Saturday, March 22, 2025

गरीब आदमी की मरन है


 कल शहर से घर आते हुए एक लड़का घोड़े पर बैठकर जाता दिखा। घोड़े की ऊँचाई कम थी। शायद खच्चर रहा हो। कह नहीं सकता।

आजकल आदमी के बारे भी इत्मिनान से कुछ कहना मुश्किल तो जानवर के बारे में कैसे कह सकते हैं?
बच्चा घोड़े पर एक तरफ़ पैर करके बैठा था जैसा कभी पुराने जमाने में स्कूटरों में महिलाएँ बैठती थीं। दूसरे घोड़े की बाग उसके हाथ में थी। दूसरा घोड़ा पहले का अनुसरण करते हुए दुलकी चाल से चला जा रहा था- "महाजनों एन गत: सा पंथा।"
कभी घोड़े आम सवारी होते थे। सेनाओं की ताक़त घुड़सवारों की संख्या से तय होती थी। अब घोड़े इक्का-दुक्का ही दीखते हैं सड़कों पर। समय के साथ बदलता है बहुत कुछ। पहले न्यायाधीश का मतलब ईमानदार होता था। अपनी तनख़्वाह में गुज़ारा करने वाले, न्याय करने वाले। अब ऐसे लोग अल्पसंख्यक हो गए हैं। अब ज़्यादातर जजों का तनख़्वाह से गुज़ारा नहीं हो पाता। बेचारों को अलग से मेहनत करके केस सेटल पैसे कमाने पड़ते हैं।
घोड़े की बात से कानपुर के भगवती प्रसाद दीक्षित 'घोड़े वाले' याद आ गए। वे कानपुर में चुनाव लड़ते थे। घोड़े पर चलते थे। अख़बार वाले उनको 'राबिनहुड ऑफ इंडिया' बताते हुए लेख लिखते थे। दीक्षित जी भाषण देते हुए मज़ेदार जुमले बोलते थे:
1. जब लड़का सरकारी नौकरी में आता है तो घर वाले कहते हैं क्या फायदा ऐसी नौकरी का जिसमे ऊपरी कमाई न हो। वही लड़का जब बाद में घूस लेते हुये पकड़ा जाता है तो कहते हैं हाथ बचाकर काम करना चाहिये था। मतलब सब चाहते हैं लड्डू फूटे चूरा होय ,हम भी खायें तुम भी खाओ।
2. आगे की मोर्चे हमको आवाज दे रहे हैं। कोई गलत काम करने से पहले सोचो कि आगे की पीढियां सवाल करेंगी कि अब्बा जान -अब्बा जान यू हैव बिट्रेड द कन्ट्री (आपने देश के साथ धोखा किया है)
3. देश में आज लल्लू, जगधर छाये हुये हैं। ये जनता को धोखा दे रहे हैं। जनता सब समझती है लेकिन कुछ बोलती नहीं है। इसीलिये ये जनता को लूट रहे हैं।
4. चुनाव में आदमी नहीं पैसा जीतता है। नोट से वोट खरीदे जाते हैं। जब तक देश में घोड़ेवाले की तरह के आम आदमी के चुनाव जीतने के हालात नहीं बनते तब तक देश की हालत नहीं सुधर सकती।
दीक्षित जी की पार्टी के दो स्थायी सदस्य थे। एक वे खुद दूसरा उनका घोड़ा। वे कहते कि अगर वे चुनाव जीते तो घोड़े के साथ लोकसभा में जायेंगे। लोग पूछते कि लोकसभा में उनका घोड़ा कैसे रहेगा! इसपर वे जबाब देते:
"जिस संसद में सवा पाँच सौ गधे जा सकते है वहां मेरा एक घोड़ा क्यों नही रह सकता है!"
एक बार दीक्षित जी से उनके घर पर मिला था। हरसहाय इंटर कालेज के पीछे गली में तिमंज़िले पर रहते थे। घर वाले नाराज़ रहते थे उनसे। नीचे दरवाज़े पर खड़े-खड़े कुछ देर बात हुई। उन्होंने कविता सुनाई :
"चलो न मिटते पद चिन्हों पर, अपने रास्ते आप बनाओ।"
(दीक्षित जी के बारे में लिखी पोस्ट टिप्पणी में दिए लिंक में जाकर पढ़ सकते हैं)
