सुबह होते ही सूरज भाई खिड़की के रास्ते हमारे कमरे में घुस आते हैं। बिस्तर पर, कुर्सी पर, जमीन पर अपना राजपाठ फैला लेते हैं। जहां पसरते हैं, वह हिस्सा चमक जाता है। अगल-बगल भी ।
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Sunday, April 05, 2020
इंद्रधनुष हमारे आस-पास
सूरज भाई सीधे चलते हैं। सीधा हिसाब। जो सामने आता है उसको रोशनी, ऊष्मा बांट देते हैं। बिना किसी भेदभाव के। बिना किसी लागलपेट के। जितना क्षेत्रफल उतनी रोशनी। यह नहीं कि कोई दूसरा डबल रोशनी बटोर के ले जाये और फिर उसको ब्लैक में बेच ले।
रोशनी की नदी हैं सूरज भाई। उमंग के फव्वारे फूटने लगते हैं उनकी संगत में।
फव्वारे से याद आया कि हमारी निर्माणी में मेन गेट के एकदम सामने एक बड़ा फव्वारा है। गेट खुलते ही एकदम सामने से दिखता है फव्वारा। पानी का गुंबद बनाते हुए पानी नीचे गिरता है। उसके बाद फिर ऊपर पानी का गुम्बद बनता है।
जब हम आये थे फैक्ट्री तो देखा कि फव्वारा बन्द है। फव्वारा क्या असल में यह फायर सेफ्टी के लिहाज आग बुझाने के पानी का टैंक था। उसी पर किनारे पाइप लगाकर नोजल लगा लिए गये। बन गया फव्वारा।
हां तो अपन आये तो राउंड के लिए निकले। नया मुल्ला प्याज खाता है कि नहीं यह मुझे नहीं पता लेकिन यह पक्का पता है नया अफसर राउंड जरूर लेता है। जिसको राउंड करने की जगह नहीं मिलती वह मीटिंग करके अपनी इच्छा पूरी करता है। राउंड और मीटिंग के दौरान अक्सर अपने से पहले के अफसर द्वारा किये सारे कामों में कमी निकालता है। कई काम रुकवाकर अपनी तरह से करवाता है। नतीजतन ,अकसर, पहले से बड़ी से बेवकूफियां कर जाता है। अगले के लिए और ज्यादा काम छोड़ जाता है।
राउंड के पहले ही दिन फव्वारा टाइप दिखा गेट के सामने। उसके आगे सन्तरी की पोस्ट। लिए बंदूक खड़ा सन्तरी गोया फव्वारे की रक्षा के लिए खड़ा हो। हमें बुन्देलखण्ड के तालाब याद आ गए। गर्मी के दिन में पानी की चोरी बचाने के लिए वहां लोग लिए बन्दूक पहरा देते हैं।
फव्वारे के बारे में हमने पूछा - 'यह फव्वारा बन्द क्यों है?'
'यह बन्द ही रहता है। जब कोई वीआइपी आता है तब चलाया जाता है।'- हमको बताया गया।
हमने फौरन कहा -'अरे यार फैक्ट्री के लिए फैक्टरी के वर्कर से बड़ा वीआइपी कौन हैं। वह तो रोज आता है। फव्वारा रोज चलना चाहिए। फौरन चलवाओ।'
हमने इसी बहाने खुद को भी वीआईपी में शामिल कर लिया। आखिर हम भी तो फैक्ट्री के वर्कर हैं। रोज आते हैं फैक्ट्री।
बहरहाल कुछ ही दिन में फव्वारा चालू हुआ। कुछ दिन तो बहका बहका चला। अड़ियल कामगार की तरह उसने भी सोचा होगा कि बहककर चलेंगे तो पिंड छोड़ देंगे ये लोग हमारा। लेकिन हम भला कहां छोड़ने वाले। मानो हम एक बार को छोड़ भी दें लेकिन हमारे साथ के लोग कहां छोडने वाले जिनको यह जिम्मेदारी मिली है कि वे फव्वारा चलाएं। लिहाजा अब फव्वारा दिन भर चलता है। फैक्ट्री में घुसते ही मन खूबसूरत फव्वारा देखकर मन खुश हो जाता है।
फव्वारा हमारे दफ्तर से दो मिनट की दूरी पर ही है। आते जाते दिखता है। अक्सर उसके पास जाकर देखते हैं। सूरज की रोशनी में पानी में बना इंद्रधनुष देखते हैं। मन खुश हो जाता है।
पानी मे बने इंद्रधनुष को जब साथ के लोगों को दिखाते हैं तो उनको ताज्जुब होता है कि इंद्रधनुष उनके इतने पास है। कइयों को तो इंद्रधनुष देखे सालों हुए। उनको लगता है कि इंद्रधनुष तो केवल बरसात में खिलता है। उनको पता ही नहीं कि इंद्रधनुष उनके पास भी दिखता है। जहां सूरज की रोशनी में पानी खिलखिलाता है वहां इंद्रधनुष खिलता है।
यह हमारी जिंदगी में भी होता है। हमारे पास खुशियों के अनगिनत इंद्रधनुष खिले होते हैं लेकिन हम उनको देख ही नहीं पाते। इंद्रधनुष देखने के लिए उनको देखने की नजर चाहिए होती है। जिनकी नजर होती है उनको बीहड़ चुनौतियो के बीहड़ अंधकार में भी आशाओं के इंद्रधनुष दिखते हैं।
कल शाम जब लगभग सब कामगार घर जा चुके थे तब हमें लगा कि कुछ बेडरोल कम बने हैं। तब तक काम करते हुए हमको शान मोहम्मद दिख गए। हमने उसको कहा -'तुम जाओ बेड रोल की सिलाई कर दो।'
शान गया और देर रात साढ़े नौ तक उतना काम किया जितना दिन भर लोगों ने किया होगा। हमारा मन खुश हो गया। मन में एक इन्द्रधनुष और खिल गया।
कल देखा फव्वारा तो लगा फव्वारे की धार पानी की टँकी को हाथ जोड़कर आदर सहित प्रणाम कर रही है। पानी की टँकी से उतरा पानी ऊपर उठकर पानी की टँकी की ऊंचाई तक पहुंचता दिखा।
फव्वारे के पानी में सतरंगा इंद्रधनुष खिला है। हम सोचते हैं कि सारे रंगों टोंक दें -'दूर रहो यार तुम लोग। एकदम चिपके हुए हो - सत्ता से कारपोरेट की तरह। कोरोना से बचो।'
हमारे ऐसा सोचते ही इंद्रधनुष पानी में खिलखिलाकर हंस सा दिया। बोला -'हमको कोई कोरोना-'हम ऐसे ही मिलकर रहेंगे। हम साफ दिल के हैं। हमको कोई कोरोना का डर नहीं।'
इंद्रधनुष की बात सुनकर हमको अच्छा लगा। हमारे मन में भी एक ठो इंद्रधनुष खिल गया। आप भी देखिए आपके मन में भी खिल रहा होगा इंद्रधनुष। देखिये जी भरकर। का करेंगे बैठे-बैठे घर में।
देखिए , बताइए कैसा लगा। तब तक हम आते हैं फैक्ट्री में सच्ची का इंद्रधनुष देखकर।
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Saturday, April 04, 2020
आयुध निर्माणियां - जहां चुनौतियां भी दुम दबाकर आती हैं
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| कवर आल |
'घर में मन नहीं लग रहा !'
