Monday, December 22, 2025

श्रीलंका दौरे के यात्रा वृत्तांत



 आजकल नए घर को व्यवस्थित करने में लगे हैं। तमाम काम करने हैं। हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ इतनी है कि हम किसी काम में दखल न दें। उसे हम बखूबी निभा रहे हैं। बिना किसी हील -हुज्जत के।

इस बीच कल साइकिल ने शिकायत की। आठ महीने से लाइन हाजिर जैसी खड़ी है। हवा निकल गई। चेहरा बिना किसी पोर्टफोलियो के सांसद की तरह लटक गया है । दो दिन पहले हवा भरने का पंप लेकर आए। 140 रुपए का मिला । हवा भी भर ली। साइकिल खुश हो गई। उसको लगा उसके दिन बहुरेंगे। लेकिन दो दिन हुए अभी उसका चलने का मौक़ा नहीं आया। जाड़ा पड़ रहा है। उसकी भी इज्जत करना जरूरी है। आज तो कोहरा भी ज़ोरदार हो गया। प्रदूषण भी है।
कोहरा और प्रदूषण 'हैंड्स इन ग्लोब्स' टाइप हो गया है। नेता-अपराधी गठजोड़ की तरह। नेता कौन, अपराधी कौन ये आप तय करें। किसका जलवा ज़्यादा है कहना मुश्किल। दोनों के ही अपन आदी हो गए हैं। किसी को क्या दोष दें?
इस बीच अपनी किताबें छाँटने का काम करने की सोचते रहे। कुछ किताबों में काफ़ी पहले दीमक लग गई थी। दीमक सब मर गई हैं। उनके खंडहर बचें हैं। क्या पता दीमकों का भी इतिहास होता है कि नहीं। उनके यहाँ भी गड़े मुर्दे उखाड़ने का चलन है कि नहीं। उनके यहाँ भी नामों के बदलने का चलन है या ऐसे ही काम चलता है। उनके यहाँ शासन व्यवस्था कैसी है -प्रधानमंत्री होता है राष्ट्रपति। कुछ पता नहीं।
पहले सोचा था कि दीमक खाई किताबों को हटा देंगे। लेकिन फिर लगा कि ऐसे तो फिर बहुत किताबें छँट जाएँगीं । उनमें कुछ जरूरी और दुर्लभ टाइप किताबें भी हैं। अगर हटायेंगे तो वो किताबें फिर कहाँ से लायेंगे। दीमक खाई किताबों को हटाना राजनीति से दागी राजनेताओं को हटाने से कम जटिल दुसाध्य काम नहीं है। फिर तय किया पिछले आठ महीनों में दीमकों ने किताबें नहीं खायीं तो अब क्या खायेंगी? दीमकें इस मामले में इंसानों से अलग होती हैं। मर जाने पर दुबारा जीवित होकर किताबें नहीं खातीं। इंसानों की फ़ितरत अलग होती है। उनमें दशकों/सदियों पहले नायक, खलनायक भी बवाल काटते रहते हैं।
इस बीच साल भी विदा होने के लिए अड़ा हुआ है। कह रहा है अब हम भी चलेंगे। जो लेखा-जोखा करना हो फटाक से कर लीजिए। रिजोल्यूशन -फ़िजोल्यूश्न लेना हो ले लो। कुछ यूनीक टाइप का लेना हो तो ले लो। वरना कोई और ले लेगा तो टापते रहोगे। हमने बीतते साल की बात को कोई तवज्जो नहीं दी। नौ दिन का मेहमान है।नौ दिन बाद कोई पूछेगा नहीं। बदल जाएगा कैलेंडर की तरह।
उधर स्पेनिश सीखने वाला एप ड्यूलिंगों अलग ग़दर काटे है। रूठी हुई प्रेमिका की तरह रोज ताने मारता है। Nobody ignores me for long से लेकर लगता है अब स्पेनिश सीखने में रुचि नहीं रही जैसे डायलॉग। अब फिर से अभ्यास शुरू करना है। इस साल उर्दू का क़ायदा सीख गए थे। लेकिन अभ्यास छूट गया। सारे अक्षर -'अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो' टाइप लगने लगे। अब फिर से क़ायदे से क़ायदा सीखना है।
पिछली पोस्ट में बेटे Anany की बनाई रील से संबंधित पोस्ट पर आई टिप्पणियां भी जबाब देने के लिए हैं। ज्यादा टिप्पणियाँ हो जाती हैं तो उनपर प्रतिक्रिया देना रह जाता है। बेटे की रील इंस्टाग्राम पर थी। कुछ मित्रों के खाते इंस्टाग्राम पर नहीं है। उनकी सुविधा के लिए बेटे का बनाया वीडियो अलग से पोस्ट कर रहे हैं। ठीक है न?
फोटो श्रीलंका के दौरे में खींची गई सुमन के साथ। इस साल की यादगार फोटो में से एक। फोटो अनन्य ने खीचीं थी।
श्रीलंका दौरे के यात्रा वृत्तांत पर अगर किताब बनायें तो उसका शीर्षक क्या रखें? आप सुझायें।

