Saturday, January 25, 2014

बिनु धरना सब सून

दो दिन पहले दिल्ली में धरना प्रदर्शन हुआ।

माननीय मुख्यमंत्री ने दो दिन धरने पर बैठक उट्ठक लगायी। वहीं दफ़्तर लगाया। वहीं धरना किया। वहीं बयान दिया। वहीं समझौता वार्ता की। जहां से धरना शुरु किया वहीं खतम कर दिया।

एक मुख्यमंत्री सिपाहियों के निलंबन के लिये दो दिन धरना रत रहे। आखिर में दो को छुट्टी पर भेज कर ही मान गये। निलंबन में वेतन आधा मिलता है। छुट्टी में पूरा। सरकार का नुकसान करा दिया धरना खत्म करा कर।
हम समझते थे मुख्यमंत्री बहुत अधिकार संपन्न होता है। लेकिन यहां तो उल्टा ही निकला। दो दिन ठिठुरने के बाद केवल दो लोगों को छुट्टी पर भेज पाये ये तो बहुत गड़बड़ बात है।

लगता है मुख्यमंत्री समर्थन देने वाली पार्टियों को संदेश दे रहे हों– हमको कमजोर और असहाय समझकर मुख्यमंत्री बनवा दिया। हम इसका बदला लेकर रहेंगे। लेकर रहेंगे, लेकर रहेंगे। इंकलाब जिन्दाबाद!

जब माननीय धरने पर बैठे तो हमें लगा जैसे एक कोई शेर एक मेढक के शिकार के लिये धरने पर बैठ जाये। बाद मे पता चला कि मेढक छुट्टी पर चले गये और शेर वापस अपने दफ़्तर लौट आया बोला -जनता जीत गयी।
यह भी लगा कि अब सब पार्टियों को लगता है बातचीत से कुछ हल होने वाला नहीं। सब काम धरने से ही निपटेंगे। धरने पर अगाध भरोसे को देख कर स्व. भगवती चरण वर्मा जी के एक उपन्यास का शीर्षक याद आता है– सामर्थ्य और सीमा। लगता है कि धरना ही उनकी सामर्थ्य है और धरना ही उनकी सीमा। सब काम धरने से।

ये धरना अपने यहां एक बड़ा बवाल है। जिसके मन की न हुयी वो धरने पर बैठ जाता है। अभी माननीय बैठे धरने पर । अब खबर आ रही है कि विरोधी पार्टी धरने पर बैठेगी। निलंबित हो गये होते तो पुलिस वाले बैठ जाते। अब हो सकता है बाकी पुलिस वाले भी धरने पर बैठ जायें –पुलिस वालों में भेदभाव मत करिये। समान पद समान सुविधा के नियम के हिसाब से हमको भी छुट्टी पर भेजिये।
dharnaनियम कानून सहज बुद्दि सब बेकार हैं। धरना सार्वभौमिक सत्य है। जिसे देखो वह अपना काम धरने से निकलवा रहा है। देश में जिसे देखो वह धरने पर है।

भ्रष्टाचार धरने पर है कि हमको जायज ठहराओ। काहिली नारा लगा रही है कि हमें ईमानदारी का दर्जा दो। गुंडागर्दी हल्ला मचा रही है कि उसको बहादुरी का स्केल दिया जाये। बर्बरता माइक पर दहाड़ रही है कि हमको देशभक्त न माना गया तो देश वालों की खैर नहीं।

वैसे देखा जाये तो यह सच ही है। धरने का चलन आदि काल से है। दुनिया में जो भी कुछ आजतक मिला वह धरने से ही मिला।

पुराने जमाने में ॠषि लोग तपस्या करते थे। अड़ जाते थे आराध्य के सामने के सामने कि हमको वरदान दो। सालों तक तपस्या करते थे। तपस्या भी तो एक तरह का धरना ही है। देवताओं के सिंहासन हिल जाते थे तपस्या वाले धरने से । तब वे वरदान देकर मामला निपटवाते थे। वरदान वास्तव में एक समझौता ही तो था। बीच का रास्ता होता था। दुनिया में आज तक जो हुआ सब धरने की बदौलत ही मिला।

