक्षण नहीं किया जाता है। वैसे सही माइनों में मिड डे मील योजना भ्रष्टाचार की चारागाह बन गया है। धन के लोलुप बच्चों की जान से खिलवाड़ करने से नहीं चूक रहे हैं।
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] ये क्या हो रहा है [...]

Sunday, July 14, 2013

फ़टाफ़ट क्रिकेट -खलीफ़ा तरबूजी के बमकने से लेकर धोनी की फ़िनिशिंग तक

http://web.archive.org/web/20140420081906/http://hindini.com/fursatiya/archives/4490

फ़टाफ़ट क्रिकेट -खलीफ़ा तरबूजी के बमकने से लेकर धोनी की फ़िनिशिंग तक

धोनीकभी बच्चों की पत्रिका पराग में के.पी. सक्सेना ’खलीफ़ा तरबूजी’ के किस्से लिखते थे। धारावाहिक किस्तें। एक किस्त में खलीफ़ा एक क्रिकेट मैच देखने जाते हैं। सुराही, पान, हुक्का और सब टंडीला लेकर पहुंचते हैं इस्टेडियम। एक खिलाड़ी की तेज शॉट को एक फ़ील्डर गेंद ,पेट के पास हाथ लाकर , लपककर मैदान में लेट जाता है। आउट हुआ खिलाड़ी पवेलियन की तरफ़ लपकता है। बाकी खिलाड़ी उछलने, खुशी मनाने लगते हैं। खलीफ़ा तरबूजी बमकने लगते हैं- ये देखो उसकी खिलाड़ी के पेट में गेंद मारकर भागा जा रहा है अगला और उसके साथ के खिलाड़ी मर्दुये सब उसको पकड़ने की जगह खुशी मना रहा हैं। उठाओ उसको, डॉक्टर बुलाओ। कैसे साथ के लोग हैं- लाहौलविलाकूवत।
 
बाद में खलीफ़ा को पता चलता है खेल के बारे में। उसके अलग किस्से हैं। खलीफ़ा सच्चे खेल प्रेमी थे सो हार-जीत से अलग खेल के बारे में सोचते थे। आज लोग सिर्फ़ हार-जीत के बारे में सोचते हैं। इसीलिये हलकान रहते हैं।

बहरहाल , परसों पता चला कि भारत की क्रिकेट टीम त्रिकोणीय श्रंखला जीत गयी। आखिरी ओवर की जीत के चर्चा मीडिया में हैं- बाकी सारे मुद्दे पीछे धकियाते हुये। मजा देखिये तीन टीमें खेली उसको टूर्नामेंट बना दिया। आगे लगता है दो टीमों के बीच भी टूर्नामेंट होंगे। कई फ़ाइनल होंगे। एक पहले बैटिंग का फ़ाइनल, दूसरा पहिले फ़ील्डिंग का फ़ाइनल, इसके बाद ये फ़ाइनल, वो फ़ाइनल फ़िर डकवर्थ लुईस वाला फ़ाइनल। सबमें देश सांस रोककर बेहाल होता रहेगा मैच के पीछे।

हम तो रात लंबी तान के सो गये। सुबह पता चला देवांशु से कि धोनी माना नहीं, भारत को जिता दिया। हमने कहा -ये तो गड़बड़ किया। हारना चाहिये था। 

क्रिकेट जैसे अनिश्चित खेल में भी अगर सब सोचे मुताबिक हो जाये तब तो हो चुका। क्रिकेट बीच में फ़िक्सिंग के चलते जरा बदनाम सा हुआ लेकिन अब फ़िर लगता है उसकी हालत में सुधार हो रहा है। लोग क्रिकेट के नाम पर फ़िर समय बर्बाद करने लगे हैं। पोस्ट लिखने लगे हैं।

क्रिकेट की फ़िक्सिंग पर जो बवाल मचाते हैं उनको सोचना चाहिये कि क्रिकेट में सब तो फ़िक्स है, पिच की लंबाई, चौड़ाई, ओवर की गेंदें, खिलाड़ी की संख्या, ओपनर, अंपायर, थर्ड अंपायर, कप्तान, उपकप्तान, विकेटकीपर, कमेंट्रटर, विशेषज्ञ हेन-तेन तो एक ठो परिणाम और फ़िक्स हो जाने से कौन पहाड़ टूटता है। फ़ालतू का बवाल।

