Monday, September 21, 2020

परसाई के पंच-43

 


1. कुछ राष्ट्रों और व्यक्तियों का बचपन कभी नहीं जाता। बूढे आदमियों को भी मैंने कुत्ते की पूंछ में पटाखे की लड़ी बांधकर आग लगाते देखा है।
2. पुस्तक लिखनेवाले से पुस्तक बेचनेवाला बड़ा होता है। कथा लिखनेवाले से कथावाचक बड़ा होता है। सृष्टि निर्माता से सृष्टि लूटने वाला बड़ा होता है।
3. मैं कथा लिखता हूं और वह चौराहे पर कथावाचक बांचता है। वह कथा तुलसीदास ने लिखी थी। कथावाचक की थाली भर जाती है; ऊपर से भेंट मिलती है, सो अलग। मैं, एक कथा लेखक, सड़क पर खड़ा टुकुर-टुकुर देखा करता हूं।
4. पाठ्य्पुस्तक से कुंजी ज्यादा बिकती है।
5. मामूली देवता तो असंख्य थे, पर लक्ष्मी उन्हें कहां मिली? वह सीधे विष्णु के पास गयी और गले लग गयी। दूसरे देवताओं ने भी कोई ’प्रोटेस्ट’ नहीं किया। करते भी कैसे? विष्णु बहुत बड़े थे –शक्ति में, धन में, रूप में, चातुर्य में। स्त्री बनकर जिसने अपने दोस्त की शंकर को ठग लिया, उसकी चतुराई कोई कमी नहीं थी। लक्ष्मी सीधी ’मोनोपोली’ में जाकर मिल गयी।
6. मोनोपोली छोटे को पनपने नहीं देती। एक गरीब मुनि नारद को शादी के लिये सुन्दर चेहरे की जरूरत पड़ी थी, सो विष्णु ने उसे बन्दर का चेहरा दे दिया। फ़िर खुद जाकर स्वयंवर में बैठ गये और जिस लड़की पर उस बेचारे का जी आ गया था, उससे अपने गले में वरमाला डलवा ली। कहते हैं –नारद, वह तुम्हारा मोह था। और हुजूर आपका?
7. लक्ष्मी का सारा काम फ़ूहड़ है। सवारी से श्रंगार तक। तस्वीर में देखो –फ़ूल पर खड़ी हैं। अरे, फ़ूल जैसी खूबसूरत,कोमल चीज क्या खड़े होने के लिये है? सौन्दर्य-बोध बिल्कुल नहीं है लक्ष्मी में। उसे अगर सरस्वती की वीणा मिल जाये, तो उसके तार तोड़कर उनसे उल्लू को बांधने लगे। सम्पन्न फ़ूहड़ता की तरफ़ सुरुचि आखिर कैसे आकर्षित हो।
8. वे और होते हैं जिनके देवता जल्दी-जल्दी बदलते हैं। वे राम को भी प्रणाम कर लेते हैं और रावण को भी। वे दिन में हंस की चोंच सहलाते हैं और रात को उल्लू से गपशप करते हैं।
9. छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढाना चाहिये।
10. कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं; वे आदतन, प्रकृति के वसीभूत झूठ बोलते हैं। उनके मुख से निष्प्रयास, निष्प्रयोजन झूठ ही निकलता है।
11. भेद तो रात्रि के अन्धकार में ही मिटता है; दिन के उजाले में भेद स्पष्ट हो जाते हैं। निन्दा का ऐसा ही भेदनाशक अंधेरा होता है।

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अरविन्द कुमार जी से बातचीत

 अरविन्द कुमार जी मेडिकल फिजिक्स के प्रोफेसर , जाने-माने व्यंग्यकार और कथाकार तो पहले से ही हैं। इस बीच वे शानदार और सफल वार्ताकार के रूप में भी स्थापित हुए हैं। आज 21.09.2020 को अरविन्द कुमार जी ने बातचीत के लिए अपन को मौजूद रहने के लिए कहा है। तो हम तैयार हैं। आप भी आइये ऑनलाइन शाम को 8 बजे । क्लिक कीजिए नीचे दिया लिंक और सुनिए बातचीत अरविंद कुमार और अनूप शुक्ल की। बातचीत का लिंक यह रहा


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Sunday, September 20, 2020

परसाई के पंच-42

 

