Saturday, October 25, 2025

बनाना बोट राइड -समंदर के पानी में छ्पाऽऽऽक



 लक्षद्वीप में आने के तीसरे दिन बनाना बोट राइड पर गए हम लोग। बनना मतलब केले के आकार की रबर की बनी बड़ी नावें। हवा भरी होगी अंदर। नाव पर बैठकर पकड़ने के लिए रस्सी लगी थी। उसको पकड़कर बैठना होगा था ताकि संतुलन बना रहे।

बनाना बोट समुद्र किनारे रेत पर रखीं थीं। उनको ठेल-ठाल कर पानी में उतारा गया। लोग नाव पर सवारी करने के लिए तैयार होने के पहले रेत पर, पानी पर मजे करते रहे। तरह-तरह के पोज में फोटो खिंचाते रहे। महिला साथियों ने गोल घेरे में उबंटू आकार में बैठकर भी एक फ़ोटो खिंचाया।
बनाना वोट राइड के पहले नाश्ते के समय लोगों ने अपने सुबह के किस्से भी सुनाये। सुमन गुप्ता जी और किरन शुक्ला जी ने किसी स्थानीय व्यक्ति की साइकिल लेकर साइकिलिंग भी की थी। सुमन गुप्ता जी उतरते समय गिर गईं। घुटनों में चोट लगी। ख़ुद मरहम-पट्टी कर ली।
उस दिन अहोई अष्टमी थी। कुछ महिलायें व्रत भी थीं। सुबह उठकर उन्होंने पूजा की। बिना नमक का नाश्ता बनवाया गया था उनके लिए।
बनाना बोट राइड के पहले राउंड में पाँच लोग गए। बनाना वोट को मोटर वोट से बांधा गया। मोटर वोट से लंबी रस्सी से बंधी नाव मोटर वोट के पीछे-पीछे चलती रही। पानी में दूर तक गई। सब लोग लाइफ़ जैकेट पहने थे। मोटर वोट और बनाना वोट पर भी एक आदमी था जो सबकी सुरक्षा का इंतजाम देख रहा था।
काफ़ी देर पानी में घूमने के बाद मोटर वोट और उसके पीछे नाव वापस लौटी। किनारे आकर नाव में में सवार लड़के ने तेज आती नाव को एक तरफ़ जल्दी से झुका दिया। नाव में सवार सभी लोग पानी में गिर गए। पानी बहुत कम गहरा था किनारे इसलिए किसी को कोई खतरा नहीं था। सब आराम से कुछ देर पानी में बैठे रहे, मजे करते रहे। फिर किनारे आ गए।
पहली राइड के बाद दूसरे चक्कर में हम लोग बैठे नाव में। नाव में बंधी रस्सी कस कर पकड़ ली। नाव को मोटर वोट से बाँधकर आगे बढ़े हम लोग। धीरे-धीरे हम आगे बढ़े। मोटर वोट की तेज गति के साथ हम लोग हल्ला भी मचाने लगे। देखते-देखते हम किनारे से दूर गहरे पानी में आ गए।
अचानक क्या हुआ यह तो नहीं पता चला लेकिन नाव टेढ़ी होकर पलट गई। हम सभी लोग गहरे पानी में गिर गए। पानी में गिरे तो पहले तो डूब गए लेकिन लाइफ़ जैकेट पहने होने के कारण फौरन ही ऊपर भी आ गए। मुँह में ढेर सारा नमकीन पानी चला गया। ऊपर आकर पानी की लहरों के साथ ऊपर नीचे होने लगे।
