Monday, May 25, 2015

बदहाल शिक्षा व्यवस्था

मजाक-मजाक में मई 25 हो गयी आज। सुबह जगे तो देर तक सोचते रहे किधर निकलें आज। सुबह निकलने के पहले रोज यही होता है।सोचते रहते हैं। सोचें न तो बहुत पहले ही निकल लें। कभी-कभी यह भी मन आता है कि बिना बिचारे निकल लें। लेकिन वो दोहा सामने आकर खड़ा हो जाता है:

"बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछिताय।"

बहरहाल, आज व्हीकल मोड़ की चाय की दूकान पर अड्डा जमा। दो बुजुर्ग आपस में बतिया रहे थे। चाय पीते हुए। अपने नातियों के किस्से सुना रहे थे। नाती उनसे कैसे मासूमियत से पैसे मांगते हैं और मिल जाने पर कैसे खुश हो जाते हैं यह बताते हुए उनके चेहरे पर जो मुस्कान चस्पां हुई उसे देखकर लगा कि अपने नाती की मुस्कान की फोटोकॉपी चिपकाएं हों मुखड़े पर।

नाम बताया नारायण प्रसाद। 2005 में वीएफजे से रिटायर हुए। 35 साल 8 महीने की नौकरी के बाद। बोले- "न हम आईटीआई न डिप्लोमा, लेकिन जो जॉब बाँध दिया मशीन पर वो बना के ही उतारा। कोई सा भी जॉब ऐसा नहीं जिसको हम बना न पाएं। रिटायर पर फ़ोटू हुई तो जीएम बोला-'हम आठ फैक्ट्री घूम आये। आज तक कोई ऐसा न मिला जिसकी 35 साल की सर्विस में न एक्को लेट,न कोई मेमो, न कोई चार्जशीट। हमारे हाथ में होता तो हम पांच साल की सर्विस अभी बढ़ा देते।' हमने कही-'साहब,आपने इत्ता कहा बस वही हमारे लिए बहुत है।'"
चहकते हुए बताते नारायण प्रसाद फोटो खिंचाते हुए गम्भीर हो से हो गए। मुस्कराने को बोला तो और तन गए।फोटो दिखाई तो खुश हो गए।

अपने काम को लेकर जो गर्व का भाव 70 साल के बुजुर्ग के चेहरे पर दिखा।वह आजकल कम होता नजर आता है। कम क्या खत्तम टाइप हो रहा है सब।जाने कैसी पढ़ाई होती है आजकल।


और पढ़ाई तो माशाअल्लाह। इंजीनियरिंग कालेज के बच्चे पहले तो भर्ती के लिए कोचिंग की शरण में जाते थे। अब वे इंजीनियरिंग कालेज में पास होने के लिए भी कोचिंग करते हैं। कल एक बच्चे को फोन किया तो पता लगा कि सर्वेयिंग (सिविल इंजिनियरिंग) के लिये कोचिंग क्लास में था। बताया की कालेज में फैकल्टी नहीं है।
कल के अखबार में खबर छपी थी -'प्रदेश में हर साल बन रहे 33 हजार 847 इंजीनियर, काम के सिर्फ 746' । प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज फायदे का सौदा नजर आया तो कालेज ऐसे खोले भाई लोगों ने जैसे हर गुमटी वाला पान मसाले की पुड़िया लटका लेता है बेचने के लिए। हर अगले फ़ार्म हॉउस पर एक प्रोफेशनल कालेज की होर्डिंग लगी है। फैकल्टी नहीं, लैब नहीं, रोजगार नहीं लेकिन कालेज तो है। जगह-जगह प्रोफेशनल पढ़ाई के नाम पर मध्यमवर्ग के पैसे चूसक ठीहे खुले हैं।

हाल यह है कि इन कॉलेजों से बीटेक/एम टेक किये लड़के स्टोरकीपर, दरबान की नौकरी में (जिनके लिए दसवीं/बाहरवीं पास जरूरत है) आ रहे हैं। यह चलन बढ़ता जा रहा है।

