Sunday, November 23, 2014

आपकी आँखो में कुछ महके हुए ख़्वाब हैं

 

"जो वादा किया , वो निभाना पड़ेगा
रोके जमाना चाहे,तुमको आना पड़ेगा।"

यह कह रहे हैं चाय वाले भाई रेडियो के साथ गुनगुनाते हुए।आज तय किया था कि ग्वारीघाट तक साइकिल से जाएंगे लेकिन साथी शेखर पाण्डेय का पहला दिन था साइकिलिंग का सो ग्वारीघाट का प्लान स्थगित कर दिया और खमरिया की तरफ चल दिए।

चलते हुए रेडियो कह रहा था:
"आपकी आँखो में कुछ महके हुए ख़्वाब हैं
आपसे भी खूब सूरत आपके अंदाज हैं"

सूरज भाई धरती पर रौशनी भेजकर उसको खुश करने की कोशिश सा करते हुए दिख रहे थे। जैसे कोई प्रवासी पति घर लौटते हुए अपनी घरैतिन के लिए खूब सारे गहने,कपडे लत्ते के उपहार लाकर उसको खुश करने की कोशिश करता है वैसे ही सूरज भाई रात भर बाहर रहकर सुबह लौटे हैं और पूरी धरती को रौशनी के गहने से सजाते हुए खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। धरती भी हवाओं के माध्यम से इठलाती, लजाती हुई खुश होकर सूरज को निहार रही है।प्रफुल्लित हो रही है।

आगे एक अखबार वाले बच्चे ने साइकिल पर चढ़े-चढ़े ही ऊपर अखबार फेंका।अखबार रेलिंग से टकराकर नीचे गिरा।हमने देखा सूरज भाई मुस्कराते हुए हमारी तरफ देख रहे हैं गोया कह रहे हों -"ऐसा ही हमारे साथ भी होता है।हम सब जगह बराबर रौशनी भेजते हैं।लेकिन कभी-कभी थ्रो गलत हो जाता है।दिल्ली की रौशनी कलकत्ता चली जाती है, लखीमपुर की जबलपुर।"

एक बच्ची एक ब्रश करते हुए पिता के कंधे पर उसकी परियोजना की तरह सवार थी। हमने उसको हाथ हिलाकर बाय किया तो उसने भी हाथ हिलाया हल्के से मुस्कारते हुए। उसके दादी-बाबा हमारा यह हाथ हिलौवा संवाद अपनी नातिन को फुल वात्सल्य के साथ निहारते हुए देखते रहे।बच्ची का पिता इस सबसे बेखबर बच्ची को अपने कंधे पर लादे ब्रश करता रहा।

लौटते में देखा एक जगह कुछ महिलायें लकड़ियाँ बिन रहीं थी। साथ के आदमी उनके सर पर लकड़ी लादने में सहायता कर रहे थे बस। अक्सर मैंने देखा है कि जहां आदमी और औरत दोनों काम करते हैं वहां आदमी अपना रोल अपेक्षाकृत निठल्लेपन का ही चुनता है।

पता चला कि ये लोग पास के मंडला जिले के रहने वाले हैं ।यहां मजूरी करने आये हैं। एक ठेकेदार के यहाँ। आज इतवार है तो हफ्ते भर का ईंधन जुटाने निकल पड़े।सुबह से बिन रहे थे लकड़ी।

लौटते में एक तालाब के पास देखा तो तमाम बगुले तालाब की जलकुंभी पर जगह-जगह अपना कब्जा जमाये हुए दिखे।प्रवचन मुद्रा में। उनको देखकर मुझे शहरों में जगह-जगह अतिक्रमण करके बनाये धर्मस्थल याद आये।बगुले धर्मगुरुओं की तरल 'निर्लिप्त घाघ' लग रहे थे।

मेस में पहुंचकर देखा सूरज भाई धरती के साथ गुफ्तगू करते हुए मुस्करा रहे थे। किरणें उजाले के साथ खिलखिलाते हुए बतिया रहीं थीं। सुबह हो गयी थी।


  • Kiran Dixit हम भी यही कहना चाह रहे हैं -
    आपके लेखन में कुछ महकी हुई सी बात है ।
    आपसे भी खूबसूरत आपके अंदाज़ हैं ।।
  • Priyam Tiwari आप अपरोक्ष रूप से बार बार मुझे भी साइकल खरीदकर वज़न कम करने का निर्देश दे रहे हैं।
  • Amit Kumar Hame bhi hamare vidyarthi dino ki yaad aa gayi aapki cycle ki baat pe jab ham apne shahar (paida to nahi hue the wahan lekin wo apna ho gaya hai) ka chakkar ek purani cycle (kyonki nai wali cycle khareedne ke doosre din hi chori ho gayi thi) pe kat te the.
  • Nirupma Pandey admi apne liye nithallepan ka kaam dhundta h... vakai bara minute observetion h

Saturday, November 22, 2014

यह यथार्थ से भी परिचय कराता है







आज पुलिया पर सत्येंदर और रामसत मिले।सत्येंदर पुलिया पर बैठे थे। रामसत पुलिया की आड़ में नीचे शायद निपट रहे थे।

