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Thursday, August 29, 2019
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
कल हमने लेह-लद्दाख सीरीज में एक नौजवान का जिक्र किया । हुन्डर के पास रेत की टीलों के पास एक नदी बहती है। पांच- छह मीटर चौड़ी। उसको फांदकर पार करने की चुनौती उछाल दी किसी ने।
तमाम तमाशबीनों और मोबाईलधारियों के बीच एक युवा ने चुनौती स्वीकार की और कमीज उतार कर छलांग लगाई। एकदम किनारे पानी में गिरा। एक बार गिरा साफ पार नहीं हो पाया तो दुबारा फिर कोशिश की। दुबारा फिर वहीं गिरा।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/videos/10217488976949787/
इसके बाद उसने कोशिश नहीं की। उसकी कोशिश देखकर अच्छा लगा। वह पार नहीं हो पाया लेकिन कोशिश की उसने। और कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
कल वीडियो लगा नहीं पाया। लेकिन किसी ने टोंका भी नहीं। वैसे भी लोग लम्बी पोस्ट्स जिसमें फोटो लगीं हों , देखी ही जाती हैं। पढ़ी कम जाती हैं।
देखिये ये वीडियो।
Wednesday, August 28, 2019
रेत के टीले और बहती नदी
पिछली पोस्ट में फोन के बंद होने की बात बताई । दोस्तों ने पूछा -फोन का क्या हुआ। हुआ यह कि हमने कई बार फोन को दबाया, सहलाया, पुचकारा। वह चला नहीं। फिर निराश होकर उसको धर दिया। सुबह उठे तो आदतन उसको फिर आन किया। ताज्जुब कि वह चला और लाल अक्षरों में वार्निंग देने लगा - बैटरी बहुत कमजोर है। मतलब फोन की सांस वापस आ गयी। फ़ौरन चार्जिंग पर लगाया। थोड़ी देर में टनाटन चलने लगा। यह पोस्ट भी उसी फोन से लिख रहे।
हुन्डर पहुंचकर शाम को पास ही स्थित रेत के टीले देखने गए। नुब्रा घाटी पर इस जगह पता नहीं कैसे रेत आई होगी। रेत आई तो ऊंट भी आये। हो सकता है पहले ऊंट आये हों। उनके लिए रेत का इंतजाम किया हो कुदरत ने।
यहां के ऊंट खास तरह के होते हैं। दो कूबड़ वाले। शायद पृकृति ने एक के साथ एक फ्री वाली योजना में इन ऊँटो को बनाया हो। चूंकि ऊंट अलग तरह के तो उनको रखने का इंतजाम भी अलग किया होगा। वरना क्या पता रेगिस्तान में एक कूबड़ वाले ऊंट इनको चिढ़ा-चिढ़ाकर हलकान कर देते। क्या पता उनकी चिढ़ से आजिज आकर कोई ऊंट अपना एक कूबड़ कटवा देता।या फिर एक ऊंट वाले इलाके में कोई 'कूबड़ कटवा' अपना आतंक मचा देता। ' कूबड़ कटवे' को एक कूबड़ वाले ऊंट सम्मानित करते।
नकटों के शहर में जिंदा रहने के लिए नाक कटाकर जीना पड़ता है।
बहरहाल इस जगह अनेक लोग ऊंट की सवारी कर रहे थे। 200-300 रुपये में एक चक्कर। समय के हिसाब से रेट। ऊंट बेचारे बहुत दुबले-पतले दिख रहे थे। निरीह, बेबस। शायद भर पेट खाने को न मिलता हो। दिहाड़ी के मजदूरों के ठेकेदार जिस तरह उनको न्यूनतम मजदूरी भी नहीं देते ऐसे ही लगता है ऊंटों को भी न्यूनतम भोजन नहीं मिलता। खत्तम होते अनुदान वाली संस्थाओं जैसे खत्तम होते लगे ऊंट। उन पर दया आई। सवारी करने का मन नहीं हुआ।
सवारी भले न की हो लेकिन उनके साथ फोटो खूब खिंचाई। अगल में, बगल में, आगे खड़े होकर, पीछे से। मने कोई कोना नहीं छोड़ा मुफ्तिया फोटो का। अनन्य ने फोटो खींची ऊंट के काफिले की। और भी।
तमाम लोग वहां फोटो खिंचवाने को आतुर थे। घर परिवार वाले जबरियन आत्मीय और कुछ तो रोमान्टिक भी होते पाए गए। मेरे सामने अपने जोड़ीदार को झिड़ककर हड़काने वाली महिला उसी के साथ फ़ोटो खिंचाते हुए इतना मुलायम मुद्रा में हो गयी कि कोई फ़ोटो देखता तो कहता -'लवली कपल। मेड फार इच अदर।'