क्रिकेट की अनिश्चितता वाली अदा बड़ी जालिम लगती है। बहुत हाला-डोला मचता है कभी-कभी। जीत राणा के चेतक सी इधर-उधर लपकती है- था अभी यहां अब यहां नहीं, किस अरि मस्तक पर कहां नहीं। जो टीम जीतती लगती है वह हारने लगती है, हारते-हारते जीत जाती है। कुछ पता नहीं चलता कभी-कभी कि जीतने वाला जीतेगा भी या हार के ही मानेगा। राजनीतिक पार्टियों के गठबंधन के तरह पता नहीं चलता कि जीतती टीम कब जीत से अपना गठबंधन सिद्धांतों के आधार पर तोड़ ले।

कभी-कभी तो टीमें खेल में जीत-हार का इतना वैरियेशन इस्तेमाल करती हैं कि लगता है मार्डन संगीत सुन रहे हैं। जीत का आखिरी तक पता नहीं चलता किसके पक्ष में वोट डालेगी। कभी-कभी तो ऐन टाइम पर वोटिंग से वॉक आउट कर जाती है। मैच ड्रा या टाई हो जाता है।

कभी-कभी तो खिलाड़ी जबरियन जीत-हार को इधर-उधर उछालते रहते हैं। राहत सामग्री की तरह पता नहीं चलता कि किधर गिरेगी जीत की पोटली। अच्छा-खासा जीतती टीम अचानक कहने लगती है- नहीं जीतते , जाओ क्या कल्लोगे?
 
कभी-कभी खिलाड़ी यह दिखाने के चक्कर में पड़ जाते हैं कि वे मैच के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। लोस्कोरिंग में बायकाट से भी धीमी गति से बैटिंग करने लगते हैं ( बकौल Gyan Dutt Pandey : जैफ बायकाट बैटिंग कर रहे थे। एक दर्शक पेड़ पर बैठा नीरस मैच देख रहा था। उसे झपकी आ गयी। टपक गया और सिर में चोट से अस्पताल मेँ भर्ती कराया गया। होश में आने पर जब यह पता चला कि बायकाट तब भी बैटिंग कर रहा था तो वह पुन: बेहोश हो गया। … कोमा में! :) )। पहले आसानी से हासिल होने वाले टुइयां से स्कोर को पहाड़ सरीखा असंभव बनाते हैं। इसके बाद जब मैच फ़ंस जाता है तो फ़िर उसको जीतने में जान लगा देते हैं। जीत हासिल करके हीरो जैसा बन जाते हैं। कई दिनों तक मीडिया हीरो बने रहते हैं। पैसे, विज्ञापन, रुतबा बढ़ता है। लोग उनकी तारीफ़ में कढ़ाई करते हैं कि कैसे अगले ने मैच बचाया, जिताया। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि यही बरखुरदार थे जिन्होंने मैच को जीत के नेशनल हाईवे से हार की तंग गली में फ़ंसा दिया था। लोग मैच निकालने वाले को लपक कर सम्मानित करने के चक्कर में फ़ंसाने वाले को भूल जाते हैं।

मैच फ़ंसाकर निकालने की अदा दिखाने वाले खिलाड़ियों की हरकतें प्रोफ़ेशनल कालेज के उन लड़कों जैसी लगती हैं जो इम्तहान के पहले किताबों की धूल झाड़ना हराम समझते हैं और लेकिन इम्तहान नजदीक आने पर किताबों सी ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे चुनाव के समय में जनप्रतिनिधि जनता से। पहले मैच फ़ंसाने के लिये पसीना बहाना फ़िर मैच बचाने/जिताने के लिये बनियाइन भिगोना।

इस चक्कर में देखने वालों के दिल की धड़कने सेंसेक्स की तरह ऊपर नीचे और चीयरबालाओं के ठुमकों की तरह उचकती-गिरती रहती हैं। ब्लॉड प्रेशर डालर की कीमतों के तरह और रुपयों की औकात की तरह झटका देता है।