ये उद्गार लॉक डाउन के चलते घर में सीमित कर दिए गए किसी इंसान के नहीं है। यह कथन हमारी निर्माणी के एक अधिकारी के हैं जो अपने तमाम साथियों के साथ कोरोना से लड़ने के लिए यथासम्भव सहयोग देने की कोशिश में लगे हैं।
आज कोरोना की समस्या से पूरा विश्व जूझ रहा है। पूरे देश में हाल बेहाल हैं। अभी बाकी देशों के मुकाबले अपने यहां आफत कम दिखती है लेकिन देश की जनसंख्या के रहन-सहन और सुविधाओं के हिसाब से देखा जाए तो अगर बीमारी बढ़ी तो महामारी फैल जाएगी।
देश में कोरोना से बचाव के साधन बहुत सीमित हैं। मास्क नहीं हैं पर्याप्त, डॉक्टर के लिए कवरआल कम हैं, बेड शीट चद्दर की भी किल्लत हो सकती है। समस्या भयावह होने की स्थिति में वेंटिलेटर कम होंगे।
देश के तमाम संस्थान ऐसे में आगे आये हैं। हमारा संस्थान में उनमें से एक है।
हम फौज की जरूरतों के हिसाब से सामान बनाते हैं। इनमें ड्रेस से लेकर तोप, बंदूक, ट्रक, टैंक तक हजारों तरह के उत्पाद शामिल हैं। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई दूसरा संस्थान होगा तो इतनीं तरह की चीजें बनाता होगा।
कोरोना समस्या से निपटने में देश की आवश्यकताएं पूरा करने के लिए हमारा संस्थान भी अपनी पूरी क्षमता से जुटा हुआ है। जरूरत का जो सामान हम बनाते थे उसका उत्पादन बढ़ा दिया। जो नहीं बनाते थे उसके उत्पादन के लिए प्रयास शुरू हो गए।
इस काम में घण्टे, मिनट, दिन, रात सब गड्ड-मड्ड हो गए हैं। पता ही नहीं चलता कि दिन कौन है, तारीख क्या है। काम मगनमन हैं ऐसे कि कोई अचानक नाम भी पूछ लें तो अकबका जाएं कि हमारा नाम क्या है।काम के आगे कुछ सूझ न रहा।
हम लोग तमाम तरह के आइटम बना रहे। सैनिटाइजर कई फैक्ट्री बना रही। वेंटिलेटर , टेंट पर काम चल रहा। कम्बल तो बनाते ही हैं, जित्ते चाहिए बिन देंगे। चुनौती नए सामान बनाने की है। बन रहे हैं।
हम कपड़ा ग्रुप की निर्माणियां इस हल्ले में फीनिक्स की तरह फिर से उठ खड़े हुए हैं। आमतौर पर निम्न तकनीक की निर्माणियां मानी जाने वाली फैक्ट्रियों से सबसे बड़ी जरूरतें पूरी होनीं हैं। कवर आल और मास्क तथा दीगर सामान बन रहे हैं यहां।
हम लोग भी कई तरह के सामान बना रहे। कवर आल, मास्क, बेड रोल मुख्य हैं। निर्माणी बन्द है। कोई हाजिरी नहीं हो रही। लेकिन काम करने वाले अपने आप हाजिर हो रहे हैं। काम कर रहे हैं। अभी कम लोग आ रहे हैं। लेकिन जैसे ही सामान आ जायेगा सब आ जाएंगे घर से, जुट जाएंगे काम पर।
जो लोग काम में जुटे हैं उनको किसी के आदेश का इंतजार नहीं। खुद आदेश लेकर काम कर रहे हैं। लालफीताशाही जैसी भावना शायद कोरोना ग्रस्त होकर निर्वासन में चली गई है।
लाकडाउन के हालत के बावजूद लोग दिल्ली, ग्वालियर , कानपुर लोग ऐसे जा रहे हैं जैसे घर के बाहर सामान लेने निकले हों।
सवाल उठा -'दिल्ली की फर्म से सामान लेने कौन जाएगा ? ' जो दो हाथ उठे उनमें एक हाथ राधारमण शर्मा का था जो उसी दिन लेह से लौटे थे, उनके साथी अबुल हसन तो पहले से तैयार थे। ऐसे ही अनुराग यादव और ऋषि बाबू अपनी गाड़ी से ग्वालियर हो आये दो बार। फायर ब्रिगेड के विनोद और ए के श्रीवास्तव कानपुर से मशीनें उठा लाये। रजनीश मिश्र और नरेंद्र दिल्ली से रात बारह के बाद लौटे।
कहीं कोई अलसैट भी हुई तो उसकी भी ऐसी-तैसी हो रही। एक दिन सीम सीलिंग इक्विपमेंट आया। सीम सिली गई। लोग चले गए घर कि इसकी टेस्टिंग कल होगी। हमको सीम सिलाई की सूचना रात को मिली । हमने कहा -टेस्ट हुई ? जबाब मिला -'कल सुबह हो जायेगी।' हमने हल्की मायूसी से कहा -'क्या यार, आज करना था न।'
हमारे कहने की खबर लैब के लोगों तक पहुंच गई। लोग खुद ब खुद घर आये। लैब खुली। टेस्ट हुआ। सफल रहा। उसका वीडियो बना। सबको भेजकर सफलता के प्रति आश्वस्त होकर लौटे।
कुछ ही देर में लोग अपने इस मुकाबले में उन फैक्टियों का सक्रिय योगदान भी है जो सीधे उत्पादन में नहीं जुटी हैं । वे तकनीकी सहयोग दे रहीं हैं। कवर आल का कपड़ा टेस्ट करने की मशीन नहीं थी हमारे इधर। टेस्ट करने के लिए भेजने से पहले यह सोचा गया खुद टेस्ट कर कर लें। उसके लिए इक्विपमेंट कैसे बने ? जुट गई रात को ही ओएफसी की टीम।
बकौल ओएफसी के महाप्रबन्धक आदित्यानन्द श्रीवास्तव -' यार चेयरमैन साहब बोले टेस्टिंग मशीन बनाने को टी हम भिड़ गए अपनी टीम को लेकर। रात भर जुटे रहे। और सुबह कौवा बोलने के पहले मशीन तैयार हो गयी।'
अगले ही दिन दूसरी भी तैयार हो गयी। और पहुंच भी गई हमारे इधर। देखा देखी एस ए एफ ने भी बना ली एक और मशीन। करो कित्ते टेस्ट करने है।
हाल यह कि पूरा संस्थान एक साथ उठ खड़ा हुआ है। वो कहते हैं न - 'ले अंगड़ाई उठ हिले धरा, करके विराट स्वर में निनाद।' वैसे ही हाल हमारे संस्थान के हैं आजकल। कोई भी चुनौती आती भी है तो दुम दबाए हुए ही आती है। उसको पता है कि भागना ही है उसको तो पहले ही दुम दबाए रहो।
'विनाशाय च दुष्कृताम' हमारे संस्थान का ध्येयवाक्य हैं। हमने कोरोना के विनाश में सहयोग कर रहे हैं।
सीता की खोज में निकले हनुमान को अपनी ताकत पर शंका थी। जामवंत ने हनुमान को उनकी ताकत का एहसास कराया और वे लंका गए। हमारे यहां भी हाल यही हैं आजकल। हमारे यहां हर इंसान आजकल हनुमान और जामवंत का कम्बो पैक बना हुआ है। खुद हनुमान बना है, दूसरे के लिए जामवंत बना है। ऐसे में दुष्ट का विनाश कैसे नहीं होगा।
इस समय हम लोग अद्भुत उत्साह से गनगनाये हुए हैं। लगता है क्या न कर डालें। हर क्षण नया आइडिया बिना परमिशन लिए दिमाग में घुस जाता है। उस पर अमल भी हो जाता है। ऐसे ही कल हमारे साथियों ने डिस्पोजेबल बेड रोल बना के दिखाया। कीमत 50 /- एक चादर, एक तकिया कवर और दो नैपकिन।
हमने कहा -'गज्जब हो यार तुम लोग। रोज कोई न कोई नया आईटम लांच कर देते हो।'
'क्या करें सर , आजकल घर में मन ही नहीं लग रहा। हर समय कुछ न कुछ करने का आइडिया आता रहता है ' - साथी सुमित पटले का यह जबाब जब वीडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान जब अपने चेयरमैन हरिमोहन जी को बताया तो उन्होंने ताली बजाकर हम लोगों के जज्बे की तारीफ की। उनके चेहरे पर परिवार के उस मुखिया की खुशी थी जो अपने बच्चों को चुनौतियों से जूझते हुए और उनको परास्त करते हुये देखने पर होती है।
