Friday, January 17, 2025

कुंभ मेले की खबरें

 


कल सभी मीडिया चैनल कुंभ मेले की खबरें दिखा रहे थे। रात को अभिनेता सैफ अली पर हमले की खबर आई।मीडिया चैनल हमले की ख़बरें दिखाने लगे। शाम तक बीस पुलिस टीमें लगी हुईं थीं जाँच के काम में। आज सुबह देखा टीमों की संख्या और 35 हो गई। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि एक सेलिब्रिटी पर कितना ध्यान देता है समाज।

राजनीति, हिंदू मुसलमान , सत्ता-विपक्ष, कुमार विश्वास-सैफ, पर भी जिसके पास जो मसाला, भड़ास थी उसने वो पोस्ट करना शुरू कर दिया। सैफ और किसी समलैंगिक पत्रकार का किस्सा भी किसी पोस्ट पर देखा।
कुछ पोस्ट सुशांत को याद करते हुए भी लिखी गईं।
किसी मुद्दे पर हिंदू-मुसलमान-सिख-ईसाई करने वालों में बहुतायत उन लोगों की रहती है जिनका उस समाज से कभी उठने,बैठने, मिलने, जुलने, बोलने, बतियाने, सुख-दुख साझा करने का कोई अपना अनुभव नहीं रहा। ऐसे लोग सुनी-सुनाई धारणाओं पर अपनी राय बनाकर अपनी इतनी दृढ़ता से रखते हैं।
सबके अपने-अपने गढ़े किस्से हैं। उनको ही दोहरा रहे हैं लोग।
अपन भी तो वही कर रहे।
आशा है सैफ जल्दी आईसीयू से बाहर आकर कुछ और कहेंगे। इसके बाद मीडिया वालों को कुछ और मिलेंगे। इस बीच मीडिया वाले अपने हिसाब से काम चलायेंगे।
धूप बहुत खुशनुमा है। अभी इसका न कोई किराया लग रहा न कोई जीएसटी लग रही। आप भी धूप सेवन करिये। विटामिन डी मिलेगी। हड्डियां मजबूत रहेंगी।

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Wednesday, January 15, 2025

‘हनाहन’ गन्ने का रस और जामुन का सिरका



नाम रखने में हिंदुस्तानियों का कोई जवाब नहीं। कनपुरियों का खासकर। गन्ने के रस और जामुन के सिरके की दुकान का नाम ‘हनाहन’देखकर लगा कि आमजन लेखकों से कम प्रयोगधर्मी नहीं होते। यह दुकान कल्याणपुर-बिठूर रोड पर बिठूर से छह किलोमीटर पहले है।
हनाहन का मतलब गूंगे के गुड़ की तरह है। समझा जा सकता है बताना मुश्किल। Alok Puranik जी के ‘दबादब’ की तरह ‘हनाहन’। तुलसीदास जी ने प्रयोग किया है:
‘मुठिका एक महाकपि हनी’।
लेकिन हनाहन में मारपीट नहीं है। अहिंसक है यह।
नाम आज से करीब पच्चीस साल पहले रखा गया। बोर्ड तीन साल पहले लगा। रजिस्टर्ड ट्रेड मार्क युक्त दुकान है। नाम रखने वाले उमाशंकर त्रिवेदी जी नब्बे साल के हैं। मतलब यह नाम उन्होंने करीब 65 साल की उम्र में रखा।
नाम देखकर रुके। गन्ने का रस पिया। दस रुपये ग्लास। आप भी कभी पहुँचिये ‘हनाहन।’

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गंगा नदी की संगत में कुछ देर



