Friday, February 21, 2025

मुफ्त की डाक्टरी


 रात झाँसी आए। बुंदेलखंड लिट्रेचर फेस्टिवल में शिरकत करने। चौथा फेस्टिवल है। किसी लिट्रेचर फेस्टिवल में शिरकत करने का पहला मौक़ा है। तीन दिन के इस कार्यक्रम में हमारे अलावा साहित्य जगत के बड़े ख़लीफ़ा आलोक पुराणिक Alok Puranik, नीरज बधवार Neeraj Badhwar , अनुज खरे Anuj Khare और बाबुशा कोहली Baabusha Kohli ( हमारी जबलपुरिया मोगैम्बो) भी पधार रहे हैं। आना ज्ञान चतुर्वेदी जी को भी था। उनके कार्यक्रम के संचालन के लिए हमको 23 तारीख को रोका गया था। इसी हिसाब से टिकट बनवाया गया। लेकिन कल पता चला कि ज्ञान जी नहीं आ रहे हैं। अब पहले निकलने का हिसाब देखेंगे या घूम लेंगे एक दिन झाँसी और।

झाँसी पहली बार आए थे 1983 में। साइकिल से भारत यात्रा करते हुए लौटते में। तीन दिन ठहरे थे। उसके बाद तो कई बार आना हुआ झाँसी। पिछली बार एक शादी में आए थे। ओरछा भी गए थे। ओरछा में कुछ जगहें और बेतवा नदी में नहाना रह गया था। क्या पता इसीलिए आख़िरी दिन रुकना हो रहा हो।
सबेरे टहलने निकले। सड़क पर कूड़ा जमा करने वाली गाड़ी में होटल वाला कूड़ा जमा कर रहा था। ड्राइवर सीट पर बैठा बहादुर मोबाइल देख रहा था। शायद स्टेटस अपडेट कर रहा होगा -‘कूड़ा बटोर रहे हैं।’
सड़क पर एक नौजवान पिट्ठू बैग पीठ पर लादे मोटरसाइकिल स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था। किक पर किक मारे जा रहा था लेकिन मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हो रही थी। हम उसको देखते हुए आगे बढ़ गए। कुछ कर भी तो नहीं सकते थे। कोई बालिका होती तो शायद कहते कि लाओ हम लगा के देखें किक शायद स्टार्ट हो जाये। जेंडर की बड़ी भूमिका होती है सहायता करने में।
आगे ओवरब्रिज के नीचे बुंदेलखंड के कई महापुरुषों के चित्र खंभे में बने थे। उनके नीचे लिखा था -‘बुंदेलखंड के गौरव।’
उनको देखकर लगा कि बेचारे सर्दी, गर्मी, बरसात में हमारे ये आदरणीय, पूजनीय खम्भे में टिके गौरव बढ़ते रहते हैं, इनके नाम पर गौरवान्वित लोग मजे से मलाई खाते रहते हैं।
चौराहे पर चाय की दुकान पर चाय पीने के लिए रुके। बेंच पर बैठकर चाय पीने की मंशा से अंदर घुसते ही ऊपर का डाला सर पर लगा। सर सहलाते हुए दुकान वाले से शिकायत की तो बोला -‘उल्टा लग गया है।’
अंदर बैठकर फिर शिकायत की तो उसने मुआवजे के रूप ने चाय का ग्लास पकड़ाकर मेरा मुँह बंद कर दिया। फिर बयान जारी किया -‘इसे ठीक करवाना है।’
हमको लगा कुंभ और दिल्ली में ट्रेन दुर्घटना के फौरन बाद मुवावजे की घोषणा और व्यवस्था बनाने की घोषणा सरकारों ने इस चाय वाले से सीखी होगी।इस तरह की हरकतों का कोई कापी राइट भी तो नहीं होता।
चाय पीते हुए एक महिला की एक ऑटो वाले से बहस और गाली गलौज भी सुनी। एक भिखारिन महिला जमकर आटोवाले को किसी बात पर गरिया रही थी। आटोवाला हंसते हुए उसका जवाब दे रहा था। चाय वाला मुस्कराते हुए चाय छानते हुए गाली-जुगलबंदी सुन रहा था। कुछ देर बाद आटोवाला चला गया। महिला भी शांत होकर इधर हो गई।
चाय में बुंदेली अंदाज़ में चीनी पड़ी थी। कई दिन से कम चीनी का कोटा पूरा हो गया।
लौटते हुए देखा एक नई के पानी में लगे रबड़ की पाइप से दो महिलायें पानी पालीथीन के बोरे दो रहीं थीं। थोड़ी दूर पर खड़े दो आदमी उनको यह करता देख रहे थे। हम उन लोगों को सड़क की दूसरी तरफ़ से देख रहे थे। क्या पता कुछ और लोग भी इस देखा-देखी में लगे हों। मेहनत करने वाले दो, देखने वाले बीस।
वहीं पर कर्मयोगी ध्यानचंद की प्रतिमा लगी देखी। पीछे बुंदेलखंड लिट्रेचर फेस्टिवल का बड़ा बोर्ड खम्भे पर लगा था। अपना कमरे में लौट के आए। हमारे पीछे चाय भी आ गई।
चाय पीते हुए कार्यक्रम का विवरण देखा। हमारे नाम के आगे डा लिखा था। डा अनूप शुक्ल। हमने यह डाक्टरी वापस करने की कोशिश की। आयोजकों को बताया कि हम डाक्टर न हैं। उन्होंने कहा , अब तो पोस्टर छप गए हैं। अब कुछ नहीं हो सकता। कार्यक्रम के दौरान तो डाक्टरी बरदाश्त करनी पड़ेगी। हमने भी सोचा कोई बात नहीं पड़ी रहेगी डिग्री मानद उपाधि की तरह। कभी विरोध करना होगा तो वापस करने के काम आएगी।
आलोक पुराणिक Alok Puranik हर बात को आर्थिक नज़रिए से देखते हैं। उन्होंने सलाह दी -'कोई पूछे तो बता देना शर्तिया इलाज वाले डाक्टर हैं। बहुत स्कोप है इस धंधे में। ख़ूब कमाई होगी।'

