Friday, October 09, 2020

परसाई के पंच-65

 

1. न्याय देवता है। हर देवता भेंट लेता है। अगर भक्त से सीधे भेंट ले तो कोई बात नहीं, पर हर देवता का एक मध्यस्थ होता है- ’मिडिलमैन से कहीं छुटकारा नहीं। न्याय देवता का मिडिलमैन वकील होता है। दुश्मन से छुटकारा मिल सकता है, पर अपने ही वकील से छुटकारा मुश्किल है।
2. एक बार कचहरी चढ जाने के बाद सबसे बड़ा काम है, अपने ही वकील से अपनी रक्षा करना। प्रतिपक्षी से उतना डर नहीं रहता, जितना अपने ही वकील से।
3. सफ़ल डाक्टर वह है जो जो मरीज को न मरने दे, पर इलाज चलता रहे। सफ़ल वकील वह है, जो मुवक्किल को न जीतने दे, न हारने दे, बस मुकदमे चलते रहें। इसीलिये सफ़ल डॉक्टर और सफ़ल वकील के हाथों अपने को सौंपना खतरे से खाली नहीं है।
4. पैसे में बड़ा विटामिन होता है।
5. कुछ लोग स्नेह और सहानुभूति का घड़ा भरकर रखे रहते हैं और आदमी के मरने की राह देखते रहते हैं। इनका हृदय आग बुझाने के लिये पानी से भरी रखी हुई बाल्टी की तरह होता है, जिसका उपयोग तभी होता है, जब आग लगती है। इनका स्नेह और सहानुभूति पाने के लिये आदमी को मरना पड़ता है।
6. सच्चा संवेदन भी जब रूढ हो जाता है, तब वह भावहीन, रिक्त, थोथा रिफ़्लेक्स हो जाता है। बिन बोले का दुख बड़ा कहा गया है, पर अब कोलाहल से दुख की मात्रा नापी जाती है।
7. शवयात्रा में जो तफ़रीहन भी जाय उसका दुख बड़ा गिना जायेगा और जो दुख से टूटकर घर बैठा रहे , उसे निष्ठुर माना जायेगा।
8. नीरो रोता भी समारोह में था। हम सभी छोटे-मोटे नीरो बने जा रहे हैं। जो समारोह में न रोये, उसका रोना, रोना नहीं गिना जायेगा। पहले ’मदनोत्सव’ होते थे, अब ’रुदनोत्सव’ होते हैं। इन रुदनोत्सवों में सच्चा रोने वाला तो रह जाता है, झूठा रोने वाला रंग जमा लेता है।
9. चन्दा खाने वाले के सुभीते के लिये ही गुप्तदान की परम्परा को महत्व मिला है।
10. मांगना तीन प्रकार का होता है –अपने लिये मांगना, अपने समेत दूसरों के लिये मांगना और केवल दूसरों के लिये मांगना। अपने लिये मांगने में लज्जा है, अपने समेत दूसरे के लिये मांगने में एक गर्व है। गांधीजी तीसरे प्रकार के मांगने वाले थे और उन्हें देनेवाला स्वयं गर्वित होता था।
11. आमतौर पर चन्देवाले का स्वागत उसी प्रकार किया जाता है, जिस तरह एक चोर का। यह सामान्य विचार बन गया है कि चन्दा मांगनेवाला बेईमान होता है, वह रकम खा जाता है और काम नहीं करता।

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Wednesday, October 07, 2020

परसाई के पंच-63

 

1. पहले देवता आदमी बनकर ठगते थे, अब आदमी देवता बनकर ठगते हैं।
2. हर सत्य के हाथ में झूठ का प्रमाणपत्र है। ईमान के पास बेईमानी की सिफ़ारिशी चिट्ठी न हो , तो उसे कोई दो कौड़ी को न पूछे।
3. सुना है विरहिन को बरसात में प्रिय की बड़ी याद सताती है। परीक्षा के मौसम में भी कुछ लोगों का विरह जाग उठता है और उन्हें किन्हीं विशेष परिचितों की याद सताने लगती है।
4. सफ़लता के महल का सामने का आम दरवाजा बन्द हो गया है। कई लोग भीतर घुस गये हैं और उन्होंने कुंडी लगा दी है। जिसे उसमें घुसना है, वह रूमाल नाक पर रखकर नाबदान में घुस जाता है। आसपास सुगन्धित रूमालों की दूकाने लगी हैं। लोग रूमाल खरीदकर उसे नाक पर रखकर नाबदान में से घुस रहे हैं। जिन्हें बदबू ज्यादा आती है और जो सिर्फ़ मुख्य द्वार से घुसना चाहते हैं, वे दरवाजे पर सिर मार रहे हैं और उनके कपालों से खून बह रहा है।
5. यौवन सिर्फ़ काले बालों का नाम नहीं है। यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तात्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम हैं,; यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है। और सबसे ऊपर, बेहिचक बेवकूफ़ी करने का नाम यौवन है।
6. काम बन्द करने और मरने का क्षण एक ही होता है।
7. राजा के पीछे और साहूकार के आगे रहना चाहिये। राजा सनकी माना जाता है और साहूकार समझदार।
8. बड़ा-से-बड़ा सूरमा जो घमासान युद्ध में दुश्मन के बीच बेखटके घुस जाता है, साहूकार के सामने पत्ते सा कांपने लगता है।
9. सहनशील साहूकार ज्यादा खतरनाक होता है। एक अर्से तक वह आपको ढाल देता रहेगा और जब आप समझ रहे होंगे कि वह भूल गया है, वह गर्दन अचानक पकड़ लेगा।
10. ’ब्लैंक लुक’ देना भी एक कला है। अगर साहूकार की सड़क दे निकलना है तो अच्छे कद्दावर दोस्तों के बीच चलिये, ताकि साहूकार की दृष्टि से बचने के लिये उसके कन्धे ढाल बन सकें। अगर मित्र छ: फ़ुटा नहीं है तो उससे बातचीत में इतने मशगूल हो जाइये लो आसपास देखना ही न पड़े, मानो आप किसी गम्भीर अन्तर्राष्ट्रीय समस्या पर विचार कर रहे हों और छेड़ने से विश्व शान्ति को खतरा हो जायेगा।
11. कर्जदार और फ़िलासफ़र में विशेष अन्तर भी नहीं है। दोनों दुनिया से मुंह छिपाते हैं।

