Friday, February 05, 2016

घरैतिन से हम बोले, मोहब्बत का कोई गीत गुनगुनाओ

घरैतिन से हम बोले, मोहब्बत का कोई गीत गुनगुनाओ
झोला थमा के वो बोली, जाओ भाग के सब्जी ले आओ।

मोहब्बत की पाठशाला का ये मजेदार चलन है यारों ,
जो कभी पढ़ा नहीं, सलाहें देता है हेडमास्टर सरीखी।

मोहब्बत की बात की , सब दोस्त टोंकने लगे,
ये हम कर लेंगे, तुम कुछ और काम देख लो।


-कट्टा कानपुरी

न्याय में अब बुफ़े सिस्टम का चलन शुरु हुआ

न्याय में अब बुफ़े सिस्टम का चलन शुरु हुआ
भीड़ के बहाने जैसा ठीक लगा, न्याय होने लगा।

दिख गया सामने जो, उसी के कपड़े फ़ाड डाले यार,
समय कहां किसी के पास, अपराधी पकड़ने का।

रुपया 52 पैसे मजबूत हो गया क्या कहने,
चार पैसे और चढता कुछ चुटकुले बनते।

-कट्टा कानपुरी

Thursday, February 04, 2016

सेल्फ़ी विद सूरज एंड अमित

जो लोग यह समझते हैं कि हमारी पहुंच खाली पुलिया के लोगों तक ही है उनकी जानकारी के लिए यह फोटो चतुर्वेदी न्यूज चैनेल के सर्वेसर्वा Amit Chaturvedi के साथ। सुबह की चाय के बाद जैसे ही सेल्फी लेने लगे अमित वैसे ही सूरज भाई आ गए बोले रुको जरा रौशनी की सप्लाई बढ़ा दें। इसी बहाने सूरज भाई भी आ गए सेल्फी में। smile इमोटिकॉन

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कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए

Wednesday, February 03, 2016

उधारी की सरदारी

आज अख़बार में यह खबर पढ़ी, "उधार में सिगरेट नहीं देने पर युवकों ने दुकान में लगा दी आग।"

लड़कों की हरकतें एकदम अमेरिका, ब्रिटेन टाइप लगीं। बात मानने से मना किया तो फूंक दिया पूरा ईराक।

युवकों ने दूकान को आग हवाले किया। अमेरिका ने इराक को  आई.एस.आई.एस. के हाथ थमा दिया।

इससे यह लगता है कि चाहे व्यक्ति हो या देश,  सिरफ़िरे युवाओं कि हरकतें एक जैसी होती हैं। आखिर अमेरिका भी तो एक युवा देश ही है। महज 500 सौ साल के करीब उम्र  का।

लड़के शायद बदमाश नहीं थे। न सिगरेट के लती। लती होते तो इतनी देर तक  सबर नहीं कर पाते कि रात  9 बजे की मना की गयी  उधारी का गुस्सा रात डेढ बजे उतारें ।
शायद यह जीवन मूल्यों की टकराहट है। दुकानदार के अनुसार, उधार प्रेम की कैंची होगा। जबकि लड़के लोग उधार को प्रेम का पुल और फ्लाई ओवर मानते होंगे। एक मरियल सा पुल बनने में जितना लोहा लगता है उतने में हजारों, लाखों कैंचियां बन सकती हैं। इसलिए पुल और कैंची की भिड़ंत में कैंची की ऐसी-तैसी तो होना पक्का है।

शायद युवक बाजार के हिसाब से चल रहे होंगे। आपके पास बनियाइन खरीदने के पैसे भले न हों लेकिन बाजार आपको बाइक और मोबाईल जबरियन थमा देगा। ले जाओ बेट्टा ऐश करो। पैसे तो हम वसूल ही लेंगे। उधार लेकर आओ। क़िस्त पर क़िस्त चुकाओ। स्मार्ट नागरिक बन जाओ।

आज का युग ही उधारी का युग है।  आज  हर बड़े आदमी के पास क्रेडिट कार्ड मतलब उधारी का लाइसेंस रहता है। जिसकी जितनी बड़ी उधारी वह उतना बडा आदमी। गणित की भाषा में कहें तो आज के समय में आदमी का बडप्पन उसके क्रेडिट कार्ड की उधारी  लिमिट के समानुपाती होता है।

नौजवानों को शायद गुस्सा इस बात पर आया होगा कि जब पूरी दुनिया में उधारी का चलन है तो ये पनवाड़ी कैसे मना कर सकता है उधार देने को। जब दुनिया भर की सरकारें उधारी के रथ पर सवार होकर सरपट भाग रही हैं, विकसित देशों के नागरिक उधार पर जिन्दगी जी रहे हैं तो अगर कोई पानवाला उधार में सिगरेट देने से मना करता है इसका मतलब वह देश के विकास का दुश्मन है।  देशप्रेमी नौजवानों ने देशी आदमी की दुकान सुलगा दी।

संभव यह भी हो सकता है कि युवक  शब्दों, मुहावरों को उनके प्रचलित अर्थों से हटकर नये रूप में ग्रहण करना चाह रहे हों। आजकल किसी भी बात पर उत्तेजित होकर सरकारी संपत्ति फ़ूंक देने को लोग क्रांति की संज्ञा देने लगे हैं। उसी तर्ज पर शायद युवक लोग दुष्यन्त कुमार के शेर:

मेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये।

को नये संदर्भ में ग्रहण करने की कोशिश कर रहे हों। सिगरेट न सुलगा सके तो दुकान ही सुलगा दी।
आपका क्या कहना है?

हैप्पी न्यू ईयर

पिछले महीने की बात है। मैं कानपुर में था। गुमटी में अपने परिवार के साथ जा रहा था। गाड़ी मैं ही चला रहा था। चला तो धीमे ही रहा था पर सड़क पर दायें-बायें शायद कुछ ज्यादा हो गया रहा होगा तो पीछे वाला मोटर साइकिल सवार मेरी कार को ओवर टेक नहीं कर पा रहा था।

एक जगह सड़क थोड़ा चौड़ी हुयी तो वह झटके से आगे आया और मेरी कार के आगे निकल गया। लेकिन उसको याद आया होगा कि मेरी ड्राइविंग के चलते उसको कुछ देर रुकना पड़ा। उसका गुस्सा भरा था उसके मन में। उसने अपनी मोटरसाइकिल धीमी की और मेरी कार के ...साथ चलते हुये मुझे हड़काया-" गाड़ी चलाने की तमीज नहीं है?"