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बेटे के उद्गार

 दो दिन पहले साझा पोस्ट में बेटे Anany Shukla की रील का जिक्र किया था। रील बेटे ने इंस्टाग्राम पर साझा की थी। कुछ मित्रों ने टिप्पणी की कि वे लोग इसे देख नहीं पाये क्योंकि उनका इंस्टाग्राम में खाता नहीं है। ऐसे मित्रों की सुविधा के लिए रील का वीडियो यहाँ साझा कर रहे हैं। रील को अब तक पाँच लाख से अधिक लोग देख चुके हैं। पोस्ट का लिंक यह रहा :

इस पोस्ट में इंस्टाग्राम रील का लिंक भी दिया है।
संयोग से आज ही अनन्य अपनी Georgia पर निकल रहे हैं। ट्रिपलीडर के रूप में यह उसकी 56 वीं यात्रा है। अब तक बारह देश घूम चुके अनन्य की Georgia की पहली यात्रा है। नए साल की शुरुआत Georgia में होगी। पिछले साल वियतनाम गए थे अनन्य।
वियतनाम घूमने का मेरा भी बहुत मन है। अनन्य का मार्च, 2026 में 45+ की उमर के लोगों की ट्रिप वियतनाम ले जाने का प्लान है। उसी में हमारा जाना होगा। आपमें से कोई मित्र वियतनाम ट्रिप पर चलने को उत्सुक हों तो बतायें। साथ चलें।
खैर वियतनाम ट्रिप तो अगले साल होगी। फ़िलहाल तो आप यह वीडियो देखिए। इसके बारे में पोस्ट का लिंक ऊपर दिया है।

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Saturday, December 20, 2025

युवाओं की संवेदनशीलता




 मेरे सुपुत्र Anany Shukla अपने इंस्टाग्राम पर अक्सर रील्स पोस्ट करते रहे हैं। उनमें उनकी यात्राओं के किस्से और अपने विचार रहते हैं। उनकी एक रील 58 लाख लोगों ने देखी है। देखने और टिप्पणी करने वालों में अधिकतर युवा लोग हैं।

