Wednesday, October 14, 2015

हँसता हुआ आदमी कभी बूढा थोड़ी होता है

सुबह जब निकले आज तो देखा सड़क पर खूब चहल-पहल थी। एक भाई दोनों हाथों को एक के बाद एक उठाते, नीचे गिराते तेजी से टहल रहे थे। मानों उन्होंने हाथ में डम्बल थाम रखे हों।वाक करते हुए एक्सरसाइज भी करते जा रहे हों।

छट्ठू सिंह अपने सथियों के साथ टहलते मिले। तबियत पूछी तो साथी लोग बोले- 'छट्ठू सिंह जवान हो रहे हैं। आजकल फिर से दूध पीने लगे हैं।' हम बोले-'छट्ठू सिंह बूढ़े कब हुए थे? वो तो हमेशा जवान लगते हैं। हँसते रहते हैं। हँसता हुआ आदमी कभी बूढा थोड़ी होता है।' इस पर सब हंसने लगे।मने सब जवान हो गए।

रॉबर्टसन लेक की तरफ गए। झील का पानी अलसाया सा लेटा था। कोई लहर पानी को जगाती तो पानी फिर कुनमुनाकार सो जाता। एक मकान के पिछवाड़े जलते बल्ब का प्रतिबिंब झील पर पड़ रहा था। ऐसा लगा मानों बल्ब झील में ही जल रहा हो।


आसमान की लालिमा झील पर इस तरह दिख रही थी गोया लालिमा अपनी 'सेल्फी' ले रही हो। झील के पानी में अपनी शक्ल देखने के बाद दिशाओं से पूछा होगा लालिमा ने- 'बता तो कैसी लग रही हूँ।' दिखाएँ बोली होंगी- 'गजब यार। आज लगता है बिजली गिर कर रहेगी।' इस पर लालिमा लाज - लाल होते हुए बोली होगी दिशाओं से -' बहुत दुष्ट हो तुम लोग। हमेशा मजाक सूझता है तुम लोगों को।'

पंकज टी स्टाल के सामने की दुकान पर दो भट्टियां सुलग रहीं थीं। बड़ी भट्टी से राख नीचे गिर रही थी। पास-पास सुलगती दो भट्टियां एक ही छत के नीचे रहते दो लोगों की तरह चुपचाप सुलग रहीं थीं। एक दूसरे से बिना कुछ बोले। बीच का लोहे का रॉड उनके बीच विभाजक रेखा की तरह खड़ा था। दोनों को सुलगने से ही फुर्सत नहीं थी कि आपस में कुछ बात करें।

एक बच्चा कूड़ा बीनने के बाद उसमें से काम लायक कूड़े को अलग कर रहा था। मूलत: प्लास्टिक का सामान। दस रुपये किलो में बिकता है प्लास्टिक का कूड़ा। सामानों में दारू की बोतल, पन्नी, फ़ाइल कवर, सीएफएल जैसी तमाम सामान कूड़ा हो चुके सामान थे। विभिन्नता में एकता का एहसास दिलाते हुए।


एक खिलौना भी था कूड़े में। बच्चा उसे बड़े ध्यान से देखता रहा। हमने उसी समय फोटो खींची तो उसने खिलौना बोरी में फेंक दिया मानों कोई गलत काम करते देख लिया हो किसी ने। हमने पूछा -'क्यों फेंक दिया खिलौना?' वो बोला-'स्कूल में भर्ती करा दोगे आप।' पहले भी किसी ने फोटो खींची थी और बोले थे-'स्कूल में पढ़ाई करो।'


मन किया किसी चैनल वाले की तरह उससे पूछें कि खिलौना खेलने का मन करता है क्या? कब खेला कभी खिलौने से ? इसी तरह के सवाल के मार्मिक सवाल पूछते हुए बताएं कि देश का दुर्भाग्य कि खिलौने खेलने की उम्र वाले बच्चे कूड़े के ढेर बीनते हुए अपना भविष्य बना रहे हैं। पर हम कोई चैनल वाले तो हैं नहीं जो यह सब पूंछते।

15 साल का कूड़ा बीनने वाला बच्चा प्रकाश अपनी माँ के साथ रहता है। पिता नहीं रहे। सौ-पचास रूपये काम लेता है कूड़ा बीनकर । पांचवी तक पढ़ा है। 4 बजे निकला था कूड़ा बीनने। अब घर जायेगा। दिन में कोई काम नहीँ करता।गांव से आया था शहर पढने। हॉस्टल में रहा दो-तीन दिन। मन नहीं लगा तो भाग आया। किसी के कहने से नहीं पर खुद पढाई करेगा दो साल बाद।


बच्चा गले में पड़ी चेन मुंह में दबाये कूड़े में मिली एक किताब की फोटो ध्यान से देखता रहा। कुछ देर बाद किताब बोरे में फेंक दी। हमारे कहने पर किताब उठाकर दुबारा वह पोज दिया।

लौटते में सूरज भाई दिखे। हमने उनसे पूछा कि आधी रात में क्यों नहीं चमक रहे थे। अब चमकने से क्या फायदा हब सब तरफ उजाला हो गया है। सूरज भाई बोले-'पगला गए हो का? रात को हमें थोड़ी चमकना होता है। और बुड़बक यह उजाला हमारी ही वजह से तो है।' हमने कहा -उ सब मत बताओ। तुम्हारे ऊपर तोहमत लगानी थी सो लगा दी। रात जब सबसे ज्यादा अँधेरा था तब तुम नहीं चमके तो सुबह जब उजाला हो गया तो तुम्हारा चमकना बेकार है।

सूरज भाई मुस्कराते हुए चमकते रहे। हमारे ऊपर हंस भी रहे होंगे। लेकिन हमने जो हमें जो कहने को कहा गया था , जो तोहमत लगानी थी वह हमने बिना कोई दिमाग लगाये सूरज भाई से कह दिया।

पुल के नीचे देखा। एक आदमी चूल्हे में दाल पका रहा था।दाल चुर रही थी।इस बीच वह आँख बन्द करके झपकी ले रहा था।


दीपा स्कूल के लिए तैयार हो रही थी। उसके पापा रिक्शा लेकर चले गए थे। आज वुधवार को सफेद ड्रेस थी उसकी। कोठरी के अंदर से वह अपनी मुट्ठी में कुछ लाई और मुझे दिखाया। मुट्ठी में उसकी पासपोर्ट साइज फोटो थी। उसके पिता ने बताया था कि उसका आधार कार्ड बनना है। पूछा कैसी है फोटो? हमने कहा-'बहुत अच्छी।' फिर अपने ज्यामेट्री बॉक्स में रखी एक और फोटो दिखाई उसने। उसके भाई की फोटो है वह जो गांव में पढ़ता है इंटर में। अपनी बहन की कोई फोटो नहीं है उसके पास।

हमसे बात करते हुए दीपा बैठकर सीसे में देखते हुए अपने बाल काढ़ती रही। सर में ऊँगलियों से बालों के बीच पगडण्डी बनाते हुए चोटी की। सर का पीछे का हिस्सा दिखाकर हमसे पूछा -'चोटी ठीक हुई पीछे।' हमने कहा-हाँ।


हमने जो फोटो लिए थे वह उसको दिखाए। उसने सब देखे।फिर हमने उसको 'सेल्फी' लेना सिखाया। चार सेल्फी ली बच्ची ने। हमने पूछा-सबसे अच्छी कौन है ? उसने एक फोटो बताई।फिर हमसे पूछा -'आपको कौन सी अच्छी लगी?' हमने बतायी जिसमें वह मुस्करा रही थी। फिर उसने कहा-'मेरे शेरू की भी एक फोटो खींचिए।' शेरू मने उसका कुत्ता। मैंने कहा-'तुम खुद खींचो।' उसने खींची।खुश हुई।

हम लौटकर मेस आ गए। पोस्ट लिख डाली। अब जाते हैं दफ्तर। आप लोग मजे से रहिये। मस्त। बिंदास। मुस्कराते हुए।

Tuesday, October 13, 2015

कितनी मुद्दत बाद मिले हो

सुबह हुई आज 5 बजे। साईकल स्टार्ट हुई 6 बजने में कुछ मिनट पहले। कमरे से देखने पर लग रहा था कि बाहर अँधेरा है। पर बाहर निकले तो ढेर उजाला।कोई सफर शुरू होने पर लगता है कठिन होगा। पर निकलते ही वह सुहाना सा हो जाता है। इसलिए सफर पर निकलने के पहले बहुत सोचना नहीं चाहिए। निकल लेना चाहिए।

पुलिया पर एक आदमी मौनी बाबा टाइप मुंह किये बैठा था। खूब सारे लोग सड़क पर टहलने के लिए निकले हुए थे। फैक्ट्री के सामने दूर तक सामान लेकर आये ट्रकों की लाइन लगी थी। कल छुट्टी थी। कल सामान खाली नहीं हो पाया। आज स्टोर्स का काम बढ़ेगा।

कालोनी की तरफ से निकले। महिलाएं/बच्चियां अपने घर के बाहर सफाई कर रहीं थीं। कोई कूड़े को धक्का सा मारते हुए भगा रहीं थी। कोई प्यार से सहेजते हुए विदा कर रही थी कूड़े को।


सड़क पर महिलायें/बच्चियां हाथ में कांसे के लोटे में जल और थाली में फूल लिए पूजा के लिए निकलीं थीं। नवरात्र शुरू हो गया। एक जगह सात-आठ बच्चियां पूरी सड़क पर चहकती हुई चली जा रहीं थीं। पूजा करके लौट रहीं थीं। बताया-'काली मन्दिर होकर आये। पूजा करके।नवरात्र शुरू हो गए न अंकल।' हमने पूछा-'फोटो खींच लें?' इस पर एक बच्ची ने टीम प्रवक्ता का जिम्मा सम्भालते हुये कहा-'नहीं। हम खुद फेसबुक पर डाल देंगे। आप लाइक कर देना।' हमने कहा-' तुम खींचोगी कैसे? जब खींचोगी नहीं तो डालोगी कैसे? और हम तो तुम्हारे फ्रेंड हैं नहीं। कैसे लाइक करेंगे?' इस पर वो बोली -'अभी घर जाकर खिंचवाएंगे न। भाई खींचेगा। तब डालेंगे ऍफ़ बी पर।'
कांसे से राहत इंदौरी का शेर याद आया:
"वह खरीदना चाहता था कांसा(भिक्षा पात्र) मेरा
मैं उसके ताज की कीमत लगाकर लौट आया।"
रास्ते में दो कीर्तनिये मिले। गले में हारमोनियम और ढोलक लटकाये, गाते-बजाते कालोनी में टहल रहे थे। मथुरा-वृन्दावन से आये हैं। 25 सालों से आ रहे हैं। सुबह-सुबह साफ-सुथरे कपड़े पहने भजन गाते देखकर अच्छा लगा। ढोलक वाले के पैर में कुछ तकलीफ सी थी। लंगड़ाकर चल रहे थे।