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Tuesday, October 06, 2020

परसाई के पंच-62

 

1. आसपास से गंवार सम्पन्नता जब तमाचे जड़ रही हो, तब उचटकर तमाचा जड़ने को जी चाहता है। पर उसकी अपेक्षा यह ज्यादा सम्मानपूर्ण लगता है कि तमाचा मारने वालों की तरफ़ से हम भी किसी को एक चांटा मार दें।
2. भारत में जिस हिसाब से बच्चे पैदा हो रहे हैं, उस हिसाब से मकान नहीं बन रहे हैं। सरकार को कानून बना देना चाहिये कि हर बच्चा पैदा होने पर बाप को एक मकान बनवाकर देना होगा। इससे सन्तति-नियमन एकदम हो जायेगा और कुछ मकान भी बन जायेंगे।
3. बम्बई में अनुशासन है। वहां चोरी भी अनुशासन से होती है, स्मगलिंग भी अनुशासन से।
4. दिल्ली खींचती जरूर है। पुराने जमाने में आक्रमणकारियों को खींचती रही है । अभी भी जो दिल्ली है, उसे जीतने के इरादे से ही आता है। पर दिल्ली उसे जीतकर एक कोने में डाल देती है।
5. हमारी इस सारी व्यवस्था को मिल लेने वाले ही चला रहे हैं। बड़ी कम्पनियां हजारों रुपये वेतन पर राजधानियों में मिल लेने वाले रखती हैं, जिनका काम सिर्फ़ मिल लेना है। मगर मैंने सुना है कि असली सरकार यही मिल लेने वाले चलाते हैं, यही बजट बनाते हैं; यही मन्त्रिमण्डल बनवाते हैं, यही नीतियां तय करते हैं। युद्ध और शान्ति भी, सुना है इन्हीं मिल लेने वालों के इशारे पर होती हैं।
6. सूखे मरुस्थल में रहने वाले की इच्छा कभी-कभी समुद्र में डूब मरने की होती है।
7. प्रेम जोड़ने में लोक कर्म विभाग और इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के योगदान का अध्ययन होना भी जरूरी है। सड़कें जहां जाती हैं, वहां से न जातीं, तो कितने वर्तमान प्रेम-सम्बन्ध कहीं और जुड़ते? जिस प्रेम को आत्मा का सम्बन्ध कहते हैं, वह किस हद तक सड़क का संयोग है?
8. रिटायर्ड फ़ादर से निभाना तलवार की धार पर चलना है। गैर-रिटायर्ड फ़ादर ’पार्ट-टाइम’ फ़ादर होता है, जबकि रिटायर्ड फ़ादर के पास बात करने का वक्त नहीं होता, मगर रिटायर्ड फ़ादर के पास बात करने वालों का टोटा पड़ जाता है।
9. कितने प्रेम इस कारण असफ़ल हो जाते हैं कि प्रेमी ’फ़ादर’ को ’स्टैण्ड’ नहीं कर सका। कितनी अच्छी-अच्छी तरुणियां इसलिये अच्छे प्रेमी प्राप्त नहीं कर पातीं कि ’फ़ादर’ की छाया से अच्छे नवजवान बचते हैं।
10. अच्छी आत्मा ’फ़ोल्डिंग’ कुर्सी की तरह होनी चाहिये। जरूरत पड़ी तब फ़ैलाकर उस पर बैठ गये; नहीं तो मोड़कर कोने में टिका दिया।
11. मैंने ऐसे आदमी देखे हैं, जिसमें किसी ने अपनी आत्मा कुत्ते में रख दी है, किसी ने सुअर में। अब तो ऐसे जानवरों ने भी यह विद्या सीख ली है और कुछ कुत्ते और सुअर अपनी आत्मा किसी-किसी आदमी में रख देते हैं।

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Monday, October 05, 2020

युवा दिखने की ललक

 