वहीं एक नदी बह रही थी। पांच - छह मीटर या कुछ और ज्यादा ही चौड़ी। किसी ने उसको भागकर फांदने का चैलेंज उछाल दिया। एक लड़के ने अपनी शर्ट उतारी और भागते हुए छलांग लगाई। आधे मीटर पहले पानी में गिरा छपाक। पार नहीं कर पाया। लेकिन कोशिश की। उकसाने पर दुबारा उसने कोशिश की। फिर कुछ दूरी से किनारा चूक गया। भीग गया। लेकिन उसका हौसला देखकर खुशी हुई। असफल होने की पूरी आशंका के बावजूद उसने कोशिश की यह कितनी अच्छी बात है। आजकल हम लोग तो असफल होने के डर से कोई काम शुरू ही नहीं करते। उसका वीडियो देखिये अच्छा लगेगा।
तमाम देर आसपास के नजारे देखते हुए वापस लौट आये। अगले दिन हमको आगे जाना था। भारत के आखिरी गांव।
Tuesday, August 27, 2019
खरदुंग ला से हुन्डर
खरदुंग ला में दुनिया की सबसे ऊंची सड़क पर हम करीब दो घंटे रहे। मन तो कर रहा था कि कुछ देर और रहें लेकिन आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे थे । हम आगे बढे। हमारी आगे की मंजिल नुब्रा घाटी में हुन्डर थी।
खरदुंग ला तक हमारा फ़ोन टनाटन काम कर रहा था। एयरटेल का पोस्ट पेड कनेक्शन। प्रि पेड फ़ोन यहां काम नहीं करते। पोस्ट पेड में भी बीएसएनएल के फ़ोन यहां काम करते हैं। बाकी मिल गये तो मिल गये वर्ना नेटवर्क इच्छा। अभी तक हमारा फ़ोन घरवालों के फ़ोन के मुकाबले वीआईपी बना हुआ था। लेकिन खरदुंग ला से आगे बढते ही न जाने क्या हुआ कि हमारा फ़ोन ’शान्त’ हो गया। स्क्रीन गोल।
कई बार स्टार्ट, रिस्टार्ट करने के बावजूद फ़ोन की स्क्रीन काली ही बनी रही। कुछ दिन पहले ही खरीदे गये प्ल्स 7 फ़ोन की बोलती बन्द। हमें लगा खरदुंग ला की ऊंचाई में सांस फ़ूल गयी होगी, ठंड से हाल बेहाल हो गये होंगे -कुछ देर में गर्माहट से ठीक हो जायेगा। लेकिन फ़ोन एक बार रूठा तो रूठा ही रहा।
इधर फ़ोन बन्द हुआ उधर आशंकाओं की फ़ौज ने हमारे दिमाग में सर्जिकल स्ट्राइक कर दी। फ़ोन बन्द होने से संबंधित तमाम आशंकायें हमारे दिमाग में बिना अनुमति लिये घुस गयीं। लगा कि किसी ने हमारा खाता हैक कर लिया होगा। इधर फ़ोन बन्द हुआ उधर हमारे खाते से नेटबैंकिग से पैसे विदा हो रहे होंगे, कोई हमारे क्रेडिट कार्ड से अपने लिये ऐश के सामान खरीद रहा होगा। इन आशंकाओं को जितना भी परे धकेलते वे उतने ही आजिजी से वापस आकर दिमाग में पसरती जातीं।
आशंकाओं की अंतिम विदा तब हुई जब हमने हुन्डर में पहुंचते ही वहां जम्मू कश्मीर बैंक के एटीएम अपने खाते के बैलेन्स को चेक किया। खाते के पैसे यथावत खाते में शरीफ़ बच्चों की तरह मौजूद थे।
तेजी से आधुनिक और जटिल होती जा रही दुनिया में किस तरह की चिंतायें दिमाग में कब्जा करती हैं इसका अंदाज खरदुंग ला से लेकर हुन्डर तक की यात्रा में एहसास हुआ। जिन सुविधाओं ने हमारा जीवन आसान टाइप किया है वही साथ में नयी तरह की चिंतायें भी लायीं हैं। सुविधा के साथ चिंता भी मुफ़्त में।
खाते में पैसे सुरक्षित होने की चिंता जब विदा हुई तो अपना चार्ज दूसरी चिंता को दे गयी। पैसे की चिंता से हटकर अब चिंता इस बात की होने लगी कि फ़ोन कैसे ठीक होगा। कन्हैयालाल बाजपेयी जी कविता पंक्तियां याद आईं:
चिंता एक के साथ एक फ़्री वाले अंदाज में आती हैं इसका एहसास तब हुआ शर्ट की जेब में रखा मोबाइल जेब से निकलकर जमीन पर गिर पड़ा। उसके गिरने के अंदाज से लगा मानो बारबार दबाने के बावजूद सेवा न दे पाने की शर्म के चलते उसने जेब से कूद कर आत्महत्या की कोशिश की हो। जमीन पर गिरने से मोबाइल के माथे पर गुलम्मा पड़ गया। हमने प्यार से सहलाते हुये पुचकार कर मोबाइल को जेब में रखा। इसके बाद उसको दबाया नहीं। मोबाइल चुपचाप पड़ा रहा जेब में।