होना तो यह चाहिए कि जिन प्राइवेट कालेज में फैकल्टी नहीं है उनको फौरन बन्द कर देना चाहिए। लेकिन यह निर्णय कैसे होगा। जिनके कालेज हैं वे ही निर्णय लेने वाले हैं। अपने पेट पर क्यों लात मारेगा कोई।

लौटते समय पुलिया पर दो महिलाएं बैठीं मिलीं।फैक्ट्री खुलने के इन्तजार में हैं। 7.30 पर अंदर हो जाएंगी। घर से खाना बनाकर और खुद के लिए भी लेकर निकली हैं।पति फैक्ट्री में थे। नहीं रहे तो उनकी जगह नौकरी पायी हैं। 10 साल कर चुकीं 10 अभी और बाकी है।यह सरकार संस्थान हैं मृतक आश्रित को सहारा देते हैं। निजी संस्थान होता तो बहुत हुआ तो एकमुश्त कुछ पैसा देकर छुट्टी पा लेते।

अभी गाना बज रहा है:

......पूरा लन्दन ठुमकता।

लन्दन तो खैर अभी जगा नहीं होगा। आप जग गए होंगे तो उठिए अब। गुडमॉर्निंग बोलिये खुद को और मुस्कराते हुए दिन शुरू करिये। जो होगा देखा जाएगा।

Sunday, May 24, 2015

एक हमारे सुधरने से,दुनिया तो बदलने से रही

बहुत कोशिश की हमने, कि थोड़ा सा सुधर जाएँ,
लेकिन दिल ने टोंक दिया, काहे को बदलना जी।

एक हमारे सुधरने से,दुनिया तो बदलने से रही,
फिर बेमतलब काहे को, बेफालतू भला बनना जी।

बहुत सताएंगी ये बुरी आदतें, बिछुड़ जाने पर
कौन भैस खोली है,इनसे काहे पल्ला छुडाएं जी।

-कट्टा कानपुरी

*शाइर ने यहां 'फालतू' की जगह 'बेफालतू' लिखा है। ये कुछ ऐसा ही है जैसे महाराजाधिराज के पहले श्री और फिर 1008 भी लगाया जाये। या फिर 'बेस्ट' को 'सबसे बेस्ट' लिखते हैं लोग।

चाँद की सवारी है, चांदनी का काफिला है

आसमां में टँगे चाँद से हम बोले सुनो,
चले आओ गुरु चाय पिलायें तुमको।

वो मुआ बोला अकेला हूँ ड्यूटी पर मैं,
आया तो सीधे सस्पेंड ,माफ करो हमको।

चांदनी से कहा फिर तुम ही चली आओ ,
वो बोली फोन मिलाती हूँ अभी भाभी को।

आसमान था अँधेरे में बस चाँद था रोशन,
मनो केजरी चमका रहे अकेले हों आप को।

चांदनी पसरी थी, धरती पे करप्शन की तरह,
चाँद को कोई कुछ कहे, ये हिम्मत थी किसकी।

चाँद की सवारी है, चांदनी का काफिला है,
तारे बने बाराती हैं, छटा खिली गजब की।

-कट्टा कानपुरी

जलेबी, आधे सर का दर्द और कुत्ता कूरियर कम्पनी

हमारे मित्र डॉ आर के त्रिपाठी आज जबलपुर से त्रिची तबादले पर गए। जबलपुर में पिछले साढ़े पांच साल से थे।त्रिची पदोन्नति पर जा रहे हैं। वहां अस्पताल के इंचार्ज होंगे।

हमारा डॉ त्रिपाठी से परिचय 25 साल पुराना है। 1989 में जब बलांगीर फैक्ट्री में थे तब से। जंगल में बनी इस फैक्ट्री में बहुत बड़ा अस्पताल था। स्पेसिलिटी अस्पताल। लेकिन डॉक्टर केवल तीन थे शुरू में। डॉ त्रिपाठी, डॉ दास और डॉ कानूनगो। जंगल में कहीँ भी बिच्छू,सांप या जंगली जानवर निकल आते। ऐसी जगह सबको स्वास्थ्य सेवाएं मुहैय्या कराई जहां से सबसे पास का ठीक ठाक अस्पताल 200 किमी दूर था।

एयरपोर्ट पर हम अकेले थे डॉ त्रिपाठी के साथ। कवि अजय गुप्त की ये पंक्तियाँ याद करते हुए :

