Wednesday, June 06, 2018

नदी की कहानी कभी फ़िर सुनाना

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, अनूप शुक्ल सहित, मुस्कुराते लोग, धूप के चश्मे
राजा संग अनूप
इतवार को घूमकर लौटने के बाद मन किया गंगा नहाने का। घर से एक किलोमीटर दूर है। लेकिन नहाये नहीं अभी तक। दर्शन करके लौटते रहे।
इतवार को मन किया तो निकल लिये। झोले में कपड़े धर कर।
नहाने का मन राजा से मिलने के बाद बना। राजा दो दिन पहले मिले थे। शिवाले के पास रहते हैं। रोज दो घंटे गंगा में तैरते हैं, नहाते हैं। चार महीने में वजन बीस-बाइस किलो गिरा लिये हैं। कह रहे थे स्वीमिंग सबसे बढिया एक्सरसाइज है।
राजा सऊदी अरब के एक मॉल में काम करते थे। पता नहीं कैसे पैर , जांघ में इन्फ़ेक्शन हो गया। लौट आये। इलाज चल रहा है। वहां बिंदास खर्च के बाद महीने में तीस हजार बचते थे। यहां काम खोजते हैं तो आठ-दस हजार की नौकरी मिलती है। ठीक होने के बाद फ़िर जायेंगे। अर्थशास्त्र में पोस्टग्रेजुएट हैं।
सऊदी अरब और यमन की लड़ाई का किस्सा बताया। दोनों में जंग छिड़ी है। सऊदी अरब के सैनिक थुलथुल हैं। लड़ नहीं पाते ज्यादा। उनकी पोस्टिंग शहर की तरफ़ होती है। कम खतरनाक इलाके में। उनकी तरफ़ से बाकी देशों की सेनायें लड़ती हैं। कोई सैनिक मारा जाता है तो अस्सी-नब्बे लाख कम्पन्शेशन मिलता है परिवार वालों को।
लड़ाई-भिड़ाई पता नहीं किस लिये होती है। अच्छा खासा आदमी असमय शांत हो जाता है। लड़कर तबाह होते हुये आदमी शायद यह भी जताना चाहता है कि प्रकृति का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते दुनिया की सबसे बड़े बेवकूफ़ का ताज पर भी उसी का हक बनता है।
और भी तमाम किस्से सुनाये राजा ने। लब्बो-लुआबन यह कि शादी के दो साल अच्छे गुजरते हैं। फ़िर बवाल। कुंवारे में आदमी ऐश कर ले। फ़िर तो जंजाल है। यह भी कि यहां हर बात के लिये सवाल क्या कर रहे, कहां जा रहे? मने प्राइवेसी कुछ है ही नहीं।
राजा से मुलाकात के बाद ही हमने सोचा था कि जब भी मौका मिला, गंगा में डुबकी लगाते रहेंगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं और बाहर
राधा कृष्ण की आराधना करती राधिका
तो अपने इरादे पर अमल करने के लिये निकले। राधा अपने ठीहे पर अकेली थी। अपने तख्ते-ताउस पर। कृष्ण-राधा की एक मिट्टी की मूर्ति हाथ में लिये पूजा जैसी कर रही थी। राधे-राधे कहकर फ़िर पूजा में लग गयीं।
संदीप सीढियों पर ही मिल गया। हमको रास्ता दिखाने के लिये साथ चल दिया। रास्ता मतलब बीच धार तक पहुंचने का रास्ता। चप्पल हाथ में लेने को कहा उसने। हम ले लिये। आगे उदकता-फ़ुदकता , बतियाता चल दिया। हमने पूछा -’गंगा पार इतवार को बच्चों को पढाने आते हैं लोग। वहां जाया करो।’
उसने कहा- ’पता है।’
पता है के आगे कोई प्रतिक्रिया नहीं। बताया उसको पचास तक गिनती आती है। भाई जेल में बंद है। मसाला बेंचते पकड़ा गया था। पांच लाख रुपये मांग रहे पुलिस वाले छोड़ने के लिये। छोटा भाई शुक्लागंज में रहता है।
मसाला बेचते-खाते पकड़ा जाने पर जेल हो तो आधा कानपुर अन्दर हो। कोई और केस भी होगा। लेकिन पता नहीं उसको।
गंदे पानी , कीचड़ और जलकुम्भी के बीच से होते हुये हम कुछ साफ़ पानी के पास पहुंचे। संदीप कपड़े उतारकर दिगम्बर हो गया। पानी में कूदकर तैरने जैसा लगा। लेकिन हम और आगे चल दिये।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: वृक्ष, आकाश, घर और बाहर
तरबूज की फसल
बालू में तमाम सामान जगह बिखरे थे। कहीं कोई जूता औंधा पड़ा था, कहीं कोई शैम्पू का पाउच। एक जगह पान का बादशाह बालू पर पसरा हुआ था। शोले के ठाकुर की तरह। गड्डी में क्या तो शान रही होगी अगले की। पत्तों की कैबिनेट में दूसरे नम्बर की जगह। गड्डी से अलग बेचारा बालू में गुमनाम सा पड़ा था-’मार्गदर्शक पत्ते की तरह।’
आहिस्ता-आहिस्ता हम पानी में उतरे। पानी की धार धीमी थी । घुटने तक पानी में पहुंचकर हम नदी में आसन में लगाकर बैठ गये। पानी ने चारो तरफ़ से आलिगन करके हमारा स्वागत किया। मतलब कस के ’हग’ किया उसने मुझे। हम मुंड़ी झुकाकर पूरा पानी में गोता लगा लिये।
पानी की धार में बैठे-बैठे हमने सोचा हम भी अज्ञेय जी तरह नदी में कविता पाठ करें। ’अरे वो यायावर , रहेगा याद’ कविता की तरह कट्टा कानपुरी का कोई कलाम पढ ड़ालें। लेकिन कोई श्रोता न होने के चलते हमने अपना विचार नदी में ही विसर्जित कर दिया। वह कविता याद की:
नदी की कहानी कभी फ़िर सुनाना,
मैं प्यासा हूं दो घूंट पानी पिलाना।
मन किया नदी में धंसे हुये पोस्ट लिखें। शीर्षक लिखें-’ नदी में नहाते हुये’। लेकिन फ़िर लगा कहीं मोबाइल गिर गया तो दस हजार का चूना लग जायेगा। लिहाजा इस विचार को भी विसर्जित कर दिया।
चूने से याद आया कि बनारस में शंकर जी पर चढाने के लिये जो दूध बिकता है वह दूध न होकर चूने का घोल होता है। हमको शंकर जी पर बड़ा तरस आया। बताओ सब जानते हुये भी बेचारे चुप रहते हैं। चढावा आदमी क्या भगवान तक को कितना मजबूर कर देता है। लोग दूध की जगह चूने का घोल चढा रहे हैं और भगवान जी बेचारे कुछ बोल नहीं पा रहे। जब सबसे सीनियर देवताओं में से एक, संहार के देवता का यह हाल तो बाकी के देवताओं के हाल समझे जा सकते हैं।
भगवान जी की इस मजबूरी पर नंदन जी की यह कविता याद आ गयी:
"बड़े से बड़े हादसे पर
समरस बने रहना
सिर्फ देखना और कुछ न कहना
ओह कितनी बड़ी सज़ा है
ऐसा ईश्वर बनकर रहना!"
भगवान जी के यहां ट्विटर का चलन शायद हुआ नहीं है। वर्ना वे कुछ न कुछ जरूर करते। क्या पता हो उनका ट्विटर खाता जिसे उनका पुजारियों ने हैक कर लिया हो।
बहरहाल नदी में नहाते हुये हम चारो तरफ़ पानी से घिरे थे। अंजुरियों में पानी भरकर कई-कई बार पानी को महसूस किया। पानी उंगलियों की पोरों से शरारती बच्चियों सा इठलाता हुआ निकलता चला गया। पानी में हाथ ऊपर नीचे किया। कई-कई बार। आराम से हुआ। लेकिन पानी के बिस्तरे पर कस के हाथ मारा तो पलट के लगा। पानी ने अपनी ताकत दिखा दी। मारोगे हमको तो हम भी चोट पहुंचायेंगे। हम पानी हैं कोई इंसान नहीं कि ठोकरें खाकर चुप रहें।
पानी की ताकत का तो ऐसे भी हमको एहसास है। पानी के जेट से फ़ौलाद तक कट जाते हैं। आंसुओं की धार से पत्थर भी पसीज जाते हैं।
नदी में नहाते हुये लगा कि जिस तरह हमारी तमाम नदियां सूखती जा रही हैं उससे क्या पता हमारी अगली पीढियां कभी कहें- ’भारत में कभी पानी की नदिया बहतीं थीं।’

नदियों के साथ बेशर्मी और बदतमीजी का आलम यह है कि कभी सदानीरा नदियों के हाल गरीबी रेखा से नीचे वालों जैसे हो गये हैं। नावें बालुओं में औंधी पड़ी हैं। पानी तो छोड़ दिया जाये, कीचड़ तक दुर्लभ है नदियों में।
नदी में खड़े होकर सामने पुल से गुजरते लोग देखे, मालगाड़ी देखी। ऊपर सूरज भाई मुस्करा रहे थे। शायद कह रहे हों-’ बेटा हम तो रोज नहाते हैं। तुम आज एक दिन नहाये तो चमकने लगे।’
हमको नेहरू जी की वसीयत याद आई जिसमें वे अपनी राख गंगा नदी में बहाने की बात करते हैं। सदियों से बहती फ़िर भी नित नवीन गंगा। आज देखते गंगा के हाल तो शायद नेहरू जी एक बार फ़िर मर जाते। अच्छा हुआ समय से चले गये। आज होते तो न जाने क्या दुर्गति करते लोग चाचा जी की। जमाना बड़ा खराब है।
लौटते में संदीप फ़िर मिला। नदी में तैरते हुये। कुछ बच्चियां भी मदी में मछलियों की तरह उलट-पुलट रहीं थीं।
वहीं किनारे पर राधिका भी दिखी। सनसिल्क का शैम्पू मुंड़ी में मलती हुई नहा रही थीं। बताया -’सबसे अच्छा शैम्पू होता है यह।’
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, अनूप शुक्ल सहित, मुस्कुराते लोग, बाहर और क्लोज़अप
बैटरी रिक्शा में खुद फ़ोटो खींचते अनूप शुक्ल
हमारे किनारे पहुंचने तक संदीप बाहर निकल आया था। निस्संग भाव से बताया-’सुबह चाय पी थी। खाना केवल शाम को बनता है।’ कहते हुये वह दौड़ते हुये आगे निकल गया।
सड़क पर आकर बैटरी रिक्शा पकड़े। बैठ गये। सड़क पर जाते दूधिये देखे। फ़ोटो खैंची। फ़िर मन किया नहाये-धोये हैं तो अपना भी एक ठो फ़ोटो काहे न खींचा जाये। खैंच लिये। देखियेगा। बताइयेगा कि अच्छा आया है क्या? अच्छा न लगे तो बता दीजियेगा। खराब भी कह सकते हैं। हम बुरा नहीं मानेंगे। हमारा कोई दोस्त भी बुरा नहीं मानेगा। आखिर दोस्त हैं, हमारे भक्त थोड़ी।
बहुत हो गया। अब चला जाये। आज वुधवार है। बुद्ध सदा शुद्द। आजकल कोई भी चीज शुद्द मिलती कहां हैं। मिल गयी तो मजे करो।

