Monday, December 16, 2024

लावारिस चाय वाला

 


न बीबी रहेगी न बेटा रहेगा,
अकेला कफ़न में लपेटा रहेगा
न दौलत रहेगी , न शोहरत रहेगी
दो गज जमीं पे लेटा रहेगा ।

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Wednesday, December 11, 2024

पुस्तक प्रकाशन की पार्टी

 पुस्तक प्रकाशन की पार्टी की पार्टी में कौन सा अलंकार है पूछेंगे तो कई मित्र कहँगे, ये क्या मज़ाक़ है? ये तो किसी अनपढ़ को भी पता है कि इसमें अनुप्रास अलंकार है। स्कूल के दिन होते तो लिखते, 'प वर्ण की आवृति होने के कारण इसमें अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।'

लेकिन छोड़िए स्कूल के दिनों को और अनुप्रास अलंकार को। वैसे भी वे सब स्कूल अब बंद हो रहे हैं जिनमें हमने शुरुआती पढ़ाई की।
बात पुस्तक प्रकाशन की।
पिछले हफ़्ते हमने अपनी नई किताब 'बेवकूफ़ी का सफ़र' प्रकाशित की। ई बुक, प्रिंट आन डिमांड (जिसमें आर्डर करके किताब प्रिंट फार्म में मंगाई जा सकती है) और किंडल फ़ार्मेट में।
अभी तक अधिकतर मित्रों ने ई बुक फ़ार्मेट में किताब ख़रीदी है। प्रिंट फ़ार्मेट में कुल तीन किताबें बिकी हैं अभी तक।
इसके पीछे ई बुक किताब सस्ती होना कारण है या लोगों में ई बुक की बढ़ती लोकप्रियता?
आपको कौन सा फ़ार्मेट पसंद है?
प्रिंट फ़ार्मेट का लिंक एक मित्र को बताया तो उनका कहना था कि किताब लेते आना। हम भुगतान कर देंगे। मतलब किताब बेचने का काम शुरू किया जाए।
अभी तक इतनी किताबें (कुल 23) बिक चुकी हैं क़रीब पाँच सौ रुपए रायल्टी के जमा हो चुके हैं।
मन कर रहा है दोस्तों को एक पार्टी दे दी जाए।
अगर चाय पार्टी करते हैं तो कितने मित्र आएँगे चाय पीने। चाय के बहाने किताब पर भी चर्चा हो जाएगी।
'बेवकूफ़ी का सफ़र' के बाद पुलिया सीरिज़ की दूसरी किताब पर भी काम शुरू हो चुका है। जल्द ही उसकी सूचना जारी होगी।
फ़िलहाल तो 'बेवकूफ़ी का सफ़र' ख़रीदने के सभी लिंक टिप्पणी बाक्स दे रहे हैं।
और हाँ, पार्टी वाली बात मज़ाक़ नहीं है। चाय पिलाएँगे मित्रों को जो किताब पढ़ चुके हैं। आपने पढ़ी क्या?

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Monday, December 09, 2024

 पिछले हफ़्ते फूलबाग की तरफ़ जाना हुआ। दोपहर का समय। जाम जैसा तो नहीं लगा लेकिन चौराह किसी व्यस्त कामकाजी इंसान जैसा लगा। हर चेहरा बिजी बिजी। सड़क पर एक सवारी मूलगंज, एक सवारी मूलगंज की आवाज़ सुनाई दे रही थे। सामने एलआईसी की बड़ी इमारत के बग़ल से आता ट्रैफ़िक। 

चौराहे के पास सड़क के डिवाइडर पर बनी जगह पर बैठे सैकड़ों कबूतर चीयर लीडर्स की तर्ज़ पर हवा में उड़कर , करतब जैसा दिखाते हुए वापस आकार बैठ जाए। सामने दीन दयाल उपाध्याय की प्रतिमा दिखाई दे रही थी। वहीं कहीं कामरेड राम आसरे की प्रतिमा भी लगी थी। लेकिन वह दिख नहीं रही थी। कामरेड अब हर जगह नज़र ओझल हो रहे हैं।

लौटते समय बिरहाना रोड होते हुए आए। सड़क के दोनों ओर ज्वैलर्स ही ज्वैलर्स। अलावा इसके तमाम प्रसिद्द पुरानी दुकाने। दुकानों के सामने दुकानों के साइनबोर्ड के अलावा दुकानों के नाम के बोर्ड एक साइज़ में लटके दिखे। दुकानों की ड्रेस की तरह।

सड़क किनारे एक लाइन में चार-पाँच मक्खन मलाई के ठेले दिखे। कानपुर की मक्खन मलाई प्रसिद्ध है। तमाम लोगों ने इसकी तारीफ़ में लिखा है। लेकिन हमने पहले कभी खायी नहीं थे। सोचा अभी तक नहीं खाए तो अब खा लें। एक ठेले से सौ ग्राम ली। दोने में थमा दी उसने। साथ रुपए की सौ ग्राम। वहीं खड़े-खड़े खाई। 

हर ठेले पर स्व. कल्लू मक्खन वाले की फ़ोटो इश्तहार की तरह लगी थी। 1960 में बेचना शूरू किया होगा कल्लू जी ने। बाद में और लोग लगाने लगे। ऐसा लगा सब उनके ख़ानदानी हैं। लेकिन पूछने पर पता लगा ऐसा है नहीं। सब बस फ़ोटो लगाए हैं उनकी। 

फ़ायदे के लिए प्रसिद्ध हो गए इंसान से ज़बरियन सम्बंध बनाना आम बात है। गांधी से घृणा करने की हद तक नापसंद करने वाले मंच पर गांधी जी की जय बोलते हैं। 

आगे मारवाड़ी लाइब्रेरी दिखी। 1918 में स्थापित लाइब्रेरी का शहर के पुराने लोग गर्व से ज़िक्र करते हैं। पहली  मंज़िल पर स्थित लाइब्रेरी पर चैनल वाला दरवाज़ा लगा है। सरका के अंदर गए तो एक आदमी ने हमको जिस अन्दाज़ में देखा उसका हिंदी अनुवाद करें तो लगे वह पूछ रहा था-' कौन? क्या चहाते हैं?'