कल घर पहुंचने के पहले थोड़ा इधर-उधर भी घूमे। 'कामसासू काम्प्लेक्स' की तरफ भी गए। इतवार के बावजूद कुछ दुकाने सज गयीं थीं। एक ठेले पर 'लिट्टी-चोखा' का बोर्ड लगा था। बिक्री अभी शुरू हुई नहीं थी। 'लिट्टी-चोखा' खाये बहुत दिन हुए। जल्द ही नम्बर लगेगा।
कामसासू परिसर में कांट्रैक्ट पर सिलाई करने वालों के शेड हैं। शाहजहांपुर और आसपास के शहरों से आकर लोग सिलाई का काम करते हैं। बाहर से आये लोग काम की जगह पर ही रहते, खाते, सोते हैं। होली, दिवाली, तीज-त्योहार घर चले जाते हैं। काम न मिलने पर जहां काम मिलता है, वहां चले जाते हैं।
एक भाई जी अकबरपुर से काम करने आये हैं। 54-55 उम्र होगी। लगते अलबत्ता चालीस के अल्ले-पल्ले ही हैं। बेटियों की शादी हो गई। नाना बन गए। लड़का घर में खेती-पाती का काम देखता है। उसकी शादी करने के लिए बहू खोज रहे हैं। जल्दी ही निपटा देंगे।
लड़के की उम्र 20 साल जानकर मैंने कहा -'इत्ती जल्दी काहे शादी कर रहे। कुछ कमाने-धमाने लगे तब करना। पढ़ने-लिखने की उम्र है यह तो। बोले -'पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगता। हरामी है। और खाने-कमाने के लिए खेती-बारी है। फिर शादी-ब्याह समय पर हो जाये वहै ठीक।'
ओवरऑल सिलते हैं भाई जी। बगल में उनके साथी शायद बिल्हौर की तरफ़ के हैं। सुबह से लेकर देर रात पांच-पांच ओवरऑल सिल डालते हैं। खाना बनाने , खाने के अलावा जागने का सारा समय दर्जीगिरी में लगता हैं। खाने-खर्चे से बचाकर पांच-छह हजार घर भेजते हैं हर महीने।
खा- पीकर यहीं जमीन पर सो जाते हैं। बताया -' एक रात नाग देवता फन काढ़े सर के पास खड़े हुए थे। जान सूख गई। लेकिन वो फिर अपने-आप चले गए। '
मशीन के ऊपर टमाटर और दीगर सब्जी लटकी हुई थी। नीचे रखने पर चूहे कुतर जाते हैं। चश्मा दीवार पर टँगा था। डोरी से। दूसरा चश्मा बगल में रखा था।
हमने पूछा -'दो चश्मे क्यों ?'
इसको (दीवार पर लटके चश्मे को) पहनकर बूढ़े लगते हैं। हालांकि बुढ़ा तो गए ही हन लेकिन इसको पहिन के ज्यादा बूढ़े लगते हैं इसीलिए नहीं पहनते इसे।
55 साल की उम्र के, नाना बन चुके , दर्जी का काम करने वाले इंसान की युवा दिखने की ललक खुशनुमा लगी। गुदगुदी ललक।
बगल में हजरतपुर से आये बाप-बेटे बैग सिलने का काम कर रहे थे। लड़के की उम्र 20 साल करीब। बैग के नीचे रबर के गुल्ले लगा रहा था। गुटके को बैग के ऊपर बैग को लट्टू की तरह घुमाते हुए सिलाई करता जा रहा था चुपचाप। बाप और गुरु दोनों के डबल रोल वाला आदमी लड़के को काम करते देख रहा था।
आठवीं तक पढ़ा है बच्चा। आगे मन नहीं लगा होगा। पढ़ नहीं पाया। बाप की देखादेखी लग गया सिलाई में। खाने-जीने का आसरा होगा। इसके साथ की उम्र के अनगिनत बच्चे न जाने किस-किस तरह की मस्तियां कर रहे होंगें। यह बच्चा उन सब से बेखबर दर्जी खाने में बैठा बैग सिल रहा है। न कोई दोस्त, न कोई सहेली। जिंदगी क्या अजब पहेली।
बगल के शेड में कानपुर से आये तीन दर्जी बैग बना रहे हैं। कानपुर में बकरमण्डी के पास रहते हैं। दो बेटे साथ आये हैं। फरमान और फैसल। बेटियां अपनी अम्मी के पास घर मे हैं। खुद की बैग की दुकान है कानपुर में। काम की कोई कमी नहीं। लेकिन 'भाईजान' के कहने पर काम पर आ गए। भाईजान मतलब सिलाई का काम लेने वाले कांट्रेक्टर। बताया भाईजान हर मुसीबत में ख्याल रखते हैं। उनकी बात मना नहीं कर सकते। बाकी लोगों ने भी इसी तरह की बात कही -'पैसा हमेशा टाइम पर मिल जाता है।'
दिन भर में दस बैग सिल लेता है एक टेलर। हमारे यहां यह काम कठिन मानते हैं लोग। करने में हिचकते हैं। जिस काम को हमारे यहां कठिन माना जाता है,बाहर उसी को करने के लिए दूर-दूर से कारीगर आते रहते हैं। सुरक्षित और असुरक्षित, संगठित और असंगठित का अंतर है यह। सुविधा और सुरक्षा इंसान की क्षमता में कमी लाती हैं।
कानपुर से और कई काम करने वाले आये थे लेकिन लैट्रिन की ठीक व्यवस्था न होने के कारण वापस चले गए। हमको बड़ी शर्मिंदगी लगी। इतनीं दूर से आये लोग व्यवस्था की कमी के चलते वापस चले गए। हमको हवा ही नहीं। फौरन तय किया कि जल्द से जल्द इसे ठीक कराना है।
लौटते में फिर कालोनी होते हुए आये। तमाम घरों के लोग घर छोड़कर जा चुके हैं -अपने-अपने घरों में। घर उजाड़ हैं। लोग-बाग हाउस बिल्डिंग एडवांस लेकर मकान बनवा रहे हैं। पहले घर रहने पर एच आर ए मिलने में समस्या होती थी। घर छोड़ने की अनुमति लेनी होती थी। अब बिना अनुमति घर छोड़कर एच आर ए ले सकने के नियम के बाद से घर तेजी से खाली हो रहे हैं। इलाके वीरान हो रहे हैं।
वहीं कुछ लड़के घूमते दिखे। हमने बिना मास्क घूमते टोंका तो एक ने हंसते हुए मास्क लगा लिया। बात करने पर पता चला फिजियो का काम करता था। अभी छूट गया। यह भी कि कुछ दिन गलत संगत में पड़ गया था। दारूबाजों के चक्कर में। उसके चलते ही एक्सीडेंट भी हो गया। पैर में चोट लग गयी। अब गलत संगत छोड़ दी। 6 महीने हुए दारू नहीं छुई।
कोई लड़का खुद बताये गलत संगत में पड़ने और उसे छोड़ सकने के बारे में यह सुनकर लगा कि मजबूत इरादे हों तो सुधरना सम्भव है। उसके बाद उसी बच्चे ने लगातार बहने वाले नल को दिखाया, बताया कि लोग किधर से आते हैं, चोरी करके चले जाते हैं।
वापस लौटते हुए दो बच्चे दिखे। साइकिल पर खड़े बतिया रहे थे। हम भी खड़े हो गए। बतकही में शामिल हो गये। दोनों हम उम्र बच्चे 20 साल के करीब। रिश्ते में मामा-भांजे। अलग-अलग कारणों से पढ़ाई छोड़कर काम मे लग गए।
दिन भर काम में जुटे बच्चों के मनोरंजन की बात करने पर सिफर मिला। बातचीत के दौरान सवाल-जबाब:
सवाल : कोई दोस्त हैं , उनसे बात होती है ?
जबाब : दोस्त हैं लेकिन बात-मुलाकात नहीं होती। टाइम ही नहीं मिलता।
सवाल: कोई सहेली ?
जबाब: वही तो 'काम' नहीं किया आजतक।
यह देखकर झटका नहीं लगा कि युवा पीढ़ी का यह नुमाइंदा विपरीत जेंडर से दोस्ती को 'गलत काम' मानता है। अपने समाज के बड़े हिस्से की सहज सोच है शायद। तमाम 'गलत कामों' की जड़ भी।
हम कुछ और पूछें-कहें तब तक हमको याद आया बहुत देर के निकले हैं हम। याद आते ही फौरन पैडल किक मारकर साइकिल स्टार्ट की और खरामा-खरामा चलते हुए घर में जमा हो गए।