खरदुंग ला से हुन्डर के रास्ते में दिस्किट बौद्ध स्थल पड़ा। एक पहाड़ी पर बुद्ध की ऊंची प्रतिमा करीब 32 मीटर है। कई दर्शक यहां इसे देखने आ रहे थे। हमने भी देखा। वहीं पर ब्रिटेन से आये एक बुजुर्ग दम्पत्ति से मुलाकात हुई। नजारा और मूर्ति देखकर उनका कहना था - अद्भुत। इसके अलावा फ़्रांस से आये एक मोटर साइकिल सवार से भी बतकही हुई। अपनी सहेली के साथ फ़्रास से भारत घूमने आये करीब 35 साल के जवान ने बताया कि वो हर साल भारत घूमने आता है। लेह लद्दाख के इस हिस्से के बारे में उसका कहना था कि दुनिया में इतनी खूबसूरत जगह कोई और नहीं।
हुन्डर में बार्डर रोड के गेस्ट हाउस में रुके। रुकने की व्यवस्था हमारे दोस्त अंकुर ने की थी। वे पहले यहां काम कर चुके थे। गेस्ट हाउस में काम करने वाले लोग उनकी याद कर रहे थे।
गेस्ट हाउस के आसपास की पहाड़ियों पर शाम उतर आई थी। सामने की पहाड़ी पर बनी आकृतियां ऐसी लग रही थीं मानो कोई मियां बीबी किसी बात पर भन्ना कर एक दूसरी के उल्टी तरफ़ सर करके लेट गये हों। पत्थर दिल जोड़े में से कोई किसी को मनाने की कोशिश भी नहीं कर रहा था। लेटे थे चुपचाप। पहाड़ पर मौन पसरा था। मन किया उनको अंसार कम्बरी की कविता सुनायें:
पढ सको तो मेरे मन की भाषा पढो,
मौन रहने से अच्छा है , झुंझला पडो।
लेकिन फ़िर छोड़ दिये। पत्थरों को कविता क्या सुनाना।
कुछ देर बाद हम लोग पास में स्थित रेत के टीलों को देखने गये। उसका किस्सा अलग से। लौटकर फ़िर इंगलैंड-न्यूजीलैंड के बीच का मैच देर रात तक देखते रहे। हमारी सहानुभूति और समर्थन शुरुआत से ही न्यूजीलैंड के साथ रहा। आखिर में जब वह हारा तो हम दुखी होकर सो गये। उठे तो सुबह हो गयी थी।
Monday, August 26, 2019
दुनिया की सबसे ऊंची सड़क पर
लेह में आने के अगले दिन नुब्रा घाटी के लिये निकलना था। ड्राइवर लखपा ने सुबह जल्दी चलने की बात कही। हमने हां भर ली। लेकिन निकलते हुये देर हो ही गयी। तसल्ली से नाश्ता करते हुये निकले।
जहां हम रुके थे उसके आसपास सेना के कई संस्थान थे। एक यूनिट के बाहर तिरंगा फ़हरा रहा था। सेना की गाड़ियों की आवाजाही हो रही थी। इन सबको देखते हुये हम आगे बढे।
रास्ते में कुछ स्कूल दिखे। बच्चे स्कूल के मैदान में खेलते। सभी स्कूल सेना की यूनिटों के सहयोग से चलते हैं। इतनी कठिन परिस्थिति में सेना के सहयोग के बिना सहज जीवन मुश्किल। सेना को भी स्थानीय लोगों का पूरा सहयोग मिलता है।
जैसे-जैसे ऊंचाई बढती गयी , पहाड़ बर्फ़ से ढकते गये। बर्फ़ पहाड़ों के कुछ हिस्सों को ढके हुये उनको सफ़ेद बना रही थी। बर्फ़ का हिस्सा नीचे से गलते हुये पानी में बदलता जा रहा। पानी जहां जगह मिली वहां से नीचे बहता जा रहा था। कहीं पहाड़ के किनारे से, कहीं बीच सड़क से, कहीं दोनों तरह से। बीच सड़क से गुजरते हुये पानी सड़क के हिस्से को भी अपने साथ लेती जा रही थी - ’चल मेरी गुइय़ां’ कहते हुये। जगह-जगह सड़क उखड़ गयी थी।
बर्फ़ को देखने के लिये शायद बादल भी उतावले थे। जगह-जगह उमड़ते हुये बर्फ़ के ऊपर टहल रहे थे। सूरज भाई भी रोशनी की सर्चलाइट मारते हुये सबको चमकाते हुये सब पर निगाह रखे थे।
लेह से करीब 35 किमी दूर और लगभग 2 किमी की ऊंचाई पर जगह का नाम है -खरदुंग-ला । खरदुंग-ला दर्रा की सड़क दुनिया की सबसे ऊंची सड़क है जहां गाड़ियां चलती हैं। दुनिया भर के मोटर साइकिलिस्ट यहां चलना एक उपलब्धि मानते हैं।