रावण को शिव से वरदान तपस्या से ही मिला। बैठ गये धरने पर शंकर जी के सामने। सालों बैठे रहे। तब शंकर जी ने वरदान देकर मामला निपटाया। अपना धनुष तक दे दिया। महिषासुर, अर्जुन, बुद्ध सब को अपनी ताकतें, हथियार और ज्ञान सब धरने से ही तो मिले।

न्यूटन भी पेड़ के नीचे बैठे धरना ही तो दे रहे थे जब उनको सेव का गिरना दिखा। उसी से उन्होंने न्यूटन के नियम बनाये।

आर्किमिडीज को भी अपनी समस्या का हल नहीं समझ में आया तो जाकर बैठ गया नहाने के टब में। उसी धरने के चलते उसको उत्प्लावन के नियम का ज्ञान मिला।

दुनिया भर में जितने भी बड़े-बड़े निर्णय हुये वे सब तमाम मीटिंगों में लिये गये। मीटिंग भी तो एक तरह का धरना ही है। जिसमें मांग करने वाले और मांगने वाले एक ही जगह पर होते हैं। घंटो के मोलभाव के बाद समझौता खतम होता है।

कुल मिलाकर हमको तो ये लगता है कि ये दुनिया ही धरना प्रधान है।

आपको क्या लगता है?

15 responses to “बिनु धरना सब सून”

  1. अनूप शुक्ल
    नियम कानून सहज बुद्दि सब बेकार हैं। धरना सार्वभौमिक सत्य है। जिसे देखो वह अपना काम धरने से निकलवा रहा है। देश में जिसे देखो वह धरने पर है।
    भ्रष्टाचार धरने पर है कि हमको जायज ठहराओ। काहिली नारा लगा रही है कि हमें ईमानदारी का दर्जा दो। गुंडागर्दी हल्ला मचा रही है कि उसको बहादुरी का स्केल दिया जाये। बर्बरता माइक पर दहाड़ रही है कि हमको देशभक्त न माना गया तो देश वालों की खैर नहीं। http://hindini.com/fursatiya/archives/5380
  2. अशोक पाण्‍डेय
    भोजपुरी में ‘धरना’ शब्द का क्रिया के रूप में भी खूब इस्तेमाल होता है, पकड़ने के अर्थ में। अरविन्द केजरीवाल जी जान गईल बाड़े कि धरने से कुर्सी धराई।
    केजरीवाल वोट की राजनीति कर रहे हैं। वे जनता को संदेश दे रहे हैं, ”देखो, मुख्यमंत्री बनकर तो एक सिपाही को भी नहीं हटा सकता। इसलिए अब प्रधानमंत्री बनाओ।”
  3. रचना त्रिपाठी
    हमें भी कोई उपाय सुझाते! खलिकर बैठे हैं; कवनो काम-धाम नाही है अभी; धरना करें भी, तो किस मुद्दे पर।
    :)
    रचना त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..हाउसवाइफ मतलब हरफ़नमौला
  4. अशोक पाण्डेय
    भोजपुरी में 'धरना' शब्द का क्रिया के रूप में भी खूब इस्तेमाल होता है, पकड़ने के अर्थ में। अरविन्द केजरीवाल जी जान गईल बाड़े कि धरने से कुर्सी धराई।
    केजरीवाल वोट की राजनीति कर रहे हैं। वे जनता को संदेश दे रहे हैं, ''देखो, मुख्यमंत्री बनकर तो एक सिपाही को भी नहीं हटा सकता। इसलिए अब प्रधानमंत्री बनाओ।''
  5. सलिल वर्मा
    धरना करते हुए इनको कुर्सी धरा गया और अब दुनिया के सामने देखाई देने लगा है इनका ट्रिक… आज दू ठो पुलिस वाला को छुट्टी पर भेजवाए हैं.. आगे जाकर जनता का छुट्टी होगा, चाहे इनका छुट्टी, देखेंगे हम लोग!!
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..हाथों में तेरे मेरा हाथ रहे
  6. प्रवीण पाण्डेय
    वरदान भी पूछ कर माँगे जायेंगे, जनता न हुयी जामवन्त हो गयी। हनुमान को बल याद दिलाने के लिये।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..सड़कों पर लोकतन्त्र
  7. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    धारदार धरना ।
  8. arvind mishra
    निलम्बन , लघु दण्ड, दीर्घ दण्ड ,लाईन हाजिर आदि तो सुना है मगर ये छुट्टी पर भेजना ??
    छुट्टी पर भेजना दंड संहिता के किस नियम /प्रावधान के तहत आता है ?
  9. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    करत करत धरना प्रबल, सीएम भी बन जाय।
    पुनि-पुनि धरना रत हुए जनता गयी अघाय॥
  10. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    धरना-महिमा सुनो सज्जनों रहे अनूप बताय।
    करत करत धरना प्रबल, सीएम भी बन जाय॥
    सीएम भी बन जाय, मगर धरना ना छोड़े।
    गृअह मंत्री निरुपाय, मीडिया पीछे दौड़े॥
    कहते कवि सिद्धार्थ, अनर्गल कुछ भी करना।
    केवल एक उपाय, लगाओ तुम भी धरना॥
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..यूँ छोड़कर मत जाइए (तरही ग़जल-III)
  11. HARSHVARDHAN
    आपकी इस प्रस्तुति को आज की राष्ट्रीय मतदाता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन (मेरी 50वीं बुलेटिन) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।
  12. jitendra bhagat
    लाजवाब!
  13. Anurag Sharma
    भोली जनता ने कहीं प्रधानमंत्री बना दिया तो 'धरना' देंगे कि मुझे यूएन का चीफ बनाओ, दिल्ली को नहीं, न्यूयॉर्क को बिजली-पानी दूंगा …
  14. Mukesh Kumar Tyagi
    hame bhi yahi lagta hai
  15. देवांशु निगम
    ई सब बड़ा लफड़े का काम है जी , हम कुछ नहीं कहते |
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..फितूर !!!