कल धूप में बैठे Pramod Singh जी की किताब बाँच रहे थे,'बेहयाई के बहत्तर दिन।' ठहर-ठहर के पढ़ना पड़ता है प्रमोद जी को। लिखते समय उनका पूरा ज़ोर इस बात पर रहता है कि जल्दी से कोई समझ न जाए उनके लिखे का मतलब। नदी के बहाने वे लिखते हैं :
"तुमसे कहूँ,ढेरों मरतबा सोचा है मैंने, एक इंसान से ज्यादे मानवीय लगती है मुझे नदी?कितना जीवन है इस नदी में। इतना है जितना इस स्टीमर में बैठे सब लोगों को मिला दो। इस नदी में अब तक जितने लोग सफ़र किए हज़ारों साल से,उन सबको और उन सबको भी जो इसके तटों पर रहते आए, उन सबको, उतना जीवन है इस नदी के जल में।"
नदी में जीवन की बात पढ़ते ही हम फ़ौरन गाड़ी स्टार्ट करके गंगा नदी देखने चल दिए। बिठूर। घर से दूरी दिखाया 17 किलोमीटर। समय 43 मिनट।
रास्ते में जगह लोग खिचड़ी खिलाते,खाते दिखे। दोने,पत्तल में। कल्याणपुर के आगे दो महिलाओं ने हाथ देकर गाड़ी रोकने का इशारा किया तो हम समझे 'बिठूर' तक 'लिफ़्ट' के लिए कह रही हैं। गाड़ी धीमी करने पर पता चला वे खिचड़ी खाने को कह रहीं थीं। हमने हाथ जोड़ के मना किया और आगे बढ़ गए।
रास्ते में 'हनाहन' गन्ने के रस और जामुन के सिरके का बोर्ड दिखा। नए तरह का नाम देखकर उतरकर रस पिया। नाम के बारे में पता किया। बैकुंठपुर गाँव के उमाशंकर त्रिवेदी(लाला जी) ने यह नाम रखा था। 25 साल पहले। नामकरण में आम लोगों की प्रतिभा ज़बरदस्त है।
गंगा किनारे भीड़ नहीं थी। सौ-पचास लोग नहाते दिखे। लगता है सब संगम निकल लिए।
एक परिवार वहीं नहाने के बाद पूड़ी सब्ज़ी खा रहा था। एक महिला अपने पति की दिया जला के दे रही थी, गंगा में सिराने के लिए। एक बच्ची एक तख़्त पर खड़े होकर सेल्फ़ी मोड में फ़ोटो ले रही थी। एक आदमी कपड़े उतारकर दौड़ता हुआ गंगा की तरफ़ बढ़ा। किनारे तक पहुँचकर ठिठक गया। नदी से नहाकर निकले एक आदमी से पूछा, 'पानी ठंडा है?' नदी से निकले आदमी ने अंगौछे से बदन पोंछते हुए कहा, 'बहुत ठंडा है।'
वह आदमी ठिठुरकर किनारे खड़ा रहा। बाद में आहिस्ते-आहिस्ते, ठिठुरते-ठिठुरते नदी में सहमते हुए घुसा। हड़बड़ा के डुबकी लगा के वापस हो लिया।
नदी से नहाकर निकले आदमी से बतियाए तो पता चला कि बाराबंकी शहर के सिलौटा गाँव के रहने वाले हैं। पाँच लोग निकले थे घूमने। त्रयम्बकेश्वर, महकालेश्वर, सोमनाथ होते हुए कल उज्जैन में शिप्रा स्नान करके आज ही कानपुर पहुँचे बिठूर में गंगा स्नान करने।
पंद्रह दिन में कई तीर्थों की यात्रा करके अब वे लोग वापस लौटेंगे अपने गाँव। सभी सिलौटा के रहने वाले हैं। छह महीने पहले केदारनाथ गए थे घूमने। घुमक्कड़ी के तमाम किस्से,अनुभव बताए उन लोगों ने। बताया नर्मदा का पानी इतना साफ़ है कि नीचे तल पर गिरा सिक्का तक दिखता है।
इनकी यात्रा की प्रेरणा पुरुष प्राइमरी स्कूल में अध्यापक हैं। वे भी साथ में थे। जैसे ही छुट्टी मिली, निकल पड़ते हैं घूमने। जाड़े में छुट्टी हुई गुरुजी की, निकल लिए।
घूमने के लिए कहीं रिज़र्वेशन नहीं कराते ये लोग। रिज़र्वेशन से बंधन हो जाता है। ऐसे जब मन किया चल दिए, जब मन किया चल दिए।
नहाने के बाद उनमें से एक ने शंख बजाया। हमने वीडियो बनाया तो उन्होंने कहा ये भई बढ़िया बजाते हैं। हमने उनका भी वीडियो बना लिया। वे लोग बता रहे थे कि आज यहीं रुकेंगे। खिचड़ी बनाएँगे नदी किनारे। सब सामान साथ है। हमको लगा, ये होती है घुमक्कड़ी।
वहीं एक पंडित क़रीब दस लोगों को अपने चारों तरफ़ बैठाए कोई पूजा करा रहा था। वह कह रहा था लोग सुन रहे थे। हमने भी दूर खड़े होकर सुना,'जैसे हम बता रहे,वैसा करते जाओ।'
वहीं नदी किनारे बना टिकैत राय का बनवाया शिवमंदिर देखा। टिकैत राय लखनऊ के नवाब गाजीउद्धीन हैदर (1814-1827) के मंत्री थे। उन्होंने यह मंदिर बनवाया था। मंदिर में कुछ लोग पूजा कर रहे थे। तमाम लोग फ़ोटोबाज़ी करते भी दिखे। अलग-अलग पोज में फ़ोटो। लोग अपने-अपने जोड़ीदारों के अलग-अलग स्टाइल में फ़ोटो खींच रहे थे। एक लड़की मंदिर के आले में मोबाइल रख अपना सेल्फ़ी वीडियो बना रही थी। शिव मंदिर के आगे शिव वाहन भी टहलते दिखे। हमने उनकी फ़ोटो ली। वे वहीं चहलक़दमी करते रहे। अपन कुछ और फ़ोटो खींचकर नीचे आ गए।
नदी किनारे कुछ दान पात्र भी दिखे। एक में इलाक़े भी लिखे थे। 'जालौन,झाँसी,भिंड, हमीरपुर, उन्नाव,रायबरेली, हरदोई आदि' के लिए रखे दानपात्र में 'आदि' की आड़ में कोई भी दान दे सकता है। दान के लिए उत्साहित करने के लिए लिखा था :
"तुलसी पक्षी के पिए घटे न सरिता नीर। दान लिए धन न घटे, जो सहाय रघुवीर।"
चूँकि कानपुर वालों के लिए दानपात्र लागू नहीं था इसलिए हम ऐसे ही आगे बढ़ लिए। पैसे बचे।
नदी किनारे कुछ पक्षी बैठे थे। थोड़ी-थोड़ी देर में वे अचानक उड़ान भरने लगते। जैसे उड़ान अभ्यास कर रहे हों। थोड़ा उड़कर फिर वापस नदी किनारे बैठ जाते।
वहीं नदी किनारे एक चाय की दुकान पर चाय पी गयी। दस रुपए की एक चाय। थोड़ी देर और गंगा नदी की संगत में रहकर वापस लौट आए। अभी नदी की संगत टैक्स फ्री है। पता नहीं कब इसपर भी टैक्स लग जाए। जीएसटी अलग से।
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Tuesday, January 14, 2025