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Tuesday, June 05, 2018

उप्पर गोरी का मकान


इतवार को चमनगंज की तरफ गए। सड़क पर साइकिलियाने के बाद एक गली में घुस गए। कार से होते तो सीधे निकल जाते। सड़क और गली में 'भीड़ भरा सन्नाटा' था। मतलब लोग खूब थे लेकिन चहल-पहल कम टाइप। शायद रोजे के कारण लोग चुप हों। दिन भर ऊर्जा बचाकर रखनी है।
कई जगह फकीर टाइप लोग दिखे। आदमी, औरत , बच्चे सब शामिल मांगने वालों में। एक ने बताया लोग अपनी मर्जी से दान करते हैं। दान माने जकात । सुबह के समय देने वाले दिख नहीं रहे थे। सिर्फ माँगने वाले ही दिखे। गली के मोड़ और अंदर दूर तक मकानों के छज्जों के नीचे लोग कटोरा लिए दिखे।
एक शेड के नीचे कुछ वरिष्ठ फ़क़ीर और बाकी कनिष्ठ फकीर टाइप थे। वरिष्ठ चुप थे। वरिष्ठता की हनक चुप रहकर साधना आसान होता है। जब तक अपने पर न आये, बोलते नहीं। वरिष्ठता बाधक बनती है। जब अपने पर आएगी तो पसड़ जाएंगे। भसड़ मचा देंगे।
एक बच्ची ने वहीं बैठी एक महिला को मसाले की पुड़िया दी। उसने चुप से रख ली। बाद में खायेगी शायद।
हम सड़क पर खड़े ही थे कि कुछ महिलाएं आ गईं। कागज में लिखा नम्बर मिलाकर बात कराने के लिए कहने लगीं। साथ खड़े आदमी ने ,जो कि बात करते हुए चमनगंज का तात्कालिक गाइड बन गया था मेरा, मना कर दिया -'मेरे पास मोबाइल नहीं है।' महिलाओं ने मेरे आगे पर्ची बढ़ा दी।
हमने असमंजस से उस आदमी की ओर देखा। मेरे दिमाग में अनगिनत व्हाट्सअप, फेसबुकिया सावधानी वाले सन्देश उछलकर सामने आ गए। उनमें बताया गया था अनजान नम्बर मिलाने से मोबाइल हैंग हो जाता है, सब पैसा निकल जाता है, गड़बड़ लोगों से कनेक्शन साबित हो जाता है। इसी तरह के तमाम हिदायती सन्देश।
सेकेंड के कुछ हिस्सों तक ही हिदायती संदेशों की हुकूमत रही। जेब से मोबाइल निकालते ही नकारात्मकता की सरकार गिर गयी। नम्बर मिलाया। जितनी देर में घण्टी जाए तब तक महिला ने बताया -'बहू है। रामादेवी में। तरन्नुम नाम है।' तरन्नुम का नम्बर बन्द मिला। वो उदास हो गयी। फिर दूसरा नम्बर भी रेंज के बाहर या बन्द मिला। नम्बर भले न मिला पर बिना पैसे खर्च किये हमारी भलनसाहत जम गई। हम इसी में खुश। हमारी दौड़-धूप में कोई कमी नहीं रही।
साथ खड़े आदमी से बतियाते हुए हमने पूछा -'चमनगंज का नाम बवालों में क्यों आ जाता है बार-बार। क्या गड़बड़ है?'
उसने बड़ी तसल्ली से समझाया -'गड़बड़ कोई नहीं। कुछ लोगों के चलते पूरी बस्ती को बदनाम करना ठीक नहीं है। हम तो बाप-दादों के जमाने से यहीं रह रहे। कोई लफड़ा नहीं।'
आगे सड़क किनारे ही जगह-जगह तख़्त पर मुर्गे की बोटी कट रही थी। एक जगह खड़े होकर हम देखने लगे। काटने वाले ने कहा -' ले लेव। 120 रुपये किलो है।इससे कम कहीं न होगी।' हमने कहा -'हमें लेना नहीं है। बस देख रहे हैं।'
उसने मुझे इस तरह देखा जैसे मेहनत करते लोग निठल्लों को देखते हैं। बोटी काटते हुए बोला -'इसमें देखने की क्या बात है भाई।' इसके पहले वो- 'फूटो यहाँ से' कहे हम आगे बढ़ लिए।
भरी बस्ती में टहलते हुए तमाम दुकानें दिखीं। अधिकतर बन्द। आगे हम एक और सकरी गली में घुस गए।
गली में धूप आहिस्ते-आहिस्ते इठलाते हुए उतर रही थी। ऐसे जैसे दूर-दराज के इलाकों के दफ्तर तसल्ली से खुलते हैं। गलियों में दुकानें भी आराम से खुल रहीं थी। एक जगह गैस सिलिंडर साइकिल पर लदे बीच गली में औंधे पड़े थे। उसके पीछे दूसरी साईकल में सिलिंडर दूसरी तरफ मुंह किये थे। दोनों सिलिंडरों में 36 का आंकड़ा लगा।
गलियों से होते हुए हम लक्कड़मंडी के मुहाने पर निकले। इन्हीं गलियों से होते हुए हम कभी गांधी नगर से जीआईसी पढ़ने जाते थे। हमारे मास्टर साहब पंडित श्याम किशोर अवस्थी यहीं कहीं रहते थे। वह सब याद आया।
कर्नलगंज निकलकर मुख्य सड़क पर आ गए। एक आदमी कान में मोबाइल लगाए फुटपाथ के बिस्तर पर ऊंघ रहा था। दूसरा उसके पैर की मालिश कर रहा था। एक जगह एक ही मोबाइल की लीड से दो महिलाएं गाना सुनते हुए जाते दिखी। दोनों के कान में एक-एक तार। तार से गाना याद आया:
तार बिजली से पतले हमारे मियां।
वहीं एक आदमी अपनी पान की दुकान जमा रहा था। हमारे दिमाग ने गाना बजाया :
नीचे पान की दुकान
उप्पर गोरी का मकान।
हमने गर्दन ऊपर की तो एक भाई साहब सैंडो बनियाइन में जनता दर्शन देने वाली मुद्रा में जम्हूआई ले रहे थे। मन किया उनसे पूछें -'भाई साहब इस मकान वाली गोरी किधर गयीं?' लेकिन जब तक पूंछे तब तक साईकल, समझदारों की तरह, आगे बढ़ गई। आगे निकलकर हमको अंदाज हुआ कि हमसे ज्यादा समझदार तो हमारी साइकिल है।
कोतवाली के पीछे से शिवाले वाली गली में घुस गए। फिर जीवन की बहुरंगी चित्र दिखे। कई जगह चबूतरों पर उबासी लेते बुजुर्ग। चाय पीते , लंतरानी हांकते लोग।

माल रोड चौराहे पर 'सामूहिक केश कर्तनालय' में लोग बाल कटवा रहे थे। फुटपाथ पर जमी कुर्सियों पर जमे लोग।
स्कूटी पर लोग पानी ले जाते दिखे। बीस लीटर की पांच-सात बॉटल। एक का पेट्रोल खत्म हो गया था। वह पानी वहीं सड़क पर रखकर पेट्रोल भराने चला गया।
पता चला की पिज्जा की तरह ये पानी डिलीवर करते हैं। 7000/- माहिने मिलते हैं। स्कूटी, पेट्रोल मालिक का। किसी पार्टी में पानी डिलीवर करने जा रहे हैं।


पानी की बढ़ती किल्लत के बारे में हमने वहीं खड़े-खड़े तमाम आशंकाएं कर डालीं। आने वाले समय में लोग पानी लाकर में रखेंगे। पानी दहेज में चलेगा, कारपोरेट पार्टियों को पानी चन्दे में देंगे। पानी कारखानों में बनेगा। हवा से आक्सीजन और सल्फ्यूरिक एसिड आदि से हाइड्रोजन नोचकर पानी बनाया जाएगा। सरकार पानी बनाएगी। पानी के पाउच पर गवर्नर के दस्तखत होंगे, कुछ लोग नकली पानी बनाएंगे। चाइनीज पानी से बाजार पट जाएंगे। पीते ही आदमी का प्यास से बुरा हाल हो जाएगा। बीमार हो जाएगा। अस्पताल में असली पानी के इंजेक्शन लगेंगे तब ठीक हो पायेगा।
आशंकाएं और भी मुंह बाए खड़ीं थीं लेकिन याद आया पास में गंगा नदी है। सोचा इसके पहले कि पानी के लिए विश्वयुध्द की दुंदभी बजे, गंगा के पानी में छप्प छइयां कर ली जाए। सोच पर अमल करने की मंशा से हम फौरन झोले में कपड़े भरकर गंगा जी की ओर चल दिये। उसका किस्सा आगे की पोस्ट में।
फिलहाल तो आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो। मंगल है वैसे भी आज।

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Monday, June 04, 2018

बड़ी मस्त है

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मोटरसाइकल, जूते और बाहर
सड़क पर हजामत और कान का मैल निकलवाते लोग