खरदुंग-ला में पहाड़ चारो तरफ़ बर्फ़ से ढंके थे। यात्रियों के जत्थे के जत्थे अकेले , परिवार सहित यहां आने की यादें सुरक्षित रखने के लिये तरह-तरह से फ़ोटो खिंचा रहे थे। कोई सेल्फ़ी ले रहा था, कोई ग्रुप फ़ोटो। वहीं पर ’बार्डर रोड आर्गनाइजेशन’ की तरफ़ से यह सूचना देते हुये खम्भा लगा है कि यह सड़क दुनिया की सबसे ऊंची सड़क है। उस खम्भे के पास खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाने की लोगों में होड़ लगी थी। जिस तरह विवाह मंडप में दूल्हे-दुल्हन के साथ बराती-जनाती फ़ोटो खिंचाने का इन्तजार करते हैं उसी अदा में लोग बारी-बारी फ़ोटो खिंचा रहे थे। खम्भा एक फ़ोटो खिंचाने वाले अनेक। अलग-अलग मुद्रा में फ़ोटो खिंचाने की ललक में उसी खम्भे के पास इकट्ठा थे।
कुछ लोगों ने तो पहाड़ पर चढकर फ़ोटो खिंचाई। कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने बर्फ़ पर लेटकर भी यादें कैमरे में कैद की। सभी जी भरकर इन क्षणों को समेट लेना चाहते थे। पता नहीं फ़िर कभी आना हो या न हो !
खम्भे की तरफ़ जाते हुये कुछ लोग बर्फ़ में फ़िसल गये। कुछ रपट गये फ़िर संभल गये। कुछ हुये धड़ाम भी। अपन ने भी मौका मिलने पर फ़ोटोबाजी की। इस बीच आसपास की बर्फ़ से ढंकी चोटियों के नजारे भी जी भर के देखे। देखने में कोई शुल्क और जीएसटी तो लगी नहीं थी। माले मुफ़्त -दिले बेरहम। सारी चोटियां बार-बार देखीं, कई बार देखीं।
वहीं पर एक चाय की दुकान थी। वहां से चाय पी गयी। इतनी ऊंचाई पर भी चाय के दाम मात्र 40 रुपये। बड़ी कागज की ग्लास में चाय दी चाय वाले ने। दो चाय के साथ तीसरा ग्लास मुफ़्त में। यहां शहर में किसी माल में इतनी चाय डेढ सौ से कम में न दे कोई, ग्लास अलग से देने की तो बात भूल ही जाइये।
उसी जगह सेना के ट्रुक भी चलते दिखे। सभी वाहन निर्माणी जबलपुर के बने। इनमें से कुछ जरूर तब के बने होंगे जब हम वाहन निर्माणी जबलपुर में थे। देखकर बहुत अच्छा लगा। देश भर में जहां भी सेना की कोई भी यूनिट है वहां वाहन निर्माणी जबलपुर के ट्रक हैं।
खरदुंग-ला पर तमाम मोटर साइकिल वाले भी जमा थे। वे लेह से लद्दाख घूमने निकले थे। कोई अकेले , कोई समूह में। कुछ समूहों में लड़कियां भी दिखीं। लगा कि यार जिंदगी और जवानी जो है सो यही है। बाकी तो सब बेफ़ालतू की बाते हैं। वहीं खड़े-खड़े तय किया कि एक यात्रा तो इस इलाके की मोटरसाइकिल से भी करनी है। अब तय करने को तो कर लिया, अब देखिये इस पर अमल कब होता है।
इस बीच पानी भी बरसने लगा। हमारे ड्राइवर ने हमसे आगे चलने के लिये कहा। हम उनकी बात मानकर कुछ देर में आगे चल दिये। आगे की मंजिल नुब्रा घाटी थी।
Friday, August 09, 2019
अनुशासित यातायात के लिए सहयोग करें
शहरों में जाम एक आम समस्या है। भीड़ से ज्यादा लोगों का रवैया ज्यादा जिम्मेदार है जाम के लिए। हर आदमी हड़बड़ी में है। सोचता है एक मिनट का काम उल्टी तरफ से निकल लेते हैं। इस चक्कर में कभी-कभी घण्टों फंस जाता है और दूसरों को जाम के लिए कोसता है।
हमारे घर के पास सालों से ओवर ब्रिज बन रहा है। लगता है सालों तक अभी और बनेगा। दो स्कूल हैं एक बाईं तरफ दूसरा दाईं तरफ। स्कूल शुरू होने और बन्द होते समय गजब भभ्भड़ मचता है। लोग अपने बच्चों को छोड़ने आते हैं और जहां भी जगह मिलती है , गाड़ी घुसा देते हैं। इस चक्कर में सुबह और दोपहर रोज जाम लगता है। जिस दिन नहीं लगता है , लगता है कुछ गड़बड़ हुई।