आगे एक बच्ची अपनी दादी के साथ टहल रही थी। अंशिका नाम है बच्ची का। दादी बच्ची के सवालों का मुस्कराते हुए जबाब दे रही थी। मैंने सुना जब उसने बताया-'बन्दर उछलकर पेड़ पर चढ़ जाता है।'

आज दो साल की बच्ची कल को बड़ी होकर शायद किसी को बताये--'मुझे सबसे ज्यादा प्यार मेरी दादी करतीं थीं।रोज सुबह टहलाने ले जाती थीं।'

बच्ची-दादी की फोटो खींचकर चलने को हुए तो पता चला कि हमारी पेंट का पाँयचा साइकिल की चेन में फंस गया था। हमारे हाल ऐसे हो गए जैसे किसी सड़क पर स्टेच्यू बोल दिया हो। किनारे खड़े कुछ देर सोचते रहे क्या करें। तीन विकल्प सूझे:

1. पैन्ट खींचकर निकाल लें।
2.पैन्ट उतारकर फिर उसको साईकिल के चेन कवर से निकालने की कोशिश करें।
3. किसी को रोककर चेन से पैन्ट निकलवाने में सहायता करने को कहैं।

पहले विकल्प में पैन्ट फटने का खतरा था। दूसरे में सड़क पर 'छेम-छेम' का डर। तीसरे के लिए कोई दिखा नहीं। हारकर हमने 3 विकल्प निरस्त करके मामला सहज बुद्धि को सौंप दिया। सहज बुद्धि ने रास्ता सुझाया और हमने खड़े-खड़े साइकिल का पिछला पहिया उठाया और दूसरे पैर से आहिस्ते से पैडल चलाते हुए पैन्ट को चेन के बन्धन से मुक्त किया।

अभी कमरे पर आकर दूसरे उपाय के बारे में सोचा तो लगा कि वह तो सम्भव ही नहीं था साईकिल पर सवार होने के चलते मेरे दोनों पैर साइकिल के इधर-उधर 'इस पार प्रिये तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा' वाली स्थिति में थे।

सोच तो यह भी रहे हैं कि साइकिल की चैन ने पाँयचा पकड़ा क्यों? शायद वह रोज पाँयचे को अपने नजदीक से गुजरते, छूकर निकलते महसूस करती होगी। आज मौका मिला होगा अकेले में तो उसने पकड़कर रगड़ दिया होगा आवारा पाँयचे को। कुछ देर तक साथ रहने के बाद फिर शायद बिछुड़ने का मन न हुआ हो। अब अलग होने पर शायद एक दूसरे की याद में डूबें हों। क्या पता।


बिरसा मुंडा चौराहे पर चाय पी। एक आदमी एक झंडा थामे चला जा रहा था। बताया मैहर देवी जा रहे हैं। 25 साल से जाते हैं। बेलदारी करते हैं। पैदल यात्री के साथ दो चप्पल धारी यात्री भी थे। वे दोनों पहली बार जा रहे थे। दूसरा भी मजूरी करता है। तीसरे ने फोटो नहीं खिंचाई। ग्रेजुएट है तीसरा। एम.बी.ए. कर रहा है। हमने कहा-चाय पी लो। वो बोले-जाना है। हमने जो भी फुटकर पैसे थे दे दिए कि जहां रुकना चाय पी लेना। उसने ले लिए। हमें याद आया कि हम जब साइकिल से भारत दर्शन करने निकले थे तो बिहार में एक दरोगा ने अपने पास के सब पैसे हमको दे दिए थे। हमने केवल फुटकर पैसे दिए।यह चिरकुटई है या यात्री का जबलपुर का ही होना यह सोचेंगे।

चाय पीने पर 50 का नोट दिया तो चाय वाले ने नाक बिचकाई। तब तक किसी ने उसको फुटकर रूपये दिए । उसने 45 रूपये मुझे वापस कर दिए।

सड़क की दूसरी तरफ एक बच्चा फूल की माला बना रहा था। प्रकाश नाम है बच्चे का। कक्षा 5 में पढ़ता है। सुबह 6 बजे आया था। अभी पापा आएंगे तब जाएगा स्कूल। 10 रूपये की एक माला है। रात को ठेलिया यहीं खड़ी करके ढंककर फूल सहित घर चले जाते हैं उसके पापा। सुबह प्रकाश आता है। माला बनाता है। फूल बेंचता है। फिर स्कूल जाता है।


लौटते में सूरज भाई एकदम सामने दिखे। चमकते हुए। मुस्कराते हुए शायद गाना भी गा रहे हों:
"कितनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो।"
दीपा से भी मिले। शिकायती लहजे में पूछा उसने-आप कहां रहे इतने दिन। आये नहीं। हमने बताया -घर गए थे। वह पूजा के लिए जा रही थी। बोली-'आप हीनई रुको। हम अब्बी आये। एक मिनट में।' हम बोले-'तुम पूजा करके आओ आराम से। हम फिर आएंगे।' उसके लिए जो बिस्कुट कल शाम ही खरीद के लाये थे देकर हम चले आये।
काली मन्दिर के सामने से गुजरे। तमाम लोग पूजा करने के लिए वहां मन्दिर की सीढ़ियों पर चढ़ते और पूजा करके उतरते दिखे। उसके सामने ही पुल के नीचे मजदूरों के तमाम परिवार चूल्हे सुलगाये देवी पूजा से निर्लिप्त पेट पूजा का इंतजाम करते दिखे।

मेरे सामने ही रेलवे फाटक बन्द हुआ। हम उसके खुलने का इंतजार करते वहीं साईकिल के डंडे के इधर-उधर पैर किये खड़े कुछ देर पोस्ट लिखते थे। दो ट्रेनें गुजरीं। फिर गेटमैन ने चाबी लगाकर बैरियर का ताला खोला। हैंडल से गियर घूमाते हुए 'बैरियर फाटक ' खोला। हम निकलकर आगे आये। इसके बाद सरसराते हुए पैडलियाते हुए मेस पहुंचे।

मेस के फर्श पर देखा चिड़ियाँ फुदक रहीं थीं। फर्श चिकनी थी इसलिए उछल-उछल कर आगे-पीछे हो रहीं थीं। सड़क पर पहुंची तो मटकते हुए चलने लगीं जैसे कोईं माडल रैंप पर कैटवॉक करते हुए चल रही हो।सड़क पर इठलाती हुई चलती चिड़िया बहुत खूबसूरत लग रही। मन किया उससे कह दें-'बहुत खूबसूरत। क्यूट।' पर फिर नहीं कहा। चले आये कमरे पर।कमरे पर पहुंचकर चाय पीते हुए पोस्ट लिखी।

आपका दिन चकाचक बीते। अच्छे से रहिएगा। मुस्कराते हुए। मुस्कराने में कंजूसी मत करियेगा। थोड़ा हमारे हिस्से का भी मुस्करा लीजियेगा।

Monday, October 12, 2015

डू यु नो हू वाज डिस गनेश शंकर?

आज हमारी छुट्टी है।पितृ विसर्जनी अमावस्या की। पर ये स्टेट्स ससुरे किधर फूट लिए। आज जब इनका सबसे ज्यादा काम है तब ये दिख नहीं रहे। लगता है ये भी निकल लिये बिहार चुनाव में।
डर बस यह है कि कहीं कोई बेचारे हमारे निरीह स्टेटस को यह समझकर न धुन डाले कि ये कोई इनाम वापस करने आये हैं। उससे भी बड़ा डर यह कि कहीं कोई हमारे किसी स्टेटस को पकड़कर कोई इनाम न दे दे। यह डर इसलिए ज्यादा बढ़ गया कि आजकल कोई भी इनाम किसी को भी दे दिया जाता है।

हमें हमेशा यह डर लगा रहता है कि कल को हमारा कोई चिरकुट मसखरा स्टेटस हमारे ही इनबॉक्स में सन्देश भेजे- 'डैडी ये देखो हमको गनेश शंकर विद्यार्थी मेडल मिला है। डू यु नो हू वाज डिस गनेश शंकर? एनी आइडिया?'

इनाम हमेशा सुपात्र लोगों को मिलने चाहिए।जैसे अब्बी किन्हीं बादल जी को 'भारत का नेल्शन मण्डेला' बताया गया। कल को नेशनल मंडेला जी के नाम पर किसी इनाम का एलान हुआ तो पहला इनाम सुपात्र होने के नाते बादल जी को मिल ही जाना चाहिए।

सूचना: माननीय प्रात:स्वत: स्मरणीय( अपनी टिप्पणियों से स्वयंम अपना स्मरण कराने वाले) श्री 1008 भाई Mukesh Sharma जी की सलाह पर इस स्टेटस को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाता है। सुबह के 8 बजकर 55 मिनट पर।

Sunday, October 11, 2015

चाहना (प्रमिला के लिए)



मैं तुम्हारे तन की
ताजगी होना चाहता हूँ
तुम्हारे चेहरे की आभा


तुम्हारे हृदय का
उल्लास होना चाहता हूँ
वाणी का स्फुरण

तुम्हारे कण्ठ का
गीत होना चाहता
तुम्हारी जिव्हा का शाप

तुम्हारे श्वास की
सुगन्ध होना चाहता हूँ
मन की उदारता

तुम्हारी चेतना का
चेहरा होना चाहता हूँ
प्रेरणा का प्रकाश

तुम्हारीं आकांक्षाओं का
आगार होना चाहता हूँ
सम्बंधों की घनिष्टता

तुम्हारी पेशानी का
पसीना होना चाहता हूँ
तुम्हारी पीड़ा का पतझड़

मैं फिर से वही
तुम्हारे विश्वास की
खिलती कली होना चाहता हूँ।

-प्रियंकर पालीवाल
'वृष्टि छाया प्रदेश का कवि' कविता संग्रह की
कविता Priyankar जी ने अपनी पत्नी प्रमिला जी
के लिए लिखी। हम लोग कलकत्ता में मिले पिछले माह
तो जबरियन यह रिकार्डिंग हुयी।
अड्डेबाजी हुई शिवकुमार मिश्र के दफ्तर में।

https://youtu.be/IX7_zWQRYHA

Saturday, October 10, 2015

साइकिल की परछाई और काला धन

अनन्य -सुमन
आज सुबह साईकल चलाने नहीं गए। स्टार्टअप में ही फंस गए। मन कुछ ऐसे ही उखड़ा रहा जैसे किसी जनप्रतिनिधि का मन अपने भाषण में कोई बेवकूफी बोलने से रह जाने पर उखड़ा रहता होगा।


