Sunday, September 13, 2015

जो फरा सो झरा

रेल जबलपुर से चलकर हाऊबाग रेलवे स्टेशन पहुंची।लोग कूदकर उतरे। फिर दूसरी ट्रेन में बैठने के लिए। यह ट्रेन फिर जायेगी जबलपुर। वहां से लौटकर फिर हाऊबाग़ होते हुए आगे जायेगी। मतलब एक टिकट में एक स्टेशन 2 बार देख लिया।

प्लेटफार्म पर एक महिला कंघी कर रही है। साथ का लड़का सा आदमी बीच से मांग निकाल रहा है। प्लेटफार्म पर एक आदमी सोया है। करवट लेता है तो कम्बल हिलता है। लगता है कोई क्रांति होगी। पर आदमी दूसरी करवट लेकर सो जाता है। क्रान्ति छलावा साबित होती है।

डब्बा भर गया है। लोग आपस की सवारियां सहेज रहे हैं। एक आदमी एक महिला से पूछता है- डुकरिया कितै गयी। एक बुजुर्ग महिला इधर-उधर ताक रही है। उसके बगल की बच्ची मोबाइल पर कुछ कर रही है। क्या पता वह भी मेरी तरह स्टेट्स लिख रही हो।


एक बच्चा खिड़की पर बैठा था। हाथ खिड़की पर रखे हुए। अचानक खिड़की उसकी हथेली पर गिरी। कोई लॉक या सिटकनी नहीं लगी थी। बस ऐसे ही फंसी थी खिड़की। गाडी हिली तो नीचे आ गयी। कौन ठीक करवाये। रेल लाइन बन्द ही होने वाली है।

खिड़की हथेली पर गिरते ही बच्चा बहुत तेज चिल्लाया। खिड़की फौरन ऊपर की गयी। बिलखते हुये रोता रहा बच्चा कुछ देर। दूध की बोतल दे दी गयी उसके मुंह में। बिलखता हुआ बच्चा सुबकते चुप हो गया। फिर मुस्कराने लगा। हथेली थोडा सूझ गयी है। पर दर्द कम हो गया है। अच्छा हुआ कि ऊँगली पर नहीं गिरी खिड़की।

ट्रेन मोड़ पर धीमी हुई है। कई जंगली रंगबिरंगे फूल बाहर खिले हुए हैं। गुडमार्निंग जैसा करते हुए। एक पेड़ के नीचे कुछ बच्चियां खेल रही हैं। एक टूटी दीवार को देहरी सरीखा बनाये दो लड़कियां बैठी ट्रेन को देख रही हैं। एक मंजन करते आदमी ने ट्रेन को देखते हुए जमीन पर कुल्ल्ला कर दिया।


पटरी के किनारे-किनारे दीवार पर डॉ करवाल की विज्ञापन मोहरें पुती हुई हैं-खोयी हुई ताकत फिर से प्राप्त करें। एक दुकान पर लिखा हुआ है-अर्जी वाले हनुमान जी। हर तरफ प्रचार की धूम है। बिना विज्ञापन के कोई पूछता नहीं आजकल किसी को।

अगला स्टेशन ग्वारीघाट है। कई सवारियां उतर गयीं। समोसे वाला आवाज लगा रहा है-समोसे दस के दो।
हम बाहर की सीनरी देखते हुए पोस्ट टाइप करते जा रहे हैं। फिराक साहब का शेर याद आ रहा है:
वो पास भी हैं करीब भी
मैं देखूं की उनको याद करूँ।
एक घर के बाहर बनी पगडण्डी पर भागती हुई बच्ची ट्रेन को देखने के लिये पटरी के पास आती है। खेतों में कांस के पौधे भाले की तरह खड़े हैं। भक्क सफेद। लगता हैं इन सफेद भालों से ही अँधेरे का संहार किया गया होगा।


जमतरा घाट पर सौंदर्य की नदी नर्मदा के दर्शन होते हैं। यात्री सीट से उठकर नर्मदे हर बोलते हुए नमन करते हैं। कुछ लोग सिक्के फेंकते हैं। दूसरी तरफ सूरज भाई नर्मदा में नहाते हुए मिलते हैं। जिस जगह वह अपनी किरणों के साथ नर्मदा स्नान कर रहे हैं वहां पानी चमक रहा है। नर्मदा प्रफुल्लित हैं। सूरज की किरणें खिलखिला रही हैं जलक्रीड़ा करते हुए। सूरज भाई जल डुबकी लगाकर आसमान में अपनी ड्यूटी बजाने लगे। पर किरणें वहीं नर्मदा की गोद में इठलाते हुए खेल रहीं हैं। नर्मदा भी उनको दुलराते हुए आगे बढ़ती जा रही हैं।


बाहर जंगल पसरा हुआ है। साथ का यात्री बताता है ये पेंड़ो पर जो बौर से दिख रहा है वे सागौन के पेड़ हैं। कुछ दिन में फल निकलेंगे इनमें। फिर झर जायेंगे। जो फरा सो झरा।

ट्रेन बरगी स्टेशन पर पहुंच गयी है। बाहर पटरियों के दोनों तरफ बैठे यात्री बीड़ी फूंकते हुए बतिया रहे हैं। एक यात्री पूछ रहा है-अबे चलती क्यों नहीं गाड़ी आगे। पंक्चर हो गयी क्या।

एक बच्ची अपना पाठ याद कर रही है। किताब से पढ़ रही है-ईश्वर ने हमें बचाया। उसकी मम्मी अनुवाद बताती हैं-गॉड सेव्ड अस।

ट्रेन भी यह सब देखते/सुनते हुए आगे चली जा रही है। खटर-खट,खटर-खट, खटर-खट करती हुई।

पैसेंजर के साथ सेल्फी

आज की प्रभात यात्रा ट्रेन से। जबलपुर-बालाघाट नैरोगेज सुना है बन्द होने वाली है। बन्द होने के पहले मन किया इससे जर्नियाया जाये। भोरे उठ गए। मुंह हाथ धोने से पहिले ही नहा-धो लिए आज।चाय के साथ दू ठो ब्रेड चैंप के निकल लिए।

15 रूपये का टिकट कटाय के बैठ गए ट्रेन में। पैसेंजर है। जनता गाड़ी। खटर-खटर-ख़ट, खटर-खटर-खटर-खट करती हुई चल रही है ट्रेन।

ई देखिये पैसेंजर के साथ सेल्फी। ठीक आया है?

चलिये साथ में आप भी। इतवार का आनन्द लिया जाए।

Saturday, September 12, 2015

कभी जो मिलोगे तो पूछेंगे हाल

अभी दोपहर को दफ्तर से लौटते हुए पुलिया पर ये फेरी वाले आराम करते हुए दिखे। मोबाइल पर गाना सुन रहे थे -कभी जो मिलोगे तो पूछेंगे हाल।

बात शुरू की तो पता चला कि सीतापुर जिले के लहरपुर और बिसवाँ के हैं। तौकीर (बाएं) और फुरकान (दायें)। फुरकान के पिता जी आये थे 15 साल पहले फेरी लगाने। फुरकान 5 साल पहले पहली बार आये थे। आते-जाते रहते हैं। कुछ दिन जबलपुर में फेरी लगाते हैं। कभी लखनऊ चले जाते हैं।

चादर, दरी, तकिया के गिलाफ आदि की फेरी लगाते है। सामान कभी जबलपुर से लेते हैं। कभी लखनऊ से ले आते हैं। कमाई खाने भर को हो जाती है। आज अभी तक कुछ बिक्री हुई नहीँ। पर अभी दिन खत्म नहीं हुआ है। शाम तक कुछ न कुछ बिक्री होगी। ऊपर वाला सबका इंतजाम रखता है। 

2002 में शादी हुई फुरकान की। 3 बेटियां हैं। सब परिवार सीतापुर में है। यहां अकेले किराये पर कमरा लेकर रहते हैं।


तौकीर अभी कुछ दिन हुए ही आये जबलपुर। अभी कुंवारे हैं। 28 साल उम्र है। जबलपुर अच्छा शहर लगा उनको।

दोनों को अपने नाम का मतलब नहीँ पता।

और बात करते लेकिन दोनों 'अच्छा चचा, अब चलें शायद कुछ बिक जाये'- कहते हुए साइकिल स्टैंड से उतार कर चलते बने।

लौटते हुए देखा एक बच्ची तेजी से चलती हुई जा रही थी।ध्यान से देखा तो याद आया कि वही बच्ची थी जिसका पैर जला था और जिसको साईकिल पर लेकर हम अस्पताल गए थे मरहम पट्टी कराने। देखा तो घाव भर गया था। पर जले के निशान बकाया थे। पूछा तो इशारे से बताया उसने कि दवा लगाती रही। ठीक हो गया घाव।