1. अन्धे में अजब काइयांपन आ जाता है। वह खरे और खोटे सिक्के को पहचान लेता है। पैसे सही गिन लेता है। उसमें टटोलने की क्षमता आ जाती है। वह पद टटोल लेता है, पुरस्कार टटोल लेता है, सम्मान के रास्ते टटोल लेता है। बैंक का चेक टटोल लेता है। आंख वाले जिन्हें नहीं देख पाते, उन्हें टटोल लेता है।
2. नये अन्धों के तीर्थ भी नये हैं। वे काशी, हरिद्वार, पुरी नहीं जाते। इस कांवड़ वाले अन्धे से पूछो – कहां ले चलें? वह कहेगा –तीर्थ ! कौन सा तीर्थ? जबाब देगा –केबिनेट ! मन्त्रिमण्डल ! उस कांवड़ वाले से पूछो, तो वह भी तीर्थ जाने को प्रस्तुत है। कौन सा तीर्थ चलेंगे आप ? जबाब मिलेगा – अकादमी, विश्वविद्यालय।
3. जब प्रतिवाद करने वाला नहीं हो तो जिसके पास उसके साहित्य के बारे में कहने को कुछ नहीं है, वह यह भी कह सकता है कि यह लेखक चोरी करता था। यही बात सबसे महत्वपूर्ण मानी जायेगी और अखबारों में इसी का शीर्षक बनेगा।
4. भारतीय साहित्य की वह उज्ज्वल परम्परा अभी जीवित है, जिसके अनुसार हर लेखक के बारे में कहा जाता है कि वह गरीब और भुखमरा था।
5. अगर सुअर मैला खाकर परम आनन्द अनुभव करता है तो मैं फ़ल खाने की सलाह देकर उसका मजा किरकिरा नहीं करना चाहता। दुख इतना ही है कि दिन भर मैले की तलाश में रहकर सुअर कोई रचनात्मक काम नहीं कर पाता। भगवान वाराह का अवतार कम से कम इतना लोकहित तो करता ही है कि मैदान में पड़े मल को उदरस्थ कर लेता है।
6. व्यंग्य रचनात्मक लेखन होता है, साहित्य होता है। बलात्कार, चोरी और अपहरण की रिपोर्टिंग नहीं होता।
7. निन्दा की मैं परवाह नहीं करता। मैं खुद लोगों की आलोचना तो करता हूं, पर निन्दा नहीं। दोनों में बहुत फ़र्क है। आलोचना स्वस्थ प्रवृत्ति है। निन्दा कैंसर है। निन्दक अपनी मौत मरता है। अकाल मृत्यु। यह उसके शरीर की नहीं उसकी आत्मा की , उसकी स्पिरिट की मृत्यु होती है।
8. यह शायद हमारे देश के दार्शनिक, सांस्कृतिक मूल्यों की विकृति है कि किसी को दीन बनाये बिना उसे महत्वपूर्ण नहीं माना जाता।
9. त्याग अच्छा गुण है। पर लादी हुई गरीबी पाप है।
10. ऐसा नहीं कि दु:ख हमेशा आदमी को ऊंचा उठाता है। दु:ख आदमी को नीच भी बनाता है।
11. कमजोरियां सबमें होती हैं। पर उन कमजोरियों की चर्चा कब करना और कैसे करना, यह विवेक की मांग करता है।

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परसाई के पंच-41

 1. जिसकी बात के एक से अधिक अर्थ निकलें वह सन्त नहीं होता, लुच्चा आदमी होता है। सन्त की बात सीधी और स्पष्ट होती है और उसका एक ही अर्थ निकलता है।