आगे उसी गन्ने के रस की दुकान पर रस पिया जहां कुछ दिन पहले पिया था। पहले दिन तो नाम नहीं बताया था दुकान वाली महिला ने। लेकिन अगले दिन बात करने पर बताया था नाम - सुनीता। कल रस पीते हुए याद आया सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष से लौटी हैं। मन किया कि सुनीता का इंटरव्यू करके स्टोरी बनाएँ - "एक सुनीता ये भी।" लेकिन फिर सुनीता को गन्ने का रस बेचने में व्यस्त देखा तो मन को बरज दिया।
रस पीते हुए अलबत्ता कुछ बात हुई। अग़ल-बग़ल हर दस बीस मीटर पर गन्ने का रस बेचने वाले मौजूद हैं। सुनीता ने बताया -"क्या करें लोग? रोज़ी-रोटी का सवाल। हर कोई बेंच रहा है।" लेकिन किसी से कोई शिकायत नहीं सुनीता को। बोली -"भगवान जिसको जो देता है वो मिलता है। पेट भरने का मिल जाता है वही बहुत है।"
हमारे देखते एक कामगार महिला आई। ठसक के साथ रस पिया। चलते हुए बोली -"हमारे हिसाब में लिख लेना।" उसकी ठसक देखकर अच्छा लगा।
रस पीते हुए ही हमने आनलाइन ऑटो बुक कर लिए था। ऑटो वाला बग़ल में आकर खड़ा हो गया। रस पी रहे थे तो उससे भी पूछ लिया। पूछने हुए याद आया कि वह मुस्लिम है। नाम आया था -"अनीश अली।" लगा उसका रोजा होगा। लेकिन पूछने पर उसने बताया कि वो रोज़े से नहीं है। उसको भी रस पिलाया। चल दिए घर की तरफ़।
रास्ते में बिना पूछे अनीश ने अपने रोजा के बारे सफ़ाई देना शुरू किया। कहा - "रोजा का मतलब पाँच बार की नमाज़। काम के चलते यह मुश्किल। फिर भी दस रोजा रह चुके हैं।"
होते करते बात घर-परिवार की होने लगी। बताया कि उसके दो बच्चे चार साल और दस साल की उमर के होकर नहीं रहे। कोई बीमारी हो गयी थी जिसमें हड्डी ख़राब हो जाती हैं। बहुत इलाज कराया लेकिन बच्चे बचे नहीं। सुकून की बात कि तीसरा बच्चा ठीक है। दस साल का है। कोई बीमारी नहीं।
जितनी देर बात हुई उतने के लब्बो-लुआब यह कि गरीब आदमी की मरन है। जिसके पास पैसा है उसके साथ सब कुछ है। जिसके पास पैसा नहीं उसका साथ कोई नहीं देता। पैसे के सब साथी। हमने सोचा बात तो सही है। हर जगह पैसे वालों के साथ लोग खड़े हैं। सरकारें तक उनको फ़र्शी सलाम बजाती हैं।
अनीश ने बताया कि उसके पिता कबाड़ का काम करते हैं। पत्नी बीमार हैं। दवा दिलाकर आया ऑटो लेकर। घर बनवा रहा है। चकेरी के पास। सरिया लेना है घर के लिए।
उसने पूछा भी -"कामधेनु सरिया ले रहे हैं घर के लिए। ठीक है? ले लें?"
हमने बिना सोचे कहा -"हाँ ले लो। बढ़िया है।"
बाद में सोचा कि कामधेनु तो गाय का नाम है। समुद्र मंथन में निकली थीं। इसके पास ऐसी शक्तियाँ होती हैं जिससे हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। लेकिन यह तो हिंदू मिथकों के अनुसार है। क्या कामधेनु एक मुस्लिम की मनोकामना पूर्ण करती होंगी। क्या वे भी हिंदू-मुसलमान मानती होंगी?
रास्ते में बताया अनीश ने कि ऑटो उसका किराए का है। 500 रुपए रोज पर। सौ रुपए चार्जिंग के अलग।
चलते हुए अनीश ने कहा -"कोई नौकरी हो तो बताइएगा।"
हमने सोचा कि आजकल प्रधानमंत्री तो नौकरी के बारे में बता नहीं पा रहे हैं। हम क्या बताएँगे? लेकिन कहा कुछ नहीं।
घर आकर पैसे दिए। अनीश चला गया। लेकिन उसकी बात याद आ रही -"आजकल पैसे के सब साथी होते हैं। गरीब का कोई साथ नहीं देता। गरीब आदमी की मरन है। "