Wednesday, January 15, 2014

हमारा काम रोशनी देना है

कल सूरज भाई कह रहे थे हम कोई तुम्हारे किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री थोड़ी कि दस पैसे का काम करें और हजार का गाना गायें। फ़ोटू खिंचायें। हमारा काम रोशनी देना है, ऊर्जा देना है वो हम करते रहते हैं भले ही दिखें न दिंखें। परेशान न हुआ करो अगर चाय पीने तुम्हारे पास न आ पायें। हमने कहा वो तो ठीक है लेकिन भाई जिस दिन दिखते नहीं तो सूना लगता है। वो मुस्कराने लगे। बोले -बाते बहुत बना लेते हो। फ़ेसबुकिये हो गये हो पक्का।

किरणें बेचारी बोर हो जाती हैं

सूरज भाई अभी आये नहीं। फोन करके पूछा कि आजकल आप सुबह रोज देर से क्यों आते हो तो वे बोले-- यार, तुम्हारे यहां सुबह टीवी पर कल के प्राइम टाइम का रिप्ले आ रहा होगा। सबमें अगला प्रधानमंत्री कौन पर बहस हो रही है। किरणें बेचारी बोर हो जाती हैं । तुमको तो पता है हम अपनी किरणों को कित्ता चाहते हैं। इसलिये जरा आराम से आते हैं आजकल।

