Sunday, December 18, 2016

अरे स्टेटस बच्चा जल्दी आओ

अरे स्टेटस बच्चा जल्दी आओ
फेसबुक पर फौरन चढ़ जाओ।
सब जोहते रहते हैं बाट तुम्हारी
देखते ही मारते लाइक किलकारी।
जाड़ा बहुत जोर का है भैया
खुद तो ओढ़े पड़े हो रजाइयां
हमसे कहते फेसबुक पर जाओ
ठिठुर ठिठुर कर चाहे मर जाओ।
हम न आएंगे अब झांसे में
नहीं जुटेंगे फेसबुक तमाशे में
सोयेंगे लम्बी तान के भैया
तुम करते रहना ता ता थैया।
देखो स्टेट्स भी बहक गया
कित्ता समझाया पर सटक गया
उसको तो हम देखेंगे फुरसत में
आप इसी से काम चलाओ।
-कट्टा कानपुरी

Friday, December 16, 2016

सूरज भाई छापेमार बन गए

सूरज भाई छापेमार बन गए
कोहरे को पकड़, रगड़ दिए।
ठण्ड के थोड़े पर कतर दिए
हवा, धूप के हाथ मिला दिए।
उजाले की गस्त भी बढ़ गयी
धूप भी जरा और गुनगुनी हुई।
धूप मुस्कराकर अब पसर गई
सुबह अब यहां सुहानी हो गई।
धूप का टुकड़ा इधर टहल रहा
बच्चा मानो आँगन में मचल रहा।
घास-फूल मौज से इठला रहे
मानों इनके अच्छे दिन आ गए।
यह तो यहां का हाल है कहा
धूप का हाल कैसा हैं वहां?
-कट्टा कानपुरी

Sunday, December 11, 2016

सर्दी का मौसम



दिसम्बर का महीना शुरु होते ही कायनात ने मौसम बदलने की घोषणा कर दी। सर्दी का मौसम आ गया। कोहरे की चादर ओढे  पेड़-पौधे सूरज की तरफ़ मुंह करके खड़े हो गये। एटीएम के बाहर नोट-निकासी के लिये खड़ी जनता की तरह वे सूरज से गर्मी की सप्लाई का इंतजार करने लगे।  किरणों के काम के घंटे कम हो गये। उनके दर्शन दुर्लभ हो गये।  ठण्डक की सप्लाई बढ़ा दी गयी।  सर्दी के  कपड़े निकलने लगे। लोग पहन-ओढकर निकलने लगे। जगह-जगह कूड़े के ढेर के अलाव जलने लगे। लावारिश मौतें ठंड के खाते में जुड़ने लगी।


क्या पता सूरज भाई के यहां भी कोई ’रोशनी घोटाला’ हुआ हो। सूरज के केन्द्र से चली करोंडों-अरबों डिग्री की गर्मी सतह तक आते-आते 6000 डिग्री ही बचती है। किसी ने सोचा यह उजाले का भ्रष्टाचार रुकना चाहिये। अरबों-खरबों के फ़ोटान जहां दबे हैं वे सब निकलने चाहिये। वहां भी नोटबंदी की तर्ज पर ’किरणबंदी’ हो गयी हो। ज्यादा फ़ोटान वाली किरणों की सप्लाई बन्द हो गयी हो। डिकिरणाईजेशन लागू हो गया हो सूरज भाई के यहां भी। इसीलिये सुबह-शाम रोशनी की किरणों की सप्लाई में कमी हो गयी हो। 

ट्रेनों ने  देरी से चलना शुरु कर दिया है। जहाजों की उड़ाने निरस्त होने लगी हैं। मंहगी गाड़ियां रफ़्तार में साइकिलों से मुकाबला करने में जुटी हुई हैं। लोग मुंह की भाप से खुद को गरम करके काम चलाने लगे हैं। मूंगफ़ली टूंगते हुये देश की समस्याओं के हल खोजने के काम में तेजी आ गयी है। चाय की खपत में पूरे देश में इजाफ़ा हो गया है। चाय वालों की पूछ और नखरे बढ़ गये हैं। 