गर चापलूस होते
तो पुरखुलूस होते
चलते न यूं अकेले
पूरे जुलूस होते।


डॉ त्रिपाठी को विदा करने के बाद रांझी में एक दुकान पर जलेबी बन रही थी। ताज़ी जलेबी खाये हुए बहुत दिन हुए। आज मौका मिला तो तौला लिए 100 ग्राम अपने और संगी ड्राइवर के लिए। कटोरी में दही साथ में।

जलेबी बनाने वाले रवि गोस्वामी बड़े मन से जलेबी बना रहे थे। हमने फ़ोटो खींची तो दुकान में एक बच्चा बोला-'आप बाहर के हौ का? विदेश के? जो फोटो खैंचत हौ'। हम बोले -'बहुत दिन बाद दिखी जलेबी सो खैंच रहे।' रवि बोले -'याददाश्त के लिए खिंचवाते हैं फोटो न लोग। उसई तरह है।'

जलेबी बनाते-बनाते रवि ने बताया कि सुबह-सुबह जलेबी दही खाने से आधे सर का दर्द नहीं होता। इसीलिये लोग पोहा-जलेबी खाते हैं। सर झुकाये जलेबी बनाते रवि जलेबी के छल्लों को एक दुसरे से जोड़ते हुये बढ़ाते जा रहे थे। जब पांच-छह गोल जलेबी में लम्बाई पूरी हो जाती तो ऊपर से मैदा की लाईन खींच देते। इससे सब जलेबियाँ आपस में जुडी रहतीं। एक तरह से छत पर बिछी ईंटों के बीच सरिया जैसे ईंटों को साथ रखती है। वैसे ही जलेबी के ऊपर खींची मैदे की लकीर जलेबियों को साथ रखती है। सेंकते समय उलटने-पुलटने में आसानी रहती है।


रवि को जलेबी बनाते देखकर लगा कि सामान्य सी लगनी वाली चीजों की निर्माण प्रक्रिया में कितनी कलाकारियां छिपी होती हैं।

रवि बनारस के सिगरा के रहने वाले हैं। पिताजी वीएफजे से 1998 में रिटायर हुए। यहां केटरिंग का धंधा है। सुबह जलेबी बनाते हैं।

बनारस की बात चली तो बताया कि वहां शहर बन रहा है। फुटपाथ निकल रहीं हैं। ओवरब्रिज बन रहे हैं। घाट साफ़ हो रहे हैं।

दूकान पर पैसे देते हुए ध्यान आया कि आगे ही महेश यादव की दूध की गुमटी है। उनकी बिटिया 14 महीने की है। एक ठो चॉकलेट ले लिए। महेश से मिले। उन्होंने बताया कि डेयरी में दूध के दाम बढ़ गए हैं लेकिन उन्होंने अभी बढ़ाये नहीं हैं दाम। 200 रूपये रोज का नुकसान हो रहा है।


बिटिया के लिए चॉकलेट दिया तो खुश हुए। नाम बताया उसका-आराध्या। हमने खुद को छोटी चॉकलेट लेने के लिए कोसा। परसाई जी का लेख -'सड़ी सुपारी की संस्कॄति 'याद करते हुए। महेश ने घर आने निमंत्रण दिया। यह हमारी उससे दूसरी ही मुलाक़ात है।

चलने से पहले एक आदमी दूध लेने आया। साथ में उसके कुत्ता था। दूध के पैसे उसने दिए। दूध पालीथीन में भरकर कुत्ते के मुंह में पकड़ा दिया। कुत्ता खरामा-खरामा चलता हुआ निकल गया । मालिक पीछे-पीछे आराम से।

कुत्ते को दूध ले जाते देख मुझे याद आया कि कूरियर कम्पनियां सामान डिलिवरी के लिए कूरियर बच्चों को काम पर लगाती हैं। उनको पेट्रॉल और शायद मोबाइल का खर्च के साथ 5/7 हजार रुपया देती हैं। जिस तेजी से पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं और कम्पनियां कम्पटीशन के चक्कर में लागत कीमत कम करने की जद्दोजहद करती रहती हैं उससे बड़ी बात नहीं की कोई कम्पनी आये और कुत्तों को सामान डिलिवरी के लिये इस्तेमाल करे। पते की जगह जिस घर में सामान डिलीवर करना है उस घर का कोई सामान जमा करना होगा कूरियर कम्पनी के पास। 'कुत्ता कूरियर कम्पनी' के कुत्ते सूँघकर सामान पहुंचा दिया करेंगे।