2. किराये के मकान ’कमर्शियल बेसिस’ (व्यावसायिक आधार) पर बनवाये जाते हैं। व्यावसायिक आधार का सूत्र है – कम लागत, घटिया माल, अधिक दाम।
3. मकान भी दो तरह के होते हैं, रहने के लिये और किराये पर देने के लिये। एक प्रकार के मकान से दूसरे प्रकार का काम नहीं लिया जाता। रहने का मकान किराये पर नहीं दिया जाता, और किराये के मकान में रहा नहीं जा सकता है।
4. आदमी बेमजा बात खुलकर करता है और बामजा को छिपकर। याने सुख शर्म की बात मानी जाती है।
5. हम सब गलत किताबों की पैदावार हैं। ये सवालों को मारने की किताबें थीं।
6. स्कूल प्रार्थना से शुरु होता था –’शरण में आये हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन!’ क्यों शरण में आये हैं, किसके डर से आये हैं –कुछ नहीं मालूम। शरण में आने की ट्रेनिंग अक्षरज्ञान से पहले हो जाती थी। हमने गलत किताबें पढीं और आंखों को उनमें जड़ दिया।
7. हमारी किताबों में पिता-स्वरूप लोग सवाल और शंका से ऊपर होते थे। शिष्य पक्षपाती गुरु को अंगूठा काटकर दे देता था और दोनों ’धन्य’ कहलाते थे।
8. हमें तो तीसरी कक्षा में ही उस भक्त की कथा पढा दी गयी थी , जो अपने पुत्र को आरे से चीरता है। कुछ लोगों के लिये आदमी और कद्दू में कोई फ़र्क नहीं। दोनों ही चीरे जा सकते हैं।
9. जीवन से कट जाने के कारण एक पीढी दृष्टिहीन हो जाती है, तब वह आगामी पीढी के ऊपर लद जाती है। अन्धी होते ही उसे तीर्थ सूझने लगते हैं। वह कहती है – हमें तीर्थ ले चलो। इस क्रियाशील जन्म का भोग हो चुका है। हमें आगामी जन्म के भोग के लिये पुण्य का एडवांस देना है।
10. आंख वाले की जवानी अन्धों को ढोने में गुजर जाती है। वह अन्धों के बताये रास्ते पर चलता है। उसका निर्णय और निर्वाचन का अधिकार चला जाता है। उसकी आंखे रास्ता नहीं खोजतीं, सिर्फ़ राह के कांटे बचाने के काम आती हैं।
11. कितनी कांवड़े हैं – राजनीति में, साहित्य में, कला में, धर्म में, शिक्षा में। अन्धे बैठे हैं और आंख वाले उन्हें ढो रहे हैं।

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Saturday, September 19, 2020

परसाई के पंच-40

 1. अतिशासन से शासनहीनता के दौर में आ जाना भी क्रान्ति है।

2. यहां सफ़ाई-दरोगा अगर नौकरी से निकाल दिया जाय, तो उसे कारपोरेशन में क्रान्ति कहेंगे।
3. सबसे कॉमिक रोल क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी का है। वह यह है कि जो अपने को ईमानदार और वीर कह ले वह हुआ। जो नहीं कहे, वह बेईमान, दब्बू, पिछलग्गू, स्वार्थी वगैरह सब हुआ। परमवीर चक्र अपने सीने पर अपने ही हाथों से खोंसना पड़ता है।
4. कोई दस को बेईमान कहे तो कहने वाला अपने खुद ईमानदार सिद्ध हो जाता है।
5. जो शासन समस्यायें हल कर सकता है वह करता है। जो नहीं कर सकता है वह कमीशन बिठाता है।
6. शासन एक रेलगाड़ी है। वह चलती है। शासक रेलगाड़ी में बैठे हैं। न वे चलते हैं, न गाड़ी को चलाते हैं। वे समय काटते हैं। मुसाफ़िर समय काटने के लिये मूंगफ़ली खाता है –टाइम पास। नये शासकों के लिये जांच कमीशन मूंगफ़ली है –टाइम पास।
7. इस देश के लोग ऐसे ही हैं कि उन्हें बताना पड़ता है कि तुम पर क्या अत्याचार हुये।
8. सरकार का काम शासन करना है, दुकान करना नहीं। फ़िर कीमत खरीददार और बेचनेवालों के बीच का मामला है। सरकार इसमें क्या करे?
9. अपने को दुखी मानकर और मनवाकर आदमी राहत पा लेता है। बहुत लोग अपने लिये ’बेचारा’ सुनकर सन्तोष का अनुभव करते हैं।
10. चिट भीतर भेजकर बाहर बैठे रहने में हर क्षण मृत्य-पीड़ा होती है। बहादुर लोग तो महीनों चिट भेजकर बाहर बैठे रहते हैं, मगर मरते नहीं।
11. कोई लाभ खुद चलकर दरवाजे पर नहीं आता। उसे मनाना पड़ता है, चिरौरी करनी पड़ती है। लाभ जब थूकता है तो उसे हथेली पर लेना पड़ता है।