भुलक्कड़ी और बेवकूफ़ी किसी की बपौती थोड़ी है




 
आज सुबह चाय बना रहे थे। एक चाय बिना दूध की बननी थी। बाक़ी दूध वाली। पानी चढ़ा कर दूध डाल दिया । चीनी डाल दी। तुलसी की पत्ती डाल दी। अदरख घिसते हुए देखा कि दूध वाली चाय में दूध पड़ा ही नहीं है। इधर-उधर देखा। कहीं दिखा नहीं। दूध के कप में दूध के निशान दिख रहे थे लेकिन दूध ग़ायब।

फिर देखा तो पता चला कि दूध बिना दूध वाली चाय में खौल रहा था। दूध वाली चाय बिना दूध के उबल रही थी। उसको ज़रूर ग़ुस्सा आ रहा होगा।
चाय के भगौने न हो गए कोई वोट मशीन हो गए। एक पार्टी के वोट दूसरी पार्टी में गिनकर उसको जिता दिया गया।
बहरहाल चाय का पानी इधर-उधर करके चाय बनी और पी गयी। सुबह की शुरुआत भुलक्कड़ी से हुई।
कुछ दिन पहले एक और घटना हुई। हम बाज़ार गए थे। कुछ सामान लेना था। कार सड़क पर खड़ी करके सामान लिया। वापस आकर कार खोलने के लिए चाबी लगाने की कोशिश की। चाबी लगी नहीं। दरवाज़ा खुला नहीं। हम बार-बार चाबी घुसाने की कोशिश की लेकिन चाबी घुसी ही नहीं।
हमने सोचा क्या लफड़ा है। इसके आगे कुछ सोचें तब तक अंदर से कार का शीशा बजाने की आवाज़ आई। देखा अंदर कोई बैठा था ड्राइविंग सीट पर। वह हाथ से इशारे करके कुछ कह रहा था। हमें लगा कि कौन घुस गया हमारी कार में। लेकिन फिर उसके इशारे एहसास हुआ कि कुछ लफड़ा है।
लफड़े का एहसास होते ही बग़ल में देखा। पता चला कि हमारी कार आगे खड़ी थी। मतलब हम बेध्यानी में दूसरी कार को खोलने की कोशिश कर रहे थे। वो तो कहो हम कानपुर में थे जहां इस तरह की बातें आम हैं। कार में बैठा इंसान और अपन दोनों मुस्करा कर चल दिए। किसी और शहर में होते तो कार वाला बग़ल के थाने में रिपोर्ट लिखाने के लिए मचल जाता।
ऊपर की दोनों बातें भुलक्कड़ी की हैं, बेध्यानी की हैं। अंग्रेज़ी में इसे अबसेंटमाइंडेडनेस कहते हैं। भुलक्कड़ी के अनगिनत किस्से कहानियाँ हैं। तमाम किस्से चलन में हैं। बड़े-बड़े वैज्ञानिक भुलक्कड़ बताए गए हैं। इससे लगता है भुलक्कड़ मतलब तेज दिमाग़ वाला।
लोग भुलक्कड़ी या बेध्यानी को अक़्ल से भी जोड़कर देखते हैं। जितना बड़ा भुलक्कड़ उतना बड़ा वैज्ञानिक। भाषण देते समय बड़े लोग बोलते-बोलते अटक जाते हैं। लोग इसके लिए उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। लेकिन असल में वे लोग वैज्ञानिक चेतना सम्पन्नता की स्थिति में होते होंगे। उनकी खिल्ली उड़ाने की बजाय तारीफ़ करना चाहिए। ख़ुशी मनानी चाहिए कि एक निठल्ले नेता के वैज्ञानिक बनने की राह खुल रही है।
भुलक्कड़ी को अक़्ल से जोड़ने वाली बात अगर सही है तो इसके लिए इंसान को बनाने वाले ईश्वर की ज़िम्मेदारी बनती है। इंसान की असेम्बली करते हुए एक की अक़्ल दूसरे में फ़िट कर दी। एक में थोड़ी कम अक़्ल डाली, दूसरी में ज़्यादा कर दी। पता नहीं यह उसने बेध्यानी में किया या अक़्ल में चूक के चलते लेकिन ज़िम्मेदारी तो उसी की बनती है। उसकी बेध्यानी के चलते न जाने कितने 'डिफ़ेक्टिव इंसानी पीस' धरती पर सप्लाई हो गए। धरती को बरबाद कर रहे हैं।
मज़ेदार बात यह कि ऐसे तमाम लोग कमअक़्ल लोग अपने को अक़्लमंद मानते हुए दुनिया भर में ग़दर काटे हुए हैं। वे शायद इस प्रसिद्ध कथन को जायज़ ठहराने पर लगे रहते हैं -"दुनिया का आधा नुक़सान उन लोगों के चलते होता है जो अपने को ख़ास समझते हैं।"( Half of the harm in the world is done by the people who think that they are imporatant)
चाय बनाने की बात से शुरू हुई बात अक़्ल तक आ पहुँची। ऐसा ही हो रहा है आजकल। विकास की बात करने वाले लोग विनाश का बटन दबा रहे हैं। क्या पता ऐसा वे बेध्यानी में कर रहे हों। भुलक्कड़ी और बेवकूफ़ी किसी की बपौती थोड़ी है।