गलियों में कोहरा पसरा हुआ है। लेकिन सड़क के  कोहरे को गाड़ियों ने कुचलकर चिंदी-चिंदी कर दिया है। जो कोहरा कुचले जाने से बचा है उसको गाड़ियों के धुंये ने सुलगाकर खतम कर दिया है। बचा हुआ कोहरा जानबचाकर पेड़ों की टहनियों, पत्तों में जाकर छिप गया है। जान जाने के डर से थर-थर कांप रहा है बेचारा। पेड़ उसके थरथराने से हिलडुल रहे हैं। ऊपर से आती किरणों की सवारी देखकर कोहरे बेचारी की सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम हो गयी है।

भीख मांगने वाली का बच्चा कनटोपा पहने अपनी मां से चिपका है। महिला चुपचाप हथेली फ़ैलाये बैठी है। लोग आते-जाते उसको देखते निकल रहे हैं। जेब से हाथ निकालना कठिन होता जा रहा है। पैसा निकालना  तो और भी कठिन। नोटबंदी के समय में कैसलेस भीखकी व्यवस्था का इंतजाम किया ही नहीं है महिला ने। कैसे मिलती भीख? भीख मांगने के लिये भिखारियों को भी वोट मांगने वाले लोगों की तरह आधुनिक होना पड़ेगा।

यह बात हम बचपन से जानते हैं कि सर्दी में चीजें सिकुड़ जाती हैं। लोग अपनी ऊर्जा को बचाकर रखने के लिये कपड़े लादने लगते हैं। दिन में चार बार नहाने वाले , चार दिन में एक बार पानी गिराने लगते हैं। लोग घर से निकलना कम कर देते हैं। 

लेकिन इस बार की सर्दी में नजारे अलग तरह के हैं। लोग एटीएम की लाइनों में पैसे निकालने के लिये खड़े हैं।  सर्दी से मुकाबले के लिये जगह-जगह अलाव की जगह इस बार भाषणों से आग उगलने की व्यवस्था की गयी है। लोग भाषण सुनकर गरम हो रहे हैं। उबल रहे हैं। ठंड से मुकाबले की यह नयी तकनीक विकसित हुई है। आगे चलकर इसका उपयोग पेट की आग बुझाने के लिये भी किया जायेगा। शुरुआती दौर में कुछ समस्यायें आ रही हैं लेकिन लोग लगे हुये हैं इस तकनीक में महारत हासिल करने में। कुछ दिन बाद देश की हर समस्या का इलाज भाषणों से ही होना संभव हो जायेगा। तब शायद हम दुनिया में पहले देश होंगे जहां भाषणों के माध्यम से समस्याओं के हल निकाले गये। अपना देश एक बार फ़िर दुनिया का सिरमौर बन जायेगा। 

लेकिन यह जब होगा तब होगा। फ़िलहाल तो सर्दी का मौसम है। खुद को बचाकर रहिये। पहन-ओढकर घर से निकलिये। मफ़लर कसकर रखिये। कपड़े न हों तो कोई बात नहीं, सिकुड़कर रहिये। जितना सिकुड़ेंगे, आपके जिन्दा रहने की संभावनायें बढती जायेंगी। 

क्या सोच रहे हैं भाई ! सिकुड़िये जल्दी से । आपके सिकुड़ने से जो जगह निकलनी है उस पर कब्जा करने के लिये अकड़े हुये लोग इंतजार कर रहे हैं। देरी करेंगे तो जनहित/देशहित में वे आपको  रगड़ देंगे।