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परसाई के पंच-39

 1. ज्ञानी कायर होता है। अविद्या साहस की जननी है।

2. आत्मविश्वास कई तरह का होता है- धन का, बल का, ज्ञान का। मगर मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि होता है।
3. सच्चा क्रांतिकारी कण्डक्टर, गेटकीपर, चपरासी वगैरह से ही संघर्ष करता है।
4. भारतीय लेखक एक साथ दो युगों में जीता है – मध्य युग में और आधुनिक युग में। वह कुम्भनदास की तरह घड़े बनाकर नहीं जीता, पर कहता है –’सन्तन कहा सीकरी सों काम।’ वह रैदास की तरह जूते नहीं सींता , न कबीर की तरह कपड़े बुनता है –मगर बात उन्हीं के आदर्शों की करता है।
5. आप तो बाजार में खुद माल की तरह बैठे हैं और खरीदार को दोष देते हैं कि कम्बख्त हम लोगों को खरीद रहा है।
6. सरकार का विरोध करना भी सरकार से लाभ लेने और उससे संरक्षण प्राप्त करने की एक तरकीब है।
7. सरकारें खुद चाहती हैं कि कुछ लेखक उनका विरोध करें। वे उन्हें पहचान लें और जो चाहिये दे दिवा दें।
8. अतिक्रांतिकारिता की बात करने वाले बुद्धिजीवी अक्सर –बुर्जुआ के एजेन्ट होते हैं। वे सामाजिक क्रांति की तर्कपूर्ण , योजनाबद्ध और यथाविधि प्रक्रिया में अडंगा डालते हैं।
9. पेचिश तो वादे करने वालों को हो रही है और बाथरूम के किले में बन्द होकर वे बचाव कर रहे हैं। बाथरूम पर हमला नहीं होता। इतनी लड़ाइयां हुई हैं, किले तोड़े गये, पर इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं है कि बाथरूम पर गोला दागा गया। हिटलर तो बेवकूफ़ था। आत्महत्या क्यों की? बाथरूम में घुस जाता।
10. बहादुरी की परिभाषा क्या है? डर हो तब दबे रहना और जब डर न हो, तब लट्ठ घुमाना।
11. क्या एक बेईमान की जगह पर दूसरा फ़िट करना ही दूसरी आजादी है, क्रांति है? क्या हम जुते हुये घोड़े हैं? पहले कोचवान को दूसरे ने ढकेल दिया और खुद बैठकर हांकने लगा। चाबुक मारकर कहता है –दौड़ रे घोड़े , क्रांति हो गयी। हमारी शायद यही नियति है कि एक बेईमान के हाथ से दूसरे बेईमान के हाथ में ट्रान्सफ़र होते रहें। यह बेईमानी का ’रोलिंग प्लान’ अनवरत योजना है।

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परसाई के पंच-38

 1. इस देश के ज्ञानी या अज्ञानी सबकी यह विडम्बना है कि वह क्रोध से फ़ौरन किस्मत पर आ जाता है।

2. वर्तमान सभ्यता जेबकटी की सभ्यता है। हर आदमी दूसरे की जेब काट रहा है। इस सभ्यता में अपनी जेब बचाने का तरीका यह है कि दूसरे की जेब काटो। सिर्फ़ उसकी जेब सुरक्षित है, जो दूसरे की जेब पर नजर रखता है।
3. मैंने कभी लिखा था कि आदमी कचहरी जाने वाला जानवर है। आज कहता हूं – आदमी वह जानवर है जिसकी जेब कटती है।
4. आदमी को लिफ़ाफ़े के बारे में बहुत सावधान रहना चाहिये। लिफ़ाफ़ा दुरुस्त है तो सब ठीक है।
5. भरम टूटने से आदमी मर जाता है।
6. निष्क्रिय ईमानदार और सक्रिय बेईमान मिलकर एक षड्यन्त्र-सा बना लेते हैं।
7. मजे की बात यह है कि प्रगतिवादी सत्ता प्रतिष्ठान के नेता भी , जिन्हें ’प्रतिक्रियावादी’ कहते थे, उन्हीं की चिरौरी करके उन्हें अपने बीच सम्मान से बिठाकर ’रिस्पेक्टेबिलिटी’ प्राप्त करते हैं, मगर जो अपना था उसे अवहेलित करते थे।
8. खुशफ़हमी से नेता पनपता है, मगर जनता नष्ट होती है। यही इस देश में हो रहा है।
9. भैयाजी लज्जावान आदमी हैं। उनसे जनता का भला नहीं हुआ तो वे हयादार आदमी की तरह मुंह छिपाकर बैठे रहे। निर्लज्ज तो है नहीं कि बाहर निकल पड़ें। वे बैठे-बैठे जनता के कष्टों के लिये रोते रहते थे। पांच साल जनता के लिये वे छिपकर रोये हैं।
10. चुनाव के वक्त हंसकर ही टालना चाहिये। जो हंसकर नहीं टाल सकता, वह हार जाता है।
11. जो आदमी महंगाई से लेकर मौसम तक ठीक कर सकता है, वह सर्वशक्तिमान से एकाध इंच ही छोटा पड़ेगा।