हमारे संगठन के मुखिया हरिमोहन जी Hari Mohan ji अपने साथी अधिकारियों के साथ लगातार नेतृत्व कर रहे हैं। अदम्य उत्साह के साथ रोज घण्टो वीडियो कांफ्रेंसिंग करते हुए हर काम की प्रगति का जायजा ले रहे हैं। दिन में कई बार क्लास लगती है सर की। हर तरह का सहयोग , सलाह, सुझाव, निर्देशन । अनेक सम्पर्क सूत्र बात ख़त्म होते हमारे मोबाइल में हाजिर हो जाते हैं। खुद अनथक मेहनत करते हुए हम लोगों को भी अपनी ऊर्जा का एहसास कराते रहते हैं।
ऐसे समय में जब तमाम तीसमार खाँ माने जाने वाले निजी संस्थान अपने अपने खोल में दुबक गए हैं हम सरकारी लोग काम कर रहे हैं। महीनों तक न सरकने वाली फाइलों पर फैसले व्हाट्सऐप पर हो रहे हैं। तमाम नियमों के बंधन ढीले हो गए हैं। लेखा विभाग के लोग 24 घण्टे उपलब्ध हैं।
काम से घिरे हुए हैं। काम में मजा आ रहा है।
हर समय दिल काम में ही लगा है। जा रहे हैं अब फिर काम पर। घर में मन नहीं लग रहा है। 
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10219326353403050
Thursday, April 02, 2020
कहीं टैक्स न लग जाये
हमारे एक दोस्त हैं। हर दम हंसते हैं। हर बात पर हंसते हैं। कुछ उनको जिंदादिल समझते हैं। बाकी कहते हैं –”बेवकूफ़ है।’ कुछ उसकी हंसी से जलते हैं। कुछ कहते हैं-’मेंटल है।’
एक दिन हमने दोस्त की हंसी का राज पूछा। यार तुम ऐसे कैसे हंस लेते हो? सुनकर दोस्त हंसने लगा। उसको हंसते देख हम भी हंस दिये। हम दोनों को हंसते देख साथ के लोग भी हंसने लगे।
हंसी बहुत संक्रामक होती है। एक से दस तक, दस से हजार-लाख तक इतनी तेज फ़ैलती है कि अफ़वाह भी क्या पहुंचेगी। हंसी-हंसी में हमारा सवाल कहीं उड़ गया।
कुछ दिन बाद हम फ़िर साथ थे। कोई बहस कर रहे थे। शायद बजट पर कोई बात हो रही थी। बजट होता ही बहस के लिये है। इससे अधिक आम आदमी बजट का क्या बिगाड़ सकता है। किसी ने बजट पर कुछ राय व्यक्त की। दोस्त हंस दिया। राय देने वाला चिढ गया । कहने लगा –’इसमें हंसने की क्या बात?’ दोस्त फ़िर से हंस दिया। रायचंद बमक गये।
असल में रायचंदजी अपने को बड़ा ज्ञानी समझते थे। जितने थे उससे डेढ गुना ज्यादा मानते थे। ज्ञानी व्यक्ति दुनिया पर हंसता है। दुनिया पर हंसने वाला ज्ञानी अक्सर अपने पर हंसी बर्दाश्त नहीं पाता। उनको लगा कि मेरा दोस्त हंसकर उनके ज्ञान की हंसी उड़ा रहा है। उनके ज्ञान की आग में मेरे मित्र की हंसी ने घी का काम किया। वे और तेज सुलग गये। सर्द मौसम सुहाना हो गया। ज्ञानी जी विदा हो गये।
ज्ञानी जी के विदा होने के बाद दोस्त से पूछा-’तुमने उनको खामखां नाराज कर दिया। उनकी बात पर क्यों हंसे। वे गलत तो नहीं थे।’
दोस्त मेरी बात पर भी हंसा। हमने बुरा नहीं माना। बुरा मानने का हक भी नहीं था। आज की दुनिया में बुरा मानने का हक केवल उसको है जिसके पास ताकत है। सामर्थ्य है। जिसके कल्ले में बूता है वही बुरा मान सकता है आजकल। दूसरे किसी को बुरा मानने का हक नहीं। कमजोर की कोई जान भी ले ले, कत्लेआम भी हो जाये, पूरा कुनबा, आबादी भूखों मर जाये लेकिन मजाल कि वह बुरा मान जाये। मानते ही किसी न किसी दफ़ा में अंदर हो जायेगा। इसने बुरा मानकर अपनी समाज विरोधी-सरकार विरोधी काम किया है। इसके बुरा मानने के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है।
बहरहाल हमने दोस्त की हंसी बर्दास्त की। फ़िर पूछा – ’तुम्हारी इस हरदम हंसी का राज का क्या है? तुम इस कदर कैसे हंसते रहते हो? हर बात हंसते रहते हो। कैसे हंस लेते हो? हमें तो डर लगता है कि कहीं पकड़कर अंदर न कर दिये जाओ। ऐसा हुआ तो हमारी हिम्मत तुम्हारी जमानत लेने की भी न होगी।’ हमने अपने सवाल में थोड़ा चिंता का छौंक भी लगा दिया।
हमारे सवाल में चिंता के तड़के ने दोस्त को भावुक कर दिया। वह हंसते हुये बोला। हंसना मेरी आदत है। इसीलिये हंसता रहता हूं। तुम भी हंसा करो। हंसी अभी टैक्स फ़्री है। जियो के सिम की तरह। जब टैक्स पर नहीं हंसी पर तब तक हंस लो। पता नहीं कब हंसी पर टैक्स लग जाये। फ़िर हमारे लिये हंसना भी मुहाल हो जाये। पता लगा सारी तन्ख्वाह हंसी पर टैक्स देते ही गुजर गयी। खाने के लिये कुछ बचा ही नहीं।
हंसी पर टैक्स की बात सुनकर हमें भी खूब हंसी आई। हमारा दोस्त बोला-’ अभी तुमको मेरी बात मजाक लग रही है। जब हंसी पर टैक्स लगेगा तब अफ़सोस करोगे कि पहले हंस लेते तो टैक्स बचता।’
हम हंसी पर टैक्स लगने के बाद दिनों की कल्पनाओं में हंसते हुये गोते लगाने। जब कभी बजट में हंसी पर टैक्स लगेगा तब टैक्स के पक्ष और विपक्ष वालों की कुछ प्रतिक्रियायें शायद इस तरह हों।
पक्ष : हमने देखा है हंसने का काम अमीर लोग, पैसे वाले ही करते हैं। बड़े-बड़े पैसे वाले, कारपोरेट, धनबली जनता की हालत पर बहुत हंसते हैं। हम उनकी इसी हंसी पर टैक्स वसूल कर जनता की भलाई के काम करेंगे। इसीलिये हमने हंसी पर टैक्स लगाने की सोची है। हंसी पर टैक्स से होने वाली आमदनी से गरीबों के लिये कल्याणकारी योजनाओं के लिये आमदनी होगी। इससे गरीबों को फ़ायदा होगा।
विपक्ष: लेकिन हंसी तो इंसान का प्राकृतिक गुण है। आप किसी इंसान की हंसी पर टैक्स कैसे लगा सकते हैं। गरीब इंसान भी अगर हंसना चाहे तो आप उस पर भी टैक्स लगाओगे? अजीब तर्क है।
पक्ष: आप किस जमाने की बात कर रहे हैं जनाब। हवा, पानी भी कभी प्राकृतिक हुआ करते थे। आज पानी का अरबों-खरबों का कारोबार है। हवा का भी कारोबार बढ रहा है। हंसी भी अब कहां प्राकृतिक रही। दुनिया भर में नकली हंसी का चलन बढ रहा है। इसलिये इस मामले में जितना जल्दी हम कानून बना लें उतना अच्छा। इस टैक्स से इतना भला होगा गरीबों का वे हमेशा गरीब रहना ही पसंद करेंगे। अमीर लोग इतना हलकान हो जायेंगे हंसी पर टैक्स से कि वे खुद गरीबी की रेखा के नीचे आने आने के अप्लीकेशन भरेंगे। सिफ़ारिश लगवायेंगे लोगों से गरीबी का प्रमाणपत्र पाने के लिये। सारे अमीर लोग अगले बजट तक गरीब हो जायेंगे। पूरे देश में सिर्फ़ गरीब ही गरीब होंगे। हम दावे से कह सकेंगे –’हमारी सरकार गरीबों की सरकार है।’ रही गरीब इंसान के हंसने की बात तो उनके लिये उनकी हैसियत के हिसाब से उनकी हंसी पर टैक्स की छूट दी जायेगी। होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस पर मनचाहा हंसना अलाउड होगा। इससे ज्यादा उनको हंसने की फ़ुरसत ही कहां होगी?