जिन्दा रहने के लिये सिकुड़कर रहना सीखना आना चाहिये।


Sunday, December 04, 2016

देशभक्ति का मौसम


मौसम तीन तरह के होते हैं- जाड़ा, गर्मी, बरसात। जाड़े में सर्दी पड़ती है। गर्मी में गरम हवा चलती है। बरसात में पानी बरसता है। लेकिन यह तो शुद्ध मौसम की बात है। आजकल मिलावट का जमाना है। हर तरफ़ मिलावट हो रही है। ईमानदारी में बेईमानी, राजनीति में धूर्तता , देशभक्ति में गद्दारी, सफ़ेदधन में कालेधन की इतनी महीन मिलावट होने लगी है कि पहचानना मुश्किल होता है। इसी तरह मौसम में भी मिलावट होने लगी है। कब जाड़े में पानी बरसने लगे कहना मुश्किल। जाड़े में कब पंखे चलने लगें यह भविष्यफ़ल बताने वाले भी नहीं बता पाते।

प्रकृति के बनाये मौसमों के अलावा इंसान ने भी कई मौसम अपने हिसाब से बनाये हैं। इनमें देशभक्ति का मौसम सबसे प्रमुख होता है। हर देश में यह अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। जैसे जापान में मजदूर लोग नाराज होते हैं तब उत्पादन बढा देते हैं। लेकिन अपने यहां नाराजगी का इजहार काम बन्द करके और कहीं-कहीं बना हुआ सामान जलाकर करते हैं।

अपने देश में देशभक्ति का मौसम कई तरह से मनाया जाता है। अलग-अलग तबके के लोगों के अपने-अपने अंदाज हैं।
टाप क्लास की देशभक्ति ऊपर के 1% तबके की होती है। इनके कब्जे में देश के 90%  संसाधन होते हैं। वे लोग जो कुछ भी करते हैं वही देशभक्ति होती है। उनकी हर लीला देशभक्ति है। उनके द्वारा की गई हर लूटपाट, गड़बड़ी, गद्दारी को देशभक्ति के खाते में जोड़ा जाता है। इनकी देशभक्ति के हाथ कानून के हाथ से भी लम्बे होते हैं।  देशभक्ति के काम में सहयोग के लिये वे सरकारों को काम पर रख लेते हैं। सरकारें  उनकी देशभक्ति में  सहायता करती हैं। जो सरकार उनकी देशभक्ति में अड़चन डालती है उसको वे  बदलवा देते है। इनकी देशभक्ति का डंका हर तरफ़ बजता रहता है। इनके लिये हर मौसम ’देशभक्ति का मौसम’ होता है। इसकी ’देशभक्ति का मौसम’ रंगीन, खुशनुमा, जायकेदार और आनन्ददायक होता है।

दूसरी तरह की देशभक्ति वह तबका मनाता है जो आबादी में 30-35% होगा। देशभक्ति का सबसे ज्यादा हल्ला यही तबका मचाता है। देशभक्ति के काम में आसानी के लिये सरकार को देश समझ लेता है। हल्ले में इजाफ़े के लिहाज से यह तबका खुद को दो भागों में बांट लेता है। एक सरकार समर्थक हो जाता है। दूसरा सरकार विरोधी। दोनों मिलकर देशभक्ति का हल्ला इत्ती जोर से मचाते हैं कि देश सुने तो बहरा हो जाये।  समर्थक तबका सरकार के हर कदम का समर्थन करता है। सरकार उनकी गर्दन काटने के लिये अध्यादेश लाये तो वे भारत माता की जय कहते हुये उनका समर्थन करते हैं। नोटबन्दी का मसला हो या सर्जिकल स्ट्राइक का किसी भी सवाल उठाने वाले को  देशद्रोही मानता है।


समर्थक लोग दिल लगाकर समर्थन करते हैं। नोटबंदी का समर्थन करने वाला दलाल कमीशन पर पुराने नोट बदलते हुये भारतमाता की जय का नारा लगाता है। ड्राइंगरूम में वन्देमातरम चिल्लाता है तो बीबी समझ जाती है 500 रुपये की गड्डी बदली। इंकलाब जिन्दाबाद सुनती है तो कहती है- ’आज 1000 के नोट बदलने वाले बहुत आ रहे हैं।’