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Thursday, March 20, 2025

मदु गंगा नदी में पुल के नीचे और मैंग्रोव के बीच बोटिंग


 श्रीलंका घूमने के दौरान जहां-जहां घूमने जाते थे वहाँ की प्रमुख बातें व्हाटसएप पर खुद को मेसेज करके सेव कर लेते थे। बाद में तसल्ली से मेसेज, फ़ोटो और याद को मिलाकार उस जगह के बारे में लिख लेते थे।

इस बार भी वही किया हमने। मेसेज लिखते रहे। उनको देखकर कुछ पोस्ट भी लिखी। लेकिन एक दिन मैंने देखा कि पिछले दिनों के सब मेसेज ग़ायब थे। मोबाइल अपनी पार्टी के अपराधी को क्लीन चिट की तरह साफ़ था। देखा तो पता चला कि व्हाटसएप एक दिन बाद मेसेज डिलीट हो जाने की थी। फटाफट सेटिंग ठीक की। पुरानी बातें याद करके लिखीं।
ख़ैर, हम लोग श्रीलंका पहुँचने के तीसरे दिन लाया बीच होटल से सुबह का नाश्ता करके घूमने निकले। सबसे पहले मदु गंगा नदी देखने और उस पर बोटिंग करने गए।
मदु गंगा श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम में एक उथली नदी है, जो बालापिटिया में समुद्र में मिलती है। कहानी के अनुसार, मधु डेल्टा में 64 द्वीप हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश जलमग्न प्रतीत होते हैं क्योंकि केवल 25 द्वीपों की रिपोर्ट की गई है। 15 द्वीपों में एक बड़ा भूभाग है। कुछ द्वीपों पर लोग रहते हैं, लेकिन सभी जंगल और झाड़ियों से ढके हुए हैं।
हम लोगों ने मदु गंगा नदी में नाव से सैर की। सोलह लोग एक नाव में। दो घंटे की बोटिंग के 28 डालर (लगभग 2400 रुपए मतलब क़रीब 8500 श्रीलंकाई रुपए) पड़े। नाव में बैठते ही नाव नदी में दौड़ने लगी। जगह-जगह नदी सड़कों पर बने पुलों के नीचे से गुजरती। पुल इतने नीचे थे कि उनसे सर टकराने से बचाने के लिए सर झुका लेना पड़ा। ऐसे कई पुल पड़े जहाँ अगर सर न झुका तो हमारे सर और पुल की सड़क का मिलन हो जाता। इस बात को सोचकर हर पुल के नीचे से गुजरते हुए गाना याद आता - "मिले जो सर हमारा तुम्हारा तो भरता बने सर हमारा।"
जैसे ही नाव किसी सड़क के नीचे से गुजरने को होती, नाविक और हमारा टूर सहयोगी -हेड्स डाउन (सर नीचे करिए) कहते हुए सबके सर झुकवा देता।
नदी में बोटिंग करते हुए कई द्वीप दिखे। उन द्वीपों में बाहर से आवाजाही के लिए साधन नाव है। द्वीप में बसे गाँवों में केवल दुपहिया सवारी का चलन है। कई सौ लोगों की आबादी है कुछ द्वीपों में। इन द्वीपों को देखकर मुझे श्रीनगर की डल झील में बसे कई गाँव याद आए।
नदी में एक जगह गणेश भगवान का मंदिर भी दिखा। छोटा सा मंदिर वीराने में, नदी के पानी में अकेलेपन का भाव लिए चुपचाप खड़ा था। हमारे साथियों ने गणेश जी को दूर से प्रणाम निवेदित किया।
वहीं पर भगवान बुद्ध भी मिले नदी में अपने मंदिर में । खुले में ।
नदी के बीच में एक जगह नाव पर एक दुकान लगी थी। उसमें नारियल पानी, चाय -कापी आदि बिक रहे थे। एक लड़का और दो लड़कियाँ दुकान चला रहीं थीं। हमने वहाँ रुककर नारियल पानी पिया। आगे बढ़े।
मदु नदी में हमको जगह-जगह मैंग्रोव (mangrove) के पेड़ दिखे। मैंग्रोव ऐसे झाड़ी या व पेड़ होते हैं जो खारे पानी या अर्ध-खारे पानी में पाए जाते हैं। अक्सर यह ऐसे तटीय क्षेत्रों में होते हैं जहाँ कोई नदी किसी सागर में बह रही होती है, जिस से जल में मीठे पानी और खारे पानी का मिश्रण होता है।
मदु नदी में कुछ जगहों पर मैंग्रोव के पेड़ इतने सघन थे कि लगा हम लोग मैंग्रोव की गली में आ गए हैं। एक जगह मैंग्रोव इतने सघन थे क़ि केवल नाव निकलने भर का रास्ता था उनके बीच। ऊपर छाए मैंग्रोव के पेड़ों की डालियों से बचने के लिए हम लोग सर झुकाकर बैठे तब निकलना हुआ।
पुल से नीचे से और मैंग्रोव के पेड़ों के बीच से झुककर निकलते समय मुझे हमको ने बाइबल की सीख याद आ रही थी -Submit to authority (समर्पण)
मैंग्रोव पेड़ों के बीच से गुजरते हुए मोबाइल में गाना बज रहा था -प्यार को प्यार मिले तो, नज़र कहीं लग न जाए।
क़रीब घंटे भर की बोटिंग के बाद हम लोग एक द्वीप पहुँचे सिनेमन द्वीप। यहाँ हमने दालचीनी का पेय पिया। मदु गंगा (नदी) क्षेत्र के स्थानीय लोगों की आय का मुख्य स्रोत दालचीनी उद्योग है। ताजा दालचीनी छीलने के लिए यहां लाई जाती है।
सिनेमन द्वीप पर काफ़ी देर रुके हम लोग। किनारे पर ही वहाँ एक पेड़ पर आम की तरह का फल दिखा। लोगों ने बताया कि यह ज़हरीला फल होता है। खाने के पंद्रह मिनट के भीतर खाने वाले की मौत हो जाती है। स्थानीय भाषा में उसका नाम 'बालजा' बताया लोगों ने।
सिनेमन द्वीप पर ही मछलियों से मालिश कराने का इंतज़ाम भी था। मछली मसाज के लिए लोग अपने पैर पानी में डाल के बैठ जाते थे। पानी के अंदर की मछलियां उनके पैर को अपने मुँह से चुटकी जैसा काटती होंगी। गुदगुदी भारी मालिश का अनुभव हुआ होगा।
वहीं पर एक छोटा घड़ियाल का बच्चा भी था। लोग उसको सर पर रखकर फ़ोटो खिंचा रहे थे। कुछ पैसे देकर। अपने साहब जी के बचपन के बारे में लोग बताते हैं कि वे मगरमच्छ पीछे लेकर चले आए थे। शायद उनके यहाँ भी सिनेमन द्वीप सरीखी व्यवस्था रही होगी जहाँ कुछ भुगतान करके लोग घड़ियाल को हाथ में, सर पर रखकर फ़ोटो खिंचा सकते हैं।
देखते-देखते दो घंटे का समय हो गया। हम लोग वापस लौट आए। मदु गंगा नदी में बोटिंग का प्यारा अनुभव हमारी याद में दर्ज हो गया था।