पिछले हफ़्ते लखनऊ आने पर मैं अनन्य को लेने एयरपोर्ट गया। घर से चार किलोमीटर दूर है एयरपोर्ट। फ्लाइट दिल्ली से साढ़े आठ बजे की जगह दस बजे चली। लखनऊ आते-आते साढ़े ग्यारह बज गए। अनन्य ने मुझसे बार-बार कहा -"मैं कैब करके आ जाऊँगा। आप परेशान मत हो।" लेकिन मैंने कहा -"मैं लेने आऊंगा। परेशान होने की कोई बात नहीं।"
एयरपोर्ट पर फ्लाइट के लखनऊ आने पर जहाज़ से सामान आने में लगे समय का उपयोग करते हुए अनन्य ने रील बनाई। रील बनाते हुए अपने मन के भाव व्यक्त करते हुए अनन्य ने रिकार्ड किया :
"इस समय रात के साढ़े ग्यारह बजे हैं। मैं अभी-अभी लखनऊ में उतरा हूँ। इंडिया में यह प्लेन उतरने का यह कोई odd टाइम नहीं है। वैसे भी मैं हमेशा यात्राएँ करता हूँ, मैंने दुनिया घूमी है। मैंने अलग-अलग समय में, कठिन परिस्थितियों में यात्राएं की हैं। लोगों से मिलता रहा हूँ।
मैं अभी उतरा हूँ यहाँ पर। मेरे पापा पिछले 45 मिनट से बाहर एयरपोर्ट पर मेरा इंतजार कर रहे हैं। मेरी फ़्लाइट लेट हो गई थी। मैंने उनसे कहा-' नहीं, आप मत आइए। मैं कैब से आ जाऊँगा। आपको इतनी देर तक जागने, आने की जरूरत नहीं है।' लेकिन बेटा होने के नाते मुझे पता है कि मैं उनके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता कि आप मत आओ। मुझे पता है कि वो आएँगे ही। यह उनका लगाव दिखाने का, प्यार जताने का तरीका है। पिता लोग ऐसे ही होते हैं (that is how dads are) । छोड़ना एयरपोर्ट, स्टेशन।
तीन साल पहले अपना काम शुरू करने पर मैंने जब पहली बार ट्रेन ली थी सोलो ट्रिप पर निकलने के लिए तब वो वहाँ थे। बीच में जब मैं ट्रिप पर जाता थे, वे वहाँ मौजूद रहते थे। एयरपोर्ट पर छोड़ने के लिए , रिसीव करने के लिए। और यह कभी बदला नहीं । पिछले तीन साल में मैंने 70 यात्राएँ की हैं। चीजें बदल गई हैं, लोग बदल गए हैं, मैं बदला हूँ, मेरा सोचने का तरीका बदला है लेकिन यह भावना, यह सोच नहीं बदली है।"