इसके बाद कूरियर सेवा में लगे बच्चों का क्या होगा। क्या पता वे फिर कुत्तों से भी कम पैसे में सामान पहुंचाने के लिए तैयार हो जाए। जिन्दा रहने के लिए सब कुछ करना पड़ता है भाई।

मेस में आये तो मेस के बच्चे चाय थर्मस में भरकर दे गए। लैपटाप पर चाय का कप धरे चाय की चुस्कियां लेते हुए स्टेट्स लिख रहे हैं।  पेश है इतवारी तुकबंदी भी:

सुबह से टहलते रहे,
इधर उधर ही यार ।
बीत गया इस बीच
चवन्नी भर इतवार।

दोस्तों की छुट्टी है
होंगे बांचने को बेकरार।
अब और देर न करो
पोस्ट कर दो यार।


सुबह हो गयी है। आपको छुट्टी का दिन मुबारक को।

Saturday, May 23, 2015

अबे कहां मर गया बे, तू मतले के बच्चे

अबे कहां मर गया बे, तू मतले के बच्चे,
चल सट जा शेरों से, गजल मुकम्मल हो।

घुसा ले चार शेर ,अपने और मक्ते के बीच,
बहर, वहर में चक्कर में मत पड़ बस ठूंस ले।

कोई दाद दे शुक्रिया कहना, सर झुका कर के,
कुछ न बोले तो कहना -गहरी है देर से समझेंगे।

-कट्टा कानपुरी

ये मत समझ कि घटिया शेर अपन कह नहीं सकते

ये मत समझ कि घटिया शेर अपन कह नहीं सकते,
जरा लिहाज करते हैं उस्तादों की चिरकुट गजलों का।

एक शेर कहा था तो नामचीन शायर भड़क गए थे
तुम्हारी ये हिम्मत कि तुम हमारे कलाम से घटिया लिखो।

उस वाकये से हम सच में इतना दहल गए मत पूछो,
उनके हर घटिया शेर पर हमने माइक लगा के दाद दी।

--कट्टा कानपुरी

अजीब हो तुमने मुझे इंकलाबी बना डाला

हमने तो मुट्ठियां भींच लीं थी डर के मारे,
अजीब हो तुमने मुझे इंकलाबी बना डाला।

कैसी दर दर की ठोकरें खिलवा रहे तुम यार,
हम तो समझे थे लाइफ कटेगी झिंगा लाला।

जिस तिजोरी पे भाग के हमने कब्जा किया था,
उसका तल्ला खुला है,सामने जड़ा है हैवी ताला।

-कट्टा कानपुरी

देश की धक्काड़े से उन्नति हो रही है

शहर के छोर का आखिरी किनारा जिसे पार करते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता है। कुछ इसी अंदाज में वीएफजे और जीआईएफ फैक्ट्री की सीमा फलांगते हुए मढ़ई पहुंचे। सामने से मोटर साइकिलों में दूध के कनस्तर लादे लोग आते दिखे। ये लोग महाराजपुर के पास की दूध डेरियों से दूध लाते है।शहर में बेंचते हैं।

मढ़ई में कई घर कुम्हारों के हैं। लोग घरों के बाहर सांचे से ईंट बनाते दिखे। भट्टे भी लगे थे। एक आदमी हाथगाड़ी पर घर के अहाते में बने भट्टे से पकी ईंटें बाहर लाता हुआ दिखा। बच्चियां मुंह में कपड़ा बांधे हुए हथगाड़ी से ईंटे उठाकर चट्टे लगा रहीं थीं। कुछ खुद भी एक-एक करके ईंट लाकर चट्टे पर सजा रहीं थीं। फोटो खींचा तो बच्चियां अपनी दादी को बुला लाईं और बोलीं-'इन्हउन की खींच देव।' खींच दी तो दादी प्रफुल्लित हो गयीं। उस समय सोचा कि इनकी फ़ोटो बनवाकर इनको दे देंगे। देखते हैं कि कितना अमल कर पाते हैं सोच पर।