कल घण्टाघर चौराहे से होते हुए पंकज बाजपेयी के ठीहे पर पहुंचे। घण्टा घर के आगे सड़क किनारे कनमैलिये कान का मैल निकालते दिखे। एक जगह हजामत वाले और मैल निकालने वाले एक साथ दिखे। कान का मैल निकालने के लिए लम्बी सलाई कान में घुसेड़कर मैल के मलबे को हिलाया।फिर हिले हुए मैल को चिमटी से पकड़कर बाहर कर दिया।
मैल हो या कोई भी बुराई हो, इनकी बुनियाद बड़ी कमजोर होती है। जरा सा इधर-उधर करने से हिल जाती है। इसके वाद उसको निकाल बाहर कर सकते हैं। बस में हो। रमानाथ जी कहते भी हैं :
कुछ कर गुजरने के लिए
मौसम नही मन चाहिए।
आगे एक घोड़ा तांगे में आठ आदमियों को लादे लिए चला जा रहा था। तांगे का बोझ अलग से। देखते-देखते घोड़े की सर्विस कंडीशन आदमियों की तरह ही बेकार और बर्बाद होती चली गईं हैं। पहले एक घोड़े पर एक घुड़सवार होता था। बहुत हुआ कभी किसी सुन्दरी का अपहरण हुआ या प्रणय निवेदन हुआ या कोई घायल मिल गया तो दो सवारियां हो गयीं। आशिकी और मानवता में दोगुना बोझ तो चलता है। लेकिन अब विकास के लफड़े ने बताओ एक-एक घोड़े पर दस-दस सवारों का बोझ लाद दिया है।
घोड़ों से कम बुरे हाल नहीं हैं आदमियों के। हम क्या बताएं आप खुद समझते हैं। आखिर आप भी तो आदमी हैं। वैसे बहुत पहले दुष्यंत जी कह गये हैं:
जिस तरह चाहिए बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी , हम झुनझुने हैं।
सालों पहले आदमी झुनझुने में बदल गया था। अब क्या है पता नहीं। क्योंकि अब कोई आवाज भी नहीं सुनाई देती।।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, खड़े रहना और बाहर
पंकज बाजपेई अपने ठीहे पर
पंकज बाजपेयी ने कल साथ चाय पी। बिस्कुट का पैकेट लिया और मिठाई वाले कि शिकायत फिर की -'दो दिन बर्फी नहीं दी।'
वहीं कल काले , चीकट कपड़े पहने आदमी फिर मिला। लोगों ने बताया कि 20 साल से देख रहे हैं। किसी से बात नहीं करता। चुपचाप चाय लेकर पीता है, सिगरेट भी। कूड़ा बीनता है। उसी को बेचकर जो मिलता है उसी को खर्च करता है। किसी से कुछ मांगता नहीं।
हमारे सामने चाय लेकर दूर चला गया वह आदमी। हम उसके पास पहुंचे। सिगरेट उंगलियों के पास तक सुलग चुकी थी। नाम पूछा तो उसने बताया लेकिन कुछ समझ नहीं आया। इसके अलावा और कोई बात नहीं की उसने। चुपचाप खड़ा रहा।
हर इंसान अपने में एक मुकम्मल कहानी, उपन्यास होता है। कई लोगों पर सैकड़ों लोग लिखते हैं। कुछ लोग ऐसे ही गुमनाम होते हैं जिनके बारे में वो लोग भी कुछ नहीं जानते जिनके आसपास बीसियों साल से वह रहा होता है। आदमी को अजूबा बनाकर लोग अपना काम खत्म समझ लेता हैं।
आगे एक मकान के नीचे बैठे लोग एक ड्रम में पानी भर रहे थे। पानी ऊपर से नीचे ड्रम में इकट्ठा हो रहा था। पानी दिन पर दिन इतना कम और दुर्लभ होता जा रहा है कि क्या पता आने वाले समय में लोग दहेज में मोटर, कार की जगह पानी के ड्रम मांगे। काले धन की जगह लोगों के यहां से पानी बरामद हो।
चंद्रिका देवी चौराहे पर सड़क मंदिर निर्माण के कारण बन्द होने की सूचना थी। सड़क पर बल्ली लगाकर रास्ता बंद किया हुआ था।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, लोग बैठ रहे हैं और बाहर
रिक्शे पर मंजन और सुरमे का प्रचार
फुटपाथ से निकलकर आगे बढ़े। चमनगंज की ओर। हलीम कालेज होते हुए आगे बढे। जगह-जगह लोग फुटपाथ पर बैठे गपिया रहे थे। एक जगह चौराहे पर रिक्शे पर लाउड स्पीकर लगाए एक आदमी सुरमा और दांत का मंजन बेंच रहा था। सुरमे और मंजन की तमाम खाशियत बताई उसने। सब रिकॉर्डेड। सुरमे की ख़ासियत बताने का अंदाज ऐसा ही समझिए जैसे लोकतंत्र की सरकारें अपनी उपलब्धियों का प्रचार करती हैं।
मंजन और सुरमा के बहुत प्रचार के बावजूद कोई उसे खरीदने नहीं आया। कुछ देर बाद उसने रिक्शा आगे बढाया। जैसे राजनीतिक दल वोट न मिलने पर अपनी स्ट्रेटेजी बदलते हैं, उसने अपना ठीहा बदला और नई जगह से वही टेप बजाने लगा। ग्राहक अभी भी नदारद थे।
एक दुकान पर मीट बिक रहा था। कुछ बकरे दुकानों पर टँगे थे। उनकी साफ अंतड़िया देखकर ऐसा लगा मानो बकरे बाबा रामदेव के योग टेप देखकर कपालभाती कर रहे हों और जब उनका पेट अंदर हो अचानक उसी समय किसी ने उन पर स्वच्छता अभियान लागू कर दिया हो। मांस और खाल गायब। बकरे पोस्टर की तरह टँगे ग्राहक के इन्जार में सूख रहे थे।
कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.
बड़ी मस्त है -क्या ? शायद जिंदगी।
आगे एक दुकान पर लिखा था -बड़ी मस्त है।
क्या मस्त है आप इसका कयास लगाइए। शायद जिंदगी। आप बताइए।
आगे का किस्सा जल्ली ही। फिलहाल शुभकामनाएं।

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Friday, June 01, 2018

मैं तुम्हें बांच लूं तुम मुझे बांचना


सुबह शुक्लागंज की तरफ निकले। अधबने पुल के पास आगे जाते आदमी की पिछली जेब दिखी। जेब का मुंह खुला था। अंदर से रुमाल टाइप कपड़ा झांक रहा था। जेब की खिड़की से उचककर दुनिया देखने की कोशिश करते हुए। जब तक रुमाल की शक्ल ठीक से देखते, आदमी फुर्ती से आगे निकल गया।
दुनिया में तमाम राग-ताग , ऐसे ही होते हैं। जब तक वह होकर आंखों के आगे से निकल जाते हैं। अनगिनत घपले घोटाले भी ऐसे होते हैं जिनकी हवा लगने के पहले वो घट चुके होते हैं। दुनिया भी तो ऐसी ही है। जब तक पता चला होगा किसी को 'बिग बैंग' तब तक दुनिया, दुनिया भर में पसर चुकी होगी।
सामने से दस बारह लोग आते दिखे। जुलूस की शक्ल में। पता चला कामगार हैं। मजूरी के लिए खड़े होने बाजार जा रहे हैं। हमने अपने को फौरन वहीं खड़े होकर भाग्यवान समझा कि हमको इनकी तरह रोज-रोज अनिश्चितता के माहौल में नहीं जीना होता। पुख्ता मजूरी का इंतजाम है।
पीछे एक राजगीर अकेला चला जा रहा था। कन्नी-वसूली झोले में। झोला कंधे में रखी अलुमिनियम की पटरी पर जो फर्श को समतल करने के काम आती है। कुछ अनमना सा दिखा। शायद अकेले होने के चलते या मजदूरी की अनिश्चितता के कारण। अनमना और उदासी से अंसार कम्बरी की गीत पंक्ति याद आ गयी:
फिर उदासी तुम्हें घेर बैठी न हो,
शाम से ही रहा मैं बहुत अनमना।
इस गीत की आखिरी पंक्तियां हैं:
पंक्तियां कुछ लिखी पत्र के रूप में
क्या पता क्या लिखा उसके प्रारूप में
चाहता तो ये था सिर्फ इतना लिखूँ
मैं तुम्हें बांच लूं तुम मुझे बांचना।
एक आदमी अपने मकान से टिकी सीढ़ी पर सड़क से पांच फुट ऊपर बैठा मोबाइल में मुंडी घुसाए था। शायद सिग्नल ऊपर पकड़ रहा हो। नीचे आता न हो।
आगे कामगार चूल्हे में खाना बना रहे थे। आदमी भगौने में न्युटी नगेट चाकू से हिलाते हुए उसमें मसाला मिला रहा था। कोई सामान कम पड़ा तो दो हाथ दूर की दुकान पर आर्डर देकर ले लिया। चूल्हे के इतनी पास दुकान। मांगते ही माल हाजिर। कौन मॉल इतनी जल्दी मांग पर आपूर्ति कर सकेगा।
चार चूल्हे में दो जल रहे थे। दो बन्द थे। आग तेज करते हुए रिक्शे वाला बोला -'होटल के खाने में मजा नहीं आता।'
राधा के अड्डे पर आज शान्ति थी। राधा कान में तेल। डाल रही थीं। बुजुर्ग दूर बैठे बीड़ी पी रहे थे। सुरेश रिक्शे की रिपेयरिंग कर रहे थे। राधा ने देखकर 'राधे-राधे' कहा और फिर काम की रिपेयरिंग में लग गईं।
सामने से जुनैब एक पांव में चप्पल पहने चली आ रही थी। उसकी दूसरी चप्पल पड़ोस का कुत्ता उठा ले जाता है। गनीमत बताई की आज एक ही ले गया। वरना दोनो ले जाता है। पड़ोसिन के घर से चप्पल पहन वो काम पर चली गयी।
नीचे गंगा किनारे एक आदमी रिन साबुन से अपनी चड्ढी बनियाइन धो रहा था। इसके बाद गंगा में उतर कर नहाने लगा।एक दूसरे बाबा जी पीतल की बाल्टी लिए आगे बीच गंगा में नहाने लगे। सूरज भाई भी वहीं बादलों की ओट से निकलकर नदी में डुबकी लगाने लगे।
पुल पर सवारियां आती जाती दिख रही हैं। आते-जाते लोग पुल पार कर रहे थे। उनको पता नहीं होगा नरेश सक्सेना जी क्या कहते हैं इस पर:
पुल पार करने से पुल पार होता है,
पुल पार करने से नदी नहीं पार होती।
नरेश सक्सेना जी ने जब यह कविता लिखी होगी तब नदी में पानी बहुत होता होगा। पार करना मुश्किल होता होगा । अब तो नदी लोग टहलते हुए पार कर लेते हैं। नाव नहीं, जीप चलती है नदी में।
वहीं राजा मिले। उनके बारे में अलग से। सेल्फी देख लो तब तक उनके साथ। बताओ कैसी है हम आते हैं लौटकर आगे का किस्सा बताने।

Thursday, May 31, 2018

सावधान कार्य प्रगति पर है

गन्ने का रस पीने का नबाबी अंदाज। निरीह जनता की तरह खड़ा घोड़ा

सुबह निकले। निकलते ही खुदी सड़क दिखी। आदमी की गहराई के बराबर खुदी सड़क के मलवे के सीने पर बोर्ड लगा था-“ सावधान, कार्य प्रगति पर है।“

मलवे और प्रगति का ऐसा रिश्ता है कि जहां मलवा दिखता है , लगता है जरूर प्रगति हुई हैं यहां। जहां प्रगति वहां मलवा। बोले तो - मलवा प्रगति का बाप है।