Monday, January 13, 2025

अखबारी खबरों के बहाने



आज सबेरे अख़बार में मोटे अक्षरों में छपने वाली कुछ खबरें ये पढ़ीं :
1. महाकुंभ का आज से आरम्भ
2. कानपुर में कड़ाके की सर्दी जारी
3. भाजपा चुनाव अधिकारी को जूते का बुके दिया, मर्दाबाद के लगे नारे
4. कन्नौज रेलवे स्टेशन हादसे में ठेकदार और इंजीनियर पर मुक़दमा दर्ज
5. अमेरिकी राष्ट्रपति का शपथ समारोह इस बार ख़ास होगा
6. यूपी -बिहार के बजट से भी ज़्यादा लॉस एंजिल्स में आग से नुक़सान
7. बीमारी के लिए छुट्टी लेने वाले कर्मियों की हो रही जासूसी
महाकुंभ इलाहाबाद में शुरू हो रहा है। 144 साल बाद आता है इस तरह का महाकुंभ। उनकी तैयारियों, इंतज़ाम और सम्भावित घपलों की अनेक आती रहती हैं। साधुओं की ट्रेन में मारपीट और एक साधु द्वारा यूट्यूबर को चिमटिया देने के वीडियो वायरल हो रहे हैं। साधुओं को मिलने वाली सुविधाओं को देखते हुए क्या पता आने वाले समय में 'मनरेगा' की तर्ज़ पर 'सधुरेगा' योजना बने। इतने भजन गाने /इबादत करने पर या इतनी बार किसी का नाम लिखकर जमाकरने पर इतना भत्ता मिलेगा। इसके लाभ लेने के लिए क्या पता पढ़े-लिखे बेरोज़गार युवा इसके लिए अप्लाई करें और काम से लगें।
सर्दी के क़िस्सा तो पूरे उत्तर भारत में जारी है। कानपुर में कड़ाके की सर्दी पड़ रही है। क्या पाता सर्दी से निजात पाने के लिए भाजपा चुनाव अधिकारी से अलग तरह का व्यवहार किया गया हो। अलग तरह की पार्टी में अलग तरह का व्यवहार चलता है।
कन्नौज रेलवे स्टेशन में पचास मीटर की स्लैब गिर जाने से पचास से ऊपर मज़दूर घायल हो गए थे। शटरिंग ठीक से न होने से हादसा हुआ बताया गया है। ठेकेदार,इंजीनियर पर मुक़दमा होने के बाद मामला कुछ दिन तक चलने के बाद कहीं बैठ जाएगा। आराम करेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण की खबरें लगातार चर्चा में हैं कई दिनों। चर्चाओं में अपने प्रधानमंत्री के न बुलाए जाने की चर्चा, अधिकतर में चटखारे लेकर, हो रही है। चर्चा का टोन ज़ाहिर करता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण में देश के प्रधानमंत्री को न बुलाना मतलब ट्रम्प की नाराज़गी है। लोग इतने विश्वास से बयानबाज़ी कर रहे हैं मानों वहाँ के निमंत्रण पत्र पर हल्दी-रोली उन्हीं लोगों ने लगायी है। नहीं बुलाया तो न सही। जाड़े में पंद्रह-बीस घंटे उड़कर जाना जी हलकान करने वाला ही काम है। हो सकता है उनके यहाँ चलन ही न हों।
लॉस एंजेल्स में लगी आग अमेरिका के लिए चुनौती तो है ही। उस इलाक़े के तमाम घर जल गए हैं। वहाँ तो बिजली के खंभे भी लकड़ी के होते हैं। सब कुछ लकड़ी का। जल गया। जल रहा है। पता चला कि बीमा कम्पनियों ने लोगों के बीमे में घपला किया। आग लगने के पहले बीमा निरस्त कर दिया। अब मामला अदालतों में जाएगा। निपटेंगे लोग। लेकिन इससे यह तो पता चलता है कि पूँजीवादी समाजों में संस्थाएँ धोखेबाज़ होती हैं। कानूनों की सलवार पहनकर मजमे से फूट लेती हैं। सरकारें भी अपने हिसाब से, कानूनों के छेद से निकालकर, घपलेबाजी क़रके उनको सहायता देती हैं।
अपने कर्मचारियों की जासूसी कराने वाली बात काम से जुड़ी हुई है। खबर जर्मनी की है। वहाँ लोग बीमारी के बहाने छुट्टी लेकर घर बैठ जाते हैं। इससे अर्थव्यवस्था को नुक़सान हो रहा है। इसलिए अपने कर्मचारियों की जासूसी करा रही हैं कम्पनियाँ कि क्या वे सही में बीमार हैं।
इसी सिलसिले में पिछले दिनों L&T के चेयरमैन के चर्चित बयान पर भी खूब हल्ला मचा है। उनका कहना है कि हफ़्ते में 90 घंटे काम करना चाहिए। काम करने वाले हल्ला मचाए हुए हैं, बताओ ऐसा कहीं होता है? तमाम देश तो हफ़्ते में चार दिन काम की बात कर रहे हैं। ये महाराज रोज के क़रीब 13 घंटे खपाने की बात कर रहे हैं। 'घंटे बढ़ाने से परिणाम भी घंटा ही आएगा' जैसे बयान भी आ रहे हैं।
काम के घंटे बढ़ाने से आउटपुट बढ़ने की बात L&T के चेयरमैन कर रहे हैं इससे लगता है उनके हिसाब से उनके यहाँ होने वाले काम में दिमाग़ नहीं लगाना होता होगा। घंटे लगते होंगे। काम में परिणाम लगाए गए घंटों के समानुपाती होगी।
जो लोग L&T के चेयरमैन की बात विरोध कर रहे हैं। उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। उनके तर्क सही हैं या ग़लत इस पर कुछ न कहते हुए यह कहना चाहता हूँ कि देश के ज़्यादातर निर्णायक पदों पर बैठे लोग काम के घंटों से अपनी ज़िम्मेदारी के निर्वाह को आंकते हैं। जिस देश का प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करने को अपनी ज़िम्मेदारी निबाहने का पैमाना मानता हो उस देश के उच्च पद पर बैठे लोगों द्वारा काम के घंटों की महिमा का गुणगान करना स्वाभाविक है।
क्या पता वे मिलने पर बताएँ महामहिम को कि साहब 18 घंटे के हिसाब से हफ़्ते के 126 घंटे होते हैं। मैंने केवल 90 की वकालत की है। आपको कोई चिंता करने की ज़रूरत नहीं। आपकी बराबरी किसी को नहीं करने देंगे। हमको भी कुछ काम-वाम दिलाइए।
काम मिला कि नहीं यह आने वाला समय बताएगा।
हफ़्ते में 90 घंटे काम का विरोध करने वाला तबका वो तबका है जिसके पास इन सब बातों को पढ़ने, महसूस करने, समझने, प्रतिक्रिया करने की समझ, मौक़ा और साधन हैं। देश का बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो बिना L&T चेयरमैन का आह्वान सुने हफ़्ते के सातों दिन 13 घंटे से ज़्यादा ही खटता रहता है। ये लोग वे लोग हैं जो असंगठित क्षेत्र में काम करते होंगे। उनकों किसी कम्पनी के चेयरमैन की बात सुनने का मौक़ा है न मतलब। वे लगे रहते हैं। काम करते रहते हैं। उनके लिए किसी की कही बात का कोई मतलब नहीं।
ज़िंदा रहने के लिए काम करने वालों के लिए काम के घंटे मायने नहीं रखते। अफ़सोस यह ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