Sunday, January 12, 2014

दुनिया कित्ती खूबसूरत है


delhiअभी सुबह उठे। उठने के पहले जगे। जगे फ़िर उठे। देखा बाहर सूरज भाई अभी आये नहीं थे। सोचा आराम से आयेंगे। चाय मंगाई। पीते हुये टीवी देखते रहे। सब खबरें रिपीट हो रहीं थीं। ’रिपीट’ माने दुबारा पीट रहीं थीं। फ़िर बंद कर दिया टीवी। हल्ला कम हुआ कमरे में। ’सुकून’ बढा। ’शांति जी’ भी आ गयीं कमरें में।’सुकून भाई’ और ’शांति जी’ आपस में एक दूसरे को देख मुस्कराने लगे। ’सुकून भाई’ ने ’शांति जी’ को मित्र बनाने के लिये फ़ेसबुक खोला तो देखा वहां ’शांति जी’ की फ़्रेंड रिक्वेस्ट पहले से ही आई हुई है। उन्होंने फ़टाक देना मित्रता अनुरोध स्वीकार किया। ’हल्लो’ ,’हाऊ आर यू’ से शुरु होकर बजरिये ’आई लाइक यू’ होते हुये दोनो एक साथै ’आई लव यू’ तक पहुंच गये और बतियाने लगे। दो मिनट में दो अजनबी ’दो इश्किया’ हो गये। कूल न ! :)
अपन का नारा है- “व्यस्त रहो, मस्त रहो।” अमल अलबत्ता उल्टा करते हैं। मस्त पहले होते हैं फ़िर व्यस्त होने का जुगाड़ देखते हैं। इस उलट-पुलट के चक्कर में न कायदे से व्यस्त रह पाते हैं न मस्त।
तारीख देखी। साल 1/36 से ज्यादा निकल गया। झटका लगा। अरे ब्बाप रे, नये साल के रिजलूशन पर अमल ही नहीं शुरु किया। घबराते हुये, डायरी देखी! क्या लिये थे शपथ नये साल में करने की। देखा- कुच्छ नहीं। कोई कसम नहीं खाये थे। ’नये साल में क्या करना है’ ऐसा कोई वायदा रिकार्ड नहीं किये थे। बड़ा सुकून मिला। अलसा गये होंगे। लेकिन देखिये कित्ता ’सुकून’ महसूस हो रहा है । यह आलस्य का सौन्दर्य है। अब जो भी कर डालेंगे नये साल में वह बोनस होगा।
बालिकासाल बेइंतहा व्यस्तता से शुरु हुआ। दस-दस बजे रात के कई दिन दफ़्तर से कमरे तक आने में। इत्ती देर तक काम करने के बाद भी तमाम काम अधूरे रहे। हर समय डरे-डरे से रहते हैं कि न जाने कौन काम मेज पर चढकर आंखे दिखाने लगे। हड़काने लगे – “हमें अधूरा छोड़कर बाद वाले काम कर दिये। दिल्ली में होते तो शिकायत कर देते केजरी भईया से।” बड़ा डर लगता है। जिसको देखो वही हड़काता रहता है।
अपन का नारा है- “व्यस्त रहो, मस्त रहो।” अमल अलबत्ता उल्टा करते हैं। मस्त पहले होते हैं फ़िर व्यस्त होने का जुगाड़ देखते हैं। इस उलट-पुलट के चक्कर में न कायदे से व्यस्त रह पाते हैं न मस्त। मस्त लोग समझते हैं ये ससुर तो हमेशा व्यस्त रहता है। व्यस्तता समर्थक सोचते हैं-इसे तो मस्ती से ही फ़ुरसत नहीं। ये क्या खाकर मस्त होगा।
गये साल में तमाम काम अधूरे रह गये। साल के आखिरी दिन सब सामने आकर खड़े हो गये। हम सबसे गले मिलकर ’हैप्पी न्यू ईयर’ बोल दिये। गले मिलने में फ़ायदा होता है कि आंख नहीं मिलानी पड़ती। सबको कह दिये- इस साल पक्का निपटायेंगे यार तुमको। सारे काम मुस्कराते हुये बहुत देर तक साथ रहे। उनकी संगत में शर्मिन्दा महसूस करने लगे तो बहाने से फ़ूट आये यह कहते हुये कि आते हैं जरा दोस्तों को नये साल की शुभकामनायें देकर आते हैं। वे मुस्कराने लगे। अभी भी देखा कि वे बारह दिन पीछे खड़े मुस्करा रहे थे। सबको बुला लिया – “अरे यार आ जा आओ। गये साल में क्यों खड़े हो। नये साल में आओ।”
गये साल में तमाम काम अधूरे रह गये। साल के आखिरी दिन सब सामने आकर खड़े हो गये। हम सबसे गले मिलकर ’हैप्पी न्यू ईयर’ बोल दिये। गले मिलने में फ़ायदा होता है कि आंख नहीं मिलानी पड़ती।
वे आ गये मुस्कराते हुये। अब सबको एक साथ निपटायेंगे।
