Tuesday, January 19, 2016

रोजगार की भाषा सबसे तेजी से सीखते हैं लोग

धूप स्नान वाले तख्त खाली हो गए थे शाम को
कल शाम को क्लास खत्म होने के बाद हम लोग समुद्र तट पर घूमने निकले। जिन तख्तों पर दिन में लोग धूप सेंकते दिख रहे थे वे अब सब खाली थे। तख़्त जो सुबह जिंदगी से लबरेज दिख रहे थे वे बेजान से पड़े थे रेत पर। लोग तख्तों पर पड़े गद्दे समेट रहे थे। तख़्त भी एक के ऊपर, एक की पीठ दूसरे से सटा कर, रख रहे थे।

गद्दे समेटती हुई एक महिला से बात की तो पता चला की धूप सेंकने वाले तख्तों का किराया 100 रुपया है। लेकिन अगर खाना वगैरह दुकान से ही लिया जाता है तो तख्त पर मुफ़्त में धूप सेंक सकते हैं।

महिला कर्नाटक के किसी गाँव से आई है यहाँ काम करने। 15-20 सालों से हर साल आती है। छह महीने टूरिस्ट सीजन में रहती है यहां। फिर वापस गाँव चली जाती है। गाँव में खेती है। पति भी और बच्चे भी साथ में आते हैं। बीच किनारे होटल में काम करने का खाने और रहने के अलावा 3000/- महीना मिलता है। पति को 5000/- महीना मिलता है। वह खाना बनाने का काम भी करता है।


कमला कर्नाटक  से आई है गोवा
कमला नाम है महिला का। उससे कहता हूँ -'आप हिंदी बहुत साफ़ बोलती हैं। कहाँ से सीखी।' वह धन्यवाद देते हुए कहती है-'यहीं काम करते हुए सीखा सब।' रोजगार की भाषा सबसे तेजी से सीखते हैं लोग। जो भी भाषा रोजगार का साधन बनेगी, लोग उसको सीखेंगे लपककर।

आगे एक नाव के पास तीन लोग बैठे अपना जाल ठीक कर रहे थे। एक लड़का एक तरफ से काटता सा जा रहा था जाल, दूसरा लड़का एक चाकू जैसी सलाई से जाल सिलता जा रहा था। हम लोगों से बात करते हुए वे दोनों अपना काम भी करते जा रहे थे। बताया कि यहाँ बड़ी मछली पकड़ना मना है। सिर्फ छोटी मछली पकड़ सकते हैं। कल एक पेटी मछली पकड़ी उन लोगों ने। उनसे अलग एक अधेड़ उम्र का आदमी चुपचाप तल्लीनता से अपने काम में जुटा था।

समुद्र तट पर सैलानी अलग-अलग तरह से आनन्द ले रहे थे। कुछ लोग आती-जाती लहरों को देखते हुए पाँव भिगा रहे थे।जोड़े और परिवार के साथ आये लोग फोटो भी खींच रहे थे। कुछ लोग नहा रहे थे, पानी में किल्लोल कर रहे थे। कुछ बच्चे तट पर ही वालीबॉल खेल रहे थे।


मछली पकड़ने का जाल ठीक करते मछुआरे
एक परिवार समुद्र तट पर बैठा था। तीन पीढ़ियों वाले इस परिवार की सबसे छोटी बच्ची, जिसकी उम्र साल दो साल की होगी, खिलौनों से खेल रही थी। उसके पास प्लास्टिक का एक हजारा टाइप था उसमें पानी भरकर रेत की क्यारियां सी बनाकर वह उनको पानी से सींच रही थी। हम लोगों ने बच्ची की तारीफ की तो उसकी युवा माँ प्रमुदित होकर मुस्कराती हुई उसकी तरफ देखती रही। बच्ची इन सब से बेखबर रेत की क्यारियों को सींचती रही।

इस बीच एक जीप वहां आई और खड़ी हो गयी। समुद्र तट और यात्रियों की सुरक्षा के लिए कुछ सुरक्षा कर्मी थे जीप के अंदर।

दिल्ली से आया नौजवान जोड़ा
आगे चलकर देखा कि एक युवा जोड़ा समुद्र तट पर फोटोग्राफी कर रहा था। शायद नवविवाहित रहे हों। युवा अपनी साथिन की फोटो अकेले ले रहा था। अलग-अलग पोज में। हमारे साथ के एक साथी ने स्वयंसेवक की तरह उनके साथ के फोटो खींचने का प्रस्ताव किया। वह खुश हो गया। हम भी। इसके बाद उनके कई फोटो उनके ही कैमरे से लिए। एक फोटो हमने भी ले लिया अपने कैमरे, पूछकर। दिखाया भी उनको।

सूरज की किरणें समुद्र तल पर

चलते समय बताया उन लोगों ने कि वे दिल्ली से आये हैं। उनसे बातचीत करते हुए और अभी यह टाइप करते हुए सोच रहा हूँ कि घूमने-फिरने के दौरान जान-पहचान होने की गति कितनी तेज होती है।

नाव समुद्र से निकाल कर वापस ले जाते लोग
सूरज की किरणें पानी की लहरों को चमकाने का काम करने में लगी हुई थीं। तट की तरफ भागती लहरें किरणों की चमक से जगमग करने लगतीं। लेकिन जगमग तो लहरों की सतह के ऊपर वाला भाग कर रहा था। उसके नीचे का पानी जो ऊपर के पानी को अपने ऊपर लादकर आगे ला रहा था वह तो अँधेरे में ही बना रहा। गुमनाम। लहर के ऊपरी, चमकते, हिस्से के लिए नींव की ईंट बना।

सूरज भाई बादलों के बीच लुकते, छिपते क्षितिज की तरफ बढ़ते जा रहे थे। उनका विदा होने का समय होता जा रहा था। देखते-देखते बिना हमसे टाटा-बॉय-बॉय किये वे समुद्र के अंदर कब डुबकी लगा गए पता ही नहीं चला।
चाय की दूकान पर अनूप शुक्ल , राजीव कुमार, रघुनंदन मिश्र और सुधीर श्रीवास्तव

आगे एक दूकान पर बैठकर चाय पीने की सोची। 60 रूपये की एक चाय। बड़ा बियर टाइप मग भर चाय का दाम था यह। हमने दो चाय का आर्डर दिया और वाई-फाई फ्री देखकर मोबाईल का वाई-फाई खोला। फटाफट कई वाई-फाई कनेक्सन खुल गए। हर कनेक्सन यूजर नेम और पासवर्ड मांग रहा था। हमने दुकान वाले से पूछा तो उसने पूछा-'खाने का आर्डर किया क्या? ' हमने कहा -'चाय का किया है न।' इस पर उसने कहा-'चाय पर थोड़ी वाई-फाई फ्री होता है।'

लेकिन एक हमारे मित्र यूजर नेम पासवर्ड की खिड़की को स्किप करके इंटरनेट जुड़ गए और हमारी जलन का पात्र बने। हमारे मोबाइल ने इस तरह स्किप करके जुड़ने से इंकार कर दिया । हम फिर अपने मोबाइल नेटवर्क वाले नेट से जुड़े और कट भी लिये क्योंकि बैटरी खर्च हो रही थी।

जिस बालक ने हमको नेट का पासवर्ड बताने से मना किया था उससे फिर अपने खूब सारी ग्रुप फोटो खिंचवाये। एक बार ठीक नहीं आई तो दुबारा खिंचवाए। इस तरह उसको उसकी 'बदमाशी' की सजा दी।
बालक से बात करने पर पता चला कि वह उडीसा के एक गाँव से यहां आया है। तीन महीने पहले। इंटर की पढ़ाई किया है। उसके गाँव के कई लोग हैं यहां। उनके ही साथ वह यहां आया है। 8000/- महीना देता है दुकान वाला उसको।

चाय आई तो दो चाय को चार कप में डालकर पिया चारो मित्रों ने। पीकर 120/- रूपये दिए तो पता चला दूध वाली चाय 70 रूपये की है। 20/- और देने पड़े।

लौटते हुए वह युवा जुड़ा जिसकी फोटो हम लोगों ने खींची थी फिर मिला। और बातचीत हुई। वे दोनों ही लोग लखनऊ के रहने वाले हैं। कैसरबाग और अमीनाबाद के। हर साल आते हैं गोवा घूमने। पिछले साल फ़रवरी में आये थे। पास के होटल में रुके हुए हैं। हफ्ते भर रुकने के हिसाब से आये हैं यहां।

शाम गहरा रही थी। एक जगह देखा कि जो नाव समुद्र में थी उसको खींचकर लोग बाहर लाये और एक हाथगाड़ी में लादकर रेत में घसीटते हुए दुकान के अंदर ले गए। धूप में पड़े तख्तों के गद्दे इकट्ठा करके एक जगह जमाकर मोमिया की चद्दर से ढंककर रखते लोग दिखे।

एक महिला अपनी छोटी बच्ची को साथ लिए रेत को अपनी हथेलियों में गट्टे की उछालती हुई खेल रही थी। रेत को उछालकर सीधे हथेली में रखती फिर उछालकर हथेली पलटकर उसमें कैच करती रेत को। उसकी बच्ची भी रेत को अपने हिसाब से रूप देती खेलने में मगन थी।