पिछले कुछ दिनों से रोट्रेक्ट क्लब से जुड़े कुछ लोग जाम कम करने में सहयोग करने के लिए सुबह पुल की शुरुआत पर खड़े होकर लोगों को सही तरफ़ से जाने के लिए समझाते दिखे। उनको देखकर उल्टी तरफ से जाते देखकर सीधे हो गये लोग। कुछ लोग फुर्ररर से उल्टी तरफ निकल गए। शायद आगे जाकर सेलिब्रेट भी किया हो।
आज Raghvendra मिले पुल के मुहाने पर। सीने पर यातायात अनुशासन का पोस्टर चिपकाए हुए। रोट्रेक्ट क्लब क्लब वाले इस अभियान में लगे हैं। राघवेंद्र से बतियाते । पता चला कि थिएटर से जुड़े हैं। मुम्बई में 'इप्टा'। कई नाटक कर चुके हैं। भगत सिंह पर केंद्रित पीयूष मिश्रा के प्रसिद्ध नाटक 'गगन दमामा बाजयो' में सुखदेव का रोल कर चुके हैं। उसे देखकर पीयूष जी ने उनको मुम्बई बुलाया कहते हुए -'अब तुम मुम्बई आने लायक हो गए। '
एक और यादगार प्रस्तुति बताई चेखव की एक कहानी के नाट्य रूपांतर 'जांच पड़ताल' पर अभिनय की। पीपीएन से पढ़कर थियटर से जुड़े हैं।
नाटक के चलते घुमक्कड़ी करते हुए राघवेंद्र 20-25 प्रदेश घूम चुके हैं।
कनपुरिया ट्रैफिक की अराजकता को सुधारने की कोशिश करते हुए उन्होंने मुम्बई, मिजोरम आदि के अनुशासित ट्रैफिक के किस्से सुनाये। वहां आदमी लाइन में लगकर बस में चढ़ता है। यहां लोग लगी हुई लाइन तोड़ देते हैं।
राघवेंद्र के बोर्ड को देखकर कुछ लोग सीधी तरफ से गए। कुछ ने बच्चों को मोड़ पर उतार दिया। लेकिन कुछ लोग झांसा जैसा देकर सरपट निकल गए। एक ने तो मोटर साईकल धीमे की । लगा कि वहीं उतर जाएगा। लेकिन फिर बुत्ता देकर बगलियाते हुये निकल गया।
एक उत्साही सवार ने वहीं खड़े-खड़े राघवेंद्र को तमाम हिदायतें दे डालीं। ऐसे करना चाहिए, वैसे करना चाहिए। कुछ इस तरह जैसे चाय की दुकानों पर चुश्कियाँ लेते हुए विराट कोहली को खेलना सिखाते हैं। हमें लगा कि कहीं वह इस स्वयंसेवक को लापरवाही के आरोप में सस्पेंड न कर दे। लेकिन शायद उसको जल्दी दी इस लिए बिना कठोर अनुशासनिक कार्यवाही के सिर्फ हिदायत देकर चला गया।
राघवेंद्र ने बताया कि वो होटलों में बचा हुआ खाना इकट्ठा करके भूखों को भोजन कराने वाली संस्था 'रॉबिनहुड आर्मी ' से भी जुड़े हैं। र होटलों , रेस्तराओं से बचा हुआ खाना इकट्ठा करके गरीबों को खिलाते हैं। 100- 150 लोग जुड़े हैं इससे।
राघवेंद्र मूलतः हास्य-व्यंग्य से जुड़े हैं। राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल आदि कनपुरिया सेलिब्रिटी के साथ जुड़े हैं। नाटक भी किये हैं उनके साथ। खुद भी लिखते हैं।
अभी मुम्बई से कानपुर अपनी माँ की बीमारी में इलाज के लिए आये थे । ऑपरेशन हुआ तो यह ट्रैफिक वाला काम थमा दिया गया। कल से मेघदूत होटल के पास ट्रैफिक सीधा करेंगे।
राघवेंद्र को देखकर मन किया कि हम भी सुबह सुबह घर से निकल कर ओवरब्रिज के पास खड़े होकर ट्रैफिक सुधार में सहयोग करें। सुना है किरण बेदी जी के पति रिटायरमेंट के बाद कुछ देर ट्राफिक चौराहे पर सहयोग करते थे। हम पहले ही करने लगें। 
लेकिन सोचने और करने में फर्क होता है। फिलहाल तो यही तय किया कि ट्राफिक में शॉर्ट कट नहीं मारेंगे। सीधी तरफ से जाएंगे। जाम का झाम बचाएंगे।
आपका भी मन करने लगा होगा न इसी तरह का संकल्प लेने का। तो ले लीजिए। कोई फीस नहीं है अभी संकल्प लेने में। संकल्प लीजिये कि ट्राफिक नियम का पालन करेंगे। अच्छा संकल्प लेने में कभी घबराना नहीं चाहिए। क्या पता अमल भी हो जाये।
हम लोगों ने सुबह-सुबह एक बढ़िया संकल्प लिया। इतना कम है क्या?