उसके अंदाज से लगा कि वह पूछ नहीं रहा है बल्कि मुझे बता रहा है कि मुझे गाड़ी चलाना नहीं आता। उसके गुस्से को देखकर लगा कि अगर वह आर.टी.ओ. होता तो वहीं मेरा ड्राइविंग लाइसेन्स मुझसे लेकर निरस्त कर देता और क्या पता उसके पहले कुछ जुर्माना भी ठोंक देता।

मेरे घर वाले भी मेरी आराम-आराम की ड्राइविंग से खुश नहीं रहते। कहते भी रहते हैं-’तुमको गाड़ी चलाना नहीं आता। पता नहीं चलता कि गाड़ी चला रहे हो या बैलगाड़ी।’ एक अनजान आदमी जब उनकी ही तरह कहता मिला कि मुझे गाड़ी चलाना नहीं आता तो वे बोले भले कुछ नहीं लेकिन मन ही मन सोच जरूर रहे होंगे कि उनकी ही तरह और लोग भी सोचते हैं मेरी ड्राइविंग के बारे में।

बाहर साथ में चलता मोटर साइकिल सवार बहुत गुस्से में दिख रहा था। उसके तेवर से लग रहा था कि उससे कुछ तर्क करेंगे या सफ़ाई देंगे तो वो और भन्नायेगा और अपना सारा ’दुर्वासा विकार’ हमारे ऊपर निकालेगा। घर वाले तटस्थ थे ( लेकिन उसको हम अपराध नहीं कह सकते न भाई ) लेकिन सोच रहे थे कि कहां से फ़ंस गये इस बवालिया बहस में।

ऐसे समय में जब सबने साथ छोड़ दिया तब ’मेरी बेवकूफ़ी’ मेरे साथ खड़ी हुई। मैंने अपनी बेवकूफ़ी का सहारा लेकर उस गुस्साते हुये नौजवान से मुस्कराते होेते हुये कहा- "हैप्पी न्यू ईयर।"

मेरी मुस्कान, बेवकूफ़ी और नये साल की शुभकामना के संयुक्त आक्रमण के सामने नौजवान का गुस्सा वहीं ढेर हो गया। वह बेचारा भी आगे कुछ बोल नहीं पाया सिर्फ़- ’सेम टु यू।’ बोलकर रह गया। मोटरसाइकिल पर एक्सेलेटर मारकर आगे बढ गया।

यह सिर्फ़ यह बताने के लिये कि गुस्सा जो भयंकर और माफ़िया टाइप विकार माना जाता है उसका मुकाबला भी मुस्कान, बेवकूफ़ी और शुभकामनाओं जैसे शरीफ़ और कमजोर माने जाने गुणों के साथ बखूबी किया जा सकता है और सिद्ध किया जा सकता है कि संगठन में शक्ति होती है। smile इमोटिकॉन

बहुत खूब, शाबास अजेंद्र

Tuesday, February 02, 2016

पुलिया पर कमलेश


कमलेश
आज सुबह पुलिया पर कमलेश मिले। धूप सेंकते हुए पास ही रखी पालीथीन से कुछ-कुछ निकाल-निकालकर खाते जा रहे थे। पास से देखा तो एक पालीथीन में गुड़ और दूसरी में लइया जैसी कुछ थी। गुड़ की भेली के टुकड़े करके मुंह में रखते जा रहे थे। बीच-बीच में लइया भी फांकते जा रहे थे।

पूछने पर बताया कि कांचघर में रहते हैं। सिलबट्टा पर दांत बनाने का काम करते हैं। वीएफजे क्वार्टर की तरफ जा रहे थे। वहां किसी ने बुलाया है अपनी सिल और सिलबट्टे पर दांत बनवाने के लिए।

आजकल रेडीमेड मसाले के जमाने में घरों से ...सिल और सिलबट्टे का चलन बहुत कम हो गया है। इस लिहाज से सिल पर दांत बनवाने का काम भी बहुत कम हो गया है। ऐसे में कमलेश जैसे लोगों की रोजी-रोटी कैसे चलती होगी यह सोचते हुए हमने जब पूछा उनसे तो बोले, कभी मिलता है काम, कभी नहीं मिलता।

विकास और तकनीक के बदलाव के साथ परम्परागत पेशे वाले कई कामों से जुड़े लोगों के काम और रोजी-रोटी के साधन कम होते जाते हैं। हमको पता नहीं चलता लेकिन जो लोग उनसे प्रभावित होते होंगे उनको नए काम में लगने में समय लगता होता। कमलेश को देखकर और पूछने पर भी यही लगा कि वे सिलबट्टे पर दांत बनाने के ही धंधे में लगे हैं।

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले कमलेश के घर में पत्नी और दो बेटे हैं। दोनों बेटे 'इधर-उधर' प्राइवेट काम करते हैं।

कमलेश धीमे-धीमे बोल रहे थे। शायद कुछ तकलीफ रही हो शरीर में या बोलने में। ज्यादा पूछताछ पर चेहरे पर झुंझलाहट सी भी दिखी से। उनके पास दो ठो झोले में कुछ सामान गड्ड-मड्ड था। देखकर लगा शायद मंगलवार को हनुमान जी के मन्दिर में मांग कर आये हों। लेकिन जब पूछा तो बोले,'हम भीख नहीं मांगते।'

इसके बाद हम चलने लगे तो बोले कमलेश,' चाय-वाय कुछ पिला देव।' (मतलब शायद यह कि सुबह-सुबह दिमाग मत खराब करो। चाय के पैसे दे दो और आगे बढ़ो)। हमने पूछा, कित्ते पैसे चाहिए चाय के लिये। कमलेश बोले, 'दस रूपये दे दो।'

पूछने पर बताया कि गुड़ और लइया भी किसी ने दिया है।

हम चाय के पैसे देकर फैक्ट्री की तरफ चल दिए। कमलेश भी पुलिया से उठकर काम के लिए चल दिए।
रास्ते में और बाद में भी मैं सोच रहा था कि जबलपुर स्मार्ट शहर बनने वाला है। जब बन जाएगा जबलपुर स्मार्ट सिटी तब कमलेश जैसे लोग कहां रहेंगे? जबलपुर में या कहीं और। जिन सेवाओं की आवश्यकता स्मार्ट शहरों में नहीं रहेगी उनको प्रदान करके रोजी कमाने वाले लोग स्मार्ट शहर में ही रहेंगे या शहर बदर कर दिए जाएंगे।
 