मन्दिर की तरफ से आ रही थी वह। हाथ में कुछ पैसे भी थे।शायद शनिवार के दिन हनुमान मन्दिर में मांगने आई हो। इसका मतलब मंगलवार/शनिवार को शायद फिर दिखे। देखेंगे। हो सका तो उसके घर जाकर उसकी बीमारी के बारे में पता करेंगे। वह बोल क्यों नहीं पाती।

बच्ची जल्दी में थी। चली गयी। हम भी वापस आ गए। लंच के इंतजार लेटे हुए पोस्ट लिख रहे हैं। खिचड़ी बन रही है। खाना हो तो आ जाइए। दही,पापड़ और आचार भी होगा। घी नहीँ मिलता मेस में।

अपने को खुश रखिये, मुस्कराइए

आज भोर में जन नयन-पट खुले मल्लब आँख का पलक-शटर खुला तो याद आया कि साइकिल में हवा कम है। सो आज पइयां -पइयां टहलने निकल लिए। घुटन्नाधारी पच्चल सवारी।

सूरज भाई फूल वाल्यूम में विराजमान थे आसमान पर। पूर्ण बहुमत के साथ उनकी सरकर चल रही थी। आते ही अन्धकार तत्वों का संहार कर देने का तेज और सन्तोष उनके चेहरे पर पसरा हुआ था। हमने उनको गुडमार्निंग कहा तो उन्होंने भी चमकते हुए शुभप्रभात बोला।

फैक्ट्री के गेट के आगे एक बच्चा एक ट्रेलर से सामान की रस्सी खोल रहा था। नाम सिंटू। उम्र 17 साल। कक्षा 5 पास। रहवैया जिला गया। बिहार। पिता मजूरी करते हैं। कभी मिलती है। कभी नहीं। कुल चार भाई दू बहन में सिंटू भाइयों में सबसे छोटे हैं। बहन एक बड़ है एक छोट।

पहली बार घर से निकले हैं सिंटू। 5 दिन लगे जमशेदपुर से जबलपुर आने में। पता नहीं है बच्चे को कि कौन शहर आये हैं। घर की याद आती है? पूछने पर बोले-हां आती है न। माँ ,बाबू, भाई, बहन सबकी याद आती है।
आगे चलकर क्या तुम भी ड्राइवर बनोगे? पूछने पर बोले-सिखाएगा तब न बनेगे। महीने के 4000 रुपया देगा अभी ड्राइवर। खाना अलग से।

साथ में बुलाकर चाय पीते हुए बात करते रहे हम। जल्दी-जल्दी चाय सुड़ककर वह अपने डाले पर चला गया। चाय की दुकान वाले पटेल जी ने बताया -इससे छोटे-छोटे बच्चे भी आते हेल्पर के रूप में।

चाय की दुकान के पास टूटे बेंचासन पर और ड्राइवर बैठे थे। बता रहे थे जमशेदपुर से जबलपुर रोड ठीक है। कहीं-कहीँ कुछ गड़बड़ है।

बिहार में किसकी सरकार बनेगी पूछने पर बोले-उ त आखिरी दिन पता चलेगा। अभी तो भाषणबाजी चल रहा है। सुनतेही होंगे टीवी पर।

नितीश कुमार के बारे में बोले- काम बहुत किया नितीश कुमार। पहले तो सब घपला-घोटाला ही होता रहा। बकिया एक अकेला आदमी कित्ता कर लेगा। सब व्यवस्था दुरुस्त किया। स्कूल में कॉपी-किताब, स्याही,खाना सब मिलने लगा। हमारे समय कहां मिलता था सब।

ड्राइवरी की बात चली तो बोले-अब ड्राइवर के लिए मैट्रिक पास होना जरूरी हो गया है। पहले तो ठेंपा लगाने वाला भी स्टियरिंग घुमाने लगता था। पढ़ा-लिखा होगा ड्राइवर तो रोड पर जो लिखा होगा पढ़ लेगा। दायें मुड़ना है कि बाएं -देख लेगा।

बात करते हुए गाने सुन रहे थे मोबाईल पर ड्राइवर लोग।भरत शर्मा की आवाज सुनाई दी--
'राजा गांजा न पियब खराब हुई जाइबा'
फिर वहीं खड़े-खड़े शराब और गांजे का तुलनात्मक अध्ययन हुआ। शराब खून का बहाव तेज करती है। आदमी प्रधानमन्त्री तक को गरिया देगा। डरेगा नहीं शराब के नशे में। गांजे में ब्लड प्रेसर धीमा होता है। आदमी शांत रहता है। इसका मतलब गांजा शराब के मुकाबले बेहतर नशा होता है-यह बातचीत शुरू तो हुई लेकिन अंतिम निष्कर्ष नहीं निकल सका।

ड्राइवरों में ही बुजुर्ग सान्याल सिंह भी थे। जमीन पर बैठे थे। ड्राइवर के साथ सहायक के रूप में आये हैं। पता चला कि 4 जनवरी, 2000 को टाटा से रिटायर्ड हैं। मतलब अब उम्र 75 साल। टाटा में असेम्बली लाइन में थे। काम इसलिए करते हैं ताकि शरीर फिट रहे। सब लोग उनको बाबा कह रहे थे।

स्वास्थ्य की बात चली तो बाबा ने बताया कि स्वास्थ्य का सबसे ज्यादा नुकसान तनाव के चलते होता है। शरीर भी मशीन है। मशीन में कोई वाइब्रेशन होता है तो मशीन आगे चलकर गड़बड़ होती है। तनाव भी शरीर की मशीन को डिस्टर्ब करता है। लोग कह देते हैं- यह कर लाओ। डू इट। तुरन्त चाहिए। अब अगर करने की क्षमता या जानकारी नहीं है किसी में तो उसमें डिस्टर्बेंस होगा। लगातार ऐसा होगा तो तबियत गड़बड़ायेगी। स्वास्थ्य ठीक रहने के लिए सबसे जरूरी है तनाव से बचना। तन और मन की क्षमता के अनुसार ही जिंदगी जीना चाहिए।

सान्याल सिंह उर्फ़ बाबा जी ने और भी बहुत बातें बताईं।जिनको हम जानते हैं लेकिन अमल में नहीं लाते इसलिए टेंशनियाते हैं।

चाय की दूकान से चलते हुए पैसा देना भूल गए। पर थोड़ी ही देर में याद आया तो लौटकर दिए। दोनों लोग मुस्कराए भी। लौटते हुए देखा कि सिंटू ट्रेलर के नीचे घुसा जंजीर खोल रहा था सामान का। केवल पैर दिख रहे थे उसके। सर नहीं दिख रहा था-उसके भविष्य की तरह।

पुलिया पर पहुंचे तो वहां मड़ई से चलकर कन्चनपुर के लिए मिटटी के बर्तन बेचने निकली छोटीबाई मिली। 30 रुपए के बर्तन कुम्हार से लेती हैं। 40 तक बेंचती हैं कन्चनपुर में। बीच में एक जगह और रुकी थीं। अब यहां से चलेंगी तो सीधे कन्चनपुर रुकेंगी।

परिवार में 4 बेटियां हैं। पति 20 साल पहले नहीं रहा। टीबी थी। सरकारी इलाज कराया। बचा नहीं। तब सब बेटियां छोटी थीं। अब सबकी शादी हो गयी। एक नाती साथ रहता है। पति के न रहने पर कुछ न कुछ काम करती रहती हैं। जीविका के लिए।

रोज के 40-50 रूपये कमाई है। गरीबी वाला कार्ड बना नहीं। पता नही कब आर्डर होगा।

कभी-कभी भूखे भी रहना होता होगा जब पैसे नहीं होते होंगे। यह पूछने पर हंसते हुए बोली छोटीबाई--भूखे काहे रहेंगे? भगवान सब देता है। भूखा कभी नही रहता।

50 रूपये दिहाड़ी वाली छोटीबाई की हंसी में जीवन के प्रति जो आस्था है उसको नमन करते हुए मैं वापस लौट आया।

सुबह हो गयी। जिनका सप्ताहांत हैं वो मजे करें। जिनको काम पर निकलना है वो मन लगाकर ख़ुशी-ख़ुशी काम पर निकलें। घर में रहने वाले लोग भी अपना ख्याल रखें। शरीर एक मशीन है इसका ख्याल रखें। अनावश्यक तनाव न लें।