समुद्र तट पर अँधेरा सा हो चला था। लोग तेजी से टहलते हुए वापस आते-जाते अपने ठीहे पर लौटते दिखे। बीच किनारे ढाबों में मेजों पर लालटेन सरीखी जल गयीं। हम वापस लौट आये, थोड़ा भटकते, पूंछते हुए। गेट पर चौकीदार से बात हुई तो उसने बताया कि उड़ीसा से आया है वह। और भी कई साथी हैं उसके उड़ीसा से। एक सुरक्षा एजेंसी के माध्यम से यहां काम मिला है। छह महीना रहते हैं। आठ से आठ 12 घण्टे की ड्यूटी के महीने के 12 से 15 हजार मिलते हैं।

शाम को खाना खाकर निकले तो खाने की और अन्य दुकाने गुलजार थीं। शराब की दुकानों पर लोग जमा थे। मेन रोड पर आये तो एक युवा लड़का मोपेट पर आया और पूछने लगा मोटर साइकिल, कार, टैक्सी चाहिए किराये पर तो बोलिये। मोटर साइकिल का किराया 350/- प्रतिदिन।

हमने उससे पूछा कि आजकल यहां किस देश के सैलानी सबसे ज्यादा आये हुए हैं। उसने बताया कि रूस और इंग्लैंड के। लेकिन रूसी लोग कंजूस होते हैं। खर्च नहीं करते। क्या करें उनका रूबल कमजोर हो गया है। इंग्लैण्ड के भी ऐसे ही हैं। इंडियन टूरिस्ट आर द बेस्ट।

उसने बिना पूछे अपना नम्बर दिया और किसी जरूरत पर फोन करने को कहते हुए चला गया। हम भी खरामा-खरामा टहलते हुए वापस आ गए।


यह हमारा गोवा का पहला दिन था।

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Monday, January 18, 2016

हंसने के लिये किसी भाषा की दरकार नहीं होती

सुबह अलार्म बजा तो जगे। घर फ़ोन करने के लिये नम्बर मिलाने की कोशिश किये तो पता चला नेटवर्क गोल। बाहर निकले। फ़ोन किया और टहलने निकल लिये।

शर्ट और घुटन्ना धारण किये हुये ही बाहर निकल आये थे। सर्दी नहीं लग रही। कल रात जब उतरे थे जहाज से तो तापमान 28 डिग्री बताया गया था।

सुबह के छह बजे ऊंघ रहा है गोवा। बल्कि सोया हुआ है। सडक पर केवल कुत्ते, होटलों के दरबान और हम जैसे लोग टहल रहे हैं। कुछ पक्षी आपस में एक दूसरे को गुडमार्निंग कर रहे हैं। बीच बीच में कोई गाड़ी सुबह की शांति को कुचलकर निकल जाती है।

एक नाले के ऊपर लगा हुआ है गोवा का मानचित्र। बताता है कौन जगह है। कितनी दूर है। दूर से देखने में आकर्षक लगता है मानचित्र। लेकिन पास से जब देखते हैं तो उसके केवल एक फ़ीट नीचे नाले का पानी बहता दीखता है तो सारा ध्यान नाले पर अटक जाता है। चमक-दमक वाली तमाम चीजों के अन्दर का सच कुछ ऐसा ही होता है शायद।

होटल के दरबान से पूछ्ते हैं चाय किधर मिलेगी? वह जो जगह बताता है उतनी दूर जाने का मन नहीं होता। कमरे में रखे चाय का इंतजाम, दो-तीन मिनट की दूरी पर कलंगट बीच, सुबह नौ बजे से क्लास का इंतजाम तथा मोबाइल की बैटरी 20% ही यह सब मिलकर आगे जाने से रोकते हैं। हम वापस चल देते हैं।

हमारे दिन-प्रतिदिन के कार्यकलापों में मोबाइल का दखल इस कदर हो गया है कि मोबाइल की बैटरी कितनी चार्ज है यह भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल हो गयी है।

बीच की तरफ़ जाते हुये होटल के बाहर बैठे दरबान से चाय के बहाने बात करते हैं। वो बताता है कि चाय यहां आठ बजे से पहले नहीं मिलती। बीच पर कोई दुकान नहीं। लेकिन आठ बजे के बाद लोग साइकिल पर चाय का कंटेनर लादे चाय बेचते दिखाई देंगे।

दरबान की आवाज से बंगला भाषी होने की भनक मिलती है। बताता है कोलकता का है। छह साल पहले आया है यहां रोजी-रोटी के सिलसिले में। परिवार वहीं है।

दूध के पैकेट रखे हुये हैं बाहर। आधा किलो का पैकेट 16.50 का है।

घूमने के लिये मोटर साइकिल किराये पर मिलती है। 500 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से। फ़ेस्टीवल सीजन खतम हो गया है गोवा में लेकिन टूरिस्ट सीजन मार्च तक चलेगा।

बीच की तरफ़ जाते हैं। समुद्र की लहरों की आवाज दूर से सुनाई देती हैं। लहरें मानों समुद्र का पानी तट पर लाकर पटक दे रही हैं। लेव संभालों कहते हुये अगली खेप के लिये वापस समुद्र की तरफ़ चल देती हैं। रात को तट की तरफ़ आती हुयी लहरें चन्द्रमा की रोशनी में चमकती दिखाई दे रहीं थीं।

होटल पर लौटते हैं तो एक विदेशी जोड़ा बीच की उम्र का बाहर कुर्सी पर बैठा है। कुछ अन्दर लाबी में इन्तजार कर रहे हैं। उनसे कुछ पूछते हैं तो भाषा की दीवार बीच खड़ी हो जाती है। लेकिन इशारों में बातचीत करने पर पता चलता है कि वे रूस से आये हैं। घूमने के लिये। अंग्रेजी कम जानने का इशारा उंगली और अंगूठे को एक इंच की दूरी पर रखते हुये बताया - ’इंगलिश चूं चूं। मतलब अंग्रेजी कम आती है।’

इसके बाद वह शायद रूसी भाषा में कुछ बोलता रहा। हम कुछ समझ न पाये। वह कुछ मजेदार डायलाग बातें भी बोल रहा होगा क्योंकि उसकी बातें सुनकर उसकी साथिन हंसती जा रही थी। महिला का हंसना साफ़ समझ में आ रहा था। हंसने के लिये किसी भाषा की दरकार नहीं होती।

होटल का रिशेप्सनिस्ट बताता है कि हफ़्ते भर से आये हुये हैं ये लोग। इनका गाइड आयेगा तब इनको घुमाने ले जायेगा।

होटल में नेटवर्क गोल है। इंटरनेट कनेक्शन होटल से मिला है। एक हफ़्ते का वाई-फ़ाई चार्ज 1200 रुपये लिखा है कागज पर। वह भी किसी एक ही डिवाइस के लिये। चाहे मोबाइल चला लो या फ़िर लैपटाप। मेेरे मोबाइल में तो इंटरनेट है ही। बाहर निकलेंगे भड़ से आ जायेगा। इसलिये मैं लैपटाप पर ही वाई-फ़ाई कनेक्शन करता हूं। इसमें भी मोबाइल की बैटरी कम खर्च होने की बात दिमाग में हैं।

सुबह हो गयी अब। सूरज भाई बाहर से हल्ला कर रहे हैं। कह रहे हैं -आओ यार बाहर, कहां अंदर बैठे हो घुसे हो। चलो तुमको समुद्र तट दिखायें।

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Sunday, January 17, 2016

पुस्तक मेले से वापसी

ज्ञान जी कमलेश पाण्डेय जी के साथ
पुस्तक मेले में पहुंचते हुए हमको पांच बज गए थे। पहुंचते ही हम अंदर जाने के लिए लपके लेकिन पता चला कि मेले का टिकट भी लेना है। यह बात किसी पुस्तक मेला यात्री ने अब तक बताई न थी।

खैर टिकट की लाइन में लगे तो पता चला कि टिकट काउंटर वाले के पास फुटकर पैसे नहीं थे। ज्ञान जी की किताब के विमोचन का समय हो चुका था लेकिन फुटकर पैसे के अभाव में हम अटके हुए थे। कुछ लोग दस बीस रूपये छोड़कर टिकट मेले की तरफ लपक रहे थे। पर हम अस्सी रूपये कैसे छोड़ दें यह समझ नही आ रहा था। खैर कुछ देर के बाद फुटकर पैसे आये काउंटर पर और हम लपकते हुए हाल नम्बर 12 अ की तरफ पहुंचे। गेट पर ही मिली बस की सहायता से।
किताबघर प्रकाशन की स्टॉल पर ज्ञान जी को सुनते लोग
 वहां जिससे भी पूछा उसने किताबघर का नया रास्ता बताया। मैं मुक्तिबोध की कविता की तर्ज पर 'घूम गया कई मोड़' दूकान की खोज में। जब दुकान मिली तब तक विमोचन हो चुका था और मदन कश्यप जी बोलना शुरू कर चुके थे।

हमने सोचा था मेले में खूब किताबें खरीदेंगे लेकिन खर्च बचा इस बहाने कि एक तो रास्ते में कोई एटीएम नहीं मिला कि पैसे निकाल लें। मशीन से पैसा लेने का इंतजाम दुकान वालों के पास था नहीं। इसके अलावा जब तक विमोचन का काम और गुफ्तगू निपटी तब तक मेला भी निपट गया था कल का।