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Thursday, February 20, 2025

कोलम्बो का लोटस टावर


 श्रीलंका के स्वतंत्रता स्मारक (पोस्ट लिंक टिप्पणी में) के बाद हम लोग कोलम्बो का लोटस देखने गए। श्रीलंका के इस सबसे ऊँचे टावर की गिनती दुनिया के सबसे ऊँचे टावरों में होती है। कमल के आकार की इस इमारत से पूरे शहर का नजारा दिखता है। इमारत में मनोरंजन और खाने-पीने की भी तमाम सुविधाएँ हैं। शुरुआत में इसके निर्माण में क़रीब 113 मिलियन डालर लगने का अनुमान था। (लगभग दस अरब रुपए)।निर्माण पूरा होने पर इसमें कुछ घपले की भी खबरें चलीं जो कि बाद में सही साबित नहीं हुईं। हर घपले की जाँच की लगभग यही नियति होती है।

टावर की बनावट और बिजली व्यवस्था इस तरह है ऐसा लगता है कि टावर के ऊपर कमल का फूल रखा हुआ है। दूर से ही कमल का चमकता दिख रहा था। जिस दिन हम उसे देखने गए थे उसी दिन दिल्ली चुनाव के नतीजे आए थे। भाजपा की जीत हुई थी। टावर के ऊपर कमल का फूल भाजपा की जीत की तरह चमक रहा था।
जब हम वहाँ गए थे तब तक हमको पता नहीं था कि इसे ऊपर से भी जाकर देखने की व्यवस्था है। वहाँ पहुँचने पर पर देखा कि लोग टिकट लेकर टावर के ऊपर जा रहे हैं। हमने तय किया कि हम भी जाएँगे।
टावर को देखने की फ़ीस 20 डालर थी। 20 डालर मतलब लगभग 1738 रुपए। श्रीलंका के हिसाब से 6000 रुपए। टावर देखने की फ़ीस और रात के कारण ग्रुप के लगभग सभी सदस्य होटल जाने के लिए मचल गए। केवल हमारे साथ के कुमावत दम्पति और मैंने टावर देखने का तय किया यह सोचकर कि न जाने कब फिर आना हो।
29 मंज़िला टावर को देखने की क़ीमत 20 डालर भुगतान करने पर याद आया कि हमने न्यूयार्क की 102 मंज़िला एंपायर स्टेट बिल्डिंग देखने के 65 डालर (4500 रुपए) भुगतान किए थे
टावर के बारे में विवरण देखने पर पता चला कि इसकी आधारशिला 20 जनवरी,2012 को रखी गयी। 15 सितम्बर,2019 में निर्माण कार्य पूरा हुआ। इमारत को 16 सितम्बर, 2022 को लोगों के लिए खोला गया। इमारत के बनने में हुए घपले का भी उल्लेख मिलता है जो कि साबित नहीं किया जा सका। आमतौर हर घपले की यही नियति यही होती है।
कोलम्बो की बेइरा झील के किनारे बने इस टावर के ऊपर जाने के लिए लगी लिफ़्ट के लाइन लगी थी। जितने लोग ऊपर से वापस आते लगभग उतने ही लोगों को ऊपर भेजा जाता। इस दौरान वहाँ टावर से सम्बंधित कई जानकारियाँ फ़्लैश हो रही थीं जैसे यह लिफ़्ट एशिया की सबसे तेज लिफ़्ट है जो 243 मीटर की ऊँचाई 48 सेकेंड में तय करती है, इमारत के बाहरी कमल के फूल वाले हिस्से को चमकाने के लिए 21,280 पिक्सल एलिमेंट लगे हैं।