लिएंडर पेस अभी टीवी पर कह रहे हैं कि मुझे पता है कि अगर मैं हिंगिस को खुश रख सकूंगा तो हम जीतेंगे ही।
आप भी अपने को खुश रखिये।मुस्कराइए। देखिये कितने खूब लग रहे/रहीं हैं आप। देखिये तो सही। फिर से मुस्कराने का मन होगा।

आपका दिन शुभ हो।

Friday, September 11, 2015

बच्चा भोपाल मत जाईयो, बहुत होयगा तंग

सतगुरु हमस्यूं रीझि कर, एक कह्या प्रसंग,
बच्चा भोपाल मत जाईयो, बहुत होयगा तंग।

बहुत होयगा तंग, इधर-उधर तू भटकेगा,
डाल गले में हाथ किसी के, फ़ोटू खिंचवाएगा।

5 हजार जाएंगे टेंट से, औ सुनना पड़ेगा भाषन,
इतने में आ जाएगा, तेरा महीने भर का राशन।

बीबी बच्चों से और पड़ोसी से बतियाओ हिंदी में,
मजे करो बस यूं ही, नहीं धरा कुछ और जिंदगी में।

-कट्टा कानपुरी

भाषा ऐसी चाहिए जैसे चेहरे पर मुस्कान

भाषा ऐसी चाहिए जैसे चेहरे पर मुस्कान
देखें मन खुश होय और न देखे तो हलकान।

हिंदी सम्मेलन हो रहा,बना अखाड़ा भोपाल,
जो भी पहुंचा नहीं वहां, ठोंक रहा है ताल।

पहुंचे हैं जो लोग सब रहे फोटो हैं खिंचवाय,
हिंदी है यदि सीखना, बेचो घूम-घूम कर चाय।
--कट्टा कानपुरी

Thursday, September 10, 2015

बयानों में हीनभावना

कुछ लोग हिंदी के साहित्यकारों को गरियाते हुए कहते पाये गए कि उनका लिखा उतना मारक नहीं है जितना उन भाषाओं के लेखकों का जिनमें हत्यायें हो रही हैं।

कुछ के बयानों में तो इतनी हीनभावना दिखी और हिंदी साहित्यकारों के सुरक्षित होने से कि लगा कि अगर सम्भव हो तो अपने साहित्य का स्तर उठाने के लिए कुछ लोगों को पिटवाने/निपटवाने का इंतजाम किया जाए।
यह मेरी समझ में जल्दबाजी में दिए गए बयान है। क्या इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि उन भाषाओं को बोलने, बैपरने वाले समाज में हिंदी पट्टी के मुकाबले ज्यादा कट्टरता है। वे अपनी रूढ़ियों और मान्यताओं के खिलाफ लिखने वालों के प्रति ज्यादा अनुदार हैं।

किसी भाषा के साहित्यकार मारे जा रहे हैं इसका मतलब उस भाषा में चुनौतीपूर्ण लेखन हो रहा है और जिनमें हत्याएं नहीं हो रहीं उनमे ऐं वें टाइप यह पैमाना ठीक टाइप नहीं लगता।

हिंदी के कवि मान बहादुर की हत्या खुले आम गड़ासे से काटकर हुई। अगर किसी भाषा के साहित्यकार की हत्या से वह साहित्य चुनौतीपूर्ण बनता हो तो हिंदी साहित्य तड़ से महानता के एवरेस्ट पर पहुंच गया होता।
परसाई जी ने लिखा था-पता होता कि पिटने से यश मिलता है तो पहले से पिटने का इंतजाम कर लेता।
साहित्य से अधिक यह समाज के मनोविज्ञान का विषय है कि ऐसा क्यों हो रहा है।

नहीं क्या ?

हौसला इसे कहते हैं


Wednesday, September 09, 2015

सफलता-असफलता तो इंद्रधनुषी रंग हैं जिंदगी के

सुबह जग तो गए पर उठने का मन न किया। लेटे रहे। पर फिर अलार्म बजा तो उठना पड़ा। उठे तो पहले सोचा कि आज साईकल न चलेगी। लेकिन फिर 'पच्चल' पहनकर निकल लिए।

बाहर निकलते ही बायीं तरफ देखा तो सूरज भाई आसमान पर विराजमान थे। बहुरंगी उजाला उनके चारो तरफ सुरक्षा घेरे सा फैला हुआ था। लगा कि किसी अनगढ़ गृहणी ने आसमान के आंगन पर रौशनी छिटककर उसको अनमने मन से लीप दिया हो। बहुत दिन बाद दिखे सूरज भाई। देखकर कहने का मन हुआ-शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद। लेकिन कहे नहीं फिर। पता नहीं लोग क्या सोचें।

होता है ऐसा। हम बहुत कुछ कह नहीं पाते अपने जीवन में। बहुत कुछ अनकहा रहा जाता है यह सोचते हुए कि लोग क्या कहेंगे।ऐसे समय ऊ वाला गाना याद नहीं आता-

'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों काम है कहना।'
सड़क पर लोग टहलते हुए जा रहे थे। लगा लोग अनमने से टहल रहे हैं। ऐसा शायद इसलिए लगा कि हम खुद अनमने से रहे होंगे। आदमी सबको अपने हिसाब से देखता है न।

पंकज टी स्टाल पर बाजा बन्द था। बोले तो चालू किया। गाना बज रहा था-दिल ने फिर याद किया। लेकिन फिर खड़खड़ होने लगी तो बन्द कर दिया। दिल ने लगता है ज्यादा 'जोड़' से याद कर लिया।

दूकान पर कुछ लोग बस्ता जैसा लादे चाय पी रहे थे। पता चला कि जीसीएफ फैक्ट्री के कामगार थे। रात की शिफ्ट में काम करके निकले। घर जाने से पहले चाय पीते हुए बतिया रहे थे।

एक आदमी बीड़ी पीता हुआ चाय पी रहा था। बीड़ी का धुंआ वह अलग-अलग तरह से फेंक रहा था। कभी एकदम सीधे सामने।अगले कश में मुंह से 30 से 40 डिग्री ऊपर की तरफ करके मानों मुंह की तोप से धुंए का गोला छोड़ रहा हो।उसके अगले कश में धुंए की तोप उतना ही नीचे चलने लगी मानों सीजफायर की घोषणा कर रहा होगा।
धुंए का कोई प्रवक्ता होता तो इसकी अपने हिसाब से व्याख्या करता। ऊपर की तरफ उड़ते हुए को प्रगति और नीचे की तरफ के धुएं को कीमतों में कमी बताता। कोई कविमना प्रवक्ता शायद रमानाथ अवस्थी की कविता भी सुना देता:
चाहे हवन का हो
चाहे कफ़न का हो
धुएं का रंग एक है!
किसी का अलगाव क्या!
किसी का पछताव क्या!
अभी तो और सहना है!
ठीक है भाई सहना है तो सहेंगे।

बीड़ी पीते हुए आदमी की दाढ़ी सफेद पर मूंछे चिट काली थीं। डाई किया होगा। त्रिभुज के आकार की मूंछे इतनी सफाई से तरासी गयीं थीं कि मन किया नाप लेकर त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने लगूं।

आड़ में कुछ बच्चे बैठे आपस में बतिया रहे थे। बात किया तो पता चला कि एक बच्चा कॉल सेंटर में काम
करता है। उम्र 20 साल। यूके बेस्ड कम्पनी के कॉल सेंटर में काम करता है। जॉन नाम है वहां उसका। बोला हिंदी नाम बताओ तो रख देते हैं वो लोग फोन। ग्रामर नहीं सिर्फ अंग्रेजी कांफिडेंटली बोलना जरूरी होता है। ट्रेनिंग होती है। कुछ दिन अमेरिका की कॉल के लिए भी काम किया। यूके वाले कॉल करते हैं।अमेरिका में करना पड़ता है।

चेतन भगत की 'लाइफ इन ए काल सेंटर' से बहुत अलग है कॉल सेंटर की जिंदगी। बहुत स्ट्रगल करना पड़ता है। 5000 से जबलपुर से शुरू किया था। अब 35000 मिलते हैं। बीकाम किया है। एमबीए कर रहे हैं। अब सीनियर हो गए। कभी-कभी कॉल छोड़ देते हैं अब। फिर आती है तो किसी और के पास चली जाती है।

आगे जिंदगी में क्या करना है पूछने पर बताया कि खूब पैसे कमाने हैं। आगे बढ़ना है।

उसके दोस्तों में एक कम्पनी सिकरेटरी का कोर्स कर रहा है। दूसरा जबलपुर इंजिनयरिंग कालेज से इंजियंरिंग। एक बच्चा सर झुकाये बैठा था। दोस्तों ने बताया कि सऊदी अरब से आया है।