यह अपने उखड़े मूड वाली बात हमने ऐसे ही लिखी। इसको उतनी ही गम्भीरता से लिया जाए जितना हमारी बाकि बातों को लिया जाता है। कहना हम जनप्रतिनिधि के भाषण में बेवकूफी वाली बात ही चाहते थे। आप भी समझ ही गए होंगे फिर भी हमने सोचा आपको बता भी दें। वैसे ही जैसे भले लोग बताकर मजाक करते हैं न-ऐसे ही मजाक कर रहे थे, बुरा मत मानना।  

वैसे भी हम साइकिल चलाते हैं तो दोस्त लोग घराने के सवाल करते हैं। कोई कहता है कि हम जब लोगों से बात ही करते रहते हैं तो साइकिल कब चलाते होंगे? कोई पूछता है कि हम साइकिल चलाते हुए लिखते हैं या फिर खड़े होकर। इसी तरह की और बातें। साइकिल का ये होता है जब तक निकलते नहीं तब तक लगता है आज छोड़ा जाये। पर जब निकल लेते हैं तब लगता है फालतू में देर की। बढ़िया हवा, खूबसूरत नजारा और न जाने क्या-क्या।

तो शाम को निकले आठ बजे। वैसे भले न निकलते लेकिन फल लेने जाना था इसलिए निकलना पड़ा। फल इसलिए कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की आड़ में हमने पिछले दो दिन से रात का खाना बन्द कर दिया। फलाहारी हो गए। दो ही दिन हुए हैं यह त्याग किये हुए लेकिन हमने लोगों को बताया ऐसे है गोया सालों से शाम को फलाहार ही करते आ रहे हैं।

बचपन से फल के नाम पर मौसमी फलों आम,अमरुद.तरबूज,खरबूजा खाने के बाद ही खाये थे हमने इसके पहले। व्रत कभी कोई रहे नहीं। ऐसे में रोज शाम को खाने के नाम पर सिर्फ फल खाने की सोचना और उस पर अमल भी करने की बात अटपटी सी लगती है। कुछ ऐसा ही जैसे कोई कहे कि अब से आर टी ओ दफ्तर में लोगों के लाइसेंस बिना दलाली के बनेंगे।

बहरहाल शाम को स्टार्ट किये साइकिल और निकल लिए व्हीकल मोड़ की तरफ। पुलिया के पास एक आदमी ने हमको नमस्ते की।हमने भी बिना पहचाने नमस्ते कर दिया। हम नमस्ते बोलने वाले एक दूसरे के विपरीत दिशाओं में चले गए। हमारे मुंह से निकले नमस्ते क्या पता पुलिया पर बैठे गपिया रहे हों।

सड़क पर साइकिल चलाते हुए अपनी परछाई दिखी। खुद की डेढ़ गुनी काली परछाई देखकर ऐसा ही लगा जैसा समाज में सफेद धन को लगता होगा जब वह अपने से कई गुना होते काले धन को देखता होगा।
सड़क पर लोग टहल रहे थे। पर आहिस्ता-आहिस्ता। एक महिला इतने धीरे-धीरे टहल रही थी जितने आराम से जयमाल के लिए वधुएँ वर की तरफ जाती हैं।

सामने से जो भी गाड़ी आती उसकी रौशनी हमें तो दूर से ही नजर आ जाती पर लगता है गाड़ी वाला हमको हमारे एक दम पास आकर देखता होगा।देखने के बाद भुनभुनाते हुए ब्रेक लगाता होगा।

सड़क किनारे चाट और अंडे की दुकाने ठेलों पर गुलजार थीं। चुटुर-पुटुर सामान वाली दुकानों पर भी चहल-पहल थी। खरामा-खरामा चलते हुए व्हीकल मोड़ पर पहुंचे। एक किलो पपीता,आधा दर्जन सेव,आधा दर्जन केला तौलवा लिया। कुल 90 रूपये खर्च हुए। दो समय के खाने का फल था इतना। मतलब 45/- एक बार का खर्च।

मेस में खाना 50/-रूपये पड़ता है। हम दो दिन के दस रूपये बचाकर खुश हुये लेकिन जल्दी ही इस खुशी पर हमारी ही नजर लग गयी जब मैंने वहां एक पैकेट में अनार के दाने देख लिए। 20/- का पड़ा पैकेट। मतलब जितनी बचत की सोच रहे थे उतने ही पैसे ज्यादा ठुक गए। इसीलिए कहा गया है कि अपनी खुशी ज्यादा जाहिर नहीं करनी चाहिए।

लौटे तो पालीथीन में लगभग दो किलो फल अपनी ऊँगली पर लटकाये रहे। कुछ देर बाद ऊँगली तक गयी तो उसने जिमेदारी अंगूठे पर दाल थी। एक ऊँगली/अंगूठे पर लटकी फल धारण किये पालीथींन साइकिल के चलने के साथ ऐसे हिल रही थी जैसे किसी मन्दिर में लटकता कोई घण्टा जिसे अभी ही कोई बजाकर गया है।

लौटते में परछाई दोगुनी लम्बी हो गयी थी। जाते समय जो परछाई बगल में चल रही थी वह अब हमारे सामने हो गयी थी। जैसे काला धन अब राजनीति और समाज के क्रिया कलापों में आगे-आगे चलता है वैसे ही हमारी काली परछाई हमारे हैंडल के आगे चल रही थी।

कमरे पर लौटकर टीवी खोला तो खबर आ रही थी कि दिल्ली सत्कार के बर्खास्त मंत्री अतीक आलम खान बता रहे थे कि वे राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं। हम रामेन्द्र त्रिपाठी की कविता याद कर रहे हैं:

राजनीति की मण्डी बड़ी नशीली है
इस मण्डी ने सारी मदिरा पी ली है।

अब इतना लिखने के बाद कुछ और रह नहीं जाता सिवाय यह कहने के कि अब इसके बाद फल खाने जा रहे हैं। आपको खाना है तो आप भी आ जाइये।

राजनीति की मण्डली बड़ी नशीली है


आज सुबह साईकल चलाने नहीं गए। स्टार्टअप में ही फंस गए। मन कुछ ऐसे ही उखड़ा रहा जैसे किसी जनप्रतिनिधि का मन अपने भाषण में कोई बेवकूफी बोलने से रह जाने पर उखड़ा रहता होगा।
यह अपने उखड़े मूड वाली बात हमने ऐसे ही लिखी। इसको उतनी ही गम्भीरता से लिया जाए जितना हमारी बाकि बातों को लिया जाता है। कहना हम जनप्रतिनिधि के भाषण में बेवकूफी वाली बात ही चाहते थे। आप भी समझ ही गए होंगे फिर भी हमने सोचा आपको बता भी दें। वैसे ही जैसे भले लोग बताकर मजाक करते हैं न-ऐसे ही मजाक कर रहे थे, बुरा मत मानना। :) 

वैसे भी हम साइकिल चलाते हैं तो दोस्त लोग घराने के सवाल करते हैं। कोई कहता है कि हम जब लोगों से बात ही करते रहते हैं तो साइकिल कब चलाते होंगे? कोई पूछता है कि हम साइकिल चलाते हुए लिखते हैं या फिर खड़े होकर। इसी तरह की और बातें। साइकिल का ये होता है जब तक निकलते नहीं तब तक लगता है आज छोड़ा जाये। पर जब निकल लेते हैं तब लगता है फालतू में देर की। बढ़िया हवा, खूबसूरत नजारा और न जाने क्या-क्या।


तो शाम को निकले आठ बजे। वैसे भले न निकलते लेकिन फल लेने जाना था इसलिए निकलना पड़ा। फल इसलिए कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की आड़ में हमने पिछले दो दिन से रात का खाना बन्द कर दिया। फलाहारी हो गए। दो ही दिन हुए हैं यह त्याग किये हुए लेकिन हमने लोगों को बताया ऐसे है गोया सालों से शाम को फलाहार ही करते आ रहे हैं।

बचपन से फल के नाम पर मौसमी फलों आम,अमरुद.तरबूज,खरबूजा खाने के बाद ही खाये थे हमने इसके पहले। व्रत कभी कोई रहे नहीं। ऐसे में रोज शाम को खाने के नाम पर सिर्फ फल खाने की सोचना और उस पर अमल भी करने की बात अटपटी सी लगती है। कुछ ऐसा ही जैसे कोई कहे कि अब से आर टी ओ दफ्तर में लोगों के लाइसेंस बिना दलाली के बनेंगे।

बहरहाल शाम को स्टार्ट किये साइकिल और निकल लिए व्हीकल मोड़ की तरफ। पुलिया के पास एक आदमी ने हमको नमस्ते की।हमने भी बिना पहचाने नमस्ते कर दिया। हम नमस्ते बोलने वाले एक दूसरे के विपरीत दिशाओं में चले गए। हमारे मुंह से निकले नमस्ते क्या पता पुलिया पर बैठे गपिया रहे हों।


सड़क पर साइकिल चलाते हुए अपनी परछाई दिखी। खुद की डेढ़ गुनी काली परछाई देखकर ऐसा ही लगा जैसा समाज में सफेद धन को लगता होगा जब वह अपने से कई गुना होते काले धन को देखता होगा।

सड़क पर लोग टहल रहे थे। पर आहिस्ता-आहिस्ता। एक महिला इतने धीरे-धीरे टहल रही थी जितने आराम से जयमाल के लिए वधुएँ वर की तरफ जाती हैं।

सामने से जो भी गाड़ी आती उसकी रौशनी हमें तो दूर से ही नजर आ जाती पर लगता है गाड़ी वाला हमको हमारे एक दम पास आकर देखता होगा।देखने के बाद भुनभुनाते हुए ब्रेक लगाता होगा।

सड़क किनारे चाट और अंडे की दुकाने ठेलों पर गुलजार थीं। चुटुर-पुटुर सामान वाली दुकानों पर भी चहल-पहल थी। खरामा-खरामा चलते हुए व्हीकल मोड़ पर पहुंचे। एक किलो पपीता,आधा दर्जन सेव,आधा दर्जन केला तौलवा लिया। कुल 90 रूपये खर्च हुए। दो समय के खाने का फल था इतना। मतलब 45/- एक बार का खर्च।
मेस में खाना 50/-रूपये पड़ता है। हम दो दिन के दस रूपये बचाकर खुश हुये लेकिन जल्दी ही इस खुशी पर हमारी ही नजर लग गयी जब मैंने वहां एक पैकेट में अनार के दाने देख लिए। 20/- का पड़ा पैकेट। मतलब जितनी बचत की सोच रहे थे उतने ही पैसे ज्यादा ठुक गए। इसीलिए कहा गया है कि अपनी खुशी ज्यादा जाहिर नहीं करनी चाहिए।