टावर पर जाने के लिए लिफ़्ट का इंतज़ार करते हुए मोबाइल की बैटरी पर निगाह थी। ख़तरे के स्तर तक पहुँच चुकी बैटरी देखकर लग रहा था कि कहीं मोबाइल स्विच आफ न हो जाए। ऐसा हो जाता तो होटल के लिए सवारी करना मुश्किल हो जाता। मोबाइल की बैटरी भी हमारे काम के लिए साँसो की तरह ज़रूरी हो गयी है। हमने मोबाइल बंद कर दिया। सोचा कि लौटते समय ही देखेंगे।
अपना नम्बर आने पर हम लोग लिफ़्ट से ऊपर गए। टावर के ऊपर के गलियारे से पूरी शहर का नजारा दिख रहा था। अंधेरे में सभी ऊँची इमारतें चमक रहीं थी। नीचे बेइरा झील का काला पानी दिख रहा था। उसमें भी एलईडी लगा देते तो वह भी चमकती।
टावर के ऊपर पहुँचे लोग टावर के साथ फ़ोटो खींच रहे थे। तरह-तरह के पोज में। हमने अपने मोबाइल को बंद ही रखा। कुमावत जी के मोबाइल से फ़ोटो खींचे। फ़ोटो खींचते समय आदतन न्यूयार्क के एंपायर स्टेट बिल्डिंग से करते रहे। वहाँ की इमारतें ज़्यादा चमकदार, ज़्यादा ऊँची थीं।
नीचे सड़क पर जाती गाड़ियाँ चमकती चींटियों सरीखी दिख रहीं थीं जो फुर्ती से अपनी सवारियों को लादे इधर से उधर जा रहीं थीं।
हमने भी कुछ फ़ोटो लिए, कुछ सेल्फ़ी भी। ऊपर तेज हवा चल रही थी। सेल्फ़ी वीडियो बनाते हुए हमारे बाल उड़ रहे थे। हमारे बग़ल में सेल्फ़ी बनाती एक लड़की की ज़ुल्फ़ें भी उड़ते हुए हमारी तरफ़ आती लग रही थीं। हमें लगा कि कहीं गाना बचता,' उड़े जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी'। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। हमने अपनी और मोबाइल दोनों की बैटरी का ख़्याल रखते हुए वाह कहकर वीडियो बनाना छोड़ दिया।
कुछ देर तक टावर से शहर को देखने, निहारने, फ़ोटो खींचने, वीडियो बनाने के बाद हम नीचे उतर आए। वापस लौटने का रास्ता शापिंग कामप्लेक्स और फ़ूड प्लाज़ा से होते हुए था। तमाम लोग वहाँ बचे हुए पैसे खर्चा कर रहे थे। हम सीधे बाहर आ गए।
बाहर आकर बची हुई बैटरी वाले मोबाइल का उपयोग करके हमने आटो किया। उबर का किराया क़रीब 500 रुपए बता रहा था। वहाँ खड़े आटो वाले ने कहा 1000 रुपए लेंगे, छोड़ देंगे। हमने उबर से आटो ख़रीदा। थोड़ी देर में वह आ भी गया। हम उसमें बैठकर वापस होटल आ गए।
यह श्रीलंका का हमारा पहला दिन था। अच्छा बीता।
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Wednesday, February 19, 2025

श्रीलंका का आज़ादी का स्मारक


 गंगा रामया मंदिर (पोस्ट का लिंक टिप्पणी में) के बाद हम लोग थोड़ी ही दूर स्थित श्रीलंका का आज़ादी का स्मारक देखने गए।