कुछ बच्चे और थे जो वहां सिगरेट फूंक रहे थे। बोले-दिन में एकाध दो पी लेते हैं। टेंशन दूर करने के लिए। सिगरेट के बाद मसाला फांकते हुए देखा तो टोंका-ये बहुत खतरनाक है। इसमें केमिकल मिले होते हैं। बोले- हमेशा नहीं खाते। सिगरेट की महक कम करने के लिए खाते हैं मसाला। घर वालों से छिपकर पीते हैं। उनकी इज्जत का सवाल है।

इज्जत के नाम पर याद आया कि अपने यहां अनगिनत काम इज्जत की रक्षा के लिए होते हैं। लोग प्रेम करने पर अपने बच्चों को इज्जत के लिए मार देते हैं। हजारों पद्मणियां अंगारों पर इज्जत के लिए आग में कूद गयीं। इन्द्राणी ने अपनी बच्ची का खून इज्जत के लिए ही किया था शायद क्योंकि वह रिश्ते में अपने भाई के साथ शादी करना चाहती थी।पता नहीं उसने राहुल सांकृत्यायन की 'वोल्गा से गंगा' से पढ़ी थी कि नहीं जिसमें समाज के शुरूआती दिनों की कहानियाँ है जिसके अनुसार एक ही महिला का पुत्र उसका पति भी होता था। अगर वह हार्वड फ्रॉस्ट का उपन्यास स्पार्टाकस पढ़ी होती तो उसको पता होता-जीवन सबसे अमूल्य होता है। जीवन से कीमती कुछ भी नहीं होता। इसकी हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए।

पोस्ट लिखते हुए अपने बच्चे और भतीजे और युवा मित्र याद आये। सब कहीं न कहीँ संघर्षरत हैं। कोई मन से कोई अनमने ढंग से। कोई सफल होता जा रहा है किसी के हाथ से सफलता बार-बार फिसलती है।उन सबसे यही कहना है सफलता-असफलता तो इंद्रधनुषी रंग हैं जिंदगी के।जीवन सबसे अमूल्य होता है। भरसक सार्थक जीवन जीने की कोशिश करनी चाहिए। शानदार,जबरदस्त,जिंदाबाद।

लौटते हुए देखा सड़क पर सूरज भाई ने हमारी अगवानी में धूप की कालीन बिछाई हुई थी। सड़क एकदम झक्क लग रही थी।धूप हम कुछ कहने के लिए मुंह खोले लेकिज अं अं अं कहकर रह गए। धूप खिलखिलाते हुए हमारे मजे लेती हुई और खूबसूरत लगने लगी। हमको लगा कि धूप थोडा सा और खूबसूरत होती तो किसी प्यारे दोस्त के चेहरे की मुस्कान सरीखी लगती।
अब आप पूछेंगे कौन सा प्यारा दोस्त? तो यह आप ही हैं । सच्ची। मुस्कराइए ताकि सुबह की शुरुआत हो सके और दिन शुभ हो सके।
अच्छे से रहिये। चलते हैं काम पर निकलने के लिए तैयार होने। आपका दिन शुभ हो।

लहर का हर छोर, दोनों और लिखना

लहर का हर छोर, दोनों और लिखना
रात में भी तुम, सुनहली भोर लिखना।

मौसमों की जिदें सारी तोड़ देना,
हवा में कुछ खुले पन्ने छोड़ देना,
मन! हमेशा पंख खोले मोर लिखना।

फूल पर ठहरी हुई सी ओस लिखना,
जिंदगी भर तुम नहीँ अफ़सोस लिखना,
आँधियों में पत्तियों का शोर लिखना।

नहीं छूटे कहीं कोई छुपा कोना,
गीत के हर अन्तरे में साँस बोना,
लिखो बारिश तो बहुत घनघोर लिखना।

एक धीमीं आंच पर गुनगुना करना,
वक्त को सुनना, नहीं अनसुना करना,
खुले मन से कभी, मन का चोर लिखना।

--यश मालवीय

जिम्मेदार नागरिक ऐसे होते हैं



Tuesday, September 08, 2015

सन्तोषधन इफरात में है अपने देश में

कल रात भौत जल्ली सो गए। सच तो यह कि सोये नहीं थे। बस जरा लेटे ही थे कि नींद ने हमला कर दिया और कब्जे में ले लिया। सोचे थे कि किताब उताब बांचेंगे। पड़ फिर निंद्रालीन हो गए। नींद का कब्जा कुछ ढीला हुआ रात 2 बजे। पलक पट खोले। मोबाईल नेट आन किया तो पटपटा कर स्टेट्स, नोटिफिकेशन बम चटाई बम सरीखे बरसने लगे।

अब जब नींद खुल ही गयी थी तो सब पढ़ गया।टिपियाया गया। गाना सुना गया। यह सब कर ही रहे थे कि उधर Mukesh Sharma हड़काने लगे कि इत्ती देर तक क्यों जग रहे। हम कुछ सफाई देते तब तक उन्होंने सजा सुना दी- विश्व सम्मेलन की रपट 3 पढ़ लो। हमने पढ़ा और टिपियाकर सो गए।

दूसरी क़िस्त की जगहर 5 बजे हुयी। फिर एक घण्टा भोर चिंतन के बाद साइकिल सवार होकर निकल लिए। सूरज भाई आसमान पर पूरे जलवे के साथ विराज मान थे। ऐसे लग रहा था कि बस भाषण की शुरुआत करने ही वाले हैं-'मितरों मैं बचपन से लोगों के चेहरे की तरह चमकना चाहता था। मैंने लोगों के चेहरे की मुस्कान से सीखा कि कैसे चमकना होता है।'


फैक्ट्री के सामने मोड़ पर एक जोड़ा स्त्री-पुरुष सड़क किनारे बैठा दिखा। वे आपस में कुछ बोल नहीं रहे थे। चुप थे। इससे कन्फर्म हुआ कि वे पति-पत्नी ही होंगे। समय के साथ पति-पत्नी मौन की भाषा में सम्वाद कुशल हो जाते हैं। हाव-भाव से सम्प्रेषण करने लगते हैं।

टहलने जाती महिला उसी तरह एक हाथ से साड़ी का पल्लू थामे टहलती जा रही थी जिस तरह महीने भर पहले जाते दिखी थी।

छट्ठू सिह के साथी मिले। छट्ठू सिंह नहीं दिखे। एक ने बताया-लूज़ हो गए होंगे।नहीं आये। बातचीत से पता लगा कि छट्ठू सिंह आर्थिक रूप से उत्ते मजबूत नहीं जितना बताते हैं। खाने की भी तंगी है शायद।बेटा अकेला कमाने वाला है। खाने वाले कई।


पटेल की चाय की दुकान पर पटेल जी मिले।दो बेटे बेरोजगार हैं। एक ने वेल्डर का काम किया है। दूसरे ने मेकेनिकल इंजीनियरिंग। दोनों को कोई काम नहीं मिला अब तक। चिंता इंजीनियर बेटे की पढ़ाई के लिए लिए गए लोन की है। ढाई लाख चुकाने हैं। हमसे बोले कहीँ लग सकें तो बताइयेगा। हमने कहा बताएंगे।

चाय की दुकान पर ही भरत से मिले। शांत, उदास, धीमी आवाज में बोलते हुए। 45 /46 की उमर है। एक लकड़ी की टाल में बेलदारी का काम करते हैं।पौने तीन सौ रोज और हफ्ते में दो दिन लकड़ी मिल जाती है ईंधन के लिए।


भरत 5 वीं तक पढ़े हैं। 20 साल का बेटा 8 वीं तक पढ़ा है। लोहा बाँधने का काम करता है। छल्ला बनाता है। 18 साल की बिटिया पापड़ बनाती है।

हमने पूछा प्रधानमन्त्री के बारे में जानते हो? जन-धन योजना में खाता है? 1 रूपये प्रति माह वाली बीमा योजना है तुम्हारे लिये। पता है इसके बारे में?

हाँ कोई नए बने हैं शायद मोदी। खाते के बारे में कुछ सुना तो है लेकिन ज्यादा पता नहीं। सुनकर यह लगा कि जिनके लिए कल्याणकारी योजनाएं चलती हैं वे ,बावजूद अरबों रूपये के प्रचार-प्रसार के खर्चे के, अक्सर उनके जीवन वृत्त पर स्पर्श रेखा तक डालने में असफल रहती हैं।

हमने भरत से पूछा-जिंदगी कैसी लगती है? खुश हो? कभी पिक्चर देखते हो? कभी देखी क्या?