हमने बिना पूछे डरते-डरते टाइप बता दिए -'आर्मापुर में रहते हैं। लाइब्रेरी देखनी है।'

उसने अंदर बैठे किसी आदमी से पूछा और कहा -'मेम्बर बनना होगा। तब देख पाएँगे किताबें।'

मेम्बर फ़ीस 300 रुपए प्रति वर्ष। किताबें इशु करानी हो तो आठ सौ रुपए। एक बार में दो किताबें इशु होंगी। पंद्रह दिन के लिए। 

हम वहीं कुर्सी पर बैठकर मेज़ पर रखे अख़बार देखने लगे। कुछ लोग वहाँ बैठे पढ़ रहे थे। नोट्स नुमा कुछ ले रहे थे। बीस-पचीस लोग होंगे। लाइब्रेरी में लगभग 30-35 हज़ार किताबें होंगी। अलमारियों पर उनको देने वाले लोगों के नाम लगे थे। 

अख़बार पलटकर देखने के बाद सबसे पास की अलमारी देखी हमने। चाँद का फाँसी अंक और अन्य दुर्लभ किताबें मौजूद थीं वहाँ। संदर्भ ग्रंथ जो वहीं बैठकर देखे जाते हैं।

आगे और किताबें देखने की कोशिश करने पर लाइब्रेरी के एक कर्मचारी ने धीरे से बताया कि बिना सदस्य बने किताबें देखने की अनुमति नहीं है। थोड़ा चकित हुए हम। लाइब्रेरी कोई गोपनीय जगह है क्या जिसका सदस्य बने बिना किताबें देख तक न सकें। यह पहली बार देखा किसी लाइब्रेरी में। मन किया सदस्य बन जाएँ लेकिन फिर यह सोचकर कि घर से इतनी दूर लाइब्रेरी आना-जाना हो नहीं पाएगा, नहीं बने सदस्य। 

थोड़ी देर और वहाँ रहकर बिना किताबें देखे वापस चले आए। आते समय हमको किताबें देखने से रोकने वाले शख़्स ने रजिस्टर पर नाम पता लिखने को कहा ताकि सनद रहे कि हम वहाँ आए थे। हमने लिख दिया और वापस आ गए। आते समय और अभी भी सोच रहे थे कि इतना लाइब्रेरी में आम इंसान को किताब देखने न देना क्या पठन विरोधी व्यवहार नहीं है? 

सड़क पर फिर चहल-पहल मिली। एक नुक्कड़ पर एक शाकाहारी भोजनालय में कुछ लोग खाना खा रहे थे। दुकान पर बोर्ड लगा था -संगम शाकाहारी भोजनालय, नया गंज चौराहा। मालकिन श्रीमती  मुन्नी देवी शुक्ला। अब मालिकन जैसे शब्द दुकानों में कहाँ चलते हैं। 

सड़क के दोनों तरफ़ दुकानों में पुराने अन्दाज़ में गाव-तकिए लगे दुकानों के कर्मचारी बैठे दिखे। कुर्सी मेज़ और काउंटर वाले समय में कुछ ही जगह गाव तकिए वाली व्यवस्था दिखती है।

आगे तिराहे पर कटे-फटे नोट बदलने वाले बैठे थे। मन किया वो नोट बदल लें जो थोड़ा फटा होने के चलते मक्खन वाले ने लेने से मना कर दिया था। लेकिन फिर नहीं बदला। 

आगे कलट्टरगंज बाज़ार है। छह साल पहले जब बाज़ार आए थे तो यहाँ काम करने वाली मज़दूर परदेशन से मिले थे। उनसे  फ़ोटो उसको देने आए थे। सोचा मिला जाए फिर उनसे। पता किया तो मालूम हुआ परदेशन नहीं रहीं। कब नहीं रहीं पूछने पर लोगों से समय दो तीन महीने से लेकर दो-तीन साल तक बताया। जिस दुकान पर काम करती मिली थी उस दुकान वाले ने  निर्लिप्त भाव से बताया -'बीमार थी। कई जगह काम करती थी। नहीं रही।'

बाज़ार में सन्नाटा था। दुकानें बंद। जगह-जगह लोग ताश खेलते हुए समय काट रहे थे। एक जगह दो कुत्ते एक बोरी को नोचते हुए उस  पर क़ब्ज़े के लिए झगड़ रहे थे। देखकर मुझे राजनीतिक पार्टियों के लोग याद आए जो चुनाव चिन्ह या खुद को असली पार्टी बताते हुए संघर्ष करते हैं। अपने बग़ल में हो रहे कुत्तागीरी से निर्लिप्त ताश खेलते हुए समय बिताने वाले लोग शतरंज के खिलाड़ी वाले नवाबों जैसे लोग लगे जो अपने आसपास से बेपरवाह शतरंज खेलने में डूबे थे।

घंटाघर चौराहे पर आते-जाते लोगों को देखते रहे कुछ देर। लग रहा पूरा शहर ही बेतहाशा भागा चला रह है कहीं। घंटाघर का टावर कानपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के बोर्ड के पीछे सहमा सा खड़ा दिखा। शहर की अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह घंटाघर किसी कमजोर हो चुके बुजुर्ग की तरह अपने आसपास गुजरते जन-प्रवाह को देख रहा था। 

घंटाघर से विजय नगर तक के आटो में बैठे। रास्ते में घंटाघर से चटाई मोहाल, डिप्टी पड़ाव के रास्ते का वीडियो बनाया। विजय नगर से  आर्मापुर गेट तक दूसरे आटो में आए । आर्मापुर गेट पर, एक बच्ची जो शायद स्कूल से घर जा रही थी, ने आटो वाले से गरीब आवाज़ में कहा -'दस रुपए देंगे।' जबाब में आटो वाले ने वात्सल्य, अपनापे और प्यार के मिले-जुले स्निग्ध भाव से बच्ची को देखते हुए कहा -'बिटिया तुम जितना देओगी उतने में ले चलेंगे।' बच्ची चुपचाप आटो में बैठ गयी। आटो चल दिया।  

आर्मापुर गेट से पैदल घर तक आते हुए हमारे ड्राइवर रहे संजय ने हमको पैदल आते देख लिया। हमको ज़बरियन गाड़ी में बैठकर घर छोड़ा। 


Saturday, December 07, 2024

बेवक़ूफ़ी का सफ़र का प्रकाशन




 कल हमने अपनी नई किताब ‘बेवक़ूफ़ी का सफ़र’ के प्रकाशन की ख़बर दी थी। सौ से ऊपर मित्रों ने बधाई, शुभकामनाएँ भेजीं। सभी का धन्यवाद, आभार।

