Saturday, May 29, 2021

इब्ने शफी, बी.ए के पंच

 "जब एक आदमी पागल हो जाता है तो उसे पागलखाने में बंद कर देते हैं और जब पूरी कौम पागल हो जाती है तो ताकतवर कहलाने लगती है।"

-इब्ने शफी, बी.ए.
उपन्यास 'अनोखी रक्कासा' से।

शहंशाहियत में तो सिर्फ एक नालायक से दो-चार होना पड़ता है, लेकिन जम्हूरियत में नालायकों की पूरी टीम बवाले जान बन जाती है।
-इब्ने शफी, बी.ए.
उपन्यास 'भयानक जजीरा'- 1953 से।

Thursday, May 27, 2021

लव एट द टाइम ऑफ कोरोना

 बहुत दिन से लिखना स्थगित है। इस बीच कोरोना का हल्ला इतना रहा कि हर तरफ बस कोरोना ही कोरोना। कई मित्र, जान पहचान वाले और उनके परिवारी जन 'शांत' हो गए। कुछ इलाज शुरू होने में देरी से गये, कुछ गलत इलाज से, कुछ डर से। एक की पत्नी ने बताया कि ये तमाम तरह के वीडियो देखकर दहशत में आ गए। बीपी कम हो गया। नहीं रहे।

गब्बर सिंह की बात याद आई -'जो डर गया, समझो मर गया।'
बीमारी के नित नए इलाज बताये जा रहे हैं। इतनी तरकीबें कोरोना से बचाव कि अगर उनकी गिनती की जाए तो जनसँख्या के आकंड़ों पर भारी पड़ें। कई इलाज तो आपस में इतने विरोधी कि अगर एक साथ खड़े कर दिए जाएं तो उनमें आपस में मारपीट हो जाये। 'इलाज दंगा' हो जाये शहर में।
इलाज से बेहतर बचाव है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की बात हो रही। मास्क जरूरी है। पानी जरूरी है। सफाई जरूरी है। सांस रोकने का अभ्यास जरूरी। सब अपनाए जा रहे हैं। एक डॉक्टर के वीडियो में आया कि पच्चीस सेकेंड तक सांस रोक लिए तो समझिए फेफड़े मजबूत हैं। हम अभ्यास करके 40 सेकेंड तक रोक लिए। लगा कि घर में बाउंसर बैठा लिए हैं, कोरोना आएगा तो दौड़ा लेंगे।
जिनके यहां कई लोग नहीं रहे उनके हाल का अंदाज ही लगाया जा सकता है। हर नई फोन काल उठाते हुए जी दहलता - ' कोई अनहोनी की खबर न हो।' सबेरे किसी भी इंसान से मिलते हुए लगता -'कहीं यह किसी के न रहने की खबर न दे।'
कल एक मित्र से बात हुई। उन्होंने अपने कई परिवारी जन खोये कोरोना में। हाल पूछने पर जबाब आया -'जिंदा हूँ।' दो शब्द का यह जबाब कोरोना से जूझते लोगों की मन:स्थिति का एक्सरे है।
कोरोना हो जाने पर आइसोलेशन की बात होती है। अलग कमरा, अलग बाथरूम। सब कुछ अलग। ऐसे में मुझे हमेशा अपने देश की आधी से भी अधिक आबादी वाले वो लोग याद आये जिनमें कई-कई लोग एक कमरे/कोठरी में रहते हैं, कई-कई परिवार एक बाथरूम, एक शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। वो कैसे आइसोलेशन में रहेंगे।
बहुत कठिन समय से गुजरना हो रहा है। इससे बचाव के लिए सावधानी, इलाज तो जरूरी है ही। साथ ही जरूरी है जिजीविषा। जीने की इच्छा। जीने की अदम्य इच्छा बहुत तगड़ी एंटीबायटिक है, बहुत असरदार स्टेरायड है कोरोना से मुकाबला करने के लिए।
हमारा एक दोस्त 10 दिन आईसीयू में रहा। होश नहीं रहा उसको। जब होश आया तो डॉक्टर ने कहा -'सरदार जी, दवाएं तो ठीक हैं। लेकिन जब तक आप नहीं चाहेंगे तब तक ठीक नहीं होंगे। आप को खुद अपने को ठीक करने के लिए मेहनत करनी होगी।' दोस्त आजकल घर आ गया है। कमजोरी दूर हो रही है। ठीक हो रहा है।
परसाई जी ने लिखा है -''हड्डी ही हड्डी, पता नहीं किस गोंद से जोड़कर आदमी के पुतले बनाकर खड़े कर दिए गए हैं। यह जीवित रहने की इच्छा ही गोंद है।"
इस बीच कई बार बहुत कुछ लिखने की सोची। लेकिन मन नहीं हुआ। बीच में एक पोस्ट लिखने की सोची थी। संकट के समय में अनजान लोगों ने जिस तरह अनेक लोगों की सहायता की , तन से, मन से, धन से उससे लगा कि जब सारे तंत्र फेल हो जाते हैं, सारे सिस्टम भू लुंठित हो जाते हैं। जब राजनेताओं के बस में सिवाय निर्लज्ज बहानेबाजी, बटोलेबाजी और बयानबाजी के कुछ नहीं बचता ऐसे कठिन समय में भी समाज में ऐसे लोग होते हैं जो इंसानियत के जज्बे से भरे होते हैं। ऐसे लोग चुपचाप अपनी सामर्थ्य भर लोगों की सेवा में लगे रहते हैं। कोई भी समाज इनके कारण ही बचा रहता है।
ऐसे तमाम लोगों को समाज में देखकर लगा कि उनके बारे में लिखते हुए मार्खेज के उपन्यास की तर्ज पर लिखें -'लव एट द टाइम आफ कोरोना।' कोरोना काल में प्रेम।
लिखाई तो जब होगी तब होगी। फिलहाल आप मजे में रहिये। डरिये मत। आक्सीमीटर से ज्यादा अपनी सांस पर भरोसा करिये। जब तक आप चाहेंगे तब तक आपकी सांस चलेगी।
खूब मस्त रहिये। जो होगा देखा जाएगा।

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Monday, May 24, 2021

जिजीविषा

 मरने में मरने वाला ही नहीं मरता

उसके साथ मरते हैं
बहुत सारे लोग
थोड़ा-थोड़ा!
जैसे रोशनी के साथ
मरता है थोड़ा अंधेरा।
जैसे बादल के साथ
मरता है थोड़ा आकाश।
जैसे जल के साथ
मरती है थोड़ी सी प्यास।
जैसे आंसुओं के साथ
मरती है थोड़ी से आग भी।
जैसे समुद्र के साथ
मरती है थोड़ी धरती।
जैसे शून्य के साथ
मरती है थोड़ी सी हवा।
उसी तरह
जीवन के साथ
थोड़ा-बहुत मृत्यु भी
मरती है।
इसीलिये मृत्यु
जिजीविषा से
बहुत डरती है।
-डा.कन्हैयालाल नंदन