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Friday, September 18, 2020

परसाई के पंच-37

 

1. निरीक्षक लोग नकल कराना अपने कर्तव्य में शामिल समझते हैं लेकिन वे नकल उन्हीं को कराते हैं जो अपने हों या जिनकी ट्यूशन के हों।
2. जब तक कॉलेज का प्रोफ़ेसर तहसीलदारी के लिये लालायित रहेगा और रीडर आई.ए.एस. की परीक्षाओं में बैठेगा, तब तक कॉलेजों में अच्छे पढाने वाले आ ही नहीं सकते।
3. जो जनता का विश्वास खो दे उसे शिक्षा विभाग भेज देना चाहिये। शिक्षा विभाग कचरे की टोकरी है। जो सामान बेकार होता जाय उसे इसमें फ़ेंकते जाना चाहिये।
4. जिनका कक्षा में मुंह न खुले, जो विद्यार्थियों को देखकर कांप जायें, उन्हें प्रोफ़ेसर बना देना चाहिये। जो अफ़सर सब जगह नालायक सिद्ध हो गये उन्हें तरक्की देकर शिक्षा विभाग का अफ़सर बनाना चाहिये।
5. ’भारतीय बनिया संस्कृति’ एक अलग ही संस्कृति है। इस संस्कृति का लक्षण है कि किसी भी मामले में आदमी के मन में पहिले यह विचार आता है कि मैं इसमें कहां बेईमानी कर सकता हूं।
6. सच्चा कार्यकर्ता वह है जो पार्टी को ’पालटी’ बोलता है, विरोधी को ’चुनैटी’ देता है और जिसकी सारी कोशिश यह होती है कि उम्मीदवार से ज्यादा-से-ज्यादा पैसे चाय-नाश्ते के लिये झटक ले।
7. वर्षा और शीत की संधि बेला में पतंगे बल्ब के आसपास मंडराते हैं। वे मुझे कार्यकर्ता लगते हैं और बल्ब उमीदवार। फ़िर पतंगे लोप हो जाते हैं, बल्ब बराबर जलता रहता है। कार्यकर्ता अब सिर्फ़ तब दिखेगा, जब किसी की जमानत दिलानी होगी, पुलिस केस दबाना होगा या तबादला करना होगा।
8. घोषणायें की जाती हैं कि यह चुनाव धर्मयुद्ध है; कौरव-पाण्डव संग्राम है। धृतराष्ट्र चौंककर संजय से कहते हैं –ये लोग अभी भी हमारी लड़ाई लड़ रहे हैं। ये अपनी लड़ाई कब लड़ेंगे? संजय कहते हैं –इन्हें दूसरों की लड़ाई में उलझे रहना ही सिखाया गया है। ये दूसरों की लड़ाई लड़ते-लड़ते ही मर जाते हैं।
9. देख रहा था कि जो अपने को पाण्डव कहते हैं , वही दौप्रदी को चौराहे पर नंगा कर रहे थे। और अब देख रहा हूं कि कुछ पाण्डव कौरवों से भीतर-ही-भीतर मिले हुये हैं और कुछ कौरव पाण्डवों से।
10. जो पहले लिखा गया है, उसके बारे में कोई सवाल नहीं उठाना चाहिये। पहले लिखे की पूजा और रक्षा होनी चाहिये। वह पवित्र है। भोजपत्र पर जो लिखा है वह आर्ट पेपर पर छपे से ज्यादा पवित्र होता है।
11. न्याय देवता का मैं आदर करता हूं। पर एक न्याय देवता सेशन कोर्ट में बैठता है, दूसरा हाईकोर्ट में और तीसरा सुप्रीम कोर्ट में। सेशनवाला न्यायदेवता मुझे मौत की सजा दे देता है। मैं जानता हूं कि मैं बेकसूर हूं। उधर हाईकोर्ट में बैठा न्याय देवता बड़ी बेताबी से मेरा इन्तजार कर रहा है कि यह मेरे सामने आये तो मैं इस निर्दोष को बरी कर दूं। पर मैं उसके सामने जा नहीं सकता क्योंकि मेरे पास 5-6 हजार रुपये नहीं हैं। न्याय देवता मेरी तरफ़ करुणा से देखता है और मैं उसकी तरफ़ याचना से- पर हम आमने-सामने नहीं हो सकते।

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Thursday, September 17, 2020