आज देखा तो अभी तक ग्यारह लोगों ने किताबें ख़रीदीं भी। वो ग्यारह दोस्त कौन हैं यह मुझे पता नहीं लेकिन उनका अलग से आभार। शुक्रिया।
इस ख़रीद से 330 रूपये की रायल्टी की कमाई हुई है हमको।कम नहीं है। लेकिन एक अकुशल मजदूर की दैनिक मजदूरी से
काफ़ी कम है। एक निठल्ले इंसान और मेहनत करने वाले की मजदूरी में जितना अंतर तो जायज़ है।
इस बीच प्रिंट वाली किताब भी उपलब्ध हो गई है। टिप्पणी में प्रिंट वाली किताब आर्डर करने का लिंक दिया है। मन करे तो ख़रीदें। किंडल में भी किताब अपलोड की है। लेकिन अमेरिका कनाडा के दोस्त कह रहे हैं कि अभी तक वहाँ डाउनलोड नहीं हुई है किताब। अब शायद होने लगी हो।
इस किताब की तैयारी पिछले महीने से जारी थी। पिछले दिनों शाहजहांपुर गए थे तो सैफ़ से मुलाक़ात के दौरान इसके लेख सैफ को दिखाए थे। कवर पेज बनाने के लिए। सैफ के कवर पेज को देखकर आलोक पुराणिक जी ने राय दी, अनूप जी को हवाई जहाज पर उल्टा बैठाइए।
आलोक जी की मंशा एक शुभचिंतक की मंशा थी। उनका सोचना था कि देश के आजकल के चलन के हिसाब से चलना चाहिए हमको भी। सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है तो लेखक क्यों सीधे बैठे।
सैफ़ की राय में उल्टा बैठाने में चाय का कप नहीं दिखेगा। चाय का कप न दिखे तो क्या फ़ायदा फ़ोटो का। लिहाज़ा फ़ोटो वैसा ही बना रहा।
शीर्षक के बारे में भी एक मित्र ने कहा, ‘बेवक़ूफ़ी का सफ़र’ की जगह ‘बेफिक्री का सफ़र’ ज़्यादा मुफ़ीद रहेगा। बेवक़ूफ़ी में नकार का भाव है। बेफिक्री धनात्मक सोच का परिचायक है।
हमको बात एक बारगी तो ठीक लगी। लेकिन फिर समस्या यह आई कि किताब के लिए आईएसबीएन नंबर ‘बेवक़ूफ़ी का सफ़र’ के नाम से लिया है। अलग नाम से लेने पर फिर हफ़्ता निकल जाएगा। इसलिए नाम बदला नहीं।
वैसे भी बेफिक्री ओटीपी की तरफ़ अल्पकालिक है। बेवक़ूफ़ी शाश्वत है। कोई परेशानी आने पर ‘बेफिक्री’ हवा हो सकती है लेकिन ‘बेवक़ूफ़ी’ कभी साथ नहीं छोड़ती। कोई कह सकता है कि यह तर्क ‘बेवक़ूफ़ी’ का है। यह बात ही किताब के शीर्षक के पक्ष में जाती है।
किताब स्व प्रकाशन योजना के तहत किया गया है। किसी मित्र को इस बारे में जानकारी चाहिए तो हमसे संपर्क कर सकता है। इस जानकारी में हमारी किताब ख़रीदने की शर्त नहीं शामिल है।

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Friday, December 06, 2024

बेवकूफ़ी का सफ़र

 


पिछले महीने एक पोस्ट में अपनी किताबों को छपाने की योजना के बारे में लिखा था। उनमें से एक ट्रेन और हवाई यात्राओं के संस्मरण के बारे में थी। पिछले महीने आलस्य और आराम के गठबंधन में काम करते यह किताब तैयार हो गई। कल ई बुक के रूप में प्रकाशित भी हो गयी। ई बुक का लिंक टिप्पणी में दिया है। इस पर क्लिक करके आप किताब अपने मोबाइल या कम्प्यूटर पर डाउन लोड करके पढ़ सकते हैं। अभी pothi प्रकाशन से प्रकाशित हुई है ई बुक। जल्द ही किंडल और दूसरे प्लेटफ़ार्म पर भी प्रकाशित होगी।

किताब का नामकरण वरिष्ठ व्यंग्यकार Alok Puranik जी ने किया है। वे हमारी किताबों के नाम पुरोहित हैं। इस नामकरण के पीछे उनकी हमारी बेवक़ूफ़ियों पर भरोसे
की भावना दिखाई देती है। आशा है उनके इस विश्वास की रक्षा होती रहेगी।
किताब का कवर पेज हमारे शाहजहाँपुर के साथी Saif Aslam Khan ने डिज़ाइन किया है। सैफ़ बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। बचपन से कार्टून और स्केच बनाते रहे हैं। आजकल सैफ़डूडल के नाम से डूडलिंग करते हैं। उनके काम को गूगल ने भी सराहा है। शाहजहाँपुर में कैंट की बेंच नम्बर सात पर ज़बरियन क़ब्ज़ा करके उस पर देश-विदेश के तमाम नामचीन लोगों के स्केच बनाए हैं।
किताब वाहन निर्माणी जबलपुर में हमारे वरिष्ठ महाप्रबंधक रहे टीटीएस कृपा वेंकटेशन जी को समर्पित है। कृपा सर के साथ काम करना एक बहुत ख़ुशनुमा अनुभव रहा। बावजूद बहुत वरिष्ठ होने के उनका दोस्ताना व्यवहार और असहमति को बेझिझक प्रकट करने की जैसी लोकतांत्रिक उनके साथ रही वैसी नौकरशाही में दुर्लभ है।
किताब का प्रकाशन अपन ने स्व प्रकाशन योजना के तहत किया है। पहली किताब 'पुलिया पर दुनिया' भी हमने लगभग दस साल पहले स्व प्रकाशन योजना के तहत ही किया था। इसके बाद छह किताबें विभिन्न प्रकाशनों से आईं। यह आठवीं किताब फिर से स्व प्रकाशन योजना से आ रही है।
अभी यह किताब ईबुक फ़ार्मेट में है। जल्द ही यह किताब प्रिंट फ़ार्मेट में भी आएगी। किताब प्रकाशन के लिए जमा की है। अप्रूवल होने पर उसका लिंक साझा करेंगे।
ई बुक किताब की क़ीमत 40 रुपए रखी है। मेरे ख़याल में ज़्यादा नहीं है। किताब के बारे में कोई भी सुझाव देंगे तो अपन आभारी रहेंगे।
यह किताब, अब तक आई किताबें और आने वाली कोई भी किताब बिना मेरे पाठकों के सहयोग और समर्थन के सम्भव नहीं थी। आपकी टिप्पणियाँ मुझे सदैव लिखने के लिए उत्साहित करती रहीं हैं।
आपके सहयोग के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। आभार।


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Wednesday, December 04, 2024

नदी के मुँह से निकलती भाप

 पिछले हफ़्ते शाहजहाँपुर गए। चार दिन रहे। मित्रों से मेल मुलाक़ात हुई। कुछ लोगों से मिलना रह गया। शहर में इधर-उधर आने जाने के दौरान देखा कि सड़क पर भीड़ बहुत बढ़ गयी है।  सड़कें तो उतनी ही चौड़ी जितनी पहले थीं लेकिन कारों और ई रिक्शों  की संख्या की बहुत बढ़ गयी है। छोटी ,पतली संकरी गलियों तक में लोग कार घुसाकर चलते दिखे। 