क्रिकेट मैच को जिस तरह अपने खिलाड़ी जबरियन आखिरी ओवर तक घसीट के ले जाते हैं उससे किसी भावुक क्रिकेट प्रेमी की सदमे से मौत हो सकती है और किसी खिलाड़ी पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा ठुक सकता है।

खेल के उतार-चढ़ाव का क्रिकेट प्रेमियों के दिल पर तगड़ा असर होता है। प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी इसी झटके में गये। सचिन का आउट होना झेल नहीं पाये। चले गये।

उतार चढ़ाव की बात से याद आया कि घरों, मोहल्लों, दफ़्तरों में तमाम लोग मैच के रोमांचक क्षणों में एक ही पोज में बैठे रहते हैं। हिलते नहीं इस डर से कि जहां वे हिले नहीं , टीम का विकेट हिल जायेगा। रोमांचक मैच दर असल इनके कारण ही जीते जाते हैं। लेकिन क्रेडिट, पैसा और विज्ञापन मैदान के लोगों मिलते हैं।

बहरहाल अब भारत जीत चुका है। कुछ दिन के लिये शांति हुई हल्ले-गुल्ले से। अब अगला मैच होने तक भारत में मैच के रोमांच के चलते सदमे से निपटने की आशंका संभावना कम हुई है। है कि नहीं?

8 responses to “फ़टाफ़ट क्रिकेट -खलीफ़ा तरबूजी के बमकने से लेकर धोनी की फ़िनिशिंग तक”

  1. देवांशु निगम
    ये प्रोफेशनल कालेज के स्टूडेंट वाली बात मारू टाइप है एकदम | तभी सारे स्टूडेंट पंखा हैं धोनी के :) :) :)
    प्रभाष जोशी वाली बात पता नहीं थी | अभी उनका विकी पेज देखे |
    और मैच जीतने से फिक्सिंग की बात पर मट्ठा पड़ गया | बेचारे न्यूज़ चैनल अब काहे पर डिस्कसिआयेंगे :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..चीर-फाड़ , पोसमार्टम !!!!
  2. arvind mishra
    ये नशा आप पर भी हावी है क्या ? हमें तो क्रिकेट शब्द से अब एलर्जी है !आपका एक अच्छा ख़ासा व्यंग हम पर भारी पड़ रहा है सो खिसकते हैं !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..बिचारी कर्मनाशा!
  3. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    रोचक
  4. आशुतोष कुमार
    खलीफा तरबूजी की याद दिला कर आप ने चित्त प्रसन्न कर दिया . किरकिट और खलीफा का संयोग यों ही जान मारू है .
  5. shobha
    मियां तरबुजी की खूब याद दिलाई बाकि क्रिकेट में कोई दिलचस्पी नहीं. ये मियां तरबुजी वही है ना जो फ को फ बोलते है?
  6. प्रवीण पाण्डेय
    रोचक बनाने के प्रयासों के मध्य सौन्दर्यलहरी बिखेरता अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट..
  7. फ़टाफ़ट क्रिकेट -खलीफ़ा तरबूजी के बमकने से लेकर धोनी की फ़िनिशिंग तक | SportSquare
    [...] [...]
  8. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    […] […]

Friday, July 12, 2013

सफ़ाई का मौका

http://web.archive.org/web/20140420081915/http://hindini.com/fursatiya/archives/4478