इतना रिकार्ड करने के बाद अनन्य अपना सामान लेकर बाहर आए। मैंने फ़ोन पर बता दिया था कि मैं कहाँ इंतज़ार कर रहा हूँ। मैं कार में बैठा गाड़ियों को आते-जाते देख रहा था। मुझे पता नहीं लगा कब अनन्य एयरपोर्ट से बाहर आकर गाड़ी के बाहर से मेरा वीडियो बनाने लगे। जब मैंने कार के शीशे से अनन्य को चुपचाप वीडियो बनाते हुए देखा तो उसकी तरफ़ देखकर मुस्कराने लगा। अनन्य ने वह भी रिकार्ड किया वीडियो में।
अगले दिन सुबह अनन्य ने अपने मोबाइल पर मुझे इंस्टाग्राम पर अपनी रील दिखाई। रील के आख़िरी हिस्से में अनन्य की लरजती हुई आवाज़ सुनकर एक क्षण को मैं भी भावुक हुआ लेकिन फिर मुस्कराकर मोबाइल वापस कर दिया।
बाद में मैंने अनन्य की रील पर उसके दोस्तों की टिप्पणियाँ देखी। कई लोगों ने रील देखकर अपने-अपने पिता को याद किया। कुछ लोगों ने अपने पिता के न रहने की बात करते हुए उनको मिस किया था। टिप्पणी करने वालों में सिनेमाजगत के कुछ प्रसिद्ध एंकर भी थे। युवाओं की संवेदनशील टिप्पणियाँ देखकर अच्छा लगा। कई लोगों ने मेरे बारे में अच्छी-अच्छी टिप्पणियाँ भी कीं। कुछ ने मुझे अपना प्यार, आदर भी भेजा।
देखते-देखते रील को देखने वालों की संख्या एक लाख पार गई। हमने सोचा हम भी कुछ टिपिया दें। हमने मजे लेते हुए टिप्पणी लिखी -" (Ghar pass tha isliye aa gaya lene 😍. Need not be taken so seriously 😀🥰💐. घर पास था इसलिए आ गया लेने। इसको इतना गंभीरता से लेने की जरुरत नहीं।"
मेरी इस टिप्पणी को अनन्य ने पिन 📌 कर दिया। उसके दोस्तों ने मेरी टिप्पणी को देखकर लाइक करते हुए और अनन्य से मजे लेते हुए uncle rockes anany shocks जैसी कई मजेदार टिप्पणियाँ की हैं। अभी तक मेरी टिप्पणी को 775 लोग लाइक कर चुके हैं। अभी भी लोग इस रील को देख रहे हैं। टिप्पणी कर रहे हैं। अभी तक चार लाख लोग इस रील को देख चुके हैं।
टिप्पणी और लाइक से अलग सोशल मीडिया पर इस तरह पोस्ट का पसंद किया जाना यह दर्शाता है कि लोग पारिवारिक रिश्तों वाली पोस्टों को सहज रूप में पसंद करते हैं। जुड़ाव महसूस करके टिप्पणी करते हैं। अनन्य की पोस्ट की हुई इंस्टाग्राम की रील का लिंक नीचे/ टिप्पणी बाक्स में दिया हुआ है। आप रील और उस पर आई हुई टिप्पणियाँ पढ़ेंगे तो युवा पीढ़ी की संवेदनशीलता का एहसास होगा।