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Sunday, May 16, 2021

कौन मुस्काया

 

कौन मुस्काया
शरद के चांद-सा
सिंधु जैसा मन हमारा हो गया।
एक ही छवि
तैरती है झील में
रूप के मेले न कुछ कर पाएंगे
एक ही लय
गूँजनी संसार में
दूसरे सुर-ताल किसको भाएंगे।
कौन लहराया
महकती याद-सा
फूल जैसा तन हमारा हो गया।
खिल गया आकाश
खुशबू ने कहा
दूर अब अवसाद का घेरा हुआ
जो भी भी पास तक आती न थी
उस समर्पित शाम ने
जी भरकर छुआ।
कौन गहराया
सलोनी रात-सा
रागमय जीवन हमारा हो गया।
पूर्व से आती
हवा फिर छू गई
फिर कमल मुख हो गयी सम्वेदना
जल तरंगों में नहाकर चांदनी
हो गयी है
इन्द्रधनु-सी चेतना
कौन शरमाया
सुनहरे गात-सा
धूप जैसा क्षण हमारा हो गया।
- गीतकार विनोद श्रीवास्तव, कानपुर

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Monday, May 10, 2021

फिर नए सपने होंगे

 

फिर घना कोहरा छंटेगा,
फिर नया सूरज उगेगा,
फिर नई कली खिलेगी,
फिर नई मंजिल मिलेगी।
फिर नए सपने होंगे,
गले लगाते कुछ अपने होंगे,
स्वप्न होंगे नए
दर्द भी कुछ नए होंगे।
हर जख्म के लिए
मरहम कुछ नए होंगे।
कोरोना काल की मनहूसियत को धता बताती हुई यह कविता सुनिए हमारे सुपुत्र Anany Shukla की आवाज में। कठिन समय में आशा की बात कहती हुई कविता सुनते हुए यही सोच रहे थे अपन -'काश हम भी ऐसे वीडियो बना पाते।' 🙂

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मुहब्बत

 *किसी शहर से परिचित होने के लिए शायद सबसे आसान तरीका यह है कि यह जानने की कोशिश की जाए कि उसमें रहने वाले लोग किस तरह काम करते हैं, किस तरह प्यार और मुहब्बत करते हैं और किस तरह मरते हैं।

*सच तो यह है कि यहां हर आदमी जिंदगी से ऊबा हुआ है और अच्छी आदतें डालने की कोशिश में लगा रहता है। हमारे नागरिक कठोर परिश्रम करते हैं, लेकिन इसमें उनका एकमात्र उद्देश्य धनवान बनना होता है।
* निश्चय ही आजकल सबसे साधारण बात जो हमें देखने को मिलती है वह यह कि लोग सुबह से लेकर शाम तक काम करते हैं और फिर जिंदा रहने के लिए उनके पास जो समय बच रहता है, उसको बर्बाद करने के लिए ताश खेलने की मेजों , जलपान-ग्रहों या गपशप करने की जगहों की ओर चल पड़ते हैं।
* जिसे 'प्रेम-क्रीड़ा' कहा जाता है, उसमें हमारे यहां के लोग या तो एक-दूसरे का बहुत तेजी से भक्षण कर लेते हैं या फिर दाम्पत्य-सम्बन्ध की हल्की-फुल्की आदत डालकर जिंदगी बसर करने लगते हैं। इन अतिवादों के बीच का जीवन हमें यहां अक्सर देखने को नहीं मिलता।
* और शहरों की तरह ओरान में भी, समय और चिंतन की कमी के कारण लोगों को एक-दूसरे से मुहब्बत करनी पड़ती है, बिना यह जाने हुए कि मुहब्बत क्या चीज होती है।
-अल्वेयर कामू के उपन्यास प्लेग के अंश।

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Sunday, May 09, 2021

कोरोना से लड़ना सबका फर्ज है

 