बीस साल के सत्येन्दर ने बताया कि सुबह पहले वे गेट नंबर 3 पर मॉगने जाते हैं। इसके बाद पास के हनुमान मन्दिर।सुबह से 9 बजे तक 20-25 रुपया पा चुके थे। अब आगे के लिए मंदिर जा रहे थे।आज शनिवार था सो कुछ ज्यादा मिलने की आशा है।

रामसत इस बीच ऊपर आ चुके थे।बोतल के पानी से हाथ धोते हुए बोले-"हम लोग सूरदास हैं। जो थोडा बहुत मिल जाता है उसी में गुजारा कर लेते हैं।

इस बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट वाले तिवारी जी भी पुलिया पर नमूदार हुए।साइकिल अलग दिखी तो हमने पूछा-"आपकी साइकिल बदली-बदली लग रही है।" इस पर उन्होंने बताया उनकी साईकिल चोरी हो गयी।एक पुरानी साईकिल से काम चला रहे हैं।

सत्येंदर और रामसत को काम पर जाना था।हमको भी।इस तरह सुबह की पुलिया सभा विसर्जत हुई।

ओ मेरे हमराही मेरी बांह थामे रहना





 


"ओ मेरे हमराही मेरी बांह थामे रहना
बदले दुनिया सारी तुम न बदलना।"

ये गाना बज रहा है चाय की दूकान पर जहां हम बैठे चाय पी रहे हैं।

सुबह उठे तो सूरज भाई ऐसे गर्म होकर घूर रहे जैसे कोई समय का पाबन्द अफसर अपने उस मातहत को घूरता है जो दफ्तर में लेट आया हो।साइकिल से चले चाय की दूकान की तरफ तो रास्ते पर रौशनी के छींटे मुंह पर मारते रहे गोया हम अभी भी नींद में हैं और रौशनी की बौछार से हमारी नींद उड़ जायेगी।

रास्ते में बस स्टॉप पर एक भाई जी एक बेंच पर निर्मलबाबा की तरह दोनों हाथ दोनों तरफ फैलाये रामपाल पर प्रवचन कर रहे थे।सुनाई पड़ा -"रामपाल की हरकतें सरकार बर्दास्त करती रही। उसकी पहुंच थीं।आम आदमी करे तो पुलिस एक दिन में अंदर कर दे।"

एक जगह कुछ लोग शाखा लगाये हुए थे। आठ दस लोग।एक मध्यम आयु का व्यक्ति लाठी के पैंतरे सीखा रहा था। नमस्ते सदा वत्सले पता नहीं हुआ कि अभी बाद में होगा।

चाय पीते हुए गाना सुन रहे हैं:

"तू इस तरह से मेरी जिन्दगी में शामिल है
जहां भी जाऊँ लगता है तेरी महफ़िल है।"

यह शायद चाय के बारे में मेरा बयान सुना रहा है बाजाबाबू।दूसरी चाय मांगते हुए पहली चाय ठण्डी होने की बात कहते हैं तो चाय बाबू बोले-"आप मोबाइल में खेल रहे थे तो इसमें मेरी क्या गलती?"

आम आदमी मोबाइल में घुसे आदमी के बारे में यही सोचता है कि अगला गेम ही खेल रहा है।कुछ ऐसे जैसे यह धारणा कि आतंकवादी है तो मुस्लिम होगा।

चाय की दूकान के पास और कई दुकाने गुलजार हैं। नास्ते पानी और दीगर चीजें। एक दूकान पर जलेबी छन रही है।पोहा भी साथ में। गर्म पोहा से भाप जैसे ऐसे निकल कर बाहर जा रही है जैसे आप पार्टी से उसके कार्यकर्ता।

सूरज भाई इस बीच बगल में आकर बैठ गए। मुझे पता तब चला जब रेडियो पर गाना बजा:

"बड़ी दूर से आये हैं
प्यार का तोहफा लाये हैं।"

हमने सूरज भाई से रूबरू होते हुए कहा--"वाह भाई आप भी बाजार के चोचले सीख गए! दूर से आये हो यह तो सब जानते हैं लेकिन प्यार का तोहफा लाये हो यह पहली बार पता लगा।"

हमारी यह बात सुनकर सूरज भाई मुस्कराने लगे।उनके साथ कि बच्ची किरणें खिलखिलाने लगीं। सुबह हो गयी है।वंशीधर शुक्ल की कविता याद आ गयी :

"उठ जाग मुसफिर भोर भई
अब रैन कहाँ जो सोवत है।'

सूचना:पहला फोटो मेरे कमरे के बाहर से।दूसरा मेस से तीन किलोमीटर दूर वेहकिल मोड़ पर चाय की दूकान पर जहां हम 14 मिनट में पहुंचे।मतलब स्पीड 12 किमी प्रति घंटा। जाम में फंसी कार के मुकाबले बहुत तेज।
अपडेट:लौटे 11 मिनट में।मतलब स्पीड 15 किमी प्रति घण्टा।