इस बीच साथ बनाना वोट में सवार लड़का और मोटर वोट पर चला रहे लोग फौरन कूद कर पानी में आये। उनमें से एक ने हमारा और हमारे पास पानी में गिरी सुमन गुप्ता जी का हाथ पकड़ लिया। लाइफ़ जैकेट के कारण हम पानी की सतह पर थे। सतह कई मीटर नीचे थी। पास में स्टीमर और बचाने वाले लोग थे। अनन्य भी बगल में तैरते हुए कह रहा था -'चिंता की कोई बात नहीं। अभी सब लोग मोटर वोट पर चलेंगे।'
मोटर वोट पर सीढ़ियाँ लगाई गयीं। हम लोग एक-एक करके मोटर वोट पर पर चढ़े। पानी में स्थिर हो जाने के बाद सुमन गुप्ता जी का एक बयान यह भी था -' मेरे मुँह में पानी चला गया। मेरा तो व्रत खंडित हो गया।' सुबह घुटने में लगी चोट पर समुद्र का नमकीन पानी अलग से अपने जलवे दिखा रहा था।
मोटर वोट पर चढ़कर हम किनारे आए। किनारे आते हुए सोच रहे थे कि हमको तैरना तो आता नहीं। लाइफ़ जैकेट न पहने होते तो क्या होता? अभी भी यही सोच रहे हैं। तय किया है कि जितनी जल्दी हो सके तैरना सीखना है। दुनिया के जितने हिस्से में ज़मीन है, उससे ज्यादा हिस्से में पानी है। तैरना सीखना जरूरी है।
कुछ देर बार हम फिर से बनाना राइड के लिए चले। पहले बार की पानी में गिरने की याद हावी थी। हम बच गए थे लेकिन पानी में गिरने की याद ज़्यादा मुखर थी। इस बीच मौसम भी ख़राब हो गया था। हवायें तेज हो गयीं थीं। लहरें ज्यादा उछलने-कूदने लगीं थीं। शायद समुद्र को पसंद नहीं आ रहा कि एक बार हमको उसने वापस भेज दिया इसके बाद हम दुबारा उसके पास आयें वोट राइड के लिए। समुद्र का इलाका, समुद्र की मर्जी। उसने हमारा समुद्र वीजा कैंसल सा कर दिया। हम वापस आ गए।
किनारे आकर आहिस्ते से उतरे। दुबारा बनाना राइड कैंसल होने के अफ़सोस से ज़्यादा सुकून था कि मौसम और ज़्यादा ख़राब होने से पहले हम वापस आ गए।
एक बार की बनाना वोट राइड के 500 सौ रुपये पड़ते हैं। हम लोग दो बार गए इस राइड पर लेकिन दोनों बार राइड पूरी नहीं इसलिए पैसे नहीं पड़े। मुफ्त में दो राइड करने का अनुभव मजेदार रहा।
नोट : बनाना वोट राइड के बहाने पानी में गिरने का हमारा यह पहला अनुभव था। जिस तरह हम पानी में गिरे थे उसको याद करते हुए बीस साल पहले लिखी पोस्ट याद गई -मेढक ने पानी में कूदा,छ्पाऽऽऽक। पोस्ट का लिंक टिप्पणी में दिया गया है।
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Friday, October 24, 2025

