Monday, November 09, 2020

परसाई के पंच-99

 

1. ’बिग पावर’ का यह कर्तव्य है कि वह कहीं शान्ति न रहने दे। सब डर के साये में जिन्दा रहें।
2. हर मिशन एक खूबसूरत धोखा होता है।
3. राजनीति में सबकुछ होता है। आपस में तय करके भी लड़ाई होती है।
4. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं , जिनका हृदय तलुवे में होता है। वे हृदय को कुचलते हुये चलते हैं।
5. क्रान्ति और भ्रान्ति में थोड़ा-सा अन्तर होता है। कभी-कभी भ्रान्ति को भी क्रान्ति समझ लिया जाता है।
6. सन्त एक नैतिकता अपने लिये रखता है, दूसरी दूसरों के लिए।
7. शीर्षासन का राजनीतिक फ़ायदा यह है कि इसमें हर चीज उलटी दिखती है। और सफ़ल राजनीति के लिये चीजें उलटी दिखना जरूरी है।
8. आम कवि सम्मेलनों में या तो गाना जमता है, या गाली, क्योंकि ये दोनों सहज ही समझ आते हैं; इन दोनों के परे जो कविता नाम की चीज है, वह अगर सुनायी जाये, तो कवि को हूट कर दिया जायेगा।
9. विज्ञापनबाजों ने जिस तरह नारी का उपयोग किया है, उसी तरह हमारे कुछ कवि कर रहे हैं। नारीछाप साबुन और नारीछाप कविता- एक ही टाइप है।
10. कवि पर जिम्मेदारी है कि वह जन-रुचि का परिष्कार करे। यह कहना गलत है कि जनता समझती नहीं है। हम ही जनता को नहीं समझते। हमने अपने ऊपर नट, गायक और मेमने का ’रोल’ ले लिया है।
11. हमारी आधी कविता का स्रोत तो यह है कि ’उसका’ पिता उसे हमसे मिलने नहीं देता –इसलिये हम घुट रहे हैं ! और आधी का विषय है, उस न मिल सकने वाली के सलमासितारे ! बस प्रेम-गीत हो गया। नर भी प्रसन्न, नारी भी प्रसन्न ! ताली, ’वंसमोर’ और फ़िर एक प्याला काव्य-वारुणी !

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परसाई के पंच-98

 1. धर्म वह है, जिसका पालन धनी-गरीब सब कर सकें, जो बड़े और छोटे सबके लिये सुलभ हो।

2. विचार को निर्बाध गति से प्रकट होने देना चाहिये। विचार जब लुप्त हो जाता है, या विचार प्रकट करने में बाधा होती है या किसी के विरोधी विचार से भय लगने लगता है, तब तर्क का स्थान हुल्लड़ या गुण्डागर्दी ले लेती है।
3. यह कैसी रिश्तेदारी या मित्रता है कि अपने आदमी को गलत करते देखकर भी उसे चेताया न जाय। यह तो इसी तरह हुआ कि कोई खन्दक में गिरा जा रहा है और उसका मित्र दूर खड़ा देख रहा है। उससे पूछा कि क्यों भाई, तू उसे क्यों नहीं रोकता? तो वह कहता है –’जरा आपसी मामला है; रिश्तेदारी है, वे बुरा मान जायेंगे। गिर ही जाने दो।’
4. समाज में वह शक्ति आनी चाहिये कि सामाजिक, मिथ्यावाद, असामाजिक कृत्य और समाज के लिये हानिकर कर्मों का विरोध कर सकें।
5. जिस धर्म के पालन में लाख रुपये लगें, वह धर्म नहीं है, धन्धा होगा।
6. पाखण्ड विशेष धर्म में ही नहीं है, सबमें हो रहे हैं।
7. इस देश में ऐसा ही होता आया है –बड़े से बड़े मस्तिष्क को राजसत्ता खरीदती रही है। द्रोणाचार्य-सरीखे शस्त्र और शास्त्र मर्मज्ञ को दुर्योधन ने ऐसा खरीदा कि महाभारत में द्रोणाचार्य दुर्योधन की ओर से लड़े –यह जानते हुये कि उसका पक्ष अन्याय का पक्ष है।
8. अन्याय के विरुद्ध जिसकी आवाज बुलन्द नहीं होती वह लेखक या कलाकार नहीं बन सकता।
9. अमेरिकी बड़ा विचित्र आदमी होता है। वह भीतरी शान्ति, व्यक्तिगत शान्ति तो चाहता है पर बाहर सरकार को अशान्ति फ़ैलाने देता है।
10. बेशर्म की नाक इस्पात की बनी होती है।
11. सच्ची दोस्ती वही है, जब दोस्त एक-दूसरे को बेवकूफ़ बनायें।

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Saturday, November 07, 2020

परसाई के पंच-97

 