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Wednesday, March 19, 2025

आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाये तो जिन्दगी भर प्रोफ़ेसर ही रहता है

 


मरियमपुर अस्पताल के सामने मट्ठा, ब्रेड (बेड लिखा है ठेलिया में ) मक्खन, पाव की ठेलिया के नीचे प्रो. राम किशोर सक्सेना लिख देखकर हमें याद आया कि वर्षों तक हम दुकानों के साथ प्रो. लिखा देखकर सोचते थे कि ये प्रोफ़ेसर लोग दुकान क्यों खोले हुए हैं। दुकान ही खोलनी थी तो प्रोफ़ेसर क्यों हुए ?

बाद में पता चला प्रो. का मतलब प्रोप्राइटर भी होता है।
प्रोफेसर से याद आया मुस्ताक अहमद यूसुफ़ी का डायलॉग -“आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाये तो जिन्दगी भर प्रोफ़ेसर ही रहता है , चाहे बाद में वह समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे।”

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एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं

 एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं

उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।
गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन
कर गया प्रार्थना के समय आचमन
जब कभी गुनगुनाने लगे बांसवन
और भी बढ़ गया प्यास का आयतन
पीठ पर काँच के घर उठाए हुए
कौन किसके लिए पर्वतों पर चढ़ा ।
जब कभी नाम देना पड़ा प्यास को
मौन ठहरे हुए नील आकाश को
कौन संकेत देता रहा क्या पता
होंठ गाते रहे सिर्फ़ आभास को
मोम के मंच पर अग्नि की भूमिका
एक नाटक यही तो समय ने गढ़ा ।
एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।
-स्व. रामप्रकाश शुक्ल' शतदल'
*शतदल जी कानपुर के चर्चित गीतकार थे। देश के विभिन्न मंचो से काव्यपाठ करते रहे। कानपुर में नियमित शृंगार संध्या का आयोजन करते रहे। देश के प्रमुख गीतकारों को शृंगार संध्या में आमंत्रित करते रहे। इस गीत का ऑडियो मुझे शतदल जी के पुत्र मनीष शतदल ने उपलब्ध कराया। गीत का यूट्यूब लिंक ये रहा । सुनिए अच्छा लगेगा। संभव हो तो गीत के बारे में अपनी टिप्पणी भी लिखिए यूट्यूब पर।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/pfbid02yW9dUXQiaA9M4pXphZ3FTtX7PjKMaFaAc9N41fHKw9bF2ETupcHc5vv73HgU4qqHl