"अगर आदमी ध्यान से सोचे तो हर घटना का , चाहे वह कितनी ही अप्रिय क्यों न हो, आशापूर्ण पहलू भी होता है।
यह सुनकर रेम्बर्त ने गुस्ताखी से अपने कन्धे सिकोड़े और बाहर निकल आया।
दोनों शहर के केंद्र में पहुंच गए थे।
"यह निहायत अहमकाना बात है न डॉक्टर! दरअसल मैंने अखबारों के लिए लेख लिखने के लिए दुनिया में जन्म नहीं लिया था। मेरा ख्याल है किसी औरत के साथ जिंदगी बसर करने के लिए मैं पैदा हुआ हूँ। यह तर्क संगत बात है न ?"
रियो ने सतर्कता से उत्तर दिया कि सम्भव है रेम्बर्त की बात में सच्चाई हो।"
ऊपर उद्धरत बातचीत अल्वेयर कामू के प्रसिद्द उपन्यास प्लेग के दो पात्रों की है।
ओरान शहर में प्लेग फैल जाती है। रेम्बर्त संयोगवश ओरान में आया था। प्लेग महामारी से बचाव के लिए शहर के फाटक बंद कर दिए गए। लोगों का आना-जाना रुक गया।
रेमबर्त शहर से बाहर जाने के लिए छटपटाने लगा। उसकी प्रेमिका उसका इंतजार कर रही थी। लेकिन शहर के फाटक बंद थे। कोई बाहर नहीं जा सकता था।
रेम्बर्त ने हर सम्भव कोशिश की निकलने की। उच्चाधिकारियों से मिला। जोर-जुगाड़ लगाया। डॉ रियो से अनुरोध किया कि उसे प्लेग के कीटाणु न होने का प्रमाणपत्र दे ताकि वह उसे दिखाकर निकल सके। रियो ने मना कर यह कहते हुए:
"मैं तुम्हे सर्टिफिकेट नहीं दे सकता, क्योंकि मुझे यह नहीं मालूम कि तुम्हारे अंदर इस बीमारी के कीटाणु नहीं है। और अगर मुझे मालूम होता तो भी मैं इस बात की गारंटी कैसे दे सकता हूँ कि मेरे यहाँ से निकलकर प्रीफेक्ट के दफ्तर तक पहुँचने के बीच तुम्हें इस बीमारी की छूत नहीं लग जायेगी।"
रेम्बर्त हर तरह से अपने को सही ठहराने की कोशिश करते हुए निकलने की कोशिश करता है। असफल होता है। इस बीच वह डॉक्टर रियो के सम्पर्क में रहते हुए शहर से निकलने की कोशिशें करता रहता है।
डॉक्टर रियो आपदाग्रस्त लोगों के इलाज में लगा रहता है। रेम्बर्त शहर से निकलने की फिराक में। इस सिलसिले में वह गेट पर तैनात लोगों से जोड़-तोड़ कर निकलने की कोशिश में रहता है। उसको अपनी प्रेमिका से मिलने की उतावली है।
रेम्बर्त को पता चलता है कि डॉक्टर रियो की बीबी शहर से करीब 100 मील दूर एक सेनिटोरियम में है।
अगले दिन तड़के ही रेम्बर्त ने डॉक्टर को फोन किया। "जब तक मैं शहर से निकलने का कोई तरीका नहीं निकाल लेता , क्या तब तक तुम मुझे अपने साथ काम करने दोगे?"
कुछ देर की खामोशी के बाद जबाब सुनाई दिया , "जरूर, रेमबर्त! धन्यवाद।"
इसके बाद रेम्बर्त डॉक्टर रियो के साथ काम करने लगा। शहर से निकलने की कोशिश भी जारी रहीं।
एक दिन रेम्बर्त का शहर से बाहर निकलने का जुगाड़ बन गया। उसका शहर से जाना तय हो गया। वह रियो और तारो से विदा लेकर गया। रेम्बर्त की जगह नई टीम बन गई।
जिस रात रेम्बर्त को जाना है उसी शाम वह वापस आकर डॉक्टर रियो से मिलता है। आगे की बात :
"रेम्बर्त बोला , "डॉक्टर , मैं शहर छोड़कर नहीं जा रहा। मैं तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ।"
तारो बिना हिले-डुले कार चलाता रहा। लगता था कि रियो अपनी थकान से छुटकारा पाने में असमर्थ था।
"और ----'उसका' क्या होगा?" रियो की आवाज बड़ी मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
रेम्बर्त ने जबाब दिया कि उसने सारे मामले पर बड़ी गम्भीरता से सोच-विचार किया है। उसके विचार तो नहीं बदले लेकिन अगर वह चला गया तो उसे अपने पर शरम आएगी, जिसकी वजह से अपनी प्रियतमा के साथ उसका सम्बन्ध और भी पेचीदा हो जायेगा।
इस बार और अधिक उत्साह दिखाते हुए रियो ने कहा कि यह निरी बकबास है। अगर कोई अपने सुख को ज्यादा पसन्द करता है तो इसमें उसे शरम नहीं महसूस करनी चाहिए।
" यह तो सही है," रेम्बर्त ने जबाब दिया, "लेकिन जब सब दुखी हों तो सिर्फ अपना सुख हासिल करने में शरम महसूस हो सकती है।"
तारो ने, जो अभी तक खामोश रहा था, पीछे मुड़कर देखे बगैर कहा कि अगर रेम्बर्त दूसरे लोगों के दुख में हिस्सा बटाने की इच्छा रखता है तो उसके पास फिर अपने सुख के लिए कोई समय नहीं बचेगा। इसलिए दोनों रास्ते में से उसे एक चुनना ही पड़ेगा।
"बात यह नहीं है," रेम्बर्त ने फिर कहा।" अब तक मैं हमेशा अपने को इस शहर में एक अजनबी- सा महसूस करता था। और मुझे ऐसा लगता था कि आप लोगों से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन अब मैंने अपनी आंखों से जो कुछ देखा है, इसके बाद मैं जान गया हूँ कि मैं चाहूं या न चाहूं मैं यहीं का हूँ। प्लेग से लड़ना सबका फर्ज है।""
इसके बाद रेम्बर्त शहर छोड़कर भागने के प्रयास छोड़ देता है। डॉक्टर रियो की टीम से जुड़कर प्लेग रोगियों की सेवा में जुट जाता है। एक दिन ऐसा भी आता है जब शहर में प्लेग खत्म हो जाती है और सड़कों पर मरते हुए चूहों की जगह बिल्लियां दिखने लगती हैं।
पिछली सदी में हुई प्लेग महामारी पर केंद्रित यह उपन्यास पढ़ते हुए आज कोरोना की विभीषिका के समाचार छाए हुए हैं। तमाम लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। असमय विदा हो रहे हैं।
यह विवरण एक पराये शहर के पत्रकार की एक अजनबी शहर के लोगों की पीड़ा से जुड़कर वहां के लोगो की सेवा करने की भावना का है।
आज जब हमारा समाज इस विभीषिका से जूझ रहा है तब समय यह देखने का भी है कि हम अपने समाज से कितने जुड़े हैं। हमारे अंदर डॉक्टर रियो और पत्रकार रेम्बर्त के कितने अंश बचे हैं।
डॉक्टर रियो और रेम्बर्त प्लेग से लड़े थे। आज कोरोना फैला है। कोरोना से लड़ना हमारा फर्ज है।

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Friday, May 07, 2021

प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है

 *इंसान को मुसीबतजदा लोगों की तरफ से जरूर लड़ना चाहिए, लेकिन अगर वह लड़ाई के सिवा हर चीज में दिलचस्पी लेना बंद कर दे तो लड़ाई का क्या फायदा?

*प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है और हमेशा इंसान की जिंदगी में ऐसा वक्त आता है जब वह कैद से, अपने काम से, कर्तव्य परायणता से ऊब जाता है, और सिर्फ एक ही चीज की तमन्ना करने लगता है - किसी प्रिय चेहरे की, प्यार भरे किसी दिल की गरमी और जादू पाने की।
*इंसानों में घृणा करने योग्य बातों की अपेक्षा प्रशंसनीय गुण अधिक मात्रा में हैं।
अल्वेयर कामू के उपन्यास ' प्लेग' से।

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Thursday, May 06, 2021

लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है - मनोहर श्याम जोशी

 मेरी तमाम ऐसी 'रचनाएं' भी हैं, जो मैं अपने मानस पटल पर ही लिखकर खुश हो गया, कागज पर उतारी नहीं। एक जमाना था कि इस तरह सोची हुई रचनाएं भी बोलकर सुना डालता था। खैर, अब तो आलम यह है कि बात करते-करते यह भी भूल जाता हूँ कि बात किस प्रसंग से शुरू की थी और उसे किस ओर ले जाना चाहता था। जो रचनाएं मैंने शुरू भी कीं, उनमें से भी ढेरों ऐसी हैं , जिन्हें मेरी अन्य व्यस्तताओं ने या मेरे भीतर बैठे आलोचक ने पूरा होने ही नहीं दिया।