1. न्याय के दो रूप होते हैं – एक दूसरे के लिये;दूसरा अपने लिये।
2. एक झूठ होता है; एक सफ़ेद झूठ और एक अखबारी झूठ। हमारे तमाम अखबार समाज को झूठ तक बेचते हैं। सत्य की कीमत लें तो एक बात है, पर झूठ तक को खरीदकर पढ़ते हैं लोग।
3. दुनिया में निर्दोष की बलि होती है। तुम्हारे यहां बकरे की बलि होती रही है, देवताओं की प्रसन्नता के लिये। किसी देवता की हिम्मत सिंह की बलि मांगने की नहीं होती। सिंह की बलि देने का प्रयास करने पर बलि-कर्ता भक्त की ही बलि हो जाये, इसलिये मिमियाने वाले बकरे की बलि।
4. सब धर्माचार्यों को उनके भक्तों ने ही कलंकित किया है। सनातनधर्मी कभी बौद्धों के सिर काटते थे। फ़िर बौद्धराज्य हुए तो सनातनधर्मियों के मस्तक उतरने लगे। इसाई धर्मवाले हिरोशिमा में बम पटकते हैं और ओमान में नरसंहार करते हैं। इस्लामवाले काश्मीर में लूट, अगजनी, हत्या करते हैं। जैन धर्मवाले पानी छानकर पीते हैं, मगर खुले बाजार में आदमी का खून बगैर छना पी जाते हैं।
5. धार्मिक दंगों में जो लड़ते हैं; वे क्या भक्त होते हैं? उनको धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है। ईश्वर को वे कुछ नहीं समझते। वे ऐसे होते हैं जो किसी भी धर्म के लिये कलंक होते हैं- गुण्डे,हुल्लड़बाज, लुटेरे ! झगड़ा हो जाने से लूट का सुभीता मिलता है।
6. यहां नेता केवल चुनाव में सक्रिय होता है और अफ़सर केवल लाठी और गोली चलाने पहुंचते हैं।
7. नेता की बात कोई मानता नहीं है, क्योंकि आम आदमी का उनमें विश्वास नहीं है।
8. चुनाव के सिवा नेता किसी के पास नहीं जाता। समाज की दैनिक समस्याओं की ओर नेता का ध्यान नहीं जाता।
9. अफ़सर का जनता से सम्बन्ध केवल डिग्री, समन, लाठी और गोली के मार्फ़त होता है।
10. जिस समाज के तरुणवर्ग में घुटन होती है वह समाज पतित होता जाता है, क्योंकि घुटन विकृतियों की निशानी है, उससे मानसिक रुग्णता आती है और समस्त जाति का स्वास्थ्य बिगड़ता है।
11. प्रेम की प्रेरणा से कर्म में सौन्दर्य और कुशलता आती है, पर कर्महीन प्रेम अत्यन्त पतनशील और घिनौना होता है।

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परसाई के पंच-96

 

1. फ़ासिस्ट संगठन की विशेषता होती है कि दिमाग सिर्फ़ नेता के पास होता है, बाकी सब कार्यकर्ताओं के पास सिर्फ़ शरीर होता है।
2. किसी प्रधानमंत्री को बेटा रखने का शौक नहीं करना चाहिये। यह बड़ा खर्चीला शौक है। एक तरह की ऐयाशी है। संविधान में संशोधन हो कि सन्तानहीन ही प्रधानमंत्री हो सकता है, क्योंकि बेटा मिटाऊ होता है।
3. सत्य एक लचीली बेल की तरह है। बेल अपने आप तो चढ़ नहीं सकती। तो वह मिथ्या के खम्भे के सहारे चढ़ती।
4. यहां मिनिस्टर हौआ होता है। साधारण जन नहीं अखबारनवीस तक उसे देवता समझते हैं – कि वे उससे दूर , नीचे बैठते हैं, उसे ’हीरो’ बना डालते हैं और जब अगर वह कोई काम उनके साथ करता है, या उनके साथ मिलकर करता है तो वे उसकी जय बोलते हैं। यह संकेत है प्रजातंत्र की असफ़लता का।
5. प्रजातन्त्र में अखबारनवीस अभिभूत हुये कि प्रजातन्त्र गया।
6. अखबार मंत्रियों के अभिनय, उछलकूद सबको खूब छापकर उन्हें ’हीरो’ बनाते रहते हैं। आम जनता इनसे बेवकूफ़ बनती है। वह ’हीरो’ की जय बोलती है, उसकी कमी की ओर नहीं देखती।
7. अखबारनवीस प्रजातन्त्र का ’वाचडॉग’ होता है। वह रखवाली करता है, दुम नहीं हिलाता।
8. यहां तो ’मिडलची’ अखबार निकलते हैं, 420 के उस्ताद अखबार निकलते हैं, 10-5 में बिक जाने वाले अखबार निकलते हैं। दन्तनिपोर , घोंघाबसन्त, पोंगानाथ आदि-आदि- हर कोई अखबारनवीस बन जाते हैं।
9. दकियानूसी मार्क्सवादी उतना ही खतरनाक होता है जितना बुर्जुआ।
10. अफ़सर और राज्य एक ही वस्तु है। अफ़सर राज्य के लिये और राज्य अफ़सर के लिये। अफ़सर अपने माल और राज्य के माल में कोई भेद नहीं करता –अद्वैत इसी को कहते हैं।
11. अफ़सर के यहां की शादी ’स्टेट वेडिंग’ होती है। जैसे मन्त्री की शवयात्रा ’स्टेट फ़्यूनरल’ होती है। ऐसा इसलिये होता है कि जब जनम-जनम के पुण्य़ उदय होते हैं, तब आदमी अफ़सर के यहां जन्म लेता है।