ज्ञान जी के साथ अनूप शुक्ल। फोटो खींची सन्तोष त्रिवेदी ने।
दौड़ते भागते हुए हिन्द युग्म का स्टॉल दिखा जहां मेरे कई मित्रों की पुस्तकों का विमोचन हुआ। वीनस केसरी का अंजुमन प्रकाशन दिखा नहीं। चीनी और दूसरे देशों की पुस्तकों को देखने की हसरत ने तो सर ही नहीं उठाया।  :)
अरविन्द पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह 'आत्मालाप' का विमोचन करते हुए सुशील सिद्धार्थ, सुभाष चन्दर, प्रेम जनमेजय और
 
मेले के बाहर निकलते ही एक भेलपुरी के खोमचे से भेलपुरी ली। जितनी की टिकट मेले की उतनी की ही भेलपुरी। किताबों का स्वाद तो पढ़ने पर मिलेगा। भेलपुरी तत्काल स्वादिष्ट लगी। भूखे जो थे।

सुशील सिद्धार्थ, अनूप श्रीवास्तव, , प्रेम जनमेजय और ज्ञान चतुर्वेदी जी। पीछे अनूप शुक्ल।
भेलपुरी बेचने वाले बालक राहुल ने बताया कि कल मेले में 800 रूपये की बिक्री हुई। रोज इतनी ही होती है। इसमें आधा फायदा हुआ। शाहजहाँपुर के रहने वाले , कक्षा 9 पास बालक राहुल ने बताया कि आम दिनों में वह इण्डिया गेट के पास खोमचा लगाता है लेकिन मेले के दौरान यहां आ गया। उसके पिता और भाई भी इसी तरह के काम करते हैं। उससे कुछ देर और बतियाकर हम वापस लौट लिए।

वापस लौटने के रास्ते और तरीके कई लोगों से पूछे।।हर एक ने अलग-अलग रास्ता बताया। कोई बोला मेट्रो पकड़ लो। दो जगह बदलकर चले जाना। किसी ने कहा ऑटो कर लो।300 रूपये लेगा सीधे उतार देगा ठीहे पर। बहुमत जनता की सलाह बस से जाने की थी। उसी को मानकर हम बस स्टैंड की तरफ चल दिए।

निर्मल गुप्त जी के आने में देरी हुई पर उनकी भेंट हो ही गयी ज्ञान जी से।
बस स्टैंड तो कई मिले लेकिन हमारा वाला काफी देर में मिला। लोगों से पूछते-पूछते आगे बढ़ते गए। एक जगह फुटपाथ पर एक युवा लड़का-लड़की टहल रहे थे। हमने उनसे रास्ता पूछा तो उन्होंने इतने अच्छे से और इत्मिनान से बताया कि हमारा मन किया उनसे पूछने का कि आपकी समझ ने व्यंग्य किसको कहते हैं? हिंदी व्यंग्य की आज की स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है? लेकिन फिर हमको लगा कि यह उनकी भलमनसाहत की बात के जबाब में ठीक नहीं होगा। नहीं पूछे।

ज्ञान जी सुशील सिद्धार्थ और सन्तोष त्रिवेदी के साथ।
आगे बस स्टैंड मिला और जरा सी देर में बस भी। 20 रूपये के टिकट में एक घण्टा चलने के बाद जहां उतरे पता चला कि हमारा गन्तव्य दो किमोमीटर पीछे छूट गया था। यह तब हुआ जब एक यात्री और कंडक्टर ने जिम्मा लिया हुआ था कि मैं चिंता न करूँ वे हमें सही जगह उतार देंगे। जब हम अपनी तरफ से लगभग अपने जोखिम पर उतरे तो दोनों ने ही बिना किसी अपराध बोध के कहा - 'आपको पीछे वाले स्टॉप पर उतरना था।'
खैर हम 2 किमी पीछे पैदल चलते, पूछते और भटकते हुए वापस आये और अंतत: अपने ठीहे पर पहुंचे।
गन्तव्य पर पहुंचने के दौरान अपनी यात्रा को लेखन से जोड़कर देखते हुए सोचता रहा मैं की यात्रा कोई भी रास्ता बताने वाले लोग कई मिलेंगे लेकिन रास्ते का और यात्रा किस तरह की जाए इसका चुनाव खुद को ही करना होता है। इस प्रक्रिया में भटकाव और देरी भी हो सकती है लेकिन लगे रहे तो मंजिल अवश्य मिलती है। मंजिल कितनी जल्दी मिलती है यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे चुने हुए रास्ते कैसे हैं और हम रास्ते में मिलने वालों संकेतों को कितनी अच्छी तरह पढ़ने में सक्षम होते हैं।

मेले के बाहर भेलपुरी बेंचते राहुल।

बात कुछ ज्यादा ऊँची हो गयी और काम भर की बोरिंग भी इसलिए अब पुस्तक मेले का किस्सा खत्म।
यह पोस्ट दिल्ली से मुम्बई जाते हुए 10000 मीटर ऊंचाई पर हवाई जहाज पर लिखी जा रही। मतलब देखिये हम हिंदी को जमीन से 10 किमी ऊँचा तो उठा ही दिए। मुम्बई से रात तक गोवा पहुंचेंगे। वहां हफ्ते भर की ट्रेनिंग के दौरान गोवा के किस्से सुनायेंगे आपको।

ठीक है न।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207144201776873

एक लेखक को हमेशा यही समझना चाहिए कि वह नया है


ञान चतुर्वेदी जी आलोक पुराणिक के साथ
किताबघर की स्टॉल पर ज्ञान जी ने पुरानी पीढ़ी के लेखकों परसाईजी, शरदजोशी जी, श्रीलाल शुक्ल जी आदि को याद करते हुये नजीर जी का किस्सा सुनाया। किस्से के अनुसार दादा के कन्धे पर सवार पोता उनसे कहता है - 'दादा मैं तो आप से भी लम्बा हो गया।' इस पर दादा कहते हैं -' हां बेटा, पर यह मत भूलना कि इसमें मेरा भी कद शामिल है।'

व्यंग्य और साहित्य में नया काम करने की जरूरत पर बल देते हुए ज्ञान जी ने कहा- 'अगर आज मेरा कद कोई दस फिट बताता है तो उसमें आठ फिट इन बुजुर्गों के कारण है। हम कुछ ऐसा लिखें कि बुजुर्गों के लिखे में कुछ नया जोड़ें, आगे बढ़ाएं, विस्तार करें। यह न हो कि हम बस बुजुर्गों की बनाई हवेली का किराया वसूलते रहें और किस्से सुनाते रहें कि ये शानदार हवेली हमारे बुजुर्गों की हैं। उस हवेली की देखभाल करना, उसमें कुछ नया जोड़ना भी हमारा काम है।'

अगला विमोचन समारोह किताबघर के पास ही भावना प्रकाशन पर होना था। Subhash Chander जी के 'हिंदी व्यंग्य का इतिहास' के तीसरे संस्करण और कमलेश पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह 'आत्मालाप' का विमोचन होना था।

समकालीन हिन्दी व्यंग्य के खलीफ़ा एक साथ प्रेम जन्मेजय, हरीश नवल, सुशील सिद्धार्थ, ज्ञान चतुर्वेदी , आलोक पुराणिक
भावना प्रकाशन पर हिंदी के समकालीन व्यंग्य के अधिकाँश नामचीन लोग मौजूद थे। Gyan Chaturvedi, Harish Naval , Sushil Siddharth, सुभाष चन्दर, आलोक पुराणिक , Kamlesh Pandey, नीरज बधवार, Archna Chaturvedi, सन्तोष त्रिवेदी, Anuj Tyagi , Pankaj Prasun और अन्य तमाम लोगों के साथ बुजुर्ग अनूप श्रीवास्तव के साथ खाकसार अनूप शुक्ल भी मौजूद थे। लग रहा था कि व्यंग्य की संसद भावना प्रकाशन पर चल रही है। कई प्रशंसक/पाठक भी वहां शिरकत कर रहे थे। इनमें कमलेश पाण्डेय जी की श्रीमती जी (सोनी पाण्डेय) जिनका दो पहले जन्मदिन था और उन्नाव की Reshu Vermaभी थीं।

'हिंदी व्यंग्य का इतिहास' का विमोचन करते हुए ज्ञान जी ने सुभाष चन्द्र की विकट तारीफ़ की। कहा- सुभाष चन्द्र अद्भुत प्रतिभा के धनी हैं। विकट मेहनत कर लेते हैं। व्यंग्यकार हैं, इतिहासकार हैं, आलोचक हैं, रेडियो के लिए लिख लेते हैं, फिल्मों के लिए लिख लेते हैं। इतने सारे काम वे कर लेते हैं। व्यंग्य का इतिहास लिखकर उन्होंने बहुत बड़ा काम किया है। सुभाष जी के पीने के शौक पर भी उन्होंने कुछ मजे लिए।

सुभाष जी ने व्यंग्य का इतिहास लिखने में खर्च हो गए आठ-दस सालों की बात कही कि ये समय बर्बाद हो गया। व्यंग्य लेखन में पिछड़ गया। हजारों किताबें पढ़नी पड़ीं। रात 3 बजे तक जगना पड़ा।