विपक्ष: जब सारे लोग गरीब हो जायेंगे तो चुनाव के लिये चन्दा कौन देगा? सरकारें कैसे बनेंगी। देश कैसे चलेगा?
पक्ष: चुनाव के चन्दे के लिये सरकार व्यवस्था रखेगी। जैसे लोकतंत्र में सब लोग बराबर होते हैं लेकिन कुछ लोग ज्यादा बराबर होते हैं वैसे ही जब सब लोग गरीब हो जायेंगे तो कुछ लोग इस सुविधा का लाभ उठाकर ज्यादा गरीब हो जायेंगे। हम कुछ गरीब लोगों को चिन्हित करके उनसे चन्दा लेकर चुनाव लड़ेंगे। सरकार बनायेंगे। देश चलायेंगे। आप भी ऐसे ही करियेगा। आप जीत जायेंगे तो आप चलाइयेगा सरकार और देश।
विपक्ष: लेकिन ऐसा करना क्या कारपोरेट और धन्नासेठों के साथ विश्वासघात करना नहीं होगा जिनके चन्दे से चुनाव लड़कर आपने सरकार बनाई? आप ऐसा करेंगे तो फ़िर हम लोगों को चुनाव लड़ने के लिये चन्दा कौन देगा? आप अपने साथ-साथ हमारी लुटिया भी डुबाओगे।
पक्ष: अरे हम जो भी करेंगे अपने चंदा देने वालों से पूछकर ही करेंगे। उनकी सहमति और अनुमति के बिना हम कोई कानून नहीं बनाते। सच कहा जाये तो हम उनके इशारे पर ही काम करते हैं। वे न चाहें तो हम दो मिनट में पैदल हो जायें। यह योजना भी उनके ही कहने पर लाई जा रही है।
एक बार हंसी पर टैक्स की चर्चा शुरु हुई फ़िर तो न जाने कितने पतंगे उड़ने लगी प्रतिक्रियाओं के आसमान में।
सबसे पहली बहस इस बात पर हुई कि हंसी पर जीएसटी लगेगा कि नहीं? लगेगा तो कित्ता? दोस्त का मानना था कि कलेक्शन बढाने के लिये हंसी के टैक्स पर जीएसटी शून्य होना चाहिये।
दूसरा बोला-’हंसी कोई सैनिटरी नेपकिन है क्या जो इस पर जीएसटी जीरो हो?’
दोस्त बोला-’ तब क्या ? हंसी इंसान के लिये सैनिटरी नैपकिन ही तो है। मन की सारी गंदगी निकालकर बाहर करती है हंसी।’
सैनिटरी नैपकिन वाली बात से एक सुझाव आया- ’महीने में कम से कम तीन दिन हंसी टैक्स फ़्री होनी चाहिये। इससे लैंगिक समानता को बढावा मिलेगा। ’
महीने में तीन दिन टैक्स फ़्री का प्रस्ताव पारित ही होने वाला था कि किसी ने याद दिलाया कि अबे अब तो टैक्स का मतलब ही जीएसटी है। इसलिये हंसी पर जो टैक्स लगेगा वह खुद हंसी पर जीएसटी होगी। अब जीएसटी पर जीएसटी थोड़ी लगेगा। कोई छूट नहीं मिलेगी हंसी के टैक्स पर।
हंसी के टैक्स पर छूट न मिलने से हम दुखी हो गये। दुखी होने के बाद हम सब एक हो गये। सब मिलकर कल्पना करने लगे कि हंसी पर टैक्स लगने के बाद के सीन क्या हो सकते हैं।
बच्चा के पैदा होते ही उसकी हंसी का रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। स्कूल जाने तक उसकी हंसी टैक्स फ़्री होगी। स्कूल में ट्यूशन फ़ीस के साथ उसकी हंसने की फ़ीस भी जुड़ेगी। हरेक के मुंह में हंसी का काउंटर लगा होगा। दिन में कुछ बार हंसना टैक्स फ़्री होगा। उसके बाद हंसने पर टैक्स का मीटर चालू होगा। चुनाव में लोग बिजली, पानी मुफ़्त देने की घोषणा की तर्ज पर हंसी पर टैक्स में छूट की घोषणा करेंगे-’हमारी सरकार आने पर हम महीने में सौ बार मुफ़्त हंसने की सुविधा देंगे।’
सरकारी कर्मचारियों के हंसने के लिये अलग नियमावलियां होंगी। पद के अनुसार हंसने का कोटा निर्धारित होगा।
ठहाके का अधिकार केवल वरिष्ठ अधिकारियों के पास सुरक्षित होगा। दफ़्तर में हंसने के लिये पहले से प्रस्ताव पास कराना होगा। बिना अनुमति हंसने पर सजा का प्रावधान होगा। कारण बताओ नोटिस जारी होगा।
सेवापंजिका में प्रतिकूल प्रवृष्टि होगी। लगातार हंसते रहने वाले को जबरियन रिटायर कर दिया जायेगा। कामकाज में हंसी बर्दाश्त नहीं होगी।
अलग-अलग तरह की हंसी पर अलग-अलग टैक्स होंगे। हंसने पर अलग, खिलखिलाने पर अलग। कंटीली, नखरीली, सजीली हंसी का टैक्स स्लैब एक होगा। बच्चे और बुजुर्गों को हंसी में टैक्स पर छूट होगी। पोपले मुंह वाले लोगों की हंसी पर छूट होगी। स्व्च्छता अभियान को बढावा देने के लिये साफ़ दांत वाले लोगों को टैक्स पर डिस्काउंट मिलेगा। ठहाके पर सबसे ज्यादा टैक्स होगा। टैक्स केवल हंसी पर लगेगा। मुस्कान टैक्स फ़्री होगी।
पोपले मुंह पर टैक्स में छूट पाने के लिये तमाम नौजवान लोग अपने दांत तुड़वा लेंगे। मुस्कान टैक्स फ़्री होने की सुविधा का लाभ उठाने के लिये लोग अपने हर हंसी को मुस्कान बतायेंगे। बाजार में हंसी और मुस्कान के विशेषज्ञ बढ जायेंगे। अदालतों में अपने क्लाइंट की हंसी को मुस्कान बताकर अरबों का टैक्स बचायेंगे। सरकार को चूना लगायेंगे।
हंसी पर टैक्स लगने पर टैक्स चोरी भी होगी। लोग टैक्स बचाने के लिये सबके सामने भले न हंसे लेकिन जहां मौका मिला , अकेले में हंस लेंगे। टैक्स बचा लेंगे। ऐसी टैक्स चोरी को बचाने के लिये जगह-जगह सीसीटीवी लगाये जायेंगे। लोगों के घरों तक में सीसीटीवी लगने के प्रस्ताव पास आयेंगे। लोग निजता के अधिकार के हनन की बात कहते हुये अदालत जायेंगे। टैक्स लगाने वालों की दलील होगी-’ हम निजता देखें कि टैक्स कलेक्शन। इनके भले के लिये ही तो यह इस्कीम चलाई गयी है। इसमें इनका ही भला है। हंसने पर कोई रोक नहीं लेकिन टैक्स तो देना पड़ेगा हंसी पर।’