जिंदगी में सुख-दुख तो लगे रहते हैं। कोई शिकायत नहीं हमें। पिक्चर कभी नहीं देखते। घर में बच्चे देखते हैं।
45/47 की उम्र में जब अपने यहां के सिनेमा नायक छैला बाबू बने अनगिनत दिलों की धड़कने बनने लायक युवा बने रहते हैं तब भरत जैसे लोग भी हैं जो अपनी उम्र से 20 साल बड़े दीखते हैं। सब दांत हिलते हैं। कुछ टूट गए हैं। मनोरंजन के किसी संस्करण से कोई परिचय नहीं । इसके बावजूद पूछने पर कहता है- जिंदगी से कोई शिकायत नहीं। सन्तोषधन इफरात में है अपने देश में।

लौटते हुए देखा एक ड्राइवर ट्रेलर के डाले पर खड़ा कुल्ला कर रहा था। दूसरा मन्जनरत था। टाटा से सामान लाद कर आये हैं। रांची के रहवैया। 4 दिन लगे आने जमशेदपुर से।

शमीम नाम है ड्राइवर का। ट्रेलर खुद का है। 15 लाख का खरीदा। पहले दूसरे का ट्रेलर चलाते थे। फिर पैसा बचाकर खुद खरीदा। एक लड़का है। सउदिया गया है। वह भी ट्रक चलाता है।

ट्रेलर चलता-फिरता घर है। खाने-पीने, सोने का सब इंतजाम इसी में। हमारे देखते-देखते स्टोव जलने लगा उनका और कुछ पकने लगा। हम चले आये।

अब बहुत हुआ। चला जाए दफ्तर की तैयारी की जाए। आप मजे से रहिये। खुश रहिये। मुस्कराइए।यह सोचिये कि आपकी मुस्कराहट से किसी और की मुस्कराहट जुड़ीं हो सकती है।

आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

याद तुम्हारी कर चुपके से....

याद तुम्हारी कर चुपके से आज सांझ को फ़िर मैं रोया।

क्षण भर में मन दौड़ गया फ़िर उन भूली-भटकी राहों में
और अचानक तुम्हें पा लिया फ़िर मैंने अपनी बांहों में
लहराते से मुक्त केश थे, थीं मदिरालस तिरती आंखें
झूल रही थी देह फ़ूल सी, सुख की चिर आतुर चाहों में
होता नहीं कहीं धरती पर सपनों से ज्यादा कुछ सुन्दर
इसीलिये तो हमने उनकी खातिर अपना सब कुछ खोया।

याद तुम्हारी कर चुपके से आज सांझ को फ़िर मैं रोया

दो हृदयों का मिलन देखकर मानों सारा जग जलता है
पर अपने-अपने मन पर ही बोलो किसका वश चलता है
जिस पर रीझे उस पर अपना जीवन ही अर्पित कर डाले
यह मानव की एक चिरन्तन एक अभागी दुर्बलता है
कौन यहां जन्मा धरती पर जिसने नहीं विरह-दुःख देखा
जिसने क्षण न दिए सुधियों को जिसने अपना मन न भिगोया।

याद तुम्हारी कर चुपके से आज साँझ को फिर मैं रोया।

कितनी हो दृढ़ता धीरज की फिर भी दृग भर आते हैं
कितना ही कठोर संयम हो फिर भी पांव फिसल जाते हैं
कब रह पाया दुःख अनगाया,कब रह पाई मौन प्रतिध्वनि
भाव उधर अंतस में उठते,अक्षर इधर बिखर जाते हैं
आज तुम्हारा कण्ठ अलंकृत अगणित सुधियों की माला से
उस माला में एक फूल सा मैंने अपना प्राण पिरोया।


याद तुम्हारी कर चुपके से आज साँझ को फिर मैं रोया।

वह अनुभूति प्रखर होती है जिसकी फांस गड़ी रह जाए
दर्द वही असली होता है जो प्राणों से निकल न पाये
वह जो रह-रह कर बहता है फिर भी भरा-भरा रहता है
कब जाने ढुलते जल-कण सा कब जाने तूफान उठाये
आज लगा होने आलोड़ित फिर कोई करुणा का सागर
उस सागर में लघु गागर सा मैंने अपना गीत डुबोया।

याद तुम्हारी कर चुपके से आज साँझ को फिर मैं रोया।

-डॉ उपेन्द्र,कानपुर।

उठिये मुस्कराइये कि आप फ़ेसबुक पर हैं




'नारद की चिंता' -सुशील सिद्धार्थ


Sushil Siddharth नाम मैंने सुन रखा था। श्रीलाल शुक्ल के साथ लिये कुछ इंटरव्यू पढ़े थे उनके। इसके अलावा और कुछ जानकारी नहीँ थी उनके बारे में। उनका लिखा कोई लेख भी ध्यान नहीँ था।

पहली बार उनसे तब बात हुई जब वे अपने इलाज के सिलसिले में अस्पताल में भर्ती हुए और यह खबर शायद संतोष त्रिवेदी ने साझा की थी। बीमारी की खबर के साथ उनका फोन नम्बर भी था।नम्बर था तो उनको शुभकामनाएं देने के बाद उनके फेसबुक खाते ...को देखना शुरू किया। यह हिंदी साहित्य की परम्परा के अनुरूप ही था जिसके अनुसार साहित्यकार पर ध्यान तब ही जाता है जब वह बीमार होता है या फिर उसको कोई इनाम मिलता है।कभी-कभी ध्यान दिलाने के लिए इनाम लौटाना भी काम आता है पर उसके लिए इनाम मिलना भी तो चाहिए।

उनकी गतिविधियाँ और अवधी की उनकी कवितायें पढ़ीं। पर पता लगा कि अवधी सम्राट वंशीधर शुक्ल और पढ़ीस जी के इलाके वाले भाईसाहब की ख्याति व्यंग्यकार के रूप में ज्यादा है।

व्यंग्यकार से पूछकर उनकी किताब 'नारद की चिंता' मंगाई गई। किताब मंगवाने में काम भर के करम हो गए। नेटबैंकिग से भुगतान की सुविधा नहीं थी ऑनलाइन बुकिंग में। अंतत: बेटे की शरण में गए। बेटे ने फौरन किताब अपने कार्ड से भुगतान करके बुक करवा दी। हमने आल्हादित होकर सोचा:

'जिनके लड़िका समरथ हुइगे उनका कौन पड़ी परवाह।'

अब यह अलग बात कि वर्षों पहले का सरिता/ मुक्ता में पढ़ा विज्ञापन- 'क्या आप मांग कर खाते हैं' इतना हावी था कि किताब के पैसों में चाय पानी के भी जोड़कर बेटे को फौरन भेज दिए। बेटे ने भी पुत्र धर्म का पालन करते हुए कहा-अरे पैसे भेजने की क्या जरूरत थी।

किताब बुक करवाने के बाद कुछ दिन बेकली रही। कुछ देर हुई आने में। फिर भूल गए। जैसे ही भूले तो एक दिन सुखद आश्चर्य के रूप में किताब पधार गई।यह भी लगा कि सुखद आश्चर्य के लिए भूल जाना भी अच्छा उपाय है।

किताब मिलते ही हमने उसको खोला और बीच से पढ़ना शुरू किया। यह कुछ ऐसे ही जैसे कोई किसी के घर जाए तो सीधे उसके आँगन में पहुंच जाये। अब चूँकि आँगन तो रहे नहीं सो आप आँगन की जगह किचन पढ़िए या फिर मन करे तो बेडरूम। यह भी कह सकते हैं कि किसी से मिलते ही उसके दिल तक पहुंचने की कोशिश करें। जो भी समझना हो समझ लें। पूरी छूट है आपको। सुझाव हमारा, चुनाव आपका।

अब बीच का जो पन्ना खुला वह 'आदत' लेख था। उसमें भी सबसे जो वाक्य पढ़ा वह यह था--'आदत हो जाये तो बिना सिगरेट या चाय के प्रेशर नहीं बनाता, बिना प्रवचन सुने काली कमाई हजम नहीं होती।'

'बिना प्रवचन सुने काली कमाई हजम नहीं होती।' पढ़ते ही हम तड़ से मुरीद हो गए लेखक के।(बतर्ज आधा गांव - ने देखा और तड़ से आशिक हो गयी) हमको भड़ से राग दरबारी की पंक्ति याद आई -'वे हंसे और आगे का काम भांग ने सम्भाल लिया।' यह भारतीय नौकरशाही/समाज का विद्रूप है। लोग काला धन कमाते हैं। प्रवचन सुनकर उनको लगता है पच गयी कमाई। प्रवचन काली कमाई का हाजमोला है। यह भी कि प्रवचन सुनने वालों में बहुतायत उनकी होती है जो काली कमाई करते हैं। या फिर यह कि प्रवचन बाबा अपना प्रवचन फंदा उन पर डालते हैं जिनके पास काली कमाई की सुविधा हो। सबके लिए 'विन-विन' स्थिति।