सड़क पर भीड़ के बावजूद कहीं किसी को उत्तेजित होते नहीं देखा। लोग तसल्ली से जाम हटने का इंतज़ार करते दिखे। एक दिन हम एक गली से निकल रहे थे। रास्ता पता नहीं था लेकिन शार्टकट के लालच और गूगल महाराज के निर्देशन के चलते एक गली में घुस गए। गली इतनी ही चौड़ी थी कि सिर्फ़ एक कार ही गुजर सकती थी। सामने से एक ठेलिया आ रही थी। ठेलिया वाले ने कार आते देखकर ठेलिया क़रीब पचास कदम पीछे खींची। कार को निकलने दिया। एक लड़के ने कार आते देखकर सड़क किनारे खड़ी अपनी  मोटरसाइकिल और किनारे की ताकि कार निकल सके। 

रामप्रसाद बिस्मिल , अशफ़ाक उल्ला खान और रोशन सिंह के बलिदान के चलते शाहजहाँपुर को शहीदों की धरती कहते हैं। वहाँ के लोगों के सड़क व्यवहार के चलते हमें लगा यह धैर्य की धरती भी है। 

शहर प्रवास के दौरान एक दिन खन्नौत नदी देखने गए। गेस्ट हाउस से थोड़ी ही दूर से गुजरती है नदी। सुबह निकले तो देखा सड़क पर टहलते लोग दिखे। मार्निग वाकर समूह के लोग शायद आकर लौट चुके थे। सुबह काम वाले लोगों को ठेकेदार का मुंशी जमा कर रहा था। फुटपाथ किनारे एक बढ़िया एक बुजुर्ग से बतिया रही थी। बतिया क्या रही थी बुजुर्ग से कुछ कह रही थी। बुजुर्ग चुपचाप उसको देखते हुए उसकी बातें सुन रहा था। 

कैंट के तिराहे से ज़रा सा आगे दायीं तरफ़ को नदी की तरफ़ का रास्ता है। रास्ते के दोनों तरफ़ खड़े पेड़ों की जड़ें ऐसे दिख दातों की तरह दिख रहीं थीं जिनके मसूढ़े खुल गए हों। पेड़ कभी भी गिरने के लिए तैयार दिखे। 

थोड़ा आगे चलने पर रास्ते में झाड़-झंखाड़ के चलते ऊपर आ गए। खेत-खेत होते हुए नदी की तरफ़ बढ़े। 

नदी के पास पहुँचकर एक मोटरसाइकिल दिखी। उसके पीछे एक लड़की और साथ में एक लड़का। उनके पास से गुजरने तक   लड़का मोटरसाइकिल स्टार्ट कर चुका था। लड़की उसके पीछे बैठकर चली गयी। सुबह-सुबह वे दोनों भी नदी देखने आए होंगे। 

नदी तसल्ली से बह रही थी। जाड़े के समय  मुँह से निकली हवा भाप की तरह लगती है। बहती नदी के मुँह से भी भाव निकल रही थी। निकली हुयी भाप इठलाती हुई खेतों की तरफ़ जा रही थी। थोड़ा आगे चलकर यह भाप कोहरे में बदल गयी थी। ऐसा लगा मानो कोहरे ने नदी के रास्ते में अवरोध लगा दिया हो ताकि उसको रास्ता न दिखे न और वह ठहर जाए। आगे न बढ़े। लेकिन नदी किसी रास्ते की मोहताज थोड़ी होती है। वह तो खुद अपना रास्ता बनाती है। वह धड़ल्ले से बहती रही। 

सामने देखा नदी का पानी तिरछा होकर बह रहा था। शायद उसको तिरछे होकर आगे बढ़ने में ज़्यादा सहूलियत लग रही हो। शतरंज के ऊँट की तरह तिरछा बहता पानी आगे बढ़ता जा रहा था। 

थोड़ी देर बहती नदी को देखने के बाद लौटने की सोची। इस बीच एक जानवर नदी में घुसता दिखा। लगा कोई मोटा कुत्ता होगा। थोड़ी देर में वह बग़ल से होकर आगे जाता दिखा और फिर नदी में घुस गया। पानी पीने लगा। हमें लगा कोई जंगली जावनर होगा। हम लौट लिए। 

लौटते समय देखा वह जानवर हमसे आगे निकलकर खेत में पड़ी किसी चीज़ को खा रहा था। वह हमारे रास्ते में था। हमको लगा वह कुछ खाने का बहाना करते हुए हमारा इंतज़ार कर रहा था। 

अभी तक निर्लिप्त भाव से उस जानवर को देखने के कारण हमको उससे कोई डर नहीं लगा। लेकिन अब हमारे रास्ते में होने के कारण हमारी निर्लिप्तता क्लीन बोल्ड हो गयी। उसकी डर और आशंका बैटिंग क्रीज़ पर आ गयीं। हमको लगा पास से गुजरते ही यह जानवर हम पर हमला करेगा। सम्भावित हमले से बचने के लिए अपने को तैयार करने लगे। खेत में पढ़े दो अद्धे हाथ में ले लिए। सोचा अगर हमला करेगा तो पहले इसे मारेंगे। डर कर भागेगा तो ठीक नहीं तो मोबाइल फेंककर मारेंगे। मोबाइल फेंककर मारने की सोचते हुए उसकी क़ीमत एक बारागी ध्यान में आई लेकिन मोबाइल उस समय मेरे हाथ में मौजूद एक अद्धे से ज़्यादा क़ीमत का नहीं लगा। 

यह भी सोचा कि अगर उस जानवर ने हमला किया तो फ़ौरन गेस्ट हाउस में सो रहे बेटे को फ़ोन करेंगे। लोकेशन भेजकर उसको बुला लेंगे। 

यह सब सोचते हुए हम बहुत आहिस्ते से आगे बढ़े। आगे कुछ झोपड़ियाँ दिखीं। हम सीधे न लौटकर झोपड़ियों की तरफ़ बढ़ते गए। उस जानवर से हमारी दूरी बढ़ती गयी। हमारा डर भी काम होते हुए और कम होता गया। 

झोपड़ियों के बाहर कुछ लड़कियाँ और बच्चे मौजूद थे। कुछ कुत्ते भी खेल रहे थे उनके आसपास।  हमको वहाँ से गुजरते देखकर उन्होंने हमारी तरफ़ देखा। हमने उनसे चलते-चलते बातचीत की। उन्होंने बताया कि वे न जाने कब से यहाँ रह रहे हैं। हमने उनसे बताया  -'यहाँ एक जानवर दिखा इसीलिए इधर से गुजर रहे हैं।'

फिर पूछा भी क़ि यहाँ जंगली जानवर अक्सर आते रहते हैं। तुम लोगों को डर नहीं लगता। 

'अरे हमारे इन कुत्तों के कारण उनको खुद डर लगता है। वो इधर नहीं आते' -एक बच्ची ने बताया। 

यह सुनकर हमारा रहा-बचा डर भी विदा हो गया। कुछ आगे ही सड़क भी दिखने लगी। हम सड़क पर आ गए। 

