Friday, September 26, 2025

आयुध विहार में मुलाक़ात



 नोयडा रिहाइश के दौरान हम जब भी दिल्ली घूमने का कोई किस्सा पोस्ट करते तो उसे पढ़कर आयुध विहार में रहने वाले हमारे कुछ सीनियर कहते -"कभी आयुध विहार भी आओ।" हम जाने के बारे में सोचते पर नोयडा से दो घंटे की दूरी के चलते सोचते ही रहते। जाना हो नहीं पाता। लेकिन पिछले इतवार को दोस्तों से मिलने की कड़ी में द्वारिका में रहने वाले मित्र योगेन्द्र पाठक से मिले तो पास ही स्थित आयुध विहार भी गए। (क़िस्सा यहाँ पढ़ सकते हैं -https://www.facebook.com/share/v/1CzkUFwNPx/)

हम 36 साल आयुध निर्माणी संगठन में रहे। संगठन का मुख्यालय कोलकाता में है। आयुध विहार , आयुध निर्माणी संगठन के सेवानिवृत्त अधिकारियों का मुख्यालय जैसा है। यहाँ संगठन के कई सेवानिवृत्त अधिकारी रहते हैं।
अपने देश में सरकारी सेवाओं का चरित्र मूलत: राजशाही है। बॉस ख़फ़ा तो चैन दफ़ा। हमारे संगठन में भी कुछ अधिकारी ऐसे हुए जिनसे लोग आतंकित रहते थे। उनको 'मैंन मैनेजमेंट' के नाम पर केवल चिल्लाना, धमकाना जैसे दशकों पुराने तरीकों से ही काम चलाना आता था । मैंने पाया कि ऐसे 'गलेबाज' लोगों में से अधिकांश का पारिवारिक जीवन चौपट रहता है। कुछ लोग इसलिए भी चिल्लाते रहे ताकि उनके ग़लत-सही निर्देश लोग बिना एतराज के पालन करते रहे। ऐसे अधिकांश लोग रिटायरमेंट के बाद अकेले, अलग-थलग होते गए। कोई उनसे बात करना भी पसंद नहीं करता।उनकी भी हिम्मत नहीं होती कि अपने से लोगों से बात कर सकें।
मेरा सौभाग्य रहा कि एकाध अपवाद छोड़कर मेरे सीनियर्स बहुत प्यारे, आत्मीय और ख्याल रखने वाले रहे। अपन बिना किसी लाग-लपेट के, बिना डरे, बिना दबाब के उनसे अपनी बातें रखते रहे। असहमत होने पर बहस करने, लड़नें-झगड़ने की सुविधा भी मिलती रही । कभी यह नहीं लगा कि इससे हमारा कोई नुक़सान होगा। अपने खिलंदड़े स्वभाव के चलते हमारे अधिकांश वरिष्ठ अधिकारियों से हँसी-मजाक के संबंध भी रहे। इसके पीछे मेरा खिलंदड़े स्वभाव से अधिक उन वरिष्ठों का हाथ रहा जो हमारी बेवक़ूफ़ियों को नजरंदाज करते रहे।
ऐसे लोगों से उनके रिटायर होने के बाद भी संपर्क बने रहे। पारिवारिक संबंध रहे। बातचीत होती रही। हमारे रिटायर होने के बाद तो सिलसिला बढ़ गया। टहलते हुए जिसका ध्यान आता, फ़ोन लगाकर बातचीत कर लेते।
सुभाष चंदर Subhash Chander सर के साथ शाहजहांपुर में काफ़ी दिन काम किया हमने। तमाम यादें उनके साथ की हैं। दिल्ली आईआईटी से इंजीनियरिंग करके आयुध निर्माणी संगठन में आए सुभाष सर शाहजहांपुर में मिले थे। फैक्ट्री का लगभग सारा ही काम देखते थे। बहुत मेहनत करते थे। मुझे आज भी ताज्जुब होता है कि कैसे उनको तमाम लंबे-लंबे फ़ोन नम्बर याद रहते थे। बिना डायरी देखे लोगों को फ़ोन मिलाते। पीए को बताते -"इस नंबर पर बात कराओ।"
सुभाष चंदर जी के साथ की कई मजेदार यादे हैं। किसी बात पर नाराज होते तो लगता प्यार कर रहे हैं। हमारे साथ काम करने वाले अधिकारी अजीत कुमार गुप्ता को एक बार किसी बात पर उन्होंने डाँटा तो गुप्ता जी ने उल्टा सर से शिकायत की -"सर इसमें सारा दोष आपका है। आप हमको हड़काते तो हैं नहीं। हमसे इतने प्यार से बातें करते हैं कि हमको डर नहीं लगता। बिना डरे कहीं काम होता है?" सर के पास मुस्कराने के अलावा कोई चारा नहीं था।
एक दिन दोपहर को लंच में घर जाने के पहले मैं एक फ़ाइल लेकर सर के दफ़्तर में चला गया। ऑफ़िस के बाहर लालबत्ती जल रही थी। लेकिन अपन उस समय यह सोचते नहीं थे। हमको लगा कि काम से जरूरी कोई काम थोड़ी होता है।
सर कुछ जरूरी काम कर रहे थे। हमने फ़ाइल उनके आगे रख दी। साहब ने संकोच पूर्वक कहा -"शुक्ला मैंने कुछ जरूरी काम कर रहा हूँ।" इसका मतलब यह था कि बाद में आना अपने काम के लिए। लेकिन मुझे लगा कि हम जो काम लेकर आए हैं उससे जरूरी कोई काम कैसे हो सकता है?