श्रीलंका पर पुर्तगाली, डच और अंग्रेजों का अधिकार रहा। सबसे आख़िरी क़ब्ज़ा अंग्रेजों का रहा। भारत की आज़ादी के छह महीने से भी कम समय में अंग्रेज श्रीलंका को भी छोड़कर चल दिए। भारत से भरी बरसात में गए तो श्रीलंका से जाड़े मौसम में।
श्रीलंका 4 फ़रवरी, 1948 को आज़ाद हुआ। हम लोग आठ फ़रवरी को श्रीलंका में थे। मतलब हमारे श्रीलंका दौरे की शुरुआत के चार दिन पहले ही श्रीलंका की आज़ादी की सालगिरह मनाई गयी थी।
श्रीलंका की आज़ादी में भारत में हुई घटनाओं और गतिविधियों का ज़रूर प्रभाव रहा होगा। श्रीलंका की आज़ादी के पहले भी कई विद्रोह हुए थे लेकिन वे दबा दिए गए। 1915 में श्रीलंका हुए बौद्ध - मुस्लिम दंगे में तमाम लोग मारे गए। इसके बाद श्रीलंका में मध्यम वर्ग का राजनीति में बड़े पैमाने पर प्रवेश हुआ। अंतत: 4 फ़रवरी, 1948 को श्रीलंका में अंग्रेज लोग सत्ता श्रीलंका के लोगों को छोड़ कर निकल लिए।
स्वतंत्रता स्मारक के बनने की शुरुआत देश की आज़ादी के एक साल बाद 4 फ़रवरी, 1949 को हुई। 1953 को निर्माण पूरा हुआ। यह स्मारक श्रीलंका के लोगों ने आज़ाद होने के बाद बनवाया। इसका निर्माण श्रीलंका के सबसे प्रसिद्ध कैंडी साम्राज्य के दरबार हाल की तर्ज़ पर किया गया।
खंभों पर टिकी खुली इमारत के सामने श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री Don Stephen Senanayake की मूर्ति बनी हुई है। श्रीलंका की आज़ादी में सरनायक का अहम योगदान रहा। आज़ादी के बाद वे देश के पहले प्रधानमंत्री बने।
डी एस सरनायक जी के बारे में पढ़ने पर पता चला कि वे पढ़ने लिखने में सामान्य ही थे। क्रिकेट अच्छा खेलते थे। शुरू में क्लर्क का काम किया। बाद में ससुराल से मिली ग्रेफ़ाइट की खान देखते हुए आराम का मिडिल क्लास जीवन जीते रहे।
1915 में श्रीलंका में बड़ा बौद्ध -मुस्लिम दंगा हुआ। भारत की तर्ज़ पर वहाँ भी दंगों की शुरुआत अंग्रेजों के आने के बाद ही हुई होगी। दंगे के बाद बड़ी संख्या में लोग गिरफ़्तार किए गया। इनमें सरनायक जी के दो भाई भी थे। जिनको बिना सबूत के 46 दिन तक जेल में रखा गया। इस घटना के बाद सरनायक जी सार्वजनिक जीवन और राजनीति में आए। विभिन्न कमेटियों में रहे। अनुभव लिए। अंतत: श्रीलंका की आज़ादी के बाद वहाँ के पहले प्रधानमंत्री बने। जीवन पर्यंत प्रधानमंत्री बने रहे।
आज़ादी का स्मारक एक बड़े खुले मैदान में बना है। कोई दीवार नहीं, कोई दरवाज़ा नहीं। सब तरफ़ से खुला स्मारक। 4 फ़रवरी, 1948 को देश की आज़ादी का महोत्सव इसी जगह पर मनाया गया। नई पार्लियामेंट बनने तक देश की लोकसभा, राज्यसभा के रूप में इसी जगह का उपयोग होता रहा। आजकल इस इमारत का उपयोग धार्मिक और राष्ट्रीय पर्वों के मनाने के लिए होता है।
इमारत एक ऊँचे चबूतरे पर बनी है। चारों तरफ़ से ऊपर जाने की सीढ़ियाँ बनी हैं। 10000 वर्ग फुट एरिया में बनी इमारत के खंभों के साथ फ़ोटो खिंचाने के कई लोग वहाँ मौजूद थे। खूबसूरत खंभों के साथ, खूबसूरत लोग, अपनी खूबसूरत यादों को संजो रहे थे। हमारे साथ के लोगों ने ख़ूब फ़ोटोबाज़ी की। खंभों के साथ सटकर, उनके पास बैठकर, खड़े होकर, आड़े-तिरछे पोज में फ़ोटो खिंचवाए।