मैंने अभी अन्य व्यस्तताओं का जिक्र किया, उनमें से अधिकतर व्यवसायिक लेखन से जुड़ी हुईं थीं और लुत्फ की
बात यह है कि इस तरह के लेखन में भी मैं काटता-जोड़ता रहा हूँ।
मैं जब सम्पादक था , मेरी इसी संसोधन वृत्ति से परेशान प्रेस फोरमैन मुझे अपने लिखे हुए का प्रूफ एक बार से ज्यादा पढ़ने नहीं देता था कि ये तो हर बार बदलते ही चले जायेंगे।
तो मेरे हिस्से सन्तोष नहीं,खाली संशय पड़ा है। तो मेरे पास गिनाने को मेरी एक भी उपलब्धि नहीं है। अलबत्ता अफसोस अनेक हैं, जिन्हें बहानों की संज्ञा भी दी जा सकती है। गनीमत इतनी ही है कि ये बहाने कुछ ठोस और महत्वपूर्ण न लिख पाने के हैं।
कहा जाता है कि रचनात्मक तेवर दो तरह के होते हैं -एक रूमानी दूसरा क्लासिकी। मुझे खुशफहमी रही है कि मैं अपने गुरु नागर जी की तरह क्लासिकी तेवर का धनी हूँ। और अपने दूसरे गुरु अज्ञेय जी की तरह रोमांटिक नहीं। लेकिन क्लासिकी तेवर साध लेने पर भी कोई रचनाकार अपनी रचना में अपने मन का उल्लंघन नहीं कर सकता। यह क्या है कि लेखन अंततः और मूलतः आत्माभिव्यक्ति ही है। जिसे आत्म या सेल्फ कहा जाता है वह आध्यात्म और विज्ञान , दोनों के पंडितों के लिए खासी रहस्यमयी चीज रही है।
आद्यात्म और मष्तिष्क विज्ञान दोनों का ही विद्यार्थी न होने के कारण मैं उस रहस्यवादी आयाम में जा सकने की योग्यता नहीं रखता। लेकिन मुझे इसमें संदेह नहीं कि लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है और कि स्वयं से किसी भी लेखक के लिए मुक्ति सम्भव नहीं।
आप विश्वास कीजिये मैने किशोरावस्था से अब तक कुछ और हो जाने का यत्न किया है। जैसे स्कूल में, जब मैंने पाया कि हीरो का दर्जा मुझे ज्यादा पढ़ाकू लड़के नहीं , खिलाड़ी लड़के पाते हैं , तब मैंने किसी खेल की टीम में जगह पाकर अपनी जय बुलवाने की जी-तोड़ कोशिश की। और लड़कों की अपेक्षा काया में कमजोर तथा उम्र में छोटा होने के कारण मेरी खेल के मैदान में एक न चली।
यह कमी पूरी करने के लिए मैं हर खेल के बारे में अपना।किताबी ज्ञान बढ़ाता चला गया, ताकि खिलाड़ियों के बीच उठ बैठ सकूं। अपने को कुछ और बना सकने के क्रम में मैंने अपने को स्वयं अपने लिए हास्यास्पद बनाया। उच्चतर शिक्षा के दौरान चाहा कि बहुत बड़ा वैज्ञानिक बन सकूं। मुझे ' कल का वैज्ञानिक' की उपाधि भी मिली, लेकिन मैं वैज्ञानिक न बन सका। नियति ने मुझे इतना ही धैर्य और इतनी ही समझ दी थी कि विभिन्न विषयों की सतही जानकारी हासिल कर सकूं और उनपर पत्रकार की हैसियत से कलम चला सकूं।
तो मैं तमाम कोशिशों के बाद मैं ही रह गया - एक अदद कायर, कमजोर और रोंदू किस्म का इंसान, जो अपनी कातर भावुकता , हर नए उत्साह के 'पर' नोच डालने वाली अपनी उद्दत उदासी और संसार तथा स्वयं पर उठते नपुंसक आक्रोश की पर्दादारी करने के लिए व्यंग्य- विनोद, आत्म व्यंग्य और विडम्बना की शरण लेता रहा है।
- स्व. मनोहरश्याम जोशी
आज के अमर उजाला से साभार

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प्लेग की जगह कोरोना

 


महामारी मुझे इसके सिवा कोई नया सबक नहीं सिखा पाई कि मुझे तुम्हारे साथ मिलकर लड़ना चाहिए। हमसे से हरेक के भीतर प्लेग है, धरती का कोई आदमी इससे मुक्त नहीं है। और मैं यह भी जानता हूँ कि हमें अपने पर लगातार निगरानी रखनी होगी, ताकि लापरवाही के किसी क्षण में हम किसी चेहरे पर अपनी सांस डालकर उसे छूत न दे दें। दरअसल कुदरती चीज तो रोग का कीटाणु है। बाकी सब चीजें ईमानदारी, पवित्रता -इंसान की इच्छाशक्ति का फल हैं-ऐसी निगरानी जिसमें कभी ढील न हो। एक नेक आदमी जो इसमें कभी ढील नहीं देता , किसी को छूत नहीं देता।
-अल्वेयर कामू के उपन्यास 'प्लेग' से।
पिछली सदी में लिखे इस कालजयी उपन्यास को आज पढ़ते हुए लगा कि काफी कुछ वैसा ही घट रहा है, बड़े पैमाने पर, ज्यादा तेजी के साथ। सिर्फ प्लेग की जगह 'कोरोना' ने ले ली है।
नीचे हमारा परिवेश - रास्तों पर जिंदगी बाकायदा आबाद है।


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Monday, April 26, 2021

सच और हसीन झूठ

 

झूठ की भीड़ में एक अकेला सच खड़ा था।
सच अकेला था लेकिन निडर था।
झूठ की भीड़ अकेले सच से डरी खड़ी थी। पता नहीं किस झूठ की पोल खोल दे।
एक अकेला सच अनेकों झूठ पर भारी था।
झूठ की भीड़ में खुसफुसाहट डर बढ़ रहा था। लोग फुसफुसाते हुए आपस में कह रहे थे -'यार इस सच के बच्चे ने जीना मुहाल कर रखा है। यह तो बहुत बड़ी समस्या है हमारे लिए। कब तक इसके डर के साये में जिएंगे हम। इसका कोई इलाज नहीं क्या?'
दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका कोई इलाज न हो। एक शातिर झूठ ने कहा। निकलेगा इसका भी इलाज निकलेगा। चिंता न करो। देखते रहो। थोड़ा इंतजार करो।
झुट्ठों की भीड़ इंतजार करने लगी।
कुछ देर बाद एक हसीन झूठ इठलाता हुआ सच की तरफ बढ़ा। सच जब तक कुछ समझ पाए तब तक झूठ ने उसको चूम लिया और गले लगकर कहा -' सच में तुम कितने बहादुर हो सच। मैं तुम्हारी बहादुरी पर फिदा हूँ। आई लव यू।'
सच कुछ देर को हक्का-बक्का रह गया। जब उसको समझ आया कि उसको चूमने वाला 'झूठ' है तब उसने उसको झिड़ककर दूर किया। हसीन झूठ मुस्कराते हुए झूठ की भीड़ में वापस लौट आया।
कुछ ही देर में सच को हसीन झूठ द्वारा चूमे जाने का वीडियो वायरल हो गया। उसमें से सच द्वारा झूठ को झिड़ककर दूर करने का सीन गायब था।
सच बेचारा डाक्टर्ड और वायरल वीडियो के अधूरे होने की बात कहते हुए अपनी सफाई पेश कर रहा था। लेकिन झूठ की भीड़ में कोई उसकी सुनने को तैयार नहीं था।
सच अभी भी अकेला खड़ा था। सामने झूठ की भीड़ थी। लेकिन अब झूठ की भीड़ से सच का डर खत्म हो गया था। सच के हसीन झूठ के साथ के वायरल वीडियो ने सच को झूठ का 'आदमी' साबित कर दिया था।
सच 'सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं' का स्टेटस लगाए अकेला परेशान खड़ा था।
हसीन झूठ और शातिर झूठ साथ मिलकर अठखेलियां मना रहे थे। हसीन झूठ को झूठ समाज के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया था।
पूरा झूठ समाज उल्लास मनाते हुए भी डरा हुआ था कि अबकी बार फिर सच सामने आया तो उसका मुकाबला कैसे करेंगे।