ज्ञान जी ने सुभाष जी की बात पर कहा कि अच्छा काम हुआ इस बात की ख़ुशी होनी चाहिए। व्यंग्य पर इससे पहले कुछ व्यवस्थित काम हुआ नहीं था।

सुभाष जी ने हिंदी व्यंग्य का इतिहास समेत कुल मिलकर 40 किताबें लिखीं हैं अब तक। दस साल में हजारों किताबें पढ़ने वाली बात को ध्यान करें तो लगता है कि अगर ये दस साल सुभाष जी इतिहास लिखने में न खपाते तो हमारे पढ़ने के लिए कितनी किताबें और लिख मारते। कहने का मतलब हर खराब लगते पक्ष का एक अच्छा पहलू भी होता है। :)
 

पंकज प्रसून, प्रेम जन्मेजय, हरीश नवल , सुशील सिद्धार्थ और पीछे कमलेश पाण्डेय

ज्ञान जी ने पुराने लेखन को भूलकर आगे रचने की बात कहते हुए पुराने लिखे को 'नसेनी' (सीढ़ी)की तरह प्रयोग न करने की बात कही। सुशील जी ने इसे तुलसी के 'अब लौं नसानी अब न नसैहौं' से जोड़ते हुए अब तक बर्बाद हुए आगे न होंगे जैसी बात कही।

संचालन सुशील जी ने ही किया था। शानदार। सुभाष जी के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा- 'सुभाष के इस काम के पीछे उनकी मेहनत ही नहीं प्रतिभा का बड़ा योगदान है, कर्मठता का योगदान है (एक और किसी 'ता' का योगदान बताया था हम भूल गए)। इसके बाद कहा यह सब मैं घर से रटकर आया था कि यह बोलना है।  :)
 
ज्ञान जी ने सुशील जी की भी तारीफ़ की और कहा -'सुशील जी ने देर से लिखना शुरू किया। लोग खराब लेखन से शुरुआत करते हैं। लिखना सीखते हैं। फिर अच्छा लिखते हैं। लेकिन सुशील जी लिखना शुरू करते ही अच्छा लिखने लगे। बहुत अच्छा लिखते हैं।उनके लिखे हुए को देखकर लगता है कि व्यंग्य लेखन में वे सिद्ध लेखक की तरह सीधे अवतरित हुये हैं।'

हिन्दी व्यंग्य की विभूतियां एक साथ सुशील सिद्धार्थ, ज्ञान चतुर्वेदी, आलोक पुराणिक, नीरज वधबार, सुभाष चन्दर, अनुज त्यागी और सम्तोष त्रिवेदी
हिंदी व्यंग्य का इतिहास के बाद कमलेश पाण्डेय जी के तीसरे व्यंग्य संग्रह 'आत्मालाप' का विमोचन हुआ। ज्ञान जी ने कमलेश जी से जुड़े एक संस्मरण की याद करते हुए बताया कि उन्होंने कहीं लिखा था कि कमलेश पाण्डेय नए लेखकों में अच्छा लिखते हैं। इस पर कमलेश जी ने उनसे कहा था - 'मैं उतना नया नहीं हूँ। काफी दिन हुए मुझे लिखते हुए।'

ज्ञानजी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए शरद जोशी के हवाले से कहा -'एक लेखक को हमेशा यही समझना चाहिए कि वह नया है। आज ही लिखना शुरू किया उसने। तभी वह सच्चा लेखक हो सकेगा।'

कमलेश पाण्डेय जी ने अपनी बात कहते हुए कहा कि वे चुपचाप अपना लेखन करने में लगे रहे। प्रचार की तिकड़म से अपरिचित। उनके तीसरे व्यंग्य संग्रह की भूमिका लिखते हुए सुशील जी भी ने लिखा है-'व्यवहार में बहुत कम खुलने वाले कमलेश अपने लेखन में खुलते भी हैं, खिलते भी हैं।'

आत्मालाप संग्रह का अंश -'श्रीमती जी साफ़ कहती हैं कि उन्हें देख-देखकर मुग्ध होने का नाटक मैं अक्सर इसलिये करता हूँ कि इन दिनों अनिवार्य से हो चले ब्यूटी पार्लर और फिटनेस सेंटर के खर्चे से बच जाऊं।' पढकर मुझे लग रहा है जल्द ही इस संग्रह की की पूरी रचनाएँ पढ़ लूँगा।

भावना प्रकाशन से दोनों किताबें मैंने खरीद लीं। उधार। उधार इसलिए क्योंकि पैसे पास में थे नहीं और एटीएम रास्ते में मिला नहीं। सुभाष जी ने दोनों किताबों के दाम आधे करा दिए। सुभाष जी की किताब 1000 रुपये और कमलेश जी की 350 रूपये की है। दोनों मिलाकर कुल 675 रूपये की मिलीं। आज ही नेट बैंकिंग से पैसा भावना प्रकाशन को भेज देंगे। ज्ञान जी की किताब 'रंदा' भी 350 रूपये की है लेकिन वो किताबघर वालों ने 250 रूपये की दी। लौटते हुए मालिश महापुराण का पेपरबैक संस्करण भी खरीदा जो कि 150 रूपये का है लेकिन मेले में 110 का मिला।

सुभाष जी की किताब व्यंग्य का इतिहास में कुल 542 पृष्ठ हैं। बकौल श्रीलाल शुक्ल 'मुगदर साहित्य' (जिसे मुगदर की तरह प्रयोग करके कसरत की जा सके) की श्रेणी में रखी जा सकती है। यह किताब लेते ही हमने देखा कि इसमें हमारा भी नाम है। यह देखकर किताब और अच्छी लगने लगी।

पुस्तक विमोचन होने के बाद जमकर फोटोबाजी हुई। सबने अपने प्रिय लेखकों के साथ फोटो खिंचाये। ज्ञान जी आलोक पुराणिक के साथ अलग से फोटो खिंचाया जिसको Alok Puranik ने अपने प्रोफाइल पर लगाते हुए लिखा - व्यंग्य के विश्वविद्यालय के साथ व्यंग्य का एक छात्र।

आलोक पुराणिक की ज्ञान जी के साथ फोटो संतोष त्रिवेदी ने खींची और सलाह साथ में टिका दी की आलोक जी से अपेक्षा है कि वे बाजारबादी लेखन से हटकर सरोकारी लेखन भी करें। आलोक पुराणिक यही कहकर बवाल काटा कि काम करते रहें हम लोग बस वही बहुत है।

आलोक पुराणिक वैसे तो प्रसिद्ध हैं हीं व्यंग्यकार के रूप में। लेकिन एक और खासियत उनको देश भर में प्रसिद्द कर सकती है कि उन्होंने 6 महीने में अपना वजन 22 किलो कम किया। उनको स्लिम, ट्रिम और काम भर का स्मार्ट बताते हुए नीरज बधवार ने सलाह दी की एक दिन के लेखन का पारिश्रमिक उनको डाई पर लगाना चाहिए इससे और हसीन से लग सकें।

Neeraj Badhwar का जिक्र करते हुए और फिर तारीफ़ करते हुए सुशील जी ने बताया था कि उनको नीरज ने फेसबुक पर अन्फ्रेंड कर दिया है।उसका किस्सा नीरज ने मुझे बताया लेकिन किस्से की निजता का सम्मान करते हुए हम यहाँ नहीं लिख रहे।

फोटो सेशन तक इतने लोग हो गए थे कि कैमरे में अंट नहीं रहे थे। किसी ने सुझाव दिया कि कुछ लोग जमीन पर बैठ जाएँ लेकिन कोई जमीन से जुड़ने को तैयार नहीं हुआ। अलबत्ता अर्चना चतुर्वेदी, जिनकी फोटो किनारे खड़े होने से न आने का खतरा लग रहा था, जरूर किनारे से बीच में जाकर खड़ी हो गयीं यह कहते हुए कि इससे सबकी फोटो अच्छी आ जाएंगी।

विमोचन होने के बाद हम आलोक पुराणिक , नीरज बधवार और अनुज त्यागी के साथ बतियाते हुए बाहर निकल गए। बाकी लोग अपने-अपने हिसाब से और लोगों के साथ। अनुज त्यागी, आलोक पुराणिक और नीरज बधवार को विदा करके लौटे तो सुभाष चन्दर जी पंकज प्रसून और अभिषेक के साथ खड़े मिले।
सुभाष जी 3 बार मुझसे यह शिकायत की मैंने अपने आने के प्रोग्राम के बारे में पहले क्यों नहीं बताया। मैंने कहा - 'मैं बताता तो आप मुझसे इंतजार करते। आपको मुझसे अपेक्षा हो जाती। अगर मैं अपेक्षा पर खरा न उतरता। अपेक्षा पर खरा उतरने पर बड़ा लफड़ा होता है चाहे वह जिंदगी में हो या लेखन में। है कि नहीं।' :)

इसके बाद मैं जब दुबारा मेले पहुंचा तो सब दुकानें बंद हो रहीं रहीं थीं। सबको बाहर की तरफ भेजा जा रहा था। लोग किताबों के थैलियां समेटे घर वापस जा रहे थे। पुस्तक मेला सिमट रहा था।

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'व्यंग्य विसंगतियों को कम से कम शब्दों में व्यक्त करने वाली विधा है