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10217350319443436
Tuesday, July 23, 2019
लेह की सुबह
रात देर लौटकर आये। आराम से बतियाते हुए सो गए। सबेरे-सबेरे लगा कि कोई खिड़की खड़खड़ा रहा है। देखा तो हवा थी। शायद हमको उलाहना दे रही थी कि यहां क्या सोने आये हो? उठो, निकलो, देखो बाहर के नजारे। अभी मुफ्त हैं, क्या पता कल टैक्सिया जाएं।
छह बजे गए थे। बाहर निकले। सुबह हो चुकी थी। आसमान पर सूरज भाई की सरकार बन चुकी थी। हर तरफ उनका जलवा बिखरा हुआ था। हर पहाड़ पर उनकी ही किरणें बिखरी हुईं थी।
सामने एक पहाड़ पर थोड़ी ऊंचाई पर देखा एक कुतिया अपने पिल्ले को बेहद अपनापे से प्यार कर रही थी। उसके पूरे बदन को चूमती हुई। दुलराती हुई। पुचकारती हुई। दूर होने के चलते फोटो साफ नहीं आया। लेकिन याद के लिए जूम - फोटो तो ले ही लिए।
सबेरा हो गया लेकिन चाय अभी तक नदारद थी। जिस जगह ठहरे थे वहां आसपास कोई दुकान भी नहीं कि जाकर चाय पी आएं। मेस थी। उस दिन इतवार भी था। कुक को आराम से आना था , यह भी बाद में पता चला।
थोड़े इंतजार के बाद चयास बढ़ी तो वीरबालक की तरह किचन में धंस गए। किचन किसी कुंवारे बालक की रसोई की तरह बेतरतीब सा बिखरा हुआ था। वहां पहुंचते ही हमारे स्वागत में एक डम्प्लाट चूहा निकल कर आया। शायद किचन का यही प्रोटोकाल होगा।
हमको लगा कि हमको देखकर चूहा डरकर भाग जाएगा। लेकिन वह पट्ठा तो एक रैक से दूसरी रैक, एक डिब्बे से दूसरे डब्बे पर चढता-उतरता रहा। किचन में इस तरह निर्बाध टहलता रहा जैसे किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष एक देश से दूसरे देश टहलता हो या फिर रिटायरमेंट की बढ़ता हुआ कोई अफसर एक के बाद दूसरा ताबड़ तोड़ दौरा करता हो।
जब चूहा हमसे डरा नहीं तो हमने भी उसको नजरअंदाज कर दिया। वह भी अपने करतब दिखलाकर किसी डिब्बे में सोने चला गया। हमने फिर चाय बनाने के लिए, चीनी के डब्बे और दूध की खोज शुरू कर दी। सब मिल गए लेकिन पानी नदारद। कमरे में जाकर पानी लाये और चाय बनाई। चाय की पत्ती किसी भी ब्रांड की रही हो लेकिन पीते हुए मन हुआ कहें -'वाह ताज।' लेकिन फिर कहा नहीं । कारण आपको पता ही है।
ड्राइवर लखपा अपने समय से पांच मिनट पहले हाजिर हो गए। हम तब तक तैयार नहीं हुए थे। देरी की तोहमत एक-दूसरे पर डालने की कोशिश की। लेकिन देरी की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। अंततः तय हुआ कि अभी देर नहीं हुई है। यह तय करने के बाद सबने सुकून की सांस ली।
सुकून की सांस लेने के बाद सब लोग दूसरे से जल्दी तैयार होने की बात कहते हुए आराम-आराम से तैयार हुए। तैयार होकर नाश्ता किया। चलते हुए मेस का बिल दिया। सत्रह सौ करीब आया बिल जिसमें एक हजार कमरे का किराया था।
चलते समय देखा कि काम करने वाले आ गए थे। आसपास के गांवों से आते हैं। गावों में खेती भी है। लेकिन खेती के लिए वे बारिश पर नहीं निर्भर रहते। पहाड़ से पिघलने वाली बर्फ के पानी से सिंचाई होती है। पहाड़ की बर्फ लेह-लद्दाख की जीवन रेखा है।
हम सारा सामान गाड़ी में लादकर निकल लिए। हमारा अगला पड़ाव नुब्रा घाटी था।
Monday, July 22, 2019
लेह में पहला दिन