रेलवे ट्रैक पारकर सड़क के दोनों तरफ खेत दिखे। एक गुलमोहर का पेड़ झुककर हमको ऐसे देख रहा था मानों झुककर फरसी सलाम मार रहा हो। दो महिलाएं सड़क की तरफ पीठ किये पुलिया पर बैठीं थीं। गोया वो शहर का बहिष्कार कर रहीं हों।



व्हीकल मोड़ पर पहुंचकर कटनी राजमार्ग शुरू हो गया। सड़क पर ट्रक,कार,मोटरसाईकल और साइकल आती-
जातीं मिलीं। दोनों तरफ चाय-नास्ते की दुकानें चहकती हुईं गुलजार हो रहीं थीं। लोग वहां चाय-नास्ता कर रहे थे।

करौंदा नाले के पास एक महिला गोबर के कण्डे पाथ रही थी। बगल की पक्की बिल्डिंग में तमाम भैंसे पूँछ फटकारते हुए आपस में एक दुसरे को शुभ प्रभात कर रहीं थीं। कोई कोई तो डकारते हुए गुडमॉर्निंग करती दिखी।

पास ही एक बुजुर्ग दिखे। पास के इमलिया गाँव के रहने वाले हैं। विष्णु नाम है। घर से टहलने निकले थे। बता रहे थे कि इटारसी के रहने वाले थे। 30 साल पहले इमलिया आ गए। यहीं ग्राम समाज की जमीन मिल गयी तो मकान बना लिया बस गए।

डेरी में दूध दूहने का काम करते थे विष्णु जी। 11 से 15 भैंसे रोज दुहते थे। 6000 रूपये मिलते थे। अब उम्र हो गयी । 70 के हैं। काम छोड़ दिया। डेयरी में 50 भैंसे थीं। अब 70 हो गयीं हैं।


अपनी कहानी आगे सुनाई विष्णु ने- 'दो बेटियों की शादी कर दी।लड़के को पढ़ाया लिखाया लेकिन साला हरामी निकला। मन नहीं लगा पढ़ने में। अब वहीं डेरी में कच्ची नौकरी कर रहा है।गए साल बीमार हो गए। मलेरिया पकड़ लिया। कमजोरी है। ईसई लाने टहलने निकलते हैं।'

आगे परियट नदी मिली। सूखकर काँटा हो गयी हो जैसे। अगल-बगल की डेरियों से आती गन्दगी से नदी बीमार होकर आई सी यू में भर्ती हो गयी हो जैसे। किसी तरह काँखती हुई सी बह रही थी बस।


लौटते में एक जगह कण्डे माँ-बेटे कण्डे पाथते मिले। ठेलिया में डेरी से गोबर लाती हैं। 20 रूपये प्रति भैंस प्रति महीना गोबर खरीदती हैं। कण्डे 50 रूपये के 100 के हिसाब से बेंचती हैं। बस मजूरी निकल आती है। बरसात में काम बन्द कर देती हैं। जाड़े में मुश्किल होती है लेकिन करना पड़ता है।

 बच्चा 9 वीं में पढ़ता है। स्कूल बन्द हो गए हैं तो माँ का सहयोग कर रहा है। मोबाईल में गाना सुनते हुए बच्चा कण्डे पाथ रहा है। माँ जमीन से ही धूल उठाकर कण्डे पाथने के पहले फैलाती जा रही है। जैसे रोटी बेलते समय चोकर वाले आटे का परथन लगाने से रोटी चिपकती नहीं कुछ उसी तरह कण्डे के लिए धूल का परथन लगाती जा रही है जमीन पर।

'मोबाइल पर गाना सुनते हुए मन लगता है बच्चे का पाथने में' -माँ मुस्कराते हुए बतातीं हैं।


जमीन का कोई किराया नहीं पड़ता। सरकार की है जमीन। बड़ी बात नहीं कल को सरकार अपनी जमीन के अस्थायी उपयोग के लिए भी कोई कर लगा दे। रोज कोई दरोगा परची काटने आ जाये। बिना पर्ची कण्डे पाथने पर जुर्माना ठोंक दे या फिर दया करके छोड़ दे-100/200 कण्डे का नजराना लेकर।