हम देखते हैं कि अपन समय बहुत बरबाद करते हैं। जैसे भरे बटुये वाली तमाम घरैतिनें बाजार जाती हैं और अजर्रा खर्च करती हैं वैसे ही अपन लेफ़्ट-राईट मिडल च समय बरबाद करते रहते हैं। अव्वल तो कोई प्लान बनाते नहीं। अगर कोई बना भी लिया तो फ़ालो करना तो दूर की बात-पलट के उसको देखते तक नहीं। आम तौर पर अपने सब काम तब शुरु होते हैं जब समय खतम होने वाला होता है। कुछ ऐसे जैसे कोई डेली पैंसेजर सामने से गुजरती रेल को निहारते हुये चाय पीते रहता है और जैसे ही गाड़ी प्लेटफ़ार्म पार करने वाली होती है वह कुल्ड़ड़ पटरी फ़ेंककर लपककर रेल के आखिरी डिब्बे का हैंडल पकड़कर पायदान पर लटक जाता है।
इस बरबादी में सबसे ज्यादा समय बातचीत में जाता है। दफ़्तर में, दोस्तों से, फ़ोन पर, नेट पर, यहां, वहां न जाने कहां-कहां। इस चक्कर में अपने से न बात हो पाती है। न चीत। हाल यह है कि दुनिया से बतियाने के सारे चैनल चौबीस घंटे आन रहते हैं। अपने वाले का नेटवर्क नहीं मिलता। मिलता भी है तो रिंग ट्यून बजने लगती है:
मुक्तिबोधओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!
उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,
सबसे ज्यादा समय बातचीत में जाता है। दफ़्तर में, दोस्तों से, फ़ोन पर, नेट पर, यहां, वहां न जाने कहां-कहां। इस चक्कर में अपने से न बात हो पाती है। न चीत। हाल यह है कि दुनिया से बतियाने के सारे चैनल चौबीस घंटे आन रहते हैं। अपने वाले का नेटवर्क नहीं मिलता।
दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
ये रिंग ट्यून सुनते ही अपन फ़ौरन ही फ़ोन काट देते हैं। सामने जो दिखता है उससे -”हल्लो, हाऊ डू यू डू!” करने लगते हैं।” कई बार सामने आईने के सामने ऐसा हुआ। कुछ देर बाद याद आया अरे ये तो खुद हैं। मुस्कराते हुये कहते हैं- ” नालायक बतबने, लफ़्फ़ाज ! चल दफ़ा हो जा सामने से।”
मन तो करता है डायलॉग मार दें – दुनिया भर से मोहब्बत का ठेका लिये घूमते हो। खुद का ख्याल नहीं रख पाते। डेढ़ महीना हो गये खांसते हुये। दवाई न लेने से खांसते हुये क्या कहीं के मुख्यमंत्री बन जाओगे?
इधर आजकल सूरज से रोज बात होती है। लोग हमारी दोस्ती को लेकर तरह-तरह की बातें करते हैं। लेकिन हमें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अपनी दोस्ती दो एकदम धुर विरोधी स्वभाव वाले लोगों की दोस्ती है। भाईसाहब एकदम नियमित, अपन पक्के अनियमित। वे दुनिया भर का भला करते हैं, अपन अपना तक नहीं कर पाते। वे पता नहीं क्या सोचते हैं मेरे बारे में लेकिन दिन में एक बार मुलाकात जरूर करने आते हैं। नहीं आ पाते तो फ़ोन करते हैं। अपनी बच्चियों- रश्मि, किरण को जान से ज्यादा चाहते हैं। कभी कोहरा उनका रास्ता रोकता है, उनको छेड़ता है तो उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। कभी-कभी मिस्ड काल भी मारते हैं। :)
पिछले छह महीने में लिखना मजे का हुआ। जो लिखा वह सब पलपल इंडिया के साथ अपने ब्लॉग में डालते रहे। पचास लेख हो गये! पलपल इंडिया में लिखे मेरे एक लेख को पढकर भोपाल की शर्मिला घोष ने खोजकर मुझे मेल लिखा। उनसे दोस्ती हुई। फ़िर हम उनके ’दादा’ हो गये। कुछ दिन के बाद पलपल इंडिया में लिखना कम हो गया। एक दिन शर्मिला ने मेल लिखा – दादा, क्या आपने पलपल इंडिया में लिखना बन्द कर दिया? आपके लेख वहां अब दिखते नहीं?