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Thursday, November 05, 2020

परसाई के पंच-95

 1. अब छात्र अपने गुरु की सारी कमजोरियां जानते हैं, इसलिये स्वाभाविक है कि जो अध्यापक जैसा होगा उसकी इज्जत वैसी ही होगी।

2. हर क्षेत्र में गैरजिम्मेदारी आ गयी है और बिना काम किये पैसा पाने की प्रवृत्ति बढी है, वैसी ही शिक्षा के क्षेत्र में आ गयी है।
3. साल भर सांप दिखे तो उसे भगाते हैं। मारते हैं। मगर नागपंचमी को सांप की तलाश होती है, दूध पिलाने के लिये और पूजा करने के लिये। सांप की तरह ही शिक्षक दिवस पर रिटायर्ड शिक्षक की तलाश होती है, सम्मान करने के लिये।
4. शिक्षक दिवस तो इसलिये चल रहा है जबरदस्ती कि डॉ राधाकृष्णन राष्ट्रपति रहे। अगर वे सिर्फ़ महान अध्यापक मात्र रहते, तो शिक्षक दिवस नहीं मनाया जाता।
5. जिस अवस्था में बेईमानी को उत्तम गुण मान लिया गया हो, उसमें आचार्य वृहस्पति भी किसी को ईमानदार नहीं बना सकते। 5 सितम्बर शिक्षकों का अपमान दिवस है। झूठ है। पाखण्ड है। गरीब अध्यापक का उपहास है। प्रहसन है। वेतन ठीक नहीं देंगे। सुभीते नहीं देंगे। सम्मान करके उल्लू बनायेंगे। यह शिक्षक दिवस उपहास दिवस है। इस देश के शिक्षकों को 5 सितम्बर को सम्मान कराने से इन्कार कर देना चाहिये।
6. यह नाटक जो जनता को प्रभावित करने के लिये किया जा रहा है, उस पर जनता हंस रही है। जिस पर जनता हंसती है उसे अगर वोट देती होती, तो दुनिया में कई जोकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हो जाते।
7. सच्चा परोपकारी वह होता है जो अपना नुकसान करके भी दूसरों की मदद करता है।
8. दिमाग खराब होने पर कोई आदमी अपने को कभी बहादुर समझने लगता है।
9. सत्य की साधना में असत्य के घर जाना पड़ता है।
10. भगवान की भक्ति से डाकू तक सन्त हो जाते हैं।
11. कुकर्मों का एक खाता बन्द करके नया खाता खोलना ही संन्यास है।

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Wednesday, November 04, 2020

परसाई के पंच-94

 