'सावधान' लाल रंग से लिखा था। लाल रंग मने खतरे का निशान। इशारे से बता दिया कि प्रगति हो रही है। काम की। संभल जाओ। सावधान कर दिया। फ़िर न कहना कि बताया नहीं। चेताया नहीं। प्रगति खतरनाक है। इसीलिये दुनिया के तमाम प्रगतिशील देश दशकों से प्रगतिशील बने हुए हैं। विकसित नहीं बने हैं। कौन बवाल मोल ले प्रगति का। जहां हैं वहीं बने रहो। प्रगति के लालच में सवा सौ करोड़ देशवाशियों को खतरे में झोंक दें ऐसे बेवकूफ़ नहीं हैं अपन। तमाम विकास वाले काम इसीलिये अटके रह जाते हैं काहे से उनकी प्रगति में खतरा है। जान है तो जहान है।

आगे एक कुत्ता होटल से फ़ेंकी गयी एक रोटी को पंजे में दबाये खा रहा था। कुत्ता अकेला था। रोटी किसी और से बंटने का खतरा नहीं था। फ़िर भी रोटी पंजे के नीचे दबाये था। खाते समय भी पंजा रोटी पर। जैसे माल काटता नेता अपनी निगाह वोट बैंक पर बनाये रखे। टुकड़ा-टुकड़ा करके कुतर रहा था कुत्ता रोटी। कुत्ते का मुंह देश के संसाधन कुतरते कारपोरेट सरीखा लग रहा था। उसके पंजे जनप्रतिनिधियों जैसे। दोनों मिलकर जनता के हिस्से की रोटी कुतरते जा रहे हैं।

नुक्कड़ पर एक आदमी कुर्सी पर बैठा दाढी बनवा रहा था। नाई ऊंघते हुये अनमने ढंग से दाढी पर ब्रश के साबुन फ़ेर रहा था। आईना बुजुर्ग टाइप हो गया था। मोतिया बिंद हो गया हो मानो। धुंधलाया आईना देखकर मुझे वासिफ़ साहब का शेर याद आ गया:
साफ़ आईने में चेहरे भी नजर आते हैं साफ़,
धुंधला चेहरा हो तो आईना भी धुंधला चाहिये।

आगे एक आदमी नबाबी अंदाज में खड़खड़े पर बैठा गन्ने का रस पी रहा था। खड़खड़े की रेलिंग पर बैठने का अंदाज ऐसे जैसे जनता को दर्शन दे रहे हों राजा साहब। घोड़ा चुपचाप अपने निरीह जनता की तरह नबाब साहब को लादे कोड़े के इंतजार में खड़ा था। जैसे ही फ़टकारा जायेगा, वह आगे चल देगा।

सड़क किनारे खड़ी एक महिला आते-जाते लोगों का ’नजर मुआइना’ करती अपने बच्चों को जगा रही थी। उसका टुपट्टा उसके जूड़े में अटका सा था। जूड़ा-टुपट्टा देखकर मिसिर जी के एक गीत की पंक्ति याद आ गयी जिसमें चूल्हे से निकले धुंये के आंगन के पेड़ में अटके रहने का बिंब था। महिला के उचके हुये जूड़े से टुपट्टा पूरी मोहब्बत से लिपटा हुआ था। उसके सर इधर-उधर झटकने के बावजूद जमा हुआ था जूड़े से। शायद गाना भी गा रहा हो:

ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेगे
तोड़ेंगे दम मगर, तेरा साथ न छोड़ेंगे।

सड़क पर एक आदमी बड़ी मोमिया बिछाये काटने के पहले उसका मुआयना कर रहा था। मोमिया पर टाटा डोकेमो का विज्ञापन छपा था। 3 जी का। 4 जी के आने के बाद 3 जी बेकार हो गया है। इसलिये कट-पिटकर बिकने के लिये आ गया था सड़क पर। मंहगी चीजें अप्रासंगिक होने पर कौड़ी की तीन हो जाती हैं। बाजार का यही मूल सिद्धांत है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति
जान हलकान किये हैं मुला इनकी गाली शबाब हैं
आगे ’रिक्शे अड्डे’ पर राधिका जी अपने 'तख्ते-ताउस' पर पूरी ठसक के साथ बैठी थीं। बाकी के लोग काम से लगे थे। पहुंचते ही ’राधिका-प्रताड़ित’ कामगारों ने अपने दुखड़े रोने शुरु कर दिये। अलग-अलग लोगों के अलग-अलग दर्द थे:
-सोने नहीं देतीं। रात बारह बजे रिक्शा चला के आओ। जरा देर लेटो। जगा देती हैं- ’बीड़ी पिलाओ। पानी लाओ।’
-तीन बजे से उठके बैठ जाती हैं। हल्ला मचाते हुये सबको जगा देती हैं।
-जाती हैं। इधर-उधर से मांग लाती हैं। लोग दे देते हैं। ठसक से पैसा देकर कहती हैं-’हमरे खातिर खाना मंगाओ।’
-खाने की बड़ी शौकीन हैं। बिना मछली रोटी नहीं खातीं।
-अरे रात जगा के बोली- ’हमार पांव छुऔ। गोड़ दबाओ।’
-जाती ही नहीं हैं। कहती हैं -’हम हियैं रहब। आदमी होय कौनौ तो मार-पीट के भगा दीन जाय। इनका कैसे भगावा जाये। जान आफ़त किहे हैं।’
एक बुजुर्ग अपना दर्द बड़ी शिद्धत से सुना रहे हैं। मुंह में दांतों की सरकार गिर गयी है। मसूढों का राष्ट्रपति शासन चल रहा है। मुंह की निकली आवाज बाहर अनुमान लगाने वाली हवा में बदल जा रही है। वे दुखड़ा रोते हुये कहते हैं- ’इनकी गालियां शबाब हैं। सुनते हैं बरक्कत होती है। कल हल्ला-गुल्ला के बाद गये रिक्शा चलाने- साठ रुपया घंटा भर में आ गये।’
राधा मजे से बीड़ी का सुट्टा मारते हुये इस बतकही के मजे ले रहे हैं। कहीं बतकही कमजोर लगती दिखी तो कोई जुमला फ़ेंककर किसी की ऐसी तैसी करके गर्मा रही हैं।
इसी समाज में लोग हैं जो अपनी गाड़ी छूने वाले को गोली मार देते हैं। उसी समाज का एक सच यह भी है जिसमें एक अनजान महिला के आ जाने से हलकान लोग उसी की गालियां शबाब की तरह माने लोग। दुनिया के तमाम इन्द्रधनुषी रंगों में यह भी एक रंग है।
गंगा किनारे झोपड़ी में जैनब की बच्ची बाहर बैठी चुटिया कर रही थी। छोटे शीशे को अपनी चप्पल के स्टैंड पर टिकाये। बहुत तसल्ली से अपने बालों की एक-एक चोटी संवारती हुई। पंत जी के ’प्रकृति यहां एकान्त बैठ, निज रूप संवारति’ की तरह चोटी करती हुई बच्ची। गंगा के हाल ’तापस बाला, गंगा निर्मल’ सरीखे हो रहे थे।
हमने बच्ची से बात की। पता चला उसकी अम्मी जैनब अभी घर में हैं। बहन खाना बना रही थी। संदीप सो रहा था। घर में टेलिविजन है। पिक्चर देखती है बालिका। छतरी लगी है। नये गाने पसंद हैं बच्ची को। कौन सा सबसे ज्यादा पसंद है पूछने पर एक कोई बताया। ’छलिया से छलिया’ शायद बोल थे। हमको याद नहीं अभी। असल में इधर अपन नयी हीरोइनों के टच में नहीं है। इसलिये नये गाने भी याद नहीं रहते।
लौटते हुये बीच सड़क पर दो रिक्शेवाले अगल-बगल खड़े होकर गपियाते दिखे। एक की बीड़ी से दूसरे ने अपनी सुलगाई। जब तक फ़ोटो खैंचे तब तक वे आगे चल दिये। दो रिक्शों का जोड़ा बिछुड़ गयो रे टाइप फ़ीलिंग देकर अपने को।
एक बच्ची अपने से डेढ गुना ऊंची साइकिल चलाती आती दिखी। पैडल तक पैर पहुंच नहीं रहे थे। उचक-उचककर चलाते हुये साइकिल डगर-मगर कर रही थी। इधर-उधर बहक रही थी। लेकिन बच्ची बड़ी सावधानी से साइकिल का संतुलन बनाये हुये थी। चेहरे पर सावधान वाला आत्मविश्वास पसरा हुआ था। उस पर पसरी हुई सूरज की किरणें उसको और चमका रहीं थीं। खुशनुमा और खूबसूरत बना रहीं थीं।



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Tuesday, May 29, 2018

तुम तो ठहरे परदेशी

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं और बाहर
राधा बीड़ी का सुट्टा सुलगाते हुए