लौटे तो पालीथीन में लगभग दो किलो फल अपनी ऊँगली पर लटकाये रहे। कुछ देर बाद ऊँगली तक गयी तो उसने जिमेदारी अंगूठे पर दाल थी। एक ऊँगली/अंगूठे पर लटकी फल धारण किये पालीथींन साइकिल के चलने के साथ ऐसे हिल रही थी जैसे किसी मन्दिर में लटकता कोई घण्टा जिसे अभी ही कोई बजाकर गया है।

लौटते में परछाई दोगुनी लम्बी हो गयी थी। जाते समय जो परछाई बगल में चल रही थी वह अब हमारे सामने हो गयी थी। जैसे काला धन अब राजनीति और समाज के क्रिया कलापों में आगे-आगे चलता है वैसे ही हमारी काली परछाई हमारे हैंडल के आगे चल रही थी।

कमरे पर लौटकर टीवी खोला तो खबर आ रही थी कि दिल्ली सत्कार के बर्खास्त मंत्री अतीक आलम खान बता रहे थे कि वे राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं। हम रामेन्द्र त्रिपाठी की कविता याद कर रहे हैं:
राजनीति की मण्डली बड़ी नशीली है
इस मण्डी ने सारी मदिरा पी ली है।
अब इतना लिखने के बाद कुछ और रह नहीं जाता सिवाय यह कहने के कि अब इसके बाद फल खाने जा रहे हैं। आपको खाना है तो आप भी आ जाइये।

आज घर जाना था पर कुछ काम पड़ जाने के चलते जा नहीं पाये सो सबके फोटो ही सही।

पुरस्कार- विरोध बनाम राजनीति

पिछले दिनों कुछ बुद्धिजीवियों की हत्याएं हुईं। कट्टरपंथियों की निंदा हुई। फिर कुछ साहित्यकारों ने अपनी उपाधियाँ और इनाम लौटाए। इस पर साहित्यकारों की कर्मकुंडली बांचते हुए इसको दिखावा बताया और सवाल किया कि उन वीर साहित्यकारों ने ऐसा उस समय क्यों नहीं किया ? ऐसा उस समय क्यों नहीं किया?

ये सवाल इतनी तेजी से किये गए कि जिन साहित्यकारों ने विरोध किया उनका विरोध उनकी अवसरवादिता बना ही साथ-साथ उन बुद्धिजीवियों की हत्याएं के प्रति विरोध भी गड्ढे में चला गया। चूंकि विरोध करने वाले अवसरवादी रहे हैं इसलिए उनका यह विरोध भी अवसरवाद ही होगा।इसलिए उनका विरोध खारिज। मतलब किसी गलत बात का विरोध तभी जायज माना जाएगा जबकि विरोध करने वाला खुद पूरी तरह पाक साफ हो। विरोध करने का अधिकार पवित्रात्माओं के पास सुरक्षित है।

आज जटिल होते आधुनिक समाज में हर व्यक्ति किसी न किसी तरह के समझौते करते हुए जीता है। हर व्यक्ति किसी न किसी सन्दर्भ में कभी न कभी किसी कुछ गलत लोगों के साथ खड़ा हुआ होगा। ऐसे तो समाज का कोई भी व्यक्ति किसी के भी विरोध का हकदार रहेगा ही नहीं।

जिन साहित्यकारों ने बुद्धिजीवियों की हत्याओं का विरोध करते हुए अपनी उपाधियाँ लौटाने की घोषणा की है उनकी तमाम पुरानी अवसरवादी घटनाओं की लिस्ट बताते हुए जितनी जोर से उनकी निंदा हो रही है उससे कट्टरवादियों को लगता होगा कि पूरा समाज हमारे समर्थन में खड़ा है।

आज नई दुनिया के पेज नंबर 14 पर दो साहित्यकारों द्वारा अपने पुरस्कार लौटाने/पद से त्यागपत्र देने की घोषणा की है। इनमें से एक उर्दू उपन्यासकार रहमान अब्बास हैं जिन्होंने अपना 'महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी पुरस्कार' दादरी घटना के विरोध में लौटाने की घोषणा की। दूसरी हैं उपन्यासकार शशि देशपांडे जिन्होंने कन्नड़ लेखक एम एम कलबुर्जी की हत्या पर साहित्य अकादमी की चुप्पी के विरोध में साहित्य अकादमी की सामान्य परिषद से त्यागपत्र दिया।

मैं इन लेखकों के बारे में कुछ नहीं जानता। इंतजार कर रहा हूँ किसी प्रतिक्रिया का जो यह बताएगी की इन्होंने जो किया वह इनकी अवसरवादिता है। इन्होंने यह तब क्यों नहीं किया जब यह हुआ था , जब वह हुआ था।
यह लिखने के बाद सोच रहा हूँ कि कोई हमसे पूछेगा कि तुमने अब यह क्यों लिखा ? उस समय क्यों नहीँ लिखा जब वह हुआ था।

साइकिल का स्टार्ट होना

कल हमने लिखा -साईकिल स्टार्ट करके निकल लिए।

Satish Tewari जी ने पूछा-साइकिल स्टार्ट करके?

मने उनका कहने का मतलब साइकिल कैसे स्टार्ट होती है? भाई। स्टार्ट तो स्कूटी, मोटर साइकिल, कार, ट्रक होता है।साइकिल कैसे स्टार्ट होती है?

असल में हमारा दिमाग इतना अभ्यस्त हो जाता है रोज होती चीजों का कि शब्दों के अर्थ रूढ़ से हो जाते हैं। स्टार्ट का शाब्दिक अर्थ शुरुआत होता है। लेकिन वाहनों और मशीनों के बटन दबाते ही चालू होने के हम इतना आदी हो गए हैं कि हमको लगता है कि कोई चीज बटन दबाते ही चलना नहीं शुरू हुई तो उसको 'स्टार्ट' होना नहीं माना जा सकता।

मेरे हिसाब से साइकिल पर पहला पैडल मारना उसका स्टार्ट होना होता है। शुरू होना। इसी तरह हर काम के साथ होता है। टेलीविजन पर लोग कहते हैं न -'आपका समय शुरू होता है अब! योर टाइम स्टार्टस नाऊ।' जब कहते हैं- 'योर टाइम स्टार्टस नाऊ' तो उसमें कौन चाबी से घुर्र-घुर्र करके शुरुआत होती है। बस खाली समय की गिनती शुरू होने लगती है। परीक्षाएं शुरू होती हैं मल्लब एक्जाम स्टार्ट होते हैं तो उसमें कौन सा इग्निशन होता है। शुरुआत ही तो होती है उसमें भी।

तो भाई जैसे दुनिया की बाकी स्टार्ट होती हैं। वैसे ही हमारी साइकिल भी स्टार्ट होती है। साइकिल को भी स्टार्ट होने का उतना ही हक है जितना स्कूटी का। जितना ट्रक का या फिर किसी और चीज का। है कि नहीं। है न ?
फिलहाल तो एक खुशनुमा सुबह शुरुआत हो रही हैं। लोगों का वीकेंड स्टार्ट हो रहा है। वीकेंड में भी कोई चाभी लगाकर इग्निशन स्टार्ट थोड़ी होता है। बस शुरू हो जाता है जैसे पहला पैडल मारते ही साईकल स्टार्ट हो जाती है।

आपका दिन अच्छा शुरू हो। मंगलमय बीते। जय हो।

Friday, October 09, 2015

ड्राइवरी का पेशा बहुत अच्छा है


शमीम खान और अब्दुल हफीज
सुबह देर हुई आज निकलने में। मन किया न जाएँ टहलने। पर फिर निकल ही लिए। पहले सोचा पैदल चला जाए लेकिन फिर साईकिल स्टार्ट करके निकल लिए। निकलते हुए साढ़े छह बज गए थे सो फैक्ट्री के सामने पटेल की चाय की दुकान तक ही गए।

दुकान पर चाय पीते हुए लम्बी दाढ़ी वाले ड्राइवर अब्दुल हफीज से मुलाकात हुई। 52 साल के अब्दुल हफीज छिंदवाड़ा के रहने वाले हैं। खुद का ट्रक है। चेन्नई से 1700 किमी 3 दिन में जबलपुर आ गए।

हाईस्कूल तक पढ़ाई किये हफीज के चार बेटियां एक लड़का है। लड़का उसी खानदान का नाम रोशन करने की हिंदुस्तानी बीमारी की उपज है। दो बच्चियों के बाद अब्दुल हफीज ने कहा-'ऑपरेशन करा लो,खत्म करो।' पर बुजुर्गों ने कहा वारिस हो जान दो पहले। वारि्सके इंतजार में दो बेटियां और हुईं। अग्रिम उपहार। बेटा हाईस्कूल में पढ़ता है। दो बेटियों की शादी हो गयी।

17 साल की उम्र से ड्राइवरी सीखे अब्दुल हफीज ने नया ट्रक साल भर पहले खरीदा। 17 लाख का। आते-जाते घर जरूर रुकते हैं। हफ्ते में एक चक्कर घर का जरूर लगाते हैं। पूरी नींद लेते हैं। अच्छा खाना खाते हैं। कोई नशा नहीं। बस कभी-कभी पुड़िया खा लेते हैं।

अब्दुल हफीज ने बताया-’ड्राइवरी का पेशा बहुत अच्छा है। लेकिन कुछ ड्राइवरों के चलते बदनाम होता है। इस लाइन में आदमी नशा (दारु,गांजा) न करे, रंडीबाजी न करे और जुआ न खेले तो इससे अच्छा कोई पेशा नहीं कम पढ़े लिखे लोगों के लिए।’


 मेरा नाम लिखते शमीम
52 साल के अब्दुल हफीज की दाढ़ी की उम्र 15 साल है। दाढ़ी और ड्रेस जिस तरह की पहने थे उससे ड्राइवर की छवि से अलग तबके के आदमी लगते हैं। बोले भी-'इसके चलते लोग इज्जत से बात करते हैं।' शरीर में सबसे ज्यादा देखभाल दाढ़ी की ही करनी पड़ती होगी फिर, एक और बच्चे की तरह। यह सुनकर दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले-'हाँ, देखभाल तो करनी पड़ती है।'

जिस गाँव में रहते हैं अब्दुल हफीज वहां 25% घर मुसलमानों के और 75% हिंदुओं के हैं। लेकिन कोई तनाव कभी नहीं होता। उनके घर के सामने ही तीन पीढ़ियों से बना मन्दिर है। किसी ने आजतक उस पर एक कंकर तक नहीं फेंका।