मदन कश्यप ज्ञान जी के लेखन के बारे में बात करते हुये

'व्यंग्य विसंगतियों को कम से कम शब्दों में व्यक्त करने वाली विधा है।' कुछ ऐसी ही बात कह रहे थे बोलने वाले जब हम किताबघर के स्टॉल पर पहुंचे। हमको पता नहीं था कि वक्ता कौन हैं पर पूछने पता चला की मदन कश्यप जी हैं।

जितेंद्र श्रीवास्तव ज्ञान जी के लेखन के बारे में बोलते हुये
सामने Gyan Chaturvedi जी बैठे अपनी तारीफ़ सर झुकाये सुन रहे थे। मदन कश्यप जी के बगल में और कुछ व्यंग्यकार बैठे थे। संतोष त्रिवेदी ज्ञान जी की बायीं तरफ से मोबाइल पर रिकॉर्डिंग और फोटोबाजी में लगे थे। दांयी तरफ से Sushil Siddharth जी कुशल संचालन कर रहे थे। (संतोष-सुशील जी को बाएं-दायें लिखने के बाद 'जे बिनु काज दाहिने बाएं' लिखने का मन किया पर हमने मन को डपट दिया -हर समय मजाक ठीक नहीं होता)। मदन जी के बाद सुशील जी ने जीतेन्द्र श्रीवास्तव को बोलने के लिए बुलाया। उन्होंने कबीर, नागार्जुन आदि कवियों की कविताओं के व्यंग्य की याद करते हुए ज्ञान जी पर अपनी बात कही। कविताओं में व्यंग्य की बात चलने पर सुशील जी ने अदम गोंडवी की गजल का शेर पढ़ा:

"काजू भरे प्लेट में व्हिस्की गिलास में
उतरा है राम-राज्य विधायक निवास में।"

विवेक मिश्र ज्ञान जी के बारे में बोलते हुये
इसके बाद में साहित्य में क्षेत्रवाद लागू हुआ और इसकी डंके पर घोषणा करते हुए सुशील जी ने विवेक मिश्र जी को बुलाया जो कि बुन्देलखण्ड से हैं जहां से ज्ञान जी भी हैं। बुन्देली आदमी की खसियत बताते हुए विवेक जी ने कहा- 'बुन्देली आदमी कभी सीधे बात नही करता। उससे आप वह कभी नहीं कहलवा सकते जो वह कहना नहीं चाहता। वह वही कहेगा जो कहना चाहता है।'

बाद में लगे हाथ ज्ञान जी के वक्तव्य से इस बात की पुष्टि भी हुई। :)

सुभाष चन्दर ज्ञान जी के बारे में अपनी बात कहते हुये
अगले वक्ता थे इस साल का व्यंग्यश्री पुरस्कार पाये व्यंग्यकार Subhash Chander जी। चश्मा माथे के ऊपर चढ़ाकर जब सुभाष जी ने बोलना शुरू किया तो मुझे अपने सीनियर याद आये। याद आने का कारण यह कि उनका भी नाम Subhash Chander है और वे भी जब बोलना शुरू करते हैं तो चश्मा माथे के ऊपर चढ़ा लेते हैं। संयोग यह भी कि दोनों की पैदाइश भी हरियाणा की है।

सुभाष जी ने ज्ञानजी की तारीफ़ करते हुये कहा कि उन्होंने व्यंग्य की विधा में अनेक नए प्रयोग किये। प्रयोग तो तमाम लोगों ने किये लेकिन ज्ञानजी ने जो प्रयोग किये उनके साथ उनकी पठनीयता और रोचकता बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हुई। इसीलिये ज्ञान जी ज्ञान जी हैं।

ज्ञान जी अपनी बात कहते हुये
इस बीच और लोग आते गए। सुनीता शानू और Archna Chaturvedi आयीं। Alok Puranik और Avinash Vachaspati पहुंचे। लखनऊ व्यंग्य घराने के अनूप श्रीवास्तव जी और Pankaj Prasun भी मौजूद थे। Kamlesh Pandey जी अपनी किताब के विमोचन के लिए तैयार थे जो की भावना प्रकाशन के स्टॉल पर हुआ था।
अंत में ज्ञान जी ने अपनी किताब 'रन्दा' के बहाने कुछ बातें साझा कीं। बताया कि 'सहारा समय' के सम्पादक मंगलेश डबराल उनके व्यंग्य 'रंदा' स्तम्भ में छापते थे। अच्छा पैसा देते थे। यह लिखते समय मुझे याद आ रहा है कि ज्ञान जी ने सहारा श्री के बारे में कुछ नहीं कहा जो बेचारे महीनों से पैसों के ही चक्कर में जेल में बन्द हैं। :)
सुशील सिद्धार्थ, ज्ञान चतुर्वेदी और सुभाष चन्दर


ज्ञान जी ने नए समय में व्यंग्य लेखन की बढ़ती चुनौतियों की बात कहीं। राजनीति पर व्यंग्य लिखने वाले लोग राजनीति की बहुत सतही समझ रखते हैं। राजनीति इतनी आसानी से समझ में आने वाली चीज नहीं है। सोशल मिडिया पर आज व्यंग्य लेखन बहुत कम शब्दों में कहने का चलन है।समय और बाजार की ऐसी मांग है। लेकिन कला अगर अच्छी होगी तो उसकी मांग बाजार में हमेशा रहेगी।

सुशील सिद्धार्थ ज्ञान जी के साथ

ज्ञान जी ने 'हम न मरब' उपन्यास में प्रयुक्त गालियों के बारे में बात की। महिलाओं के एक एनजीओ द्वारा कुछ किताबें खरीदी गयीं। उनके अनुभवों को बताते हुए बताया कि उनको किताब में कहीं गालियां नहीं अखरीं।।इसके बाद ज्ञान जी केवल गालियों के नाम पर उपन्यास खारिज करने की बात को इसी तरह का उदाहरण बताया जैसे कोई स्वादिष्ट खीर खाने के बाद खीर के स्वाद की बात न करके सिर्फ उसमें आये एक कंकड़ का स्यापा करे।

इसके बाद ज्ञान जी ने 'हम न मरब' उपन्यास में आई गालियों को लेकर उनकी आलोचना करने वालों से मजे लेते हुए कहा--'जिन लोगों को इस उपन्यास में आई गालियों से सांस्कृतिक ठेस पहुंची है मैंने उसके प्रति खेद व्यक्त करता हूँ। उनसे माफ़ी मांगता हूँ।

इतने में ही वहां प्रेम जनमेजय जी आ गए। ज्ञान जी और प्रेम जी लपककर गले मिले और बात आगे बढ़ी। मिठाई बंटी। काफी चली और ज्ञान जी के साथ लोगों ने खूब फोटो खिंचाये।

अनूप श्रीवास्तव, सुशील सिद्धार्थ, ज्ञान चतुर्वेदी और संतोष त्रिवेदी
बातचीत के दौरान सुशील जी और सुभाषजी थे। सुशील जी ने खुद और सुभाष जी को 'रंदा' किताब समर्पित किये जाने की बात का उल्लेख करते हुए इसको इस किताब की खास बात बताया। ज्ञान जी फौरन किताब का समर्पण खोलकर पूरा पढ़ा और बताया कि समर्पण में कन्डीशन भी अप्लाई हैं। पूरा समर्पण इस प्रकार है:
"आप ईर्ष्या न करें, स्वार्थो का बीजगणित न साधें, अपनी कमजोरियों को विधा की विशेषता बनाने पर जोर न दें, वस्तुपरकता का हाथ छोड़कर जुगाड़ की कलम से फतवे जारी न करें, आपमें विधा की समझ भी हो, चिंता भी और उसके प्रति पूरा समर्पण भी, विधा जब आपका कैरियर नहीं , आपकी मुमुक्षा बन जाये- तब- आप वैसे सक्षम आलोचक तथा व्यंग्यकार बन पाते हो जैसे ये दोनों हैं बहुत प्यार तथा सम्मान से सुभाष चन्दर और सुशील सिद्धार्थ को समर्पित।"

पता नहीं ज्ञान जी ने क्यों इसे पढ़ा वहां। शायद वे बाकी लोगों को बताना चाह रहे हों कि ये दो लोग ऐसे हैं इसलिए इनको प्यार से किताब समर्पित की। हो तो यह भी सकता है कि ज्ञान जी ने इसलिए पढ़ा हो पूरा समर्पंण कि वे दोनों समर्थ व्यंग्यकारों से कहना चाह रहे हों कि 'यार, यह समर्पण एडवांस चेक की तरह है। ये ये गुण धारण कर लो फटाक से और ये चेक कैश करा लो। तुम तो समर्थ हो ही। यह कोई बड़ी बात नहीं तुम्हारे लिए।  :)

किताब घर पर विमोचन के बाद लोग भावना प्रकाशन की तरफ लपके।वहां सुभाष चन्दर जी द्वारालिखित ' हिन्दी व्यंग्य का इतिहास' का तीसरा संस्करण और कमलेश पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह का पहला संस्करण अपने विमोचन की राह देख रहे थे। उसका किस्सा अगली पोस्ट में।

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Friday, January 15, 2016

धीरेन्द्र से मुलाकात

धीरेन्द्र केसरवानी
कल मेस के बाहर ही मिल गए धीरेन्द्र केसरवानी। देखकर लगा मिनी वाल मार्ट मोपेड पर लादे चले जा रहे हों। गृहस्थी का हर सामान मोपेड पर। मिक्सी, चकला, बेलन, मुगरी, बाल्टी, मग, स्क्रबर और न जाने क्या-क्या सामान लादे बेचते हैं मोपेड पर।