हमने कहा -"सर, आप अपना काम करिए। लेकिन पहले इस पर दस्तखत कर दीजिए।"
सर ने शांत भाव से लेकिन दृढ़ता से फिर कहा -"मैं कुछ जरूरी काम रहा हूँ। इसीलिए मैंने बाहर लाल बत्ती जला रखी है।"
उनके कहने की गंभीरता से मुझे लगा कि लाल बत्ती प्रोटोकाल का उल्लंघन करना शायद ठीक नहीं था। मुझे ऐसा करना नहीं चाहिए। साहब को यह ख़राब भी लगा है। उनकी शिकायत जायज है। लेकिन अब किया क्या जा सकता है।
ऐसे में होना चाहिए था कि हम सॉरी कहकर कमरे से बाहर आ जाते। लेकिन हमारी बेवक़ूफ़ी और हाजिर जबाबी ने ऐसा होने नहीं दिया। हमने कुछ ऐसा कहा -"सर, आप हमारे बॉस हैं। हम आपका सम्मान करते हैं। इसलिए हम तो आपके दफ़्तर में सर झुका के आते हैं। हमें क्या पता ऊपर बत्ती हरी है कि लाल। बत्ती हमारी ऊँचाई से भी ऊपर लगी है। इसीलिए देख नहीं पाये। आगे से देखकर आयेंगे।"
इसके बाद क्या हुआ मुझे याद नहीं। लेकिन यह किस्सा मुझे याद है। साहब को पता नहीं याद था कि नहीं। लेकिन मुलाक़ात होने पर मैंने सुनाया तो उन्होंने मजे लिए।
सुभाष चंदर जी और भाभी जी शाहजहांपुर के 'बेस्ट कपल' कहलाते थे। शाहजहांपुर के बाद कभी साथ-साथ काम नहीं किया लेकिन संपर्क हमेशा बना रहा। साहब मेटल एंड स्टील फैक्ट्री इछापूर और VFJ में वरिष्ठ महाप्रबंधक रहने के बाद आयुध निर्माणी बोर्ड के मेंबर पद से रिटायर हुए ।
सुभाष चंदर सर मेरे आयुध निर्माणी में सेवा के दौरान हमेशा मेरे सहायक रहे। उनका और उनके जैसे ही कुछ और वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग न होता तो शायद मैं आयुध निर्माणी संगठन बहुत पहले स्वैक्छिक सेवानिवृत्त हो जाता या फिर जिस पद पर पहुँच कर रिटायर हुआ वहाँ तक न पहुँचता।
सर के पास मैं शाम को पहुँचा। ढेर सारी बातें हुई, तमाम यादें दोहराई गयीं। मेरे बहुत बार मना करने के बावजूद खूब सारी मिठाई, नमकीन, चाय पिलाई। भाभी जी ने कहा -" आप काफ़ी यंग लग रहे हैं।" हमारे कम किए वजन को तमाम लोग कमजोर हो जाना कहते हैं, भाभी जी ने कहा -"यंग लग रहे हैं।" हमने उनकी बनाई हुई खीर खाते हुए कहा -"आप हमारी वजन कम करने की तपस्या में व्यवधान डाल रही हैं।" लेकिन उन्होंने मेरे अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। सब खाना पड़ा।
सुभाष चंदर सर से मिलने के बाद पास ही रहने वाले Surender Kumar सुरेंद्र कुमार सर से मिलने गए।सुभाष सर उनके ब्लॉक तक छोड़ने गए। सुरेंद्र कुमार सर हमारे ओएफ़सी में बॉस थे। मुझे याद है वे सेल फोर्ज सेक्शन का राउंड करके आने के बाद कुर्सी के पर बैठ जाते। उनके घुटने दर्द करते थे। देर तक हल्के-फुलके अंदाज़ में बातें होती। दोस्ताना लहजे में। उनके चंडीगढ़ फैक्ट्री के महाप्रबंधक बन कर जाते समय विदाई भाषण में अपनी कही एक बात मुझे याद आती है -"साहब मेरे बॉस रहे। बॉस से तमाम शिकायतें होती हैं। लेकिन मेरी एक शिकायत यह है कि साहब के साथ की मेरी ऐसी कोई याद नहीं है जिसको मैं शिकायत के रूप में याद कर सकूँ।"