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Friday, December 19, 2025

इकाना स्टेडियम में मैच

 


परसों लखनऊ के इकाना स्टेडियम में भारत - दक्षिण अफ्रीका का मैच देखने गए। हमारे पास चार पास थे। कुल तीन लोग जाने को तैयार हुए। भीड़ में जाने और गाड़ी पार्किंग के झंझट से बचने के लिए कैब से गए।

रास्ते में गाड़ी वाले से पूछा -'हमारे पास एक पास बचा है।मैच देखना है?'
उसने कहा -' हमारा ख़ुद का मैच फँसा हुआ है। जिंदगी का मैच खेल रहे हैं। कोई और मैच देखने का टाइम नहीं है हमारे पास।'
इकाना स्टेडियम के सामने उसने हमको उतार दिया। हम अंडरपास से होते हुए स्टेडियम की तरफ़ गए।
बाहर तरह-तरह के मैच से जुड़े सामानों की हाट जैसी लगी थी। क्रिकेट की टी शर्ट, कैप, झंडा, बजाने के लिए प्लास्टिक की तुरही, सीटी, तरह के स्टीकर, चौके -छक्के के छूटके पोस्टर और न जाने किस-किस तरह का सामान। वहीं गाल पर तिरंगा बनाने वाले पेंटर भी मौजद थे। लोग उनसे अपने गाल पर तिरंगा बनवाकर अंदर जा रहे थे। पूरा मेले का, उत्सव का माहौल थे।
एक जगह सुरक्षा कर्मियों की वर्दी में भी टिकट बेंचते दिखे लोग। यह कहना मुश्किल था कि वर्दी , सुरक्षा कर्मी और टिकटों में से कौन नक़ली था।
स्टेडियम के अंदर जाते हुए कई बार सुरक्षा जांच हुई। पूरी जामा तलाशी। पर्स खुलवाकर कई बार देखा कि हम कोई लोहे का सिक्का या ऐसे कोई सामान तो नहीं ले जा रहे जो असुरक्षित हो।
आख़िरी सुरक्षा गेट पर घूमने वाला पहिया लगा था। पास स्कैन करने पर उसको घूमना था ताकि हम अंदर जा सकें। पास दिखाने के पर पहिए ने घूमने से मना कर दिया। शायद हमारी शक्ल उसको पसंद ना आई हो। एकाध बार कोशिश करने पर जब नहीं घुमा चक्का तो वहाँ मौजूद बालक ने अपने गले में लटके पास को स्कैन करके हमको अंदर जाने दिया। हम स्टेडियम के नीचे पहुंच गए।
स्टेडियम के नीचे के तलघर में लोगों की भारी भीड़ थी। खाने-पीने के सामानों की तमाम दुकानें। कॉफ़ी, पानी, समोसा, पिज्जा , सैंडविच और तमाम खाने-पीने के स्टॉल लगे थे। छुटके से कप में कॉफी 60 रुपए में बिक रही थी।
स्टेडियम के अंदर लोगों का रेला का रेला आ रहा था। फ़्लड लाइट में स्टेडियम जगमगा रहा था। बीच मैदान में तमाम खिलाड़ी प्रैक्टिस कर रहे थे। दूर से सब लोग पहचान में आए लेकिन अर्शदीप सिंह को पहचान गए। लोग हल्ला मचा रहे थे। तुरही बजा रहे थे। भारतमाता की जय बोल रहे थे। इंक़लाब जिंदाबाद कह रहे थे। एकाध लोगों ने पाकिस्तान का नाम लिया। लोग अचकचा गए। फिर ठहर कर नारा लगाने वाले ने ही मुर्दाबाद बोलकर नारा पूरा किया। हमको लगा कहीं नारों की मिक्सिंग हो गई तो लफड़ा होगा। कहीं कोई रिकार्ड करके FIR करा सकता है। देशद्रोह का मुकदमा चल सकता है। देशभक्ति और देशद्रोह की शिनाख्त आजकल नारों के हिसाब से होने लगे है।
स्टेडियम के हमारे वाले हिस्से में शायद सब लोग पासधारी थे। मतलब मुफ्तिया दर्शक। वहीं सचिन तेंदुलकर के सदाबहार फैन सुधीर बैठे थे। नंगे बदन। चेहरे पर तिरंगा पेंटिंग और सीने पर लिखा नारा -'WE miss you sachin. उसके साथ में सूर्या का प्रसंशक भी बैठा था। दोनों नंगे बदन थे। हम स्वेटर और जैकेट में थे। सचिन और सूर्या को नंगे बदन भारत का झंडा फहराते देखकर लगा कि इस तरह का फैन होना कितना कठिन काम है।