लौटते हुए स्कूल जाते बच्चे दिखे। दो बच्चियाँ साइकिल पर जाती आपस में बतियाती भी जा रही थीं। हमारे बग़ल से गुजरते हुए एक बच्ची के कुछ कहने पर दूसरी ने कहा -'ओक्खे।' 

हम उन सड़क पर गुजरते लोगों को , मैदान में खेलते बच्चों और आर्मीगेट पर ड्यूटी पर तैनात सिपाहियों को देखते हुए वापस गेस्ट हाउस लौट आए। 

Sunday, December 01, 2024

किनारे पे न चलो, किनारा टूट जाएगा


पिछले दिनों कानपुर का 150 साल पुराना गंगापुल टूट गया। इस पुल पर से कई बार गुजरे हैं। अनेक यादें जुड़ी हैं। पुल गिरने की खबर मिलने पर देखने गए पुल। शहर होते हुए घर से दूरी 15 किलोमीटर। गंगाबैराज की तरफ़ से जाते तो दूरी 23 किलोमीटर दिखा रहा था। समय लगभग बराबर। शहर होते हुए गए। जहां से पुल शुरू होता है वहीं पर गाड़ी सड़क किनारे ही खड़ी कर दी। रेती में पुल के नीचे -नीचे चलते हुए उस हिस्से की तरफ़ गए जो हिस्सा टूटा था। 

पुल का टूटा हुआ हिस्सा नदी के पानी में धराशायी सा लेटा  था। क्या पता वह गाना भी गा रहा हो -'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले ये जगह साथियों।' पुल के आसपास पक्षी तेज आवाज़ में चहचहाते हुए शायद पुल के बारे में ही चर्चा कर रहे थे।

एक दूधिया अपने दूध के कनस्तर पानी में धोकर रेती में औंधाए रखकर गंगा स्नान कर रहा था। स्नान करके नदी से निकलते हुए एक बुजुर्ग को नदी किनारे निपटते देखकर भुनभुनाते हुए कहने लगा -' यह भी नही कि गंगाजी से ज़रा दूर होकर निपटें। एकदम किनारे ही गंदगी करने बैठ गए।'

उसके भुनभुनाने के अन्दाज़ से लग रहा था कि उसकी मंशा केवल खुद को और उसके बग़ल से गुजरते हमको सुनाने तक सीमित थी। थोड़ा ज़ोर से बोलता तो आवाज़ उस निपटते बुजुर्ग तक पहुँच जाती। लेकिन उसकी मंशा शायद भुनभनाने तक ही सीमित थी। बुजुर्ग उसकी भुनभुनाहट से निर्लिप्त निपटने में तल्लीन रहा।

बाद में उस बुजुर्ग के पास से गुजरते हुए लगा कि उसको बैठने में कुछ तकलीफ सी थी। बड़ी मुश्किल से  बैठे-बैठे सरकते हुए वह नदी की तरफ़ जाता दिख रहा था। उसकी तकलीफ़ का अन्दाज़ अगर दूध वाले को होता तो शायद वह कम भुनभुनाता। 

वहीं चार छोटे-छोटे बच्चे रेत पर खेल रहे थे। उनमें तीन बच्चे थे , एक बच्ची।  पास जाकर देखा तो वे रेत को नदी के पानी से गीला करके बालू के खिलौने बना रहे थे। 'कौन सा खिलौना बना रहे हो ?'  पूछने पर बच्चों ने बताया -'खाना पकाने के खिलौने बना रहे हैं।' शुरुआत चौके से हुयी। चौका बनाने के बाद उनमें से एक बच्चा थाली या परात जैसा कुछ बना रहा था।

बच्चों ने आपस में एक-दूसरे के बारे में बताया। बच्ची थोड़ा मुखर सी लगी। उसके बारे में एक बच्चे ने बताया -'ये गाली बकती है।' 'क्या गाली बकती है ? ' पूछने पर बच्चे ने बताया कि क्या-क्या गाली बकती है बच्ची। आम जन-जीवन में रोज़मर्रा की गालियाँ बताई बच्चे ने। बच्चों की बातचीत सुन सकते हैं यहाँ वीडियो में। 

बच्चों को खेलता छोड़कर हम आसपास थोड़ा टहले। लोग रेत में अपने-अपने हिसाब से ज़मीन घेरकर गर्मी के फल उगाने की तैयारी कर रहे। गोबर की खाद भी दिखी वहीं। हम एक घेरे में घुस गए यह सोचते हुए कि आगे निकलने का रास्ता होगा। लेकिन जगह इस तरह से घिरी हुई थी कि उसको पार करने का कोई जुगाड़ नहीं था। हमको वापस लौटना पड़ा।

लौटकर देखा तो बच्चे खिलौना बनाने के काम पूरा करके या स्थगित करके नदी में नहा रहे थे। हमारे पास पहुँचने तक वो बाहर निकल आए। हमने उनके फ़ोटो खींचने के लिए पूछा तो सब तैयार हो गए। पोज बनाकर भी खड़े हो गए। एक बच्चे ने उँगली से 'V' का निशान भी बनाया। उसको देखकर बच्ची ने  भी उँगली 'V' वाले अन्दाज़ में फैला ली। बच्ची ने पहले 'V' का निशान ऊपर की तरफ़ करके बनाया। बाद में  दोनों आखों को घेरते हुए 'V' का निशान बना लिया। 

फ़ोटो देखकर बच्चे खुश हो गए। एक ने उत्साहित होकर कहा -'अबे अब हमारे फ़ोटो वायरल हो जाएँगे। इंस्टाग्राम पर लगाएँगे अंकल।' सब बच्चों ने चहकते हुए  फिर से फ़ोटो देखे और दोबारा पोज देकर फ़ोटो खिंचवाए। वे खुश हो गए। मेरे मन हुआ कि काश ये फ़ोटो उन बच्चों को दे पाते। अब सोच रहे हैं कि बनवाएँगे फ़ोटो। कभी शुक्लागंज गए तो लेते जाएँगे। दे देंगे बच्चों को। 

बच्चों ने बताया कि उनमें से तीन बच्चे स्कूल जाते हैं। एक सबसे छोटा बच्चा स्कूल नहीं जाता। उसके बारे में बच्चों ने कहा -'ये स्कूल नहीं जाता , गाली बकता रहता है।' मुझे ताज्जुब हुआ कि पाँच-दस मिनट में ही गाली देने की शिकायत बच्ची से हटकर एक बच्चे की तरफ़ मुड़ गयी। 

बच्चों के नाम पूछे तो पता चला उनके नाम जैन खान, बिलाल खान , शाहबाज़ अली खान और आलिया खान हैं। सब एक ही परिवार के बच्चे हैं। सगे ,चचेरे  भाई-बहन। शाहबाज़ अली खान ने अपना नाम और लम्बा बताया था। लेकिन बाद में अपना नाम शाहबाज़ अली खान तक ही सीमित करने को राज़ी हो गया। बच्चे शुक्लागंज में गोताखोर मोहल्ले में रहते हैं। शायद उनके घर वाले नाव चलाने का काम करते हों। हो सकता है कोई गोताखोर भी हों। 