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Sunday, October 04, 2020

परसाई के पंच-94

 

1. पति पत्नी द्वारा प्रताड़ित होते हैं, तनखा को लेकर। कम तनखा लेने वाले पति पत्नी द्वारा जब-तब प्रताड़ित किये जाते हैं। जो पति वेतन के दिन कलारी होते हुये आते हैं वे भी पिटते हैं।
2. पति के प्रताड़ित होने के कारण और भी हैं। कोई पति इसलिये प्रताड़ित होता है कि उसकी स्टेनो सुन्दरी है। दूसरे की बीबी की तारीफ़ करने वाले भी प्रताड़ित होते हैं।
3. जाति और धर्म की सेवा हिसाब से करनी चाहिये। हिसाब से ज्यादा धर्म हो जाय, तो धन हाथ से निकलने लगता है।
4. जाति और धर्म की सेवा अगर ज्यादा हो जाय, तो धन नाश होता है। राजा हरिशचन्द्र ने धर्म सीमा से बाहर निभा दिया, तो चाण्डाल के घर नौकरी करनी पड़ी। राज गया, धन गया।
5. भ्रष्टाचार अगर अपने हाथ से हो तो वह प्रजा के लिये हितकारी है। दूसरे के हाथ से भ्रष्टाचार हो तो वह प्रजा के लिये दुखदायी है।
6. जनता इन्हीं से अपनी रक्षा चाहती है, जो जनता की रक्षा के लिये रैली निकाल रहे हैं।
7. दिशाहीन और विचारधारा हीन और सिद्धान्तहीन राजनीति जिन्दगी भर करने के कारण ये बूढ़े नेता इस सद्गति को प्राप्त हुये हैं कि कल राजनीति में आये फ़िल्मी हीरो इन्हें बन्दर की तरह नचाते हैं।
8. लोकतंत्र में जब सामन्तवाद जैसी ताकत शासक को मिल जाय, तब वह नवाब या महाराणा हो ही जायेगा।
9. पूरे मध्य और उत्तर भारत में छात्र-नेता को गुण्डा और अपराधकर्मी होना ही पड़ेगा। वह होता है। अगर वह गुण्डा और अपराधकर्मी न हो तो नेतागिरी नहीं कर सकता।
10. दक्षिण भारत में या बंगाल में वह छात्र-नेता होता है, जो फ़र्स्ट क्लास होता है, अध्ययनशील होता है, जिसका व्यक्तित्व प्रभावशाली और उद्दात होता है, जिसका आदर छात्र और अध्यापक करते हैं। अपने यहां नेता वह होता है, जो पढ़ता ही नहीं। मूर्ख होता है। आतंकवादी होता है। छुरा रखता है, गुण्डों का गिरोह रखता है। यह आदर्श छात्र-नेता होता है।
11. छात्र अपने को विशेषाधिकार प्राप्त ’वर्ग’ कहते हैं। छात्र ’वर्ग’ नहीं है, भीड़ है। बस-ड्राइवर और कण्डक्टर और तमाम श्रमजीवी ’वर्ग’ है। अगर छात्र ’वर्ग’ होता और श्रमिक ’वर्ग’ से मिलकर वर्ग-संघर्ष करता, तो देश में क्रान्ति हो गयी होती। मगर सबसे बड़ी क्रान्ति विरोधी शक्ति कोई है तो यह अपनी छात्र शक्ति ही है। इनकी क्रान्ति की परिभाषा है –छात्रों, अध्यापकों को आतंकित करना, हुल्लड़ करना, मुफ़्त की शराब पीना, होटलों में मुफ़्त में खाना और होटलवाले से मारपीट करना।

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परसाई के पंच-61

 