सफ़ाई का मौका

सफ़ाईमंत्री जी की शिकायत है कि उनको सफ़ाई का मौका नहीं मिला. दूध से मक्खी की तरह निकाल दिया गया. घोर कलयुग है जी. कल तक सरकार में अंगद की तरह जमा आदमी उत्तराखंड में आई बाढ में मामूली सामान सा बह गया.
मीडिया को भी तकलीफ़ हुई होगी. हफ़्ते भर का जो मामला खिंचता वह दो दिन में निपट गया. मीडिया का ’सनसनी लॉस’ हो गया. बुजुर्गवार ए.टी.एम. न्याय का शिकार हो गये. मंत्रीजी को ऐसे निकाल दिया जैसे ए.टी.एम. से पैसे निकाले गये हों. उनकी तकलीफ़ जायज है. सफ़ाई का मौका न मिला. न हाय-हाय हुई न किचकिच. निकाल बाहर किया गया.
देखा जाये तो बुजुर्गवार ने लीक तोड़ने का काम किया. राजनीति वाले घपले-घोटाले, भाई भतीजावाद और घूस-फ़ूस के लिये बदनाम हैं. बुजुर्गवार ने जनप्रतिनिधियों की बदनामियों की एकरसता को तोड़ा है. भ्रष्टाचार के दलदल से मामला उठाकर यौनाचार की जमीन तक लाये हैं. नयी नजीर पेश की है राजनीतिज्ञों के सामने. बदनामी के लिये कब तक करप्शन का मुंह जोहते रहोगे भाई. बदनामी के लिये करप्शन का विकल्प मौजूद है आपके पास.
बुजुर्गवार ने देश के युवाओं के सामने भी एक नजीर पेश की है. युवा पीढी दिन रात मल्टीनेशनल कंपनियों की चाकरी करती हुई राजनीति से दूर भाग रही है. तनाव के चलते उनके अपने यौनक्षमता प्रभावित हो रही है. इस नजीर से उनको राजनीति में आने की प्रेरणा मिल सकती है. राजनीति में आओ, फ़िर से यंग बन जाओ.
भूतपूर्व वजीर साहब के सहारे बुढ़ापे में जवानी का संचार करने की दवा बेचने वाले भी अपनी दुकान चमका सकते हैं. अगले ने हमारी कंपनी की बनी दवाई खायी तभी जवानी बरकरार रही. हमारी जड़ी सूंघी उसी से ताकत का संचार हुआ. झटका हकीम भी सार्वजनिक शौचालयों में अपना हल्ला मचा सकते हैं. हमसे झटका लगवाओ, कयामत तक जवानी चमकाओ. देशी ताकत की दवा बनाने वाले वियाग्रा के मुकाबले स्वदेशी गोली के चमत्कार के किस्से सुना सकते हैं.
बुजुर्गवार की पार्टी वालों ने उनको सफ़ाई का मौका नहीं दिया लेकिन खुद दिये पड़े हैं सफ़ाई. कह रहे हैं आरोप लगाने वाली पार्टी के लोग यह सब बहुत पहले से करते आ रहे हैं. हमारे यहां तो अब शुरु हुआ.
यह अपराध बोध ठीक बात नहीं. न बुजुर्गवार के लिये, न उनकी पार्टी के लिये न समाज के लिये. सबको छाती ठोंककर कहना चाहिये हम परम्परा से जुड़े रहे हैं. अपने पूर्वज ययाति की परंपरा निबाह रहे हैं.ययाति ने तो अपनी यौन इच्छा पूरी करने के लिये अपने लड़के से जवानी उधार ली थी. हम तो अपनी से काम चला रहे हैं. जवानी के लिये किसी लोन की अर्जी नहीं दी. वे तो सिर्फ़ स्त्रियों को भोगते थे , हम तो लड़कों को भी कृतार्थ कर रहे हैं. पूर्वजों के आदर्शों को नये आयाम दे रहे हैं. नयी नजीर पेश कर रहे हैं.
बुजुर्ग की शिकायत जायज लगती है. उनको सफ़ाई का मौका तो मिलना चाहिये था. आपको क्या लगता है?

8 responses to “सफ़ाई का मौका”