अदालत मुस्कराते हुये टैक्स लगाने वालों की समझ पर तरस खायेगी। घरों में सीसीटीवी को निजता का हनन बतायेगी।
टैक्स लगाने वाले अदालत को मुस्कराता हुआ देखकर डबल मुस्करायेंगे। घरों में सीसीटीवी के प्रस्ताव को वापस लेकर हंसी पर टैक्स का दायरा मुस्कान तक बढायेंगे। जितना नुकसान हुआ उससे दुगुना कमायेंगे।
दोस्त के साथ बात करते हुये हंसी पर टैक्स लगने के बाद की न जाने कितनी कल्पनायें हंसते हुये कर डालीं। हमको हंसता देखकर दोस्त ने कहा- ’न जाने कब यह सच साबित हो जाये। हंसी पर टैक्स लग जाये। इसीलिये मैं हंसता रहता हूं। तुम भी हंस लो।’
दोस्त की खामख्याली पर मुझे बड़ी जोर की हंसी आई। हमको हंसते देख दोस्त भी हंसने लगा। हमारे साथ खड़े लोग हमको बेमतलब हंसते देख हंसने लगे।
आपको भी हमारी बात पर हंसी आ रही होगी। हंस लीजिए। अभी हंसने पर कोई खतरा नहीं है। अभी हंसी टैक्स फ़्री है।
(कादम्बिनी के अप्रैल अंक में प्रकाशित)
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Thursday, March 26, 2020
मुसीबत का मुकाबला डटकर करो
कमरे में खिड़की खोलते ही अनगिनत किरणें बिना मास्क खिलखिलाते हुए बिस्तर, कुर्सी, फर्श पर पसर गयीं। हम उनको दूरी बनाकर रहने को कहते हैं कि भाई दूरी बनाकर रखो। कोरोना से डरो। वे और पास आकर चमकने लगती हैं।
हम सूरज भाई से कहते हैं अरे भाई समझाओ अपनी इन बच्चियों को। कोरोना से बचकर रहना है। दूरी बनाकर रहना है।
सूरज भाई हंसते हुए कहते हैं -'कोरोना इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये जन्मजन्मांतर ऐसे ही खिलखिलाते रहेंगी। कोरोना इनसे बचने के लिए देश-देश मारा-मारा घूम रहा है। इनकी संगत में रहो तुम भी बचे रहोगे।'
हम क्या बोलें सूरज भाई ऊपर आसमान में चमकते हुए ड्यूटी बजा रहे हैं। पूरे आसमान में छाए हुए हैं । उनके यहां न लाकडाउन न वर्क फ्रॉम होम। जलवा है सूरज भाई का। हो भी क्यों न ! लाखों-करोड़ों डिग्री टेम्परेचर रखते हैं सूरज भाई। पूरी धरती उनके सामने ऐसी जैसे स्विमिंग पूल में कोई कम्पट। उनके लिए क्या कोरोना, क्या फोरोना।
हम सूरज भाई के साथ सेल्फी लेने की सोचे कि जलवेदार हस्ती के साथ फोटो खिंचा कर अपलोड कर दें। डरेगा कोरोना। लेकिन सूरज भाई ने टोंक दिया कि ऐसे भूत बनके सेल्फी न लो। जरा नहा-धोकर राजा बाबू बनकर आओ तब फोटो खिंचवाओ। उजड़े-उखड़े मुंह फोटो खिंचायोगे तो लोग समझेंगे कि कोरोना के डर से कवि हो गए हो।
हम बोले ठीक। आते अभी नहाकर। सूरज भाई बोले -'हम भी आते जरा रोशनी, गर्मी और उजाले की सप्लाई देखकर।'
ऊपर उठते हुए सूरज भाई कह रहे थे -'चिंता न करो। मुसीबत का मुकाबला डटकर करो। सफाई से रहो, दूरी बनाओ। मस्त रहो। दम बनी रहे, घर चूता है तो चूने दो।'
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Wednesday, March 18, 2020
हम युद्द और शांति में देश की रक्षा तैयारियों में सहयोग कर रहे हैं- Hari Mohan
देश के रक्षा उत्पादन में आर्डनेन्स फैक्टरियों की अहम भूमिका रही है | आर्डनेन्स फैक्टरियों का 218 साल का गौरवशाली इतिहास रहा है भारत की सबसे पुरानी आर्डनेन्स फैक्टरी ’ गन एंड सेल फ़ैक्ट्री’ की स्थापना 1802 में काशीपुर, कोलकाता में की गई थी तब से देश की रक्षा जरूरतों के अनुसार अब तक 41 आर्डनेन्स फैक्टरियां स्थापित की जा चुकी है ।
18 मार्च 1801 में काशीपुर कोलकाता में गन एंड सेल पहली आर्डनेन्स फैक्टरी स्थापित की गई थी | इसीलिए प्रति वर्ष 18 मार्च को आयुध निर्माणी दिवस मनाया जाता है इसी संदर्भ में 15 मार्च 2020 को ओएफबोर्ड कोलकाता के अध्यक्ष एवं चेयरमैन श्री हरि मोहनजी के साथ श्रीरूद्रनाथ सान्याल संवाददाता इंडिया न्यूज़ ने साक्षात्कार लिया । साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर के वरिष्ठ हिंदी अनुवादक श्री प्रकाश चन्द्र ने किया। साक्षात्कार के मुख्य अंश यहां पेश हैं।
सवाल: श्री हरिमोहन जी किसी समय भारत में 39 आर्डनेन्स फैक्टरियां थीं अब 41 आर्डनेन्स फैक्टरियां हैं, आर्डनेन्स फैक्टरियों के इतने विस्तृत नेटवर्क का सार क्या है ?
जबाब: रक्षा उत्पादन में आर्डनेन्स फैक्टरियां देश में 1801 से विद्यमान हैं, 1801 में पहली आर्डनेन्स फैक्टरी गन एंड सेल कॉशीपुर कोलकाता में स्थापित हुई थी और 1947 तक 15 आर्डनेन्स फैक्टरियां थीं। आजादी बाद और कुछ उसके और बाद में स्थापित की गईं । इस प्रकार इस समय कुल 41 आर्डनेन्स फैक्टरियां हैं। इस समय आर्डनेन्स फैक्टरी आर्गेनाइजेशन देश की रक्षा की रीढ़ है। देश की पहली स्टील इकाई 1904 में एम0एस0एफ0 ईशापुर में स्थापित की गई। आज जो विस्तृत नेटवर्क रक्षा उत्पादन क्षेत्र में आपको दिखाई पड़ रहा है वह पूरे देश में फैला हुआ आर्डनेन्स फैक्टरियों का नेटवर्क है।
सवाल: आपके नियंत्रण में आर्डनेन्स फैक्टरियों में अभी हाल में क्या कुछ हाईलाईट् है ?