सबेरे टहलने निकले। नुक्कड़ पर पंक्चर वाला अपनी दुकान सजा रहा था। किसी प्रदेश में पंचर शिक्षा स्कूलों के पाठ्यक्रम में लग गई। क्या पता ऐसे ही सड़क किनारे पंक्चर बनाने वालों में कोई 'पंचर प्रोफेसर' बने। बनाने वाले तो पता नहीं कब नियुक्त हों, अभी तो सब पंचर करने में ही लगे हैं।
कोने की गन्ने की रस की दुकान चालू हो गयी थी। बच्चा उचक-उचककर , सरकती नेकर को संभालते हुए दुकान सजा रहा था। स्कूल शायद बन्द हो चुके थे उसके। 'गर्मी की छुट्टी' वाले निबंध अगर उसको लिखने को कहा जाए तो यही लिखे शायद वह -'रोज सुबह सूरज निकलने के पहले दुकान सजा लेता था मैं। सूरज इस बात से बहुत चिढ़ता था और बहुत गरम हो जाता था। दिन भर सुलगता रहता। लेकिन मैं उसकी चिंता कभी नहीं करता था, उठते ही भागकर दुकान सजा लेता।'
वहीं साईकल, स्टूल, मेज किसी अवसरवादी गठबंधन सरीखे 'सड़क रिजोर्ट' में इकट्ठा थे। सरकार बनाने वाले विधायक लोग भी इसी तरह रिजॉर्ट में जमा होते होंगे। हो सकता है ऐश थोड़ी ज्यादा हो। लेकिन हालत इससे ज्यादा जुदा नहीं होते होंगे। विनोद श्रीवास्तव की कविता है न:
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम
पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पक्षी जैसा ही रहना है
भरपेट मिले दानापानी , लेकिन मन ही मन दहना है।
विधायक लोग तसल्ली से खाते-पीते हुए मन ही मन दहते हुए सोचते होंगे -'न जाने मंत्री पद मिलेगा कि नहीं।'
आगे ऐसे ही कुर्सी, ठेलिया और आइसबाक्स कि जुगलबन्दी दिखी। कुर्सी देखकर लगा कि बस आते ही कोई कब्जा करके बैठने ही वाला है।
भड़भूँजे वालों की दुकानें भी सजने लगीं थीं। एक औरत सूप से दाना फटकती हुई छिलकों को बाहर करते हुए भुने चने बेचने के लिए तैयार कर रही थी।उसकी बिटिया बगल में ऊंघती हुई। सड़क को निहार रही थी।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, बैठे हैं, खा रहे हैं, बच्चा, भोजन और बाहर
खाने बनाने के लिए आटा माढ़ते हुए कामगार
आगे सुरेश चंद्र के रिक्शे के ठिकाने पर कई लोग जमा थे। एक रिक्शेवाला थाली में पहलवानी वाले अंदाज में आटा गूंथ रहा था । गीले आटे को दबाते, उलटते, पलटते हुए उसको रोटी के लिए तैयार कर रहा था। आटे को फुल मोहब्बत के साथ रोटी के लिए तैयार करता आदमी बहुत प्यारा लगा। हमने उससे पूछा -'कभी घर में भी ऐसे आटा गूंथते हो?'
वह हंसकर और तल्लीनता से आटा माड़ने लगा। और प्यारा सा हो गया। 
उसका साथी चूल्हे में लकड़ी सुलगाये दाल बना रहा था।
वहीं पीछे एक महिला बैठी धड़ल्ले से बीड़ी सुलगा रही थी। उससे बतियाते हुए पूछा कितनी बीड़ी सुलगा चुकी सुबह से?
बोली -'चार बंडल।नौ चिलम भी पी सुलगा चुके।'
उत्सुकता हुई तो और बतियाये। पता चला कि राधिका नाम है उनका। लोग राधा कहते हैं। पटना घर है। पांच बच्चे हैं। सब समर्थ। पति 'शान्त' हो चुके है। कुछ सालों में कई तीर्थ कर चुकी हैं। फिलहाल कानपुर में डेरा है। यहीं के लोग खाना-पीना, बीड़ी-चरस का इंतज़ाम कर देते हैं।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, लोग बैठ रहे हैं, मेज़, बच्चा, जूते और बाहर
जब तक चूल्हे में जलती रहेगी आग,
जिंदगी का मधुर बजता रहेगा राग।
सुरेश जो रिक्शे के ठेकेदार हैं ने बताया कि महीने भर से यहां टिकी हैं। कहती हैं यहीं रहेंगे। सब लोगों के साथ खाती-पीती हैं। नशा-पत्ती भी। कोई दारू भी पिला देता है।

कोई अनजान औरत अपने घर से दूर लोगों में घुलमिल जाए। लोग उसके खाने-पीने की व्यवस्था कर दे। यह अपने में रोचक है। कामगारों का समाजवाद है यह। अनजान लोगों के साथ इतनी सहजता से रिश्ते बनने की बात पर प्रमोद तिवारी की कविता याद आई:
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं,
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।

बातचीत हुई तो राधा ने कई गाने अपनी आवाज में सुनाए। एक के बाद दूसरे गाने। मानो कोई कवि किसी श्रोता के मिल जाने पर अपने सारे कलाम जबरियन सुना डाले। गाने उनकी आवाज में आवाज जैसे ही मुड़-तुड़ गए। बोल इधर-उधर। कुछ के वीडियो भी बनाये।
'तुम तो ठहरे परदेशी, साथ क्या निभाओगे' सबसे ज्यादा दोहराया। 'जादुगर सैयां, छोड़ो मेरी बैंया,,अब घर जाने दो' भी सुनाया।'
चलते हुए तख्त से उतरकर हमारे सर पर हाथ फेरते हुए गाल भी सहला दिए।

वहां से आगे हम गंगा किनारे तक आये। नीचे उतरकर गंगा के पानी को छूने का मन था। नीचे उतरने के पहले किनारे की झोपड़ी में एक महिला अपनी तीन बच्चियों और एक बच्चे के साथ दिखी तो उससे बतियाने लगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग बैठ रहे हैं और बाहर
जुनैब अपनी बेटी शबनम और बालक संदीप के साथ बगल में सिक्का बटोरने वाले चुम्बक के साथ
महिला का नाम जैनब है। देवरिया मायका। ससुराल गोरखपुर। आदमी ऊपर दुकान करता है। सब पैसा दारू में उड़ा देता है। तीन बेटियां हैं। बच्चियों को पालने के लिए जैनब घास छीलने का काम करती है। बच्चियां पांच-सात तक पढ़ने के बाद घर बैठ गईं। बोली -'मन नहीं लगता पढ़ाई में।'
झोपड़ी में बिजली है। बच्ची के हाथ मे रिमोट भी दिखा टीवी का। मीटर लगा है । बिल अभी आना शुरू नहीं हुआ। घास छीलने वाली महिला के घर टीवी, बिजली है। लेकिन गरीबी भी है। गरीबी आजकल बहुरंगी हो गयी है।
जैनब रोजा नही रखती। बोली -'दिन भर धूप में हालत खराब हो जाते हैं।'
पास में बैठे बच्चे संदीप के बारे में जानकारी देते हुए बताया -'इसके मां-बाप रहे नहीं। भाई एक मसाला बेंचता था। जेल में बंद हो गया किसी केस में। दूसरा भाई शुक्लागंज में रहता है। यह यहीं आ आ जाता है। जब भूख लगती है। यहीं खाता है।'
बच्चे संदीप के हाथ में गोल चुम्बक हैं। उनसे गंगा में फेंकने वाले पैसे बटोरता है। भूख लगती है तो जैनब के घर भगा चला आता है।
संदीप के बारे में बताते हुए जैनब बोली-'बहुत कहते हैं स्कूल जाया करो। जाता नहीं। बस पैसे बिनता रहता है। बस भूख लगने पर ही आता है। हम भी खिलाते है। जब तक बड़ा होगा, खायेगा। फिर अपना खुद देखेगा।'
हिन्दू-मुसलमान पर तमाम बहसें होती हैं हर जगह। वो सब बहसें जैनब-संदीप की सहज ममता, मानवता के मूर्तमान रिश्ते को देखकर और चिरकुट, लगीं। यह भी लगा कि हमारे आसपास अनगिनत उदात्त मानवीय रिश्ते बिखरे होते हैं। हम उन सबको चिरकुट लोगों के भुलावे में आकर अनदेखी करते हुये दुखी होते रहते हैं।
जैनब अपनी एक बेटी के साथ झोले में खुरपिया रखकर चली गयी। हम भी वापस लौट लिए। हमे भी अपनी तरह की घास छीलनी थी।
फोटुओं में राधा के गीत के वीडियो भी हैं। सुनियेगा।