रीवा के रहने वाले धीरेन्द्र 7 साल पहले जबलपुर आये थे। रांझी में रहते हैं। घूम-घूमकर बेंचते है सामान। 200 से 250 रूपये तक रोज कमा लेते हैं। सामान मांग के हिसाब से बेंचते हैं। कई ग्राहक नियमित हैं। कुछ लोग उधार भी लेते हैं। उधारी वसूलना भी एक बवाल है

धीरेन्द्र सामान से लदी मोपेड लुढ़काते हुए चले जा रहे थे। मोपेड का इंजन रिछाई के पास बैठ गया। स्टार्ट नहीं हो रहा। अब आधारताल तक घसीटते हुए ले जाना पड़ेगा।

मोपेड जब जबलपुर आये थे तब खरीदी थी 6000 रूपये में। उस समय तक 6 साल चल चुकी थी। मतलब कुल उम्र 13 साल है मोपेड की। मोपेड के हाल देखकर लगा कि उसको धीरेन्द्र मोपेड की तरह कम दुपहिया ठेलिया की तरह ज्यादा प्रयोग करते हैं।

अंदाज था कि मरम्मत करानी है मोपेड के इंजन की लेकिन समय न मिलने के कारण करा नहीं पाये। हमने कहा कि पास की दुकान में दिखा लो। इस पर बोले धीरेन्द्र- 'अरे ये खराब कर देगा। आधारताल में ठीक कराएंगे। औजार होते तो हम खुद सुधार लेते।'

समय पर ठीक न कराने पर जिस सवारी पर हम चलते हैं तो बिगड़ जाने पर हमको ही उसको घसीटना पड़ता है।

बात करते-करते हम फैक्ट्री के गेट के पास आ गए थे। धीरेन्द्र वहां से करीब 4 किमी दूर आधारताल की तरफ चले गए मोपेड घसीटते हुए। हम गेट के अंदर फैक्ट्री में जमा हो गए।

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Wednesday, January 13, 2016

फ़ूलचन्द और मोहनकुमार से मुलाकात

फूलचन्द और मोहनकुमार
कल दोपहर दो लोग पुलिया पर बैठे बीड़ी का धुंआ खींच रहे। उनकी साइकिल सामने में खड़ी धूप खैंच रही थी।

जिस तेजी से धुंआ अन्दर-बाहर कर रहे थे फ़ूलचन्द और उनके साथी मोहनकुमार उससे लगा कि शायद वे बीड़ी पीते हुये कपालभाती सिखाने का अभ्यास कर रहे हों।

फ़ूलचन्द की उमर 65 साल। मोहनकुमार करीब 46 साल। बिल्डिंग बनाने का काम करते हैं। फ़ूलचन्द मिस्त्री हैं। मोहनकुमार बेलदार मतलब सहायक।

हमें लगा कि शायद मजूरी करते होंगे और आज मजूरी नहीं मिली तो पुलिया पर सुस्ताने लगे होंगे लेकिन फ़ूलचन्द ने बताया कि वे अब केवल मिस्त्री नहीं रहे। बिल्डिंग बनाने वाले ठेकेदार हो गये हैं। 100 लोगों तक लोगों को काम लगाते हैं। सैकड़ों मकान बना चुके हैं। आज भी कहीं काम लगा है। हमसे भी पूछा- ’ बनवाना होय आपको भी तो बताओ।’


साइकिल धूप सेंक रही है
फ़ूलचन्द ने अपने काम की शुरुआत बेलदारी से की। बताया कि वीएफ़जे और जीआईएफ़ जब बनी थी तो हमने बेलदारी की। शुरु में ढाई रुपया रोज और फ़िर चार रुपये रोज मिलते थे (साठ का दशक)। आज न्यूनतम मजदूरी सौ गुनी बढकर 300 पार हो गयी है।

अपने काम करने वालों को कितना पैसा देते हो? पूछने पर फ़ूलचन्द बोले-’200 से 300 तक। जैसा काम आता हो।’

लेकिन न्यूनतम मजदूरी तो 300 रुपया है। कम क्यों देते हो? - मैंने पूछा।

आप लोगों के यहां काम करने वाले ठेकेदार तो 180 - 200 रुपया देते हैं अपने कामगारों को। - फ़ूलचन्द का जबाब प्राइम टाइम के पार्टी प्रवक्ताओं सरीखा था जो अपनी पार्टी के ऊपर लगे किसी आरोप का जबाब दूसरी पार्टी के ऊपर और बड़े आरोप लगाकर देने को सबसे सटीक जबाब मानते हैं।

3 लड़के 2 लड़कियों वाले फ़ूलचन्द के सब बच्चों की शादी हो गयी है। नाती-नातिन हैं। भरा-पूरा परिवार है।
लगते नहीं 65 साल के यह सुनकर और युवा हो गये फ़ूलचन्द।

मोहनकुमार ने बेलदारी का काम दो साल पहले शुरु किया। इसके पहले कुछ करते नहीं थे। 3 बच्चे हैं। तीनों अपना-अपना कुछ-कुछ काम करते हैं।

इसके पहले कुछ क्यों नहीं करते थे ? यह सवाल पूछने पर बताया- घर की देखभाल करते थे। पिताजी जीआईएफ़ में काम करते थे। 1990 में नहीं रहे। माताराम को पेंशन मिलती है।

यह अपने में मजेदार बात सी है न कि 3 बच्चों का पिता 44 साल की उमर तक माताराम की पेंशन के सहारे घर परिवार की जिम्मेदारी निभाता रहे और उसकेबाद फ़िर कामधाम शुरु करे।

बीड़ी पीने के लिये टोंका तो फ़ूलचन्द बोले - ’बस यही एक नशा है। और कोई नशा नहीं करते नहीं। बीड़ी नहीं पियेंगे तो टट्टी नहीं उतरेेगी। बीमार हो जायेंगे। ’

क्या कहते इस बात पर? धूप सेंकते हुये मेस में आ गये।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207118274848716

डॉक्टर हो तो ऐसा......

Monday, January 11, 2016

हनुमान मंदिर के पास ही रहते हैं अंकलजी

दोपहर लंच के बाद हम आफ़िस जा रहे थे। सामने से कुछ महिलायें अपने सर पर लकडियां लिये आती दिखीं। सबके सर पर कटी जंगली लकड़ी का गट्ठर था। लकड़ियां रस्सी से बंधी हुई थीं। वे तेजी से घर की तरफ़ जा रही थीं । हम सोच रहे थे कि उनमें से कोई पुलिया के पास सुस्ताने के लिये रुके तो उनसे बात करते हुये फ़ोटो खींचेगे। लेकिन कोई रुका नहीं। सबको घर लौटने की जल्दी थी शायद।

अचानक एक महिला के सर पर रखे लकड़ी के गट्ठर से कु...छ लकड़ियों के टुकड़े सरककर सड़क पर गिर गये। महिला ठिठककर रुक गयी। सड़क पर पड़ी लकड़ी को देखने लगी। हम बगल से गुजर रहे थे। उसकी लकड़ी सड़क से उठाकर उसके सर पर रखे लकडियों के गट्ठर के ऊपर रख दिया। वह चलने को हुई तो हमने रोककर उनका फ़ोटो लिया। फ़ोटो खींचते हुये हमने पूछा कि कहां से लेकर आ रहीं लकड़ी ? तो उन्होंने बताया कि गेट नंबर 3 के पास लोग जंगल काट रहे हैं वहीं से लेकर आई।

जंगल कटने की बात से याद आया कि फ़ैक्टी के अंदर और बाहर जहां-तहां उगी घास और जंगली झाडियां कटने का ठेका हुआ है। शायद आजकल बाहर कटाई का काम चल रहा है। शनिवार को मेस के आसपास कटिंग का काम हुआ। उस दिन दोपहर को एक महिला मेस के पास लकड़ी के दो गट्ठर इकट्ठा किये उनको घर ले जाने की तैयारी कर रही थी। लकड़ी तो उसने गट्ठर बनाकर और रस्सी से बांधकर सर पर रख ली। इसके बाद एक मोटी झाड़ी , जिसको गट्ठर में बांधना संभव नहीं था, को उठाकर सर पर रखने की कोशिश करती रही। एकाध कोशिश के बाद लकड़ी की झाड़ी तो उसने सर पर रख ली लेकिन झाड़ी के कांटो में उसकी धोती का पल्ला फ़ंस गया। लकड़ी का गट्ठर और झाड़ी को सर पर रखे-रखे धोती के पल्लू को छुड़ाने की कोशिश करते में झाड़ी का कांटा शायद उसकी उंगली में चुभ गया। दर्द से उबरने के लिये उसने उंगली कुछ देर के लिये मुंह में रख ली और घर की तरफ़ चली गयी।

यह सब मैं पुलिया की तरफ़ से मेस की तरफ़ आते हुये देख रहा था। मेस के पास पहुंचने मैं उसके पास पहुंच गया था। बातचीत करने की कोशिश करते हुये पूछा- ’ कहां रहती हो? ये दूसरा वाला गट्ठर नहीं ले जाओगी?