अगर शर्मिला न कहती तो शायद मैं नियमित पलपल इंडिया में लेख भेजता नहीं और न इत्ते लेख लिख पाता। इसलिये अपने इन लेखों का श्रेय मैं अपनी बहन जी को ही देता हूं
संयोग से उस दिन उसी समय पलपल इंडिया के राजीव सिंह जी मुझसे मिलने आये थे। मैंने फ़िर से फ़िर से पलपल इंडिया में लिखना शुरु किया। मजाक-मजाक में छह माह में पचास लेख हो गये। इनमें से अधिकतर लेख बाद में अखबारों में भी छपे। अगर शर्मिला न कहती तो शायद मैं नियमित पलपल इंडिया में लेख भेजता नहीं और न इत्ते लेख लिख पाता। इसलिये अपने इन लेखों का श्रेय मैं अपनी बहन जी को ही देता हूं जिसे वे नकारती हैं- दादा, ये तो तुमने लिखे। इसका श्रेय मुझे क्यों देते हो?
पलपल इंडिया के सम्पादक अभिमनोज जी एक दिन कह रहे थे पचास लेख हो जायेंगे तब इनको किताब के रूप में कर देंगे। अगर किताब बनी तो उसका शीर्षक होगा- लोकतंत्र का वीरगाथा काल।
नेट की दुनिया बड़ी रोचक है। तमाम लोगों को इसके झटकेदार अनुभव होते हैं। लेकिन मेरे अनुभव ज्यादातर सुखद ही रहे।
ईस्वामी जिनसे मैं कभी मिला नहीं अपनी तमाम व्यस्यताओं के बीच भी मेरे लिये यह इंतजाम करते हैं कि मेरा लिखना जारी रहे। जब भी कभी साइट में समस्या आई ,अपने सब काम छोड़कर वे उसको संभालते हैं। खुद भले न लिखें लेकिन यह देखते रहते हैं कि मेरा लिखना न रुके। दस साल पूरे होने को आये इस हिन्दिनी साइट को शुरु हुये। स्वामीजी का बिन्दास लेखन मिस करते हैं। शायद दस साल पूरे होने पर वह दुबारा शुरु हो।
नेट की दुनिया बड़ी रोचक है। तमाम लोगों को इसके झटकेदार अनुभव होते हैं। लेकिन मेरे अनुभव ज्यादातर सुखद ही रहे।
ऐसे ही चंड़ीगढ़ वाले संजय झा हैं। एक बार जब मैंने बहुत दिनों तक लिखा नहीं तो न जाने कहां से मेरा फोन नम्बर खोजकर मुझे फ़ोन किया – भाईजी, आपने बहुत दिनों से कोई पोस्ट नहीं लिखी। उसके बाद तो जब भी कुछ दिन अनियमित हुये उनका कमेंट या संदेश आता है- बालक के लिये पोस्ट कब लिखी जायेगी? चिट्ठाचर्चा न करने के लिये तो कई लोग शिकायत करते हैं।
मेरा लेख पढकर शर्मिला की मेल से शुरु हुआ स्नेह संबंध पिछले साल की हमारी उपलब्धि रही।
इनमें से किसी से भी मैं आजतक मिला नहीं। लेकिन सब बेहद अपने लगते हैं। इनके अलावा और भी न जाने कितने लोग हैं जिनसे रूबरू मुलाकात नहीं हुई। बात नहीं हुई। लेकिन जितना भी संपर्क है उतने भर से लगता है कि दुनिया अपनी तमाम खराब चीजों के कितनी खूबसूरत है।
पिछले तमाम दिन जो लेख लिखे गये वे सब ’छपास चाहना’ वाले लेख थे। इस चक्कर में ब्लॉग लिखना कम सा हुआ। कुछ लोग रोना रोते हैं कि ब्लॉगिंग खतम हो गयी। उनको शायद यह नहीं दिखता कि लगभग सारे अखबार आज अपनी सामग्री ब्लॉगों से सीधे उठा रहे हैं। टसुये बहाना छोड़कर अपने ब्लॉग पर जायें।
हम लिखने में मशगूल थे कि देखते हैं सूरज भाई खुले दरवज्जे से कमरे में पसरे मुझे टाइप करते देख रहे हैं। मुस्करा रहे हैं। हम उनसे पूछते हैं- अरे! सूरज भाई, आप कब आये?
चाय के लिये बोलने के बाद देखा सूरज भाई हमारे की बोर्ड पर झुके करेक्शन कर रहे हैं। लेख का टाइटिल लिख रहे हैं- दुनिया कित्ती खूबसूरत है। :)
सूरज भाई बोले उसी समय जब तुम लिख रहे थे -दुनिया कितनी खूबसूरत है। लेकिन तुम तो ’कित्ती’ लिखते हो! आज कितनी क्यों?
हमने सूरज भाई, आप भी खूब मजे लेते हो। बैठिये आपके लिये चाय मंगाते हैं।
चाय के लिये बोलने के बाद देखा सूरज भाई हमारे की बोर्ड पर झुके करेक्शन कर रहे हैं। लेख का टाइटिल लिख रहे हैं- दुनिया कित्ती खूबसूरत है। :)