1. पति पत्नी द्वारा प्रताड़ित होते हैं, तनखा को लेकर। कम तनखा लेने वाले पति पत्नी द्वारा जब-तब प्रताड़ित किये जाते हैं। जो पति वेतन के दिन कलारी होते हुये आते हैं वे भी पिटते हैं।
2. पति के प्रताड़ित होने के कारण और भी हैं। कोई पति इसलिये प्रताड़ित होता है कि उसकी स्टेनो सुन्दरी है। दूसरे की बीबी की तारीफ़ करने वाले भी प्रताड़ित होते हैं।
3. जाति और धर्म की सेवा हिसाब से करनी चाहिये। हिसाब से ज्यादा धर्म हो जाय, तो धन हाथ से निकलने लगता है।
4. जाति और धर्म की सेवा अगर ज्यादा हो जाय, तो धन नाश होता है। राजा हरिशचन्द्र ने धर्म सीमा से बाहर निभा दिया, तो चाण्डाल के घर नौकरी करनी पड़ी। राज गया, धन गया।
5. भ्रष्टाचार अगर अपने हाथ से हो तो वह प्रजा के लिये हितकारी है। दूसरे के हाथ से भ्रष्टाचार हो तो वह प्रजा के लिये दुखदायी है।
6. जनता इन्हीं से अपनी रक्षा चाहती है, जो जनता की रक्षा के लिये रैली निकाल रहे हैं।
7. दिशाहीन और विचारधारा हीन और सिद्धान्तहीन राजनीति जिन्दगी भर करने के कारण ये बूढ़े नेता इस सद्गति को प्राप्त हुये हैं कि कल राजनीति में आये फ़िल्मी हीरो इन्हें बन्दर की तरह नचाते हैं।
8. लोकतंत्र में जब सामन्तवाद जैसी ताकत शासक को मिल जाय, तब वह नवाब या महाराणा हो ही जायेगा।
9. पूरे मध्य और उत्तर भारत में छात्र-नेता को गुण्डा और अपराधकर्मी होना ही पड़ेगा। वह होता है। अगर वह गुण्डा और अपराधकर्मी न हो तो नेतागिरी नहीं कर सकता।
10. दक्षिण भारत में या बंगाल में वह छात्र-नेता होता है, जो फ़र्स्ट क्लास होता है, अध्ययनशील होता है, जिसका व्यक्तित्व प्रभावशाली और उद्दात होता है, जिसका आदर छात्र और अध्यापक करते हैं। अपने यहां नेता वह होता है, जो पढ़ता ही नहीं। मूर्ख होता है। आतंकवादी होता है। छुरा रखता है, गुण्डों का गिरोह रखता है। यह आदर्श छात्र-नेता होता है।
11. छात्र अपने को विशेषाधिकार प्राप्त ’वर्ग’ कहते हैं। छात्र ’वर्ग’ नहीं है, भीड़ है। बस-ड्राइवर और कण्डक्टर और तमाम श्रमजीवी ’वर्ग’ है। अगर छात्र ’वर्ग’ होता और श्रमिक ’वर्ग’ से मिलकर वर्ग-संघर्ष करता, तो देश में क्रान्ति हो गयी होती। मगर सबसे बड़ी क्रान्ति विरोधी शक्ति कोई है तो यह अपनी छात्र शक्ति ही है। इनकी क्रान्ति की परिभाषा है –छात्रों, अध्यापकों को आतंकित करना, हुल्लड़ करना, मुफ़्त की शराब पीना, होटलों में मुफ़्त में खाना और होटलवाले से मारपीट करना।

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परसाई के पंच-93

 

1. जो जाति जितनी प्राचीन होती है, उसके आदमखोरी संस्कार भी उतने ही गहरे होते हैं।
2. हम दुनिया के प्राचीन आदमखोर हैं। हमारे शिकारी बन्दूक लेकर जंगल में आदमखोर बाघ को ढूंढते फ़िरते हैं और इधर हम बेहिचक आदमी को खाते रहते हैं। हरिजन स्त्री और बच्चे को आग में झोंक देते हैं। दहेज कम लाने वाले बहू का गला घोंट देते हैं।
3. गैरकानूनी शराब- मिलावटी शराब, जहरीली शराब का उत्पादन और बिक्री यज्ञ-जैसा अनुष्ठान है, जिसमें कई पुरोहित स्वाहा बोलते हैं। हाथ भट्टीवाला, ठेकेदार, मिलावट करने वाला, आबकारी दरोगा, पुलिस अफ़सर, स्थानीय नेता, विधायक, स्थानीय’दादा’ ये सब इस अनुष्ठान में लगे होते हैं। जहरीली शराब बनाने वाले और बेचनेवाले की ये लोग रक्षा करते हैं।
4. अमेरिका और सब मामलों में चाहे भारत और पाकिस्तान में भेद करता हो, पाक को चाहता हो और भारत को नहीं, मगर एक बात में दोनों को बराबर मानता है। एक चीज है जो अमेरिका भारत और पाकिस्तान दोनों को बराबर देता है और वह चीज है –बेकारी।
5. सारे पिछड़े कहलाने वाले देश सम्पन्न गोरे और साम्राज्यवाद की नजर में बराबर हैं।
6. प्रेम धर्म के खिलाफ़ है। प्रेम करना धर्म के हिसाब से गुनाह है।
7. सम्पन्नता अपने को प्रगट किये बिना नहीं मानती और सम्पन्नता दिखाने का सबसे लोकप्रिय तरीका है, सोना दिखाना।
8. जो चोरी-तस्करी में लगा होता है, और पुलिस से परेशान रहता है, वह संन्यासी हो जाता है।
9. भक्ति, वीरता और सेक्स की मिली-जुली मानसिकता फ़िल्मी हीरो को नेता, उद्धारक और पथ-प्रदर्शक बना देती है।
10. भारत की राजनैतिक हालत बड़ी डांवाडोल मानी जाती है। सभी चिन्तित हैं। इतनी पार्टियां हैं। विचारधारायें हैं। कार्यक्रम हैं। योजनायें हैं। खर्चीले संगठन हैं। कौन का किससे गठबंधन हो जायेगा, कुछ ठीक नहीं।
11. दिल्ली में कोई वधू जलकर मरी कि प्रदर्शनों का तांता लग जाता है। इन प्रदर्शनों में ज्यादातर वे महिलायें शामिल होती हैं, जो प्रौढा होती हैं और तीसरे पहर के आलस को नारे में भुलाना चाहती हैं। अगर प्रौढायें तीसरे पहर न ऊबें तो कोई प्रदर्शन नारियों के पक्ष में न हो।