1. अजब चस्का होता है दुख का ! फ़ोड़ा बड़ा दर्द होता है। पर फ़ोड़े को दबाकर, छेड़कर भी तो दर्द का मजा लेते हैं। इसे ’मीठा दर्द’ कहते हैं। कहते हैं दाद खुजाने का आनन्द, ब्रह्मानन्द की कोटि का होता है।
2. जब हम अनुभव करते हैं कि हम औरों से अधिक कष्ट भोगते हैं, तब हमें गर्व होता है । दूसरों की दृष्टि में भी हम गौरवशाली बनना चाहते हैं। दर्द का ताज सिर पर रखे घूमते हैं।
3. दुख पूज्य माना गया है और दुख को पूज्य बनाने वालों में सबसे बड़ा हाथ दुख देने वालों का है।
4. ’दीन धन्य है क्योंकि वही स्वर्ग के अधिकारी होंगे’ ,ईसा ने कहा । ईसा तो कहकर निपट गये, पर उनके अनुयायियों ने इसका अक्षरश: पालन किया । स्वर्ग का राज्य दीनों के लिये अलग छोड़कर, पृथ्वी का राज्य खुद भोगने लगे। पर स्वर्ग के राज्य के अधिकारी भी तो बनाना चाहिये। यही सोचकर ईसा के भक्तों ने कितनी ही कौमों को , करोड़ों आदमियों को दीन बना दिया।
5. सम्पन्नता दिखाने की जितनी तीव्र हविस होती है, उससे कहीं अधिक गरीबी दिखाने की होती है।
6. जो दुख की केवल जय बोलते हैं, कहते हैं कि दुख आदमी को महान बनाता है , ये सरासर धोखा देते हैं। दुख आदमी को ’बड़ा’ भी बना सकता है और नीच भी। मन को उजला भी कर सकता है, और काला भी।
7. वे घोर निराशा से ग्रस्त होते हैं, जो दुख का हाथ जोड़कर स्वागत करते हैं –’पधारो महाराज ! हम तो कृतार्थ हो गये।’ दुख तो त्याज्य है, घृणित है।
8. कुछ पेशेवर ’सहानुभूति-प्रदर्शक’ होते हैं । पता लगाते रहते हैं किस पर क्या विपत्ति पड़ी है। किसी-किसी का तो चेहरा ही ऐसा होता है कि मालूम होता है , इन्हें सरकार से मातमपुर्सी के लिये वेतन मिलता है।
9. दया का पात्र होना कोई सुखदायक अनुभव नहीं है, समर्थ होकर भी करुणा जैसी मूल्यवान , लोक कल्याणकारी भावना को खींचना , सरासर चोरी है, धोखा है।
10. इस जमाने में दोहरा शोषण चल रहा है – आदमी की रोटी तो छीनी ही जाती है, उसके हिस्से की करुणा भी छीन ली जाती है।
11. स्त्रियां दो प्रकार की होती हैं –ध्यान देने वाली और न ध्यान देने वाली। अगर आप किसी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो नतीजा इस बात पर निर्भर करता है कि आपके पड़ोस में ध्यान देने वाली रहती है या ध्यान न देने वाली।

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कोरोना काल में साइकिलबाजी

 