मेरी पसन्द

राम शंकर त्रिवेदी हम भुलाये तुम्हें भूल पाए नहीं |
चांदनी जब खिली, रात हंसने लगी,
नभ में तारे हँसे प्रीति बसने लगी,
आह नागिन बनी बन के डसने लगी,
याद आई विरह बान कसने लगी,
चाँद देखा तो फूले समाये नहीं |
हम भुलाये तुम्हें भूल पाए नहीं||
दामिनी की दमक देख रोये कभी,
अश्रु मोती समझ हार पोये कभी,
स्वप्न देखे, निशाभर न सोये कभी,
रात दिन याद तेरी संजोये कभी,
सब हुआ नैन भर देख पाए नहीं |
हम भुलाये तुम्हे भूल पाए नहीं ||
आश अब लौ रही, एक दिन ही मिलो,
हाय सूने हृदय में सुमन बन खिलो,
प्रेम परिधान जर्जर, उसे आ सिलो,
आश मेरी अमर, तुम मिलो न मिलो,
नत नयन हो कभी मुस्कराए नहीं |
हम भुलाये तुम्हे भूल पाए नहीं ||
राम शंकर त्रिवेदी ’ कवि जी’ लखीमपुर खीरी

17 responses to “दुनिया कित्ती खूबसूरत है”