 

जूनून हो तो ऐसा


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Monday, February 01, 2016

खर्च करो यार, कमाने में वक्त न जाया करो

आज अख़बार में यह खबर पढ़ी, "उधार में सिगरेट नहीं देने पर युवकों ने दुकान में लगा दी आग।"

लड़कों की हरकतें एकदम अमेरिका, ब्रिटेन टाइप लगीं। बात मानने से मना किया तो फूंक दिया पूरा ईराक।

युवकों ने दूकान को आग के हवाले किया। अमेरिका ने इराक को तबाह करके आई इस आई इस के हाथ थमा दिया।

इससे यह लगता है कि चाहे व्यक्ति हो या देश, सिरफिरे युवाओं कि हरकतें एक जैसी होती हैं। आखिर अमेरिका भी तो एक युवा देश ही है। महज 500 सौ साल उम्र का।

ख़राब सी लगने वाली बात। बताओ उधार नहीं दिया तो आग लगा दी। बड़े बदमाश थे लड़के। लेकिन अगर लड़के बदमाश होते तो उसी समय जबरिया करके सिगरेट हथिया लेते जब दुकानदार ने मना किया था। आखिर वे कई थे और दूकानदार अकेला। पढ़ा भले न हो स्कूल में कि संगठन में शक्ति होती है लेकिन जानते पक्का होंगे। तभी तो दुकान पर इकट्ठे आये थे।

लड़के बदमाश नहीं थे। न सिगरेट के पक्के लती। सिगरेट की लत लगी होती तो इतनी देर सबर नहीं कर पाते कि 9 बजे से रात डेढ़ बजे तक इन्तजार कर पाते। उसी समय या तो छीनकर या मांगकर फूंक लिए होते कलेजा।

शायद यह मूल्यों का लफड़ा है। दुकानदार के जीवन मूल्य के अनुसार, उधार प्रेम की कैंची होगा। जबकि लड़के लोग उधार को प्रेम का पुल मानते होंगे। उनके लिए उधार प्रेम का फ्लाईओवर होगा। एक मरियल सा पुल बनने में जितना लोहा लगता है उतने में हजारों, लाखों कैंचियां बन सकती हैं। इसलिए पुल और कैंची की भिड़ंत में कैंची की ऐसी-तैसी तो होना पक्का है।

पहले के लोग कहते होंगे:

'खर्च करने से पहले कमाया करो।'

अब यह फलसफा पुराना हुआ। आज का नारा तो है:

'खर्च करो यार, कमाने में वक्त न जाया करो।'

आपके पास कमीज खरीदने के पैसे भले न हों लेकिन बाजार आपको बाइक और मोबाईल जबरियन थमा देगा। ले जाओ बेट्टा ऐश करो। पैसे तो हम वसूल ही लेंगे। उधार लेकर आओ। क़िस्त पर क़िस्त चुकाओ। स्मार्ट नागरिक बन जाओ।

खैर अब दुकान फुँकनी थी तो फुंक गयी। होनी को तो कोई टाल नहीं सकता। इस घटना में नकारात्मक पक्ष देखने से भी कोई फायदा नहीं। ऐसे में इस घटना के कुछ उजले पहलू देखे जाएँ।

सबसे पहला फायदा तो बीमा कंपनियों को हो सकता है। बीमा एजेंट जहाँ से पान, मसाला खाते हैं उनके दुकानदारों को सलाह देते हुए कह सकते हैं," भैया मेरी सलाह मानो अपनी दुकान का बीमा करा लो। अच्छी स्कीम है। चार लाख का करा लो बीमा। कभी दस-बीस हजार का सामान फुंकवा के वसूल लेना रकम। सर्वे का कराना और पैसा दिलाना हमारी जिम्मेदारी। तुम अपने हो तो बता रहे हैं। फिर न कहना बताया नहीं। बगल वाले मिश्रा जी कराइन हैं बीमा। दो-तीन महीने बाद प्लान है वसूली का।

सिगरेट कंपनी वाली मर्दानगी वाले विज्ञापन में इस बात को कलात्मक तरीके से दिखा सकते हैं कि मरगिल्ले से सीने वाले आदमी के अंदर सिगरेट पीते ही इतनी ताकत आ जाती है कि वह आधी रात में जाकर दुश्मन के इलाके में जाकर उसका आशियाना तहस-नहस कर आता है। देशप्रेम वाली फिल्मों में दुश्मन की तौर पर पाकिस्तान को लिया जा सकता है।

सरकारें इस घटना की आड़ में सिग्रेट पर टैक्स बढ़ा सकती हैं। सिगरेट कम्पनियां टैक्स बढ़ने के नाम पर सिगरेट के दाम बढाकर टैक्स की ज्यादा चोरी कर सकती हैं। क्रिकेट के और मैच करा सकती हैं।
सिगरेट महंगी होते ही एक सिगरेट को साझा करने वाले दोस्तों की संख्या दो से बढ़कर चार हो सकती है। युवाओं में भाईचारा बढ़ सकता है इस बात से।

फायर ब्रिगेड वाले और फायर टैंकर खरीद सकते हैं इसी बहाने कि पता नहीं कब कौन कोई टैंकर मांग बैठे आग बुझाने के लिए।

सबसे ज्यादा फायदा पुलिस वाले उठा सकते हैं इस बात से। किसी भी पान की दुकान के पास से गुजरते लडक़ों को पकड़कर उनके घरवालों को बुलाकर समझा सकते हैं कि आपके लड़के दुकान पर उधार सिगरेट मागने जा रहे थे। न देने पर ये दुकान फूंकने की योजना बना रहे थे।

इस पर शायद बच्चों के घर वाले कहें-"लेकिन मेरा लड़का तो सिगरेट पीता ही नहीं।"