मैं सामने से फ़ोटो खींचने के लिए इमारत के नीचे उतर आया। दो लड़कियाँ इमारत के खंभे के पास बैठी बतिया रही थीं। बतियाती चली जा रहीं थी। दूर होने के कारण उनकी बातें सुनाई नहीं पड़ रहीं थीं। लेकिन कायनात ज़रूर कान लगाए उनकी बातें सुन रही होगी। इमारत के याद-स्टोर में अनगिनत लोगों की सुनी हुई बातचीतों का संग्रह होगा। यह अलग बात कि लोगों की निजता के संरक्षण का ख़्याल रखते हुए किसी को बताती नहीं।
नीचे मैदान पर एक बुजुर्ग महिला योगा मैट बिछाए कसरत कर रही थी। टांग उठाते-नीचे करते हुए टांग-व्यायाम कर रही थी। ऊपर उठाते हुए उसकी टांग टेढ़ी हो रही थी। वह फिर से उसको सीधा करने की कोशिश कर रही थी लेकिन टांग उसकी बात मान नहीं रही थी। अपनी टांग की हुकुम अदूली सहती हुई वह महिला व्यायाम करती रही।
वहीं मैदान में एक परिवार अपने बच्चों के साथ घूमने आया था। बच्चे पूरी मैदान में उछलते-कूदते खेल रहे थे। महिला बच्चों को टोकते-समझाते हुए उनको अपनी मर्ज़ी के हिसाब से खेलने दे रही थी। पुरुष इधर-उधर देखता हुआ कुछ-कुछ बोलता जा रहा था। मैदान में और कोई नहीं था।
स्मारक के सामने आने पर जब मैंने बड़ी मूर्ति लगी देखी तो उसका फ़ोटो लिया। मूर्ति का परिचय श्रीलंका की स्थानीय भाषाओं में लिखा था। मैं उस समय जान नहीं सका कि वह मूर्ति किस महापुरुष की है। बाद में इमारत के बारे में पढ़ा तो पता चला कि वे श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री थे। वहाँ के राष्ट्रपिता जैसे थे। अपने आस-पड़ोस के बारे हम कितना काम जानते हैं। बड़ी बात नहीं कि श्रीलंका के तमाम लोग गांधी जी के बारे में न जानते हों।
श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री के बारे में पढ़ने पर पता चला कि उनकी मौत घुड़सवारी के दौरान घोड़े से गिरने पर हुई। घोड़े से गिरकर वे काफ़ी देर तक कोमा में रहे। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन ने उनके लिए डाक्टर भेजने की व्यवस्था की। भारत से डाक्टर भेजे गए। लेकिन वे बच नहीं सके।
श्रीलंका के पहले प्रधानमंत्री के कार्यकलाप के बारे में पढ़ने पर पता चला कि उनके समय में क़रीब सात लाख तमिलों को श्रीलंका का निवासी नहीं माना गया था। इसका वहाँ के तमिल नेताओं ने विरोध किया था। श्रीलंका की राजनीति में इस घटना का भी लम्बा इतिहास रहा है।
स्मारक के चारों तरफ़ की सड़क पर गाड़ियाँ आ-जा रहीं थी। किसी देश के आज़ादी के स्मारक में खड़े होकर लोगों को आते-जाते देखने का यह अनूठा अनुभव था। हमने वहाँ का वीडियो भी बनाया। आज़ादी का म्यूज़ियम भी था वहाँ लेकिन हमारे पहूंचने तक बंद हो चुका था लिहाज़ा हम उसे देख नहीं पाए।
श्रीलंका के आज़ादी का स्मारक देखते हुए शाम हो गयी थी। अपन सामने खड़ी अपनी बस की तरफ़ बढ़े । थोड़ी दूर ही गए थे कि देखा बस स्टार्ट होकर चल दी। दूर थे तो चिल्लाकर तो बोल नहीं सकते थे। बेटे को फ़ोन किया कि हम तो यहीं छूट गए। परदेश के आज़ादी के स्मारक में बस हमसे आज़ाद हो गयी। ख़ैर बस थोड़ी देर में घूमकर हमको लेने आयी। हम आगे बढ़े। इस घटना के बाद से बस चलने के पहले लोगों की गिनती का नियम लागू हो गया। जब तक सोलह खोपड़ियाँ जिन नहीं जाती तब तक बस ड्राइवर को चलने के नहीं कहा जाता।
गड़बड़ी सुधार की जननी होती है।हर समाज में सुधारों की इमारत गड़बड़ियों की नींव पर खड़ी होती है।