चंडीगढ़ फैक्ट्री में साहब के जीएम रहते हुए हम मनाली घूमने गए थे तो चण्डीगढ़ में हमारे रहने का इंतजाम किया था साहब ने। बाद में भंडारा के वरिष्ठ महाप्रबंधक और फिर आयुध निर्माणी बोर्ड के सदस्य पद से रिटायर हुए ।
रिटायर होने के बाद साहब का कानपुर आना-जाना होता रहा। संपर्क, बातचीत बना रहा। दिल्ली से संबंधित कोई भी पोस्ट लिखता तो सबसे पहले सुरेंद्र कुमार सर की याद आती कि साहब कहेंगे -"तुम दिल्ली घूमते रहते हो आयुध विहार नहीं आते।"
यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे जीवन में ऐसे कई वरिष्ठ , साथी और जूनियर अधिकारी हैं जो उनके शहर में पहुँचने पर मुलाक़ात न होने पर उलाहना देने और हड़काने का काम बेतकुल्लफ़ी से करते हैं। कल रात ही कानपुर में मेरे बॉस रहे आर एस सोढी जी का फ़ोन आया। उन्होंने तो हाल-चाल पूछा लेकिन भाभी जी ने हड़काया -"हमको पता चला है कि आप दिल्ली में अपने दोस्तों से मिलने आये थे लेकिन हमसे बिना मिले चले गए। हमको सब ख़बर रहती है। " हमने सुकून महसूस किया कि उनको आयुध विहार जाने की ख़बर उनके सूत्रों से नहीं पता चली थी वरना हड़काई और तेज होती। हालांकि हमने बता दिया और जल्दी ही दिल्ली में आकर मिलने का वायदा किया। फौरन ही पता भी मिल गया।
सुरेंद्र कुमार सर के एक बार कानपुर आने की रोचक याद है। दिल्ली से कानपुर शाम को आने वाली ट्रेन लेट होती गई। ट्रेन अगले दिन आई। हम साहब का और भाभी जी का इंतजार करते रहे। वे फ़ोन पर लौट जाने को कहते रहे। लेकिन हम यह कहकर स्टेशन पर ही जमे रहे कि आप कोहरे में कैसे आयेंगे? आख़िर में ट्रेन आई और हम उनको लेकर ही लौटे।
साहब ने पिछले साल अपने दोनों घुटने बदलवाये हैं। यह सुनकर मुझे बीस साल पहले के उनके दर्द का एहसास हुआ। दोनों घुटने सही सलामत काम कर रहे हैं। साहब के साथ तमाम यादें ताजा हुईं। कितना कुछ खा चुके हैं का हिसाब देने के बावजूद घर के बनाए लड्डू, नमकीन और चाय लेनी ही पड़ी। मजबूरी थी । साहब का डायलॉग -"ये तो तुमको लेना ही पड़ेगा" सुनकर लगा कि बॉस लोग अपना अधिकार भाव कभी नहीं छोड़ते। नौकरी में रहते हुए तो कई दूसरे चैनल होते हैं जहाँ से रियायत पायी जा सकती है। लेकिन रिटायर होने के बाद तो वे ही सर्वेसर्वा हो जाते हैं। बड़प्पन और अपनापे की अतिरिक्त अथॉरिटी मिल जाती है उनको।