Tuesday, March 18, 2025

रेशमी कंगूरों पर नर्म धूप सोयी

रेशमी कंगूरों पर नर्म धूप सोयी,
मौसम ने नस-नस में नागफनी बोयी।
दोषों के खाते में कैसे लिख डालें
ग़र अंगारे याचक बन पाँखरियाँ माँग गए।
कच्चे रंगों से तस्वीर बना डाली
हल्की बौछार हुए रंग हुए ख़ाली ।
कितनी है दूरी पर जाने क्या मजबूरी
टीस के सफ़र की कई सीढ़ियाँ फलांग गए।
खंड-खंड अपनापन टुकड़ों में जीना
फटे हुए कुर्ते रोज-रोज सीना।
सम्बन्धों की सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह अपना ही बौना पन टांग गए।
टीस के सफ़र की कई सीढ़ियाँ फलांग गए।
-कन्हैयालाल नंदन
नंदन जी के इस गीत को आप उनकी ही आवाज़ में यूट्यूब पर सुन सकते हैं। गीत का कड़ी टिप्पणी में दी है। इस गीत का ऑडियो मुझे मनीष शतदल जी से मिला। उनके पास उनके पिता जी रामप्रकाश शुक्ल 'शतदल' जी द्वारा नियमित किए जाते रहे गीतकारों के सम्मेलन 'शृंगार संध्या' के तमाम ऑडियो उपलब्ध हैं। इनमें देश के प्रसिद्ध गीतकारों के गीत उनकी आवाज़ में उपलब्ध हैं। इनमें गोपालदास नीरज, रमानाथ अवस्थी, उमाकांत मालवीय, किशन सरोज, सिंदूर जी आदि के गीत शामिल हैं। धीरे-धीरे उनको भी यूट्यूब में पेश करेंगे। दुर्लभ गीत हैं ये सब। चैनल सब्सक्राइब कर लें तो आप तक सूचना पहुँचती रहेगी।
इन गीतों के ऑडियो मिलने में कानपुर के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि एवं बहुत शानदार संचालक श्रवण शुक्ल जी का भी योगदान रहा। श्रवण शुक्ल Sharvan Shukla जी की कविताएँ भी आएँगी यूट्यूब पर।