संयोग कि सबसे पहला वाक्य ही जो पढ़ा उसमें बहुकोणीय व्यंग्य दिखा। पहली पढ़न में ही मुरीद हो जाने जैसा भाव जगा। पहली नजर में मुरीद होना पहले प्यार सरीखा होता है। सब कुछ अच्छा-अच्छा सा लगता है। फिर कई लेख पढ़े। बीच-बीच से पढ़ते हैं। सोचते हैं कि उसके बारे में लिखें लेकिन लिखना स्थगित हो जाता है।

किताब पढ़ते-पढ़ते सुशील जी के बारे में और भी काफी कुछ जानने को मिला। बेहतरीन वक्ता हैं। वलेश (व्यंग्यकार लेखन समिति) में व्हाट्सऐप पर जो ग्रुप बना है उसमें उनके वक्तव्य मैं जरूर सुनता हूँ।बहुत पढ़े-लिखे हैं। कढ़े भी कम नहीं हैं।सघन जीवन अनुभव की बानगी उनके वक्तव्यों में झलकती है।ग्रुप के एडमिन हैं सो शरारत-संगत में भी अपना भरपूर योगदान करते रहते हैं।

लेखन में मौके के हिसाब से अपने पढ़े हुए उद्धरण पढ़वाते रहते हैं। लेकिन कभी-कभी यह उद्धरण बहुलता ऐसी लगती कि मिलन के क्षणों में आप अपने संगी से किसी दूसरे व्यक्ति की तारीफ़ करने लगें या फिर सरपट चलती गाड़ी के सामने अचानक कोई स्पीड ब्रेकर आ जाए।

किताब पढ़ते हुए और सुशील सिद्धार्थ के बारे में जानते हुए अपनी और हिंदी साहित्य की स्थिति पर भी तरस आया। काम भर का पढ़ा लिखा होने के बावजूद मैं अपने समय के एक अच्छे लेखक के बारे में इतना कम जानता हूँ कि उसकी पहली किताब 50 पार का हो जाने के बाद पढ़ रहा हूँ। व्यंग्य हमारे लिए परसाई, जोशी, श्रीलाल और रवीन्द्रनाथ त्यागी से होते हुए ज्ञान देहरी पर ठिठका खड़ा है। किसी और को पढ़ते भी हैं तो इस मंशा से कि पढ़कर फटाक से ख़ारिज करें। बवाल कटे। आलोक पुराणिक जरूर बार-बार सामने आते रहते हैं। नियमित लिखते और छपते रहने के चलते उनको पढ़ना होता रहता है।

सुशील सिद्धार्थ जी की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में यही पता है कि किताबघर में नौकरी करते हैं। दिल के बीमारी झेल चुके हैं। मुस्कराते हैं तो हसीन लगते हैं। बातचीत में कभी हंसते हुए सुनता हूँ तो लगता है और भी खूबसूरत लगते होंगे।

सुशील सिद्धार्थ से मिला नहीं मैं। लेकिन अब चूंकि उनके बारे में लिख रहा हूँ तो उनसे नजदीकी जाहिर करना जरुरी है। उसका एक सरल और कम खर्चीला तरीका यह जाहिर किया जाए कि हममें और उनमें किया साझा है। तो हममें और उनमें जो साझा है वह यह कि हम लोग श्रीलाल शुक्ल के साझा मुरीद रहे। बड़े होने और लखनऊ के पास रहने के कारण वे ज्यादा सानिध्य सुख पाये शुक्ल जी का यह उनका सौभाग्य। दूसरी बात यह कि हम लोग एक ही इलाके के हैं। लखनऊ को केंद्र मानकर अगर 100 किमी की त्रिज्या का वृत्त बनाया जाये तो हमारे गांव जरूर आ जाएंगे।

और भी तमाम बातें साझा बाते हैं बताने को लेकिन हमें अचानक परसाई जी के संस्मरण लिखने के अंदाज ने डिस्टर्ब कर दिया। लोग जब किसी के बारे में लिखते हैं तो दूसरे के बारे में लिखते हुये सारी रौशनी अपने ऊपर फेंकते रहते हैं। परसाई जी कभी ऐसा नहीं करते थे। जबलपुर में रहने का नुकसान हुआ यह।

और बाकी बातें बाद में। फ़िलहाल मुझको ज्ञान चतुर्वेदी जी की कही बात याद आ गई। उन्होंने कहा था -हमको जो हैं उससे बेहतर होना है। बेहतर पिता, बेहतर पति, बेहतर लेखक और बेहतर .........होना है। बाकी सब बेहतरी थोडा मुश्किल है सो मैं एक बेहतर पाठक बनने की कोशिश करते हुए उनके लेख आदत के कुछ उद्धरण आपको पढ़वाता हूँ:

1.आदत और आदमी का चोली दामन का साथ है।
2.आदत हो जाए तो बिना सिगरेट या चाय के प्रेशर नहीं बनता, बिना प्रवचन सुने काली कमाई हजम नहीँ होती।
3.आदत पड़ जाए तो हर सांस लेता हुआ आदमी खुद को जिन्दा समझता रहता है।
4.आदत चिंतन का परिवार नियोजनी करण कर देती है।
5.बहुत सी भारतीय पत्नियां पतियों की क्रूरता को आदत के खाते में डालकर मुस्कराती रहती हैं कि अरे इनकी तो आदत है,अब कहां तक सोचूं।
6.आदत भ्रमों और गलतफहमियों की अम्मा है।
7.गुलामी की आदत पड़ जाए तो आजादी मिलने पर समझ नहीं आता कि इसका क्या करें। अमेरिका के हाथ बेंच दें या नए पूँजीवाद के यहां गिरवी रख दें।
7.आदत के कारखाने में उमंगे ऊब की शक्ल में मिलती हैं।
8. विवाह के कुछ वर्षों बाद एक -दूसरे की आदत ही पति-पत्नी में नीरसता पैदा करती है।
9.स्वभाव के सिंह द्वार पर आदत का ताला पड़ जाए तो नवीन प्रयोगों, विस्मयों का प्रवेश वर्जित हो जाता है।
10.आदत अप्रत्याशितों का विलोम है।
11.आदत से स्तुति तोता रटन्त में ढल जाती है।
12.आदतें अनादि-अनन्त हैं। आदतें ईश्वर हैं या ईश्वर भी एक आदत है।

अभी हाल में जिसको पढ़ना शुरू किया उसके मूल्यांकन के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन ऐसे ही एक बार बातचीत में सुशील सिद्धार्थ के बारे में अपनी राय बताते हुए Nirmal Gupta ने कहा- इस आदमी को अपनी प्रतिभा और लेखन के मुकाबले प्रसिद्धि और सम्मान बहुत कम मिला। मतलब लेखन/प्रतिभा और उपलब्धि का वज्रगुणन हो गया। गाड़ी उलार हो गयी। एक लिहाज से यह हिंदी साहित्य की परम्परा के अनुरूप ही है। लेखक को उनके लेखन के हिसाब से समय रहते सम्मान मिल जाता है तो फिर वह उतना महान नहीं माना जाता।

यह जो लिखा वह बस ऐसे ही। यह न 'नारद की चिंता' की समीक्षा है न ही सुशील सिद्धार्थ का मूल्यांकन।जो कुछ उनके बारे जाना, पढ़ा उसका बस ऐसे ही घालमेल है।

सुशील जी को उनके सक्रिय लेखन और उसके लिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए मंगलकामनाएं।

Monday, September 07, 2015

ज़मीं पर रंग जैसे आदमी पाये नहीं जाते

बहुत से प्रश्न ऐसे हैं, जो दुहराये नहीं जाते,
मगर उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते

इसी कारण अभावों का सदा स्वागत किया मैंने,
कि घर आये हुये मेहमान लौटाये नहीं जाते
...
बनाना चाहता हूं स्वर्ग तक सोपान सपनों का,
मगर चादर से ज्यादा पाँव फैलाये नहीं जाते

हुआ क्या आँख से आँसू अगर बाहर नहीं निकले,
बहुत से गीत भी ऐसे हैं जो गाये नहीं जाते