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Sunday, May 27, 2018

ज्ञान चतुर्वेदी और राहुल से हुई लंबी बातचीत के चुनिंदा अंश

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, Gyan Chaturvedi और Rahul Dev सहित, मुस्कुराते लोग, पाठ
ज्ञान जी और राहुल देव की लंबी बातचीत ’साक्षी है संवाद’ के रूप में पिछले दिनों आई। इस किताब के बारे में विस्तार से पिछली पोस्ट में लिखा गया है। लिंक यह रहा। https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10214454674054111
किताब के कुछ मुख्य अंश यहां पेश हैं:
1. भगवान एक अनगढ हीरा देता है। उसे गढना पढता है। गढने में बहुत मेहनत लगती है। बहुत से प्रतिभाशाली हैं पर मेहनत नहीं करना चाहते। वो भी हीरा ही हैं। पर उसकी पहचान बनाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती है। वो प्रतिभा तराशने का काम आपका है।
2. आज व्यंग्य की प्रतिभा मुझसे ज्यादा अगर किसी में कहूं तो अंजनी चौहान में हैं।
3. व्यंग्य की हालत हमने लगभग मंच की कविता की तरह कर दी है जो लोकप्रिय तो है पर कमजोर भी है।
4. व्यंग्य बहुत लोकप्रिय है, बहुत छप रहा है। बहुत गतिविधियां हैं। बड़ी-बड़ी बातें कही जा रही हैं पर वो गहराई नहीं है। फ़ैलाव शायद बहुत है, गहराई नहीं है। बड़ी बात नहीं कही जा रही है।
5. जब आप सबकी तारीफ़ करते हैं, तो वास्तव में किसी की तारीफ़ नहीं करते। आपमें यह हिम्मत होनी ही चाहिये कि नहीं, खराब भी लिखा जा रहा है।
6. इन लोगों का बाकायदा एक गिरोह चल पड़ा है, जो दर्पण को दोनों तरफ़ से काला कर रहे हैं और उसी दर्पण को वे अब वास्तविक दर्पण बताने की कोशिश कर रहे हैं।
7. यहां तो बुझी मशाल लेकर चलने वाले आलोचक भी व्यंग्य में नहीं हैं। जलती हुई मशाल तो छोड़ ही दीजिये। जिनके पास बुझी मशाल है, उनमें से केवल मिट्टी का तेल धुंवाता है चारों ओर, बदबू आती है; मशाल वो भी नहीं है।
8. अभी आलोचना के नाम पर हमारी व्यंग्य पत्रिकाओं में जो लिखवाया जा रहा है, वो बहुत कमजोर चीज है। हम परिभाषाओं पर ज्यादा जाते हैं।
9. मुझे आलोचना बहुत उदात्त स्वरूप में व्यंग्य में अभी तक नहीं दिखी है।
10. मेरा मानना ये है कि समय जितना कठिन होता जायेगा, लेखन उतना ही बेहतर कर सकते हैं। चुनौतीपूर्ण समय आपको एक बड़ी चुनौती देता है और एक अच्छा लेखक बड़ी चुनौती से बाकयदा प्रेरणा लेता है।
11. ये जो बहलाने की तरकीबें हैं बाजार की, पूरे समाज को और हर आमजन को, ये मुझे बहुत डराती हैं। आमजन कभी अपने और समाज को सुधारने के लिये जो क्रांति के सपने बुनता था, जो बदलाव के सपने देखता था, बाजार ने वहां से उसकी दृष्टि हटा दी है। वो अब दूसरे किस्म के सपने देखने लगा है। वो असली सपनों से अलग हो गया है।
12. मनुष्य एक बहुत सक्षम किस्म का पुतला बनकर रह जायेगा। रोबो तैयार करना चाहते हैं आप। एक से सारे लोग हों, एक सा सोचें, एक से कपड़े पहनें, एक सी चिंतायें करें। चिंता के दायरे इतने सिकुड़ गये हैं कि जो बड़ी-बड़ी चिंतायें समाज को लेकर होती थीं, जीवन को लेकर होती थीं। वे तिरस्कार और उपहास के पात्र हो गये हैं।
13. अब चिन्तक पैदा होने कठिन हो गये हैं। हमारा चिंतन सारा इकोनामिक्स बेस्ड है और इस इकोनामिक्स ने इतने जोर से समाज को पकड़ लिया हैकि यहां की सारी क्रियेटिविटी, आपकी सारी रचनात्मकता अब केवल बाजार कैसे बढे, इसके लिये हैं।
14. जो रचनात्मक लोग हैं, उनका जो रचनात्मक पैनापन, वो बाजार के काम आ रहा है। वो रचनात्मकता जो समाज को मिलनी चाहिये, जो समाज को बदल सकती थी, वह बाजार की चेरी बन गयी है।
15. हिन्दी प्रकाशन में तो सभी बदमाश हैं, बहुत सारी गड़बडिया हैं।
16. अंग्रेजी में जिनके बहुत नाम हैं लेखन में, अरुंधती को मैने पढा अभी, नया जो उनका नावेल आया है। मैंने देखा है कि उन्होंने अच्छा लिखा है, मैं भी ऐसा ही लिखता हूं। मैं भी ऐसा ही अच्छा लिखता हूं। पर मेरे को पूछ कौन रहा है भैया अब?
17. मेरे मन में आता है कि मेरे उपन्यासों का, खासतौर पर ’नरक यात्रा’ वगैरह का कोई अच्छा अंग्रेजी अनुवाद कर दे, तो बहुत बिकेगा और पैसे भी मिलेंगे। वो मुझे अभी तक ऐसा सक्षम कोई आदमी नहीं मिला, जो अंग्रेजी अनुवाद कर दे मेरे उपन्यास का।
18. अगर मैं अपनी किताबों की रायल्टी पर ही जीने लगूं तो बर्बाद हो जाऊं।
19. मैं कहता हूं कि व्यंग्य वह है, जो मैं लिख रहा हूं। मेरे हिसाब से वो व्यंग्य है। जो परसाई ने लिखा है, वो व्यंग्य है। जो शरद जी ने लिखा, मुझे लगता है वो व्यंग्य है। जो त्यागी जी ने लिखा, वो व्यंग्य है और बहुतों मे ऐसा भी लिखा , जो मैं कह सकता हूं कि ये व्यंग्य नहीं है।
20. मुझे लगता है कि व्यंग्य की भी सबसे पहली शर्त ये है कि मैं पढूं तो मुझे लगे कि ये व्यंग्य है। मेरा पाठक पढे, तो उसे लगे कि यह व्यंग्य है। परिभाषा नहीं पूछता पाठक।
21. व्यंग्य की शास्त्रीय परिभाषा की मैंने कभी परवाह नहीं की। व्यंग्य को ’व्यंग’ कहें कि ’व्यंग्य’ कहें और ’व्यंग्य’ कहने से कौन सी गड़बड़ हो जायेगी ये सब बातें बेवकूफ़ी की हैं। ये उनके मानसिक विलास , जिनसे व्यंग्य बनता नहीं है।
22. आपको भ्रम है कि आप बड़ी तगड़ी अभिव्यक्ति दे रहे हैं। कोई नहीं पूछता साब। आप लिखिये। ठाठ से लिखिये। जब तक उनकी राजनीति के आड़े नहीं आता कोई, तब तक कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
23. मुझे अभी फ़िलहाल के वातावरण में भी कहीं कोई अभिव्यक्ति पर खतरा नजर नहीं आता।
24. रचनाकार भी कहते हैं कि समय ही तय करेगा कि अंतत: कौन अच्छा रचनाकार था, कौन नहीं था? वो कई बार अपनी कमजोर रचना का बचाव करने के लिये भी कह देते हैं कि ये तो समय ही तय करेगा।
25. मुझे लगता है कि आलोचना को लफ़्फ़ाजी में बड़ा मजा आता है। कविता में लफ़्फ़ाजी बहुत की जा सकती है। उसमें बहुत सारी चीजें ढूंढी जा सकती हैं, पाठ-पुनर्पाठ करके।
26. आलोचना करने वाला फ़िर धीरे-धीरे खलीफ़ाई करने पर उतर आता है। जैसे ही उसका नाम हो जाता है, वह महंत बन जाता है।
27. हमारे ज्यादातर व्यंग्य आलोचक, व्यंग्य ही नहीं , हर तरह के आलोचक, जो बने, वे अंतत: खलीफ़ा के अंदाज में फ़तवे जारी करने लगे।
28. विचारहीन व्यंग्य हो ही नहीं सकता। विचार तो होना ही चाहिये व्यंग्य में।
29. व्यंग्य केवल भाषा या शैली ही नहीं है। यह केवल जुमलेबाजी भी नहीं है। ये सब बहुत जरूरी हैं व्यंग्य को करने के लिये क्योंकि ये व्यंग्य को एक ताकत देते हैं, व्यंग्य में पैनापन पैदा करती हैं ये सारी चीजें। पर अंतत: बात वहां टिकटी है कि आप इनका सहारा लेकर आखिर कह क्या रहे हो?
30. जहां तक वैचारिक प्रतिबद्धता की बात है कि वो वामपंथी हों, प्रगतिशील हों, इसके खिलाफ़ हम शुरु से ही थे। कोई भी आदमी मेरे को डिक्टेट नहीं कर सकता कि मैं क्या लिखूं?
31. अंतत: हर विचार एक मठ में तब्दील हो जाता है।इसे ही वैचारिक प्रतिबद्धता कहते हैं।
32. लेखक कितना एक्टिविस्ट हो और कितना लेखक हो, यह लेखक को ही तय करना है।
33. आप किसी चीज की कीमत पर ही दूसरी चीज कर पाते हैं। आपका प्यार किसके प्रति बहुत है यह तय करता है कि आप कितने एक्टिव रहे या कितना आपका लेखन रहेगा।
34. मेरी सारी प्रतिबद्धता मेरे लेखन के प्रति है और मेरी समाज के प्रति है जिसको मैं समझता हूं और जिसके बारे में , मैं लिखना चाहता हूं। उतना मैं कर सकूं तो मुझे लगेगा कि मैंने सब कर लिया। वो वैचारिक प्रतिबद्धता मेरी है। उतनी , उन अर्थों में है।
35. आप अपनी कमजोरी लेखन की विशेषता मत बता दीजिये। अगर मेरे से हास्य रचते नहीं बनता , तो मैं हास्य को कहूं कि ये तो बेकार की चीज है। मेरे से एक अच्छी कविता लिखते नहीं बनती और मैं यह कहूं कि कविता करना बेकार है। तो मैं अपनी कमजोरियों को विशेषता बनाकर न कहूं।
36. व्यंग्य को सपाटबयानी में तब्दील करने की इस मुहिम में हुआ यह है कि धीरे-धीरे व्यंग्य में भी व्यंग्य नहीं बचा। हास्य का साथ छोड़ा और व्यंग्य में जो विट और व्यंजना होनी चाहिये, वो है नहीं। वो ही नहीं बचा , क्या कहेंगे, कूव्वत, वो ही नहीं बची व्यंग्य में।
37. हास्य बहुत कठिन है, बहुत बड़ी चुनौती है और बहुत प्रतिभा मांगता है।
38. हास्य की तो बहुत इज्जत की जानी चाहिये। ’हास्यकार’ कहके किसी को दरकिनार कर देना बहुत बड़ा अपराध है।
39. यहां बहुत सारे वे लोग व्यंग्य लिख रहे हैं आज, जिनको व्यंग्य का क, ख, ग तक नहीं पता पर वो भी व्यंग्य लिख रहे हैं। वो इस कारण है कि लोगों ने व्यंग्य को एक बड़ा सरल काम समझ लिया है।
40. हिन्दी में बहुतों ने ’व्यंग्य’ लिखा है, पर वो व्यंग्य नहीं हो के व्यंग्य के नाम पर कुछ लिखा गया है।
41. ज्यादातर सीधा आदमी कई बार जटिल हो जाता है।
42. मेरे लिये किस्सागोई बहुत महत्वपूर्ण है। फ़िर उसमें जो बात कही जायेगी। वो आपके ऊपर है कि आप कितना जीवन समझते हो?
43. आप कमीनेपन में नहीं पडोगे जीवन में, जब आप घटियापन में नहीं पड़ोगे, जब आप छोटे-छोटे स्वार्थों में नहीं पडोगे तो आप जीवन में बहुत बड़ी-बड़ी बातें भी सीख सकते हो।
44. ये जीवन बहुत छोटा है मनुष्य का। अब बुढापे में धीरे-धीरे समझ में आता है।
45. आप पॉपुलर होते हैं , तो आपको परेशानियां तो होती हैं।
46. (लेखन में) किस्सागोई बनी रहनी चाहिये। मजा आना चाहिये।
47. अगर मुझे गली का ही क्रिकेट खेलना है , तो मैं गली का ही क्रिकेटर होकर रह जाऊंगा। मुझे बड़ा काम करना है, तो मुझे बड़ा काम करना है। फ़िर आपको चुनौतियां भी बड़ी लेनी होंगी। फ़िर छोटी चुनौतियों की औकात नहीं रह जाती।
48. मेरी मुमुक्षा है , लिखना। जिस दिन मेरी यह मुमुक्षा खत्म हो जायेगी , उसी दिन मैं चुक जाऊंगा, खत्म हो जाऊंगा।
49. आपको हर रचना में डर लगना चाहिये। हर नयी रचना लिखने में मुझे बहुत डर लगता है कि इस बार वह ठीक नहीं हो पायेगी। लगता है, हर बार तो ठीक करते गये पर इस बार जरूर कोई गड़बड़ होगी। तो यह डर मुझे बड़ा अलर्ट रखता है, हमेशा।
50. अगर व्यंग्य आपका सहज स्वभाव है तब तो ठीक है, वरना जब तक व्यंग्य आपके सहज स्वभाव में नहीं है, आप व्यंग्य उपन्यास नहीं लिख सकते।
51. मुझे लगता है कि मेरा पाठक से सीधे जुड़ पाना ही मेरी ताकत है। जो मैं कह रहा हूं, वो पाठक को लगे कि ये ही बात तो वो भी कहना चाहता है- यही मेरी ताकत है।
52. एक सफ़ल व्यंग्यकार बनने की आवश्यक योग्यता है ईमानदारी और एक निर्मल हृदय। जैसे ही आप तिकड़म में जाते हैं, आप व्यंग्य से बाहर हो जाते हैं। मेरा मानना है कि वो ही व्यंग्यकार बड़े बन पाये, और वो तभी तक बड़े रहे, बाद में, जब तक वो जीवन की छोटी तिकड़मों में नहीं पड़े।
53. अगर आपको व्यंग्य उपन्यास लिखना है, तो आपके अन्दर एक व्यंग्य की दृष्टि होनी चाहिये। आपको जीवन की समझ बहुत अच्छी होनी चाहिये और आपका हृदय बहुत निर्मल होना चाहिये।
54. एक सफ़ल व्यंग्यकार और एक बड़े व्यंग्यकार में अंतर है। सफ़ल व्यंग्यकार होना बीच का रास्ता है। एक बड़ा व्यंग्यकार होने के लिये वो मुमुक्षा चाहिये आपको। जब व्यंग्य ही आपका जीवन हो जाये।
55. पूरा समाज , जीवन, देश और विश्व इस तरह से बदला है कि बिल्कुल ही अलग चुनौतियां हैं अब जीवन के सामने। बहुत अलग किस्म की चुनौतियां हैं ये और उसके बीच अगर हम उथला-उथला खेल करेंगे, अभी भी हम राजनीति पर बहुत उथले व्यंग्य लिखते रहेंगे और हम सोशल मीडिया की तारीफ़ को ही अगर तारीफ़ समझेंगे , एक दूसरे की तारीफ़ को जो कि एक वहां का सामान्य शिष्टाचार बन गया है, तो कहीं नहीं पहुंचेंगे।
56. आप किसी सही व्यक्ति को पकड़ो, जो आपसे सही बात कर सके। फ़िर आप आगे बढो। और रातों-रात, ओवरनाइट स्टार होने की कल्पना मत करो। ये एक बहुत लम्बा खेल है साहित्य। आप अच्छा लिखो, बस बाकी चीजें अपने आप पीछे-पीछे आयेंगी। मैं ये कह रहा हूं। पुरस्कार भी
आयेंगे। पहचान भी आयेगी। सम्मान भी आयेंगे। आपके बारे में बात भी होगी।
पुस्तक विवरण
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पुस्तक का नाम:’साक्षी है संवाद ’ (ज्ञान चतुर्वेदी से लंबी बातचीत)
वार्ताकार- राहुल देव
सहयोग राशि- 100
पेज- 96
प्रकाशक: रश्मि प्रकाशन, 204, सन साइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4 , कृष्णा नगर, लखनऊ- 226023
किताब के लिये आर्डर करने के तरीके:
1. 100 रुपये पेटीम करें फ़ोन नंबर - 8756219902
2. या फ़िर 100 रुपये इस खाते में जमा करें
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3. किताब अमेजन पर इस पते पर उपलब्ध है -http://www.amazon.in/dp/B07D3N2P1R