बीच के तबके के लिये ’देशभक्ति का मौसम’ सरकार की हरकत निर्भर करता है। सरकार कोई कल्याणकारी काम करती है तो सरकार विरोधी तबका उसकी खिलाफ़त करते हुये ’देशभक्ति मनाने’ लगता है। सैनिकों के भले के लिये कोई स्कीम आती है तो जी भरकर सरकार की लानत-मनालत करता है। सीमा पर गोली खाने वाले सैनिक की तरफ़ खड़ा होकर सरकार के खिलाफ़ बयान देता है और नींद की गोली खाकर सो जाता है।

यह बीच का वर्ग  ’देशभक्ति का मौसम’ इतने बहुरंगी तरीके से मनाता है कि सच्ची में लगता है कि भारत विभिन्नता में एकता का देश है। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग विचार वाले लोग अलग तरह से राय रखते हैं। कोई बहस करता है। कोई तर्क-कुतर्क का सहारा लेता है। आमने-सामने होने पर जिन्दाबाद-मुर्दाबाद भी होता है। उत्साह में आने पर मारपीट भी हो जाती है। गाली-गलौज का मुजाहिरा करते हुये अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़े रहते हैं लोग। गाली-गलौज में मां-बहन करते हुये बताते रहते हैं कि देश नारियों के सम्मान के लिये कितना हलकान रहता है।

इन दोनों तबको के अलावा तीसरा तबका है। आबादी में सबसे बड़ा। औकात के लिहाज से सबसे गरीब। ऊपर के दोनों के तबके इस तबके की भलाई के नाम पर इसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। सरकारें इसकी भलाई के लिये काम इस तरह काम करती रहती हैं, इसको पता ही नहीं चलता। देश इसके भले के लिये बहस करता रहता है, इसको सुनाई ही नहीं देता। देश इसको मुख्यधारा में लाने का हल्ला मचाता रहता है। हर हल्ले के साथ यह तबका देश की मुख्यधारा से और दूर धकिया दिया जाता है। इस तबके के लिये  ’देशभक्ति के मौसम’  का कोई मतलब नहीं होता। इसके लिये हर मौसम बदरंग और  बेईमान है। हर मौसम में भकुआया रहता है यह तबका। जब कभी वह लोगों को देशभक्ति की बात करता सुनता है तो इसका मतलब समझ नहीं पाता। ’देशभक्ति का मौसम’ कैसा होता है उसको पता ही नहीं है। 

जिसके लिये जिन्दा रहना ही चुनौती हो उसके लिये ’देशभक्ति का मौसम’ कोई मायने नहीं रखता।

जाड़े के मौसम में बिस्तर पर कम्बल ओढकर  यह लिखते हुये देख रहे हैं कि विद्याबालन अपनी पिक्चर का प्रमोशन कर रही हैं। प्रधानमंत्री जी देश के लिये लाइन में लगे रहने वालों की तारीफ़ कर रहे हैं। घरैतिन थोड़ा ना नुकर के बाद एक बार से चाय पिलाने की बात पर सैद्धान्तिक रूप से सहमत हो गयी हैं।  कुल मिलाकर इधर मौसम में जाड़े, सौन्दर्य, देश और घर की  ’कातिलाना मिलावट’ है।  ’कातिलाना मिलावट’ बोले तो ’डेडली कम्बीनेशन’।

आपके उधर मौसम कैसा है?