सितारों में बहुत मतभेद है इस बात को लेकर,
ज़मीं पर रंग जैसे आदमी पाये नहीं जाते

--बलबीर सिंह रंग

आप मुस्करायेंगे दुनिया बेहतर लगेगी

आज मेस के बाहर निकलते ही पुलिया के पास देखा एक लड़का साइकल पर सवार एक डीसीएम ट्रक के डाले के पास लटकी जंजीर पकड़े ट्रक के साथ ही चला जा रहा था। इससे उसको पैडल मारने से तो मुक्ति मिली पर बहुत खतरनाक है यह। कभी भी ट्रक अचानक रुका तो दुर्घटना हो सकती है। हम भी जब पहले साइकिल चलाते थे तब ऐसा ही करते थे। ट्रक वाला मना करता था। डांटता था तब छोड़ते थे।

किसी दूसरे के सहारे भागने में ऐसा ही होता है। हमेशा दुर्घटना की आशंका रहती है। फिर वह चाहे आदमी हो या कोई अर्थव्यवस्था। अभी चीन और कुछ साल पहले अमेरिका की अर्थव्यवस्था हिली तो दुनिया हिल गई। इनमें वो देश ज्यादा हिले जो इनसे ज्यादा गहराई से जुड़े थे।

बस स्टैंड पर छट्ठू सिंह अपने साथियों के साथ बतिया रहे थे। नमस्ते किया तो 'जय बाबा भोलेनाथ' बोलकर अभिवादन किया। सब लोग खड़े टाइप हो गए। बोले आइये बैठिये। हम बोले -आप लोग बैठिये। हमको आगे जाना है। भगवती प्रसाद दीक्षित उर्फ़ घोड़े वाला का डायलॉग भी याद आया अभी-अभी-'आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे हैं।'

ओवरब्रिज के नीचे लोगों के चूल्हे जल चुके थे। एक आदमी लोहे की पत्ती से पूरी बटलोई में ऊपर तक भरे उबलते चावल को हिला रहा था। चावल बहुत छोटे थे। मानों आम आदमी के सपनों से टूटे-फूटे से। थोड़ा सा फुदकते फिर लगता है हौंसलों की गर्मी के अभाव में पस्त होकर बैठ जाते। पूछा तो बोले- यह चावल नहीं है।कोदो हैं। हमको सुदामा चरित की पंक्तियाँ याद आई:

कोदों सवां जुरतो भरि पेट जो
चाहति नहिं दधि दूध मिठौती।

पीछे लोग चिलम,बीड़ी फूंकते हुए खाना बना रहे थे। पूछने पर महिला बोली- सबका प्रसाद चल रहा है।भोले भंडारी और काली माई का भी।

आगे देखा दीपा पढ़ रही थी। कुछ याद कर रही थी। उसके पापा खाना बना रहे थे। मुझे देखा तो नमस्ते करके बोली-आइये अंकल बैठिये। पालीथीन की बोरी जमीन पर बिछा दी। हमने कहा-हम लौटकर आते हैं तुम्हारे लिए बिस्कुट लेकर तब बैठेंगे। बोली-नमकीन वाले लाइयेगा। चलते हुए देखा कि उसने बाल धोये थे लेकिन शायद पानी से अच्छे से साफ़ नहीँ किये। उलझे थे बाल।

चाय की दुकान की तरफ जाते हुए देखा तो रमेश लौट रहे थे। बोले- जल्दी आया करो।हमने कहा-आओ फिर पिलाते हैं चाय। वो कुत्ते के साथ लौटे। हमने दो चाय ली । एक खुद के लिए दूसरी रमेश के लिए। अपनी चाय में से आधी उसने एक और साथी को दी।


चाय पीते हुए उसने बताया कि दारू रोज पीते हैं। 60 रूपये की । साथ वाले के लिए बोला- जे तो नीट पीते हैं। चाय वाले के लिए बताया- इनको कम न समझो। 25 लाख का पानी पाउच का प्लांट लगाया है। चाय वाले पूछा-पानी के कन्टेनर जरूरत हो तो बताना।

आगे देखा एक महिला झुकी-झुकी अख़बार बांच रही थी। मुझे डॉ अमर कुमार का एक संस्मरण याद आया जिसमें मास्टर जी ने उनको सजा देते थे मुर्गा बनने की तो वो मुर्गा बने बने ही टांगों के बीच रखकर अख़बार पढ़ते थे।

डॉ साहब की बात से याद आया कि वे हमसे और तमाम ब्लागर साथियों से कितना लगाव रखते थे। डा.अमर कुमार हौसला लोगों की आफ़जाई में करने में बहुत उदार थे। जर्रे को आफ़ताब बताने में भी हिचकते नहीं थे। मुझे अभी भी यह सपना सरीखा लगता है कि वे कभी मुझसे कहा करते थे – 'गुरुदेव, जब मैं आपका लिखा पढ़ता हूं तो मेरा मन आपसे मिलने का होता है। मैं एक बार आपको छुकर देखना चाहता हूं।'

डॉ साहब की याद आते ही उनसे जुडी तमाम यादें फड़फड़ाकर ताजा हो गयीं। पुरानी यादें भी फेसबुक के स्टेट्स की तरह होती हैं। जरा सा छूते ही स्मृति पटल पर सबसे आगे आकर खड़ी हो जाती हैं। डॉ साहब से सबंधित लिंक यह रही। http://fursatiya.blogspot.in/2011/09/blog-post.html

एक दुकान सौरभ प्रोविजन से दीपा के लिए नमकीन बिस्कुट लेकर लौटा। दुकान पर एक सिक्का डालकर बात करने वाला फोन रखा था। मोबाईल के जमाने में अब बहुत कम लोग फोन करते हैं इससे। कभी-कभी क्रास कनेक्शन हो जाता है तो पैसे बर्बाद हो जाते हैं।

लौटे तो दीपा को उसके पापा पानी गर्म करके नहलाने की तैयारी कर रहे थे। कोई जुएं मारने की पुड़िया लाये थे। उसको बिस्कुट का पैकेट दिया तो थैंक्यू अंकल बोली।

उसके पापा उसको बिठाकर नहलाने लगे। बड़े कंघे से बाल काढ़ते हुए। बीच-बीच में डांटते भी जा रहे थे। हिलो नहीं। ठीक से बैठो। बच्ची बेचारी पिता जैसा कह रहा था करने की कोशिश कर रही थी।

उनको छोड़कर हम चले आये। अब चलते हैं दफ्तर। आप मजे से रहना। खूब खुश।सब लोग समय पर नाश्ता करना। खाना खाना। जिसको दवाई लेना हो वो समय पर दवाई ले। पानी पिए। जैसे ही मौका मिले तो मुस्कराये। मुस्कान सबसे खूबसूरत सौंदर्य प्रसाधन है। आप मुस्करायेंगे दुनिया बेहतर लगेगी।

ठीक न। चलो अब बॉय। अच्छे से रहें।।

ऐसे भी अध्यापक होते हैं


Sunday, September 06, 2015

नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो

अमृत लाल वेगड़ जी की कोलाज और स्केच बुक
नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो
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कल वेगड़ जी से मिलने गया। वेगड़ जी की कोलाज और स्केच की किताब 'नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो'...
दो हफ्ते पहले छप कर आ गयी। मैंने और हमारी दीदी Nirupma Ashok ने वायदा किया था कि उनकी 100 किताबें हम बिकवायेंगे। 27 किताबें हम लोगों के सौजन्य से बिक चुकी हैं। दीदी ने बताया कि उनके कालेज में आर्ट्स की दो बच्चियों को उनके कालेज के लोगों ने चंदा करके किताब भेंट की।


भोपाल में हो रहे विश्व हिंदी सम्मलेन में आने वाले प्रतिनिधियों को भेंट में देने के लिए भी 300 किताबों का आर्डर मिला है । कुल 2000 किताबें छपवाई हैं वेगड़ जी ने।

फेसबुक पर इस बारे में जब मैंने लिखा था तब कुछ दोस्तों ने किताब लेने की इच्छा जाहिर की थी। अब जब किताब आ गयी है तो जिनको लेना हो वो वेगड़ जी को सीधे पैसा भेजकर किताब हासिल कर सकते हैं।
आर्ट पेपर पर छपी इस किताब में कुल 78 पेज हैं। विवरण हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में है।


प्रगति आफसेट, हैदराबाद में छपी है यह किताब जो कि वेगड़ जी के अनुसार इस तरह की किताब छापने का सबसे बेहतरीन प्रिंटिंग प्रेस है।


किताब का छपित मूल्य 800 रूपये है।वेगड़ जी हमारे मित्रों के लिए इसे 700 रूपये में देने को तैयार हैं। किताब भेजने की व्यवस्था मतलब डाकखर्च वेगड़ जी स्वयं करेंगे।