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Monday, March 17, 2025

लड़कन के बीच रहत हन हम


कल दोपहर शहर जाना हुआ। सैंट्रो सुंदरी निकाली। झाड़-पोंछ कर निकल लिए।
अस्पताल के पास कुछ बच्चे मोबाइल को झाड़ू की तरह की स्टिक में फँसाए फोटोबाज़ी कर रहे थे। शायद रील जैसा कुछ बना रहे थे। हम उनको रील बनाते छोड़कर आगे बढ़ गए।
कालपी रोड पर सन्नाटा था। इतवार होने के कारण तीनों फैक्टरियाँ बंद थीं। इक्का-दुक्का गाड़ियाँ दिख रहीं थी सड़क पर। कालपी रोड के किनारे कुछ खंभे अभी भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार के आख़िरी दिनों में बनाए साइकिल पथ की निशानी के तौर पर गड़े थे।
समाजवादी सरकार के आख़िरी दौर में तय किया गया कि साइकिल पथ बनाएँ जाएँ। इसके लिए नई सड़कों की जगह कहाँ से आती? लिहाज़ा बनी हुई सड़कों को दोनों तरफ़ थोड़ा-थोड़ा घेर कर साइकिल पथ बना दिए गए। उन पर साइकिल तो नहीं चलीं लेकिन फ़लों, सब्ज़ी के ठेले खड़े होते रहे कुछ दिन। बाद में सरकार बदल गयी। खम्भे उखड़ गए। अब भी कहीं-कहीं गड़े हुए खम्भे बीते दिनों के साइकल पथ की याद दिलाते हैं।
अपने यहाँ योजनाएँ आमतौर पर इसी तरह बनतीं हैं, इसी तरह अमल होता है। सड़क संकरी करके साइकिल पथ बना दिया, किसी एक योजना का पैसा दूसरी में घुसा दिया। किसी कोटे में रिज़र्वेशन बढ़ा दिया भले ही सीटें कम हो गयीं। चुनाव में घोषणा कर दी इत्ते पैसे देंगे सबको, ये करेंगे, वो करेंगे। चुनाव बाद बताएँगे -"पैसे खतम हैं, योजना लागू करने के लिए योजना बनानी पड़ेगी।"
आगे सड़क किनारे नुक्कड़ पर एक बुजुर्ग अपनी दुकान पर तिरंगा झंडा लगाए बैठे थे। काफ़ी दिन से मैं इस दुकान को देख रहा था। सोचा कभी दुकान वाले से बात करेंगे। आज भी दुकान देखते हुए आगे बढ़ गए। सोचा लौटकर बात करेंगे।
सड़क पर एक स्कूटर वाला दूसरे स्कूटर को पैर से ठेलते दिखा। शायद आगे वाले का पेट्रोल ख़त्म हो गया होगा। पीछे वाला किस तरह आगे वाले को ठेल रहा था उसे देखकर लगा उनका नारा रहा होगा -"साथी लात लगाना।"
लौटते हुए फुटपाथ पर एक आदमी अपनी साइकल पेड़ के नीचे रखे ऊँघ रहा था। उसके पास छोटा बैनर लगा था जिसमें लिखा था -"बवासीर, खूनी, बादी, मस्से, कमजोरी,वातुरोग, शीघ्र पतन, स्वप्नदोष, हाइड्रोसील, लिकोरिया, चोट, मोच, दर्द, सायटिका की अचूक दवा मिलती है।"
बैनर देखकर लगा पेड़ के नीचे एक नहीं कई अस्पताल एक साथ खुले हैं। एक अकेला पेड़ के नीचे लेता आदमी सैकड़ों डाक्टरों के बराबर है।
मैंने रुककर उससे बात की तो पता चला कि पिछले कई सालों से इन रोगों की दवा देता रहा है। ऐसा कोई मरीज़ नहीं मिला उनको जिनकों उनकी दवा से फ़ायदा न हुआ हो। शर्तिया फ़ायदे की दवा है उनकी। नाम पूछने पर बताया -'ए के शुक्ला।'
समान नामराशि होने के कारण गर्व की अनभूति हुई की हमारे नाम राशि का आदमी पेड़ के नीचे लेटे हुए इतने रोगों का शर्तिया इलाज करता है।
लौटते हुए तिरंगे वाली दुकान पर आए। दुकान पर बैठे बुजुर्ग टहलने निकल गए थे। उनकी पत्नी दुकान के बाहर बैठी थी। दुकान क्या थी वह सीमेंट के पाइप और फुटपाथ के सहारे टिके लकड़ी के टूटे तख़्त पर टिका हुआ इंतज़ाम था। चाय, पान मसाला जैसी चुटुर-पुटुर चीजें रखीं थी दुकान पर।
बात करने पर पता चला कि सात-आठ साल से यहाँ दुकान रखे हैं ये लोग। झाँसी के रहने वाले हैं बुजुर्ग लालाराम। पहले गणेश फ्लावर मिल में काम करते थे। साबुन बनाने की फ़ैक्ट्री थी। मिल बंद हो गयी तो यहाँ दुकान डाल ली। तीन बच्चे हैं, तीनों अपने-अपने काम से लगे हैं।
"लड़कन के बीच रहत हन हम "- दुकान के बाहर बैठी शीला ने कहा।
सड़क किनारे दीवार से सटी टूटी-फूटी बरसाती ढँकी जगह पर रहते हैं मियाँ-बीबी। बच्चे भी आसपास ही कहीं रहते हैं। बुजुर्ग महिला ने अपना मायका चिरगाँव बताया। हमने सोचा मैथिली शरण गुप्त के बारे में पता करें लेकिन उनका नाम लेने पर शीला देवी ने एकदम अनसुना सा कर दिया। जानती नहीं होगी गुप्त जी को । हमने सोचा कि अच्छा हुआ राष्ट्र्कवि आज नहीं हैं वरना अपनी उपेक्षा से दुखी होकर एक खंड़काव्य लिख देते।
दुकान के पास एक बकरी, मुर्ग़ा और कुछ मुर्गियाँ टहल रहीं थीं। पता चला एक बकरा भी था जिसे नए साल के दिन किसी ने चुरा लिया। चार मुर्गियाँ हैं, अंडे देती हैं। अंडे और चाय बेचकर किसी तरह गुज़ारा होता है। सरकार की तरफ़ से मिलने वाला पाँच किलो राशन बेटा पहुँचा जाता है।
सड़क किनारे, सूनसान जगह अकेले रहते रात में डर नहीं लगता? सवाल के जबाब में शीला देवी ने कहा -" सड़क चलती रहती है। लोग आते-जाते रहते हैं। सिपाही गस्त करते हैं। इस लिए डर नहीं लगता।"
चाय के दाम पाँच रुपए हैं लेकिन लोग बहुत कम आते हैं पीने। फ़ैक्ट्री सामने और बग़ल में होने के बावजूद वहाँ के लोग नहीं आते। कभी-कभी कोई राहगीर आते-जाते चाय पी लेता है।
बातचीत के दौरान किसी क़िस्म की कोई दीनता वाली बात नहीं की बुजुर्ग महिला ने। चुपचाप, शांत भाव से बात करते हुए जबाव देती रहती रहीं।
मेरी समझ में बहुत कठिन और अभाव ग्रस्त जीवन है इन बुजुर्गों का। लेकिन उनकी बातचीत से इसका कोई संकेत नहीं मिला। ऐसा लगा जैसे जी रहे हैं वैसे ठीक है।
अपने देश में करोड़ों लोग इस तरह का जीवन न जाने कब से जी रहे हैं जो विकास के किसी भी मायने से सुखी जीवन नहीं कहा जा सकता। लेकिन लोग जी रहे हैं, न जाने कब से।