  1. arvind mishra
    यह व्यंग की अश्लील विधा है हमें तो आगे पढने में शर्म आ रही है :-(
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..बिचारी कर्मनाशा!
  2. प्रवीण पाण्डेय
    सफाई करने का और सफाई देने का अवसर तो मिलना बनता है, कुछ नहीं तो क्षमा माँगने का ही सही।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मैं किनारा रात का
  3. Pawan Mishra
    ये बुजुर्ग भ्रमवश 377 हटाने की जगह 370 हटाने के नाम से भाजपा से जुड़ गये होंगे शायद।
  4. sanjay jha
    बुजुर्गवार ने जनप्रतिनिधियों की बदनामियों की एकरसता को तोड़ा है. राजनीति में आओ, फ़िर से यंग बन जाओ. हम तो अपनी से काम चला रहे हैं. जवानी के लिये किसी लोन की अर्जी नहीं दी.
    …………………………..
    …………………………..
    प्रणाम.
  5. alpana
    वाकई पते की बात है यह कि ‘मीडिया का ’सनसनी लॉस’ हो गया.’
    अच्छा हो कि बाकि मामलों में भी अदालतें इतना त्वरित फैसला सुना दें.
    alpana की हालिया प्रविष्टी..रंग बदलता मौसम
  6. PN Subramanian
    पूरा मामला उतना सरल और सीधा नहीं है. इस निष्कासन और ए टी एम जैसी दीगर कार्रवाई के पीछे कई राज छुपे होंगे. आपने जो तस्वीर लगाईं है उसपर भी एक यथार्तवादी पोस्ट बननी चाहिए.
  7. Khushdeep Sehgal
    अब समय आ गया है, जब राघवजी, एनडी तिवारी और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे लोगों को मिलकर अपनी नई
    पार्टी का ऐलान कर देना चाहिए…
    जय हिंद…
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] सफ़ाई का मौका [...]

Monday, July 08, 2013

टमाटर की डॉलर को पटकनी

http://web.archive.org/web/20140420081720/http://hindini.com/fursatiya/archives/4465

टमाटर की डॉलर को पटकनी

टमाटरआजकल टमाटर के भाव चढ़ते जा रहे हैं. एक टमाटर से हमने इस बारे में बातचीत की। टमाटर ने अपने दाम बढ़ने के पीछे के कारण बताये. सुनिये बातचीत के मुख्य अंश:
सवाल: आपके भाव इत्ते भाव क्यों बढ रहे हैं?
जबाब: मैं डॉलर को पटखनी देना चाहता हूं. स्वदेशी समर्थक हूं. मुझे यह कत्तई बर्दाश्त नहीं कि कोई बाहरी ताकत हमारे देश वासियों को परेशान करे. मैं डॉलर के बढ़ते दाम से हलकान देशवासियों को सुकून का एहसास दिलाना चाहता हूं. मैं डॉलर का घमंड चकनाचूर करना चाहता हूं.
सवाल: आपकी ये कैसी स्वदेशी भावना है कि आप अपने दाम बढ़ाकर लोगों को परेशान कर रहे हैं.
जबाब: दुनिया में सब कुछ सापेक्ष होता है. परेशानियां भी. मैं अपने दाम बढ़ाकर लोगों को सुकून का एहसास दिलाना चाहता हूं कि बाकी सब्जियां मेरे मुकाबले सस्ती हैं. न केवल सब्जी बल्कि जुलाई में बच्चों के एडमिशन, बढती फ़ीस, मंहगी किताबों आदि सब परेशानियों को भुलाने में सहायता करना चाहता हूं. लोग मेरे कारण बाकी सब छोटी मंहगाई झेल लेंगे. मैं तो कोशिश में हूं कि लोग मेरे कारण उत्तराखंड की आपदा भी भूल जायें.
सवाल: ऐसे कैसे हो सकता है कि रोजमर्रा की परेशानियां सब आपके कारण भूल जायें?
जबाब: अरे चाहने से क्या नहीं हो सकता? मीडिया से बातचीत चल रही है अपनी. बात पक्की होते ही खेल शुरु होगा. फ़िर देखियेगा मेरे जलवे. सारे मीडिया वाले अपने-अपने कैमरा मैन लिये मंडी में दिखेंगे.
सवाल: तो आपकी योजना प्याज की तरह सरकार गिराने की है?
जबाब: देखिये हम किसी की नकल नहीं करते. प्याज जी से हमारे मधुर संबंध हैं. हम उनका आदर करते हैं. मुद्दों के आधार पर संबंध हैं. सलाद में हमारा उनका गठबंधन सदियों से अच्छा चल रहा है लेकिन सॉस में हम उनके साथ नहीं हैं. वैसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिये विकल्प होना हमेशा अच्छी बात है. सरकार गिराने के लिये एक ही सब्जी पर निर्भरता किसी भी लोकतंत्र के लिये ठीक नहीं. लेकिन फ़िलहाल हमारी प्राथमिकता सरकार की नहीं लोगों को कई तरह की मंहगाई से राहत महसूस कराने की है. लोग हमारी मंहगाई को देखकर बाकी मंहगाई से राहत महसूस करे यही हमारा उद्धेश्य है. सिंगल विंडो मंहगाई राहत केंद्र समझिये मुझे.
सवाल: अगर कभी सब्जियों की सरकार बनी तो क्या आप प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करेंगे?
जबाब: आप पत्रकारों की बलिहारी है. जो भी कोई जरा सा चर्चा में आया उसमें प्रधानमंत्री बनने की संभावना देखने लगते हैं. धन्य हैं आप लोग भी.
सवाल: देखिये यह हमारी पेशागत मजबूरी है. इसलिये इस सवाल का जबाब तो आपको देना ही पड़ेगा कि अगर कभी आपकी सरकार बनी तो क्या आप प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करेंगे?
जबाब: देखिये सब्जियों का उपयोग हमेशा सरकार गिराने के लिये होता है. बनाने के लिये नहीं. हमारे वरिष्ठ मित्र प्याज के साथ भी यही हुआ. एक बार उनके नाम पर सरकार गिरी लेकिन जब सरकार बनी तो उनको कोई पद नहीं मिला. वैसे भी हमारा उद्धेश्य सेवा है. सरकार बनाना नहीं. लेकिन यदि कभी ऐसा मौका आया तो सब्जी मंडी में सभी सब्जियां बैठकर सामूहिक निर्णय लेंगी और सर्वसम्मति से जो फ़ैसला होगा उसे सब स्वीकार करेंगे.
इस बीच सब्जियों के नारे गूंजने लगे:
टमाटर तुम संघर्ष करो,हम तुम्हारे साथ हैं.
हमारा नेता कैसा हो, टमाटर भैया जैसा हो.
आगे संवाददाता कुछ और पूछता तब तक टीवी पर कामर्शियल ब्रेक की घोषणा हो गयी.