आज बहुत दिन बाद साइकिलबाजी हुई। घर से निकलकर आईबी होते हुए स्टेशन की तरफ जहां तक सड़क दिखी वहां तक गए। सड़क खत्म होने के बाद रेल लाइन शुरू हुई। लौट आये।
मंदिर के पास चौराहे पर कुछ लोग तम्बाकू फटकारते हुए खड़े थे। बिना मास्क। कोरोना कहीं होगा भी तो तम्बाकू की फटक से भाग लिया होगा। ये दिहाड़ी कामगार थे। जिसको जरूरत ले जाये रोजनदारी पर। हमको लगा कि कहीं हमको भी कोई दिहाड़ी पर काम के लिए न ले जाये। ऐसा लगते ही थोड़ा बगलिया के खड़े हो गए। निठल्ले से कुछ कमाई हमेशा अच्छी पर बिना नाश्ते पानी के काम नहीं होता अपन से।
पास ही सड़क खुदी पड़ी है। बनना है उसको। पता चला ठेकेदार सड़क खोदकर गिट्टी, सीमेंट के लिए पैसे का इंतजाम करने गया है। पैसे के इंतजाम के बाद काम आगे बढ़ेगा। इस 'गरीब ठेकेदार' के पास कई काम हैं। हर जगह देरी और साधन का रोना। ठेकेदारों के आजकल ऐसे ही हाल हैं -'चाहे वो मरम्मत के काम का ठेकेदार हो या समाजसेवा का या देशसेवा। सेवा का हिसाब पूछने पर साधन का रोना।'
मेन रोड के पास एक नौजवान 50-60 सिलिंडर लिए खड़ा था। बताया कि गैस एजेंसी से लेकर डिलीवरी करते हैं। 20-30 रुपये हर सिलिंडर पर मिल जाते हैं। बीएससी किये हैं दीपक निगम। कोई काम नहीं मिला तो सिलिंडर बेंच रहे हैं। हमने पूछा -'डिलीवरी चार्ज तो दस रुपये होते हैं। तुमको 20-30 कौन देता है? बोले -'दे देते हैं लोग। 400-500 मिल जाते हैं रोज के।'
डिलीवरी की मोटरसाइकिल पर शिक्षा विभाग लिखा है। शिक्षा विभाग की गाड़ी गैस सप्लाई कर रही है। पता चला बाइक इनके पिता की है। पिता स्कूल में प्रिंसिपल हैं। आजकल स्कूल बंद हैं तो उनकी गाड़ी गैस बेंचने में सहायक हो रही है।
अपने देश की शिक्षा नीति और रोजगार नीति दोनों की साझा उपलब्धि है यह कि अपने ग्रेजुएट सड़क पर खड़े गैस सिलिंडर बेंच रहे हैं।
आगे निकलते देखा। बाउंड्री वाल जगह-जगह टूटी हुई है। जितने बार बनवाई जाती है उससे ज्यादा बार टूट जाती है। लोग भैंस, घोड़ा, गधे लाकर चराते हैं। लीद, गोबर करके चले जाते हैं। निवासी भी उसी टूटी दीवार से बने रास्ते से आते-जाते हैं। शार्टकट हर एक को सुगम लगता है।
स्टेशन की तरफ के रास्ते में चहल-पहल पूरी थी। बस वाले खुले मुंह शाहाबाद, पीलीभीत , पलिया की सवारियों के लिए आवाज लगा रहे थे। दूरी, मास्क और कोरोना का भय नदारद। हमीं अकेले मास्क लगाए थे। लोग हमको अजूबा समझ रहे होंगे।
स्टेशन के पास की दीवार से सटा हुआ फल वाला ग्राहक के इंतजार में खड़ा था। उसके पीछे सन्देश लिखा था :
कोरोना को हराना है,
मास्क जरूर लगाना है।
मास्क नारे की तरफ पीठ हुए फलवाला बिना मास्क खड़ा था। नारे की तरफ पीठ करके उसने नारे को भी छिपा लिया था ताकि बिना मास्क वाले ग्राहक को असुविधा न हो।
एक मास्क और कोरोना नारे के ऊपर 'नामर्दी का शर्तिया इलाज' का पोस्टर लगा था। नामर्दी के इलाज के पोस्टर ने कोरोना से बचाव के नारे को ढंक लिया था। नामर्दी सदियों पुरानी बीमारी है, कोरोना की उम्र अभी साल नहीं हुई। दूध के दांत भी नहीं टूटे अभी कोरोना के। जबकि नामर्दी बाबा आदम के जमाने की, बहुत सीनियर बीमारी है। कोरोना के बचाव की लिखाई के ऊपर नामर्दी के इलाज का पोस्टर ऐसी ही बात है जैसे किसी जूनियर ने सीनियर खलीफा के लिए अपनी कुर्सी छोड़ दी हो।
आगे जहां सड़क खत्म हुई वहां रेल लाइन पड़ रही थी। लोग सीमेंट की बोल्डर कंधे पर लादे हइस्सा करते हुए पटरी बिछा रहे थे। बगल में कीचड़ भरे रास्ते किनारे मेड़ पर पैर रखते हुए एक आदमी सर पर कुछ लादे चला आ रहा था। उसी के बगल में एक महिला सड़क किनारे गोबर के ढेर से कंडे पाथ रही थी।
सड़क की परात पर गोबर को आते की तरह मांडते हुए कंडे पाठ रही थी महिला। कंडे पर खाना बनाती होगी महिला। सरकार की उज्ज्वला गैस योजना इस महिला को बगलिया कर निकल गयी होगी। कल्याण योजनाएं भी बड़ी मनचली और नखरीली होती हैं। जहां मन होता है केवल वहां जाती हैं, बाकी जगह मटिया जाती हैं। कोई पूछता भी नहीं।पूछने पर क्या पता हड़का दें -'हम गए थे तुम्हारे पास। तुम मिले नहीं। हम लौट आए। हमारे पास फालतू टाइम थोड़ी है तुम्हारे इंतजार का।'
लौटते हुए एक संकरी फुटपाथ पर तीन बुजुर्ग बैठे दिखे। उम्र के चौथेपन को चुपचाप गुजरते देखते बुजुर्ग। दो लोगों की उमर 75 से ऊपर , तीसरे नब्बे पार। बताया - 'पल्लेदारी करते थे।' पल्लेदारी मतलब बोझा ढोने का काम। जिस जगह का नाम बताया उसके बन्द होने की सूचना भी दे दी साथ में।
75 पार वालों से हमको बतियाते देख 90 पार वाले बुजुर्ग ने आंखे खोलकर हम देखा। तकलीफ शुदा स्वर में पूछा -'आपको पहचाना नहीं।' पहचानते कैसे -'पहली बार तो मिल रहे थे।'
साथ के लोगों ने बताया -'ऊंचा सुनते हैं।'
हमने ऊंची आवाज में पूछा -'कैसे हाल हैं।'
सुनते ही बुज़ुर्गवार ने अपने हाथ खोलकर , पैर के पंजे दिखाते हुए दास्तान-ए-दर्द बयान करना शुरू किया। पोर-पोर का दर्द दिखाया, सुनाया। सारे दर्द की फोटोग्राफी चेहरे पर भी करते गए। तसल्ली से अपना दर्द बयान करके चुप हो गए। थकान या फिर दर्द के मारे आंख मूंद ली। हम कुछ देर और उनसे बतिया के आगे बढ़ लिए। क्या करते भी। बुजुर्गों के अकेलेपन और दर्द की कहानी सुनने के अलावा फिलहाल कुछ समझ भी नहीं आया।
बगल में ही एक छोटे कमरे में कुछ लोग कैरम खेल रहे थे। कैरम नया लगा, गोटिया पुरानी। कुछ गोटियों को तो देखकर पहचानना कठिन कि काली है या सफेद। एकदम दलबदलू जनप्रतिनिधि सरीखी जिसको देखकर जनता को पता नहीं चलता कि आजकल किस पार्टी के प्रति वफादार है। लेकिन खिलाड़ियों को गोटियों के रंगों का बखूबी अंदाज है। वे उनका रंग पहचानते हैं। वे सही गोटी पर ही निशाना लगा रहे थे। मन किया हम भी हाथ खेलने लगें कैरम लेकिन किसी ने 'लिफ्ट' नहीं दी हम वापस चल दिए।
स्टेशन के पास एक छोटा बच्चा एक छोटी बच्ची को अपनी जेब से निकाल कर चॉकलेट सरीखी कोई चीज खिला रहा था। बहुत प्यारी फोटो बनती अगर ले पाते। लेकिन हम उसको देखने में ही इतना तल्लीन हो गए कि फोटो लेने का ध्यान ही नहीं रहा।
रास्ते में एक बाबा जी अपने चेले के साथ निठल्ले बैठे बतकही में मशगूल थे। बगल की एक बछिया पर हाथ फेरते जा रहे थे। बछिया बाबागिरी के लाइसेंस की तरह लगी मुझे। आज जब हर तरह की नौकरियां छूट रही हैं ऐसे में बाबागिरी की नौकरी ही ऐसी है जो एक बार लगने के बाद कभी छूटती नहीं। इसकी कोई रिटायरमेंट की उम्र भी नहीं होती। शुरुआत हो जाए फिर जिंदगी भर टनाटन आराम।
लौटते समय दीपक फिर मिले। बताया 20-30 सिलिंडर निकाल चुके हैं। 400-600 कमा चुके होंगे। इतने समय में हम सिर्फ साइकिलियाते रहे।
घर के पास बुजुर्ग मिले। अक्सर मिलते हैं। बहुत करुण स्वर में , कभी रोते हुए भी, बताते हैं कि उनका लड़का उनको घर-खर्च नहीं देता। जबकि कानून के अनुसार उसको ऐसा करना चाहिए। कोई कानून की धारा भी बताते हैं जिसके अनुसार उसके खिलाफ कार्यवाही होनीं चाहिए। पता करने पर यह भी मालूम हुआ कि लड़का अपनी मां को खर्च देता है। मिलता है। लेकिन पिता को नहीं देता क्योंकि वो मां के साथ मार-पीट करते हैं। उनके शुरुआती बयान से मैं बहुत द्रवित हो गया। लेकिन किस्से के दूसरे पहलू सुनकर ताज्जुब भी हुआ और अफसोस भी कि आजकल बाप-बेटे के सम्बंध ऐसे हो गए हैं।
आज फिर बेटे के बारे में शिकायत बुजुर्ग ने। मुझे याद आया तो मैंने कहा -'हमें तो पता चला है कि आप अपनी पत्नी से मारपीट करते हैं। इस पर उन्होंने बिना किसी अपराध बोध के दुविधारहित अंदाज में कहा -'मियां-बीबी में आपस में लड़ाई-झगड़ा तो होता ही रहता है।'
सच क्या है मुझे नहीं पता लेकिन हर हफ्ते बुज़ुर्गवार मुझको अपने बेटे के खिलाफ कार्यवाही के लिए उकसाते हैं। कानून की धारा भी बताते हैं। हम फिर से उनको समुचित कार्यवाही का आश्वासन देकर पैडलियाते हुए घर में घुस जाते हैं।