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Sunday, April 25, 2021

पानी छीलकर आक्सीजन बनाएं

 

सुबह हुई तो चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दी। सब अपने-अपने अंदाज में चहचहा रहीं थीं। कोई ची ची, कोई टी टी। चींचीं चींचीं, कोई कुहू कुहू। बीच-बीच में तो सब एक साथ हल्ला मचाने लगतीं। मानों झगड़ रहीं हैं कि चींचीं बोल, कुहू-कुहू क्यों बोलती है। क्या पता वह जबाब देती हो -"हमारी मैडम ने यही सिखाया है। हम तो ऐसे ही बोलेंगे।"
बीच-बीच में एक कौवा भी कांव-कांव करने लगा। सब चिड़ियां उस पर हंसने लगती। कौवा बेचारा फुदककर दूर चला गया।
निकल कर देखा तो चिड़िया, न कौवा कोई भी मास्क नहीं लगाए थी। पेड़ के पास फुदकती भी बिना मास्क टहल रही थी। मन किया हड़का दें, चालान करवा दें इनका। लेकिन फिर नहीं किया। क्या पता इनके प्रोटोकाल में न हो मास्क लगाना। हो सकता है इनकी चोंच ही इनका मास्क हो।
आजकल बिना मास्क कोई दिखता है तो उससे दूरी बना लेते हैं। सपने भी बिना मास्क वाले नहीं देखते। अभी एक आइडिया आया। बहुत धांसू टाइप का लग रहा था। लेकिन हमने उसको दिमाग के मेन गेट पर ही रोक दिया। हड़का दिया -'बिना मास्क अंदर नहीं घुसोगे।' बेचारा आइडिया मुंह लटका के निकल लिया बाहर।
कोरोना का आतंक हर तरफ पसरा है। हर अगले पल किसी के 'शांत' हो जाने की खबर आ रही है। लगातार फोन आ रहे हैं, मेसेज भी। किसी को कहीं बिस्तर चाहिए, किसी को ऑक्सीजन सिलिंडर। हम किसी दूसरे को फोन करते हैं। वह किसी और को करता होगा। जिंदगी की जद्दोजहद जारी है।
इस बीच कई लोग अपने ठीक होने की खबर देते हैं। किसी को सिलिंडर मिल गया, किसी को बेड। कोई बताता है कि डॉक्टर ने उसको हड़काया कि कोरोना टेस्ट भले पॉजिटिव है लेकिन फेफड़े एलर्जी के कारण खराब हैं। ये दवाई लो। आराम से रहो। हफ्ते भर बाद उनके ठीक होने की खबर आती है। 92 साल के बुजुर्ग डॉक्टर की तारीफ कर रहे हैं जो कोरोना मरीजों को भी धड़ल्ले से देख रहे हैं, दूरी बनाते हुए। पिछले साल भी देखते रहे। 92 साल के डॉक्टर धनात्मक ऊर्जा से भरपूर हैं।
टीवी पर खबर आती है अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म हो रही है। मरीजों की जान को खतरा है। नीचे किसी नेता का बयान आता है -'आक्सीजन की कोई कमी नहीं होगी।' 'आक्सीजन की कमी की खबर' और 'ऑक्सीजन की कमी नहीं होगी' में पहले बहस और फिर मारपीट हो जाती है। इस भी अगली खबर किसी अस्पताल में आग लगने कुछ लोगों के मरने की खबर आ जाती है। आक्सीजन वाली दोनों खबरें पर्दे के पीछे जाकर बेशर्मी से हंसने लगती हैं।
आक्सीजन की कमी की बात सोचते हुए पुरानी कल्पना फिर आ गई दिमाग में। उस कल्पना में अपन इतना विकसित हो चुके हैं कि पानी के अणुओं को मूंगफली की छीलकर हाइड्रोजन और आक्सीजन अलग-अलग कर सकते हैं। हवा से नायट्रोजन और दीगर गैसों को तखलिया बोलकर आक्सीजन का मन मनचाहा उपयोग कर सकते हैं। बाद बाकी जब कभी पानी की जरूरत होती हो दो मुट्ठी हाइड्रोजन और एक मुट्ठी आक्सीजन मिलाकर तीन अंजुरी पानी बनाकर प्यास मिटा लेते।
हम पानी छीलकर आक्सीजन बना रहे थे कि बाहर बगीचे में पेड़ से कच्ची अमिया टप्प से नीचे गिर गयी। एक गिरी सैकड़ों पेड़ पर अभी हैं। पेड़ पर लगी अमियां नीचे गिरी अमियां के लिए दुखी हो रहीं होगी। उसके लिए शोक संदेश लिख रहीं होंगी। RIP के साथ हाथ जोड़ रहीं होंगी।
इसी बीच हमारे एक अजीज दोस्त के 'हमारे बीच न रहने' की खबर व्हाट्सअप पर आ जाती है। मित्र लोग दुखी होने लगते हैं। कुछ लोग पहले 'न रहने वाले' लोगों के साथ इस मित्र के लिए भी दुखी होने लगते हैं। तब तक कोई इसी दिवंगत मित्र का दो दिन पहले का संदेश फिर से लगा देता है जिसमें उस मित्र ने अपने ठीक होते स्वास्थ्य का हवाला देते सभी मित्रों को विस्तार से धन्यवाद दिया था।
मुझे अपने मित्र से हफ्ते भर पहले की चहकते हुए पुरानी यादें साझा करते हुए की गई लम्बी बातचीत याद आती है। इस बातचीत में मित्र ने कुछ दिन बाद रिटायर होकर तसल्ली की जिंदगी जीने की योजना भी थी। योजना पर अमल होने के पहले ही मित्र हमेशा के लिए रिटायर हो गए।
शहर में लाकडाउन है। मास्क लगाने के सख्त आदेश हैं। कुछ दिन में लगता है मास्क अनिवार्य ड्रेस कोड में आ जायेगा। शर्ट, पैंट, बनियाइन भले न पहनों पर मास्क जरूर लगाओ। मास्क न लगाना अश्लील और आपराधिक माना जायेगा। जिस देश के नागरिक जितने अनुशासित होकर मास्क लगाएंगे वह उतना ही विकसित माना जायेगा। देशों की प्रगति 'मास्क इंडेक्स' से नापी जाएगी।
'मास्क इंडेक्स' और प्रगति वाली बात से याद आया कि पिक्चरों में जितने भी दूसरे ग्रहों के प्राणी दिखाए जाते हैं वे सब हमसे ज्यादा विकसित होते हैं। वे सब मास्क लगाए रहते हैं। मास्क मतलब विकास। मास्क मतलब प्रगति।
लेकिन मास्क तो आम जनता के लिए होते हैं। जनता की भलाई की जिम्मेदारी जिन पर वे मास्क नहीं , मुखौटे लगाते हैं। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। अवाम की भलाई के लिए तैनात लोग तरह-तरह के मुखौटे लगाए उछल-कूद रहे हैं। जनता की सोचने-समझने की ताकत का अपहरण हो गया है। अवाम सर झुकाए अपने जीवन की रक्षा में हलकान है। जनता के आका पस्त जनता के सर पर कबड्डी खेलते हुए उसका 'कल्याण करने में मस्त' हैं।
मास्क और मुखौटे वाले आइडिये को हमने बहुत तेज हड़काया। ये क्या फालतू की बात करते हो। हमारी हड़काई से वह सहम गया और मारे घबराहट के भारतमाता की जय और वन्दे मातरम कहने लगा। हमने उसको तसल्ली देते हुए इस तरह की बेफालतू की बातें करने से मना किया। उसने कहा है कि ठीक है साहब नहीं करेंगे लेकिन सच तो यही है:
"तमाशा है
जो ज्यों का त्यों चल रहा है
अलबत दिखाने को कहीं-कहीं सूरत बदल रहा है।"
इस बीच सूरज भाई अपना चाय का कप खाली करके निकल लिए हैं। जाते-जाते बोले कि बातें तो तुम हमेशा की तरह बेवकूफी वाली ही करते हो लेकिन ये जो पानी की बूंद छीलकर आक्सीजन बनाने वाला आइडिया है न वो पेटेंट करा लो। क्या पता कभी अमल में आ जाये।
सूरज भाई तो सलाह देकर निकल लिए। हमको यह नहीं समझ में आ रहा कि वो सही में कह रहे थे या हमको 'जनता' बना रहे थे।
इस बीच हमारे एक दोस्त कोरोना को हराकर घर वापस आ गए हैं। दूसरे मित्र की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। और लोग भी ठीक हो रहे हैं।
सब ठीक होगा। बस थोड़ा सावधान रहें। मास्क लगाएं, दूरी बनाएं। हौसला रखें। मस्त रहें।
और हां, ये पानी को मूंगफली की तरह छीलकर आक्सीजन बनाने वाले आइडिया पर अपनी राय बताएं। झिझक हो तो इनबॉक्स में बताएं। हम किसी से कहेंगे थोड़ी। 🙂