इस पर पुलिस वाले कह सकते हैं। हम कब कह रहे हैं कि पीता है आपका लड़का सिगरेट। लेकिन जब वह पान की दुकान के पास से गुजरेगा तो आज नहीं तो कल पीना सीखेगा ही। फिर आप जब उसको पैसे दोगे नहीं तो वह उधार मांगेगा। नहीं देगा तो दुकान फूंकेगा। इसलिए आज नहीं तो कल तो वह करेगा ही यह अपराध जिसकी आशंका में हम इसे पकड़कर लाये हैं। वो तो कहो फूंकने से पहले हमने पकड़ लिया। सस्ते में छूट जाएगा आपका बच्चा। बाद में इसी छुड़वाने में बहुत खर्च होता।

पता नहीं इसके बाद क्या हो। शायद बाप भी कहीं से उधार लेकर बच्चों को छुड़वाए।

जो हो लेकिन इस घटना से शिक्षा यही मिलती है हमको जीवन के बदलते मूल्यों के हिसाब से जीना सीखना होगा। बाजार की मर्जी के हिसाब से अपनी कहावतों में बदलाव लाना होगा। 'उधार को प्रेम की कैंची' मानने की जगह 'मोहब्बत का पुल' समझना होगा, 'इश्क का फ्लाईओवर' समझना होगा। इस पर फर्राटे से गुजरना होगा।

दुनिया में सब यही यही कर रहे हैं। तो आपको करने में क्या एतराज है भाई। आप कोई अनोखे हैं क्या? दुनिया में रहना है तो दुनिया के उसूल तो मानने ही होंगे। आपके लिए कोई अलग दुनिया थोड़ी बनाई जायेगी।

अग्रेजी में कमजोर हमारे इंजीनियर



इसे पढ़कर रागदरबारी के मास्टर मोतीराम याद आ गए:

एक लड़के ने कहा,"मास्टर साहब, आपेक्षिक घनत्व किसे कहते हैं?

वे बोले," आपेक्षिक घनत्व माने रिलेटिव डेन्सिटी।"

एक दूसरे लड़के ने कहा, "अब आप, देखिये साइंस नहीं अंग्रेजी पढ़ा रहे हैं।"

वे बोले,"साइंस साला बिना अंग्रेजी के कैसे आ सकता है।"

जब साइंस नहीं आ पाया बिना अंग्रेजी के तो इंजीनियरिंग ससुरी बिना अंग्रेजी के कैसे आ सकती है।
 

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10207239907569458&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

फकत हौसले से निबाह है

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ये गाँव को स्मार्ट बना रही हैं

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पुलिया पर दुनिया

मैं जब तब अभी तक की अपनी एकमात्र किताब ’पुलिया पर दुनिया’ के बारे में लोगों को बताता रहता हूं। जहां कहीं जाता हूं तो अपनी किताब की प्रति साथ ले जाता हूं। इष्ट-मित्रों को दिखाता और पूछता हूं -"कैसी लगी किताब?"

ज्यादातर लोग प्रोत्साहन के लिहाज से कह देते हैं- बहुत अच्छी है, अभिनव प्रयोग है, ऐसा लेखन कम होता है। आदि-इत्यादि।"

इस तरह की प्रसंशात्मक टिप्पणियों से मन खुश हो जाता है।

आज मेरे एक अभिन्न मित्र से मेरी मुलाकात हुई तो मैंने आदतन अपनी किताब उनको दिखाई और पूछा - "कैसी लगी किताब?"

मैं यह बात भूल गया था कि उन मित्र को अपनी किताब के बारे में पहले भी बता चुका था और वे मेरे कई बार ध्यान दिलाये जाने पर आनलाइन संस्करण में 50/- खर्च करके किताब डाउनलोड करके पढ़ भले न चुके हों लेकिन देख चुके थे।

मित्र ने जो प्रतिक्रिया की वह पहले की प्रतिक्रियाओं से एकदम अलग थी। उसने कहा- " यार , तुम्हारी हरकतें तो उस बुजुर्ग महिला सरीखी हैं जो षोडसी कन्या की तरह साज-सिंगार करके हर आने-जाने वालों से पूछती है- बताओ मैं कैसी लग रही हूं। "

हमें झटका लगा। लेकिन बात सच भी थी इस लिये कुछ कह भी नहीं सकते थे इसलिये चुप हो गये। मित्र ने यह सोचकर कि हमें कहीं ज्यादा बुरा न लग जाये समझाते हुये कहा-" तुमने किताब लिख दी। तुम्हारा काम खतम। अब पाठक खुद बतायेगा कैसी है किताब। हर पोस्ट लिखने के बात क्या सबसे पूछते हो -कैसी है पोस्ट! "

इसके बाद और खुश करने के लिये कह भी दिया-" किताब बढिया है। अब अगली भी जल्दी से लिखो।"
हमें समझ नहीं आया कि षोडसी कन्या की तरह लजा जायें या 'साठसी' महिला की तरह कहें - ' चल हट , तेरी मजाक की आदत अभी गयी नहीं।  :)

वैसे ’पुलिया पर दुनिया’ खरीदनी हो तो आनलाइन लिंक यह है। खरीदिये, पढिये और बताइये कैसी लगी किताब ! :)
http://www.bookstore.onlinegatha.com/…/पुलिया-पर-दुनिया-.ht…

Saturday, January 30, 2016

एच डी ऍफ़ सी के एटीएम में न रखेंगे कदम

आज हम अपने एक मित्र से मिलने गए। रास्ते में याद आया कि मुझे पैसे भी निकालने हैं। मेरा खाता स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया में है। जब तक याद आया तब तक स्टेट बैंक का एटीएम पार हो गया था। आगे एच. डी. ऍफ़. सी. का एटीएम दिखा। बगल में बैंक। हम घुस गए एटीएम चैंबर में और अपना एटीएम कार्ड मशीन के हवाले कर दिया। स्क्रीन पर मीनू का इंतजार करने लगे कि अनूप शुक्ल का स्वागत होगा। पिन नम्बर माँगा जाएगा या ऐसा ही कुछ। लेक
िन कोई हलचल न हुई। हमने स्क्रीन पर देखा तो निम्न निर्देश दिए गए थे:

1. अपनी कार्ड डालिये।
2. मशीन आपके कार्ड को पढ़े तब तक प्रतीक्षा करिये।
3. लेनदेन आगे बढ़ाने के लिए कार्ड स्लॉट से अपना कार्ड वापस लीजिये।

हम कार्ड डालकर प्रतीक्षा करते रहे। कार्ड वापस लेने वाली कार्यवाही नहीं हुई। हमें लगा कि मशीन कार्ड पढ़ रही है। पढ़ने दो आराम से। जब दो तीन मिनट हो गए और कोई सूचना नहीं आई स्क्रीन पर तो सोचना शुरू किया कि बहुत धीमा है ये एटीएम। यह भी सोचा कि कहीं मशीन अनपढ़ तो नहीँ जो किसी और से पढ़वाने गयी हो कार्ड।

पांच मिनट से अधिक हो गए तो और कुछ नहीं हुआ तो मैंने कैंसल से शुरू करके सारे बटन दबा डाले मशीन के। मशीन को कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर मैं बगल में ही स्थित एच डी ऍफ़ सी बैंक गया। समस्या बताई तो दरबान बोला-'आपका कार्ड अंदर चला गया। सोमवार को मिलेगा।गोलबाजार आफिस से।'

मैंने पूछा-'अंदर कैसे चला गया। सोमवार को क्यों मिलेगा? आज क्यों नहीं?'