10 responses to “टमाटर की डॉलर को पटकनी”

  1. आशीष
    टमाटर जी भी विदेशी है, १६ वी सदी मे पुर्तगालियों ने लाया था उन्हे । अब वो इटालीयन नहीं है इसका मतलब यह नहीं की उन्हे छोड़ दें!
  2. arvind mishra
    सटीक व्यंग है टमाटर के बहाने नेतागिरी और मीडियागिरी पर :-) हम तो कोई सुर्खरू टमाटर गाल नेत्री की खोज में है -उसके आगे यह टमाटर बेदम है !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..मिथक का मतलब
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    दम है जी टमाटर में, मीडिया को तो इसके पीछे जाना ही पड़ेगा।
    आशीष जी, विदेशी मूल तो सुना है आर्यों का भी था। जो भारत में आ गया वह यहीं का हो गया।
  4. Alpana
    बहुत ही मस्त- जबरदस्त लगा टमाटर महोदय का साक्षात्कार.
    ये ‘प्याज जी ‘की नक़ल नहीं करते लेकिन ये भी किंग मेकर कहलायेंगे .इतिहास में दर्ज हो जायेंगे.
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..चित्र और त्रिवेणी
  5. Anonymous
    टमाटर ने पटकनी तो दे ही डाली
  6. shikha varshney
    अब कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी..यूँ हि तो टमाटर भाव नहीं बढाता :):)
    जोरदार , शानदार व्यंग है.
    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..कड़वा सच …
  7. प्रवीण पाण्डेय
    सलाद के गठबन्धन को तो मँहगा कर ही दिया, इन लोगों ने।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मैे किनारा रात का
  8. karun kumar
    phursatiya ji aapko jankar khusi hogi ki sabji morcha ko Ncp ka samarthan mil gaya hai. Hon’l krishi mantri sharadpawar pyaj ko abroad jane ke khilaph nahi hain.
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] टमाटर की डॉलर को पटकनी [...]