हमने बच्चों से पूछा -'कोई कविता या कोई शायरी आती है ? आती हो तो सुनाओ।'

बच्चों ने फ़ौरन एक शायरी सुनाई । 

किनारे  पे न चलो, किनारा टूट जाएगा ,

चोट तुम्हारे  लगेगी , दिल हमारा टूट जाएगा।

सबसे पहले शायरी  शाहबाज़ अली खान और आलिया ने सुनाई। फिर सभी ने बारी -बारी यही शायरी दोहराई। हड़बड़ी में शायरी के लफ़्ज़ इधर-उधर होते रहे। बच्चे एक-दूसरे को 'अरे चुप ' कहते हुए अपने अन्दाज़ में शायरी सुनाते रहे। 

बच्चों से हमने कोई और भी कविता या शायरी सुनाने को कहा तो उन्होंने कहा -'हमको यही आती है।' 

बच्चे आपस में खेलने में मशगूल हो गए। हम वापस लौट लिए। 

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Saturday, November 30, 2024

धनिया के पैसे नहीं लेंगे, जाओ मौज करो

 
शाम को सब्ज़ी लेने गए बाज़ार। गुमटी में कुछ काम था तो सोचा सब्ज़ी भी वहीं से ले लेंगे। रास्ते में सोचा सब्ज़ी विजय नगर से ही ले लें, बाक़ी सामान गुमटी से ले लेंगे। लेकिन फिर न्यूटन के जड़त्व के नियम का आदर करते हुए गुमटी की तरफ़ ही बढ़ लिए। 

गुमटी में भीड़ बहुत थी। गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं मिली मेन रोड पर। गली में घुसा दिए गाड़ी। गली में घुसते ही एक दुकान बंद हो रही थी। वहीं कुछ देर इंतज़ार करके,  दुकान का शटर गिरने पर गाड़ी खड़ी कर दी। 

गाड़ी करने के बाद सब्ज़ी वाली की तरफ़ गए। सब्ज़ी वाली गली में फल, अचार और परचून की भी दुकाने भी हैं। सड़क ठेलिया वालों के क़ब्ज़े में सहम-सिकुड़ गयी थी। सड़क से किसी गाड़ी की सहज रूप से गुजरना चुनौती का काम।

एक दुकान से कुछ सब्ज़ी ली। 240 रुपए हुए। आनलाइन भुगतान के लिए स्कैनर माँगा तो सब्ज़ी वाले ने कहा -'हम मोबाइल ही नहीं रखते। स्कैनर भी नहीं।' 

जब तक भुगतान के लिए पैसे निकालें सब्जीवाले ने थोड़ी धनिया थमा दी। हमें लगा -'दस रुपए की धनिया दे रहे हैं ताकि 250 रुपए हो जाएँ और भुगतान आसान हो जाए।'

धनिया हमारे गार्डन में लगी है। हमने कहा -'धनिया नहीं चाहिए।'

सब्ज़ी वाले भाई जी ने शाही  अन्दाज़ में कहा -'अरे धनिया के पैसे नहीं लेंगे। जाओ मौज करो।' 

हमने बहुत कहा धनिया के पैसे ले लो लेकिन उन्होंने लिए नहीं। 

हमने नाम पूछा तो बताया -'नरेश।'

हमने कहा -'नरेश माने राजा होता है। इसीलिए अन्दाज़ शाही है।'

नरेश बोले -'सब आप लोगों की दुआ है। '

वहीं खड़े एक ग्राहक ने बताया -'नरेश सबसे मस्त सब्ज़ी वाले हैं यहाँ। दरियादिल।सब लोग इसीलिए इनके पास आते हैं सब्ज़ी लेने। '

हमने 500 रुपए का नोट दिया। जब तक वो पीछे की परचून की दुकान से फुटकर कराएँ तब तक हमने सोचा गोभी भी यहीं से ले लेते हैं। गोभी हमें लेनी थी, हमने देख भी ली थी वहाँ लेकिन देखने में थोड़ा बड़ी लगी थीं इसलिए सोचा और दुकाने भी देख लें। लेकिन मुफ़्त की मिली धनिया ने हमें गोभी भी वहीं से लेने के लिए उकसा दिया। पचास रुपए की एक गोभी के हिसाब से दो गोभी ले ली। 

इस बीच एकाध ग्राहक और आए। उनको भी शाही अन्दाज़ में निपटाया सब्ज़ी वाले ने। 

हम और सब्ज़ी लेने के लिए दूसरे ठेलियों की तरफ़ गए। सब सामान ले लिए लेकिन मशरूम नहीं मिला कहीं। हमें याद आया कि नरेश की ठेलिया पर मशरूम थे कुछ। हम वापस गए। देखा केवल दो पैकेट बचे थे मशरूम के। हमने पूछा -'केवल दो ही हैं ?'

'कितने चाहिए ?' -पूछा नरेश ने।

हमने बताया -'पाँच पैकेट चाहिए।'

'दो मिनट रुकिए' कहकर नरेश उस तरफ़ चले गए जिधर और सब्ज़ियों की दुकानें थीं। उन दुकानों पर कहीं दिखा नहीं था मुझे मशरूम। हमें लगा वे  उनमें से ही किसी दुकान पर खोजेंगे और ख़ाली वापस आएँगे। लेकिन कुछ ही देर में नरेश तीन मशरूम के पैकेट लिए आए और हमारे सामने धर दिए। चालीस रुपए के एक पैकेट के हिसाब से दो सौ रुपए भुगतान करके कहा -'तुम्हारा दिया हुआ नोट तुम्हारे पास ही लौट आया।'

इस बीच एक महिला गोभी लेने आई। मोलभाव करने पर नरेश ने कहा -'अभी-अभी भाई साहब को पचास रुपए में दी है। आप पैंतालीस रुपए दे दो।'

लेकिन महिला और कम कराने पर तुली थी।उसने चालीस रुपए में देने को कहा। नरेश  पैंतालीस पर ही अड़े रहे। महिला ने फिर चालीस की ज़िद की। चालीस -पैंतालीस की रस्साकसी देखती हुयी  गोभी ठेलिया पर  शांत भाव से बैठी रही।

महिला ग्राहक और नरेश का मोलभाव देखकर हमको  याद आया कि नरेश ने हमको दस रुपए की धनिया मुफ़्त में दी थी। हमने चलते हुए कहा -'अरे दस रुपए हमसे वापस ले लो। गोभी दे दो ।'

नरेश ने हाथ जोड़ दिए। बोले -'आपकी दुआ बनी रहे। यही बहुत है।' 

हम चल दिए। देख नहीं पाए कि महिला को गोभी कितने में दी आख़िर में। 

अभी घर आकर हमको नरेश का अन्दाज़ याद रहा है -'धनिया के पैसे नहीं लेंगे। जाओ मौज करो।' 