  

Wednesday, November 30, 2016

हिन्दी साहित्य में रहना है तो लंगोट को मजबूत रखें


1. हिन्दी साहित्य में लंगोट का पक्का होने तथा लंगोट रक्षा की पुरानी परम्परा है। एक पवित्र परम्परा के तहत जोर इस बात पर है कि रचना चाहे कमजोर हो, पर लंगोट की पक्की हो।
2. रचना में अश्लीलता न आने पाये , इस पर हिन्दी साहित्य के वयोवृद्ध किस्म के बुजुर्गों तथा जवानों की नजर है। इस चक्कर में रचना का कचरा होता हो, तो हो!
3. हिन्दी कहानी, कविता या लेखों में अश्लीलता कहीं से प्रवेश न कर जाये, इसके लिये हिन्दी के पुरोधा किस्म के साहित्यकार रात-रात भर ड्यूटी पर जागते हैं, किसी कुंवारी, जवान बेटी के बाप की तरह।
4. कच्ची लंगोट के साथ हिन्दी साहित्य के अखाड़े में उतर रहे हो? इधर ब्रह्मचारी चाहिये।
5. हिन्दी में लंगोटी-युग , हिन्दी साहित्य के इतिहास के प्रारम्भ से जमा हुआ है।
6. हिन्दी में अश्लील रचनायें नहीं चलेंगी। इसके लिये हिन्दी के पाठ्कों को अंग्रेजी साहित्य देखना होगा। हम स्वयं भी वही देखते हैं।
7. बदमाशी और भारतीय संस्कृति साथ-साथ चलतीं रहें। हिन्दी कहानी पारिवारिक बनी रहे तथा अपनी मां-बहनों को पढ़वाने लायक रहे( दूसरों की मां-बहनों को पढ़वाने लायक साहित्य अंग्रेजी से लेकर हम स्वयं उन्हें देकर आयेंगे)
8. हिन्दी कहानी की नायिका नितान्त चरित्रवान रही है। कोई उस पर उंगली नहीं उठा सकता। वह नायक को भी हाथ नहीं धरने देती।
9. क्रांतिकारी प्रेम नहीं करता और हिन्दी में कई वर्षों से घनघोर क्रांति चल रही है।
10. हिन्दी कहानी की नायिका चिरकुंआरी है। वह चरित्रवती है। हिन्दी कहानी का नायक चरित्रवान है। जहां तक लेखक का सम्बन्ध है, वह तो बीसों बार लड़कियों से पिटने के बावजूद चरित्रवान है ही। हिन्दी साहित्य का हेडआफ़िस चरित्रवान एंड चरित्रवान लिमिटेड जैसा हो गया है।
11. हिन्दी साहित्य में रहना है तो लंगोट को मजबूत रखें। कसकर बांधे। बांधकर रखें।
12. कलम की लंगोट ढीली हुई, कि हमने हिन्दी से बाहर किया।
ज्ञान चतुर्वेदी के लेख ’हिन्दी साहित्य में लंगोट रक्षा’
यह लेख ज्ञानजी के व्यंग्य संकलन ’खामोश ! नंगे हमाम में हैं’ में संकलित है। यह संकलन पहली बार राजकमल प्रकाशन से 2002 में आया। 2015 में पेपरबैक संस्करण आया। ’हम न मरब’ में प्रयुक्त गालियों पर लिखे दिलीप तेतरबेे Dilip Tetarbe जी के लेख और बाद में Suresh Kant जी की इस बारे में की आलोचना के जबाब शायद ज्ञान जी ने पहले ही तैयार कर रखे थे।
किताब आन लाइन खरीदने का लिंक ये रहा http://rajkamalprakashan.com/…/khamosh-nange-hamam-mein-hai…

Monday, November 28, 2016

आदमी का प्रवासी हो जाना

पिछले हफ़्ते एक शादी के सिलसिले में दिल्ली जाना हुआ। नोयडा में रुकना! गाजियाबाद स्टेशन से नोयडा जाते हुये देखा दोपहर को एटीएम के बाहर लम्बी लाइन लगी थी। जगह कम होने के चलते गुड़ी-मुड़ी हुई सी लाइन। कानपुर और गाजियाबाद एक सरीखे से ही लगे।