जवाहर लाल कृषि विश्वविद्यालय के पास की पुलिया पर लोग बैठे हुए थे। महिलाएं मड़ई से घड़े लेकर महाराजपुर बेंचने जा रहीं थीं। एक जनी शादी के बरतन ले जा रहीं थीं। एक बच्ची भी थी साथ में। वह दो छोटे-छोटे घड़े एक दूसरे से बांधकर ले जा रही थी। सुस्ताने के लिए रुकी थीं सब वहां। अंदर विश्वविद्यालय के लड़के इधर-उधर टहलते दिखे।

एक पेड़ के नीचे एक भाईजी अखबार पढ़ते दिखे। पेड़ के तने का तकिया बनाये हुए। गाय चराने निकले थे। यह सीन देख सवा सदी पहले (1884 में) बलिया जिले के ददरी मेले में भारतेंदु हरिश्चंद्र का दिया व्याख्यान याद आ गया जिसे हमने इंटरमीडियट में 'भारतवर्षोंन्ति कैसे हो सकती है' निबन्ध के बहाने पढ़ा था। उसमें भारतेंदु जी लिखते हैं-' विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहां गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला। यहां उतनी देर में कोचवान हुक्का पियेगा व गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी "वहां के लोग गप्प ही में देश का प्रबन्ध छांटते हैं" सिद्दांत यह कि वहां के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक भी छिन व्यर्थ न जाये।" (पूरा भाषण यहां देखिये- http://www.debateonline.in/090912/)

इस लिहाज से देखा जाए तो एक सदी में भारत में बहुत उन्नति हो गयी। कोचवान तो छोड़िये अब चरवाहे तक अखबार बांचने लगे हैं। अब यह अलग बात है कि वहां कोचवान अब टैक्सी ड्राइवर में बदल गए हैं और वे अखबार अब गद्दी के नीचे से निकालकर नहीं बल्कि मोबाइल टेबलेट जेब से निकाल कर उस पर खबरें बांचते हैं।
लेकिन यह बात बताने के लिए अब भारतेंदु जैसे लोग भी नहीं रहे।

 रहे तो खैर ददरी के मेले भी नहीं। बस मॉल बचे हैं। वैसे मेले की जरूरत भी कहां रही अब। पूरा देश एक बाजार में बदल गया है। मेलों में आसपास के लोग ही आते थे। यहां तो पूरी दुनिया से लोग बेचने खरीदने के लिए आते रहते हैं। अपना माल बेंचते हैं बदले में थोडा सा हमारा देश खरीदकर वापस चले जाते हैं। इसी तरह भारतवर्ष की धक्काड़े से उन्नति हो रही। धकापेल विकास हो रहा है।

मुस्कराइए कि आप भारत देश के नागरिक हैं।

'यंगता' खानपान पर निर्भर करती है

"शरीर की 'यंगता' खानपान पर निर्भर करती है। अगर कोई शराब पियेगा, गांजा फूंकेगा तो शरीर कैसे बनेगा। नशा शरीर के लिए घुन की तरह है। एक बार लग गया तो शरीर खोखला हो जाता है।" यह बातें एक बन्द दूकान के चबूतरे पर बैठे बुजुर्ग ने कही। पोस्ट ऑफ़िस से 2000 में रिटायर हुये। 75 साला बुजुर्गवार से जब हमने कहा उम्र के हिसाब से तो आपका स्वास्थ्य बहुत अच्छा है तो उन्होंने यह बातें बताईं।

कोई नशा नहीं, कोई ऐब नहीं। इसीलिये सेहत ठीक है। हमने उनको 100 तक जीने की दुआ दी। वे खुश हो गए। उनके बगल में ही एक और आदमी बैठा था। वह आधारताल की किसी प्राइवेट कम्पनी में काम करता है। तबियत खराब होने के चलते काफी दिन से काम पर नहीं जा रहा। दोनों की सेहत देखकर आसानी से अंदाज लगाया जा सकता है कि प्राइवेट कम्पनियां अपने आम कामगारों की देखभाल के प्रति कितनी उदासीन हैं।