ऐसी अथॉरिटी के सामने बाइबल का पहला सूत्र वाक्य (जो कि मुझे वीएफजे में काम करते हुए महाप्रबंधक सचिवालय में काम करने वाली जीजी ने बताया था) ही याद आता है -"सबमिट टु अथॉरिटी।" (सत्ता के सामने समर्पण करो)
सुरेंद्र कुमार साहब के यहाँ से बगल वाले ब्लॉक में रहने वाले राजेश कुमार साहब से मिलने गए। राजेश कुमार सर से हमारा बोलांगीर फैक्ट्री से (1989-1992) परिचय रहा। इंदिरा गांधी ने इस फैक्ट्री का उद्घाटन करने के बाद ही अपना अंतिम सार्वजनिक भाषण दिया था। राजेश कुमार जी ने फैक्ट्री को प्रोजेक्ट स्टेट से फैक्ट्री बनने तक वहाँ काम किया। जंगल में, शेड में रहते, काम करते हुए फैक्ट्री स्थापित की। आज तो वहाँ स्टेशन है, बोलांगीर से बडमल सड़क पुल है। लेकिन मुझे आज भी आयुध निर्माणी के तत्कालीन महानिदेशक की वह तस्वीर याद है जिसमें आयुध निर्माणी संगठन के तत्कालीन महानिदेशक बोलांगीर और बड़मल के बीच पड़ने वाली नदी को पार करने के लिए अपना पैंट उतारकर तौलिया लपेटे हुए नदी के पानी में मँझाते हुए आ रहे हैं। उनकी पैंट साथ में चलते हुए कोई आदमी अपने हाथ में हैंगर की तरह लटकाये हुए है।
राजेश कुमार जी जहाँ रहे वहाँ उनकी मेहनत, कर्मठता के किस्से लोग सुनाते रहे। फिर चाहे वो बोलांगीर फैक्ट्री रही हो, दिल्ली के रक्षाविभाग में हो, किरकी फ़ैक्ट्री में या फिर रिटायर होने से पहले चांदा फैक्ट्री से वरिष्ठ महाप्रबंधक रहे हैं , हर जगह उनके काम, मेहनत, अच्छे व्यवहार और ईमानदारी की चर्चा होती रही। वो बहुत अच्छे, बहुत उत्साही संचालक भी रहे हैं। मेरे ज़ेहन में उनकी एक तस्वीर है जिसमें वे बोलांगीर फैक्ट्री में एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं का संचालन करते हुए प्रतिभागियों का हौसला बढ़ा रहे हैं।
राजेश कुमार साहब से मिलने पर वही खाने-पीने का का आग्रह हुआ। हमने बताया कि हम इत्ता-इत्ता खाकर आए हैं लेकिन उसे माना नहीं गया। खाना लग गया था। हमने मना किया तो उन्होंने कहा -"रख दो हम बाद में खाएँगे।" अब इतने दिन बाद मुलाक़ात के बाद कोई सीनियर जिसके प्रति मन में बहुत सम्मान हो हमारे कारण भूखा रह जाये यह ठीक नहीं लगता। हमने साथ में खाना खाया। साहब ने स्टेशन छोड़ने के लिए कहा । हमने बताया कि इसी ब्लॉक में रहने वाले लोडवाल सर से भी मिल लेते हैं।
राजेश कुमार सर से विदा लेकर हम नीचे रजनीश लोडवाल Rajnish Lodwal सर के यहाँ पहुँच। बाहर तमाम जूते-चप्पल रखें थे। हमें लगा शायद कोई कीर्तन -भजन हो रहा है। लेकिन अंदर गए तो पता चला कि उस दिन मैडम का जन्मदिन था। जन्मदिन पार्टी चल रही थी। केक, मिठाई खाई। 'कुछ लेते होते तो उसका भी इंतजाम' था।