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Thursday, April 22, 2021

कोरोना बहुत डरपोक है

 

साल भर से कोरोना का हल्ला मचा है। भगदड़ मची है। जिसे देखो कोरोना से हलकान है। मरहूम गब्बर सिंह से भी जबर जालिम , डरावना हो गया है। जहां देखो वहां घुस जाता है। चैन लूट लेता है। मन करता है जय-वीरू को बुलाकर फिर पकड़वा दें लेकिन याद आता है जय भी इसके चक्कर में आ चुके हैं। वीरू भी वरिष्ठ नागरिक हो चुके हैं। उनको कष्ट देना ठीक नहीं।
जबसे कोरोना आया तबसे इससे निपटने के इतने तरीके आ गए बाजार में कि पूछो मत। हर तरीका दूसरे की विरोधी पार्टी का। अगर सब तरीकों को एक साथ रख दिया तो बचाव के तरीकों में महाभारत हो जाय। तीसरा विश्वयुध्द कोरोना से बचाव के तरीकों का हो जाये। पता नहीं कौन विजयी हो लेकिन सरकार एकांत की बनेगी ।
तरह-तरह के तरीके आये कोरोना से निपटने के। कोई बताइस कोरिया के लोग उल्टे हाथ से काम करने लगे जिससे वायरस से बचे रहें। थाली, दीपक भी जले। एक दोस्त ने लम्बी बहस के बाद साबित किया कि अपने समाज में घूंघट और पर्दा कोरोना से बचाव के लिए ही थे। एक ने बताया कि डायनासोर के विलुप्त होने का कारण कोरोना था। सबको कोरोना हो गया, आक्सीजन मिली नहीं और वे निपट लिए।
हमको रोज नए-नए तरीके बताए गए। जितने अपनाए उससे ज्यादा मटियाये। कुछ तो अपनाने की शुरआत के पहले ही फर्जी साबित कर दिए गए। पिछले हफ्ते हमको रोज हड़काया गया कपूर, लौंग, अजवाइन की पुटलिया ताबीज की तरह लटकाने के लिए। दिन भर सूंघने के लिए। हम टालते रहे, डांट खाते रहे। आज तय किया था लटका ही लेंगे। लेकिन सुबह ही एक दोस्त ने लिंक भेजा जिसमें बताया गया था कि इसका कोई फायदा होने का प्रमाण नहीं। हर अवसर आपदा बन रहा है। कोरोना हर एक को अपनी पार्टी की सदस्यता दिला रहा है। लगता इसको भी चुनाव लड़ने की हुड़क मची है। सरकार बनाएगा ससुरा यह भी। बहुत नीच, कमीना है यह कोरोना भी।
ऊपर से देखने में ऐसा लगता है कि हम लोग बहुत डरे हुए हैं कोरोना से। लेकिन सच्चाई यह है कि कोरोना भयंकर रूप से डरा हुआ है। डर के मारे ही जान बचाने के लिए रूप बदल कर घूम रहा है। हर जगह नई तरह से जा रहा है। दबे पांव घुस रहा है। बहुत डरा हुआ है। डर के मारे घिग्घी बंधी हुई कोरोना की। भीड़ में घुसकर, चुनाव रैली में छिपकर अपनी जान बचा रहा है। लेकिन कब तक जान बचाएगा। बस इसके दिन पूरे हुए ही समझिए।
मजे से रहिये। निपट जाएगा कोरोना भी। न वो दिन रहे न ये रहेगे। हिम्मत रखिये कुंवर नारायण की कविता पंक्ति को याद करते हुए:
"कोई लक्ष्य
मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं,
हारा वही जो लड़ा नहीं।"
आइये सब मिलकर लड़ते हैं। कोरोना की ऐसी-तैसी करते हैं। हौसला बनाये रखिये। मुस्कराते रहिये। हौसला और मुस्कान दुनिया के हर वायरस के एन्टीवायरस हैं।
जो होगा, देखा जाएगा। निपटा जाएगा। दम बनी रहे, घर चूता है तो चूने दो।

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Tuesday, April 20, 2021

आपका क्या होगा जनाबे अली

 