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ईमानदारी और एक निर्मल हृदय एक सफ़ल व्यंग्यकार के लिये आवश्यक योग्यता है-- ज्ञान चतुर्वेदी


“एक सफ़ल व्यंग्यकार बनने की आवश्यक योग्यता है ईमानदारी और एक निर्मल हृदय। जैसे ही आप तिकड़म में जाते हैं, आप व्यंग्य से बाहर हो जाते हैं। मेरा मानना है कि वो ही व्यंग्यकार बड़े बन पाये, और वो तभी तक बड़े रहे, बाद में, जब तक वो जीवन की छोटी तिकड़मों में नहीं पड़े।“
यह बात प्रसिद्ध व्यंग्यकार पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी जी ने युवा कवि, आलोचक और संपादक राहुल देव से लंबी बातचीत करते हुये के सवाल -“आपके अनुसार एक सफ़ल व्यंग्यकार बनने की आवश्यक योग्यता क्या है?” के जबाब में कही।
ज्ञान जी से राहुलदेव की लंबी बातचीत ’साक्षी है संवाद’ शीर्षक पुस्तक में संकलित हैं। किताब स्व. सुशील सिधार्थ जी को समर्पित है। रश्मि प्रकाशन लखनऊ से छपी किताब में प्रकाशक की तारीफ़ करनी होगी कि पैसा पेटीएम करने के तीन-चार दिन बाद ही किताब पहुंच गयी। कुल जमा सौ रुपये में 96 पेज की किताब डाकखर्च सहित। मतलब लगभग एक रुपया फ़ी पेज।
किताब मिलते ही सरसरी तौर पर सारे पन्ने देख डाले। काफ़ी कुछ बांच भी लिये। इसके बाद कल और आज तसल्ली से पढी। चुनिंदा अंश नोट भी किये जो कि अलग से आपको पढवायेंगे।
इस लंबी बातचीत में राहुल ने ज्ञान जी के लेखन और उनके जीवन से जुड़े तमाम सवाल पूछे हैं। ज्ञान जी ने उनके विस्तार से और कहीं-कहीं क्या लगभग हर सवाल का बहुत विस्तार से जबाब दिया है- ’खासकर अपने लेखन और व्यक्तित्व से जुड़े सवालों के जबाब में।’ मतलब पाठक के अनुमान लगाने के लिये कुच्छ नहीं छोड़ा। बहुत आत्मीयता से सवालों के जबाब दिये।
ज्ञान जी ने समसामयिक व्यंग्य लेखन से जुड़े सवालों के जबाब देते हुये अच्छे व्यंग्य लेखन की शर्तें भी बताईं। व्यंग्य में आलोचना की स्थिति बताते हुये कहा-“ अभी आलोचना के नाम पर हमारी व्यंग्य पत्रिकाओं में जो लिखवाया जा रहा है, वो बहुत कमजोर चीज है। हम परिभाषाओं पर ज्यादा जाते हैं।“
आलोचकों के बारे में उनका यह भी मानना है - “हमारे ज्यादातर व्यंग्य आलोचक, व्यंग्य ही नहीं , हर तरह के आलोचक, जो बने, वे अंतत: खलीफ़ा के अंदाज में फ़तवे जारी करने लगे।“
“व्यंग्य में हास्य की जरूरत पर अपनी राय व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा- हास्य बहुत कठिन है, बहुत बड़ी चुनौती है और बहुत प्रतिभा मांगता है। हास्य की तो बहुत इज्जत की जानी चाहिये। ’हास्यकार’ कहके किसी को दरकिनार कर देना बहुत बड़ा अपराध है।“
व्यंग्य में हास्य को त्याज्य बताने वाले संप्रदाय की समझ के खिलाफ़ फ़्रंटफ़ुट पर बैटिंग करते हुये ज्ञान जी ने कहा-“ बहुत लोग कहते हैं, प्रेम जनमेजय उनमें सबसे आगे हैं, और उनके साथ वाले बहुत से लेखक कहते हैं कि हास्य डाल दो, तो व्यंग्य डायल्य़ूट हो जाता है, उसका तीखापन खराब हो जाता है, उसकी चोट नहीं पड़ती।
मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूं कि आप अपनी कमजोरी लेखन की विशेषता मत बता दीजिये। अगर मेरे से हास्य रचते नहीं बनता , तो मैं हास्य को कहूं कि ये तो बेकार की चीज है। मेरे से एक अच्छी कविता लिखते नहीं बनती और मैं यह कहूं कि कविता करना बेकार है। तो मैं अपनी कमजोरियों को विशेषता बनाकर न कहूं।
व्यंग्य में सपाटबयानी पर अपनी बेबाक राय रखते हुये ज्ञानजी ने सीधे कहा-“ व्यंग्य को सपाटबयानी में तब्दील करने की इस मुहिम में हुआ यह है कि धीरे-धीरे व्यंग्य में भी व्यंग्य नहीं बचा।“
हिन्दी प्रकाशकों को बदमाश बताते हुये उन्होंने यह इच्छा जाहिर की कि कोई उनके उपन्यासों नरकयात्रा और पागलखाना का अंग्रेजी में अनुवाद कर सके तो उनका दुनिया में नाम भी हो और पैसा भी मिले। ज्ञान जी की राय में हिन्दी का लेखन दुनिया के किसी भी लेखन की तुलना में उन्नीस नहीं इक्कीस ही है। हिन्दी से अंग्रेजी में अच्छे अनुवादक के न होंने के कारण दुनिया में पहचान और पैसा भी नहीं मिल पाता हिन्दी के लेखक को।
व्यंग्य के त्रिदेव, दो साल पहले हुये अट्टहास पुरस्कार प्रकरण, अपने व्यंग्य में गालियों पर उठे सवालों पर बहुत विस्तार से जबाब दिये ज्ञान जी ने। अंजनी चौहान जी (जिनको ज्ञानजी आज की पीढी का सर्वेश्रेष्ठ व्यंग्यकार मानते हैं) को ’अट्टहास’ का ’शिखर सम्मान’ दिलाने के चक्कर में ’अट्टहास’ का ’युवा सम्मान’ एक गलत आदमी को चला गया।
ज्ञान जी की एक बार फ़िर से इस मसले में सफ़ाई पढकर लगा कि वे कितने भोले हैं जो ऐसी बात पर दो साल से लगातार सफ़ाई देते आ रहे हैं जिस तरह की बातें हर सम्मान सामान्य तौर पर जुड़ी हैं। अभी हाल ही में हिन्दी व्यंग्य के सर्वेश्रेष्ठ में से एक माने गए व्यंग्यकार के नाम से शुरु हुये सम्मान की शुरुआत उसी तथाकथित गलत आदमी को देकर हुई। उसमें किसी ने इस मामले में बात तक नही की।
ज्ञानजी ने और भी तमाम सम्मानों से जुड़ी बातें विस्तार से बताई और गणित की भाषा में इति सिद्धम किया कि सिवाय एक इनाम के उन्होंने सारे इनाम सुपात्रों को संस्तुत किये और बाकायदा उनके लिये लड़े भी।
पाठक से सीधे जुड़ सकने की अपनी क्षमता को अपने लेखन की ताकत बताते हुये ज्ञानजी ने कहा-“ मुझे लगता है कि मेरा पाठक से सीधे जुड़ पाना ही मेरी ताकत है। जो मैं कह रहा हूं, वो पाठक को लगे कि ये ही बात तो वो भी कहना चाहता है- यही मेरी ताकत है।“
अपने लेखन की सबसे बड़ी कमजोरी की चर्चा करते हुये ज्ञान जी ने अपनी कमजोर याददाश्त को अपनी कमजोरी बताया। उन्होंने कहा-“ मेरी याददाश्त उतनी अच्छी नहीं है। मुझे लोगों के चेहरे याद नहीं रहते। मुझे लोगों के नाम याद नहीं रहते। इसलिये मुझे घटनायें उस तरह से याद नहीं रहतीं। कई बार तो मुझे लगता है कि वो चीज , एक अच्छी स्मरण शक्ति मेरे अन्दर यदि और होती उस तरह की, जिस तरह की बहुत लोगों की बहुत अद्भुत है।“
अच्छी स्मरण शक्ति वाले लेखकों के उदाहरण के रूप में ज्ञान जी ने अमृतलाल नागर जी को याद किया जिन्होंने आंखे कमजोर होने के बाद ’करवटें’ और ’पीढियां’ उपन्यास बोलकर लिखवाये।
अपनी कमजोर स्मरण शक्ति की विस्तार से चर्चा करते हुये ज्ञानजी ने बताया-“ मेरी स्मरण शक्ति उतनी अच्छी नहीं है। मैं भूल जाता हूं उन चीजों को। बोलते टाइम भी मेरे को बहुत बार धोखा हो जाता है। कई बार मैं मंच से किसी का नाम लेना चाहता हूं, तारीफ़ करना चाहता हूं और मुझे वो शब्द याद नहीं आ रहा, नाम याद नहीं आ रहा। मैं इतना दीवाना भी किसी लेखक का , और मैं किसी मंच से उसकी तारीफ़ कर रहा हूं और उसी का नाम याद नहीं आ रहा है। कोई कहे कि यही आपकी दीवानगी है? आप तारीफ़ कर रहे हैं और आपको नाम तक याद नहीं है! लोग ये सोचते हैं कि नाटकबाजी में ही ये तारीफ़ कर रहा है, इसको ऐसा होगा नहीं, पर वास्तव में मेरी स्मरण शक्ति.....। नाम तो बड़े गायब होते हैं मेरे से, और खासकर मौके पे तो नाम याद आते ही नहीं मेरे को।
जैसे अभी मैं आपको प्रमोद जब भोपाल में नाम ले रहा था , तो प्रमोद ताम्बट का नाम मुझसे छूटा। प्रमोद ताम्बट भी बहुत ऊंचे हैं इस मामले में कि वो फ़ालतू के जुगाड़ में नहीं पड़ते। मैं सोच रहा था कि बोलते हुये कि कोई नाम छूट रहा है। तो मेरे से कई नाम छूट जाते हैं। लोग नाराज भी हो जाते हैं।