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Tuesday, November 03, 2020

तख्त-ए- हज्जाम और किराये पर साइकिल की दुकान

 


इधर-उधर टहलते हुए स्टेशन की तरफ बढ़ गए। एक शटर बन्द दुकान के बाहर एक हज्जाम अपना सैलून सजा रहे थे। लकड़ी की कुर्सी। कटोरी में पानी। साबुन और दीगर हिसाब। सुबह हो गयी। दुकान सज गयी।
हमारे देखते-देखते एक ग्राहक आकर बैठ गए - तख्त-ए-हज्जाम पर। ग्राहक खुदा का नूर होता है। ग्राहक भगवान होता है। हज्जाम जी ग्राहक को कुर्सी पर बैठाकर साबुन लगाने लगे।
दुकान के सामने फुटपाथ पर सैलून है। दुकान खुलने पर कैसे चलता है ? - हमने पूछा।
दुकान बंद रहती है। खुलती नहीं। एक दुकान बंद होने पर उसके सामने दूसरी दुकान खुल जाती है। दुकानों का सिलसिला चलता रहता है। यह बात हर तरह की दुकान पर लागू होती है -हज्जाम की हो या बजाजे की। धर्म, राजनीति की दूकानों पर भी यह बात लागू होती है। समय के साथ पुरानी दुकान बढ़ जाती है, नई खुल जाती है।
कित्ते पैसे में हजामत बन जाती है? -चलते-चलते बेवकूफी का सवाल पूछ लिया मैंने।
"सब टोले-मोहल्ले के लोग हैं। अपने-अपने हिसाब से दे देते हैं। कोई दस, कोई बीस।" -कुर्सी पर बैठे ग्राहक ने बताया।
आज के समय में भी टोले-मोहल्ले की बात कहने वाले हैं।
आगे गली में एक जगह खूब सारी साइकल इकट्ठा थीं। हमारे देखते-देखते एक आदमी ने एक साइकिल की गद्दी पर हाथ मारकर साइकिल की सुस्ती झाड़ी। नाम और समय लिखाया और उचककर गद्दीनसीन होकर चला गया।
पता चला यह किराए की साइकिल का ठीहा है। 20 रुपये रोज पर किराए की साइकिल मिलती है। महीने की 600 रुपये। हमको कालेज के दिन का किराया याद आया। 30 पैसे घण्टे साइकिल मिलती थी किराये पर। आठ घण्टे के 2रुपये 40 पैसे हुए। 39-40 साल पहले की बात। मतलब साइकिल का किराया लगभग दस गुना बढ़ा है।
अंदर दुकान में तमाम साइकल अपने किराये पर जाने के इंतजार में जमा थीं। गुमसुम सी साइकिलें। मन किया कि सब साइकिलों को एक साइकिल सवार मुहैया करा दें। साइकलें चहकती हुई अपने सवार के साथ टुनटुनाती हुई सड़क पर मस्ती करें। लेकिन मन करने से क्या होता है?
मन की बात को वहीं स्थगित मतलब विर्सजित करके हम अपनी साइकिल स्टार्ट करके चल दिये।

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Monday, November 02, 2020

मुंह छिपाता देश का भविष्य

 