तीन मीटर दूरी पर रखे रेडियो पर यह गाना बज रहा है। बार बार कह रहा है -'आप का क्या होगा जनाबे अली।' जैसे हमी से सवाल कर रहा हो। मन किया उठकर जाएं और उमेठ के बंद कर दें कहते हुए -'बड़ा आया पूछने वाला -आप का क्या होगा जनाबे अली।'
लेकिन आलस्य ने बरज दिया। आलस्य को लोगों ने 'बेफालतू' में बदनाम किया है। आलस्य के चलते तमाम 'हिंसाबाद' रुक जाता है। किसी को पटककर मारने की मंशा उठाने, पटकने और फिर मारने में लगने वाली मेहनत को सोचकर स्थगित हो जाती है। दुनिया में आलस्य के चलते न जाने कितने बुरे काम होने से बचे हैं। आलस्य की महिमा अनंत है। चुपचाप भले काम करता रहता है यह बिना अपना प्रचार किये।
रेडियो को लगता है हमारे गुस्से की भनक मिल गयी। इसीलिए 'पान पराग' का हल्ला मचाने लगा। बदमाश है रेडियो। जैसे आजकल मीडिया एक बवाल को दबाने के लिए दूसरे बवाल की बाइट फुदकती है वैसे ही रेडियो ने भी 'जनाबे अली' से ध्यान बंटाने के लिए 'पान पराग' चला दिया।
बहरहाल पान पराग की बात पर हंसी आई। सुबह-सुबह की चाय के बाद पान पराग कौन खाता है। चाय वह भी अदरख वाली। लेकिन 'पान पराग' का कॉन्फिडेंस है भाई। सबेरे डंके की चोट पर पान पराग का हल्ला मचा रहा है। वैसे इस कॉन्फिडेंस की वजह है। किसी कनपुरिये मसाला भक्त को कोई अमृत भी दे मसाला खाने के बाद तो मुंह में मसाले के आनन्दातिरेक में आंख बंद करके कहेंगे -'अभी मसाला खाये हैं।' मल्लब मसाले के बाद अमृत कैसे पी लें, मसाले का अपमान होगा।
बहरहाल बात चाय की हो रही थी। सुबह से तीसरी चाय पी। अदरख वाली। पहली चाय में अहा, अहा। दूसरी में ठीक , ठीक। तीसरे कप तक मामला आते आते चाय की इमेज वही हो गयी जो लोकतंत्र में सरकारों के तीसरे चुनाव तक हो जाते हैं। एंटीइनकंबेंसी फैक्टर हर जगह होता है। चुनाव की सुविधा होती तो एक ही केतली की तीसरी चाय पीने के बजाय दूसरी केतली की चाय ही पीते, भले ही पीने के बाद वह पहली से घटिया लगती।
हम और कुछ सोंचे तब तक रेडियो सिटी ने हल्ला मचा दिया कि सीसामऊ में 'ए टू जेड' में सब कुछ मिलता है। दुकान न हुई डिक्शनरी हो गयी। वैसे ये डिक्शनरी भी एक लफड़ा है। पहले तो देखते थे। आजकल तो सब आनलाइन है।स्पेलिंग के हाल बेहाल हैं। जिन शब्दों के साथ बचपन और जवानी में उठते-बैठते रहे उनकी तक याद धुंधला जाती है अक्सर। अक्सर भूल जाते हैं कि किसी शब्द में 'आई' लगेगा कि 'वाई'। 'ई' 'एल' के पहले आएगा या बाद में। इस चक्कर में डॉक्टरों की तरह गड्ड-मड्ड लिख देते हैं। बिना सीपीएमटी किये डाक्टर बन जाते हैं। हमने तो लिख दिया 'गोलिया' के। झेलें पढ़ने , टाइप करने वाले। हड़काने का मौका अलग से मिलता है-'तुमको यह तक नहीं आता। कौन स्कूल में पढ़े हो।'
कभी सोचते हैं कि शब्द भी अगर बोल-लिख सकते और अपने साथ रोज होते दुर्व्यवहार की शिकायत 'मीटू' अभियान के तहत करते तो अनपढ़ों के अलावा दुनिया के सब लोग कटघरे में खड़े होते।
हम और कुछ सोचते तब तक गाना बजने लगा :
'सावन आया रे
तेरे मेरे मिलने का मौसम आया रे।'
हमने हड़काया रेडियो को। हमको हनीट्रैप में फंसा रहा है। जैसे विकसित देश पिछड़े मुल्कों को अपनी पुरानी तकनीक नई कहकर टिका देते हैं वैसे ही ये मुआ रेडियो सावन बीत चुकने के बाद सावन के आने की खबर सुना रहा है। मीडिया की तरह हरकतें कर रहा है। सावधान न रहते तो सही में मिलने के लिए हाथ में गुलदस्ता लेकर निकल लेते।
बहरहाल बाल बाल बचे। अब आगे का किस्सा फिर कभी। अभी चलते दफ्तर। देर हुई तो सही में सुनना पड़ेगा -'आप का क्या होगा जनाबे अली।'

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Monday, April 19, 2021

जीने की राह


1. डर जंगल की आग की तरह फैलता है। एक का डर दूसरे को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। निराशा बढ़ने लगती है और समझ ही नहीं आता कि आगे क्या?

पर, डर ही सब कुछ नहीं है। साहस भी, डर जितना ही संक्रामक है। किसी एक की हिम्मत चुटकियों में पूरे माहौल को बदल देती है। और फिर, अपनी शक्ति के बूते हम तो सब कर पाते हैं, जो कठिन समय में करना जरूरी होता है।

2. हम शक्ति को पूजते तो हैं, पर उसे समझते नहीं हैं। हम अपनी शक्ति को बेकार ही खर्च कर देते हैं। भूल जाते हैं कि हम सब अपनी सोच से कहीं ज्यादा साहसी और कहीं ज्यादा दूसरों को मजबूती देने में मदद कर सकते हैं। फिर प्यार ही तो है, जो बचा रहता है और हमेशा याद आता है। बेहतर है कि हम दूसरों को डर के बजाय अपना प्यार दें।
Poonam Jain दैनिक हिंदुस्तान के नियमित स्तम्भ 'जीने की राह' में।