जैसा लोगों ने बताया था उससे लगा कि लेह पहुंचते ही सांस लेने में तकलीफ होने लगेगी। चलते हुए हांफने लगेंगे। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। मौसम एकदम चमकदार और चकाचक था। हमको लगा कि मौसम के यह दांत दिखावटी हैं। कुछ देर बाद असली रंग दिखेगा। हम उसके इंतजार में थे।
एयरपोर्ट पर ड्राइवर हमको लेने आये थे। नाम लखपा। हमारे दोस्त अंकुर के मार्फ़त । रहने की व्यवस्था एयरपोर्ट के पास ही एक मेस में थी। वहां जाने के रास्ते में सेना द्वारा व्यवस्थित 'हाल आफ फेम' दिखा । इसमें लद्दाख के बारे में और सेना के विविध आपरेशन के बारे में जानकारियां हैं। उनको बाद में देखने के लिये सोचते हुए हम अपने ठिकाने पहुंचे।
मेस में पहुंचते ही चाय-पानी हुआ। इसके बाद डायमोक्स खा कर लेट गए। अनुशासित मुद्रा में। सब कुछ सामान्य सा महसूस करते हुए लगा कि लेह में खराब मौसम का हल्ला अफवाह ही है।
कुछ देर बाद बाहर टहलने निकले। बगल में ही निर्माण का काम चल रहा था। बातचीत हुई। पता लगा कि वे लोग पास के ही गांव के रहने वाले हैं। बड़े-बड़े पत्थर को स्थानीय मिट्टी के गारे से जोड़ते हुए दीवार खड़ी कर रहे थे।
कामगारों ने 'बूझो तो जाने' वाले अंदाज में अपनी उम्र का अंदाजा लगाने को कहा। हमने कुछ लगाया लेकिन वह गलत बताया उन्होंने। पता चला कि एक कि उम्र 71 साल है और उसके रिटायर होने में अभी भी कुछ साल बाकी हैं। दूसरे ने भी अपनी उम्र साठ पार बताई। यह बताते हुए उन्होंने कहा -'पहले सब ऐसे ही हो जाता था। अब तो इतना कागजबाजी होता है कि हम तो भर्ती ही न हो पायें।'
मेस में काम करने वाले भी कोई महाराष्ट से कोई झारखण्ड से। लेह कठिन स्टेशन है। यहां से शायद दो साल बाद वापस तबादला हो जाता है। कई लोग उसके इंतजार में थे। जाड़े के कठिन मौसम के किस्से भी सुनाये लोगों ने।
मैदान में जगह-जगह बंकरनुमा गोडाउन बने थे। बादल आसमान में मुफ्तिया ठहलाई कर रहे थे। एक जगह पेट्रोल पम्प नुमा जगह दिखी। देखा तो मिट्टी के तेल का पम्प था। मिट्टी का तेल यहाँ जरूरत है , शायद नियामत भी।
बाजार में एक जगह चबूतरे पर एक बुजुर्ग लोगों को उनका भविष्य बता रहे थे। एक यन्त्र की सहायता से। लोगों के पूछने के अंदाज से लगा कि वे भी मजे ले रहे हैं। पूछने वाले -बताने वाले दोनों एक ही घराने -'टाइम पास' घराने के लगे। यह बात अलग कि बताने वाले को कुछ आय भी होने की आशा थी।
बाजार टहलने के बाद पास के ही एक बौद्ध स्थल देखने गए। शांति स्थल।
बौद्ध स्थल थोड़ा ऊंचाई पर है। पहुंचते ही वहां लोगों को कैमरा बाजी में जुटते देखा। आजकल लोगों के मोबाइल में कैमरे का साइड इफेक्ट यह भी है कि कहीं भी पहुंचते ही लोग वहां के दृश्यों को दुश्मन को देखते ही गोलियों से छलनी करने वाले अंदाज में शूट करने करने लगते हैं। हमने भी किया। कुछ फोटो बावजूद तमाम लापरवाही के अच्छी भी आईं।
बुद्ध स्थल से लौटकर हमने रात का खाना बाहर ही खाया। तीन लोगों के खाने का खर्च 400 रूपये से कम ही रहा। यह इसलिए बताया कि अंदाज लग सके कि लेह-लद्दाख में खाना-पीना किसी और शहर जैसा ही है। महंगा नहीं।
खाते-पीते हुए रात हो गयी थी। बाजार बंद हो रहे थे। हम वापस लौट आये। अगले दिन हमको नुब्रा जाना था। ड्राइवर ने जल्दी तैयार होकर चल देने के लिए कहा। हमने भी हामी भर ली। लेकिन खाली हामी भरने से क्या होता है।