’ यहीं हनुमान मंदिर के पास ही रहते हैं अंकलजी । अभी इसको घर रखकर आते हैं फ़िर उसको भी ले जायेंगे।’ -कहते हुये वह घर चली गयी। बाद में दूसरा गट्ठर भी ले गयी होगी।
 

गजब का हौसला है आमिर

Sunday, January 10, 2016

पुलिया पर दुनिया एक प्रतिक्रिया



अपनी किताब ’पुलिया पर दुनिया’ मैंने पहले ई-बुक के रूप में बनाई थी। फ़िर प्रिंट आन डिमान्ड के तरह रंगीन और ’ब्लैक एंड व्हाइट’ पेपर बैक के रूप में भी अपलोड की। ये किताबें आर्डर करने पर प्रिंट करके भेजी जाती हैं।

रंगीन किताब फ़ोटो प्रिंट करने वाले पेपर पर छपने के कारण सबसे मंहगी हैं। अब तक केवल दो बिकी हैं। एक मैंने खरीदी है देखने के लिये कि दिखती है कैसी छपने पर। दूसरी Om Varma जी ने खरीदी अपने पिताजी के लिये। ओम जी के पिताजी 86 वर्ष की उमर के हैं। मप्र के सहायक जिला शाला निरीक्षक के पद से रिटायर हुये हैं। ओम जी के अनुसार उनके पिताजी लैपटाप पर मेरी पोस्टें पढते/देखते रहते हैं। मेरी किताब छपी तो उन्होंने इच्छा जाहिर की कि उनके लिये ’पुलिया पर दुनिया’ की प्रिंटेट प्रति ही खरीद कर मंगाई जाये जिससे वे अपने मन से जब चाहें पढ सकें।

ओम वर्मा जी ने बताया कि उनके पिताजी ने उनसे किताब के बारे में अपनी राय बताई और उसे मुझे लिख भेजा जाये तो ओम जी ने उनसे लिखकर आग्रह किया कि (सुनने की क्षमता बहुत कम है ओम जी के पिताजी जी की) वे अपने हाथ से अपनी प्रतिक्रिया लिखें जिसे वे मुझे भेज देंगे।

आज ओम जी ने अपने पिताजी आदरणीय बाबूलाल भागीरथ वर्मा जी मेरी किताब ’पुलिया पर दुनिया’ पर प्रतिक्रिया और अपना स्नेह मुझे प्रेषित किया है। प्रतिक्रिया आप फ़ोटो में देख सकते हैं। मैं ओम जी का आभारी हूं जो उनके माध्यम से उनके आदरणीय पिताजी का आशीष मुझ तक पहुंचा। मैंने ओम जी से वायदा किया है कि अपने लेख के प्रिंट आउट उनके पिताजी के पढ़ने के लिये भेजता रहूंगा।

आज कुछ मित्रों ने बताया कि उन्होंने मेरी किताब फ़्लिपकार्ट से खरीदी। उनका आभार। लेकिन साथियों की जानकारी के लिये बताना चाहता हूं कि किताब अगर आनलाइन.गाथा या फ़िर पोथी.काम से लेंगे तो सस्ती पडेंगी।

किताबों के लिंक एक बार फ़िर से:

1. ई-बुक और ब्लैक एंड व्हाइट पेपर बैक:
http://www.bookstore.onlinegatha.com/author/143/पुलिया-पर-दुनिया-.html

2. रंगीन पेपर बैक:
https://pothi.com/pothi/book/अनूप-शुक्ल-पुलिया-पर-दुनिया-0





https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207101303064432&set=a.1767071770056.97236.1037033614&type=3&theater

गहनों का सदुपयोग

Saturday, January 09, 2016

पुस्तक मेला की शुरुआत


रामफ़ल ’पुलिया पर दुनिया’ का विमोचन करते हुये
आज से दिल्ली में विश्वपुस्तक मेला शुरु हो गया। तमाम कवि/लेखक/व्यंग्यकार अपनी नई किताब का विमोचन, नये संस्करण का पु्नर्विमोचन करवाने के लिये दिल्ली पहुंचेंगे प्रगतिमैदान। ख्यातनाम लोग मित्रों की किताबों का विमोचन करेंगे। उन सबको बधाई। शुभकामनायें।

विमोचन के लिहाज से देखा जाये तो मेरी एकमात्र किताब ’पुलिया पर दुनिया’ का विमोचन अनूठे ठंग से हुआ था। जिस पुलिया पर बैठने वाले किरदारों के किस्से इस किताब में हैं उसी पर इसका विमोचन हुआ था। मतलब घटनास्थल पर ही।

किताब के विमोचनकर्ता थे ’पुलिया पर दुनिया’ के सबसे प्रमुख किरदार ’रामफ़ल’। जाड़े की एक धूपभरी दोपहरी में पुलिया पर गये अपन किताब लेकर। ’रामफ़ल’ को किताब पकड़ाई। कहा ये देखो किताब बनी ऐसी। फ़िर उनको विमोचन मुद्रा में किताब पकड़ाई। फ़ोटो खींची और बस हो गया विमोचन। थर्मस में चाय ले गये थे। डिस्पोजेबल ग्लास भी। वहीं चाय पी गयी और चले आये।

किताब आम लोगों के बारे में है। इसके परिचय लिखते हुये मैंने लिखा था:

" व्हीकल फ़ैक्ट्री जबलपुर की आफ़ीसर्स मेस और फ़ैक्ट्री के बीच बनी एक पुलिया पर बैठे लोगों के विवरण हैं इस किताब में। तरह-तरह के लोग दिखे पुलिया पर। हर व्यक्ति अपने में एक अलग किरदार है। पुलिया पर बैठे लोगों से बतियाते हुये एहसास होता है कि आपाधापी भरी जिन्दगी जीते हुये हम अपने आसपास की दुनिया से कितना अपरिचित रह जाते हैं।

“पुलिया पर दुनिया” आम लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी का रोजनामचा है। इसकी खासियत यही है कि कोई खास व्यक्ति इसमें शामिल नहीं है। सब आम लोगों के किस्से हैं।"

किताब की कोई समीक्षा तो नहीं छपी। लेकिन आनलाइन गाथा पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रियायें हैं। जैसे कि ये:

1. Akanksha Verma

i take this book for my father. after reading this book my father said that this book really touch his past, when he enjoy with friends at tea shop in evening. I am very happy to see my father happy.

2. Sonu Singh

ha ha ha, nice book. what we do today, we didn't meet with our friends and not sharing our feeling. This book realize me what is the importance of people in our life.

किताब आनलाइन उपलब्ध है। ई-बुक और पेपरबैक दोनों फ़ार्मैट में। खरीदने का मन करे तो इस लिंक पर जाकर आर्डर कर सकते हैं।

http://www.bookstore.onlinegatha.com/author/143/पुलिया-पर-दुनिया-.html

इस तरह हमारा भी पुस्तक मेला शुरु हो गया।






https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207094916024760&set=a.1767071770056.97236.1037033614&type=3&theater

वाह क्या बात है

Thursday, January 07, 2016

नाना के संग हंसती बच्ची

'बाबा हमारे बंगलौर से जबलपुर आये थे। फिर यहीं बस गए। जबलपुर ही हमारा घर हो गया।' --कल दोपहर को पुलिया पर अपनी नातिन गौरी के साथ 'खेलते हुए' 52 साल के कैलाश स्वामी ने बताया।
मूलत: तमिलनाडु के रहने वाले कैलाश स्वामी अब पक्के जबलपुरिया हैं। हिन्दी ही बोल पाते हैं। 'तमिल इल्लै'। मतलब तमिल नहीं जानते।

दो बेटियां हैं। दोनों की शादी हो गयी। दामाद प्राइवेट काम करते हैं। खुद कैलाश स्वामी भी रोजनदारी पर काम करते हैं। आज काम नहीं मिला तो नातिन को लेकर पुलिया पर आ गए।
...
नातिन गौरी का स्कूल का नाम सुरभि पिल्लै है कक्षा एक में पढ़ती है। छोटा अ, बड़ा अ सीख रही है। नाना के साथ खेलते हुए खिलखिला रही है। खिलखिलाते हुए नाना की गोद में भी सिमट सी जाती है। लगता है नाना से बहुत पटती है गौरी की। उसके हाथ में नाखून बढे हुये हैं। उनमें मैल भी जमा है।

बेटियां जब छोटी थीं 4/5 साल की तब ही पत्नी नहीं रहीं। फिर शादी नहीं की। खुद बच्चियों को पाला। आसपास किसी के घर छोड़कर काम पर चले जाते थे। खाना खुद बनाते थे। अब भी खुद बनाते हैं खाना। लड़कियां अपने-अपने घरों में रहती हैं।

पत्नी के न रहने पर दुबारा शादी न करने का कारण बताते हुए कुमार स्वामी ने बताया-"अगर शादी करते तो भगवान की दया से उससे भी बच्चे होते। फिर इन बच्चों के साथ तालमेल गड़बड़ाता। पता नहीं एडजस्ट हो पाते कि नहीं। इसलिए शादी नहीं की।"

लेकिन जब पत्नी नहीं रही तो तुम जवान रहे होंगे। कभी मन करता होगा किसी के साथ रहने का। तब क्या करते थे?