छिंदवाड़ा की बात चली तो वहां के सांसद कमलनाथ की भी बात हुई। बोले-'बहुत काम करवाया कमलनाथ ने। अभी सरकार बदल गयी तो थोड़ा धीमा है काम पर होता रहता है। उनकी सबसे अच्छी बात यह कि वो यह नहीँ देखता कि आप उसके वोटर हो कि नहीं। सबका काम करवाता है। दिल्ली में छिंदवाड़ा हॉउस है। जो भी जाता है उसके पास उसकी सुनता है। काम भी करवाता है। इसीलिये वह कभी हारता नहीं वह।

चेन्नई से जबलपुर 1700 किमी 3 दिन में आने की बात पर बोले-रोड अच्छा है इसलिए आ गए। जबकि टाटानगर से जबलपुर 700 किमी में लोग हफ्ता लगा देते हैं। रोड ठीक नहीं। साथ के शमीम की तरफ इशारा करते हुए बोले-ये तो हमसे एक दिन बाद चले थे चेन्नई से। 48 घण्टे में ही खड़ी कर दी गाडी जबलपुर में।

फिर शमीम से बात होने लगी।35 साल के शमीम 8 वीं पास हैं। 2 साल पहले शादी हुई। अभी बच्चे नहीं हैं। 3 भाई हैं कुल। दो भाई कपड़े का काम करते हैं। अब्बा रिक्शा चलाते थे। अब जब से सब बच्चे काम करने लगे तबसे छोड़ छोड़ दिया। 62 साल के हैं लेकिन सेहत इत्ती अच्छी की आपसे भी कम उम्र के लगें। अभी फोन कर दें तो फौरन आ जायेंगे एक्टिवा पर।


कौन लिखाई ज्यादा खूबसूरत है बताएं
अब्बा से बात होते हुए दादा जी तक पहुंची। दादा जबलपुर में हवलदार थे। मालगुजार। 7 फुट के थे। खूब तगड़ा शरीर। 1962 में जब दंगा हुआ तो उनको पाकिस्तान भेज दिया गया। जब यहां लोग मारे जा रहे थे तो दादा चले गए जान बचाने के लिए। यहां हवेली में सोना-चांदी जो थी जमीन में गाड़ के।

दादा पाकिस्तान पहुंचकर नौकरी करने लगे। यहां उनके बहनोई का इंतकाल हो गया। दादा बहनोई को मानते बहुत थे। आने के लिए वीसा की अर्जी लगाई। वीसा मिला नहीं। फिर वो पैदल रेलवे लाइन के किनारे-किनारे चलते हुए जहां तक रेल मिली नहीं आये। फिर रेल पर बैठकर वापस जबलपुर। यहां हवेली पर सरकार का कब्जा हो गया था। जमीन खोदकर लोग सब माल निकाल ले गए थे।

फिर दादा ने क्या किया? यह पूछने पर शमीम बोले-किया क्या। मंदिर पोती, मस्जिद पोती। रिक्शा चलाया। जिंदगी गुजारी। जिनकी कल तक हवेली थी वो फुटपाथ पर रहे।

शमीम के दादा की कहानी सुनकर मुझे पाकिस्तान के प्रख्यात लेखक मुस्ताक अहमद युसूफ़ी 'खोया पानी' के मिर्जा जी याद आये जो कि बंटवार के बाद पाकिस्तान गए थे। साथ में हिंदुस्तान में छूटी अपनी हवेली की फोटो ले गए थे। किसी से बहस होती तो उसको दिखाते हवेली की फोटो और कहते-ये छोड़ के आये हैं।

खोया पानी अद्भुत व्यंग्य उपन्यास है। इसका हिन्दी अनुवाद लफ़्ज पत्रिका के संपादक तुफ़ैल चतुर्वेदी ने किया है। नेट पर हमारे मित्र काकेश ने टाइप करके डाला है। लिंक मैं नीचे दे रहा। पढ़िए मजा आएगा।

इस बीच अब्दुल हफीज चले गए।अपने ट्रक के पास। शमीम ने बताया उनको बॉडी बिल्डिंग का शौक था। स्टेडियम में दौड़ते लोगों को देखकर बोले-हम भी ऐसे सुबह दौड़ते थे। अब सब छूट गया।

धर्म की राजनीति के मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए शमीम ने कहा-जहां रहे वहां के हिसाब से चलना समझदारी है। अब कहीं कुछ हो रहा और आप वहां हैं नहीं तो आप दूर रहकर क्या कर लोगे? यह भी तो नहीं पता कि सच क्या है।

उर्दू की बात चली तो बोले-हमारी पढ़ाई उर्दू मीडियम में हुई। हिंदी भी आती है। पर अंग्रेजी में हाथ तंग है। मेरा नाम चाय की दुकान की पीठ पर कागज रखकर बताया। बोले- हमारी उर्दू की राइटिंग अच्छी थी। पर जब से स्टेयरिंग पकड़ी तब से कलम छूट गयी।

हमने कहा-'इतना घूमते हो। लिखा भी करो उसके बारे में। ' बोले-'अरे लिखने को तो बहुत है।एक से एक किस्से।कितनी जगहें देखते हैं।लिखें तो गजब हो जाये।' हमने कहा-' लिखा करो न ।'

इसके बाद वो चले गए फैक्ट्री गेट की तरफ। मैं मेस की तरफ। इस तरह यह रहा आज का ‪#‎रोजनामचा‬
आपका दिन चकाचक बीते। शुभ हो। मङ्गलमय हो।

काकेश का लिंक खुल नहीं रहा। उपन्यास ’खोया पानी’ इस लिंक पर पढा जा सकता है: http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx…

Thursday, October 08, 2015

प्यार की ताकत

आज जब सुबह साइकिलियाने तो 6 बज गए थे। किधर चलें सोचते-सोचते गाड़ी हनुमान मन्दिर तक पहुंच गई। लोग सड़क पर निकल लिए थे टहलने। कुछ छोटे बच्चे-बच्चियां सड़क और आसपास की लकड़ी सरपर लादे जा रहे थे। जब निकले होंगे बीनने तो और सबेरा रहा होगा। उस समय वो सब बच्चे अपने घर में आराम की नींद सो रहे होंगे जिनके घर में फेसबुक चलता होगा। बच्चे उठाये जाने पर कुनमुना कर फिर सो जाते होंगे-'मम्मी थोड़ा और। बस एक मिनट कहते हुए।'

एक पुलिया पर छट्ठू सिंह और चार लोगों के साथ बैठे थे। सर पर सहवाग स्टाइल में रुमाल और आँखों में दीप्ति नवल नुमा काला चश्मा धारण किये। दाढ़ी बुद्धिजीवी टाइप खिचड़ी। हम तबियत पूछे तो बोले-'सब एकदम ठीक। कूदने लगे अब तो। भूखे न लगत रहल। एक्को रोटी न खा पावत रहल। अब त छ छ रोटी खा रहे।'
हम बोले-वाह। ऐसे ही स्वस्थ बने रहो। साथ के दो लोग सिगरेट पी रहे थे। हम ठोंके तो एक ने तो आखिरी कश लेकर फेंक दी सिगरेट। दूसरे ने छिपा ली। बची होगी अभी। हम कौन सरकार थे जो हमारे विरोध में वो बची सिगरेट फूंक दें। छट्ठू सिंह ने चलते समय भगवान शंकर की जय बोले। वह सबका भला करें। वह 'हर हर महादेव' नहीं बोले तो हमें भी डर नहीं लगा।

आजकल हर नारा या उद्घोष डराने का काम करता है। लगता है यह नारा नहीं बोला तो बोलने वाला बुरा मान सकता है और बुरा मानने पर तो कोई भी कुछ भी कर गुजरता है आज के समय में।

एक महिला अपनी बच्ची को स्कूल भेजने के लिए शायद रिक्शे का इंतजार कर रही थी। बस्ता सड़क पर रखे किताबें/कापियां सहेज रही थी। बच्ची स्टेच्यू बनी सड़क पर खड़ी थी। मानो जनगणमन गा रही हो।

एक लड़की सड़क पर दौड़ का अभ्यास कर रही थी। दौड़ते हुए कन्धे से हटी टी शर्ट वापस जमा रही थी। कनखियों से बगल से गुजरते लोगों को भी देख रही थी। रिबन में बंधी बालों की चुटिया उसकी पीठ पर सरल आवर्त गति में इधर-उधर हो रही थी। ऐसे लगा कि उसकी चुटिया उसके शरीर का सन्तुलन बनाने का काम कर रही हो जैसे जहाजों में 'जाइरोस्कोप' उनका सन्तुलन बनाये रखते हैं। उस बच्ची के पास से होते हुए आगे निकलने के बाद काफी दूर तक उसके जूतों की आवाज धप-धप आती रही जो कि धीरे-धीरे सुनाई देनी बन्द हो गयी।

रांझी मोड़ पर अख़बार वाले दिखे। ज्यादातर अख़बार बिक चुके थे। आगे सब्जी वाले दिखे।और आगे दो आदमी दिखे जो कि उकडू बैठे एक छुटकी बच्ची से कुछ-कुछ बतिया रहे थे। हंस रहे थे।

चाय की दुकान पर मिसिर जी मिले। सर घुटाये थे। पितृ पक्ष में घुटा दिए थे। सबको ग्लास में चाय दे रहे थे। हमको कप में दिए। एक बस रुकी। बस से एक बच्चा उतरा। तीन ब्रेड लेकर वापस चढ़ गया। हम मिसरा जी से बात करते हुए चाय पीते रहे।

इस बीच एक लड़का वहां आया। निक्कर में जो छापे बने थे वो किसी कम्पनी का विज्ञापन टाइप लग रहे थे। हमको लगा आदमी का शरीर भी विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। हीरो हीरोइन तो करते ही हैं खूब पैसे लेकर। क्या पता कल को किसी कंपनी में कोई एम बी ए पढ़ा हुआ अधिकारी आइडिया दे कि होर्डिंग में लाखों रूपये फूंकने की बजाय गरीब लोगों के शरीर विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल किये जाएँ। उनके बदन पर कम्पनी का विज्ञापन छाप दिया जाये। उनको पैसा दिया जाए। विज्ञापन के साथ भुखमरी का इलाज मुफ़्त में। जिस कंपनी का लोगो धारण किये हुए लोग ज्यादा दिखें समझो वह कंपनी ज्यादा सफल। हो तो रहा ही है यह आज भी।।आगे और अच्छे तरीके से होगा।

बच्चे से बात होने लगी तो पता चला बच्चा सुबह अखबार बेंचता है। 50 अख़बार के 50 रूपये रोज के। फिर एक दुकान से लेकर चिकन सप्लाई करता है। उसके बाद कालेज जाता है। शाम को एक ड्राइविंग स्कूल में जाता है वहां एडमिशन का काम देखता है। 500 रूपये एक एडमिशन के मिलते हैं। फिर रनिंग के लिए और फिर जिम। फिर घर जाकर खाना खाकर सो जाता है। रोज 500 से 600 रूपये की कमाई हो जाती है।