नोयडा से दिल्ली की 50 किमी का सफ़र तय करने में ढाई घंटे लगे। सड़क भले चकाचक बन जाये लेकिन ट्रैफ़िक फ़ुल जाम मय। नया हाईवे भले लखनऊ से दिल्ली साढे तीन घंटे में पहुंचाने का दावा करे लेकिन लगता है नोयडा से दिल्ली की दूरी समय के हिसाब से ऐसी ही रहेगी।

जहां रुके थे सुबह वहां टहलने निकले। कालोनी के बाहर सब्जी की दुकान धरे राजकुमार गुप्ता मिले। गोपालगंज, बिहार से आये थे1998 में नोयडा। जंगल था तब सब यहां। अब जगह मिलना मुश्किल। 18 साल में देखते-देखते नोयडा एकदम्मे बदल गया। पहले खुद आये, फ़िर परिवार लाये। थोड़ी जमीन लेकर मकान बना लिये हैं पास के ही सेक्टर में। खुद आठवीं पास है। बेटा बीए में पढ़ता है। बिटिया भी स्कूल जाती है। उन दोनों को सिर्फ़ पढाने में लगाये हैं। काम-धाम से नहीं जोड़े।

हर तरह की सब्जी धरे हैं दुकान पर। गाजियाबाद से लाते हैं सब्जी। घरों में भी डिलीवरी देते हैं। आसपास के लोग फ़ोन करके आर्डर देते हैं। वे घर पहुंचा देते हैं। साथ में लड़के को रखे हैं। 5000 रुपया महीना देते हैं उसको। नोटबंदी के चलते थोड़ा बिक्री में फ़र्क पड़ा लेकिन अब पेटीएम ले लिये हैं।

जब आदमी प्रवासी हो जाता है तो उन बदलावों को भी सहजता से स्वीकार कर लेता है जिसको अपने घर में रहते हुये शायद उतनी जल्दी न स्वीकारता। बिहार का आदमी जब नोयडा पहुंचता है तो हर तरह के बदलाव को फ़ौरन स्वीकार कर लेता है। यही अगर बिहार मतलब घर में रहते होते गुप्ता जी तो अभी तक भुगतान के लिये वैकल्पिक तरीका अपनाने में समय लगाते।

नोयडा/दिल्ली में सेवा प्रदाता ज्यादातर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं। एक दिन की हड़ताल कर दें तो बैठ जाये दिल्ली/नोयडा ! लेकिन प्रवासी आदमी हड़ताल के लिये थोड़ी आता है। काम के लिये आता है।
बिहार जाते रहते हैं गुप्ताजी। इस बार छ्ठ पर जा नहीं पाये रिजर्वेशन के चलते। यहीं नोयडा में एक तालाब किनारे मनी छठ।
पास में ही रजाई भरने की दुकान पर सोनू मिले। मुरादाबाद के रहने वाले । गर्मी में कूलर का धन्धा करते हैं। जाड़े में रजाई भरने का। मतलब साल भर मौसम की मार से बचाने का काम करते हैं।।दिल्ली में सीखे एक दुकान पर कूलर का काम। रजाई का काम अपने बहनोई से सीखे। आठ-दस साल पहले आये थे दिल्ली। पास के ही सेक्टर में किराये पर रहते हैं।
रजाई अगर रुई, कपड़ा खुद का हो तो डेढ सौ रुपये में बना देते हैं। दुकान से लेने पर छह औ से सात सौ रुपये की पड़ती है रजाई। तीन से साढे तीन किलो तक रुई लगती है एक रजाई में। रुई भी अलग-अलग तरह की। डेढ सौ से सौ रुपये किलो तक की। जैसी मन आये भरवा लो। बात करते, काम करते रहे सोनू। हम तो ठेलुहा सो बतियाते रहे।
लेकिन आज तो हमको जाना है भाई दफ़्तर। हम चलें। आप मजे करो। शुभ दिन !