उसने बताया कि मशीन ने कार्ड पढ़ने के बाद बाहर किया होगा। आपने कार्ड वापस लिया नहीं होगा इसलिए अंदर चला गया। कल इतवार है इसलिए अब परसों ही मिलेगा।

मुझे याद आया कि कार्ड मशीन के अंदर से बाहर तो आया था लेकिन उसके साथ कोई सूचना नहीँ आई थी कि कार्ड वापस ले लीजिये वरना अंदर चला जाएगा तो अगले दिन मिलेगा। मैं तो स्क्रीन पर सूचना का इंतजार ही करता रहा और उधर कार्ड मशीन ने गिरफ्तार कर लिया। अब जमानत सोमवार को होगी। पहचान पत्र और बैंक की अपडेटेट पासबुक के साथ जाना होगा।

जबसे एटीएम आया करीब 15-20 साल हुए होंगे हमारे साथ इस तरह का पहला हादसा था। इसके पहले पैसे नहीं निकले, कट गए, एटीएम कार्ड नहीं काम किया, पिन गलत होने पर पैसा नहीं निकला, पैसे कम हो गए, मशीन में फंस गए। सब हुआ और सबके समाधान हुए। तार्किक सा लगा वह सब। लेकिन एटीएम कार्ड आप निकालना भूल जाओ वह मशीन अपने में कर ले और कहे -'जाओ कल आना कार्ड लेने।' यह पहली बार हुआ। ग्राहक को उसकी अज्ञानता की जैसे सजा सुनाई हो एटीएम ने एक दिन के लिए।

मैंने बैंक के कर्मचारी से बात की। बोली मैनेजर नहीं है। मैंने कहा-' ये कैसी मशीन है आपकी जो बिना बताये कार्ड जब्त कर लेती है और कहती है कल आना। ऐसा तो मैंने कभी नहीं देखा पहले।'

मन में शायद उसने यही बोला हो कि चलिए इसी बहाने यह भी देख लिया। लेकिन प्रकट में बोली-'सर, हमारे एच डी ऍफ़ सी में तो ऐसा ही होता है।'

हमने पूछा-'आप एच डी ऍफ़ सी की कर्मचारी की तरह नहीं एक आम नागरिक की तरह भी सोचें।मैं तो जबलपुर में हूँ, आ जाऊँगा परसों। लेकिन कोई बाहर का आदमी हो। मुम्बई ,कलकत्ता से आया हो। उसको पैसे की जरूरत हो। ट्रेन हो शाम को। वह क्या करेगा? वह पासबुक भी तो लेकर नहीँ चलेगा न।'

इस पर उसने बड़ी मासूमियत से कहा-' सर, कार्ड तो आजकल बैंक से फौरन बन जाते हैं। कोई प्राब्लम होगी तो दूसरा एटीएम बन जाता है।'

यह सुनकर मुझे जो लगा सो लगा लेकिन मैंने कहा यही कि बैंक में दूसरा एटीएम बनने के पहले भी तो एफआईआर करानी होगी। थाने में मुंशी जरूरी थोड़ी फौरन लिख ले ऍफ़ आई आर।

लेकिन उसकी भी सीमाएं होंगी। वह कुछ बोली नहीं। चुप रही। मैं भी चुपचाप चला आया।

मेरा इस तरह का पहला अनुभव था कि कार्ड वापस न लेने पर मशीन कार्ड जब्त कर ले। ज्यादातर बैंक एटीएम कार्ड स्वैप करने वाली मशीन इस्तेमाल करते हैं। कुछ में ऐसा होता है कि कार्ड मशीन रख लेती है और पूरे ट्रांजैक्शन होने के बाद वापस कर देती है। लेकिन यहां तो बिना किसी कार्यवाही के मशीन ने जब्त कर लिया।

पता नहीं किस तर्क को ध्यान में रखकर इस तरह की मशीन बनाई गयी होगी। हो सकता है यह सोचा गया हो कि अगर कार्ड वापस नहीं लिया तो कहीं चला तो नहीं गया कार्ड धारक। कोई दूसरा इसका गलत इस्तेमाल न कर ले इसलिए धर लो इसे। जब असली मालिक आयेगा , सबूत सहित तो उसे दे देंगे कार्ड।

अगर यही तर्क है तो ठीक नहीं है। कोई भी व्यक्ति एटीएम आता है तो या तो पैसे का लेनदेन करने बैलेंस की जानकारी लेने। वह लिए बिना क्यों जाएगा। खाली कार्ड डालकर भूल जाने के लिए थोड़ी कोई आएगा।

व्यवस्था यह होनी चाहिए कि कार्ड मशीन से बाहर आ जाने के बाद फौरन स्क्रीन पर मीनू आना चाहिए। कार्ड निकलने के बाद ही आगे कोई कार्यवाही होनी चाहिए। न निकाले कार्ड तो आगे कुछ न हो।

बहरहाल आज के अनुभव के बाद यह कसम खाई की आइन्दा से एच डी ऍफ़ सी के एटीएम में कदम न रखेंगे। रखना भी पड़ा तो कार्ड डालें भले बाद में लेकिन निकाल पहले लेंगे।

आपके साथ भी कभी हुआ है क्या ऐसा?
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Thursday, January 28, 2016