परसाई के पंच-36

 . इधर कुछ डाकुओं , गुण्डों की फ़िल्म बनने लगी है, जिसमें लड़की डाकू से प्रेम करने लगती है। बस मैं देखता हूं कि अनेक किशोर बिल्कुल उन डाकुओं जैसा अभिनय करते हैं, मारपीट करते हैं, क्योंकि डाकू से लड़की प्यार करने लगती है।

2. फ़िल्मों में प्रेम ’मरने’ के लिये है, ’जीने’ के लिये नहीं। नायक और नायिका बरबाद होते ही हैं- पागल होते हैं या मर जाते हैं। गोया प्रेम कोई जहर है, जिसने चखा कि मर गया।
3. सिर्फ़ फ़िल्म में ही नहीं – लगभग सब पतनशील कलाओं में प्रेम जहर बना दिया गया है- वह प्राण, शक्ति, स्फ़ूर्ति, आनन्द देने वाला नहीं है। वह मारने वाला है, पागल करने वाला है, निष्क्रिय करने वाला है।
4. सरकार से भ्रष्टाचार की शिकायत करोगे तो ,भ्रष्टाचार बन्द नहीं करेगी, कमेटी बिठायगी। अन्नाभाव की शिकायत करोगे तो अन्न पैदा नहीं करायेगी, अन्न कमेटी बिठायगी। सरकारी काम ऐसे ही होता है।
5. यह शायद हमारे ही जनतन्त्र में होता है कि गुण्डे भी चुनाव में जीतकर शासन करने पहुंच जाते हैं। जुयें में फ़ड़ चलाने वाले, शराबखोरी करने वाले ,गुण्डागिरी करने वाले बड़े-बड़े निर्वाचित पदों पर हमारे ही प्रदेश में हैं। यह प्रजातन्त्र है भाई !
6. प्रजातन्त्र में सबसे बड़ा दोष है तो यह कि इसमें योग्यता को मान्यता नहीं मिलती, लोकप्रियता को मिलती है। हाथ गिने जाते हैं, सिर नहीं तौले जाते।
7. यह ’मिसफ़िट्स’ का युग है भाई ! जिसे जुआखाना चलाना चाहिये वह मन्त्री है; जिसे डाकू होना चाहिये वह पुलिस अफ़सर है; जिसे दलाल होना चाहिये वह प्रोफ़ेसर है; जिसे जेल में होना चाहिये , वह मजिस्ट्रेट है; जिसे कथावाचक होना चाहिये, वह उपकुलपति है। जिसे जहां नहीं होना चाहिये , वह ठीक वहीं है।
8. भारतीय संस्कृति ’बाहुल्य की संस्कृति’ है, अभाव की संस्कृति नहीं। यहां किसी एक को निमन्त्रण देने पर अगर एक ही जाय तो वह असभ्य और दरिद्र माना जाता है।
9. दूसरे की जगह हड़प लेना हमारी सांस्कृतिक विशेषता है। बस में, मोटर में, सिनेमा में, रेल में, दूसरे की जगह बैठ जाना और फ़िर हाथापाई करना भारत में ही देखने को मिलेगा।
10. नेताओं और मन्त्रियों को नैतिक स्तर की बड़ी चिन्ता है। याने जीवन-स्तर चाहे रसातल में चला जाय, नैतिक स्त्र हिमालय के शिखर पर चढा होना चाहिये।
11. जहां तक परीक्षकों का सवाल है, उनमें से कुछ यह समझते हैं कि जितना कठिन परचा निकलता है वह उतना ही महान विद्वान माना जाता है, इसलिये परचा ऐसा निकालना चाहिये जो खुद अपने से न हो।

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Tuesday, September 15, 2020

परसाई के पंच-35

 1. भारत-भूमि कुछ ऐसी उपजाऊ है कि बाहर से आयी हुई चीज यहां खूब फ़लती-फ़ूलती है। विदेश से आयी हुई प्लेग हमारे गांव-गांव में पहुंच गई और प्लेग की तरह आयी अंगरेज जाति भी खूब फ़ली-फ़ूली।