जीसीएफ के पास घनश्याम दास मिले। 30 मई को रिटायरमेंट है। घड़ों में पानी भरकर मजे से बैठे हुए घर के बाहर। बोले आइये चाय पिलायें। रैले साईकिल की तारीफ की। पुराने जीएम यादव साहब की भी। बताया-' यादव साहब ने फैक्ट्री एवन चलाई। नेतागीरी के नाम पर होने वाली गुंडागिरी बन्द कर दी। आम वर्कर का ख्याल रखा।5 लोगों से रोज मिलते थे। उनकी समस्या सुनते थे। जितना बन सकता था,हल करते थे। वो भी आएंगे रिटायरमेंट में मेरे।'

जबलपुर इंजीनियरिंग कालेज के एक अध्यापक से मिलना हुआ। मध्यप्रदेश की तकनीकी संस्थानों की व्यवस्था की दुर्दशा के किस्से सुने।स्कूलों में अध्यापक नहीं हैं। नई भर्ती बन्द है। इंजीनियरिंग कॉलेजों के लड़के कोचिंग पढ़ते हैं। किताबों की जगह कुंजियों से पढ़कर इम्तहान देते हैं। साल साल भर क्लास नहीं होते। सेशन ख़त्म होने क्लास में एडमिशन होते रहते हैं। किताबों के नाम पर कोई शिवानी सीरीज के नोट्स मिलते हैं उनको पढ़कर इम्तहान देते हैं।जो मित्र यह सब बता रहे थे वे खुद प्रदेश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेजों में से एक जबलपुर इंजीनियरिंग कालेज में अध्यापक हैं। आजदी के तुरन्त बाद 1947 में खुले इंजीनियरिंग कालेज के हाल रागदरबारी के छंगामल इंटर कालेज की तरह हो गए हैं।

हमसे इंजीनिरिंग कालेजों की और दुर्दशा सुनी न गई। हम चले आये। हमें लगा कि जब देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों के ये हाल हैं तो देश विकासशील से विकसित कैसे बनेगा? क्या सबके लिए ठेका होगा? जिसको ठेका मिलेगा हमको विकसित बनाने का वह आएगा और हमको विकसित बनाकर चला जाएगा। हम बस घुग्घु जैसे एक ही जगह बैठे अपने देश को विकासशील के डिब्बे से विकसित के डिब्बे में जाते देखते रहेंगे जिनमें सिर्फ नाम की पट्टी का फर्क है।

चलिए बहुत हुआ। चला जाये दफ्तर। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

फ़ेसबुक पर टिप्पणियां:

Amit Kumar Srivastava हम तो यंग इंडिया बनियान पहन कर यंगता कायम रखते है और कभी कभी अपना लक भी पहन लेते हैं । smile इमोटिकॉन

  • अनूप शुक्ल पटरे वाले जांघिये से 'यंग इण्डिया' और 'लक पहनकर चलने' तक का सफ़र सुखद है। smile इमोटिकॉन



  • Amit Kumar Srivastava हम तो उस ब्रीड के हैं जिसने इंजीनियरिंग कालेज के पहले तक पैन्ट के नीचे कुछ पहना ही नहीं । सीधे फिर लक्स कोजी पटरा जांघिया बाईपास हो गई । जैसे मैंने कभी स्कूटर नहीं चलाया था सीधे साईकिल से कार ।





  • Anamika Vajpai "यंगता" से हमें "तन्यता" का बोध हुआ, बहुत अच्छा लगा देखकर कि "हास्य (जो कहीं खो गया था)" वापस आ गया, आपकी "यंगता" हमेशा बनी रहे।....grin इमोटिकॉन



  • Baabusha Kohli आप ख़ूब GCF के चक्कर लगाइये मेरी छुट्टी के टाइम. unsure इमोटिकॉन


    • अनूप शुक्ल जब भी निकलते हैं जीसीएफ केवी स्कूल के सामने से मोगैंबो को याद करते हैं। हिचकी आती होगी। smile इमोटिकॉन


  • राजेश सेन · Om Varma और 4 others के मित्र
    ये 'यंगता' शब्द को अंग्रेजी दुल्हन का Indian दुल्हा कह सकते हैं ?