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Sunday, July 21, 2019
लेह-लद्दाख वाया लखनऊ-दिल्ली
लेह-लद्दाख घूमे पिछले हफ्ते। कानपुर से लखनऊ, दिल्ली होते हुए लेह पहुंचे। लेह का मौसम बहुत हाहाकारी बताया था हमारे दोस्तों ने जो पिछले महीने यहाँ से घूमकर गये थे। सर्दी इतनी कड़क बताई थी कि हम तमाम स्वेटर और ठंड वाले कपड़े लादकर लाये थे। लेकिन जब लेह पहुंचे तो मौसम एकदम आशिकाना सा था। बड़ी गर्मजोशी से खिली धूप ने स्वागत किया। सर्दी कहीं दाएं-बाएं हो गई थी। शायद उसको भी हमारी और सूरज भाई की दोस्ती का अंदाज लग गया था।
लेह लखनऊ दिल्ली होते हुए आये। लखनऊ एयरपोर्ट पर चाय की दुकान पर चाय लेने गए। साथ में चिप्स भी। छोटा पैकेट लिये तो सेल्सबच्ची ने मजे लिए -'पैसे बचा कर क्या करेंगे।' बिना उसकी बातों के झांसे में आये उससे बतियाये। पता चला कि मुंबई से आई है नौकरी करने। घर आजमगढ़ है। सुबह छह बजे से ड्यूटी। खुद चाय पी कि नहीं पूछने पर बोली -'पहले पेट पूजा, बाद काम दूजा।'जहाज में चढ़ने पर पता चला कि इकोनामी वाला टिकट अपग्रेड होकर चौड़ी सीट वाला हो गया। पचास मिनट के मुफ्तिया अपग्रेडेशन का खराब असर यह हुआ कि हम हर बार बोर्ड करते हुए सोचते कि यहां भी वीआईपी सीट हो जाये।
दिल्ली से लेह जाते हुए खूबसूरती खिलने लगी। बादल, पहाड़, धूप, बर्फ की चमकदार जुगलबंदियाँ दिखने लगीं। हर जुगलबंदी पहले से अलग और अपने में अनूठी। लेह में उतरे तो मौसम खिला-खिला और खुला-खुला दिखा।
हालांकि लेह में पहला दिन आराम का ही रहता है लेकिन दोस्ताना मौसम देखकर शाम को बाहर निकले। बाजार चकाचक सजा था लेकिन कोई हड़बड़ी नहीं थी किसी को। फुटपाथ के अधिकतर दुकानदार या तो बगल के दुकानदारों से बतिया रहे थे या मोबाइल में व्यस्त थे। फुटपाथ में कतार से सब्जी बेचती महिलाएं या तो स्वेटर बुन रहीं थी या फिर मोबाइलिया रहीं थीं।
बाजार की बीच की बड़ी फुटपाथ पर बनी बेंचो पर बैठे हुए तमाम बुजुर्ग समय को आहिस्ते, बुजुर्गियत और तसल्ली से बीतते देख रहे थे। कई लोग इन बेंचों के आसपास अलग-अलग पोज में फोटो खिंचा रहे थे। एक लड़का साइकिल को चलाते हुए झटके से उठाकर फुटपाथ पर चढ़ाने का स्टंट टाइप कर रहा था।
बाजार में पर्यटकों के अलावा तमाम ऐसे भी लोग थे जो यहां काम खोजने आये थे। इनमें से अधिकतर लोग बिहार, झारखण्ड के मिले।
तिब्बत रिफ्यूजी बाजार में भी ज्यादातर दुकानदार तसल्ली से बैठे थे। ग्राहकों पर झपटने, उन पर कब्जा करने और सामान टिका देने की नीयत नहीं दिखी।
तिब्बती बाजार के बाहर सड़क पर एक बच्ची चलते हुए अपने टैब पर कुछ पढ़ती हुई दिखी। वहीं बाहर चाय की दुकान पर लोग अलग-अलग तरह की चाय पीते दिखे। और भी अलग-अलग तरह के चित्र जो अब यादों में गड्ड-मड्ड हो गए हैं।
लेह लद्दाख के दिन 'नेट विपश्यना' के दिन रहे। किसी भी कम्पनी के प्रीपेड पर फोन बंद। बीएसएनएल के अलावा पोस्ट पेड केवल लेह में चला। बाकी सब जगह केवल बीएसएनएल के पोस्ट पेड फोन ही चले। अच्छा ही हुआ, वरना हम प्रकृति सुषमा निहारने की बजाय नेटबाजी ही करते रहते।

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