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Tuesday, February 18, 2025

कोलम्बो का गंगा रामया मन्दिर , भगवान बुद्ध के पवित्र बाल


आठ फ़रवरी को दोपहर के लंच के बाद (पोस्ट की कड़ी टिप्पणी में) हम लोग घूमने निकले। शनिवार होने के कारण दफ़्तर और दुकानें ज़्यादातर बंद थे। सड़कों पर भीड़ नहीं थी। हम लोग कोलम्बो दर्शन के लिए निकले।
हमारी सबसे पहली मंज़िल थी कोलम्बो का प्रसिद्द बौद्ध मंदिर गंगा रामया मंदिर । इस बौद्ध विहार में भगवान बुद्ध के बाल के अवशेष रखे हैं।
भगवान बुद्ध के बाल के बारे में कहा जाता है कि भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद दो व्यापारी भाई तपासु और भल्लिका उनसे मिलने आए। वे भगवान बुद्ध के पहले भक्त बने। भगवान बुद्ध से विदा लेते समय उन भक्त व्यापारी भाइयों ने भगवान बुद्ध से कुछ निशानी के तौर पर देने का आग्रह किया। भगवान बुद्ध जी ने अपने सिर के कुछ बाल उनको प्रदान किए। व्यापारी बंधुओं ने वे बाल विभिन्न बौद्ध विहारों में रखने के लिए प्रदान किए। उनमें से एक बांग्लादेश के चिटगाँव स्थित बौद्ध विहार भी था।
मार्च, 2007 में श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महेंद्र राजपक्षे की पहल पर चिटगाँव, बांगलादेश के बौद्ध विहार में रखे बालों में से कुछ बाल लाकर गंगा रामया विहार में रखे गए। कहते हैं कि उस समय यहाँ आसपास के इलाक़े में सूखा पड़ा था। भगवान बुद्ध के पवित्र बाल मंदिर में आते ही भारी वर्षा हुई और महीनों से पड़ा सूखा ख़त्म हो गया।
बौद्ध मंदिर पहुँचकर हम लोगों ने देखा कि मंदिर के बाहर सड़क की दूसरी तरफ़ पूजा के वस्त्र पहने भक्तों की भीड़ सड़क पर लाइन लगाए खड़ी थी। भक्तों की पंक्ति में सबसे आगे और सबसे आखिरी में एक हाथी भी खड़ा था। मंदिर के सामने प्रांगण में पूजा की अलग तरह की पोशाक पहने भक्त गण खड़े थे। पोशाक जालीदार जिरह बख्तर नुमा थी। पुरुष लोग ही शामिल थे भक्तों में।
थोड़ी देर में विभिन्न वाद्य यंत्र बजने लगे और मंदिर के प्रांगण में उपस्थित भक्तगण अपनी जगह पर नृत्य करने लगे। वाद्य यंत्रों की आवाज़ तेज़ी होती गयी और उसी क्रम में भक्तों का नृत्य तेज होता गया। कुछ देर बाद भक्त गण मंदिर से बाहर की तरफ जाने लगे। उनके पीछे एक पुजारी थाल में सोने का मुकुट लेकर जा रहा था। जुलूस के साथ पुलिस भी थी।
पता करने पर लोगों ने बताया कि साल में एक बार एक हफ़्ते प्रति दिन इस तरह के भक्ति जुलूस निकाला जाता है। यह मंदिर के आसपास के इलाक़े को रक्षा के लिए किया जाता है।
मंदिर की इस जुलूस और पूजा प्रक्रिया को देखने के लिए तमाम देशी और अधिकतर विदेशी लोग वहाँ मौजूद थे। थोड़ी देर के नृत्य के बाद भक्त लोग परिक्रमा के लिए मंदिर से बाहर चले गए। हम लोग मंदिर के अंदर प्रवेश कर गए।