शाम टहलने निकले। सूरज भाई अपनी किरणों का शटर गिराकर आरामफ़रमा हो गए थे। बिजली के लट्टू जगह-जगह जल गए थे। हवा कुछ और ठंढा गयी थी। शाम के धुंधलके ने ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी।
एक नुक्कड़ पर इडली डोसे की दुकान दिखी। डोसा तवे पर अकेले लेटा था। ऐसे जैसे उसको कोरोना हो गया हो और वह आइसोलेशन में हो। अकेले लेटे-लेटे अकड़ गया था। डोसे के पेट के आलू ठंडे हो गए होंगे।
'अब इसको गाय को खिला देंगे' - ठेलिया वाले ने कहा।
नई दुकान खुली है। शुरुआत में बिक्री कम है। सड़क से थोड़ा दूर है। दिखती भी नहीं। बल्ब भी धीमा। शाम से चार डोसे बिके। पांचवा ठंडा हो गया। दस-पन्द्रह डोसे से शुरू किया गया है काम। इतने का ही सामान तैयार किया गया। क्योंकि अगले दिन खराब हो जाता है।
दुकान पर काम करता लड़का दिल्ली में सिलाई का काम करता था। लाकडाउन में काम बंद हो गया। घर आ गया। वहां 500 रुपये रोज उठाता था। यहाँ दो सौ मुश्किल से जुटते हैं। इसीलिए शाम को ठेला लगा लेता है। क्या पता चल ही जाए काम।
आगे तिराहे पर पुलिस तैनात थी। देखकर हम डरे। पुलिस को देखकर हमेशा डर लगता है। क्या पता किस बात पर ठोंक दे। हेलमेट क्यों नहीं पहने, लाइसेंस दिखाओ, मास्क ठीक से क्यों नहीं पहने। कुछ भी हो सकता है। मन में सोचा भी कि टोंकेगा कोई तो फोन करेंगे एस. पी. साहब को। हमारे परिचित हैं। कालेज सीनियर होने के नाते सर कहते हैं। इसके बावजूद डर गया नहीं मन की जमीन खाली करके। भू-माफिया की तरह मन में ही बना रहा। लेकिन संयोग कि किसी ने टोंका नहीं। सिपाही जी किनारे खड़े होकर दिहाड़ी वालों से कुछ गुफ्तगू और उससे भी ज्यादा शायद कुछ आदान-प्रदान कर रहे थे। हम सफलता पूर्वक तिराहा पार कर गए।
पुल पर एक आदमी सिगरेट पी रहा था। गंदे कपड़े पहने। सिगरेट क्या मोटा सिगार टाइप था कुछ। हमने मन में सोचा कि कोई ऊंचा नशा कर रहा होगा। हम लोग इसी तरह सोंचते हैं। गरीब आदमी के बारे में खराब धारणा बनाकर ही शुरू होते हैं। हमने मन को डपट दिया। बिना पुष्ट प्रमाण के कोई बात मत बताओ। यह हरकत दफ्तरों के बाबुओं, अफसरों पर ही जँचती है अपने कामचोरी के बड़े छेद अनदेखे करते हुए दूसरे के सूराखों पर सर्च लाइट मारते रहते हैं।
पुल पार सड़क पर रजाई गद्दे की दुकानें खुली थीं। सर्दी के मुकाबले के लिए हथियार तैयार हो रहे थे। रजाई-गद्दे , जाड़े के दुश्मन से मुकाबले के लिए बनाये गए, बंकर होते हैं जिनमें छिपकर इंसान अपने को महफूज समझता है।
लौटकर एक पेड़ के नीचे कुछ मोटर साइकिल सवार दिखे। पता चला वे खाना डिलीवर करने का काम करते हैं। मोबाइल पर आर्डर आता है डिलीवरी का। उसको होटल से लेकर ग्राहक तक डिलीवर करते हैं। डिलीवरी पर पैसा खाते में आ जाता है।
कैसे काम होता यह जानने के लिए पूछताछ की तो उसी समय एक बच्चे के मोबाइल में डिलीवरी आर्डर आ गया। उसने मुझे मोबाइल दिखाया। पास के होटल से पांच किलोमीटर दूर एक जगह खाना देना था। 30 रुपये मिलने थे। पेट्रोल का खर्च अलग। उसने मेरे सामने आर्डर लिया और चला गया।
40-50 बच्चे लगे हैं इस काम में। 400-500 रुपये तक कमा लेते हैं। कोई भविष्य नहीं। लेकिन कुछ नहीं तो यही सही।
एक लड़का और आया धड़धड़ाते हुए। 50 रुपये की डिलीवरी करके आया था। बगल वाले ने बताया सीनियर है। बड़ी डिलीवरी ही लेता है। मेरे सामने उसके पास 20 रुपये की डिलीवरी का आर्डर आया। उसने मना कर दिया। आर्डर उछलकर बगल वाले के मोबाइल में आ गिरा। उसने किक मारकर मोटर साइकिल स्टार्ट की और चल दिया।
डिलीवरी ब्वॉय से उनके धंधे की बात की तो उसने सामने खेलते बच्चों की तरफ इशारा करते हुए कहा -'देखिये वो सामने देश का भविष्य बर्बाद हो रहा हो रहा है।'
सड़क पर चार छोटे-बच्चे, तीन लड़के - एक लड़की, सिक्के उछालते हुए चित-पट खेल रहे थे। उनके हथेलियों में बहुत सिक्के थे। हमको देखकर बिना पूछे सफाई देने लगे -'ऐसे ही खेल रहे हैं। जीत-हार के बाद सब पैसे वापस कर देंगे।' सबसे ज्यादा पैसे बच्ची ने जीते थे।
हमने पूछा -'पैसे का खेल तो जुआ होता है।'
वो बोले-'जुआ नहीं है। हम लोग भाई-बहन हैं।'
हमने सोचा -'महाभारत का जुआ तो भाई लोगों के बीच ही तो हुआ था।'
बच्चे स्टेशन के पास मतलब कम से कम एक किलोमीटर दूर रहते थे। उनके घरवालों को शायद पता भी न हो कि बच्चे कहां , क्या खेल रहे हैं।
फोटो खींचने पर बच्चों ने मुंह छिपा लिए। हमने कहा -'मुंह छिपा रहे हो इसका मतलब तुमको पता है गलत काम कर रहे हो।'
बच्चे मेरी बात का जबाब दिए बिना भाग गए। हम लौट आये। पलटकर देखा तो बच्चे फिर खेलने में जुट गए थे।
यही बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं।