बी कॉम 3 सरे सेमेस्टर में महाकोशल डिग्री कालेज में पढ़ता है बालक। 3 पक्के दोस्त हैं। कभी-कभी कालेज से पिक्चर देखने जाते हैं। तीनों की साझा सहेली है। उसके साथ पिक्चर जाते हैं। सहेली एम ए में पढ़ती है। चार महीने हुए दोस्ती के। तीन पिक्चर देखी इस बीच। सबसे नई 'सिंह इज ब्लिंक' देखी। अच्छी लगी। बाकी दो दोस्त कम जाते हैं। बालक ही ज्यादा जाता है सहेली के साथ पिक्चर देखने।

एम ए में है तो बड़ी होगी। हड़काती होगी। यह पूछने पर बताया बालक ने -'नहीं। अच्छा नेचर है। हड़काती नहीं। अच्छे से बात करती हैं।' पिक्चर का खर्च बच्चा उठाता है।

इसके पहले कोई दोस्त थी? पूछने पर बताया बालक ने -हां एक दोस्त थी न। केवी में हम साथ पढते थे। रोज उससे बात करते थे। दो साल साथ रहा उसका।उसके पापा आर्मी में थे। इंटरमीडिएट करने के बाद उसके पापा ने उसको महाराष्ट्र भेज दिया।

क्यों भेज दिया ? पूछने पर बताया- 'उसके पापा ने उसके पास मेरी फोटो देखी। उन्होंने मेरे घर शिकायत की। मम्मी से कहा। मम्मी ने कहा- ये तो मेरे घर रोज आती है। जब ट्यूशन पढ़ने जाती थी तो रोज आती थी वो मेरे घर। मेरे पापा 1998 में नहीं रहे। सिर्फ मम्मी हैं घर पर। मैं अकेला हूँ।'

अपने किस्से बताते हुए आगे बताया बालक ने- फिर उसके पापा ने उसको महाराष्ट भेज दिया। जब वो जा रही थी तब उसने मुझे स्टेशन बुलाया। मैं गया मिलने। उसके पापा ने देख लिया। फिर वापस नहीं बुलाया उसे। वहीं एडमिशन करा दिया।

उसकी यादें साझा करते छूटे बालक ने बताया- दो साल साथ रहा हमारा। हम पढ़ने में ऐसे ही थे। उसने कहा-तुमको टॉप करना है। हमने किया। 98/99 परसेन्ट नम्बर लाये।

प्यार में कितनी ताकत होती है यह एहसास फिर से हुआ। किसी के प्यार में दशरथ मांझी पहाड़ तोड़ देता है। किसी के प्यार में कोई फिसड्डी बच्चा टॉप कर जाता है।

बालक ने यादें साझा करते हुए बताया-'उसके साथ स्कूल में रहते थे। पिक्चर केवल एक बार गए-बेशरम। प्यार करते थे। रोज किस करते थे। जब गयी तो फोन नम्बर बदल गया। कुछ दिन पहले उसका फोन आया था तब मैंने उसकी बात दीदी (अभी की पिच्चर सहेली) से कराई। उसने किसी दुसरे के मोबाइल से फोन किया था। मेरे पास उसका नम्बर नहीं पर जब मैं पढाई पूरी कर लूँगा तब उसके घर जाऊँगा। उससे शादी करूँगा।'

दीदी के बारे में बताया कि उनकी 8 महीने में शादी होने वाली है।

क्या पता उसका किसी और से साथ हो जाये ? इस पर कहा बालक ने- 'हो जाएगा। तब की बात अलग। लेकिन मेरा तो नहीं होगा। वह भी इंतजार करेगी। मैं लॉ करके वकालत करूँगा। फिर उसके पापा से बात करूँगा। पूछूँगा-बताइये आपको क्या चाहिए अपनी लड़की के लिए। जो चाहिए वो सब करके दिखाऊंगा।'

आपने 4 साल पुरानी बात याद दिला दी।कहते हुए और भी तमाम यादें साझा की बालक ने। लड़की का फेसबुक खाता बालक ने ही बनाया। वह आपरेट नहीं करती। फोन भी नहीं है उसके पास। पापा ने दिया नहीं है। दूसरे के फोन से बात करती है।

पान मसाला खाता है बालक। पर कम। सब टोंकते हैं पर छोड़ नहीं पाता। जेब में बढ़िया स्मार्ट फोन। खूब सारी बातें हुईं बालक से। उसने खुद का नाम भी बताया। पिक्चर दीदी और केवी वाली गर्ल फ्रेंड का भी। फेसबुक एकाउंट भी दिखाया। लिखने के लिए मना भी नहीं किया। लेकिन मैं किसी के नाम नहीँ लिख रहा। मुझे लग रहा है कि बच्चियों के घर वाले कहीं यह पोस्ट देखेंगे तो उन बच्चियों को परेशानी न हो।

दो पीढ़ियों की सोच का अंतर है यह शायद।

आपका दिन शुभ हो।

सामूहिक अच्छाई। सामूहिक सफलता।


Wednesday, October 07, 2015

क्या फायदा पढाई का

अंकुश महोबिया  पुलिया पर
आज दोपहर लंच पर आते हुए अंकुश महोबिया से मुलाक़ात हुई। उम्र 16 साल। शिक्षा कक्षा 4 तक। कंचनपुर में रहते हैं। अभी मामा के पास रिछाई जा रहे थे। तक गये तो रुक गए। पुलिया पर आराम करने के लिए।

4 में जब पढ़ते थे तो रिछाई में रहते थे पिता। रिछाई के स्कूल में ही पढ़ते थे अंकुश। फिर कंचनपुर रहने लगे। स्कूल रिछाई में ही रहा। आने-जाने में परेशानी थी। भटक भी जाते थे कभी-कभी। इसीलिये पढ़ाई छूट गयी। कुछ भी पढ़ नहीं पाता बच्चा।

पढ़ाई छूटने के बाद एक साल मोबाईल की दुकान में काम किया अंकुश ने। मोबाईल पर गेम खेलने का शौक था। जो मोबाइल बनने आते उनके ऐसे ही बटन दबाते रहते। दूकान वाला दस रूपये रोज देता था घर आने-जाने के लिए। वह भी बचा लेते थे अंकुश।

एक साल बाद एक चने की दुकान में नौकरी की। छह साल की। चार महीने पहले छोड़ी नौकरी तब साढ़े चार हजार महीने के मिलते थे। जो पैसे मिलते थे वो घर में दे देते थे। बचत की ।

नौकरी छोड़ने का कारण यह कि पैर में दर्द रहने लगा। घुटने के साथ पेट भी दर्द करता है। कोई इलाज नहीं कराया पर कहते हैं-वात है। हमने पूछा कि इलाज क्यों नहीं कराया? इस पर बोले-'ऐसे ही नहीं कराया।लगा कि अपने आप ठीक हो जायेगा।'


ईंधन के लिए लकड़ी बटोर कर लौटती महिला
हमने अपने सीनियर डॉक्टर शुक्ल को फोन किया। सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद अब पूरे होम्योपैथिक डॉक्टर हो गये हैं। घर पुलिया के पास से गुजरते हैं। हमने पूछा कि अगर वो अभी आ रहे हों तो यहीं दिखा दें बच्चे को।पर उनको अभी आने में देर थी। हमने बच्चे को उनका नाम लिखकर कागज में दिया यह कहते हुए कि इनको जाकर दिखा देना। बच्चा लिखा हुआ पता नहीं पढ़ पाया पर कागज जेब में रख लिया।

अंकुश का छोटा भाई 9 साल का है। बहन 2 साल की। हमने उससे पूछा कि तुमको पढ़ाई करनी चाहिए थी। छोड़ क्यों दी? इस पर वह बोला-हमारा बाप तो पढ़ा लिखा है। लेकिन उसको मजदूर का ही काम मिला। मतलब कहने का कि क्या फायदा पढाई का।

पिता सुशील महोबिया के लिए नाराजगी का भाव भी। बार-बार बाप कहते हुए बात की पिता के बारे में।बोला-जब हमको पढाना चाहिए था तब बाप ने पढ़ाया नहीं। 150 रूपये रोज कमाता है। 90 की दारु पी जाता है। फिर घर का खर्च कैसे चलता है? पूछने पर बोला अंकुश-चल जाता है।ईंधन के लिए लकड़ी बटोर कर लौटती महिला

महोबिया किसलिए लिखते हैं ? क्या महोबे के रहने वाले हैं पिता? पूछने पर बोला-पता नहीं। पर यह पता है की नानी के पापा के पापा महोबे के रहने वाले थे।


बच्चे ने बताया कि उसके पास सैमसंग ग्रैंड 4 मोबाईल था। सेकेण्ड हैण्ड खरीदा था। 20 हजार में। पर वह बाप ने किसी को बेच दिया या दे दिया पता नहीं। एक दिन चार्जर में लगा था। बाप के एक दोस्त का फोन खराब हो गया था। बाप ने उसके कहने पर कुछ दिन के लिए उसको दे दिया अंकुश का मोबाईल। फिर वह वापस नहीँ मिला। दो दिन बाद सिम भी बन्द हो गया।

घर में किसी से पटती नहीं अंकुश की सिवाय दादी के। इसलिए कि -'हमसे कोई कुछ कहता है तो हम फौरन पलट के जबाब दे देते हैं।किसी से दबते नहीं'। बताया अंकुश ने।

हाथ में एक चटकी स्क्रीन वाला छोटा स्मार्टफोन था बालक के। बताया कि यह उसके छोटे भाई का है। हमने पूछा-पटती नहीं किसी से तो भाई का मोबाईल लिए कैसे घूम रहे? इस पर बोला-'ऐसे ही दे दिया उसने। कुछ देर के लिए।'

आगे क्या करोगे पूछने पर बोला -'अब पढ़ेंगे। पिता रोज शाम को पढ़ाता है।अब ठीक से बात करते पापा। दारु कम कर दी है। हमने भी पहले जो मसाला खाते थे वह छोड़ दिया है। अब केवल सुपाड़ी खाते हैं। अगले साल आठवीं में एडमिशन लेंगे।'

डॉ शुक्ल का पता देकर हम चले आये। अंकुश बोला-'कल शाम को जाएंगे पापा के साथ। अगर वो राजी हुए। अभी तो मामा के घर जाएंगे।'