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Tuesday, April 13, 2021

अपना पराठा बचाएं, चूहों को निपटाएं

अखबार में खबर पढ़ी-डलिया से पराठा गुम होने से महिला हुई बेहोश। दो पराठे में से एक पराठा डलिया से गायब हो गया। महिला ने देखा और बेहोश। बाद में यह समझाया गया कि पराठा चूहा ले गया।
पराठा गायब होने पर महिला के बेहोश होने के पीछे कई कारण रहे होंगे। न जाने क्या-क्या सोच रही होगी महिला। क्या पता आटा खत्म हो गया हो घर में, कल कैसे बनेगा खाना , यह सोच रही हो। या कोई और चिंता कर रही हो। उसी समय पराठा गायब देखकर झटका लगा हो और बेहोश हो गयी हो।
चूहे द्वारा पराठा ले जाने वाली बात इसलिए समझाई गयी होगी कि चूहे आमतौर पर ले जाते होंगे पराठे। चूहे अनाज खाने, चुराने के लिए मशहूर हैं। गल्ला गोदामों की अनाज की कमी/चोरी चूहों के मत्थे ही जाती है। बिहार में तो बांध कुतर गए थे चूहे।
चूहों की तरह कई सरकारी महकमों के लोग भी बदनाम हैं समाज की चीजें कुतरने के लिए। अखबार की एक खबर के मुताबिक एक आदमी ने खुदकशी कर ली। अखबार के मुताबिक खुदकशी का कारण यह था कि उसकी नाबालिग बेटी का अपहरण गांव कुछ ताकतवर लोगों ने कर लिया था। पुलिस लड़की की बरामदगी के लिए एक लाख रुपये मांग रही थी। उस आदमी ने 20 हजार जुगाड़ के दे दिए। बाकी के 80 हजार नहीं जुगाड़ पाया। पुलिस दाम कम करने को राजी नहीं हुई होगी। उस आदमी ने मजबूरी में आत्महत्या कर ली।
अखबार के मुताबिक आदमी का लिखा सुसाइड नोट जिसमें पुलिस द्वारा पैसे मांगे जाने का जिक्र होगा पुलिस ने फाड़ दिया। मामला एकाध दिन की सुर्खी के बाद रफा-दफा होने की गुंजाइश बन गयी।
एक पेंशनर द्वारा दी जानकारी के मुताबिक लेखपाल ने उनकी रिपोर्ट लिखने के लिए पन्द्रह हजार लिए थे।
इसी तरह के चूहे समाज को खोखला कर रहे हैं। अफसोस यह भी कि इनके लिए कोई चूहामार दवाई भी नहीं मिलती। जो मिलती है उसके मारक तत्व खत्म चोरी हो जाते हैं।ये चूहे उसको खाकर और ताकतवर हो जाते हैं। चूहामार दवाई इन चूहों के लिए नशे के काम आती है।
चूहे पकड़ने के लिए चूहेदानी का प्रयोग पहले ही असफल हो चुका है। बकौल परसाई जी :
"सरकार कहती है कि हमने चूहे पकड़ने के लिये चूहेदानियां रखीं हैं. कुछ चूहेदानियों की जब हमने जांच की तो पता लगा उसमें घुसने के छेद से बड़ा छेद, पीछे से निकलने के लिये होता है। चूहा जैसे ही फंसता है उधर से निकल जाता है क्योंकि पिंजड़ा बनाने वाले चूहों से मिले हुये हैं और चूहा पकड़ने वाले भी। हम पिंजड़ा देखते हैं वे उन्हें छेद दिखा देते हैं।
हमारे हिस्से बस चूहेदानी खरीदने का खर्च बढ़ रहा है..."
इलाज क्या है इसका। इलाज यही है कि अपने आसपास के चूहों को पहचान कर उनसे दूर रहा जाए। उनके दांत तोड़ने की व्यवस्था की जाए। चूहों के सारे बिल बन्द किये जायें।
अपने पराठे को बचाने के लिये चूहे को निपटाना जरूरी है।

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Saturday, April 10, 2021

साइकिल के जन्मदिन के बहाने

कल हमारी साइकिल छह साल की हो गई। 2015 में जबलपुर में रांझी से ली थी। लेने के बाद घण्टी लगवाई, गद्दी बदलवाई। एक दो बार ट्यूब बदले। उसके अलावा टनाटन है साइकिल। पैडल मारते ही स्टार्ट हो जाती है।
साइकिल का साथ भले छह साल का हो गया लेकिन उसकी कोई पहचान अगर कहे तो शायद न बता पाए। कई साइकिलों के बीच अगर खड़ी हो और हमको अपनी साइकिल चलाने को कहा जाए तो बड़ी बात नहीं कि किसी दूसरी साइकिल की गद्दी की धूल झाड़कर पैडल मारने लगें। इतने सालों के साथ के बाद भी ऐसा अजनबीपन निहायत गैरजिम्मेदाराना है। लेकिन ऐसा होता है। साथ रहने वालों की तो बात छोड़िये कई बार अपन खुद को अजनबी लगते हैं। लगता है कि कहीं देखा है, मिले हैं लेकिन कहां देखा , कहां मिले यह ध्यान नहीं आता। फिर लगता है, अबे ये तो अपन ही है।
साइकिल की पहचान की बात से याद आया कि उसका हैंडल जंगिया गया है। ताला खुला रहता है। ऐसी अनगिनत साइकिलें होंगीं दुनिया में। लेकिन लगता है इतने से पहचान लेंगे साइकिल को।
कुछ दोस्त हमारी साइकिल को पुरानी बताकर बदलने की सलाह देते हैं। गियर वाली लेने को कहते हैं। लेकिन अपन को यही , बिना गियर वाली पसन्द है। गियर वाली साइकिल में इंसान गियर तो जल्दी-जल्दी मारता है लेकिन साइकिल चलती अपनी ही गति हैं।
बावजूद नापंसगी के पिछले दिनों हमारे बच्चों ने हमको गियर वाली जबरियन गिफ़्टियाँ दीं। बच्चों के प्यार से निहाल होने के बावजूद उनको फिजूलखर्ची पर टोंकते हुए बेमन से साइकिल खोली गई। कसवाई गई। पता चला साइकिल और हमारे साइज में जो अंतर के चलते उसको चलाने का एक ही तरीका है कि साइकिल और हम दोनों साथ-साथ सड़क पर साथ-साथ पैदल चलें।
साइकिल के साथ पैदल चलने में वैसे कोई बुराई नहीं। लेकिन गियर वाली साईकिल को बुरा लग सकता है कि उसकी बेइज्जती हो गई। अगर किसी हीरे को कोई रईस पेपरवेट की तरह प्रयोग करे या रॉल्स रॉयस से शहर का कूड़ा उठवाया जाए तो उनको बेइज्जती महसूस होगी न। किसी की 'बेइज्जती खराब' करने का अपना कोई इरादा नहीं रहता।
हमारे एक अजीज दोस्त हैं जो कद और अक्ल दोनों मामले में थोड़ा नाटे टाइप होने के साथ-साथ अपने ऊलजलूलपन के कारण भी जाने जाते हैं। हमको बहुत चाहते हैं। उनको हमारी नई छोटी साइकिल के उपयोग का एक तरीका यह भी समझ में आया कि अपन अपना साइज थोड़ा लम्बाई में कम करवा लें। उनका कहना था कि मेडिकल में आजकल सब कुछ सम्भव है। लेकिन शुक्र उनका इस बात का कि उन्होंने हमारी लम्बाई में बदलाव के उपाय को साइकिल की कीमत के मुकाबले खर्चीला बताते हुए खुद खारिज कर दिया यह कहते हुए कि यह काम कोई सरकारी खर्चे पर तो होगा नहीं लिहाजा क्या फायदा पैसा बर्बाद करने में।
नई साइकिल चली भले नहीं हो लेकिन उपयोग उसका भी हो रहा है। होली के मौके पर उसका उपयोग जोड़ो के साथ फोटॉग्राफी में हुआ। चीजें अपना उपयोग करा ही लेती हैं। पुरानी साइकिल भी चल ही रही है टनाटन।

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