चाय पियो कुल्हड़ खाओ



लेखराज मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों से नीचे देखने पर एक दुकान का बोर्ड दिखा। बोर्ड पर लिखा था -"चाय पियो कुल्हड़ खाओ।"
सीढ़ियों पर खड़े-खड़े दुकान की फोटो ली। सोचा कभी यहाँ चाय पीकर कुल्हड़ खाया जाएगा।
उसके बाद कई बार लेखराज मेट्रो स्टेशन से गुजरे। लेकिन वहां रुककर चाय पीने का समय नहीं मिला। सुबह सोचते-' शाम को आयेंगे।' शाम को सोचते -'देर हो गई, अब कल देखेंगे।'
इस बीच सोचते रहे कि यहाँ चाय के कुल्हड़ आइसक्रीम कोन के तरह होंगे जिनको आइसक्रीम के साथ-साथ खाते जाते हैं। लेकिन कौतूहल बना रहा।
कल शाम को घर लौटते हुए लेखराज मेट्रो स्टेशन आया तो उतर ही पड़े। सीढ़ियों से उतरकर चाय की दुकान की तरफ़ गए। बाहर बैठे हुए कुछ लोग चाय पी रहे थे। काउंटर पर कुछ चाय के कुल्हड़ (मिट्टी के) और कुछ कागज के कप रखे थे। चाय वाला चाय बना रहा था। ग्राहकों को दे रहा था।
हमने काउंटर पर खड़े लड़के से पूछा -"ये खाने वाला कुल्हड़ कैसा होता है भाई? पिलाओ हमको भी चाय। खिलाओ कुल्हड़।"
"अरे वो सब ऐसे ही बेवकूफ बनाने के लिए लिखा है" काउंटर पर खड़े लड़के ने ग्राहक को चाय देते हुए कहा।
हमने कहा -"लेकिन ये लिखा किस लिए है? खाने वाला कुल्हड़ कौन सा होता है?"
फिर उसने बताया कि आइसक्रीम वाला मोटा कोन ही होता है खाने वाला कुल्हड़। मोटा कुल्हड़ होता है। फैजाबाद से आता है। जल्दी ख़राब हो जाता है इसलिए मंगवाते नहीं। कम मात्रा में देते नहीं वो लोग। कम से कम 500 का आर्डर होता है एक बार में। उतने की खपत नहीं होती इसलिए मंगाते नहीं। कभी-कभी मंगाते हैं।
"लेकिन फिर लिखे काहे हो ये खाने वाले कुल्हड़ की बात?"- हमने पूछा।
उसने कहा -"अरे ऐसे ही लिख दिया। लिखा है तो चल रहा है।" वैसे कुछ लोग मिट्टी के कुल्हड़ को खाते हैं। आदत होती है उनको मिट्टी खाने की।
कहना तो हम यह भी चाहते थे इस तरह बेवक़ूफ़ बनाकर चाय बेचना अच्छी बात नहीं है। लेकिन कहे नहीं यह सोचकर कि कहीं बुरा मान गया तो गड़बड़ होगी। आजकल सच बात का लोग बुरा बहुत जल्दी मान जाते हैं।
हमने मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पी। दाम पंद्रह रुपये। काग़ज़ के कप में चाय के दाम दस रुपये हैं। कभी-कभी मिलने वाली खाने वाले कुल्हड़ की चाय के दाम बीस रुपये हैं।
जिस बेतकुल्लफ़ी और आत्मविश्वास से चाय वाले ने कहा -"अरे वो सब ऐसे ही बेवकूफ बनाने के लिए लिखा है" उससे मुझे रागदरबारी के मुन्नू बेईमान के भतीजे की याद आ गई। मास्टर मोतीराम के पूछने पर , तुम उस मुन्नू बेईमान के भतीजे तो नहीं हो ?, लापरवाही से कहा था -"और नहीं तो क्या?। (संबंधित अंश टिप्पणी में)
रागदरबारी से जमाना पचपन साल आगे बढ़ गया है। उस समय अपने बेईमान होने वाली बात पूछने पर बताने का चलन था। आज के समय में बताकर बेवकूफ बनाने का चलन है। तमाम योजनाएँ घोषित होती हैं, उनका हल्ला मचता है। बाद में उनके बारे में पूछने पर बताया जाता है -"वो तो जुमला था। ऐसे ही बेवकूफ बनाने के लिए बोला था।"
लोग बेवकूफ बन रहे हैं। बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य अद्भुत होता है।

#लखनऊ, #lucknow,#सुबह, #subah, #रोजनामचा, #Rojnamcha 


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Thursday, October 23, 2025

अहसान मेरे दिल पर तुम्हारा है दोस्तों



 शाम को कायकिंग के बाद सब लोग अपने-अपने कमरे चले गए। कुछ लोग घूमने भी निकले होंगे। रात को खाना खाते हुए दिन के अनुभवों पर बात होती रही। खाने के दौरान बगल के रेस्टोरेंट से गाने और डांस की आवाजें आती सुनाई दीं। खाना खाकर हममें से कुछ लोग उधर की तरफ़ गए।