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परसाई के पंच-92

 

1. सरकारी आदमी जहां प्रोबेशन पर होता है वहां अपन मकान बनवाना शुरु नहीं करता।
2. अलग-अलग रँडापा भोगते जब दस रँडुए इकट्ठे होते हैं तो वे सब अपने को बीबी वाले समझते हैं।
3. शोभा-यात्रा उनकी निकलती है जो भभूत रमाने वाले शिव के पत्थर के लिंग पर सोना मढ़ते हैं। शोभा यात्रा उनकी निकलती है जो दसवीं शताब्दी के बाद दुनिया में क्या हुआ, यह नहीं जानते और आधुनिक समाज को उपदेश देते हैं।
4. यश का उन्माद बहुत बुरा होता है। नार्मल यशोकामना रहे और नार्मल तरीके से यश मिले तो ठीक है। सब यश चाहते हैं। मगर कुछ लोग ज्यादा उस्ताद होते हैं। वे जानते हैं कि साधारण तरीके से हमारी सीमित यश फ़ैलेगा। इसलिये वे ऐसे तरीके अपनाते हैं, जिनसे उनकी हंसी उड़े। उपहास प्रसंशा से ज्यादा फ़ैलता है और नगर-नगर, गांव-गांव लोग चर्चा करते हैं कि उसने ऐसा किया।
5. राजनैतिक दोमुंहापन कोई बुरी बात नहीं मानी जाती।
6. हर गुरु का यह दुर्भाग्य है कि उसके सच्चे चेले बननेवाले बन्दर उसकी लंगोटी उड़ाकर उसे नंगा कर देते हैं।
7. एक धर्म हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों से बड़ा होता है- वह है काले धन्धे का धर्म।
8. शराबबन्दी का शुभ परिणाम यह होता है कि अवैध शराब का धन्धा चलता है। ब्लैक में शराब मिलती है। शराबबन्दी के क्षेत्र में शराब ज्यादा आसानी से मिलती है, खुले क्षेत्र की अपेक्षा।
9. धर्म कोई भी हो, भगवान या खुदा का निवास काले धन की तिजोड़ी में और गैरकानूनी शराब की बोतल में रहता है। भगवान क्षीर सागर में नहीं, गैरकानूनी मदिरा सागर में विश्राम करते हैं।
10. कबीरदास हिन्दू और मुसलमान दोनों के ढोंग की पिटाई करते थे। मरने के बाद ढोंगियों ने कबीरदास के सत्य की पिटाई कर दी। सत्य को हिन्दू और मुसलमान दो टुकड़ों में तोड़कर समाधि और मजार में गाड़ दिया। बीच में दीवार खड़ी कर दी अपनी मूर्खता के ईंट-गारे से।
11. कोई भी विभाग हो, कोई अकेला पैसा नहीं खाता। खा ले तो संग्रहणी हो जाये। महामानवों की श्रंखला खाती है।

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Sunday, November 01, 2020

परसाई के पंच-91

 

1. असल में हमारी जाति मुर्दे को अरसे तक चिपकाये रहती है। रूढि को छोड़ने में बहुत समय लेती है और बरबाद होती है।
2. सबसे सुभीते की शादी तो अदालती होती है। मगर अदालती शादी सिर्फ़ घर से भागे लड़के-लड़की करते हैं। उधर लड़की का बाप पुलिस में रिपोर्ट कराता है, इधर दूर किसी शहर में लड़के-लड़की अदालत में मैरिज सर्टिफ़िकेट लेते हैं।
3. सामन्ती युग में बारात, याने फ़ौज होती थी। युद्ध करके कन्या प्राप्त की जाती थी और उस घर की सम्पत्ति लूटी जाती थी। यह बड़े-बड़े सामन्त करते थे। पर उनकी नकल साधारण आदमी भी करने लगे। दूल्हा घोड़े पर बैठा है, बगल में तलवार है, बाराती हमलावर की तरह व्यवहार करते हैं। लड़की के घर को शत्रु राज्य मानते हैं। दूल्हा घड़ा फ़ोड़ता है, तलवार से रस्सी काटता है। दहेज के रूप में लूट का माल और लड़की लेकर बारात लौट जाती है।
4. विवाह योग्य लड़का एक जरूरी जिन्स, माल हो गया जो लड़की के लिये पति के रूप में जरूरी है। जाति, उपजाति के कारण ’वर’ नाम की चीज की सप्लाई सीमित हो गयी तो मुनाफ़ाखोरी और कालाबाजारी चालू हो गयी।
5. घर में रोशनी के लिये तेल हर हालत में जरूरी है, जो ब्लैक में किसी भी कीमत पर खरीदा जायेगा। लड़की के लिये पति जरूरी है, वह चाहे किसी भी कीमत पर ब्लैक में मिले। यह कीमत ’दहेज’ हुई।
6. आगे तो पति की बिक्री के लिये टेण्डर मंगाये जायेंगे या मवेशी बाजार की तरह वरों के बाजार भरेंगे। जैसे बछड़े के दांत देखते हैं वैसे लड़के का वेतन पूछा जायेगा। बछड़ों की तरह नीलामी होगी लड़कों की। हर क्षेत्र में जब हराम का पैसा न्यायपूर्ण अधिकार हो गया है, तो विवाह के मामले में भी बिना कमाया यह हराम का दहेज लिया जाता है। यह अभी चलेगा। यह पूंजीवाद की एक रस्म है।
7. सच्चा सन्त वह होता है जो किसी को चैन न लेने दे।
8. राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री या मुख्यमन्त्री का ’कुटी’ में रहना सादगी और त्याग का एक घोर मूर्खतापूर्ण दिखावा है। आपको लोगों ने मुख्यमन्त्री बनकर काम करने के लिये चुना है कि कुटी में रहकर साधुपना करने के लिये। कुटी में रहकर मुख्यमंत्री तो क्या, कलेक्टर भी काम नहीं कर सकता।
9. सबसे ज्यादा लड़ाइयां देवताओं में ही होती थीं और इनकी लड़ाई के तरीके भी बहुत नीच होते थे।
10. अज्ञान और अन्धविश्वास का राज लम्बा चलता है।
11. जो भैंस को डण्डा मारने को भी क्रान्ति कहते हैं, उनके साथ कोई बुद्धिजीवी कैसे रह सकता है।