Friday, November 29, 2024

नीचे बहती गंगा मैया , ऊपर चले रेल का पहिया

कानपुर कनकैया , जंह पर बना घाट सरसैया
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पिछले दिनों कानपुर को शुक्लागंज से जोड़ने वाला गंगापुल का एक हिस्सा टूट गया। इस पुल से शहर की तमाम अनगिनत ऐतिहासिक यादें जुड़ी थीं।
लगभग एक सौ पचास साल पुराना यह पुल कानपुर से शुक्लागंज को जोड़ता था। पुल दो खंडों में बना था। नीचे लकड़ी का पुल था, जिससे हल्के वाहन और पैदल यात्री गुजरते थे और ऊपर सड़क पर कारें और दूसरे वाहन चलते थे। ऊपर वाले हिस्से पर पहले नैरो गैज का रेलवे ट्रैक था। 14 जुलाई 1875 को पहले नीचे वाला पैदल पुल खुला और दूसरे दिन रेल पुल से ट्रेनों का आवागमन शुरू हुआ।
पुल बनने में तब 17.60 लाख रुपए खर्च हुए थे।
इस पुल की लंबाई करीब 800 मीटर है।लगभग 50 साल तक इस पुल के ऊपरी हिस्से से ट्रेनें और नीचे से अन्य वाहन गुजरते रहे। कानपुर पर गंगा किनारे सरसैया घाट है। कानपुर , सरसैया घाट और गंगापुल को जोड़ते हुए लोगों ने गीत गढ़ा :
कानपुर कनकैया ,
जंह पर बना घाट सरसैया,
नीचे बहती गंगा मैया ,
ऊपर चले रेल का पहिया,
चना ज़ोर गरम .... ।
चना बेचने वालों ने इस अपने-अपने हिसाब से गढ़े लोकगीत के माध्यम से कानपुर और शुक्लागंज को जोड़ने वाले इस गंगापुल को अनगिनत पीढ़ियों और लोगों के ज़ेहन में इसे प्रसिद्ध कर दिया। अपने-अपने हिसाब इसकी यादें लोगों के दिमाग़ में बसी हुई हैं। चना बेचने वाले रामकथा से जोड़कर आगे कहते थे :
चने को खाते लछमण वीर
चलाते गढ लंका में तीर
फूट गयी रावण की तकदीर
चना जोर गरम......।
इस लोकगीत में समय-समय पर समसामयिक किस्से अपने-आप जुड़ते रहे और पुल पर से पीढ़ियाँ गुजरती रहीं। लगभग आधा शुक्लागंज रोज़ी-रोटी के सिलसिले में रोज इस पुल से कानपुर आता-जाता रहा।
बाद में जब उन्नाव और कानपुर के बीच सड़क और ट्रेन यातायात बढ़ा तो ट्रेनों के लिए अलग से पुल बनवाया गया और पुराने पुल के दोनों हिस्सों पर सड़क यातायात की व्यवस्था कर दी गई।
कानपुर से शुक्लागंज को जोडऩे के लिए अंग्रेजों ने पुल का निर्माण शुरू किया था । अवध एंड रुहेलखंड कंपनी लिमिटेड को इस पुल के निर्माण का ठेका दिया गया। पुल की डिजाइन जेएम हेपोल ने बनाई थी। निर्माण कराने वाले रेजीडेंट इंजीनियर एसबी न्यूटन ने असिस्टेंट इंजीनियर ई वेडगार्ड के साथ मिलकर इसे तैयार किया था। तब चीफ इंजीनियर टी लोवेल थे।
गंगा के एक ओर शुक्लागंज में कानपुर पुल बायां किनारा या गंगाघाट रेलवे स्टेशन था तो इस पार भी एक रेलवे स्टेशन बना था। ऐसा माना जा रहा है कि गंगाघाट की तरह इस पार भी ट्रेनें रुकती थीं। केंद्रीय विद्यालय व ओईएफ स्टेडियम के सामने आज भी ईंटों का बना एक लंबे चबूतरे का ढांचा देखा जा सकता है। बुजुर्ग बताते हैं कि यहां कभी स्टेशन था और ट्रेनें रुकने पर इस चबूतरे का प्रयोग प्लेटफार्म के रूप में किया जाता था। पैदल पुल मार्ग से प्लेटफार्म पर चढऩे के लिए सीढिय़ां भी थीं, जो अब मिट्टी में दब चुकी हैं।
पुल की हालत देखते हुए इस पर क़रीब चार साल पहले आवागमन बंद कर दिया था। इस पुल से हम भी कई बार आए-गए। नीचे पैदल यात्रियों ने लिए बने पुल पर लोग गर्मी के दिनों में आराम करते दिखते थे। पुल की बनावट के चलते धूप-छाँह का खूबसूरत गठबंधन दिखता था।
कल टूटे पुल को देखने गए। पुल कानपुर की तरफ़ से क़रीब 300 मीटर की दूरी पर टूटा है। लोगों ने बताया कि रात को टूटा पुल। कोई आवागमन होता नही था इसलिए जानमाल का कोई नुक़सान नहीं हुआ।
शुक्लागंज को कानपुर से जोड़ने वाले तीन पुलों में यह पुल सबसे पुराना था। सबसे पुराना पुल क़रीब 1875 में चालू हुआ था। इस पुल पर लगभग पचास साल तक चलती रहीं। दूसरा ट्रेनों के आवागमन के लिए पुल 1990 में चालू हुआ। ट्रेन का आवागमन अभी भी इसी पुल से होता है। तीसरा नया पुल पैदल, गाड़ियों के आवागमन के लिए बनाया गया।
पुल हालाँकि जर्जर हो जाने के कारण आवागमन के लिए बंद कर दिया गया था। फिर भी इसकी मरम्मत की बातें चलती रहती थीं। इसको एक पिकनिक स्पाट के रूप में विकसित करने की योजनाएँ भी चल रहीं थीं। पुल के टूट जाने से इन योजनाओं के क्या रूप बदलेंगे यह आने वाला समय बताएगा।
एक पुल नदी के दो किनारों को जोड़ता है। लेकिन साथ ही यह लोगों को अनगिनत स्मृतियों से भी जोड़ता है। अनगिनत लोग जो इससे गुजरे रहे हैं उनकी न जाने कितनी यादें इस पुल से जुड़ी होंगी। पुल भले टूट गया लेकिन अनगिनत लोगों की यादों में पुल हमेशा बना रहेगा। कानपुर के इतिहास में यह लोकगीत दर्ज रहेगा :
कानपुर कनकैया ,
जंह पर बना घाट सरसैया,
नीचे बहती गंगा मैया ,
ऊपर चले रेल का पहिया,
चना ज़ोर गरम .... ।
पुल के बारे में अख़बार में छपी खबरें कानपुर के इतिहासकार Anoop Shukla की फ़ेसबुक वाल से। पूरा गीत इस लिंक में सुनिए।