सड़क पार दूसरी जगह कई लोग एक इमारत के अहाते में रंग-बिरंगे कपड़े डांस करते दिए। उनके हाथ में बांस के आकार के डंडे थे। डंडों पर रंग-बिरंगे कागज लिपटे हुए थे। उनको मूसल की तरह ज़मीन पर हल्के-हल्के रखते हुए वे डांस करते हुए कुछ गा रहे थे।
स्थानीय भाषा का कोई लोकगीत होगा। उसका मतलब मुझे समझ में नहीं आया। बाद में जसीम से जानकारी लेने पर पता लगा कि गाने में एक स्थानीय कलपटी द्वीप की युवती बिकुनी को अंग्रेजों द्वारा पकड़कर अपने साथ ले जाने की कोशिश को विफल करने का आख्यान है। अंग्रेज़ बिकुनी को अपने साथ ले जाना चाहते थे लेकिन स्थानीय लोगों ने बिकुनी को एक गुफा में छिपा दिया और अंग्रेज़ लोग उसको अपने साथ नहीं ले जा पाये थे।
हमारे ग्रुप की महिला सदस्यों ने वहाँ पहुँचकर उनके हाथ से मूसल नुमा डंडे लेकर साथ में डांस करना शुरू कर दिया। उन लोक कलाकारों ने भी उनका स्वागत करते हुए लोकप्रिय हिंदी गाने गाने शुरू कर दिए। शुरुआत करते हुए गाया :
'अहसान मेरे दिल पर तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों।'
लक्षद्वीप में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा जसरी है। इसे मलयालम की एक बोली माना जाता है, लेकिन यह तमिल जैसी ज़्यादा लगती है । यहाँ हिन्दी फ़िल्म का एक गाना सुनकर एक बार फिर से लगा कि भाषा बवाल राजनीति के फ़साद खड़े करने वालों के चोचले हैं।
हमको नन्दलाल पाठक जी की कविता याद आई :
ये रंग-बिरंगी फ़ूलों जैसी भाषायें,
जिनसे शोभित होता बगिया का आंचल है,
दिल के कालेपन का इलाज करना होगा,
आदमी छली होता है ,भाषा निष्छल है।
भाषा तो है मुस्कानों का ही एक रूप,
अधरों से बहता यह आंखों का पानी है,
भाषा तो पुल है मन के दूरस्थ किनारों पर,
पुल को दीवार समझ लेना नादानी है।
इसके बाद उन लोगों ने एक के बाद एक करके कई हिंदी गाने गाये। उन पर उनके साथ हमारे साथियों ने डांस किया। आख़िर में गाया :
डम डम डिगा डिगा
मौसम भिगा भिगा
बिन पिये मैं तो गिरा, मैं तो गिरा, मैं तो गिरा
हाय अल्लाह!, सूरत आप की सुहानल्लाह।
सबने इस गाने पर मिलकर डांस किया। डांस में हमारे साथ के लोग, उस होटल में रहने वाले और वे कलाकार शामिल थे। उनमें से कुछ लोग डांस करते हुए वीडियो भी बना रहे थे।
' डम डम डिगा डिगा ' के बाद उन लोक कलाकारों ने गाना बंद कर दिया। उनको खाना खाना था।
उन लोक कलाकारों के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि उनको होटल वाले बुलाते हैं। उनके कार्यक्रम का खर्च वहाँ घूमने आए लोगों के पैकेज में शामिल होता है।
कलाकारों का डांस-गाना ख़त्म होने के बाद हम लोग वापस लौटे। हमारे साथ की किरन जी 'डम डम डिगा डिगा' के अनुसार वहीं मौजूद झूले पर गिरकर लेट गयीं। कुछ देर बाद साथ में वापस में आईं।
अपने ठीहे पर लौटकर हम लोग फिर समुद्र किनारे कुर्सियों पर जमें। लोगों ने गाने सुनाये। इसके बाद डांस भी हुए।
हम दस लोगों के ग्रुप में छह महिलायें थीं। महिला प्रधान ग्रुप में उनकी ही मर्जी चलना स्वाभाविक था। लगभग सभी लोग डांस करते रहे। हमको डांस करना आता नहीं है इसलिए अपनी जगह पर खड़े-खड़े, हिलते-डुलते ताली बजाते और बहुत हुआ तो 'हरे राम, हरे कृष्ण' ग्रुप के लोगों की तरह हाथ ऊपर करके मटकते रहे।
ऐसे में मुझे 'सेंट ऑफ़ ए वूमेन' फ़िल्म के दृष्टिहीन कर्नल का किस्सा याद आया जिसको दिखाई नहीं देता है लेकिन वह अपने साथ आए बच्चे से डांस फ्लोर का साइज पूछकर वहाँ मौजूद युवा लड़की के साथ इस तरह डांस करता है कि लड़की भी डांस करने लगती है।
लेकिन यहाँ फ़िल्म नहीं वास्तविकता थी। सब लोग हमारे 'डांस करने में अनाड़ीपन' के मजे लेते हुए हमको हिलाते-दुलाते रहे। हम थोड़ा हिलते लेकिन फिर ठहर जाते और लोगों को डांस करते हुए देखने लगते। कुछ रिकार्ड भी हुए। उनमें से कुछ इस पोस्ट में भी लगाए हैं।
कुछ देर डांस के बाद हमारे साथ की मीनल रस्तोगी जी ने हम लोगों को कुछ स्टेप्स सिखाए जिसके हिसाब से सबको आगे-पीछे होते हुए, पास आते हुए, दूर जाते हुए डांस करना था। इस क्रम में राधे-राधे और गोविंदा-गोविंदा भी बोलते जाना था। डांस के स्टेप्स और पास आना, दूर जाना तो याद करते, भूलते गए लेकिन जहाँ राधे-राधे याद रहा। जहाँ भूलते वहाँ राधे-राधे दोहरा देते। हाल यह हुआ बाद में जब तक रहे, तब तक राधे-राधे हमारे ग्रुप का 'संबोधन शब्द युग्म' हो गया। किसी को कुछ मजे लेने होते वह राधे-राधे कहने लगता।
देर रात तक गाना, डांस और हंसी मजाक के बाद हम लोग अपने-अपने कमरे में सोने गए। यह हमारी ट्रिप का दूसरा दिन था।
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Wednesday, October 22, 2025