2. दो सौ वर्षों तक हमारे सिर पर सवार होकर अंग्रेजों ने हमसे तो बहुत कुछ लिया और साथ ले गये, परन्तु हम बड़े घाटे में रहे कि उनसे समय की पाबन्दी भी नहीं सीख सके।
3. भाषा की जठराग्नि प्रचण्ड होनी चाहिये और उसे अन्य भाषाओं के शब्दादि निगलने को प्रस्तुत रहना चाहिये। परन्तु यहां सतर्कता की आवश्यकता है। हम यह देख लें कि हम कहीं सड़ा-गला माल तो नहीं निगल रहे हैं।
4. इस रुदन से आक्रान्त संसार में अगर आदमी ईमानदारी से पक्षपात रहित होकर अपने भीतर देखे तो निस्सन्देह उसे अपने से अधिक हास्यास्पद आदमी ने मिले।
5. जैसे जिन्दगी में हर चीज की ’वैल्यूज’ बदल गयी हैं, हमारे समय तक आते-आते वसन्त भी पैसों का मोहताज हो गया है।
6. सबसे प्रधान आदमी के ठीक पीछे हमेशा खड़े हो जाने की दक्षता प्राप्त कर लेना, बड़ी साधना का परिणाम है।
7. हिन्दी का लेखक या तो वास्तव में बुद्धू होता ही है, या बुद्धू बनने के अवसर की ताक में रहता है और सरलता के गर्व के साथ बुद्धू बन जाता है।
8. कहीं घर में आग लगती है तो देखते हैं कि सब चिल्लाते हैं- ’पानी लाओ ! पानी लाओ !’ पर पानी कोई एक-दो ही लाते हैं ! शेष केवल चिल्लाते हैं !
9. पढ़ाने वाले पढाते नहीं हैं और पढने वाले पढते नहीं हैं, पर दोनों एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। और नेता लोग बड़ी समझदारी से गर्दन हिलाकर कहते हैं कि यह शिक्षा-पद्धति ही दोषपूर्ण है, इसे बदलना चाहिये। याने बदलना तो चाहिये पर बदलने का काम कोई जादूगर या भगवान कर जाये तो कर जाये, ये स्वयं नहीं करेंगे।
10. इतनी मेहनत करनी पड़ती है विद्यार्थी को। पेपर आउट करना, नकल करने के लिये पायजामा में कागज छिपाना, नोट्स की नकल करना, नम्बर बढ़वाने की कोशिश। फ़िर भी लोग आरोप लगाते हैं कि विद्यार्थी मेहनत नहीं करते। झूठ है। वे व्यर्थ का श्रम नहीं करते। जो काम जरूरी है, उसी को करते हैं।
11. इस देश में कोई युवक नहीं जानता कि उसका आखिर होगा क्या? वह क्या करेगा? वह यह भी जानता है बी.ए. करने से कुछ नहीं होता। जब तक फ़ेल होता है, विद्यार्थी कहलाता है। जब पास हो जायेगा तब बेकार कहलायेगा। और हम उससे कहते हैं, पढने में मन लगाओ।

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परसाई के पंच-34

 1. कथावाचक को हम कुलपति बना देते हैं, जुआड़ी को मन्त्री बना देते हैं, अयोग्य को ऊंचा पद और सुयोग्य को नीची जगह, शोषक को शोषितों का नेता, सिंह को भेड़ों की ट्रेड यूनियन का अध्यक्ष, चोर को मजिस्ट्रेट, घूस लेने वाले को घूस पकड़ने वाला – सब यूं ही बना देते हैं।

सड़ी सुपाड़ी की संस्कृति में यही होता है।
2. बम्बई मेल के तीसरे श्रेणी के डिब्बे में जिसने जगह पा ली, वह अगर परलोक जाय और देवता लोग उसे अनधिकारी समझ स्वर्ग में न घुसने दें , तो भी वहां लड़-झगड़कर वह एक कमरा तो ले ही लेगा।
3. अजामिल ने केवल ’नारायण’ नाम लेकर स्वर्ग में प्रवेश पा लिया। मुझे लगता है कि उस समय ’नारायण’ का बहनोई, ’गेटकीपर’ की ड्यूटी पर होगा।
4. अगर कोई मुझसे पूछे कि भारतीयों के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता क्या है, तो मैं कहूंगा- मौके-बेमौके अनायास परिचय बढाना, आत्मीयता पैदा करना।
5. प्रशंसा प्राप्त करते हुये आदमी का मुख दयनीय और हास्यास्पद होता है। उस समय उसके मुख पर वही दीनता और कृतज्ञता के भाव होते हैं, जो भिखारी के मुख पर होते हैं
6. अपने मूल रूप को जितना अधिक ढांकने में मनुष्य सफ़ल हुआ है, वह उतना ही सभ्य कहलाता है।
7. मनुष्य ने भी देवता को कम बुद्धू नहीं समझा। उसने यह मान लिया कि देवता नितान्त मूर्ख और अन्धा होता है, जो जरा-सी प्रशंसा से प्रसन्न हो काम कर देता है।
8. सभी-सोसाइटियों में तो जो जितना अधिक झूठ बोल सके, वह उतना ही बड़ा हो जाता है।
9. जिसे गुरुवर्ग ’गूड ब्वाय’ कह दे, उसे अपनी जिन्दगी बरबाद समझनी चाहिये।
10. महापुरुष मूल रूप से विद्रोही होता है, विद्रोही हुये बिना वह महान हो ही नहीं सकता।
11. सामान्य मनुष्य में जो त्याग, करुणा, सहानुभूति,परोपकार, साहस आदि होते हैं, उन्हीं पर यह दुनिया टिकी है।