Saturday, January 11, 2025

आलोक पुराणिक -व्यंग्य का एटीएम का संशोधन



Alok Puranik जी को हिंदी व्यंग्य का प्रतिष्ठित व्यंग्यश्री सम्मान, 2017 में मिला था। यह सम्मान प्रतिष्ठित व्यंग्यकार पंडित गोपाल प्रसाद व्यास जी की स्मृति में उनके जन्मदिन के मौके पर दिया जाता है। आम तौर पर बुजुर्गों , मतलब लगभग वरिष्ठ नागरिक की उमर वालों मिलने वाला सम्मान शायद पहली बार पचास साल की उमर पूरे किए युवा को मिला था। सम्मान 13 फरवरी, 2017 को नई दिल्ली के हिंदी भवन सभागार में प्रदान किया गया था।
सम्मान समारोह के मौके पर आलोक पुराणिक जी के घर-परिवारी जन, मित्रों-सहेलियों-प्रशंसकों और आलोक पौराणिक से काम भर की ईर्ष्या रखने वालों के साथ मैं भी उपस्थित था। सम्मान समारोह की रिपोर्टिंग भी की थी हमने। इस मौके पर लिए आलोक पुराणिक जी के इंटरव्यू को लोगों ने काफ़ी पसंद किया था। लिंक टिप्पणी में।
सम्मान-समारोह के बाद आलोक पौराणिक जी के 51 वें जन्मदिन के मौके पर उनके बारे में किताब निकालने का विचार आया। विचार सितंबर माह के दूसरे हफ़्ते में बना। आलोक जी का जन्मदिन 30 सितंबर को पड़ता है। तय किया कि उनके जन्मदिन के पहले किताब आ जाये और किताब का विमोचन 30 सितंबर को किया जाये।
किताब का नाम फेसबुक पर रायशुमारी के बाद तय किया गया -आलोक पुराणिक-व्यंग्य का एटीएम।
किताब में लगभग बीस दिनों में आलोक पुराणिक जी के बारे में 32 संस्मरण , कई इंटरव्यू , व्यंग्यश्री सम्मान की रपट, आलोक पुराणिक के चुनिंदा लेख, शेरो-शायरी भी शामिल है। ई- बुक के रूप में प्रकाशित किताब का बाद में पुस्तक संस्करण प्रिंट में प्रकाशित हुआ -रुझान प्रकाशन से। हमारे अनुरोध पर Kush Vaishnav ने सभी लेखकों को , जिनके लेख पुस्तक में शामिल हैं, एक प्रति भेजी।ई बुक हम पहले ही भेज चुके थे।
जल्दबाजी में प्रकाशित इस किताब में प्रूफ की तमाम कमियाँ रह गईं। आलोक जी पर पीएचडी करने वाले शोध छात्र की जीवन संगिनी (जो स्वयं ज्ञान चतुर्वेदी जी के साहित्य पर शोध रत हैं) ने हिचकिचाते हुए इस इस चूक की तरफ़ इशारा किया तो हमने तय किया कि सबसे पहले यही काम किया जायेगा।
पिछले हफ़्ते प्रूफ की तमाम गलतियों पर निशान लगाने के बाद सुधार का काम जारी है। जल्द ही इसे ठीक कर लिया जाएगा।
जिन लेखकों ने इस किताब में लेख लिखे थे उनकी उपलब्धियों, सम्मानों और किताबों में इजाफा हुआ होगा। सभी से अनुरोध है कि लेखक परिचय में अपना संशोधित परिचय भेज देंगे ताकि मैं संशोधित किताब प्रकाशित करते हुए उसमें शामिल कर सकूँ।
किताब ई बुक और प्रिंट दोनों प्रारूपों में छपेगी।
और भी कोई सुझाव हो तो निसंकोच मुझे मेसेज करके या मेरी मेल anupkidak at g mail डॉट कॉम पर भेज सकते हैं।