अंकुश से बात करने के दौरान कई महिलाएं सर पर लकड़ियाँ लादे हुए पुलिया के पास से गुजरीं। सुबह से दोपहर तक ईंधन के लिए लकड़ी बटोरकर वे घर लौट रहीं थी।

मैं 'पुलिया पर दुनिया' देखते हुए मेस चला आया।
‪#‎पुलिया‬

रात की ड्यूटी भी एक बवाल है

आज सोचे टहलने न जायेंगे। लेकिन जब उठ गए तो निकल लिए। हनुमान मंदिर की तरफ जाते हुए देखा पांच लोग बीच सड़क पर चौड़े होकर तेजी से टहलते हुए जा रहे थे। लगभग पूरी सड़क की चौड़ाई पांच लोगों के कब्जे में थे। लगभग के बाद बची हुई सड़क से हम आगे निकल गए।

एक अखबार वाला अखबार लिए निकला और यूको बैंक में डालकर चला गया।

सामने से करीब 15-20 बच्चे मस्ती सरीखा कुछ करते हुए आ रहे थे। दो बच्चों से पता किया तो उन्होंने बताया कि वे सब मड़ई में रहते हैं। सुबह 4 बजे निकले हैं टहलने। स्कूल 10 बजे से है।

एक बच्चे ने बताया कि वह 4 में पढ़ता है।उससे पूछा पहाड़ा आता है? उसने कहा-हां। फिर उसने 10 और 11 का पहाड़ा सुनाया। इसके आगे के पहाड़े के लिए उसने मामला अपने दोस्त को सौंप दिया जो कक्षा 7 में पढ़ता है। उसको 22 तक का पहाड़ा आता है। बच्चे ने 19 का पहाड़ा सुना दिया और दोस्तों के साथ भागता हुआ चला गया।

फैक्ट्री के गेट नम्बर 1 के पास की चाय दुकान पर चाय पी। रात की ड्यूटी वाले ड्यूटी पूरी करके घर जा रहे थे। घर जाने से पहले चाय की दुकान पर चाय पी रहे थे।

एक ने बताया कि रात 1 बजे सो गया था वह। बारी-बारी से लोग जागते रहे। रात की ड्यूटी भी एक बवाल है। लेकिन दुनिया भर में लोग करते हैं।दुनिया की प्रगति के लिए सब करना पड़ता है।

चाय की दुकान पर जलेबी छन रही थी। पोहा थाली में सजा था। दो बच्चे उकड़ू बैठे पोहा खा रहे थे।बताया कि दो किलोमीटर दौड़ के आये हैं। हमने पूछा-पसीना तो दिख नहीँ रहा। बोला-सूख गया। जाड़ा पड़ रहा है न।

हम वापस लौट आये। अख़बार आ गया था। ख़बरें सरसरी तौर पर देखीं। आप भी बांचिये:

1. घोटाले के जांच करवाने लोकायुक्त के पास खुद ही पहुंचे प्रमुख सचिव

2.नेहरू की भांजी ने लौटाया साहित्य अकादमी पुरस्कार।

3. दिल्ली में विधायकों का वेतन 4 गुना करने की सिफारिश।

4. जबलपुर और आसपास के जिलों में डेंगू फ़ैल रहा।

5.दादरी काण्ड के चलते हो रही है देश की बदनामी।

यह सब लिखते हुए टीवी पर भी खबरें आ रही हैं। सूरज भाई बाहर से गुडमार्निंग कर रहे हैं। चिड़ियाँ चहचहाने लगीं हैं। सुबह हो गयी है। शुभ हो। मंगलमय हो। जय हो।

एक अनुकरणीय पहल


Tuesday, October 06, 2015

हरेक बहाने तुमको याद करते रहते हैं

 
 

अख़बार पढ़ते अमरनाथ पाण्डेय
सुबह अलसाये पड़े काफी देर तक उन महिलाओं के बारे में सोचते रहे जो अपने बच्चों की सलामती के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। कइयों की तबियत भी गड़बड़ा गई होगी। अधिकाँश इस बात से सहमत होने के बावजूद व्रत रहती हैं कि इससे कुछ होता नहीं पर बच्चे की सलामती के लिए कुछ रह न जाए इसलिए करती हैं व्रत। हमारी श्रीमती जी कई सालों से शुक्रवार को व्रत रखती हैं। बच्चे की सलामती के लिए। अक्सर तबियत खराब होती है शुक्रवार को लेकिन व्रत नहीँ छूटता। कहती हैं छोड़ देंगे पर छोड़ नहीँ पाती। माँ की ममता महान। शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद।

सुबह जब हो ही गयी तो हम भी निकल लिए साइकिल स्टार्ट करके। सूरज भाई निकल आये थे। फूल चार्ज में चमक रहे थे। हमने मुस्कराकर नमस्ते किया तो काम के बहाने इधर-उधर देखते हुये हमको अनदेखा किया। जब किरणों ने चिल्लाकर हमको गुडमार्निंग किया तो सूरज भाई ने भी हेल्लो हल्ला बोला और पूछा-'जग गये?
हमरा मन तो किया कहें -'नहीं सोते में साइकिल चला रहे हैं'। पर कहा नहीं। यही कहा -'बड़े स्मार्ट लग रहे हो भाई जी आज'। इस पर सूरज भाई ने सुबह की बची हुई लालिमा अपने चेहरे पर धारण करके थोडा लजाते हुए धन्यवाद बोला। सूरज भाई को 'लाज लाल' होते देख हम उनको 'हाउ क्यूट' भी बोल दिए। फिर तो बेचारे इत्ते लजा गए कि बादलों की आड़ में जा छिपे।

हम यही सोचते हुए आगे बढ़ लिए कि तारीफ़ इंसान को कितना नरम और मुलायम कर देती है। खूबसूरत लगने लगता है आदमी तारीफ सुनकर।आप आजमा कर देख लीजिये। शुरुआत खुद से करिये। आईने में खुद को निहारिये। तारीफ़ कीजिये और देखिये अपनी बढ़ी हुई ख़ूबसूरती :)

एक लड़की स्कूल का बस्ता लादे सड़क पर चली जा रही थी। चलते-चलते वह किसी प्रश्न बैंक से पढ़ाई करती जा रही थी। हमारे जमाने में गैस पेपर का चलन फाइनल इम्तहान के समय था। अब सारी पढाई ही प्रश्न बैंक के चँगुल में आ गयी है।हमको अपने मित्र राजेश की कविता पंक्ति याद आई:

हमने, अपने प्रश्‍नों के उत्तर,
बस,राम-शलाका में ढूँढे।


 

क्या पता कल को किसी भी समस्या का हल खोजने के लिए रामशलाका प्रश्नावली को कानूनी मान्यता प्रदान हो जाये।

एक आदमी सड़क की बायीं तरफ खड़ा सूरज की तरफ पीठ किये बीड़ी सुलगा रहा था। शायद उसको डर होगा कि सुबह-सुबह बीड़ी पीते हुए सूरज भाई गुस्साने न लगें। पर यह तो मेरा सोचना है। क्या पता वह इसलिए सूरज की तरफ पीठ किये सुलगा रहा हो कि कहीं सूरज भाई मांग न लें-हमको भी लाओ यार एक ।

आगे एक बच्ची बच्चा साइकिल लिए सड़क किनारे खड़ी थी।हमने पूछा क्या पंचर हो गयी साइकिल तो वह उचक कर साइकिल चलाते हुये आगे बढ गयी। पैर मुश्किल से पहुंच रहे थे पर चला ले रही थी आराम से साइकिल। उसके चेहरे पर साइकिल चला लेने का आत्मविश्वास भी पसरा हुआ था।

जिस मैदान में शाखा लगती थी वहां आज एक आदमी मुंह में ब्रश घुसाये खरामा-खरामा दौड़ रहा था। उसकी गति टहलने से भी कम लग रही थी। पर चूँकि वह चलते हुए थोडा उचक भी रहा था तो इसे दौड़ना ही कहा जाएगा।


 
चाय की दुकान पर ड्राइवर पुड़िया में गांजा रगड़ रहा था। बोला अभी सुबह की खुराक लेंगे। फिर दोपहर फिर शाम और फिर रात। दिन में सिर्फ 4 बार लेते हैं। 10 रूपये का एक बार। मूड फ्रेश हो जाता है। हमने पूछा नुकसान भी तो करता होगा । बोला-हाँ,सांस फूलने लगती है। पर क्या करें-आदत पड़ गयी है। छुटती नहीं। हमने कहा-गांजा गुलाम हो गए तुम तो।

हंसते हुए बोला-क्या करें। सब्जी बेंची। दुकान लगाई तब नहीं पिया। लेकिन ड्राइवरी में आये तो उस्ताद बोले-बनाओ बेट्टा। तो हम भी पीने लगे। अब आदत पड़ गयी।

जब नहीं लेते तब क्या करते हो? इसका जबाब देते हुए बोला-'क्वार्टर लगा लेते हैं। सब ड्राइवर ऐसा ही करते हैं। लाइन ही ऐसी है यह ड्राइवरी की।' फिर सड़क पर जाते एक ऑटो ड्राइवर की तरफ इशारा करते हुए बोला-वो देखो वो जा रहा है क्योलारी में।कच्ची पीने।

पास खड़े होने से कुछ धुंआ मेरे पास आया तो हमने कहा -तुम तो हमको भी पिला दे रहे बीड़ी। इस पर उसने आधी पी हुयी बीड़ी फेंक दी।

चाय की दुकान के पास ही एक आदमी अख़बार पढ़ रहा था। पता चला कि वो सीओडी में काम करता है।नाम अमरनाथ पाण्डेय। उम्र 35 साल। पिता नहीं रहे 1993 में। उनकी जगह 2000 में नौकरी लगी। लेबर के पद पर। समझ लीजिये 7 साल लग जाते हैं अनुकम्पा के आधार पर नौकरी लगने में। इनके मामले में शायद कम उम्र भी एक कारण रही हो देरी से नौकरी लगने में।

रोज करीब 200 अख़बार बेंच लेते हैं अमरनाथ। सुबह 4 बजे से शुरू करके सब अखबार बाँट लेते हैं। एक बच्चा है जो कि 7 वीं में पढ़ता है।

अमरनाथ के पिता प्रतापगढ़ के रहने वाले थे। इलाहाबाद से 50 किमी दूर। 1983 में जब हम साइकिल टूर पर गए थे तो अभ्यास के लिए प्रतापगढ़ गए थे। पहली सबसे लंबी यात्रा साइकिल से 100 किमी की।
लौटते में एक अनजान नंबर से फोन आया। किनारे खड़े होकर बात की तो पता चला कि गुंजन का फोन था। गुंजन हमारे वही दोस्त हैं जिनका जिक्र किया था कल हमने कि उनको हमसे शिकायत थी कि हम उनके साथ ज्यादा नहीँ रहते। गुंजन को Amit ने बताया तब उन्होंने फोन किया।