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Saturday, October 03, 2020

परसाई के पंच-60

 

1. हत्या के अपराध में जो राज्य अपराधी को प्राणदण्ड देता है, वही युद्ध में लाखों मनुष्यों को मरवा डालता है।
2. जनवरी में हर समझदार आदमी कैलेण्डर बटोरने में इतना व्यस्त रहता है कि उसे दम मारने की फ़ुरसत नहीं मिलती।
3. आज पुरुषार्थ का लक्षण कैलेण्डर बटोरने के सिवा और कुछ नहीं है। आज हुस्नबानो होती , तो सात सवालों के जबाब न मांगती। वह कहती, ’ए लोगों , जो मुझे अमुक सात कम्पनियों के कैलेण्डर ला देगा, मैं उसी के साथ शादी कर लूंगी।’
4. विशेषज्ञ की बात में कोई दखल नहीं दे सकता। हमने अपनी जिन्दगी ही विशेषज्ञों को सौंप रखी है। विशेषज्ञ पुल बनवा देता है और रेलगाड़ी हमें लेकर गिर पड़ती है। बरसात के पहले विशेषज्ञ इमारत पास कराता है और बरसात के बाद उसका मलबा उठाने का टेण्डर मंगाता है। अस्पताल में जाकर हम अपने को विशेषज्ञ को सौंप देते हैं और फ़िर अपने शरीर पर अपना हक नहीं रहता। राजनीति के विशेषज्ञों के हाथ सारी दुनिया ने अपने प्राण सौंप दिये हैं और वे किसी भी दिन सबके प्राण सहर्ष ले लेंगे। विशेषज्ञ के सामने किसकी चलती है।
5. कभी बादल जोर से गरजते हैं, जैसे खाद्य मन्त्री मुनाफ़ाखोरों को धमकी दे रहे हों। पर पानी न बरसने से गर्मी और बढ जाती है, जैसे खाद्यमन्त्री की हर धमकी के बाद भाव और बढ जाते हैं।
6. अन्धकार में कभी-कभी बिजली चमक उठती है, जैसे किसी रद्दी कविता में एक अच्छी पंक्ति आ गयी हो।
7. हवा के झोंके से वृक्ष इस तरह झुक-झुक पड़ते हैं , जैसे सेक्रेट्री की लड़की की शादी में अफ़सर लोग झुक-झुककर बरातियों को पान दे रहे हों।
8. कटे हुये पेड़ की ठूंठ पर फ़िर एक हरी फ़ुनगी फ़ूट आयी है, जैसे संसद के चुनाव का हारा, म्युनिसिपल चुनाव में खड़ा हो गया हो।
9. स्वेच्छा से विषपान करने में ’नील-कण्ठता’ एक बड़ा आकर्षण है। अपनी कोशिश यह होती है कि जहर कम-से-कम पियें, पर कण्ठ अधिक-से-अधिक नीला हो। और कोई तो गले पर नीली स्याही पोतकर ’नीलकण्ठ’ बने फ़िरते हैं।
10. स्वतंत्रता संग्राम ने कुछ लोगों को निठल्लेपन के संस्कार भी दिये थे। वे मजे में बैठे-बैठे कष्ट भुगतने लगे। लोग कहते,’ वह बेचारा बड़ी तकलीफ़ उठा रहा है।’ वे सुनते; बड़े प्रसन्न होते। ऐसा आनन्द और गर्व अनुभव होने लगा कि यदि कहीं कोई काम-धन्धा मिलता तो भी वे नहीं करते। स्वातन्त्र्य-शूर नौकरी कैसे करे? ’विक्टोरिया क्रास’ वाला किसी सेठ के फ़ाटक पर पुरानी वर्दी में चौकीदारी कैसे करे? कुछ दिनों में घाव भर गये और उन्हें देखने वाले कम हो गये। तब उन्होंने अच्छी नौकरी कर ली।
11. आत्मीय की मृत्यु पर सिर मुंड़ाने के और चाहे जो कारण हों, एक यह तो है ही कि दुख स्पष्ट दिखे और उसे समाज में मान्यता मिले।