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Wednesday, January 08, 2025

आइए चलें श्रीलंका की सैर पर



रिटायर होने के बाद सोचा था कि खूब घूमेंगे। देश-विदेश। देश में तो थोड़ा-बहुत इधर-उधर घूमे भी। विदेश यात्रा का खाता खुलता बाक़ी है। अब समय आ गया है विदेश यात्रा का।
विदेश यात्राओं की शुरुआत अगले माह होगी। श्रीलंका से। 8 फ़रवरी से 15 फ़रवरी तक। यह यात्रा मेरे बेटे Anany की टीम फिरगुन ट्रेवल्स Firgun Travels के साथ होगी।
आप भी साथ चलना चाहें तो चलें। श्रीलंका के लिए वीजा फ्री है। तुरंत मिलता है। जो लोग गए हैं, उन्होंने बताया है बहुत खूबसूरत है श्रीलंका।
यह ट्रिप खासतौर पर 45+ उम्र के लोगों के लिए है। बच्चे भी आ सकते हैं साथ में। उम्र में थोड़ा-बहुत इधर-उधर चल जाएगा। 18 से 20 लोग रहेंगे ट्रिप में। यात्रा के विवरण टिप्पणी में दिए लिंक में दिए हैं। कोई और जानकारी लेनी ही तो उसी लिंक में दिए मेल या फ़ोन 📞 पर पूछ सकते हैं।
श्रीलंका पहुँचने के बाद होटल स्टे और घूमने और नाश्ते + डिनर का खर्चा पचास हज़ार रुपये है। श्रीलंका जाना और आना अपने खर्चे पर होगा। घूमने की जगहों के विवरण और ठहराव टिप्पणी में दिए लिंक में जाकर देख सकते हैं।
जो मित्र साथ चलना चाहते हैं वो बतायें। सीट बुक करायें। सैर के लिए निकलें। इसके पहले कि घूमने लायक न रहें, खूब घूम लें। राहुल जी ने बताया ही है :
सैर कर दुनिया कि ग़ाफ़िल,जिंदगानी फिर कहाँ
जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ।
तो चलिए, जो होगा देखा जाएगा। विवरण टिप्पणी में।

https://www.facebook.com/share/p/152jfiEJZL/

किताबों की छपाई के किस्से



पिछले महीने दो किताबें प्रकाशित हुई। 'बेवकूफ़ी का सफ़र' और ' पुलिया पर ज़िंदगी।' बेवकूफ़ी का सफ़र में शामिल पोस्ट्स का अंतराल 2010 से 2024 तक है। इसमें ट्रेन और हवाई यात्राओं के 37 किस्से शामिल हैं। 'पुलिया पर ज़िंदगी' में दिसम्बर 2014 से लेकर जुलाई 2016 मतलब लगभग डेढ़ साल के समय के 54 किस्से हैं। दो किस्से 2024 में जुड़े इस तरह किताब में कुल 56 किस्से हैं।
' पुलिया पर ज़िंदगी' के लेख तिथिवार हैं। फ़ेसबुक में लिखे क़िस्सों में इकट्ठा करके किताब बनाई गयी है। एक दिन उत्सुकता हुई कि देखें इन क़िस्सों को कितने लोगों ने पढ़ा है, कितने लोगों ने टिप्पणी की है और कितने साझा हुए हैं। सारी पोस्ट्स को देखने पर यह तो ठीक-ठीक नहीं पता चला कि कितने लोगों ने पढ़ी हैं पोस्ट्स लेकिन लाइक, टिप्पणी से और साझा से अंदाज़ा लगा कौन सी पोस्ट कितने लोगों ने पसंद की। लाइक, टिप्पणी और साझा करने का विवरण निम्नवत है :
लाइक : 8009
टिप्पणी: 1658
शेयर : 118
इन टिप्पणियों में से कुछ टिप्पणियाँ मेरी भी हैं। इस लिहाज़ से देखा जाए तो लगभग 1200 -1400 टिप्पणियाँ 'पुलिया पर ज़िंदगी' की अलग-अलग पोस्ट्स पर मित्रों ने की होंगी।
टिप्पणी, लाइक्स और शेयर के मुक़ाबले अगर किताबों की बिक्री का आँकड़ा देखा जाए तो दोनों मिलाकर अभी तक कुल 52 किताबें बिकी हैं (बेवकूफ़ी का सफ़र 38 , पुलिया पर ज़िंदगी 14)। इस बिक्री से अभी तक कुल जमा 1652.50 पैसे रायल्टी के जमा हुए हैं।
ये सारे आँकड़े हमें इसलिए मिल गए क्योंकि किताबें हमने सेल्फ़ पब्लिशिंग मोड में प्रकाशित हैं। किसी प्रकाशन से प्रकाशित करते तो पता चलना मुश्किल होता कि कितनी किताबें छपी, कितनी बिकीं।
कई किताबों पर लिखा होता है दो माह में तीन संस्करण, तीन माह में पाँच संस्करण। लेकिन उनमें यह नहीं लिखा होगा कि किसी संस्करण में किताबें कितनी छपी?
कई प्रकाशक नए लेखकों की किताबें छापते हैं तो कहते हैं , पहले संस्करण में रायल्टी नहीं देंगे, रायल्टी 200-300 किताबों के बिकने के बाद देंगे। क्यों भई, पहले क्यों नहीं ? रायल्टी में कोई ख़ज़ाना थोड़ी लुटा दे रहे। प्रकाशकों की बिक्री की समस्या और अन्य खर्चे होते हैं। लेकिन लेखक को रायल्टी बिल्कुल न देना समझ नहीं आता।
मेरी अभी तक कुल जमा नौ किताबें छपी हैं। उनमें तीन सेल्फ़ पब्लिशिंग के तहत। पहली किताब (पुलिया पर दुनिया) ही मेरी स्व प्रकाशित थी। उसमें लगभग 2000 रुपए रायल्टी मिली। इसके बाद की सात किताबों पर 'प्रकाशक मित्र ' कोई रायल्टी नहीं दे पाए । अलबत्ता दो किताबों पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से कुल मिलाकर एक लाख पंद्रह हज़ार का सम्मान ज़रूर मिला।
अब मैंने तय किया है आगे किताबें या तो सेल्फ़ पब्लिशिंग से प्रकाशित करूँगा या रायल्टी की गारंटी पर।
सेल्फ़ पब्लिशिंग के बारे में किसी मित्र को कोई जानकारी या सलाह लेनी हो तो निस्संकोच सम्पर्क कर सकता है।
मेरी हाल में प्रकाशित किताबों को ख़रीदने के विवरण वाली पोस्ट का लिंक टिप्पणी में दिया है।