हमने बताया कि कल हमने बिना नाम लिए उनका जिक्र किया था। फिर यह भी पूछा कि अब कभी याद करते हो कि नहीं? इस पर गुंजन ने बताया-याद करते रहते हैं। मेरे फेसबुक मित्र भी हैं वो। श्रीप्रकाश श्रीवास्तव नाम से। हमने कहा हमें तुम्हारा नाम गुंजन के अलावा और कुछ याद नहीं रहता। न रहेगा। फिर कालेज की याद करते हुए गुंजन ने बताया कि हम उनको चाय की दुकान पर कविता सुनाते थे। चाय पिलाते थे।

गुंजन अभी बिहार सरकार में अधिकारी हैं।आजकल कैमूर में पोस्टेड हैं। दो बच्चे हैं। एक बच्चा आर्मी में है। अरुणाचलम प्रदेश में पोस्टेड है। दूसरा गाजियाबाद में पढ़ रहा है। इंजियनियरिंग कालेज में। 30 साल बाद बात हुई। क्या बात है गुंजन। अमित। जय हो।

लौटे तो पुलिया पर एक बुजुर्ग बैठे थे। नाम जगदीश प्रसाद। उम्र 78 साल।यहां शोभापुर में रहते हैं।बेटा-बहू प्रोफेसर हैं।बेटा हितकारिणी में पढ़ाता है।बहू बरगी में।दो बेटे सिहोरा में गाँव में खेती करते हैं। बोले-जिसका जैसा भाग्य वो वैसा निकल गया।

78 की उम्र में अच्छे स्वास्थ्य की तारीफ की तो बोले-सुविधाएं हैं हर तरह की इसीलिये ऐसा है।
हम चले आये वापस। नेट की सुविधा का उपयोग करते हुए आज का यह रोजनामचा आपको पढ़वा रहे हैं।
शाहिद रज़ा का यह शेर दोहराते हुए:

हरेक बहाने तुमको याद करते रहते हैं
हमारे दम से तुम्हारी दास्तान बाकी है।

आपका दिन चकाचक बीते। खुशनुमा रहे।

नेकी कर फेसबुक पर डाल

राजू पटेल मिले आज दोपहर को पुलिया पर। इनको पहली बार रामफल यादव के साथ देखा था। फिर कई बार देखा। इतवार को अक्सर रामफल के पास बैठे मिलते।

आज मिले तो बताया कि दादा (रामफल) नहीं रहे। हमने कहा-'हां हमको पता है।'

राजू पटेल कुछ रूपये गिन रहे थे। हमको आते देखा तो रूपये जेब में रखकर बात करने लगे। हमने हाल-चाल पूछा तो बोले--'हाल बेहाल हैं। काम नहीं मिल रहा। रेत महंगी हो गयी है। बिल्डिंग का काम बन्द है। सुबह से गए थे। कोई काम नहीं मिला। अब घर जा रहे हैं।'

हमने कहा- 'बिल्डिंग का काम नहीं मिल रहा तो कोई और मजदूरी का काम करो।' राजू बोले-'कहीं कोई काम नहीं मिला। अभी तक बैठे थे।'

बातचीत करते हुए घर में राशन पानी न होने की बात कही राजू ने। हम कोई काम मिल जाने की आशा बंधाने लगे। वो अपनी परेशानी बताने लगे। भविष्य की आशा और वर्तमान की हताशा में कुश्ती होने लगी।

इस बीच राजू ने कुछ पैसे उधार मांगे। राशन के लिए। मैंने हिचकते हुए मना कर दिया-अभी पास में नहीँ हैं। पिछले 3 साल में जिनको को मैंने उधार पैसे दिए, वापस नहीं मिले। रकम बहुत छोटी होने के साथ ही जिन लोगों को पैसे दिए वे बहुत कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोग रहे इसलिए ज्यादा अफ़सोस नहीं हुआ। लेकिन जब भी कोई उधार माँगता है तो लगता है कि ये पैसे हमारे पास से सदा के लिए विदा हो रहे हैं। हमारे मना करने के पीछे यही याद हावी थी।

मना करने के बाद हम फिर से काम मिलने की आशा बंधाने लगे राजू को।उसने कहा कोई बात नहीं। नहीं है तो कोई बात नहीं। हमको नन्दन जी की कविता पंक्ति याद आई:
नदी की कहानी कभी फिर सुनाना
 मैं प्यासा हूँ दो घूंट पानी पिलाना।

हमको अपने मना करने का अफ़सोस हुआ। पैसे न होने की बात भी झूठ थी। फिर हमने पूछा-'अच्छा कित्ते पैसे चाहिए।'

जो बताये हमने जेब से निकाल कर दे दिए। तीन दिन पहले मॉल में जंक फ़ूड खाने में जितना पैसा खर्च हुआ था उससे आधे पैसे ही मांगे थे राजू पटेल ने। वह भी उधार। हम कूड़ा खाना खाकर कब का भूल गए। पर उस खर्च का आधा पैसा (उधार में दिया) न जाने कब तक याद रखेंगे।

'नेकी कर दरिया में डाल' अब लागू नहीँ होता। दरिया सब सूख गयीं हैं। दूसरी बात दरिया में कुछ डालने पर बवाल हो जाता है। कल बनारस में हुआ ही। इसलिए हमने सोचा इसको फेसबुक पर डाल देते हैं। 'नेकी कर फेसबुक पर डाल।'

कहने को तो हम यह भी कह सकते हैं कि कोई नेकी-वेकी नहीँ की। फोटो खींची थी। डाल रहे थे तो साथ में नेकी भी डाल दी। smile इमोटिकॉन

क्या पता यही सच भी हो। smile इमोटिकॉन
‪#‎पुलिया‬
राजू पटेल पुलिया पर। आज भी काम नहीँ मिला।

क्या बात है भाई -वाह


Monday, October 05, 2015

अरे कहां के सौ साल

दोपहर बाद जब लंच के बाद दफ्तर जा रहे थे तो ये भाई पुलिया शैया पर आरामफर्मा मिले। हम दूर से फोटो खैंच लिए। डिस्टर्ब नहीं किये। पर जब हम पास से गुजरे तो भाईजी ने सर उठाकर जायजा सा लिया।

अब जब हम देखे कि जग ही गए हैं भाई जी तो बतियाने लगे। पता चला भाई जी सन्दूक, टीन के सब सामान लगाकर अलमारी से पीपा तक का मरम्मत का काम करते हैं। सामने साइकिल के हैंडल पर कब्जे लटके थे जैसे हैंगर पर कपड़े लटकाये जाते हैं।सुबह चले थे घर से। दोपहर हो गयी। तक गए तो पुलिया पर सुस्ताने लगे। कलीम नाम... बताया भाई जी ने।

सुबह निकलते हैं तो दिन भर में 300 से 400 रूपये कमाई हो जाती है। कभीं नहीं भी होती। लेकिन ऐसा कम होता है।

54 साल के कलीम के 4 बच्चे हैं। दो लड़के दो लड़कियां। लड़कियों की शादी हो गयी। दोनों दामाद पल्लेदारी करते हैं। लड़के दोनों भी अलमारी बनाने का काम करते हैं। किन्ही महबूब भाई के यहां। बड़े लड़के की शादी जल्द ही होने वाली है।

बचपन से जबलपुर में थे। पिता जीसीएफ में काम करते थे। 30 साल से भी पहले नहीँ रहे।

उम्र की बात चली तो बोले कलीम-अपनी तो उम्र हो गयी अब। हमने कहा-अरे अब्बी तो 54 के हुए। आधी उम्र बीती। आधी बाकी। इस पर बोले कलीम-अरे कहां के सौ साल। आदमी 60 से 70 तक चल देता है। एक और आदमी वहां खड़ा था। उसने भी 70 की उम्र पर ही मोहर लगाई। हम अकेले पड़ गए उम्र के मामले में। कुछ बहस करने लायक न थे। चुप रह गए।

रद्दी चौकी में रहने वाले कलीम से पूछा कि रद्दी चौकी नाम क्यों पड़ा उस मोहल्ले का। क्या वहां रद्दी की बहुत दुकाने हैं। इस पर कलीम ने कहा- पता नहीं। शायद इसलिए कहते हों क्योंकि वहां बहुत गन्दगी रहती हो जब नाम पड़ा।

हम कुछ बोले नहीँ। मन किया दादरी में हुई घटना के बारे में कुछ पूछें कि एखलाक के मरने पर उसका क्या कहना है लेकिन यही सोचकर कुछ पूछे नहीं कि लोग कहेंगे-पुलिया के बहाने राजनीति कर रहा है अगला।क्या पता कोई सेकुलर कह दे या फिर कोई कट्टरपंथी। लफ़ड़ा है कुछ भी पूछना।

बात करके चले गए फैक्ट्री। कलीम बैठे रहे। कुछ देर बाद चले गए होंगे।
‪#‎पुलिया‬

केवल दो गीत लिखे मैंने

दो दिन पहले गीतकार राजेन्द्र राजन के प्रसिद्द गीत 'केवल दो गीत लिखे मैंने' का एक बंद 'वाह भाई वाह' कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। मैंने उसे रिकार्ड कर लिया। सुनिये इस प्यारे गीत का मुखड़ा। पूरा गीत साथ में दिया है।
केवल दो गीत लिखे मैंने
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केवल दो गीत लिखे मैंने
इक गीत तुम्हारे मिलने का
 इक गीत तुम्हारे खोने का

सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरों
नदियों-नदियों, लहरों-लहरों
विश्वास किये जो टूट गए
कितने ही साथी छूट गए
पर्वत रोये-सागर रोये
नयनों ने भी मोती खोये
सौगन्ध गुंथी सी अलकों में
गंगा-जमुना सी पलकों में

 केवल दो स्वप्न बुने मैंने
इक स्वप्न तुम्हारे जगने का
 इक स्वप्न तुम्हारे सोने का

बचपन-बचपन,यौवन-यौवन
बन्धन-बन्धन, क्रंदन-क्रंदन
नीला अम्बर, श्यामल मेघा
किसने धरती का मन देखा
सबकी अपनी है मजबूरी
चाहत के भाग्य लिखी दूरी।
मरुथल-मरुथल,जीवन-जीवन
पतझर-पतझर,सावन-सावन

 केवल दो रंग चुने मैंने
इक रंग तुम्हारे हंसने का
इक रंग तुम्हारे रोने का।

केवल दो गीत लिखे मैंने
इक गीत तुम्हारे मिलने का
इक गीत तुम्हारे खोने का।

-राजेन्द्र राजन

https://www.youtube.com/watch?v=EQ8DL9mK3kk 

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