  1. Rajeev Singh
    दुनिया वाकई बहुत खूब सूरत है
  2. Reena Mukharji
    Nice writeup
  3. Virendra Bhatnagar
    इत्ती खूबसूरत है यह नहीं पता था :)
  4. अनूप शुक्ल
    Reena Mukharji थैंक्यू !:)
  5. अनूप शुक्ल
    Virendra Bhatnagar हमको पता है कि आपको सब पता है। इसई लिये मुस्करा रहे हैं और दुनिया को और खूबसूरत बना रहे हैं! :)
  6. sharmila ghosh
    अरे दादा… आपने तो यहाँ भी श्रेय दे दिया… इसे कहते हैं “बिल्ली के भागों छींका टूटना” :) और आपका ये कमेंट बक्सा कितना अच्छा है? अपने आप हिंदी लिखती जा रही. दादा, आपके जैसे भले मन के लोग बहुत कम होते हैं. लिखते रहिये खूब. लेख बहुत अच्छा है :)
  7. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    वाह! अच्छा लेख रहा.
    मेरे दिमाग में भी कई बार यह बात आयी कि अगर इंटरनेट न होता तो न जाने कितने अच्छे लोगों से मुलाक़ात नहीं हो पाती. ब्लॉग से जुड़े लोगों में अधिकाँश से एक बार भी मुलाक़ात नहीं हुई पर ऐसा लगता है कि सब पड़ोसी ही हैं. अभी छत पे जाके आवाज दूंगा तो आ जायेंगे. ;)
    सतीश चन्द्र सत्यार्थी की हालिया प्रविष्टी..लैंगुएज स्टडी करने का बेस्ट तरीका
  8. शकुन्तला शर्मा
    राम शान्त स्वभाव के थे पर लक्ष्मण उग्र स्वभाव के थे पर दोनों में अगाध प्रेम था, इसी तरह कर्ण और इन्द्र की मित्रता थी वे दोनों भी विपरीत स्वभाव के थे । वस्तुतः मनुष्य अपना पूरक ढूढता है और वही उसका सच्चा मित्र भी बन जाता है । परिहास-पूर्ण-प्रवाह-पूर्ण – प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
  9. Anamika Kanwar
    ati sunder bhai sab,aaj fir se aaram se padha aapka lekh,har cheez ka khoobsoorti se chitran kiya hai ,aap par sarswati jee ki kripa aise hi bani rahe aur aap hame hasne ke awsar aise hi dete rahe…ameen…aap eswami aur sharmeela bahen ko bhi mera dhanyawad kahiyega,unhone aapko kafi protsahit kiya lekhan ke liye.
  10. sanjay jha
    …………
    …………
    प्रणाम.
  11. अजय कुमार झा
    सच कहा आपने , दुनिया बडी ही खपसूरत है जी । इसका रसास्वादन लेने के लिए इसे डूब के जीना जरूरी है । लिखते रहिए कि हम पढते रहते हैं आपको
    अजय कुमार झा की हालिया प्रविष्टी..पंच लाइन — खबरों की खबर -व्यंग्य बाण >>>>>>
  12. shefali pande
    jee …. लिखते रहिये ….शुभकामनाएं हैं हमारी ……
  13. arvind mishra
    रौ हैं पूरे -दो अजनबी ’दो इश्किया’ हो गये या डेढ़ इश्किया ?
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..एअरगन से मछलियों का शिकार (सेवाकाल संस्मरण – 18 )
  14. प्रवीण पाण्डेय
    अपने अन्दर की कड़वाहट निकाल सकें तो जीवन सौन्दर्यभरा है।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..जय हो, जय हो
  15. Manjit Dihingia
    nice
  16. Abhishek Ojha
    :)
    Abhishek Ojha की हालिया प्रविष्टी..धनुहां बोस ! (पटना १८)
  17. Abhishek Ojha
    गिनती पहाड़ा पूछ रहा है टिपण्णी करने के पहले. अभी जोड़ पुछा था अब गुणा :)
    Abhishek Ojha की हालिया प्रविष्टी..धनुहां बोस ! (पटना १८)