रजनीश लोडवाल सर ने वीएफजे में बहुत दिन काम किया। फिर चाँदा में वरिष्ठ महाप्रबंधक रहने के बाद आयुध निर्माणी संगठन से मेंबर पद से रिटायर हुए। हमने उनके साथ तब काम किया जब मैं आयुध निर्माणी , शाहजहांपुर में महाप्रबंधक था और साहब ओईएफ मुख्यालय में हमारे बॉस थे। कोरोना काल में लगभग सारी मीटिंग्स ऑनलाइन ही होती रहीं। उनके कामकाज में मेहनत और अच्छे साथियों के साथ दोस्ताना व्यवहार के अलावा उनका अपने कर्मचारियों के साथ मानवीय व्यवहार सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाला है। जब मैं कानपुर में आया तो मुख्यालय के ठेके पर काम करने वाले (कांट्रैक्ट पर काम करने वाले) कर्मचारियों ने बताया -"जब तक लोडवाल सर यहाँ रहें, हमको पूरे पैसे मिलते रहे।" ऐसा मानवीय नजरिया कम लोगों का रहता है।
रजनीश लोडवाल सर के यहाँ उनके भाई साहब और घर के अन्य लोगों से भी मुलाक़ात हुई। मैडम को जन्मदिन की सूखी बधाई दी। लेकिन खाने को खूब मिला।
बातचीत करते हुए रात के दस बज गए थे। हमने विदा माँगी तो रजनीश सर हमको ख़ुद छोड़ने आए मेट्रो स्टेशन तक। हमने अपने आप चले जाने जाने की ज़िद की लेकिन उसको 'ओवररूल' करके वे द्वारिका मेट्रो स्टेशन तक छोड़ने आए। उस दिन जिससे भी मिला सबने या तो जबरदस्ती अगले गंतव्य तक छोड़ा या फ़िर ' रिले रेस के बैटन की तरह' हमें अगले को सौंप दिया। स्टेशन रात के साढ़े दस बजे पहुंचे। अपने से आते तो शायद मेट्रो छूट जाती। द्वारिका मेट्रो से से डेढ़ घंटे की दूरी है नोयडा सिटी सेंटर। स्टेशन पहुंचने के पहले बेटे का फ़ोन आया -"मैं आपको लेने स्टेशन आ रहा हूँ।"
हमने बहुत मना किया कि मैं आ जाऊँगा, तुम मत आओ। लेकिन वह माना नहीं।हमारे स्टेशन पहुँचने के पहले गाड़ी लेकर पहुंच गया था। घर पहुंचते हुए घड़ी में दिन बदल चुका था।
संयोग ऐसा रहा कि उस दिन हमारी कोई बात न हमारे सीनियर्स ने मानी न हमारे बेटे ने। सबके 'अपनापे की तानाशाही' हम पर हावी रही । हम इस मामले में अपने को खुशनसीब मानते हैं कि ऐसे कई 'अपनापा और ख्याल रखने वाले तानाशाह' से हम जुड़े हुए हैं। हम अपनी खुशनसीबी पर प्रसन्न हैं । सबके भाग्य में ऐसे सुख कहाँ होते हैं।

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Thursday, September 25, 2025

लखनऊ पुस्तक मेले में



 "पुस्तक मेले हम शाम को जाते हैं "- हॉस्टल की तरफ़ जाते हुए बच्ची ने कहा।

विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन की लिफ्ट से उतरकर आते समय मिली बच्ची से बातचीत करते हुए आए। बच्ची बीकॉम में पढ़ती है। बस्ती की रहने वाली है। हॉस्टल में रहती है।
हमने पूछा -"साल भर में कितना क्लास बंक करती हो?"