जबाब: परम्परागत रूप से आर्डनेन्स फैक्टरियां देश की रक्षा सेवा में एक संगठित सेटअप है। आर्डनेन्स फैक्टरियां देश की सुरक्षा की इंट्रीगेटेड रीढ़ हैं। इंट्रीगेटेड का अर्थ यह हुआ कि हम अपने विस्फोटक का निर्माण खुद कर रहे हैं। हम अपने हार्डवेयर का निर्माण खुद कर रहे हैं। अर्थात् अपने लिये विस्फोटक खुद बनाते हैं, स्टील खुद बनाते हैं। इस समय हम तोप आदि हथियारों के लिए खुद बना रहे हैं। जो भी हथियार हम बना रहे हैं उसकी पूरी मेटलर्जी हम ही तैयार करते हैं। तोप की बैरल्स का उत्पादन हम अपनी स्टील बनाने वाली यूनिट में कर रहे हैं। जब मैं इंट्रीगेशन शब्द का प्रयोग करता हूं तो उसका अर्थ यह है कि हमारे पास कई निर्माणियां हैं जो केमिकल्स एंड विस्फोटक की मेन्युफैक्चरिंग कर रही हैं।
हमारे पास सभी प्रकार के हार्डवेयर और एम्युनेसन निर्माणी की सुविधाएं हैं। हमारे पास सभी प्रकार के वीपेन और सभी प्रकार के रॉ-मैटेरियल बनाने की सुविधाएं हैं। हमें जो भी चाहिए होता है, ब्रास, स्टील, एल्मुनियम यह सब निर्माणियों में तैयार कर लेते हैं । हम अच्छी तरह से प्रोग्रेस कर रहे हैं, हम अच्छी तरीके से सेनाओं को युद्ध एवं शांति दोनों समय सपोर्ट करते हैं। ‘वार एंड पीस’ के कार्यक्रम में हमारी भूमिका रहती है। जब आप युद्ध का नाम लेते हैं, जब आप दुश्मन के साथ युद्ध लड़ रहे होते हैं तो आप अपने हथियारों से ही युद्ध लड़ते हैं, इसके लिए हम विभिन्न प्लेटफार्म पर ट्रेनिंग देते हैं।
युद्ध के लिए गोला-बारूद की जरूरत पड़ती है जिसकी हम आपूर्ति करते हैं। जो भी गोला-बारूद या जितनी मात्रा में हम बनाते हैं इसे आप अगले चालीस-पचास वर्षों तक प्रयोग नहीं कर सकते हैं। गोला-बारूद को केमिकल और एक्प्लोसिव से भरा जाता है, एक्प्लोसिव की अपनी सेल्फ लाइफ पांच या पन्द्रह साल तक की होती है। इसकी लाइफ सीमित होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि आप अधिक मात्रा में गोला-बारूद जमा करके युद्ध के समय प्रयोग नहीं कर सकते हैं। आपको जिस चीज की जरूरत है वह यह है कि जब युद्ध हो तो आपको अपने मोर्चे पर इसका स्टॉक सैनिको के साथ रखना चाहिए। आपको यह स्टॉक मध्य क्षेत्र में भी रखने चाहिए और जब युद्ध छिड़ जाए तो सैनिक इसका उपयोग करेंगे। यही वह क्षमता है जो आर्डनेन्स फैक्टरियों के पास उपलब्ध है। जब कहीं युद्ध होता है तो हम इन स्टॉक्स का प्रयोग करने में समर्थ होंगे और यहां तक कि हमारे पास ऐसी क्षमता और इन्फ्रास्ट्रक्चर है कि हम सेना को सीधे मोर्चे पर एम्युनिसन पहुंचाने में सक्षम हैं।
सवाल: मि0 हरिमोहन युद्ध के समय में रक्षा उत्पादन में ऐसा सेटअप तैयार करने में आप अवश्य एक्सपर्टाईज रहे हैं ?
जबाब: जब आप युद्ध के समय विषम परिस्थितियों में युद्ध कर रहे होते हैं तो उस समय आपकी राजनीतिक स्थिति का व्ययवहार भिन्न हो सकता है जिसके बारे में आप पहले से नहीं सोच सकते अधिकतर स्थितियों में अधिकतर चीजों के लिए, विशेषकर उपभोक्ता वस्तुओं के लिए आपको आत्मनिर्भर होना चाहिए।
हमारे देश के योजनाकार और दृष्टाओं ने काफी सोच-विचार किया है और उन्होंने पर्याप्त क्षमताओं की योजना बनाई है ताकि देश युद्ध के समय जवाब देने में सक्षम हो सके। यहां तक कि हमारे पास कई एम्युनिशन फैक्टरियां हैं। एक ही एम्युनिशन के लिए हमारे पास दो फैक्टरियां हैं। एक फैक्टरी अलग जगह स्थित है और दूसरी फैक्टरी दूसरी जगह स्थिति है। मान लीजिए यदि एक फैक्टरी पर बम गिरा दिया जाता है या किसी कारणवश बन्द हो जाती है ऐसी स्थिति में हमारी दूसरी फैक्टरी हमें सपोर्ट करेगी। हम आपके साथ यह भी जानकारी साझा करना चाहते हैं कि हमने इतना अर्जित ज्ञान, तकनीक, नवाचार, इन्फ्रास्ट्रक्चर संचित कर रखा है कि 97 प्रतिशत एम्युनिशन जो हम बना रहे हैं वह पूरी तरह स्वदेशी है। कुछ ऐसे एम्युनिशन हैं जिनको हमने अभी विकसित किया है या हाल ही में उनकी तकनीक का अधिग्रहण किया है। यह संभावित आयात पर निर्भर हैं अन्यथा हम एम्युनिशन के संदर्भ में आर्डनेन्स फैक्टरी के नाम के प्रोडक्ट में स्वतः पर्याप्त हैं।
हम आपको यह भी बताना चाहते हैं कि इस देश द्वारा लड़े गए सभी युद्धों में आर्डनेन्स फैक्टरियां सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हमेशा खड़ी रही हैं।
कारगिल युद्ध के समय हमारी फैक्टरियों ने 24 घंटे काम किया है। कर्मचारी घर नहीं जाते थे, उन्हें फैक्टरी के अंदर ही खाने-पीने की वस्तुएं उपलब्ध कराई जाती थी और उन्होंने लगातार काम किया और उस समय जो एम्युनिशन का उत्पादन किया जाता था वह सीधे युद्ध के मोर्चे पर भेजा जाता था। यह स्थिति थी, यही कारण था कि हमारे जनरल मलिक, जो उस समय चीफ आफ आर्मी स्टाफ थे, ने कारगिल के समय सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि कुछ कंपनियां जिन्हें आर्डर दिए गए थे वह सप्लाई नहीं दे सकीं जबकि आर्डनेन्स फैक्टरियों ने सेना को पूरी तरह से सपोर्ट किया।
सवाल: जब हम हाईलाईट के बारे में बात करते हैं तो हम स्वदेशी डिफेंस हाडवेयर पर अथवा न्यू 100 प्रतिशत डिफेंस हार्डवेयर मेन्युफेक्चरिंग पर फोकस करते हैं, यही समय था जब आप पूरी तरीके से डीआरडीओ पर रिसर्च कार्य के लिए निर्भर थे। अब आर्डनेन्स फैक्टरियों के कारण मैं समझता हूं कि सभी 41 आर्डनेन्स फैक्टरियों के पास अपने स्वयं रिसर्च यूनिट हैं। अतः इसके बारे में बताइए ?
जबाब: 20 साल पहले तक हम विशुद्ध रूप से उत्पादन करने वाले संस्थान थे। हमारे पास केवल उत्पादन में विशेष योग्यता थी उस समय हम टेक्नालॉजी, डिजाईन, गाइडेंस या तो डीआरडीओ से लेते थे या विदेशी निर्माताओं से लेते थे। लेकिन हमने अनुभव किया कि यदि हमारे पास अपनी डिजाईन नहीं है, क्षमता नहीं है, यदि हम अपना खुद का तकनीकी विकास नहीं करते हैं तो हम आगे नहीं बढ़ सकते हम आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन संगठन नहीं बन सकते। वर्ष 2006 के दौरान हमने सरकार के साथ विचार-विमर्श करके एक निर्णय लिया कि हम अपना रिसर्च एंड डेवलपमेंट भी स्वयं करेंगे और हमने प्रोडक्ट डेवलपमेंट शुरू कर दिया है। हमने प्रोडक्ट्स को अपग्रेड करना शुरू कर दिया है और इसका परिणाम यह हुआ है कि हम मात्र मेन्युफेक्चरिंग संगठन से एक आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन संगठन बन गए हैं। अब हमारे पास अपनी खुद की डिजाइनिंग क्षमता है और तकनीकी नवाचार की क्षमता है।
आपके साथ जानकारी साझा करते हुए मैं खुश हूं कि वर्ष 2006 से 2020 के इन 14 वर्षों में जो भी उत्पादन हम कर रहे हैं उसका 25 प्रतिशत टर्नओवर स्वदेशी विकसित उत्पाद हैं और हमारा काम जारी है। हम कई क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। जल्दी ही हमारे नए से नए उत्पाद सामने आएंगे।
सवाल: मि0 हरि मोहन कृपया मुझे यह बताइए कि आप मेक इन इंडिया अभियान में डीआरडीओ के साथ कैसे कोआर्डिनेट कर रहे हैं ?