वापस लौटते समय देखा कि बच्चे अभी भी रील बनाने में लगे थे। अब उनके पास बड़ा कैमरा भी दिखा। हम उनसे बात करके आगे बढ़ गए। आगे बढ़ने के बाद सोचा कि उनकी रील बनाते हुए फ़ोटो लेनी चाहिए थे। हमने फिर कार के रीयर व्यू मिरर से उनकी इमेज की फ़ोटो ली। बच्चे लोगों को कड़ी धूप में रील बनाने में न जाने क्या हासिल होता है। यही सोचते हुए हम वापस घर आ गए। 


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Sunday, March 16, 2025

पंडित भया न कोय -एक पाठकीय प्रतिक्रिया

 पिछले दिनों ज्ञान चतुर्वेदी जी के नए उपन्यास 'एक तानाशाह की प्रेम कथा' पढ़ते हुए इसके पढ़ने की सूचना फ़ेसबुक पर लगाई तो अलंकार रस्तोगी Alankar Rastogi ने टिप्पणी में लिखा:

"ज्ञान सर हम सबके प्रिय हैँ.. उनके साथ हम जैसे नौसीखिए को भी पढ़िए ताकि आपको superiority काम्प्लेक्स होता रहे .. 😆😆😆"
यह एक तरह की आत्मीय धमकी टाइप है कि हमारा उपन्यास नहीं पढ़ा तो ठीक नहीं होगा। कोई मित्र लेखक जब अपनी किताब पढ़ने के लिए कहता है तो इसका असल मतलब होता है कि पढ़कर तारीफ़ करो। लेखक अगर बड़ा हुआ तो उसकी तारीफ़ के अलावा और कुछ लिखा गया तो लेखक लिखने वाले की समझ पर सवाल उठाते हुए कहता है -" यह समझ में नहीं आया। आज नहीं आया पच्चीस साल बाद समझ में आएगा। बहुत ऊँची बात कही गयी है इसमें। लिखने वाले की समझ में नहीं आई यह उसकी समझ की कमी है। लेखक के लिखने में कोई कमी नहीं है।"
कुछ और तगड़ी नेटवर्किंग वाले समझदार लेखक तो किसी के कुछ लिखने के पहले ही कुछ बड़े माने जाने वाले लेखकों से आशीर्वाद नुमा तारीफ़ लिखकर उनसे सम्भावना युक्त होने की भविष्यवाणी लेकर सबको दिखा देते हैं। अब इसके बाद कुछ और लिखने के लिए कुछ बचता नहीं है।
वैसे भी साथी लेखकों के बारे में कुछ कहने/लिखने का मतलब तारीफ़ करने के सिवा और कुछ होता नहीं है। यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। मेरी कुछ किताबों के बारे में बड़े-बड़े लोगों ने बिना पड़े इतनी तारीफ़ की है कि अब हमें अपनी तारीफ़ें झूठ लगती हैं।
अलंकार रस्तोगी जी के उपन्यास के बारे में कुछ लिखते हुए ये जो ऊपर के तीन पैराग्राफ़ जिस तरह से लिखे उस तरह से बड़े लोग साथी/नए लेखकों की किताबों की भूमिका लिखते हैं। आठ पैराग्राफ़ में इधर-उधर की बातें लिख कर चलते हुए आधे पैराग्राफ़ में लेखक के बारे में लिखकर सम्भावना व्यक्त करके शुभकामनाएँ दे देते हैं।
अलंकार रस्तोगी के उपन्यास 'पंडित भया न कोय' की सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी भूमिका किसी बड़े लेखक से नहीं लिखवाई है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वे अपना उपन्यास इसी साल पुस्तक मेले में ही लाना चाहते होंगे। भूमिका लिखवाते किसी से तो शायद अगला साल लग जाता ।
अलंकार के इस पहले उपन्यास के बारे में कम लोगों ने लिखा है। एकाध लेख साथी लेखकों ने लिखे हैं। बड़े लेखकों को वैसे भी फ़ुरसत और मन कम ही होता है साथी लेखकों के बारे में लिखने का।
अलंकार ने जो लिखा " हम जैसे नौसीखिए को भी पढ़िए ताकि आपको superiority काम्प्लेक्स होता रहे .. " तो उसके बारे में सचाई यह है कि हमको ज़बरदस्त जलन और inferiorty कम्पलेक्स हुआ कि हाय हम न लिख पाए उपन्यास और 'ई लिख मारिन।'