मेरी स्मरण शक्ति की ये जो कमी है, इसने लेखन में मुझे कमजोर किया है। इसने मुझे और ताकतवर बनाया होता, अगर मेरे अन्दर उतनी अच्छी स्मरणशक्ति होती, जो कई बड़े हिन्दी लेखकों में है। मेरी नहीं है। संदर्भ याद नहीं रहते। कवि का नाम याद नहीं रहता, वही कविता भूल जाता हूं जिसपे मैं फ़िदा रहता हूं। तो वो मेरी कमजोरी है। बहुत बड़ी कमजोरी है।“
ज्ञान जी की इस कमजोरी के बारे में जानकर मुझे बड़ा सुकून टाइप हुआ। एक तो इसलिये कि नाम अक्सर मैं भी भूल जाता हूं। दूसरे इसलिये कि इस लंबी बातचीत में उन्होंने तमाम लेखकों का नाम लिया। उनमें अनूप शुक्ल का नाम शामिल नहीं है। हालांकि अनूप शुक्ल को ऐसी कोई आशा भी नहीं थी लेकिन अपन ने अनूप शुक्ल को समझा दिया कि ज्ञानजी तुमको बहुत अच्छा लेखक मानते हैं। बस नाम लेना भूल गये होंगे लम्बी बातचीत में याददाश्त की अपनी कमजोरी के कारण। तबसे अनूप शुक्ल बौराये घूम रहे हैं।
ज्ञान जी ने सवालों के जबाब के बहाने अपने उपन्यासों की चर्चा विस्तार से की है। ईमानदारी से की गयी इस चर्चा में बात करते हुये वे कई बार आत्ममुग्धता के पाले में पहुंच गये दे लगते हैं। अपने उपन्यासों की तफ़सील से चर्चा करते हुये अपने समकालीनों के उपन्यासों पर चर्चा करते हुये किंचित अनौदार्य के पाले में पहुंच गये से लगते हैं जब वे कहते हैं-“वरना बहुत हैं जिन्होंने, वही, जैसा मैंने आपको बताया कि किसी ने कॉलेज ले लिये, कॉलेज नहीं तो दफ़्तर ले लिया, बैंक ले लिया और ऐसे करके आप कुछ लिख सकते हैं। दो-चार। उसमें व्यंग्य की छुटपुट छटा दिखा दी, और उसे कहा कि ये व्यंग्य उपन्यास है।“
इसके जबाब में कॉलेज, दफ़्तर, बैंक लेकर लिखने वाले कह सकते हैं कि यह बात ऐसा लेखक कह रहा है जिसने अपने उपन्यास लेखन की शुरुआत अस्पताल को लेकर की थी।
ज्ञान जी ने अपने बहुपठित होने के सबूत में अपने पास मौजूद तमाम किताबों के नाम बताये हैं जो उनके पास हैं और जिसे उन्होंने बाकायदा खरीदा है। बाकायदा खरीदने की बात कुछ मजेदार लगी क्योंकि किताबें और गुजर चुके लेखकों की रचनावलियां तो खरीदकर ही पढी जायेंगी। अब गुजर चुके बड़े लेखक नवोदितों की तरह अपनी किताबें सादर, सप्रेम भेंट करने तो आयेंगे नहीं। बाद में इस बात के कहने का कारण भी समझ में आया।
वह इसलिये कि ज्ञानजी को बचपन में किताबें पढने की ऐसी लगन थी कि किताबें चोरी करने में भी गुरेज नहीं करते थे। अपने किताब चोरी के अनुभव साझा करते हुये ज्ञान जी बताते हैं-“ मेरे एक सहपाठी मित्र होते थे, नवीन जैन। हम दोनों मिलकर जाते थे किताबों की दुकान पे। दुकान वाले को बातों में उलझाते थे और वहां से चोरी करके, किताब मारकर, बाकायदा पैंट के अन्दर छुपा लेते थे। शर्ट बाहर निकली हुई है, पैंट के अन्दर खोंस लेते थे। हमारे पास एक जमाने में हजार के करीब ऐसी चोरी की किताबें हो गयीं थीं।“
बाद में ज्ञानजी का किताब चोरी करके पढने वाला सहपाठी किताब चोरी करते हुये पकड़ा गया था। उसकी बहुत पिटाई भी हुई। कपड़े उतार लिये गये। साथ में न रहने के चलते अपने ज्ञानजी बच गये।
अपनी पसंदीदा किताबों का जिक्र भी किया है ज्ञान जी ने। कल उनमें से एक जोसेफ़ हेलर के उपन्यास ’कैच ट्वेंटी टू’ की तारीफ़ से प्रभावित होकर मैं उसे खरीदने निकल पड़ा। लेकिन किताब मिली नहीं। इसके बाद ज्ञान जी दूसरे पसंदीदा अंग्रेजी लेखक पीजीवुडहाउस की एकमात्र उपलब्ध किताब ’बिग मनी’ लेकर आ गया। ढाई सौ रुपये की मिली। अब मैं भी पीजीवुडहाउस का जिक्र करते हुये कहूंगा-’बाकायदा खरीदकर लाया था यह किताब।’
ज्ञानजी ने अपने पढे-लिखे होने का जिक्र करते हुये तमाम कवियों और लेखकों का जिक्र किया। तफ़सील से उनके बारे में बताया है। लेकिन जिस मासूमियत से उन्होंने नरेश सक्सेना जी की बेहतरीन कविता का जिक्र करते हुये उसको पढ रखने का जिक्र किया उसे देखकर मुझे बहुत हंसी आई। ज्ञानजी की निश्छल मासूमियत की बलैयां लेने का मन हुआ। ज्ञानजी बताते हैं:
“ अभी के जो कवि हैं, चाहे भगवत रावत जी हों, चाहे राजेश जोशी हों, चाहे अरुण कमल हों, चाहें विनोद कुमार शुक्ल हों, नरेश सक्सेना साहब हों-’पुल पार होता है पुल पार करने से , नदी पार नहीं होती’। ये मैंने पढे हैं।“
राहुल देव की जगह मैं होता सवाल पूछने वाला तो मैं मजे के लिये पूछता नरेश जी की वो वाली कविता भी तो बताइये:
"शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है"
राहुल देव ने सभी सवालों के जबाब बहुत विस्तार से दिये हैं ज्ञान जी ने। शायद आमने-सामने की बातचीत और उसकी रिकार्डिंग के आधार पर किताब तैयार की गयी है। इसीलिये जबाबों में दोहराव है। कई जबाब अनावश्यक विस्तार से दिये गये लगते हैं।
इस बातचीत को पढना मेरे लिये उपलब्धि रहा। ज्ञान जी ने अच्छे व्यंग्य लेखन के जो गुर बताये हैं वे सबके लिये समान रूप से लागू होते हैं शायद जीवन के हर क्षेत्र में ही। वे कहते हैं:
“रातों-रात, ओवरनाइट स्टार होने की कल्पना मत करो। ये एक बहुत लम्बा खेल है साहित्य। आप अच्छा लिखो, बस बाकी चीजें अपने आप पीछे-पीछे आयेंगी। मैं ये कह रहा हूं। पुरस्कार भी आयेंगे। पहचान भी आयेगी। सम्मान भी आयेंगे। आपके बारे में बात भी होगी।“
किताब अपने में बहुत महत्वपूर्ण है। रोचक भी। इतनी कि इसके चक्कर में ज्ञानजी का उपन्यास ’पागलखाना’ पढना छोड़कर इसे पूरा किया। अब जब पूरी हो गयी किताब तो सोचा इस पर लिखा भी जाये। वैसे हमारे हिन्दी व्यंग्य में लेखक लोग सीधे किताबों के बारे में कम बाते करते हैं।
लेकिन राहुल देव की ज्ञान जी से बातचीत चर्चा, विस्तृत चर्चा की हकदार है। राहुल देव बधाई के हकदार हैं।
मुझे लगता है हिन्दी के सभी लेखकों से विस्तार से चर्चा होनी चाहिये। होना तो यह चाहिये कि बड़े स्थापित लेखक आपस में एक दूसरे का इंटरव्यू लें और नवोदितों के सामने नजीर पेश करें कि देख बेट्टा ऐसे लिया जाता है इंटरव्यू।
बहरहाल एक बेहतरीन बातचीत के लिये ज्ञानजी और राहुल देव संयुक्त रूप से बधाई के पात्र हैं।
इस बातचीत से के मुख्य अंश अगली पोस्ट में। लिंख यह रहा
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10214454783856856
पुस्तक विवरण
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पुस्तक का नाम:’साक्षी है संवाद ’ (ज्ञान चतुर्वेदी से लंबी बातचीत)
वार्ताकार- राहुल देव
सहयोग राशि- 100
पेज- 96
प्रकाशक: रश्मि प्रकाशन, 204, सन साइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4 , कृष्णा नगर, लखनऊ- 226023
किताब के लिये आर्डर करने के तरीके:
1. 100 रुपये पेटीम करें फ़ोन नंबर - 8756219902
2. या फ़िर 100 रुपये इस खाते में जमा करें
Rashmi Prakashan Pvt. Ltd
A/C No. 37168333479
State Bank of India
IFSC Code- SBIN0016730
दोनों में से किसी भी तरह से पैसे भेजने के बाद अपना पता 08756219902 पर भेजें (व्हाट्सएप या संदेश)
3. किताब अमेजन पर इस पते पर उपलब्ध है -http://www.amazon.in/dp/B07D3N2P1R
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