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209781542948754

Sunday, November 27, 2016

नये नोट-पुराने नोट



पिछले दिनों पुराने नोट बन्द हुये। नये चालू हुये। कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश एक हो गया। मिजोरम से महाराष्ट्र तक पूरा राष्ट्र एटीएम की लाइनों में खड़ा हो गया। सबका उद्धेश्य एक ही, पैसा निकालना। सबकी मंशा एक ही, बस किसी तरह एटीएम पैसा उगल दे। कष्ट सबको था लेकिन लोगों की मंशा में बदलाव नहीं आया। कर्म और विचार से पूरा राष्ट्र एक दिखा। जिस तरह लोग दरभंगा में खड़े थे उसी तरह दिल्ली में, जैसे जबलपुर में सीधे पैरों लाइन में लगे थे वैसे ही जामनगर में अपने पैरों पर खड़े मिले लोग। धर्म, क्षेत्र, भाषा, जातिभेद भूलकर लोग लाइनों में लग गये। नोटबंदी ने लोगों को एकात्म कर दिया। लोगों के शरीर भले अलग दिखे लेकिन ध्येय एक ही - “किसी तरह नोट निकल आयें एटीएम से।“
अद्भुत राष्ट्रीय एकता का मुजाहिरा हुआ नोटबंदी के बाद। सरकार और विपक्ष दोनों जनता की भलाई की चिन्ता में जुट गये। पूरा विपक्ष सरकार के विरोध में फ़ेवीकोल लगाकर साथ खड़ा हो गया। पूरी सरकार विपक्ष के मुकाबले एकजुट हो गयी। जनता अपना भला चाहने वालों से निर्लिप्त एटीएम की लाइन में खड़ी हो गयी। पूरा देश नोटबंदी पर बयान जारी करने लगा। नोटबंदी की परेशानियों के तेज में बाकी समस्याओं की आंखें चौंधियां गयीं। वे सब इकट्ठा शर्मिंदा सी होकर नेपथ्य में चली गयीं। सारे चैनल, अखबार, समाचार नोटबंटी पर बात-बहस करने लगे। पूरा देश नोटबंदी के बहस महासागर में छप्प-छैयां करने लगा। सम्पूर्ण राष्ट्र एटीएम से नोट पाने के एकमात्र ध्येय को पूरा करने में जुट गया। ऐसी दुर्लभ राष्ट्रीय एकता की भावना पर दुनिया के सारे सुख न्यौछावर। ऐसी एकता देखकर हमारे प्रचार से परहेज करने वाले मित्र ने नाम न बताने की शर्त पर सुझाव दिया -“जब भी देश में कभी राष्ट्रीय एकता पर कोई आंच आये, फ़ौरन नोटबंदी लागू कर देनी चाहिये।“
जो बड़े नोट कभी बाजार के बादशाह थे उनके हाल कौड़ी के तीन भी न रहे। जिनको तिजोरियों, तहखानों में छिपाकर रखते थे उनको लोग अवैध बच्चों की तरह कूड़ेदान में फ़ेंककर चलते बने। जिनके बिना बाजार का पत्ता तक न हिलता था वे खुद ही चलने-फ़िरने के मोहताज हो गये। बड़े नोटों के हाल दफ़्तरों के उन बड़े अधिकारियों की तरह हो गये जिनको उनकी बर्खास्तगी के बाद उसी दफ़्तर में घुसने की जगह न मिले जिसमें घुसने के लिये पहले उनकी अनुमति चाहिये होती थी।