हम इसको पढ़ते हुए 'जेनुइन' जलन के शिकार हुए। इसी जलन के कारण मन तो कर रहा है कि उपन्यास की 'जेनुइन' खिंचाई करके रख दें। लेकिन यह सोचकर कुछ दिन बाद लखनऊ में ही बसना है, मन की बात लिखने से परहेज़ कर रहे हैं। वैसे भी 'मन की बात' कहने का हक़ हर एक को थोड़ी होता है।
उपन्यास कुल जमा 192 पेज के उपन्यास के 11 पेज भूमिका, सूची आदि में निकाल कर कहानी बची 181 पेज में। इतने में कुल 33 अध्याय। मतलब औसतन साढ़े पाँच पेज में एक अध्याय। सारे अध्याय एक के बाद एक करके जुड़े हुए हैं। इसलिए उपन्यास आराम से पढ़ा गया।
उपन्यास के शिक्षा जगत के किस्से बयान किए गए हैं। मास्टर अमन के स्कूल में ज्वाइन से शुरू करके दो मिनट की शोक सभा में ख़त्म होता है उपन्यास। इस बीच अलग-अलग अध्यायों में स्कूलों से जुड़े किस्से बयान किए गए हैं। ये किस्से आम तौर पर थोड़ा इधर-उधर करके लगभग हर स्कूल की कहानी है। अलंकार के साथी अध्यापक अगर उपन्यास को पढ़ेंगे तो कोई न कोई ज़रूर कहेगा कि ये उसके बारे में लिखा न, ये हमारे बारे में क्यों लिखा भई?
यह भी हो सकता है कि विद्यालय के कुछ बच्चे इस उपन्यास को पढ़कर बिना किसी अपराध बोध के वो काम करने लगें जिनको करते हुए वे अब तक हिचकते थे।
हो तो यह भी सकता है कि कुछ बच्चे इसको पढ़कर आपस में कहें -"गुरु जी कितने पुराने जमाने की कहानी लिख़िन हैं। हमते पूछत तौ हम बताइत असल किस्सा आजकल के लौंडन का। ख़ैर लागत है गुरुजी हम लोगन की तरह ही बवाली रहे हुइहैं ।पता करौ आजकल इनकी गुंजन के का हाल हैं ।"
गुंजन के बारे में जानने के लिए उपन्यास पढ़ा जाए।
उपन्यास में अलंकार ने अपने शिक्षा जगत के लगभग सारे अनुभव निचोड़ के रख दिए हैं। अब अगला उपन्यास लिखने के लिए किसी नए इलाक़े का मुआइना करना होगा।
उपन्यास की भाषा में आम बोल चाल की भाषा है जिसमें अंग्रेज़ी के आम बोलचाल में प्रयोग किए जाने वाले शब्द बेझिझक आते , बिना 'में आइ कम इन सर ' कहे घुसते आए हैं। लेखक का अंग्रेज़ी का अध्यापक होने का इतना लाभ तो मिलना बनता है शब्द समुदाय को।
उपन्यास में लम्बे-लम्बे वाक्यों को पढ़ते हुए लगा कि छोटे वाक्य होते, चुस्त-दुरुस्त तो बेहतर होता।
उपन्यास विवरण वाले अन्दाज़ में लिखा गया है। पाठक को सब कुछ समझाते हुए। पाठक के लिए ऐसे स्कोप बहुत कम है जिसको समझने में उसको अपनी बुद्धि लगानी पढ़े और समझ में आने पर उसको लगे -"क्या ऊँची बात कही है।"
उपन्यास पढ़ते हुए शुरुआत पेंसिल से पंच वाक्य पर निशान लगाते हुए की थी। कुछ मुलाहिजा फ़रमाएँ:
1. सरकारी इमारतें भी गरीब की इंसान की तरह सीधे बचपन से बुढ़ापे में कदम रखती हैं।
2. सुविधा शुल्क युक्त लिफ़ाफ़े के हैसियत एक सरकारी विभाग में वही होती है जो आईसीयू में आक्सीजन की होती है।
इसके बाद पेंसिल कहीं इधर-उधर हो गयी और पंच वाक्य नोट करने रह गये।
सरकारी स्कूल की बुराइयाँ करते समय कहीं-कहीं अतिशयोक्ति भी नज़र आयी। 'दो इंच धूल से जमी फ़ाइलें' पढ़ते हुए लगा कि इतनी मोटी धूल देखे बिना रिटायर हो गए हम। बहरहाल लेखक को इतनी छूट लेने का हक़ तो हैइऐ है।
अलंकार रस्तोगी के पाँच व्यंग्य संग्रहों के बाद उनका पहला उपन्यास आया। इसके साथ वे उन कुछ चंद व्यंग्यकारों में शामिल हो गए जिनके उपन्यास भी आए हैं। यह हम जैसे मित्रों के लिए ऊपरी तौर पर ख़ुशी और अंदर-अंदर 'जेनुइन' जलन का कारण है।
आशा है आने वाले समय में उनके और उपन्यास आएँगे और हमारे लिए 'जेनुइन' जलन का का कारण बनेंगे। इसके लिए अलंकार को शुभकामनाएँ।

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