गन्ने से गुड़ तक


गन्ना पेरा जा रहा है। छिलका बाहर गिर रहा है।

दो कोल्हू आमने-सामने चल रहे हैं।

एक और सीन कोल्हू का।

गन्ने का रस गरम किया जा रहा है। नालियां
 ऊपर आई गन्दगी को निकालने के लिए हैं।
रस गाढ़ा होकर गुड़ बनने के लिए तैयार है।
खोये की तरह औंटकर गाढ़ा किया जा रहा है।
और गाढ़ा होने पर बगल में रखे साँचे में डाला जाएगा इसको।
 इस स्थिति तक आये हुए रस को बचपन में राब के रूप में खाया है हमने।

 
गन्ने के छिलके सुखाते मजदूर
घूमघूम कर सुखाते है ईंधन को उलट-पलटकर
गन्ने का खेत और बगल में पेरे गए गन्ने से निकले छिलकों का ढेर।
ओमप्रकाश उम्र 19 साल। 3 भाई।
मजूरी के 170 रुपया। मिस्त्री को 250 रूपया।
कोई नशा नहीं करते। शादी करके मरना है क्या।
 सब मजूर 170 रूपया पाते हैं।
लखनऊ में 250 रुपया मिलता है।
6 महीने सीजन चलता है। उसके बाद बंद।
 
भट्टी में ईंधन झोंकता बालक



रंजीत मिल मालिक कुछ खेत खुद के कुछ किराए के।
 दिन भर में 18 से 20 कुंतल गुड बनता है।
7 साल पुराना कोल्हू है। थोक दाम 23 से 24 रुपया प्रति किलो।
 व्यापारी खुद ले जाते हैं। फुटकर 30 रुपया प्रति किलो।
 
पिछले दिनों लखीमपुर से सीतापुर के रास्ते में कोल्हू देखा। गन्ने के खेत के पास ही लगे थे दो कोल्हू। खेत से कटा हुआ गन्ना कोल्हू के पास ही जमा था। उठाकर कोल्हू में पेरा जा रहा था। धूल, मिट्टी समेत। कोल्हू से निकलकर गन्ने का रस अलग-अलग सीमेंट की बनी एक हौद से दूसरे में जा रहा था। इस प्रक्रिया में गन्ने का रस गाढ़ा होता जा रहा था।

रस के एक हौद से दूसरे में जाने के दौरान उसको गरम भी किया जा रहा था। खौलते रस से ऊपर जो मैल उतरा रहा था उसको बाहर निकालते जा रहे थे। रस जो शुरू में कालिमा युक्त था वह मैल निकालने की प्रक्रिया में गोरा होता जा रहा था। आखिरी वाली हौद में कोई पाउडर सा मिलाया गया जिससे रस और उजला हो गया। गन्ने का रस काले लाल/गुलाबी करने के लिए एक केमिकल मिलाया गया। शक्कर जो भक्क सफेद और दानेदार दिखती है उसके बनने में क्या-क्या मिलता होगा इसकी कल्पना करिये।
सबसे आखिर की हौद से निकलने के बाद रस गाढ़ा हो गया तो उसको एक आयताकार हौद में खोये की तरह औंटाया गया। और गाढ़ा हो जाने पर कटे हुए शंकु के आकार के लोहे के साँचे में भर दिया गया । कुछ देर में यह गुड़ बन गया।

गन्ने के पेरने के दौरान उसके छिलके का उपयोग वहीं उसको सुखाकर ईंधन के रूप में किया जा रहा था। कोल्हू से निकले छिलके के चट्टे खेत में लगे थे। उनको धूप में छितराने के लिए कई मजदूर लगे थे। सूख जाने पर वही ईंधन सुलगाकर उससे रस खौलाया जा रहा था। 1 से 2 घण्टे में गन्ने के छिलके ईंधन के रूप में जलने के लिए तैयार हो जाते हैं।

गन्ना चूसे हुये छिलके को चिफुरी कहते हैं। एक बार मेरे पिताजी किसी को खेत में गन्ना चूसने के किस्से सुना रहे थे। एक सुनने वाले ने मासूमियत से पूछा-'काहे दादा, जब गन्ना चूसत हुइहौ तौ चिफुरी तौ बहुत हुई जाती हुईहै।' :)

गन्ने के रस से गुड़ बनने के दौरान जो गन्दगी निकलती है (माई कहते हैं उसे) उसका उपयोग ईंट बनाने वाले भट्टे ईंधन के रूप में और खेतों में खाद के रूप में होता है। इस तरह गन्ने का कोई भी अंश बेकार नहीं जाता। हरेक का उपयोग होता है।

वहां काम करने वाले लोग आसपास के गाँव के ही लोग हैं। एक मजदूर ने बताया कि उनको रोज के 170 रूपये और मिस्त्री को 250 रूपये मिलते हैं। आठ घण्टे की ड्यूटी के लिए। गन्ने पेराई का सीजन छह महीने रहता है। उतने दिन ये यहां काम करते हैं इसके बाद लखनऊ/कानपुर निकल जाते हैं रोजगार के लिए। वहां मजूरी 250/- रूपये रोज मिल जाती है।

गन्ने की किस्में गिनाई COG70, 038, लख़नौआ, आरती। लख़नौआ में रस कम निकलता है। लेकिन मिल में बहुत चलता है। शराब बनाने के लिए वह गन्ना प्रयोग होता है जिसमें रस पतला निकलता है। गन्ना 260 रूपये कुंतल है आजकल।

दिन भर में 18 से 20 कुंतल गुड़ बनता है कोल्हू में। थोक में 23 से 24 रूपये में व्यापारी ले जाते हैं। मतलब गन्ना से गुड़ बनने के पर कीमत में 100 गुना बढ़ जाती है। खुद जाकर बाजार में बेंचने पर 30 रूपये किलो बिकता है गुड़। बाजार में ग्राहक को 40 से 50 रूपये प्रति किलो मिलता है। मतलब गन्ने के दाम का 200 गुना करीब।

गन्ने के कोल्हू छह महीने ही चलते हैं। इसके बाद बन्द। शुरुआत करते हैं तो कोल्हू की ग्राइंडिंग वगैरह कराते हैं।

हम लोग गन्ने का रस लेकर आये प्लास्टिक की बोतल में। घर में चावल और गन्ने के गठबंधन से रसाएर बना। गुड़ की भेली इतनी नरम थी कि हाथ से मोड़ते ही शराफत से दो टुकड़े हो गयी।
गन्ना खेत में अकड़ा खड़ा रहता है। पेरे जाने पर अकड़ खत्म हो जाती और मिलकर मीठा हो जाता है। इस बात को ध्यान करते हुए एक तुकबन्दी कभी की थी:

उई बने रहत, उई बनी रहति
पर दोनों गन्ना अस तने रहत
औ मिलि 36 की सृष्टि करत।
अल्ला से यही प्रार्थना है
ईश्वर से यही गुजारिश है
यो गन्ना बदले गुड़ भेली माँ
और 36 उलटैं 63 माँ।
सबजन मिलजुल कर बने रहें
हंस-हंस, खिल-खिल करे रहें।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207214638457746

शाबास सुलेंद्र

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Sunday, January 24, 2016

लीसा और जॉन से मुलाकात


डेनमार्क निवासी लीसा और जॉन
कल गोवा प्रवास का आखिरी दिन था।

सुबह बीच पर गए तो देखा कि खूब सारे सफेद पक्षी समुद्र की सतह के ऊपर मंडरा रहे थे। इसके पहले नहीं दिखे थे इतने पक्षी। कुछ पक्षी समुद्र की लहरों के ऊपर गोल घेरे में ऐसे बैठे थे मानों समुद्र पर गोल मेज सम्मेलन कर रहे हों।

कन्नौज के शाहनवाज खान बीच पर चाय बेंचते दिखे। इसके पहले शानू मिले थे वो भी कन्नौज के ही थे। लगता है पूरा कन्नौज इत्र बेंचना छोड़कर गोवा में चाय बेंचने निकल पड़ा।

वहीँ डेनमार्क निवासी जॉन और लीसा मिले। जॉन अपने कैमरे से समुद्र तट की फोटोग्राफी कर रहे थे। लीसा अपने 'नयन कैमरों' का उपयोग करते हुए दृश्य देख रहीं थीं।

लीसा गेंदे की फूल की माला पहने हुयीं थीँ। अच्छी लग रहीं थीं। उनसे बात करते हुए डेनमार्क के बारे में काफी जानकारी हासिल हुई।


कन्नौज के शाहनवाज कलंगूट पर चाय बेंचते हुए
लीसा और जॉन अक्सर भारत आते रहते हैं।यह उनका दसवां दौरा है गोवा का। गोवा के अलावा दिल्ली और मुम्बई भी घूमा है उन्होंने। दिल्ली और मुम्बई के मुकाबले गोवा अच्छा और साफ़-सुधरा लगता है।

डेनमार्क में आजकल तापमान शून्य से दस डिग्री नीचे है। हम यहां 4 /5 डिग्री में कंपकपाये जा रहे हैं। 15 डिग्री और नीचे क्या हाल होंगे, सोचकर ही कँपकँपी छूट रही।

जॉन 69 साल के और लीसा 71 की हैं। रितायर्ड हैं दोनों। पेंसनर। लीसा अपराधियों की काउंसलिंग करके उनको सुधारने का काम करती थीँ। मैंने पूछा कि कितने लोग सुधरे काउंसलिंग से तो बोलीं- ' ज्यादा नहीं। कम लोग ही सुधर पाये। बहुत मुश्किल और समय खपाऊ काम है।'

उन्होंने हमसे पूछा कि क्या भारत में भी इस तरह की अपराधियों को सुधारने की व्यवस्था है। हमने बताया किशोर अपराधियों के लिए सुधार गृह (जहां से निकलने के बाद बच्चा पक्का अपराधी बनकर निकलता है) की व्यवस्था है। बड़ी उम्र के लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं है।

शायद डेनमार्क की आबादी कम है इसलिए ऐसी व्यवस्था वहां सम्भव है--लीसा ने कहा।

लीसा की बेटी पत्रकार है और दामाद कार बेचने का धंधा करता है। लीसा को चित्रकारी का शौक है। जॉन को फोटोग्राफी का।

डेनमार्क छोटा देश है। आमतौर पर खुशहाल। लोग आर्थिक रूप से सम्पन्न से हैं। सामाजिक सम्बन्ध भी ठीक-ठाक हैं। समस्याएं पूछने पर बोलीं-'समस्याएं तो हर समाज में होती हैं, हमारे यहां भी हैं, पर ऐसी कोई बड़ी समस्या नहीं हमारे यहां।'


कलंगूट बीच पर चाय की चुस्की
दिल्ली में देखी गरीबी का जिक्र किया लीसा ने। हमने सोचा अच्छा हुआ कि बस्तर, विदर्भ, बुन्देलखण्ड, उड़ीसा नहीं गयीं वरना क्या हाल होता इनका।

70 पार के डेनमार्क दम्पति एकदम चुस्त-दुरस्त दिख रहे थे। अपनी उम्र नहीं बताती तो यह अंदाज लगाना मुश्किल था कि लीसा की उम्र 71 साल होगी।

उनका फोटो खींचा। देखकर खुश हुए तो हमने उनका ईमेल आई डी माँगा ताकि उनको फोटो भेज दें। लीसा ने अपना कार्ड दिया। उसमें उनका ईमेल पता, साइट का यु आर एल (www.lisejuhl.dk) दिया है। कमरे पर आकर फोटो भेजने के बाद हम लीसा की साइट देखते हैं। उसमें गोवा के कुछ किस्से भी हैं। लेकिन समझ नहीं आये। कुछ चित्र भी हैं लीसा के बनाये हुए।


ज्वॉयसिल (दांये) अपनी साथिन के साथ
होटल से विदा लेते हुए काउंटर पर काम करने वाले ज्वॉयसिल का फोटो लेते हैं। काउंटर के पास में ही कमरा होने के कारण चाबी काउंटर में जमा करते हुये दिन में कई बार बात होती रही ज्वॉयसिल से। 31 साल की है वो। 7 साल से होटल में काम कर रही है। पति अबूधाबी गया है कमाने के लिए। साल में एकाध महीने के लिए आता है।

यह कमाने का चक्कर भी मजेदार है। कमाई के लिए कन्नौज का लड़का गोवा में चाय बेंचता है। गोवा का लड़का परिवार छोड़कर अबूधाबी में खटता है जाकर। अबूधाबी वाले शायद कहीं और जाकर पसीना बहाते हों। वहां के लोग कहीं और.....।