  • Mangat Ram Athwal अनूप सर आज आपने नशे के खिलाफ आवाज उठाई साधुवाद !



  • Anamika Vajpai "अध्यापक" जी से आपका मिलना ठीक नहीं हुआ, उन्होंने आपका हास्य लेकर अपनी चिंता आपको थमा दी। जिनके ऊपर चिंताओं का हरण करने का दायित्व है, यानी कि, अध्यापक, वही साँझ-सवेरे अपनी चिंताओं को पैम्फलेट की तरह बाँटता फिरे, ये तो अनुचित बात है। बजाए स्वयं बैठकर स...और देखें


    • अनूप शुक्ल सच से कब तक मुंह चुराया जाएगा? बड़ी दुर्दशा है कॉलेजों की। वैसे उनसे मिलना अच्छा ही हुआ। वे भी साइकिल चलाते हैं। अपन भी। चलाएंगे दोनों मिलकर साथ में। smile इमोटिकॉन


  • Mukesh Sharma विश्वस्त सूत्रो से मालूम पड़ा है क़ि रैले सायकल कंपनी आपको अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाने पर गभीरता से विचार कर रही है ।सच्ची मुच्ची में ।



  • Vivek Srivastava इंजीनियरिंग कॉलेज की हालात हर जगह खराब है चाहे प्राइवेट हो या सरकारी बस लाला की परचून की दूकान और सरकारी सस्ते गल्ले की दूकान सा ही समझ ले


    • अनूप शुक्ल सहमत। वैसे भी ताजे-ताजे हुए पीएचडी के बयान से कैसे असहमत हुआ जा सकता है? smile इमोटिकॉन


  • Chandra Prakash Pandey सुन्दर विवेचना



  • महेन्द्र मिश्रा जबलपुर इंजीनियरिंग कालेज कभी देश का महत्त्वपूर्ण शिक्षा का केंद्र रहा है और इस कालेज ने देश को कई प्रख्यात इंजीनियर्स दिये हैं समय के बदलाव के साथ साथ अब बात नहीं रह गई है ... एक बात और आज के प्राध्यापक छात्रों को कोचिंग ज्वाईन करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और खुद पढाना नहीं चाहते ..


    • अनूप शुक्ल हां, जबलपुर इंजीनियरिंग कालेज की हमने भी तारीफ़ सुनी है। कोचिंग के भी किस्से सुने हैं। smile इमोटिकॉन


  • Krishna Bihari kya pyaara shabd hai - यंगता ...





  • Rekha Srivastava कभी हमसे भी मिलिए बहुत साडी पोल पट्टी बताएँगे संस्थाओं और उनके शिक्षकों की।


    • अनूप शुक्ल काफी कुछ तो हमको पता हैं। बाकी आपसे मिलेंगे तब और पता करेंगे। smile इमोटिकॉन


  • Jagdish Warkade Isse kisi Government ko atyadhik Fayda bhi mila ..



  • Navnit Chaurasia · Friends with अमित कुमार
    Ha ha pension ka kamal dekho...75 ki umar me tamanna e 100 sal deho. Mera kya hoga sir sarkari pension bhi nahi milne wali.



  • Nirmla Kapila आपकी पोस्ट अब विकास की श्रेणी में जा चुकी है। बधाई।



  • Ram Kumar Chaturvedi झुमते हूये शरावी से जब पूछा गया कि क्या शराव के नशे में झूम रहे हो।तो जबाव आया कि शराव में तो नशा होता ही नहीं है वरना नशा शराव में होता तो नाचती बोतल।



  • RB Prasad · Satish Pancham और 3 others के मित्र
    संयमी जीवन खुद को दिया गया अनमोल उपहार है.



  • Masijeevi Hindi विकासशील से विकसित होना आसान है- सरकार विकास नोटिफाई कर देगी..काम खत्‍म।


    • अनूप शुक्ल विकासशील की तख्ती की जगह विकसित की तख्ती तो सस्ती भी पड़ेगी। smile इमोटिकॉन




  • Shiv Bali Rai young 's modulus की नई परिभाषा