वेगड़ जी का पता निम्नवत है:
अमृत लाल वेगड़
1836, राइट टाउन
जबलपुर-482002
फोन नम्बर: 0761-2410434, 2403812
E-mail:amitvegad@hotmail.com

उनके खाते का विवरण नीचे चित्रों में दिया है।

Name:Amrit Lal Vegad
A/c No.: 35001749120
SBI branch code (07665)
KAMALA NEHRU NAGAR
GARHA ROAD, DIST: JABALPUR
MP PIN-482002
IFSC Code: SBIN0007665


किसी किस्म की समस्या होने पर वेगड़ जी से उपरोक्त फोन पर या मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं।


जो साथी पैसा भेजें चाहे बैंक से या मनीआर्डर से वे अपने घर का पता और फोन नम्बर भी अवश्य भेज दें ताकि उनको उनके पते पर किताब भेज सकें वेगड़ जी।

'महक रहा है हरसिंगार , जैसे पहला-पहला प्यार

आज सुबह थोडा आराम से हुई। साढ़े छह बजे निकले साइकिलियाने। फैक्ट्री के बाहर खूब गाड़ियां खड़ी थीं। आज कुछ पदों पर भर्ती के लिए इम्तहान है। हजारों बच्चे दूर-दराज से आ रहे हैं इम्तहान देने।

शोभापुर की तरफ निकले। सोचा दीपा से मिलेंगे आज। चाय की दूकान पर बिस्कुट लेने के लिए के लिए रुके तो चाय भी पी ली। जनसेवक जनसेवा की शुरुआत अपने से करता है - कुछ वैसे ही।

चाय की दूकान पर सिया शरण दुबे मिले। उम्र 81 साल। जीसीएफ के पम्पहाउस के फ़िटर पद से 1996 में रिटायर। बोले- सतना जिला के गाँव में रहते थे। बाप गरीब। मास्टर बोले-पढ़ो। हम वजीफा दिलवायेंगे। वजीफा ऐसा कि कभी किताब नहीं तो कभी कॉपी गोल। हम भाग के आ गए जबलपुर। एक जन के यहां रुके। उ हमारा बेरोजगारी वाला कार्ड बनवा दिहिंन। दू साल मे नौकरी मिल गयी। साथ में छोकरी भी।

तीन बिटिया और एक बेटे के बाप सिया शरण हर आते जाते से 'राम-राम' करते जा रहे थे। बोले पहले नाम का मतलब होता था। अब बताओ इनका नाम विजय । विजय मतलब जीत। लेकिन कोई पिंटू बोलता है कोई चिंटू।कोई बबलू। बताओ यह भी कोई बात हुई।

तीनों बेटियों की शादी हो गयी है। लड़का 26 साल का है । उसकी शादी बाकी है। कपड़े की फेरी लगाता है। लोग कहते हैं लड़के की शादी कब करोगे-हम कहते हैं लड़की बताओ। कोई लड़की हो तो बताइयेगा।


पेंशन के मजे लेते हुए बोले- जब पसीना बहाते थे तब 2500 मिलते थे। अब बैठे-बैठे 10000 गिनते हैं। सब ईश्वर की माया है। जिस अंदाज में बता रहे थे यह सब तब मुझे लगा वीडियो बनाते तो बढ़िया रहता।

आगे ओवरब्रिज के नीचे लोगों के चूल्हे जल चुके थे। उसके आगे दीपा अपने पापा के साथ बाहर ही खड़ी ।आसपास और लोग नहीं थे वहां। सब दारु पीकर रात को हल्ला करते थे। हमने भगा दिया उनको। -दीपा के पापा ने कहा।

आप सोमवार को नहीं आये थे ?-दीपा ने अरगनी से कपड़े उतारते हुए पूछा। हमने कहा- हां। नहीं आ पाये। वो बोली-आपने कहा था कि आएंगे।इसलिए पूछा। वैसे हम बाहर चाचा के यहां गए थे। वुधवार को आये।
इतवार को तो नानी के यहां जाती हो। आज जाओगी? पूछने पर बोली-नहीँ आज काम पड़ा है। घर लीपना है। कपड़े धोने हैं। बर्तन मांजने हैं। नहीं जाएंगे।

स्कूल का होमवर्क कर लिया? पूछने पर बोली-हाँ सब कर लिया। हमने कहा -दिखाओ। दिखाई तो कई जगह वर्तनी की अशुद्धियाँ थीं। हमने बताया तो बोली- आप ऊपर लिख दीजिये। हम देखकर ठीक कर लेंगे । कुछ अक्षर ठीक किये उसने।


बिस्कुट का पैकेट दिया तो बोली- ये 'गुड डे' वाला मत लाया करो। वो वाला लाया करो जो उस दिन शाम को लाये थे। उस दिन शाम वाला मतलब क्रैकजैक। हमने कहा -ठीक।

हमने उसके पिता से पुछा तुम शैम्पू नहीं लाये इसके लिए। वो बोले-आज ले आएंगे। वह अपना रिक्शा लेकर जाने लगा तो दीपा ने उससे पैसे मांगे। थोडा जिद भी की। उसने पांच रूपये दिए और चला गया।

हमने पूछा कि क्या करोगी इस पैसे का? बोली- बतासे खाएंगे।

अभी क्या करोगी? इस सवाल के जबाब में बोली-कपड़े घरी करके फैक्ट्री जाएंगे। वहां नहायेंगे। फिर काम करेंगे सब। हमने पूछा-हम शैंपू ला दें। अच्छे से बाल धो लेना। बोली -ला दो। बगल की दुकान से कुछ शैम्पू के पाउच और छोटा साबुन लेकर उसको दिया और चले आये यह कहते हुए कि कल आएंगे देखने कि तुमने बाल अच्छे से धोये कि नहीं। वह बोली-जल्दी आना कल हमारा स्कूल है सुबह।

लौटते हुए रामफल के लडक़े गुड्डू से मिलने गए। वह काम पर चला गया था। उसकी माँ (रामफल की पत्नी) बाहर ही बैठी थी। बोली-फल का ठेला लगाता है।


हनुमान मन्दिर के सामने नीचे नाले में चार लोग बैठे थे।लगा नाले किनारे पिकनिक मना रहे हों। पूछा तो बोले-बालू निकालने का काम मिला है। शुरू कर रहे हैं काम।साइकिल पर बैठे-बैठे पूछ रहे थे तब तक पिछले पहिये पर किसी ने साइकिल का अगला पहिया सटाया। देखा तो रमेश थे। सुबह चाय की दूकान पर दादा कोंडके वाली भाषा से अलग अंदाज में बात करते हुए पूछा-क्या बात है। दीखते नहीं आजकल उधर। हमने कहा -आएंगे।

फैक्ट्री के सामने एक सब्जी वाला साईकिल पर सब्जी लिए जा रहा था। कैरियर की सब्जी का सन्तुलन गड़बड़ाया तो ठीक करने लगा। हम रुक गए देखकर तो बोला-अंकल जी जरा पकड़ लीजिये साइकिल।
साइकिल पकड़ी तो उसने बोरी बांधी। बोला 35 साल के हैं। साईकिल पन्द्रह साल पुरानी है। कुल सब्जी 1200 रूपये की है। जब तक बेंच नहीं लेंगे सब तब तक घर नहीं लौटेंगे। 300 से 400 रूपये फायदा हो जाएगा।
इस बीच कोई खरीदार आ गया। बोला-टमाटर कैसे दिए? 30 रूपये किलो थे टमाटर। मोलभाव के बाद उसने 10 रूपये टिकाये । सब्जी साईकिल वाले ने पैसे सब्जी को छुआकर माथे से लगाकर जेब में रखे और गिनकर 4 टमाटर दिए उसको।


हम वापस लौट आये। मेस में दोस्तों के साथ चाय पिए। कमरे में आकर सफाई करवाये। चद्दर बदलवाए। रमानाथ अवस्थी की कविता पुस्तक 'आखिर यह मौसम भी आया' पलटने लगे तो यह कविता दिखी-

'महक रहा है हरसिंगार
जैसे पहला-पहला प्यार।
जाग रही है गन्ध अकेली
सारा मधुबन सोता है
किया नहीं जिसने,क्या जाने
प्यार में क्या-क्या होता है।
रातें घुल जाती आँखों में
दिन उड़ जाते पंख पसार।'

चाय पीते हुए और साथ में पापड़ खाते हुए यह पोस्ट कर रहे हैं। आप मजे से रहिये। घर परिवार के साथ मजे करिये। खूब प्यार करिये अपने को। अपने से जुड़े लोगों को। जो हमारी तरह घर से दूर हैं उनके लिए फोन है न।
ठीक न। चलिए। मजे से रहिये।