लक्षद्वीप में कायकिंग मतलब डोंगीबाज़ी



 लक्षद्वीप प्रवास के दूसरे दिन स्कूबा डाइविंग सभी के लिए अद्भुत अनुभव रहा। जिन लोगों ने पहली बार किया उनके तो कहने ही क्या? लौटने के बाद देर तक हम लोग उन्हीं अनुभवों में डूबे रहे। उनके ही बारे में बातें करते रहे।

दोपहर का खाना खाने के बाद तय हुआ कि शाम को कायकिंग की जायेगी।
कायकिंग मतलब डोंगीबाजी। कायक एक छोटी नाव होती है। जिसमें बैठकर दोनों तरफ़ ब्लेड वाले चप्पू से इसे चलाया जाता है। एक बार दायीं तरफ़ पानी ठेलना होता है , दूसरी बार बायीं तरफ़ से। डोंगी आगे बढ़ती जाती है। आमतौर पर कायकिंग शांत पानी में, झील में या कम पानी वाली जगहों पर की जाती है। तरह-तरह के आकार की डोंगियाँ होती हैं। उसी के अनुसार इनके नाम होते हैं।
लक्षद्वीप में मौजूद कायक दो प्रकार के थे। एक वो जिनमें दो लोग बैठ सकते थे। दूसरे वो जो अकेले के लिए थे। लोग अपने-अपने साथ के लोगों के साथ कायकिंग करते हुए आनंदित होते रहे। फोटो खिंचाते रहे।
बैठने का तरीका इस तरह होता है कि शरीर का गुरुत्वकेंद्र इस तरह रहे कि संतुलन बना रहे। टांगे फैलाकर बैठना होता है। टांगे फैलाकर बैठना भी कठिन काम है। इस कोशिश में अपन कई बार लम्बलेट होते रहे। लगा बैठने से बेहतर है लेटकर डोंगी चलाना।
कायक संख्या में कम थीं। इस चक्कर में हमारे हिस्से वो डोंगी आयी जिसमें सिर्फ़ एक व्यक्ति के बैठने का जुगाड़ था। हम बैठ गए संभलते हुए। धीरे-धीरे हाथ में लिए दुतरफ़ा चप्पू से नाव खेते रहे। थोड़ी देर में अभ्यास हो गया। अंदाज़ हो गया कि पानी को किधर धकेलने से नाव किधर जायेगी। तट के पास ही कई गोल चक्कर लगाते रहे। हालांकि सेफ्टी जैकेट पहने थे और लोग भी पास ही थे लेकिन मन में यह एहसास था कि तैरना नहीं आता है। इस एहसास ने दूर तक जाने से रोका।
पानी में नाव चलाते हुए हमने कभी सुनी हुई प्रार्थना की याद की :
"बजरंग बली मेरी नाव चली
जरा बल्ली कृपा की लगा देना।"
हमारे कई साथी दूर-दूर तक गए कायकिंग करते हुए। लेकिन वो भी उतनी ही दूर कि सबकी निगाह में रहें।
पंद्रह-बीस मिनट चप्पू चलाते हुए, डोंगीबाज़ी करने के बाद, अपन किनारे आ गए। सीधे बैठे-बैठे पैर अकड़ से गए थे। लगा कि घंटों कायकिंग करने वाले कैसे बैठे रहते होंगे।