"हम क्लास बंक नहीं करते। आज शहर में दीदी से मिलने आए थे। इसलिए क्लास छोड़ दी।"- बच्ची ने सहज भाव से बताया।
हमने बताया -"क्लास बंक नहीं की तो कॉलेज लाइफ का मजा क्या? हम तो खूब बंक करते थे क्लास।"
बच्ची ने बताया कि हॉस्टल में ठीक मिलता है। साल में 29000/- हॉस्टल फीस है। मतलब क़रीब 2500/- महीना। लगभग 100/- रोज़।
लखनऊ विश्वविद्यालय के पहले नवोदय स्कूल में पढ़ाई की है। हॉस्टल में रहने का अभ्यास है। अच्छा लगता है।
लखनऊ विश्वविद्यालय कैम्पस में अंदर आने के लिए जगह लोहे के जंगले जैसे लगे हुए हैं। ऐसा लगता है कि पूरा इंतजाम किया गया है कि कोई घुस न जाये।
अंदर आते समय एक जगह क्लास रूम बाहर से देखा। अध्यापिका खड़े-खड़े किताब से पढ़कर बच्चों को कुछ पढ़ा लिखा रही थीं।
मेले में जाने के पहले हिंदी भाषा विभाग में अध्यापक डॉ मेडूसा से मिलने गए। डॉ मेडूसा प्रसिद्ध यूट्यूब ब्लॉगर हैं। दुखदर्शन नामक चैनल के माध्यम से व्यंग्यात्मक टिप्पणी करती हैं। (डॉ मेडूसा के वीडियो का लिंक टिप्पणी में। पोस्ट यहाँ पढ़ सकते हैं -https://www.facebook.com/share/p/173BMNmUG2/)
डॉ मेडूसा के क्लासरूम के बाहर बच्चे उनका इंतज़ार कर रहे थे। हम पहुँचे तो बच्चों ने मुझे अध्यापक समझकर नमस्ते किया। हमने उनका नमस्ते वापस करते हुए बताया कि हम अध्यापक नहीं हैं। हम उनकी अध्यापक से मिलने आए हैं।
हमने बच्चों से डॉ मेडूसा के बारे में पूछा तो पता चला कि बच्चे जानते नहीं थे कि उनकी टीचर प्रसिद्ध यूट्यूबर हैं। बताने पर बच्चों ने युडट्यूब खोला और देखकर बोले -"अबे यार, ये तो सही में अपनी मैडम हैं। इनके 76000 सब्सक्राइबर हैं।" बच्चों ने फटाफट उनका चैनल सब्सक्राइब किया।
कुछ देर इंतजार के बाद पता चला कि मैडम सुबह आईं थीं। उनके यहाँ किसी की मृत्यु हो जाने के कारण वापस चली गयीं हैं। मुलाक़ात नहीं हो पायेगी। हम मेले आ गए।
मेले में किताबें देखीं। कई किताबें ख़रीदीं। दिनकर पुस्तकालय दिनकर पुस्तकालय का जिक्र Praveen Jha प्रवीण झा की पोस्ट में पढ़ते थे। कई किताबें ख़रीदी वहाँ से। इनमे भगतसिंह की जेल डायरी, अनरेंस्ट हेमिंग्वे की आर्म्स एंड द में का हिन्दी अनुवाद, शंकर की चौरंगी, लोहिया के भारत विभाजन के गुनहगार थी।
बात करने पर दिनकर पुस्तकालय वालों ने बताया कि उनके संस्थापना में डॉ प्रवीण झा और Divya Prakash Dubey का बड़ा सहयोग है। उन्होने लोगों को पुस्तकालय के बारे में बताया। दुकान में घूमने पर Ashok Pande की किताबों का सेट दिखा। उसमें उनका अरविंग स्टोन लिखित वान गॉग की जीवनी 'लस्ट फॉर लाइफ' का हिन्दी अनुवाद भी था। यह किताब मेरे पास नहीं थी। मैंने ख़रीदी। फोटो अशोक पांडेय को भेजा। वो ख़ुश हो गए। लेखक को अपनी किताब पढ़ी जाते हुए देखकर मिलने वाली ख़ुशी से बड़ी कोई ख़ुशी नहीं होती।
बाद में किताब की भमिका पढ़ते हुए पता चला कि 570 पेज की इस किताब का अनुवाद अशोक पांडेय ने मात्र 19 दिन में किया था। जुनूनी लोग ही ऐसा काम कर सकते हैं। ग़ज़ब की बात। अशोक पांडेय जैसे बीहड़ जुनूनी कम ही हैं किसी भी समाज में।
पुस्तक मेले में बड़े प्रकाशकों के स्टॉल कम हैं। छोटे-छोटे प्रकाशक आए हैं। बिक्री बहुत नहीं है। साथ हज़ार रुपए दस दिन का किराया। लोगों तक दुकान का नाम पहुंचे इसलिए लगाए हुए हैं दुकान।