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परसाई के पंच-90

 

1. ब्राह्मण ने समाज के एक बड़े हिस्से को शूद्र बनाकर, अछूत बनाकर, शिक्षा-संस्कृति से वंचित करके जो पाप किया, उसका फ़ल वह अभी भी भोग रहा है। शारीरिक श्रम नहीं करने से और कोई उत्पादन नहीं करने से ब्राह्मण पूज्य से घटकर दीन, भिखमंगा हो गया। भिक्षा को अपना धंधा मानने लगा। सुदामा पत्नी से कहते हैं—औरन को धन चाहिये बावरी, ब्राह्मन को धन केवल भिक्षा।
2. शासन को कुछ मलहमनुमा भाषा का प्रयोग करना चाहिये या जिस रूमाल से गला घोंटे उस पर खूब इत्र छिड़क ले।
3. वह नेता कितना मूर्ख होगा जो यह समझे कि लोग यह मान रहे हैं कि मुझे पद से मोह नहीं है। पद से मोह नहीं है तो इतना झख क्यों मारते हैं यह?
4. हमारे भोले नेता ’रघुपति राघव राजाराम’ की धुन , भाषण , उपदेश आदि से नशाबन्दी कर देना चाहते हैं। इस देश में शहर-शहर और गांव-गांव भट्टियां हैं। पुलिस और आबकारी विभाग के सहयोग से ये बढ़ती ही जाती हैं। ये गृह उद्योग सारे देश को नशा सप्लाई कर देंगे। मौका आया तो गांधी दर्शन केन्द्र में भी भट्टी खुल जायेगी। काली राजनीति, काला धन, काली व्यवस्था को बदले बिना ऊपर से गांधी के नाम से सफ़ेदी पोतने की कोशिश में लगे हैं सब।
5. लड़के-लड़की अगर न पढ़ें तो सरकार का क्या नुकसान है। जितने अपढ़ लोग होंगे उतनी ही स्थायी सरकार होगी।
6. वह सरकार बहुत निकम्मी, बेशर्म और पतित होती है जो शिक्षकों को तोड़ने और कुचलने की कोशिश करती है।
7. मन्दिर से जूतों की चोरी तो सनातन धार्मिक प्रक्रिया है। उस पर अंगुली उठानेवाले नर्क जायेंगे और वहां भी उन्हें जूते बाहर उतारने पड़ेंगे।
8. आदमी प्यासा मरने से बच जायेगा तो बगीचे बहुत बन जायेंगे। बंगले और बगीचेवाले सोचते हैं कि बगीचा बच जाये। आदमी का क्या है, मर जायेंगे तो और पैदा हो जायेंगे।
9. फ़ासिज्म विरोधी से बहस नहीं करता, उसका मुंह तोड़ देता है।
10. राजनेता में अपार जीवनी शक्ति और अपार लालसा होती है। अन्त समय उसके मुंह में गंगाजल डालो तो वह कहता है –गंगाजल नहीं पोर्टफ़ोलियो डालो।
11. हिंसा और अपराध के तनाव , सनसनी, उत्तेजना के साथ ही देश के मानस को चाहिये –धर्मान्धता। धर्मान्धता इस देश के आदमी की जरूरत बनायी गयी है। एक योजना से , विदेशी साम्राज्यवाद तथा देशी पूंजीवाद और फ़ासिस्टवाद ने इसे बढ़ाया है। यह सामाजिक परिवर्तन को रोकने का षडयन्त्र है, मगर साधारण आदमी फ़ंसा है इसमें।

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