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परसाई के पंच-59

1. बड़ी मुसीबत है व्यंग्यकार की। वह अपने पैसे मांगे, तो भी उसे भी व्यंग्य-विनोद में शामिल कर लिया जाता है।
2. तरह-तरह के संघर्ष में तरह-तरह के दुख हैं। एक जीवित रहने का संघर्ष है और एक सम्पन्नता का संघर्ष है। एक न्यूनतम जीवन-स्तर न कर पाने का दुख है, एक पर्याप्त सम्पन्नता न होने का दुख है।
3. जब हम जवान थे, तब यह मान्यता थी कि बड़ों से दबो। अब यह हो गया कि लड़कों से दबो। तो अब हम बुढापे में लड़कों से दब रहे हैं। हमारी जिन्दगी तो दबते हुये गुजर गयी।
4. रिटायर्ड आदमी की बड़ी ट्रेजडी होती है। व्यस्त आदमी को अपना काम करने में जितनी अक्ल की जरूरत पड़ती है, उससे ज्यादा अक्ल बेकार आदमी को समय काटने में लगती है।
5. रिटायर्ड वृद्ध को समय काटना होता है। वह देखता है कि जिन्दगी भर मेरे कारण बहुत कुछ होता रहा है, पर अब मेरे कारण कुछ नहीं होता। वह जीवित संदर्भों से अपने को जोड़ना चाहता है, पर जोड़ नहीं पाता। वह देखता है कि मैं कोई हलचल पैदा नहीं कर पा रहा हूं। छोटी सी तरंग भी मेरे कारण जीवन के इस समुद्र में नहीं उठ रही है।
6. गणित के अध्यापक की यह कमजोरी है। वह दुनिया में किसी को गणित में कमजोर नहीं देख सकता।
7. समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने रिटायर्ड लोगों का क्या करता है। अगर कुछ नहीं करता तो रिटायर्ड वृद्ध काम करते हुये युवा के काम में दखल देगा और समाज की कर्म-शक्ति घटेगी।
8. हमारे सम्पूर्ण हिताहित को , सहज ही सोत्साह हमारी बिना मर्जी के हथिया लेने वाले शुभचिन्तक से बड़ा दुश्मन और कोई नहीं।
9. शुभचिन्तक यदि केवल ’शुभ’ की ’चिन्ता’ की मर्यादा में रहे, तो हम उसे बर्दाश्त कर सकते हैं जैसे हम उस दुश्मन को सह लेते हैं, जो मन में हमें गाली देता है। मगर ’शुभचिन्तक’, ’उपदेशक’ हुये बिना नहीं मानता, क्योंकि वह मानने को कतई तैयार नहीं कि तुम ठीक राह पर चल रहे हो। तुम हिमालय के शिखर पर भी बैठ जाओ, तो भी लगेगा कि तुम किसी गढे में पड़े हो; और यहीं से उसका काम शुरु होता है कि नसीहत की रस्सी डाल-डालकर तुम्हें उस गढे से बाहर खींचे या रस्सी की फ़ांसी लगा दे!
10. विधाता जब मनुष्य को बनाकर दुनिया में भेजने लगता है, तो उसके कान के पास मुंह लगाकर धीरे से कह देता है कि देश , दुनिया में सबसे अधिक अक्ल मैंने तुझी को दी है। हर एक से विधाता यही कह देता है और इसीलिये हर आदमी जन्म से ही उपदेशक हो जाता है।
11. अक्षमता नैतिक उपदेश की जननी होती है।

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परसाई के पंच-58

 

1. निन्दा में अगर उत्साह न दिखाओ, तो करने वालों को जूता-सा लगता है।
2. कुछ मैंने ऐसे देखे हैं, जो होश में मानवीय हो ही नहीं सकते। मानवीयता उन पर रम के ’किक’ की तरह चढती-उतरती है। इन्हें मानवीयता के ’फ़िट’ आते हैं –मिरगी की तरह। सुना है कि मिरगी जूता सुंघाने से उतर जाती है। इसका उल्टा भी होता है। किसी-किसी को जूता सुंघाने से मानवीयता का फ़िट भी आ जाता है।
3. लोग समझते हैं कि हम खिड़की हवा और रोशनी के लिये बनवाते हैं मगर वास्तव में खिड़की झांकने के लिये होती है।
4. कितने लोग हैं जो ’चरित्रहीन’ होने की साध मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ’चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं। आत्मा को परलोक में भी चैन नहीं मिलती होगी और पृथ्वी पर लोगों के घरों में झांककर देखती होगी कि किसका किससे सम्बन्ध चल रहा है।
5. हर साल ऐसा होता है –जनवरी में दीवार पर चमकीली तसवीरों का एक कलेण्डर टंग जाता है और दिसम्बर तक तसवीर की चमक उड़ जाती है। हर तसवीर बारह महीनों में बदरंग हो जाती है।
6. अफ़सर के इतने बड़े मकान बन जाते हैं कि वह राष्ट्रपति को किराये पर देखने का हौसला रखता है।
7. सुभाष बाबू ने कहा था –’तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ खून तो हमने दे दिया, मगर आजादी किन्हें दे दी गयी।
8. देश एक कतार में बदल गया है। चलती-फ़िरती कतार है- कभी चावल की दूकान पर खड़ी होती है, फ़िर सरककर शक्कर की दूकान पर चली जाती है। आधी जिन्दगी कतार में खड़े-खड़े बीत रही है।
9. छोटा आदमी हमेशा भीड़ से कतराता है। एक तो उसे अपने वैशिष्ट्य के लोप हो जाने का डर रहता है, दूसरे कुचल जाने का। जो छोटा है और अपनी विशिष्टता को हमेशा उजागर रखना चाहता है, उसे सचमुच भीड़ में नहीं घुसना चाहिये। लघुता को बहुत लोग इस गौरव के साथ धारण करते हैं, जैसे छोटे होने के लिये उन्हें बड़ी तपस्या करनी पड़ी है। उन्हें भीड़ में खो जाने का डर रहता है।
10. इस देश में कुछ लोग टैक्स की बीमारी से मरते हैं और काफ़ी लोग भुखमरी से।
11. टैक्स की बीमारी की विशेषता यह है कि जिसे लग जाये वह कहता है –हाय हम टैक्स से मर रहे हैं। और जिसे न लगे वह कहता है –हाय हमें टैक्स की बीमारी ही नहीं लगती। कितने लोग हैं जिनकी महत्वाकांक्षा होती है कि वे टैक्स की बीमारी से मरें, पर मर जाते हैं निमोनिया से।

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