नये नोटों के आने में देरी के चलते थोड़ी परेशानी हुई। जानकार लोगों के हिसाब से नोटों के बाजार में आने में देरी का कारण पहले तो यह हुआ कि ’सोनम गुप्ता’ ने नये नोट पर आटोग्राफ़ देने में देरी की। दूसरा और बड़ा कारण यह रहा कि जिनको नोट छापने थे वे बेचारे खुद नोट निकालने की लाइन में लगे थे। गोपनीयता के चलते उनको पता ही नहीं चला कि उनको ही नोट छापने थे। नोटों में छपने में हुई एकाध गड़बड़ी का कारण भी लोग यही बताते हैं नोट का डिजाइन फ़ाइनल करने वाले भी नोट निकालने की लाइनें में लगे थे। धक्कामुक्की में देख ही नहीं पाये और डिजाइन फ़ाइनल कर दिया। जब गलती पता चली तब तक नोट छपकर बाजार में टहलने लगे थे। और बाजार में तो पहुंचकर चाहे आदमी हो या नोट खर्च होना ही उसकी नियति होती है।
नोटबंदी का फ़ैसला देश में कालेधन पर अंकुश लगाने की मंशा हुआ। कालेधन को जैसे ही यह पता चला वह फ़ौरन खूब सारा सफ़ेद रंग खरीदकर ले आया और अपने को पूरी शिद्धत से सफ़ेद करने में जुट गया। जाकर जन-धन खातों के सफ़ेद तालाब में छुप गया, पेट्रोल पम्पों के टैंक में डूब गया, बैंक मैनेजरों को अपना कुछ अंश देकर सफ़ेद वर्दी पहन ली, सर्राफ़ा बाजार में जाकर सलवार-कुर्ता पहनकर फ़ूट लिया, भूखे-नंगों के खातों में जमा हो गया।
युद्धस्तर पर सफ़ेद होने लगा कालाधन। सफ़ेदपोशों के साथ खड़ा होकर ’काले धन’ के खिलाफ़ नारे लगाने लगा। नारेबाजी के बीच जैसे ही मौका मिलता वह सामने खड़े कालेधन को अपने में घसीटकर उसको सफ़ेद कर लेता और उससे भी कालेधन के खिलाफ़ नारे लगवाने लगता। कालाधन सफ़ेद होते ही कालेधन की बुराई में उसी तरह से जुट जाता जिस तरह जनप्रतिनिधि दलबदल करने के बाद पहले वाले दल की बुराई में जुट जाते हैं।
नये नोट के हाल घर में आई संयुक्त परिवार की उस बहू सरीखे हैं जिसकी चुटिया-कंधी की उमर बीतते ही ऐसे घर में शादी कर दी गयी हो जहां आते ही उसकी सास खतम हो गयी हों। हरेक की फ़र्माइश पूरी करते-करते बेचारे के हाल खराब हैं। कुल नोटों की जरूरत का 14% नोट बाजार में मौजूद हैं। बाजार के हाल ऐसे टापर बच्चे जैसे हैं जिसका एन इम्तहान के पहले पूरा सिलेबस और विषय बदल दिया गया हो फ़िर भी आशा की जाये कि वह इम्तहान में टाप ही करे। बेचारे के दिन की नींद और रात के चैन हराम हैं।
इसी बीच खबर आई कि उधर जन्नत में शाहजहां ने धूप में मूंगफ़ली टूंगते हुये औरंगजेब से शिकायती लहजे में कहा - “ तूने मुझे इमारतें बनवाने में फ़िजूलखर्ची के चलते मुझे कैदकर लिया था। अब देख कि मेरा बनवाया हुआ लालकिला अपने देश के लोगों के कितना काम आ रहा है। 500 रुपये के नोट पर कितना फ़ब रहा है लालकिला। कितना अच्छा लग रहा है यह देखकर कि पूरा हिन्दोस्तां मेरी बनवाई इमारत वाली रकम से खरीदकर रहा है। लग रहा है अभी हमारी हुकूमत काबिज है समूचे हिन्दोस्तां में। “
औरंगजेब का मन तो किया अपने अब्बाजान को किसी एटीएम में तब तक खड़ा रखे जबतक 500 रुपये का नोट न निकल आये। लेकिन फ़िर बाप समझकर छोड़ दिया उसने। उसको खर्च के लिये पैसे भी निकालने थे इसलिये चुपचाप एटीएम की लाइन में लग गया।
पुराने नोट नये नोट पर फ़िलहाल इतना ही। बाकी फ़िर कभी नये नोट निकलने के बाद !

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