जबाब: वास्तव में आपके साथ खुलकर बात करना चाहूंगा कि आप 7 साल पीछे देखें तो हमारे पास इंडियन आर्मी, नेवी, एयरफोर्स का काफी वर्कलोड था और कभी ऐसा भी था आप जानते हैं कि हम डीआरडीओ को प्रोटोटाइप डेवलप करने में कोई रिस्पांस नहीं दे रहे थे। लेकिन दो साल पहले हमने एक निर्णय लिया कि हम पूरी तरीके से डीआरडीओ के साथ कोआपरेट करेंगे। डीआरडीओ जो भी प्रोडक्ट हमारे डोमेन में डेवलप करना चाहता है उन प्रोडक्ट्स के प्रोटोटाइप (नमूने) को हम पूरी तरीके से सपोर्ट करेंगे। हम इस सीमा तक जा रहे हैं कि जो भी नमूने डीआरडीओ बनाना चाहता है हम उसे अपनी लागत पर बनवाएंगे, इस प्रकार डीआडीओ प्रोडक्ट की लागत नीचे आएगी। होता यह है कि जो भी प्रोडक्ट वह डिजाइन करते हैं उसकी एक अलग प्रकार की क्षमता होती है लेकिन जो ज्यादा मात्रा में उत्पादन करना होता है उसकी एक अलग प्रकार की क्षमता होती है।
हां, होता क्या है कि एक पीस या दो पीस, पांच पीस प्रयोगशाला में बनाना बहुत सरल है लेकिन जब आपको एक ही पीस के हजार या लाख बनाने हों तो तकनीक पूरी तरीके से अलग होती है, तरीका भी पूरी तरीके से अलग होता है। जब आप किसी वस्तु की थोक में मेन्युफेक्चरिंग करना चाहते हैं तो उसकी तकनीक पूरी तरीके से अलग होती है। बल्क मेन्युफेक्चरिंग कम से कम लागत में होती है। देखिए एक पीस, दो पीस आप किसी भी लागत में बना सकते हैं लेकिन जब आपको हजार या लाख पीस बनाने होते हैं तो पूरी तकनीकी प्रक्रिया को आप्टिमाइज करना होता है। यह वह क्षेत्र है जिसमें हमें विशेष योग्यता है।
अतः हो यह रहा है कि आर्डनेन्स फैक्टरियों के इंजीनियर्स और डीआरडीओ के साइंटिस्ट्स प्रोडक्ट बनाने के लिए अब एक साथ मिलकर रिसर्च वर्क कर रहे हैं। उदाहरण के लिए हमने डीआडीओ के साथ संयुक्त रिसर्च करके आर्मामेंट डेवलपमेंट रिसर्च इस्टेब्लिसमेंट लैब पुणे और हमारी स्माल आर्म्स फैक्टरी कानपुर ने 5.56 एमएम x 30 जेबीपीसी कार्बाइन विकसित की है इसको विकसित करने में लगभग 7 से 8 वर्ष लगे हैं। यह युद्ध क्षेत्र का वीपेन है जोकि हमारे सामने है। इन दोनों यूनिट के साइंटिस्ट्स और प्रोडकशन इंजीनियर्स ने एक साथ मिलकर काम किया है और इस वीपेन का निर्माण किया है।
यह हथियार अद्वितीय है और अद्वितीय केलिबर का है। यह केलिबर हथियार अपने प्रकार अद्वितीय हथियार है। वीआईपी सुरक्षा एवं शार्ट रेंज बैटल के लिए यह सर्वश्रेष्ठ हथियार है। इसका प्रयोग छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा नक्सलवादियों से मुकाबला करने के लिए बहुत ही कारगर तरीके से किया जा रहा है। सीआरपीएफ भी इस हथियार का प्रयोग कर रही है। बीएसएफ ने भी इस वीपेन को लेने के लिए इच्छा जाहिर की है। अन्य कई पुलिस फोर्सेज भी इसे लेने की इच्छुक हैं। यह हथियार हमारा स्वयं विकसित किया हथियार है यह शत-प्रतिशत स्वदेशी डिजाईन से तैयार किया हथियार है।
सवाल: कुछ तात्कालिक प्राथमिकताएं क्या हैं ?
जबाब: हम आपको कुछ और विस्तार से बताते हैं। हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री ने देश से एक आह्वान किया है कि हमारे देश का 70 प्रतिशत रक्षा उपकरण जो हम प्रयोग कर रहे हैं उनको आयात किया जा रहा है। जहां तक डिफेंस इक्योजिशन की बात है यह लगभग 60 से 70 प्रतिशत इम्पोर्टेड है। कतिपय वस्तुएं ऐसी हैं जिनका हम देश में निर्माण कर रहे हैं। इनमें काफी संख्या में इम्पोर्टेड कंटेन्ट्स हैं, जैसे एयरक्राफ्ट जिसका निर्माण एचएएल में किया जा रहा है इसमें भी काफी इम्पोर्टेट कंटेन्ट्स हैं। कई तरीके के इलेक्ट्रानिक डिफेंस सिस्टम जिनको हम बना रहे हैं उनमें भी इम्पोर्टेड कंटेन्ट्स हैं। इस तरह कुल इम्पोटेड कंटेन्ट लगभग 60 से 70 प्रतिशत है।
अब हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने आह्वान किया है कि हमें डिफेंस हार्डवेयर और इक्यूपमेंट्स इम्पोर्ट करना बंद कर देना चाहिए। आइए देश में टेक्नालॉजी लाएं और देश में ही उत्पादन करें और इस दिशा में काफी काम हो रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ है कि काफी संख्या में प्राइवेट इंडस्ट्रीज डिफेंस बिजनेस में रूचि दिखा रही हैं।
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Monday, March 16, 2020
ब्लॉगरों के अधूरे सपनों की कसक -एक अनूठी किताब
कल ' ब्लॉगरों के अधूरे सपनों की कसक' किताब मिली। सक्रिय ब्लॉगर रहीं रेखा श्रीवास्तव जी ने 2012 से ब्लॉगरों के अधूरे रह गए सपनों का रजिस्टर खोला था। दोस्तों के अधूरे रह गए सपनों को लिखने को कहा था। कुछ न लिखा, कुछ ने नहीं लिखा। आठ साल में कुल जमा 50 साथियों के अधूरे सपनों की दास्तान इकट्ठा करके किताब की शक्ल दी।
सामान्य समझा जाने वाला यह काम बड़ा झंझटी काम है। कभी लोग समझते हैं, कभी नहीं समझते। कोई लिखता है , कोई नहीं। रेखा जी की सफलता ही कही जाएगी कि उन्होंने कभी सक्रिय रहे ब्लॉगरों से उनके अधूरे सपने लिखवा लिए। इनमें से ज्यादातर सपने महिला ब्लॉगरों के हैं। इससे क्या यह समझा जाये कि स्त्रियां अपनी बातें स्त्रियों से साझा करने में ज्यादा सहज होती हैं ? 