गोवा से टी शर्ट और घुटन्ना वाले मौसम का हफ्ता भर आनंद उठाने के बाद अब फिर रजाई कम्बल वाले मौसम की शरण में आ गए--जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै।

 https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207187338495264

Saturday, January 23, 2016

बर्टिल (bertil) से मुलाकात


कल सुबह बीच पर बर्टिल (bertil) से मुलाकात हुई। स्वीडन के रहने वाले , 63 साल के बर्टिल बालू पर आलथी-पालथी मारे बैठे , समुद्र दर्शन कर रहे थे। हम भी बगल में धसककर बैठ गये और बतियाने लगे।
बात की शुरुआत नाम के मतलब से हुई। बर्टिल मतलब -प्रकाश। मेरा नाम भी पूछा। मैंने बताया-'अनूप मतलब जिसकी उपमा न हो। मतलब यूनीक।'

इस पर हंसते हुए बर्टिल ने कहा-'एवरीबडी इस यूनीक। यू टू।' सब अनोखे होते हैं। तुम भी हो।

हफ़्ते भर पहले ही आये हैं बर्टिल गोवा। इसके पहले भी कई बार आ चुके हैं। जहां ठहरे हैं वहां की साफ़-सफ़ाई की तारीफ़ करते हुये बताते हैं - ’वे लोग बर्तन मिनरल वाटर से धोते हैं।’ शायद पूड़ी बहुत अच्छी लगी सो कई बार जिक्र किया उसका।

’प्लम्बर’ का काम करते हैं बर्टिल स्वीडन में। इस समय स्वीडन में ठंड बहुत है। तापमान बर्फ़ के तापमान से 15 डिग्री नीचे है। अपने घर का फ़ोटो दिखाते हैं बर्टिल। बर्फ़ से ढकी हुई छत और मैदान। इतनी सर्दी से बचने के लिये ही भागकर गोवा आये हैं बर्टिल।

प्लम्बर मतलब ’पाइप फ़िटर’ मतलब नलसाज। पाइप का काम करने वाला आदमी। सहज रूप से तुलना करने लगता हूं। भारत में नलसाज का काम करने वाला भला कोई ऐसे किसी दूसरे देश जाकर छुट्टियां मना सकता है क्या? सामान्यत: तो कत्तई नहीं। 200 -300 रुपया दिहाड़ी मिलती है भारत में नलसाज को। महीने भर की कमाई मिलाकर एक दिन सिर्फ़ ठहरने के किराये के बराबर होगी कहीं।

भारत और स्वीडन की बातें करते हुये बर्टिल ने बताया कि यहां की सबसे अच्छी बात वैवाहिक और पारिवारिक संबंधों का स्थायित्व बहुत अच्छी बात है। स्वीडन में तलाक की दर 50% से ऊपर है। खुद के परिवार के बारे में बताते हुये बर्टिल ने बताया कि उनका 25 की पारिवारिक जिंदगी जीने के बाद तलाक हुआ। दो लड़के ( जुड़वा) और एक लड़की हैं। लड़के 43 साल के हैं। लड़कों और लड़की को मिलाकर कुल सात नाती-नातिन हैं। सबके फ़ोटो दिखाये खुश-खुश दिखते हुये।

तलाक का कारण पूछने पर बताया -’ पता नहीं। लेकिन लगता है कि हम लोगों के पास एक-दूसरे के लिये समय नहीं था। हम दोनों की अपने काम और कमाई इतना व्यस्त हो गये कि एक दूसरे के लिये समय ही नहीं निकाल पाते थे। तलाक हो गया।

तलाक के बाद पिछले दस सालों से अपनी मंगेतर के साथ रह रहे हैं बर्टिल। 59 साल की अपनी मंगेतर का फ़ोटो दिखाते हुए बर्टिल ने कहा- ’ वह फ़ोटो में जितनी सुन्दर दिखती है, वास्तव में उससे ज्यादा सुन्दर है।’ प्रेमिका भी तलाक शुदा है। उसके भी बच्चे हैं। बच्चों के साथ रहना उसको अच्छा लगता है।

’प्रेमिका आपको खूब प्यार करती है? - इस सवाल का जबाब देते हुये बर्टिल कहते हैं- ’आई थिंक सो। मुझे ऐसा लगता है। रोज मुझे फ़ोन करती है-’जल्दी, आ जाओ। कम सून। ’

उसको साथ क्यों नहीं लाये ? पूछने पर बताते हैं कि लम्बी यात्रा करना उसको पसंद नहीं है इसलिये नहीं लाये। लेकिन शायद अगली बार उसको साथ लाने के लिये राजी कर सकूं।

तलाक के पहले पत्नी के साथ घर साझा था। तलाक के बाद पत्नी ने घर छोड़ा तो उसका आधा पैसा उनको देना जिसे लोन लेकर चुकाया बर्टिल ने। लेकिन खुश हैं इस बात से कि अब उनका लोन चुकता होने के बाद घर उनका अपना हो गया। दोनों अब भी मित्र हैं। लेकिन मिलना-जुलना नहीं होता।

बर्फ़ से ढंके घर को दिखाते हुये बर्टिल ने बताया कि वे जिस गांव में रहते हैं वहां कुल तीन घर हैं। तीन घर वाले गांव में रहने की व्यवस्था कैसे होती होगी यह सोचकर हम ताज्जुब करते हैं।

स्वीडन के बारे में हम भी जानते हैं यह बताने के लिये हमने अलोफ़ पाल्मे और बाफ़ोर्स तोप के बारे में बताया। उन्होंने अल्फ़्रेड नोबल का किस्सा सुनाया।

स्वीडिश होने के बावजूद अंग्रेजी अच्छे से बोल रहे थे बर्टिल। इसका कारण स्वीडिश का इन्ग्लिसाइज्ड होते जाना बताया बर्टिल ने।

हमने पूछा फ़ेसबुक खाता है क्या उनका? इस पर बताया- ’ हां है पर उसमें ज्यादा इंटरेस्ट नहीं उनको। लोगों से आमने-सामने मिलना ज्यादा अच्छा लगता है उनको।

चलते समय गले मिलने की कोशिश की। लेकिन पेट पहले मिले। इसके बाद हम कमरे पर लौट आये। दिन में घूमने गये। उसके किस्से फ़िर कभी। अभी तो जा रहे हैं समुद्र बीच पर टहलने। चलिये आप भी मेरे साथ।
‪#‎गोवारोजनामचा‬
 
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