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Tuesday, January 07, 2025

'बोरसी भर आँच' - दूर खड़े खड़े होकर खुद को देखना





इस दुनिया में क़रीब आठ अरब लोग रहते हैं। हर इंसान की ज़िंदगी की कहानी अपने आप में एक महाआख्यान होता है। हरेक की ज़िंदगी एक रोचक दास्तान होती है।कुछ को उस दास्तान को सुनाने वाले मिल जाते हैं, कुछ को खुद सुनाने का मौक़ा मिल जाता है। लेकिन अधिकांश लोगों की कहानी अनकही, अनसुनी और अनजानी रह जाती है।
यह बात लिखने का कोई मायने नहीं। पढ़ाई-लिखाई की दुनिया से जुड़े लोग इस तरह की बातें अपने-अपने अन्दाज़ में महसूस करते हैं, अपने अन्दाज़ में बयान करते हैं। लेकिन लिखने का लालच भी एक अलग तरह का लालच है। लगता है कोई ऊँची बात लिख रहे हैं। कोई क़रीने की बात है। क़रीने की बात से याद आती है नंदन जी की कविता का अंश :
मैं कोई बात तो कह लूँ कभी करीने से
खुदारा! मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे!
कल Yatish Kumar जी की लिखी किताब 'बोरसी भर आँच' पूरी पढ़कर ख़त्म की । किताब मेरे पास बहुत दिनों से थी। किसी मित्र ने चर्चा की थी तभी ली थी। पढ़ना शुरू नहीं हुआ था, जैसा तमाम किताबों के साथ होता है। सोचते हैं तसल्ली से पढ़ेंगे। किताब किस बारे में है यह भी पता नहीं था। Arvind Tiwari जी ने सलाह दी पढ़ने की तो पढ़ना शुरू किया।
किताब की रोचकता ही है कि क़रीब 200 पेज की किताब दो दिन में पढ़ गया। इससे लगा कि अगर इसी तरह पढ़ें तो तमाम वो किताबें पढ़ने का काम पूरा किया जा सकता है जिनको पढ़ा जाना है।
किताब में छपी सूचना के अनुसार राधाकृष्ण प्रकाशन से फ़रवरी,2024 में आई किताब के तीन माह में तीन संस्करण आ चुके हैं। किताब की भूमिका प्रख्यात कहानीकार तद्भव के सम्पादक अखिलेश जी ने तथा ब्लर्ब प्रख्यात कवि, कथाकार उदयप्रकाश जी ने लिखा है। ये सूचनाएँ किताब के आकर्षक, पठनीय और शानदार होने के संकेत थे। इन्हीं संकेतों के कारण मैंने किताब पढ़ना शुरू नहीं किया। सोचा बेहतरीन किताब आराम से पढ़ेंगे। वो तो शुक्रिया रहेगा Arvind Tiwari जी का जिनके कहने पर 'बोरसी भर आँच' पढ़ ली। इसके पहले भी पिछले साल अरविंद तिवारी जी कहने पर अनामिका जी का उपन्यास आईनासाज पढ़ा था।
'बोरसी भर आँच' में यतीश कुमार जी के बचपन से लेकर उनके SCRA में चयनित होने के समय के बीच समय के संस्मरण हैं। इस किताब के बारे में डेढ़ सौ के क़रीब लोग लिख चुके हैं। सिद्ध लोगों ने तारीफ़ की है। हम जो लिखेंगे उसे एक सामान्य पाठक की हैसियत से ही लिखेंगे।
'बोरसी भर आँच' में यतीश कुमार जी ने अपने बचपन के जीवन संघर्षों के संस्मरण लिखे हैं। अपनी माँ, दीदी, पिता, नानी-नाना, मौसी, मित्रों और अपने आसपास रहने वाले लोगों के बारे में संस्मरण हैं किताब में। किसी सहेली का अलबत्ता कोई किस्सा नहीं है। शायद कोई किस्सा रहा नहीं होगा या रहा होगा लेकिन अनकहा रह गया।
यतीश कुमार जी के लेखन को जिस तरह एक पाठक की हैसियत से मैंने ग्रहण किया उसके अनुसार माँ और दीदी के चरित्र बहुत प्यारे, आकर्षक, चमकीले हैं। वास्तविकता में वे और प्यारे, आकर्षक और चमकीले होंगे। दीदी के बहुत काबिल, सक्षम और बहादुर होने के बावजूद उनका अपनी क्षमता और प्रतिभा के अनुसार दुनियावी रूप से स्वयं सफल न हो पाना हमारी सामाजिक असफलता है।
यतीश कुमार जी की जीवन के संस्मरण में उनके संघर्ष उनके बचपन से शुरू होकर उनके बड़े होने तक समाप्त हो जाते हैं। अपने तीस-चालीस साल पहले के समय को, भारतीय समाज के अनुसार एक सफल और संवेदनशील इंसान का, बीते समय को तटस्थ भाव से देखने का प्रयास है। तीस-चालीस साल पहले हुई तमाम मीटिगों के कार्यवृत्त (Minutes of Meeting) की महत्वपूर्ण बातें लिखना जैसा है। यह अपने बचपन को दूर खड़े खड़े होकर खुद को देखना है। अधिकतर पाठक उससे अपने को जुड़ा पाते होंगे।