2012 में शुरू किया काम किताब रूप में 2020 में आना रेखा जी के सतत प्रयासों की कहानी ही है। इसमें उनको वंदना गुप्ता जी की हौसला अफजाई का भी सहयोग मिला।
आईआईटी कानपुर में मशीन अनुवाद परियोजना में 24 वर्ष रिसर्च एसोसिएट के पद पर कार्य कर चुकी रेखा जी ब्लागिंग और अन्य मंचो पर अनेक सम्मान मिल चुके हैं । उनकी गज्जब की सक्रियता देखकर ताज्जुब होता है।
किताब की भूमिका कई नामचीन ब्लॉगर्स ने लिखी है। मुझे भी कई बार कहा रेखा जी ने लेकिन तमाम जरूरी/ग़ैरजरुरी कामों में उलझा होने के कारण मुझे याद ही नहीं रह पाया कि लिखना क्या है? जब भी रेखा जी तकादा करतीं , मैं लिखने का वायदा करता। तकादे और वायदे की जुगलबंदी इतनी लम्बी खिंची की रेखा जी बोर हो गई और उन्होंने किताब छपवाने भेज दी।
जिन लोगों ने लिखा है किताब के बारे में वे हिंदी ब्लागिंग के नामचीन साथी रहे हैं। इसलिए मेरे न लिखने किताब का कुछ नहीं बिगड़ा , अलबत्ता लिखता तो मेरा नाम भी होता भूमिका लेखकों में।
साथी ब्लॉगरों के अधूरे सपनों के किस्से पढ़ना रोचक है। कोई डॉक्टर बनना चाहता था, कोई थिएयर आर्टिस्ट। कोई सिर्फ महिला होने को जीना चाहता है तो कोई पुस्तकालय खोलना चाहता था। किसी की आत्मा नृत्य से जुड़ी है तो किसी का सपना पत्रकारिता का रहा। कुछ दोस्तों के सपने चोरी भी हो गए जिनकी रपट उन्होंने पहली बार इस किताब के बहाने रेखा जी के थाने में लिखवाई। बहुत रोचक है साथियों के कसक भरे सपनों की कहानी पढ़ना।
किताब उत्कर्ष प्रकाशन दिल्ली से छपी है। शायद नेट पर भी हो। मैं खरीदने की सोचता तब तक मुझे रेखा जी ने किताब लेखकीय प्रति के तौर पर मुफ्त में भेजी है। इसके लिए उनका आभार। 148 पेज की किताब के दाम 250 रुपये हैं। इसमें रेखा जी के पैसे कितने लगे यह मुझे नहीं पता लेकिन काम उन्होंने नायाब किया है इसके लिए रेखा जी को
बधाई
। हिंदी ब्लॉगिंग पर शोध कार्य करने वाले लोगों के लिए यह किताब काफी काम आएगी। इस किताब के बाद रेखा जी अगर फेसबुक के साथियों के अधूरे सपनों की कसक का संकलन करेंगे तो उसकी भूमिका अवश्य समय पर लिख दूंगा।
किताब का नाम: ब्लॉगरों के अधूरे सपनों की कसक
सम्पादक : रेखा श्रीवास्तव
मुद्रक एवं प्रकाशक : उत्कर्ष प्रकाशन मेरठ/दिल्ली
प्रकाशक की वेबसाइट :utkarshprakashan.in
पृष्ठ संख्या: 148
किताब का मूल्य : 250
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10219115076441258
अधूरे सपने की कसक
(रेखा श्रीवास्तव जी की किताब 'ब्लॉगरों के अधूरे सपनों की कसक' बारे में आज पोस्ट । इस किताब में अपन की सपन-बयानी यहां पेश है)
हमको जब से अपने अधूरे सपने को बयान करने को कहा गया तब से हम खोज रहे हैं कि कोई सपना दिख जाये तो पकड़ के उसको बयान कर दें। लेकिन अभी तक कोई सपना मिला नहीं। परेशान हैं। लगता है हम सपना देखने वाले जमात के नहीं हैं। ऐसा कोई सपना नहीं याद आता जिसको पूरा करने की कसक मन में हो। इसलिये इस आयोजन में हमारी रिपोर्ट ’निल ’ मानी जाये।
वैसे सपने की जब भी बात चलती है तो मुझे रमानाथ अवस्थी जी की पंक्तियां याद आती हैं:
रात लगी कहने सो जाओ, देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का, रोना और तड़पना
इस परिभाषा के हिसाब से हमने सपने कभी नहीं देखे जो हमको रोते, तड़पाते हों। हम भरपूर नींद लेने वाले रहे हमेशा। अपनी क्षमता के हिसाब से हमें वह सब मिला जिसके हम हकदार हो सकते थे। समय, समाज हमारे प्रति बहुत मेहरबान रहा।
बचपन से आजतक कई चीजें समय-समय पर आकर्षित करती रहीं। वे या तो मिल गयीं या समय के साथ उनको पाने का आकर्षण खतम हो गया। हम वैसे भी बड़ा सपना देखने वाली पार्टी के आदमी नहीं हैं। अल्पसंतोषी हैं। शायद अपनी औकात जानते हैं इसलिये कसकन से बचने के लिये बड़ा सपना देखते ही नहीं। ऐसी सवारी को लिफ़्ट ही नहीं देते जो आगे चलकर कष्ट का कारण बने।
व्यक्तिगत जीवन में- नौकरी बजाते हुये अपने घर, परिवार, इष्ट-मित्रों से पूरी तरह संतुष्ट होने के चलते आराम से जिये जा रहे हैं। कोई ऐसी इच्छा नहीं जिसे पूरी करने के लिये मन में बेचैनी हो। कोई सपन कसकन नहीं। लेकिन कुछ इच्छायें जिनको पूरा करने का मन करता है।
जब से पढ़ना-लिखना सीखा तब से हमेशा यह इच्छा रही कि मैं दुनिया भर का उत्कृष्ट लेखन पढ़ सकूं। मुझे लगता है कि यह इच्छा हमेशा बनी रहेगी। लेकिन इसमें उतनी कसकन नहीं है। यह सिर्फ़ एक इच्छा है। जो कभी पूरी भी नहीं हो सकेगी बस यह है कि इसको आंशिक रूप से पूरा कर पायेंगे।
दूसरा, अपन का देश और दुनिया घूमने का मन है। देश भी अभी पूरा घूमा नहीं है। दुनिया तो शुरु ही नहीं की। लगता है यह इच्छा भी अधूरी ही रह जायेगी। लेकिन मन में एक बात यह भी है कि किसी दिन अचानक निकल पड़ेंगे और घूम डालेंगे दुनिया। पर ऐसा होता नहीं न जी।
कभी-कभी लगता कि हमें इस दुनिया ने बहुत कुछ दिया है। जितना मिला है और जितनी क्षमतायें हैं उसके हिसाब से यह महसूस होता है कि उसको वापस करने में कोताही बरती जा रही है। तमाम किस्तें बकाया हैं। कहीं से कोई नोटिस न आये इसका मतलब यह तो नहीं कि उधार चुक गया। लेकिन यहां भी कसकन वाला भाव नहीं। लगता है कि कोई हम अकेले डिफ़ाल्टर थोड़ी हैं। उधार भी चुकता हो जायेगा। कौन अभी कहीं भागे जा रहे हैं।
महीने भर से आपको अपने सपने बयान करने का काम उधार बाकी था। रोज सोचते थे कि आज करेंगें, कल करेंगे। आपके तकादे से यह सपन-उधार कसकने भी लगा था। लेकिन आज यह कसकन भी खतम हो गयी।
अक्टूबर, 2012 में लिखी पोस्ट
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10219119783998944
Friday, March 13, 2020
आलस्य
आलस्य
दुनिया का
सबसे खूबसूरत पहलू होता है।
दुनिया में बहुत
सी चीजें सुन्दर
होती हैं।
लेकिन सबसे
सुन्दर होता है
अलसाया हुआ सौंदर्य ।
मोनालिसा की फोटो पेंटिंग
सबसे खूबसूरत इसीलिये
दिखती है क्योंकि
वह सुन्दर है साथ में अलसायी हुई भी।
आलस्य के बिना दुनिया
अधूरी है
कत्तई खूबसूरत नहीं
हो सकती आलस्य रहित दुनिया।
-अनूप शुक्ल
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