बाद में मेले में मिले K.k. Asthana जी के व्यंग्य संग्रह 'फटी जींस का चिंतन' ख़रीदने अद्विग प्रकाशन गए तो वहाँ मौजूद जोया ख़ान ने और भी कई किताबें ख़रीदवा दी। किताबों के साथ फोटो भी ली अपने यहाँ लगाने के लिए। हमने वहीं रखी Alankar Rastogi की किताब 'पंडित भया न कोय' (जो हम पहले ही खरीद चुके थे दिल्ली पुस्तक मेले में) भी साथ में उठा कर फ़ोटो खिंचाई। बाद में पता Swati Choudhary की अनुवादित किताब मनमोहन रे खरीदने फिर आए अद्विक प्रकाशन पर Advik Publisher । फिर कई फ़ोटो में शामिल हुए।
'अनुवाद में तकनीक का दख़ल' में कार्यक्रम Samiksha Telang शामिल थीं बातचीत में। साथ में सुभाष नीरव, डॉ राजेन्द्र प्रसाद मिश्र और प्रितपाल कौर (समन्वयक) थे। अनुवादकों ने बताया कि तकनीक से सहयोग भले मिल जाये लेकिन तकनीक पूर्ण सक्षम नहीं है अनुवाद में। समीक्षा ने बताया कि वो अनुवाद में तकनीक का बिल्कुल उपयोग नहीं करती हैं। मूल का भावानुवाद करती हैं।
समीक्षा ने मराठी से हिंदी अनुवाद का मशीनी अनुवाद और अपने द्वारा किए भावानुवाद का उदाहरण पेश करते हुए मशीनी अनुवाद की वर्तमान सीमाओं के बारे में जानकारी दी।
सबसे खटकने वाली बात श्रोताओं का अभाव था। चार वक्ता को सुनने वाले श्रोताओं की संख्या दो अंकों में भी नहीं थी। मेले का आयोजन करने वाली संस्थाओं को श्रोताओ का इंतजाम करने वाले हमारे प्रस्ताव पर ध्यान देना चाहिए। बातचीत का समय निर्धारित करने वालों को भी सोचना चाहिए कि भरी दोपहरी में डेढ़ बजे अपने आप श्रोता कैसे आयेंगे।
बातचीत के बाद हम भी वीआईपी लाउंज में एसी की हवा में घुस गए। वहाँ वक्ताओं के लिए लंच और बाकी लोगों के चाय का इंतज़ाम था।
लंच के बाद वाले सत्र में 'स्त्री अस्मिता के प्रश्न' पर चर्चा हुई। डॉ रजनी गुप्त, विवेक मिश्र, Kanchan Singh Chouhan , डॉ Swati Choudhary और केतकी (समन्वयक) ने स्त्री अस्मिता से जुड़े सवालों पर चर्चा की। सभी का मानना था कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना स्त्री स्वतंत्रता के लिए जरूरी सहयोगी उपाय है। चर्चा के दौरान हुए कुछ सूत्र वाक्य यहाँ पेश हैं :
डॉ रजनी गुप्त: Rajni Gupt
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-श्रम और कर्मठता का कोई विकल्प नहीं होता। स्त्री के अंदर आत्मविश्वास आना चाहिए। आत्मनिर्णय का भाव होना चाहिए। स्त्री का आत्मविश्वास बड़ी पूंजी है। सोशल मीडिया ने स्त्री को सशक्त बनाया है। उसको अभिवयक्ति की आजादी दी है। लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि स्त्री कहीं दैहिक आजादी के दुश्चक्र में न पद जाये।
डॉ स्वाति चौधरी :Swati Choudhary
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-औरतें क्या सच में कमजोर होती हैं! -
-समाज में दलित महिलाएं सवर्ण स्त्रियों के मुक़ाबले ज़्यादा स्वतंत्र हैं क्योंकि वे आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर हैं।
- स्त्री की क्षमताओं को कम बताते हुए उनको कमजोर बनाया जाता है जबकि पुरुष को समर्थ बताया जाता है। स्त्रियों को ख़ुद संघर्ष करके अपनी इस कंडीशनिंग से मुक्त होना चाहिए।स्त्री को सफलता -असफलता के डर में पड़े बिना स्वयं निर्णय लेना चाहिए।
कंचन सिंह चौहान: Kanchan Singh Chouhan