सामने ही सोने का भगवान बुद्ध का मंदिर था। उसके अंदर ही भगवान बुद्ध के सर के बाल रखे थे । शायद किसी बक्से में सुरक्षित। भव्य भगवान की सोने की मूर्ति शीशे के कवर के अंदर रखी थी। लेकिन वहाँ पास तक जाने की किसी को कोई मनाही नही थी। फ़ोटो लेने में भी कोई रोक नहीं थी।
मंदिर के पीछे भगवान बुद्ध की अनेक प्रतिमाएँ एक के बाद एक सिलसिलेवार लगीं थीं। बुद्ध प्रतिमाओं के अलावा अन्य प्रतिमाएँ भी थीं। एक संग्रहालय में बौद्ध धर्म से जुड़ी अनेक चीजें रखीं थीं कुर्सी,मेज़, तस्तरियाँ, मूर्तियाँ और बौद्ध धर्म से जुड़ी किताबें। लोग उनके दर्शन करने आ रहे थे। वहीं पर पर पीपल का पेड़ भी था।
मंदिर के माध्यम से अनेक कल्याण कारी कार्यक्रम होते हैं। मंदिर के बाहर एक बड़ा सा कलश रखा था जिसके बाहर लिखा था -your generous support will bring happiness to children with special needs and uplift their lives (आपका उदारता पूर्वक किया सहयोग विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों की सहायता और उनके भविष्य के उन्नयन में काम आएगा) हमने झांक के देखा तो कलश के नीचे पेंदे में कई रुपए पड़े थे। हमने भी कुछ योगदान दिया।
कुछ देर और मंदिर के प्रांगण में रहने के बाद हम लोगों ने वहाँ सामूहिक फ़ोटो खिंचवाया और बाहर आ गए।
गंगा रमैया मंदिर से कुछ दूरी पर ही स्थित सीमा मलाका मंदिर गए। गंगा रमैया मंदिर के प्रांगण में ही स्थित इस मंदिर में लोग ध्यान आदि करते हैं। यह मंदिर बीरा नहर के किनारे बना है। यह मंदिर 19 सदी में बनवाया गया था। मंदिर का मूल ढाँचा 1970 में पानी में डूब गया था। 1976 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण श्रीलंका के आर्किटेक्ट Geoffrey Bawa ने लिया। मंदिर निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग श्रीलंका के मुस्लिम व्यापारी S. H. Moosajee और उनकी पत्नी ने अपने पुत्र Ameer S. Moosajee की याद में किया था।
सीमा मलाका मंदिर के प्रांगण में कुछ देर बिताने के बाद हम लोग अंदर भी गए। अंदर कुछ लोग पूजा-ध्यान कर रहे थे। श्लोक जैसा कुछ बज रहा था। हम लोग कुछ देर वहाँ रहने के बाद बाहर आ गए। बाहर प्रांगण में मंदिर के किनारे कई बौद्ध मूर्तियों लगीं हुईं थीं।
कुछ देर मंदिर में रहने के बाद हम लोग बाहर आ गए। सूरज डूब रहा था। हम लोगों को सड़क पार करते देखकर आटो, टैक्सी रुक गए। तभी चले जब हम लोग सड़क पार कर गए। यह हमारे लिए विलक्षण अनुभव था। बाद में ऐसा होते कई बार देखा हमने।
सड़क किनारे एक इमारत में कई आफिसों के बोर्ड लगे थे। उनमें से एक पर cargills Food Hall भी लिखा था। हम काफ़ी देर तक सोचते रहे कि अपने यहाँ के कारगिल युद्ध से इस इमारत का क्या लेना-देना? बात में पता चला शहर में कई जगह cargills लिखा देखा तब पता चला कि यह भोजनालयों की एक शृंखला है।
गंगा रमैया मंदिर प्रांगण के बाद हम लोगों की अगली मंज़िल श्रीलंका स्वतंत्रता स्मारक थी। हम लोग बस में बैठकर उधर की तरफ़ चल दिए।