Monday, November 25, 2024

यहाँ सुकून से हैं

 


सुबह चाय की तलाश में निकले। सड़क पर आवाजाही शुरू नहीं हुई थी। लोग घरों और घर के बाहर की दुकानों के बाहर झाड़ू लगाते और कनखियों से सड़क की तरफ़ देखते मिले।
एक चाय की दुकान वाला अभी दुकान सजा रहा था। बोला -‘आधे घंटे बाद मिलेगी चाय।’ हम आगे बढ़ गये।
आगे पुलिस हद्दफ़ पुलिस चौकी दिखी। चौकी के मुख्यद्वार पर सड़क पर ‘यह आम रास्ता नहीं है’ टाइप का बैरियर लगा था। सही बात है। पुलिस चौकी का रास्ता आम लोगों के लिए कहाँ होता है।
आगे एक पुलिया पर उद्घाटन पत्थर लगा था। माननीय मंत्री महोदय द्वारा पुलिया का उद्घाटन निवर्तमान सभासद की उपस्थिति में किये जाने की सूचना लगी थी। 2018 में।
शहर में हर सौ कदम पर किसी न किसी तरह के उद्घाटन की सूचना देते हुए बोर्ड लगे हुए हैं। उद्घाटन का हाल यह है कि जहां चार ईंट लगी वहाँ पत्थर लगा।
आगे एक सड़क किनारे चाय की दुकान दिखी। रहमत अली टी स्टाल । चाय वाले से पूछा -‘चाय ताजी है?’
‘चाय कोई चार-पाँच दिन पहले की थोड़ी होती है।ताजी ही मिलेगी। अभी बनायेंगे।’ कहते हुए चाय वाले ने चाय चढ़ा दी। हमको सड़क किनारे बेंच पर बैठने के लिए कहा। हम बैठ गये।
दीवार से लगी बेंच पर बैठे एक बुज़ुर्गवार चुनही तंबाकू रगड़ रहे थे। एक-एक रेशा बीनते-रगड़ते तंबाकू और चूने को मिला रहे थे। उनके चेहरे पर सफ़ेद दाढी उनके अनुभव के झंडे की तरह फहरा रही थी।
बुज़ुर्गवार ने अपनी उम्र बताई 85 नाम नबी। रहमत अली उनके भतीजे हैं।
नबी जी ने बताया कि बटवारे के समय उनका परिवार पाकिस्तान चला गया था। वहाँ रहने के लिए उन पंजाबी लोगों के मकान मिले थे जो पाकिस्तान से हिंदुस्तान आ गये थे। बढ़िया नये मकान। लेकिन वहाँ मन नहीं लगा। सबकी ज़मीन -जायदाद यहीं थीं। लिखा-पढ़ी करके वापस आ गये। बहन वहीं रह गयीं। कुछ दिन पहले बहनोई का इंतक़ाल हुआ है। खबर आयी थी। वीसा बना है लेकिन जा नहीं पाए।
बचपन में पाकिस्तान में कुछ ही दिन रहे। लेकिन कराची के मीठे अंगूरों की याद ताज़ा है ज़ेहन में।
पाकिस्तान की बात चली तो बोले-‘ वहाँ सब आपस में लड़ते रहते हैं। हम यहाँ सुकून से हैं। ख़ासकर शाहजहांपुर की बात और अलग। यहाँ ग़लत बात पर लड़ने पर साथ के लोग टोंक देते हैं। अच्छा किया जो हम वापस लौट आये।’
घर परिवार की बात भी की। बताया -‘पाँच बच्चे हैं।लेकिन उन बच्चों के दो-दो बच्चे ही हैं। सब अपना-अपना काम करते हैं।’
देश की बात चली तो देश-प्रदेश की बागडोर थामे लोगों के बारे में बोले -‘दोनों के आगे पीछे कोई है नहीं। परिवार का उनको अंदाज़ा ही नहीं। उसी हिसाब से बात करते हैं।’ आगे वे बोले -‘ गंजा अपने बाप के मरने पर काम-काज में भी नहीं गया।’ हमको लगा देश का आम आदमी अपने नेताओं के बारे में किस तरह सोचता है यह उससे बात करके ही पता चलता है।
चाय पीकर चलने के पहले दुकान का फ़ोटो लिया। फ़ोटो जूमकर दिखाई। देखकर नबी जी बोले -‘ शुभानल्लाह। ‘

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Wednesday, November 20, 2024

फेसबुक के पाठक

 फ़ेसबुक पर कुल क़रीब 3 अरब मतलब 300 करोड़ लोगों के खाते हैं। इनमें क़रीब 38 करोड़ भारत के लोग हैं।

इनमें कितने लोग रोज़ फ़ेसबुक देखते , पढ़ते और लिखते होंगे उनका ठीक हिसाब पता नहीं। दस प्रतिशत भी मान लें तो रोज़ क़रीब 30 करोड़ लोग फ़ेसबुक पर रोज़ अपडेट करते होंगे दुनिया भर में । भारत के लिए यह आँकड़ा चार करोड़ का मान लीजिए।
एक दिन में एक पाठक अमूमन चालीस-पचास-सौ पोस्ट देख सकता होगा। पच्चीस-तीस पढ़ लेता होगा।
किसी लोकप्रिय लेखक की कोई पोस्ट हज़ार-दो हज़ार लोग देख लेते होंगे। किसी पोस्ट का आँकड़ा और आगे बढ़ जाता होगा।
फ़ेसबुक आजकल पैसे , विज्ञापन वाली पोस्ट्स की वरीयता देता है।
लोगों को शिकायत है कि उनकी पोस्ट्स की रीच कम कर दी है फ़ेसबुक ने।
फ़ेसबुक हरेक की पोस्ट पढ़ता नहीं होगा। कोई चेक लगाए होंगे उसके हिसाब से पोस्ट्स नियंत्रित करता होगा।
कहने का मतलब है कि इस फ़िक्र न पड़ें कि कम पढ़ी जा रही है पोस्ट्स। लिखते रहें। आपका लिखा कभी न कभी पढ़ा जाएगा।
कभी न कभी पढ़ा जाने वाली बात इस तरह समझें कि मारख़ेज़ का उपन्यास ‘ एकांत के सौ वर्ष’ हमने पिछले साल पढ़ा। लिखे जाने के क़रीब पचास-साठ साल बाद। कई किताबें तो सदियों पहले लिखी गयीं , अभी उनको पढ़ा जाना बाक़ी है।
यह पोस्ट भी कुछ लोग अभी पढ़ लेंगे, कुछ आज , कुछ कई दिनों बाद। कुछ कभी नहीं पढ़ेंगे।
लेकिन हमारा मन था लिखने का तो लिख दिया। पोस्ट भी कर दिया।
ठीक किया न ?

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