इस सवाल का जबाब पहले शरमाते हुए और फिर बहादुरी वाले मर्दाने अंदाज में देते हुए जो बताया स्वामी जी ने उसका लब्बो-लुआब जो निकल सकता है वह निकालने के लिए आप अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाइए।
पर लौटते समय मैं यह सोच रहा था कि दुनिया कितनी भी आधुनिक हो जाए, समय के हिसाब से समाज संचालन की कितनी भी चुस्त तरकीबें बना लें। रिश्ते, नाते, नियम, क़ानून बना लें लेकिन व्यक्ति मूलत: स्त्री-पुरुष ही होते हैं। बाकी सारे रिश्ते कृत्तिम होते हैं और वे हर समाज के लोगों के मन में साफ्टवेयर की तरह अलग से भरे जाते हैं।लेकिन प्राकृतिक आवश्यकताएं हमेशा सामाजिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करने का प्रयास करती हैं। अब यह अलग बात है कि पुरुष द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन करना उसकी मर्दानगी मानी जाती है। स्त्री के मामले में इसे चरित्रहीनता कहते हैं।

व्यक्ति मूलत: स्त्री-पुरुष ही होते हैं

'बाबा हमारे बंगलौर से जबलपुर आये थे। फिर यहीं बस गए। जबलपुर ही हमारा घर हो गया।' --कल दोपहर को पुलिया पर अपनी नातिन गौरी के साथ 'खेलते हुए' 52 साल के कैलाश स्वामी ने बताया।
मूलत: तमिलनाडु के रहने वाले कैलाश स्वामी अब पक्के जबलपुरिया हैं। हिन्दी ही बोल पाते हैं। 'तमिल इल्लै'। मतलब तमिल नहीं जानते।
दो बेटियां हैं। दोनों की शादी हो गयी। दामाद प्राइवेट काम करते हैं। खुद कैलाश स्वामी भी रोजनदारी पर काम करते हैं। आज काम नहीं मिला तो नातिन को लेकर पुलिया पर आ गए।
नातिन गौरी का स्कूल का नाम सुरभि पिल्लै है कक्षा एक में पढ़ती है। छोटा अ, बड़ा अ सीख रही है। नाना के साथ खेलते हुए खिलखिला रही है। खिलखिलाते हुए नाना की गोद में भी सिमट सी जाती है। लगता है नाना से बहुत पटती है गौरी की। उसके हाथ में नाखून बढे हुये हैं। उनमें मैल भी जमा है।
बेटियां जब छोटी थीं 4/5 साल की तब ही पत्नी नहीं रहीं। फिर शादी नहीं की। खुद बच्चियों को पाला। आसपास किसी के घर छोड़कर काम पर चले जाते थे। खाना खुद बनाते थे। अब भी खुद बनाते हैं खाना। लड़कियां अपने-अपने घरों में रहती हैं।
पत्नी के न रहने पर दुबारा शादी न करने का कारण बताते हुए कुमार स्वामी ने बताया-"अगर शादी करते तो भगवान की दया से उससे भी बच्चे होते। फिर इन बच्चों के साथ तालमेल गड़बड़ाता। पता नहीं एडजस्ट हो पाते कि नहीं। इसलिए शादी नहीं की।"
लेकिन जब पत्नी नहीं रही तो तुम जवान रहे होंगे। कभी मन करता होगा किसी के साथ रहने का। तब क्या करते थे?
इस सवाल का जबाब पहले शरमाते हुए और फिर बहादुरी वाले मर्दाने अंदाज में देते हुए जो बताया स्वामी जी ने उसका लब्बो-लुआब जो निकल सकता है वह निकालने के लिए आप अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाइए।
पर लौटते समय मैं यह सोच रहा था कि दुनिया कितनी भी आधुनिक हो जाए, समय के हिसाब से समाज संचालन की कितनी भी चुस्त तरकीबें बना लें। रिश्ते, नाते, नियम, क़ानून बना लें लेकिन व्यक्ति मूलत: स्त्री-पुरुष ही होते हैं। बाकी सारे रिश्ते कृत्तिम होते हैं और वे हर समाज के लोगों के मन में साफ्टवेयर की तरह अलग से भरे जाते हैं।लेकिन प्राकृतिक आवश्यकताएं हमेशा सामाजिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करने का प्रयास करती हैं। अब यह अलग बात है कि पुरुष द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन करना उसकी मर्दानगी मानी जाती है। स्त्री के मामले में इसे चरित्रहीनता कहते हैं।

Wednesday, January 06, 2016

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती

 
कल दोपहर लंच के बाद पुलिया पर हरिप्रसाद विश्वकर्मा से मुलाक़ात हुई।

भेलुपुरा में रहते हैं हरिप्रसाद। टेलर का काम करते थे। तीन साल पहले काम छोड़ दिया। कारण सुगर की समस्या है। बहुत थकान होती है। काम करते नहीं बनता। पहले सब कपड़े बनाते थे। कोट, सूट भी। अब कुछ नहीं होता। मशीनें बेंच दीं। एक सिलाई मशीन बची है। कोई ग्राहक मिल गया तो वह भी बेंच देंगे।

सुगर लेवल कित्ता है पूछने पर बताया 320 है। 120 नार्मल होता है यह भी कहा। इलाज फिलाज से कोई फायदा नहीं होता। बोले- 'साली सुगर होती है तो आँख, किडनी, लिवर, बीपी सब गड़बड़ा जाता है।'

सुगर, कैंसर, ब्लडप्रेसर और एकाध बीमारियों को बहन की गाली देते हुए बोले-- 'जिसको देखो यही सब घेरे रहती हैं। ये हुई तो आदमी किसी काम का नहीं रहता।'

हमने परहेज और खानपान ठीक रखकर सुगर कण्ट्रोल करने का सुझाव दिया तो बोले-'अरे क्या परहेज करें। कुछ नहीं ठीक होता। दवाएं सब महंगी हैं। कोई सुधार नहीं होता।'

जब काम नही करते तो घर का खर्च कैसे चलता है? पूछने पर बताया कि पत्नी 'दत्ता कम्पनी' में काम करती है। लड़का भी वहीं काम करता है। उससे खर्च चलता है। दूसरा बेटा 'बुढ़िया के बाल' बेंचता है ।

हरिप्रसाद खाली कमीज पहने बैठे थे। नीचे बनियाइन भी नहीं थी। कमीज की बटन के बीच से पेट दिख रहा था। हम उनके सामने कोट के नीचे स्वेटर मिलाकर चार परत के कपड़े पहने उनसे बतिया रहे थे।

पत्नी कमाती है तो ख्याल रखती होगी न ! अच्छा है।यह कहने पर हरिप्रसाद बोले:
सुर, नर, मुनि सब की यह रीती
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।


बोले--'बीमारी जब दो, चार,दस दिन में ठीक हो जाती है तो सब ख्याल करते हैं। अच्छा लगता है। लेकिन लम्बी खींचती है तो कोई ख्याल नहीं रखता। सब अपने में मस्त हो जाते हैं। खुद झेलना पड़ता है।'

50 के करीब के हरिप्रसाद के सामने के दांत टूटे हुए, आँखे अंदर और शरीर पस्त टाइप दिखा। बोले -'कोई बैठे का काम मिल जाए तो दरबान टाइप का तो अच्छा रहेगा। और मेहनत का कोई काम हो नहीं पाता।'

हमने पूछा कहीं कोशिश की ? किसी के पास गए काम मांगने तो बोले --'हमने किसी से कहा नहीं अब तक।'
हमने सहज सलाह दे दी-' कोशिश करो मिलेगा काम।'

बात करते हुए अपनी पांच पीढ़ियों के किस्से सुना दिए हरिप्रसाद ने। बोले पांच पीढ़ी पहले रहेली , गढ़ाकोटा के पास से उनके पूर्वज लालजी सिंह आये थे जबलपुर। मिस्त्री का काम करते थे। व्हीकल फैक्ट्री भी उनके पूर्वजों ने बनाई। पांच पीढ़ियों के नाम भी गिना दिए। लालजी सिंह (परबाबा)-जोराबल सिंह(बाबा)-दीनदयाल(पिता)-हरिप्रसाद( स्वयं)-दीपक (बेटा)।

पिक्चर कभी देखते हैं क्या ? पूछने पर बोले-' बहुत देखते थे पहले। ऐसा कोई टाकीज नहीं जबलपुर का जहां पिक्चर न देखी हो। देवानंद की पिक्चर आई थी --जानी मेरा नाम। वह कई बार देखी। अब तो सालों हुए कोई पिक्चर देखे।

और कोई शौक है? क्या करने का मन करता है ? यह पूछने पर बोले-'क्या शौक? यही कभी-कभी नमकीन खाने का मन करता है। कभी कुछ मीठा।'

चलने-फिरने में थकान होती है तो घर से 2 किलोमीटर दूर टहलते हुए कैसे आ गए यहां? -हमने पूछा।
बस ऐसे ही चले आये। क्या करते घर में पड़े-पड़े। ऐसे ही चले जाएंगे अभी।

हमने फोटो खींचने के लिए पूछा तो बोले खींच लो। फिर अपना अंगौछा अलग रखा। कमीज के बटन ठीक किये। फोटो खिंचाया। मैंने उनको फोटो दिखाया तो बोले--'वाह ये तो बहुत बढ़िया फोटो आया।'
आप भी देखिये। बताइये कैसा है फोटो?

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