#श्रीलंका,#shrilanka-14

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Monday, February 17, 2025

माउंट लावीनिया बीच -प्रेम की दो सौ साल पुरानी दास्तान


 कोलम्बो के माउंट लावीनिया बीच के नामकरण की कहानी रोचक है। सीलोन के दूसरे गवर्नर Sir Thomas Maitland ने "Galkissa" (Mount Lavinia) में कुछ ज़मीन ख़रीदी और 1806 में अपना खुद का आवास बनवाया। Maitland यहाँ के स्थानीय मेस्टिको ( पुर्तगाल और श्रीलंका मूल की) नर्तकी Lovina Aponsuwa से प्रेम करने लगा। उनका प्रेम का क़िस्सा उनको वापस इंग्लैंड बुलाए जाने (1811 ) तक चला। गर्वनर निवास जिसे Maitland ने Mount Lavinia House का नाम दिया था, अब माउंट लावीनिया होटल में बदल गया है और उस घर के आसपास का इलाक़ा लावीनिया के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

2023 में Maitland और लावीनिया के प्रेम कहानी पर आधारित गीत "Loveena" लिखा गया। इस गीत को श्रीलंका के रक्षा सचिव कमल गुनारत्ने ने लिखा है (Kamal Gunaratne)।
मैटलैंड और लावीनिया के प्रेम का वर्णन करते गीत का लिंक टिप्पणी में दिया है। यूट्यूब में लोगों की टिप्पणियों के हिंदी अनुवाद देखकर उनके बीच के प्रेम की सघनता का अन्दाज़ लगाया जा सकता है।
पाँच साल चला प्रेम प्रसंग आगे के दो सौ सालों के बाद तक क़िस्सों, कहानियों , गीतों के रूप में चल रहा है। आज के दिनों में ये जो किस्से वायरल होने की बात कहती है उसकी बहुत परम्परा है।किस्से-कहानियाँ इसी तरह , बिना टिकट सफ़र करते रहते हैं। उनके माध्यम बदलते रहते हैं।
बीच पर एक पिता अपनी दो बच्चियों को घुमाने लाए थे। बच्चियाँ आपस में कूदने वाला कोई खेल खेल रहीं थीं। उनके पिता अपने बच्चों को खेलता देख रहे थे। कूद देर बाद बच्चियाँ रेत में पक़ड़म-पकड़ाई जैसा कोई खेल खेलने लगीं। इस बीच एक ट्रेन फिर निकली वहाँ से।
ट्रेन के गुजरने वाली जगह पर कोई रेलवे क्रासिंग नहीं थी। ट्रेन आने पर लोग अपने-आप रुक जा रहे थे। ट्रेन के निकल जाने पर आवागमन फिर चालू हो जा रहा था।
समुद्र किनारे के बुजुर्ग अपने साथ आई महिलाओं के फ़ोटो ले रहे थे। फ़ोटो सेट करने के लिए वे पहले लगातार पीछे आते गए। फिर उनको लगा कि दूरी ज़्यादा हो गयी तो फिर आगे बढ़े। काफ़ी देर बाद एक जगह खड़े होकर फ़ोटो खींचे उन्होंने।
वहीं बीच की रेत पर एक कौवा टहलता हुआ लोगों को समुद्र में नहाते देख रहा था। थोड़ी देर बाद कांव-कांव भी करने लगा। शायद मुझे लोगों के वीडियो बनाते देख उसने भी बिना कहे यह फ़रमाइश की क़ि उसका भी वीडियो बनाया ज़ाया। समुद्र पर जिस तरह टहलते हुए कौवा कांव-कांव कर रहा था उससे मुझे समीक्षा तैलंग Samiksha Telangकी किताब का शीर्षक याद आया -कबूतर का कैट वाक। यहाँ कौवा कैट वाक रहा था। उसकी कांव-कांव सुनकर मुझे लगा कि शायद वह अपनी वाली लावीनिया को पुकार रहा हो। किसी को अपनी लावीनिया को पुकारने के लिए कहीं का गर्वनर होना ज़रूरी थोड़ी है।
थोड़ी देर और बैठकर हम लोग वापस चल दिए। रेल की पटरी के पास एक चाय की दुकान पर चाय पीने का तय किया। दुकान की तरफ़ जाते हुए देखा कि एक बच्ची वहाँ की रेत पर झाड़ू लगाते हुए रेत की अल्पना जैसी बना रही थी। हमने उसका वीडियो बनाना शुरू किया तब तक उसने झाड़ू रख दी और दुकान के अंदर चली चली गयी।
चाय की दुकान पर एक बुजुर्ग महिला प्याज़ काट रही थी। हमने चाय माँगी तो उसने बताया -'बिना दूध की मिलेगी चाय। चीनी पड़ी हुई।' हमारे मित्र Sunil Chaturvedi वैसे तो डायबिटिक होने के बावजूद मिठाई-सिठाई खाते रहते हैं लेकिन चाय बिना चीनी के ही पीते हैं। उन्होंने कहा कि उनके लिए बिना चीनी की चाय बना दे। महिला ने माना कर दिया यह कहते हुए कि पानी नहीं है।
इस बीच हम झोपड़ी (दुकान) के अंदर पहुँच गए। एक बोतल में रखे पानी की तरफ़ इशारा करके यह है तो पानी। महिला ने टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में बताया -'पानी ठीक नहीं है।' ठीक नहीं मतलब पीने का पानी नहीं है बोतल में।कारण और कोई भी सकता है लेकिन हम उसकी ईमानदारी के क़ायल हुए कि उसने ख़राब पानी की चाय नहीं बनाई।
महिला से दो-चार वाक्य का ही संवाद हुआ। वह पढ़ी-लिखी नहीं लगती थी। किसी पुराने उपन्यासों की ज़िम्मेदार माँ सरीखी वह महिला काम भर की अंग्रेज़ी और इशारों से अपनी बात कहती हुए अपनी दुकान चला रही थी। बाज़ार हर भाषा का सबसे तेज दुभाषिया होता है। लोग अपनी बात कहना और समझना सीख जाते हैं।
चाय पीकर हम लोग पैसे देकर वापस चल दिए। दो चाय के श्रीलंका की करेंसी में सौ रुपए हुए। हिंदुस्तानी रुपए में क़रीब तीस रुपए। मतलब एक चाय पंद्रह रुपए में।
दो सौ साल से भी पुराने दो प्रेमियों के नाम पर बसे समुद्र बीच पर चाय की इतनी क़ीमत बाजिब ही है।
रेल की पटरी पार करके हम लोगों ने आटो किया और होटल वापस चले आए।
पिछली पोस्ट में जो छाया वाली फ़ोटो का ज़िक्र किया था वह लगाने से रह गया था। वह इस फ़ोटो में लगा रहे हैं। पिछली पोस्ट का लिंक टिप्पणी में।

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