नाव से उतरने के बाद समुद्र के भीतर ही रखे चौकोर आकार के सीमेंट के बने खोखले ढाँचों पर बैठ गए। बैठ क्या गए धँस गए। समुद्र में रखी चौकोर छेद वाली कुर्सी की तरह रखी थीं ये समुद्र के पानी के अंदर ये सीमेंट की बनी बिना पावों वाली कुर्सियाँ। शायद आसपास की इमारतों के बनते समय रखी गयीं हों । यह भी हो सकता है कि सुरक्षा के लिहाज से बनाकर डाली गयीं हों पानी में।
उन सीमेंट के बिना पाये वाले ढांचों को कुर्सियाँ कहना ठीक नहीं होगा। ये समझिए कि वे सीमेंट के पाटे थे जिनमें नीचे चौकोर छेद बने थे।
उन सीमेंट के पाटों पर बैठे हुए लगा कि पानी में बने किसी सिंहासन पर बैठे हैं। सिंहासन पर बैठने का मतलब सत्ता प्रमुख होना। उस ढाँचे पर बैठने में शरीर के नीचे का भार तो स्थिर था लेकिन शरीर के ऊपर के हिस्से को पानी की लहरें लगातार हिला-दुला रहीं थीं। शरीर नारियल के पेड़ की तरह हो गया। एक लहर दायीं तरफ़ धकियाती, दूसरी बायीं तरफ़। हर लहर उलाहना सा भी देती लगती -' यहाँ बैठे कुर्सी तोड़ रहे हो। निठल्ले बैठने में शर्म नहीं आती।'
किसी लोकतंत्र में उठी कोई भी आवाज सत्ता को हिला देने वाली लगती है। हमारी तरफ़ आती हर लहर हमको ऐसी लगती मानो वो हमको हमारी जगह से उखाड़ फेंकना चाहती थी। थोड़ी देर तक तो हम थोड़ा सकपकाये लेकिन फिर लहरों के थपेड़ों और उलाहनों का अभ्यास हो गया। हम उनके आदी हो गए।'लहर शर्म' ख़त्म होते ही हम आनंदित होते हुए उनका मजा लेते रहे।
सीमेंट के उन ढाँचों में काई और सेवार लगी थी। हल्का खींचते ही उखड़ कर हाथ में आ जाती। हम लहरों के आने-जाने के खेल को खेलने के साथ-साथ सीमेंट के खाँचों में जमी काई और सेवार को उखाड़कर पानी में डालते रहे। बैठे से बेगार भली वाले इस काम में समुद्र की काई समुद्र को ही समर्पित करते रहे।
हमारे साथ हमारे साथी बलबंत गुप्त जी भी सीमेंट की कुसियों पर जमे हुए समुद्र के पानी, लहरों और डूबते हुए सूरज की सुंदरता को देखते रहे। आनंदित होते रहे। काफ़ी देर 'जल बैठकी' के बाद हम लोग किनारे आए। कमरों में जाकर कपड़े बदले। दिन में दो बार समुद्र के पानी में रहने का एहसास देर तक बना रहा।
अभी भी मन वहीं के पाने में डूबा हुआ है। स्कूबा डाइविंग के और कायकिंग की यादें ताजा हो रही हैं। आप भी देखिए फोटो। वीडियो।
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