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-बराबरी का मौक़ा सबसे जरूरी चीज है। स्त्री और पुरुष द्वारा किए जाने वाले कामों का वर्गीकरण स्त्री की क्षमताओं को सीमित करता है। मानसिक रूप से मुक्ति सबसे जरूरी है। सोशल मीडिया के माध्यम से बनने वाली रील्स में भी स्त्रियों के आपसी संबंध (सास-बहू आदि) वैसे ही दिखाये जाते हैं। इसका कोई बहुत फ़ायदा होता है ऐसा मैं नहीं सोच पाती। स्त्री अस्मिता के लिए सबसे जरूरी है कि जैसा (अच्छा) हम सोचते हैं वैसा कर सकें इसके लिए हमें प्रयास करने चाहिए। -
विवेक मिश्र Vivek Mishra
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-हम महिलाओं के बौद्धिक रूप से बराबर नहीं समझते। उनकी उपलब्धियों को संदेह की नजर से देखते हैं।लड़कों की कंडीशनिंग ऐसी होनी चाहिए कि वे यह समझें कि लड़कियां भी बराबर सक्षम होती हैं।
बाजार भी पितृसत्ता का रूप है। स्त्री को सजग रहना होगा कि कहीं मुक्ति का उत्सव मनाते हुए वो उसके चंगुल में न पड़ जाये। स्त्री कोई निर्णय लेते समय यह ध्यान रखें कि जो निर्णय वे ले रही हैं वह उनका अपना निर्णय है। बाजार के दबाव में लिया निर्णय नहीं है।
विमर्श के बाद फिर एसी वीआईपी लाउंज की ठंडी हवा में चाय-पान हुआ। सबको नीबू की चाय पिलवाई Lalitya Lalit ने। शाम को होने वाले कवि सम्मेलन के लिए आए सूर्यकुमार पांडेय जी को बताया कि अनूप शुक्ल नॉयडा से आए हैं मेले में शिरकत करने। हमने सूचित किया कि इसके लिए NBT ने किराया अभी तक नहीं दिया है।
वीआईपी लाउंज में सत्कार का इंतजाम देख रही बच्चियाँ लखनऊ विश्वविद्यालय में एम. ए. की छात्राएँ हैं । एम. ए. के बाद पीएचडी करेंगी या फिर कोई कंप्टीशन जिससे कि कहीं शिक्षक की नौकरी कर सकें। बच्चियों ने अपने नाम बताये इकरा, बिस्मा और रुशना। इकरा का मतलब मुझे पता था पढ़ना, बिस्मा का मतलब बच्ची ने बताया मुस्कराना। रूशना का मतलब मैंने अपने हिसाब से बताया -रूठ जाना। बच्चियों ने मुस्कराते हुए मुझे बताया कि रूशना का मतलब होता है -सूरज की पहली किरण। हमको लगा हमने मतलब पूछ लिया वरना हम यही समझते रहते कि रूशना मतलब रूठ जाना।
एक बार हमको फिर लगा कि हम अपने अज्ञान और सीमित ज्ञान के चलते दूसरे लोगों और समाज के बारे में धारणायें बनाते रहते हैं। अक्सर ये धारणायें वास्तविकताओं से अलग होती हैं। पूरी जिंदगी हम ग़लत धारणाओं के साथ ही बिता देते हैं।
बाद में कंचन ने बताया कि उनके पैर में फैक्चर हुआ है। प्लास्टर चढ़ना है। देर हो गई। टाइम नहीं मिला। अपनी चोट और इलाज में लापरवाही की सूचना हँसते हुए देने के बाद कंचन न घर आने की जिद करते हुए न आने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी।
के के अस्थाना जी K.k. Asthana भी दोनों बातचीत सत्र में साथ थे। उनका व्यंग्य संग्रह 'फटी जींस का चिंतन' खरीदकर हमने उनके दस्तखत करा लिए किताब में। उन्होंने पूरे ध्यान से वक्तव्य सुनते हुए फ़ोटो भी लिए। फोटो देखकर कोई कह सकता है कि सुनने की बजाय सो रहे हैं अनूप शुक्ल। लेकिन सच यही है कि हम ध्यान से सुन रहे थे।
अलंकार रस्तोगी से मुलाक़ात हुई। चाय समोसा हुआ। अलंकार ने दिल्ली में उनकी किताब ख़रीदने पर चाय पिलाने का बकाया उधार चुकाने का प्रयास किया। लेकिन हमने फुर्ती से उनकी कोशिश को विफल करते हुए चाय,समोसे के 150/- भुगतान कर दिए। डेढ़ सौ रुपए के चक्कर में 'किताब खरीदने पर भी चाय न मिलने का उलाहना देने' का हक गंवाना ठीक नहीं लगा हमें।
घर आकर किताबें किताबें देखते हुए लगा कि ले तो आयें हैं लेकिन इनको पढ़ना भी है। अशोक पांडेय ने 19 दिन में किताब का अनुवाद कर डाला। हम कम से कम उतने दिन में इसे पढ़ लें। देखते हैं क्या होता है।