किताब पढ़ते समय और अभी भी मैं सोच रहा था कि अगर यतीश कुमार जी माँ अपने जीवन के संस्मरण लिख सकती तो कैसा रहता। एक स्वाभिमानी, मेहनती स्त्री जीवन की अनेकानेक स्थितियों से गुजरती, परेशानियों से जूझती और हालातों से पंजा लड़ाती हुई अद्भुत जिजीविषा से जीती है। दुनिया की परवाह न करती हुई अपनी शर्तों पर जीवन जीती है। जिन लोगों ने उनको कष्ट दिए, समय आने पर उनके प्रति भी उदारता बनाए हुए उद्दात भाव से उनकी सेवा करती हैं। जीवन के अनगिनत कसैले अनुभवों के बीच छोटे-छोटे सुख हासिल करती होंगी। ऐसे जीवन के आख्यान जो अपने आप में महाआख्यान होते हैं अक्सर अनकहे रहे जाते हैं, उनको सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है।
तमाम विपरीत परिस्थियों में एक सामान्य, लगभग असुरक्षित जीवन जीते हुए एक बच्चे के SCRA में सफल होना अपने आप में दुर्लभ उपलब्धि है। विपरीत परिस्थितियों में जीते हुए संघर्ष करते हुए सामाजिक रूप से सफल होना अपने आप में बड़ी जंग जीतना है।
जिस तरह का बचपन यतीश कुमार जी का रहा उसके अपने आख्यान होते हैं। लेकिन उनको लगभग निर्लिप्त भाव से कह सकने की कला या हुनर और साहस भी सबके पास नहीं होता। यह यतीश कुमार जी के लिए सम्भव हो सका इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। एक सफल किताब के लिए उनको बधाई।
किताब को Vinay Amber के चित्रों ने आकर्षक बनाया है। इसके लिए विनय को बधाई।
किताब में ज़िक्र SCRA का हुआ। स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस रेलवे द्वारा कराई परीक्षाएँ होतीं थी। इसमें कक्षा 12 कक्षा के बाद क़रीब 25 लाख बच्चे परीक्षा देते। उनमें से 20-30 लोग चुने जाते। उन बच्चों को इंजीनियरिंग की शिक्षा दी जाती थी। चयनित होते ही बच्चों को अच्छा स्टाइपेंड और अधिकारियों जैसी तमाम सुविधाएँ दी जातीं। यही बच्चे आगे चलकर रेलवे के अधिकारी बनते। कम उमर में रेलवे के अधिकारी बनने के कारण SCRA में पढ़ने वाले बच्चे ही रेलवे के सबसे ऊँचे पदों तक पहुँचते।
इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यतीश कुमार जी कितने प्रतिभाशाली और मेहनती रहे होंगे जो 25 लाख बच्चों में से सफल 20-30 सफल बच्चों में से एक थे।
2015 में SCRA की परीक्षाएँ बंद हो गयीं। रेलवे के लिए IES से चयनित होने वाले इंजीनियर ही लिए जाने लगे (जो कि पहले भी लिए जाते थे) 20-30 बच्चे जो मुख्यतः रेलवे की जानकारी वाली इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ते थे, उनको स्कालरशिप मिलती थी उनके रास्ते बंद हो गए।
सरकारें हर कल्याणकारी योजनाओं में आर्थिक पहलू देखने लगीं हैं। SCRA से चयन बंद होने के बाद अब रेलवे में कोई बच्चा पढ़ते हुए स्कालरशिप लेते हुए रेलवे में अधिकारी नहीं बन सकता। सब रेलवे में आने के लिए बच्चे को पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़नी होगी। IES का exam देना होगा। फिर उनमें से सबसे अच्छी रैंक वाले इंजीनियर रेलवे में जा पाते।
यह तो भला हो उस समय की सरकारों का जो अपनी मेहनत, लगन और सफल होने ज़िद के चलते यतीश कुमार जी SCRA में चयनित होकर रेलवे में अधिकारी बने। उस समय SCRA न होता तो उनकी ज़िंदगी कितनी अलग होती, कहना मुश्किल है लेकिन यह ज़रूर है कि वह निश्चित रूप से अलग होती। उनकी ज़िंदगी में शायद कुछ और संघर्ष होते, शायद कुछ और उपलब्धियाँ होतीं। लेकिन ये सब बातें तो 'अगर कहीं मैं तोता होता, तोता होता तो क्या होता घराने की बातें हैं' जिनका कोई ओर-छोर नहीं होता।
फ़िलहाल तो Yatish Kumar जी को उनकी शानदार किताब के लिए बधाई। उनको उनकी आगे की लेखन यात्रा के लिए मंगलकामनाएँ ।
किताब : बोरसी भर आँच
लेखक : यतीश कुमार
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन

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पेज : 199
क़ीमत : 350 रुपए (अमेजन में 245.70 रुपए लिंक टिप्पणी में)