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Monday, September 14, 2020

परसाई के पंच- 33

 1. हमारे देश में छोटा आदमी हमेशा ’सैम्पल’ के काम आता है, और कटता है बड़ों की भलाई के लिये।

2. सिंचाई विभाग में अगर करोंड़ों के घोटाले का हल्ला हो, तो १-२ क्लर्कों को तैयार रहना चाहिये, ’सैम्पल’ के रूप में बलिदान के लिये। बड़े इन्जीनियर , जो लाखों खा रहे हैं और ठेकेदार जो लाखों के झूठे बिलों का भुगतान करा रहे हैं, नहीं पकड़े जायेंगे।
3. इस व्यवस्था में कोई अकेला पैसा नहीं खाता। सब मिलकर खाते हैं- खानेवाले भी और उन्हें पकड़ने वाले भी। इसलिये वास्तविक बड़े भ्रष्टाचारी कभी नहीं पकड़े जायेंगे। पकड़े जाने लगें तो इस देश के तीन-चौथाई मन्त्री, सांसद और विधायक जेल में होंगे। लोकतन्त्र का ऐसा नाश भला कौन देशभक्त करना चाहेगा।
4. भ्रष्टाचार मिटाने की जितनी मशीनरी हैं, जितने विभाग हैं, सब खत्म कर दिये जायें। इनके रहते भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता , क्योंकि इनकी समृद्धि के लिये भ्रष्टाचार जरूरी है। इन विभागों को बन्द करने से अरबों रुपये बचेंगे, जिनसे सिंचाई और बिजली की योजनायें चल सकती हैं।
5. भूत के पांव पीछे होते हैं, ऐसा कहा जाता है। कुछ लोगों के दिमाग के पांव पीछे होते हैं- ये मानसिक भूत हुये। इनके लिये जो बीत गया, वह परम श्रेष्ठ होता है, वर्तमान अत्यन्त हेय और उनकी यह कृपा है कि वर्तमान में जीकर वे उसे गौरवान्वित कर रहे हैं।
6. हर युग के भूत से वर्तमान की कुश्ती हुई है। कालिदास की अवहेलना जब केवल उनकी नवीनता के कारण होने लगी, तो उन्हें ललकारना पड़ा कि जो पुराना है वही श्रेष्ठ नहीं है।
7. कुछ लोग वर्तमान के सूर्य के प्रकाश में काम नहीं करना चाहते; भूत की चादर ओढ टांगे फ़ैलाकर सो जाते हैं। बौना आखिर अपने पूर्वज की छ: फ़ुटी तस्वीर कब तक दिखाता फ़िरेगा और इससे उसका कद कैसे बढेगा?
8. जो जितना सभ्य है, वह उतनी ही अधिक शोभा साधने की फ़िक्र में रहता है।
9. लोग भगवान को उस मूर्ख धनवान जैसा मानते हैं, जो जरा सी चापलूसी से फ़ूलकर थैली खोल देता है और जिसे कोई भी बुद्धू बना सकता है।
10. जो दूसरे के लिये है, वह खराब होना ही चाहिये। जो अच्छा है वह वह अपना है। खोटी सुपारी पूजा में , खोटा नारियल होली में, सड़ा माल भिखारी के कटोरे में, खोटा पैसा भिखारी के हाथ में।
11. इस जमाने में इन्द्र दधीचि के पास हड्डी मांगने आते तो दधीचि भी किसी सर्जन को बुलाकर कहते- देखो मेरे शरीर में ’फ़ाल्स रिब्स’ हैं, उनमें से एकाध टुकड़ा इसे काट दो, जिससे ये टल जायें। आज दानवीर कर्ण होता तो वह भी जाली नोट रखता। हरिशचन्द्र तो बिना अदालत एक कौड़ी भी उस ब्राह्मण को न देते।

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