बीच-बीच में लोग हल्ला-गुल्ला मचाते हुए , नारे लगाते हुए मैदान में छाये कोहरे को भगाने की कोशिश कर रहे थे। कई लोग डांस करने के लिए उठते, कुछ देर ठुमका लगाते लेकिन दूसरे का साथ न मिलने पर बैठ जाते। हमारे वाले स्टैंड में दो महिलाओं ने पहल की। कई बार मिनी डांस किए। अपने साथ आए लोगों को भी उठाने की कोशिश की। लेकिन उनके न उठने पर वे भी बैठ गयीं।
अंपायर ने मैदान का निरीक्षण किया। टीवी पर खबर आई कि आधे घंटे बाद फिर से निरीक्षण होगा। मतलब आधे घंटे लेट हो गया मैच। कोहरे के कारण मैदान खेलने लायक़ नहीं था। आधे घंटे बाद फिर आधे घंटे के लिए टल गया निरीक्षण। एक बार राजीव शुक्ला दिखे मैदान में। लोगों को लगा कि अब मैच शुरू होगा। मैदान में रोलर भी आया, पिच कवर करने का सामान भी। लगा मैच होगा लेकिन हर बार मैच टलता ही गया।
एक बार फिर टहलकर हम चाय पीने गए। चाय के दाम पचास रुपये थे। समोसा भी ऐसे ही। बेचने वाले ने बताया कि एक लाख देखकर दो दुकानें लगाने का ठेका मिला है। मैच कैंसल होगा तो नुकसान होगा। लेकिन फिर यह भी कहा -"यहाँ तो फिर भी कम नुक़सान हुआ। कलकत्ते में मेसी के आने पर तो लोगों की कुछ भी कमाई नहीं हुई। पूरा पैसा ही डूब गया।"
साथ में चाय पीती बालिका के गाल पर तिरंगा पेंट हुआ था। बताया उसने कि एक गाल पर तिरंगे का पेंट बीस रुपये में हुआ। रायबरेली से आई थी मैच देखने। पति भी साथ में। उसके भी गाल पर तिरंगा बना था। ये वाला तिरंगा लहराता दिख नहीं रहा था। यह मन में लहराता है।
कुछ देर स्टैंड के गेट पर खड़े रहे। वहाँ खड़े एक जोड़े के गाल से तिरंगे पेंट उखड़ गया था। हल्का सफेद और हरे रंग का निशान बचा था। कोई इसे देखकर कह सकता कि फटा हुआ तिरंगा गाल पर लगाए हुए। हमको लगा कि कहीं कोई इस बात की भी शिकायत न कर दे कि तिरंगे का अपमान किया उन लोगों ने।
कई बार आधे-आधे घंटे लेट हुआ मैच। हम लोगों को लगा मैच अब होगा नहीं। लौटने का तय किया। लेकिन हम लोग भी आधे-आधे घंटे टालते रहे लौटना। आख़िर में नौ बजे सूचना आई कि निरीक्षण साढ़े नौ बजे होता तो हम चल ही दिए। बाहर आते हुए सोचते भी रहे कि कहीं हमारे जाते ही मैच शुरू न हो जाये। 'न देखूँगा न देखने दूँगा' वाला भाव हावी हो गया मन में।
किसी ने बताया कि मैच होने लायक़ रोशनी तो थी लेकिन उसे टीवी पर दिखाने लायक रोशनी नहीं थी इसीलिए मैच कैंसल हो गया। स्टेडियम पर आए लोग तो केवल कुछ लाख थे लेकिन टीवी पर करोड़ों लोग देखते हैं। मैच तो करोड़ों लोगों के लिए ही होते हैं। स्टेडियम पर देखने आए लोग टीवी पर देखने वाले लोगों के मुक़ाबले में अल्पसंख्यक होते हैं। अल्पसंख्यक लोग बहुसंख्यक लोगों के आगे हमेशा कमजोर पड़ते हैं।
स्टेडियम में जाने के बाद एक बार फिर से एहसास हुआ कि खेल खेल कम बाजार की लीला ज़्यादा हो गया है। खेल में आज खेल के नियम से ज़्यादा बाजार के नियम ज्यादा लागू होते हैं।
लौटने की कैब दूर जाकर मिली। काफ़ी दूर तक यू टर्न करके जब स्टेडियम के सामने से गुजरी तब एक बार फिर लगा कहीं मैच शुरू न हो गया हो। लेकिन स्टेडियम के आगे पहुंचते ही मैच कैंसल होने की सूचना मिली तो सुकून मिला कि हम नहीं देख पाये तो कोई भी नहीं देख पाया।
स्टेडियम पर जाकर मैच देखने का यह हमारा पहला मौक़ा था। वह भी असफल हुआ। गए तो मैच ही कैंसल हो गया। हमको ग़ालिब का शेर याद आया :
थी ख़बर गर्म कि 'ग़ालिब' के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ

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Wednesday, December 17, 2025

लोगों से बातचीत


 

लोगों से बातचीत करना हमेशा रुचिकर लगता है। बहुत सारी नई बातें पता चलती हैं। रोचक भी। भयावह भी।

कल शाम को जो कैब ड्राइवर मिला वह कई देशों में कई काम करके वापस भारत आया था। पहले सऊदी अरब में रहा। फिर कुवैत में। सऊदी अरब में पहले किसी ऑफ़िस में काम काम करता था। दो साल बाद भारत से चावल मँगवा कर सऊदी में बेचने का काम किया। महीने में डेढ़-दो लाख बच जाते थे।
सऊदी के बाद कुवैत गया। वहाँ ड्राइविंग का काम किया। ड्राइविंग के काम में रेसिंग कारों को सर्विसिंग के लिए ग्राहकों के पास से लाना-वापस उन तक पहुँचाना था। हर ट्रिप में दस दीनार ट्रिप के मिल जाते थे। दस दीनार मतलब 2900 रुपए। दिन में दो-तीन गाड़ियाँ लाने/ले जाने के कम से कम 6000 हज़ार रुपये टिप के मिल जाते। लेकिन वहाँ सख्ती बहुत थी। किसी गाड़ी को लाते-ले जाते समय खरोंच भी लग जाती तो ड्राइवर पर 200 दीनार का जुर्माना लगा दिया जाया। 200 दीनार मतलब क़रीब साठ हज़ार रुपए।
ड्राइवरों ने एतराज किया तो मालिकों ने जुर्माना घटाकर 50 रुपए कर दिया। लेकिन ड्राइवर विरोध करते रहे। यह कहते हुए कि सड़क पर दुर्घटना ड्राइवर के बस में तो नहीं है। मालिक लोगों का कहना था कि ड्राइवर लापरवाही न करें इसलिए कुछ जुर्माना तो रहना चाहिए। लेकिन ड्राइवर जुर्माना शून्य करने पर अड़े रहे।
इसी दौरान एक दिन मालिक की गाड़ी ही भिड़ गई। गाड़ी ख़ुद मालिक चला रहा था। ड्राइवरों ने कहा -"अब इसका जुर्माना कौन भरेगा? ऐसे ही हम लोगों के साथ भी हो सकता है। तब जुर्माना नहीं लगना चाहिए।"
मालिक ने उसी दिन सबको काम से निकाल दिया। सबको वापसी का टिकट थमा दिया।
यह सुनकर लगा कि समर्थ लोगों को अपने साथ मज़ाक पसंद नहीं होता। उनके यहाँ बेइज्जती एक रास्ता तरफा होता है । नौकर को मालिक की बेइज्जती का कोई हक नहीं होता। इसी क्रम में नौकर की किसी भी हरकत को अपनी बेइज्जती समझने का हक मालिक के पास सुरक्षित रहता है।
लौटकर कैब ड्राईवर ने कई काम किए। लेकिन अंतत: ड्राइविंग करने लगा।
और बात करने पर बताया उसने कि सुबह छह से रात बारह बजे तक गाड़ी चलाता है। पैसे की जरूरत है। माँ को पार्किंसन की बीमारी है। तीन बेटियां हैं। परिवार के और लोग भी हैं सबकी जिम्मेदारियाँ हैं। इसलिए इतनी देर तक काम करना पड़ता है।
सुबह छह से रात बारह बजे मतलब अठारह घंटे सुनकर मुझे अपने माननीय जी याद आए। अठारह घंटे काम करना उनके साथ इतने पुख्ता तरीके से जुड़ गया है कि बड़ी बात नहीं किसी दिन कोई अध्यादेश जारी हो कि उनके अलावा और कोई अठारह घंटे काम नहीं करेगा। सत्रह घंटे करे, उन्नीस घंटे करे लेकिन अठारह घंटे न करे। करेगा तो भरेगा।
लौटते समय जो ड्राइवर मिला उसने बताया कि बंथरा का रहने वाला है। वहाँ की ज़मीन के दाम ऊँचे हो गए हैं। लोग मालामाल हो रहे हैं। उसकी भी ज़मीन है वहाँ। उसके पिता से उसकी ज़मीन के लिए 11 साल का कांट्रैक्ट किसी कँपनी ने करने के लिए संपर्क किया था। पिता जी ने कहा -"कांट्रैक्ट 11 साल का नहीं करेंगे। साल-साल भर का करेंगे। हर साल पचीस प्रतिशत किराया बढ़ा कर लेंगे।" लेकिन कंपनी वाले 11 साल का एक साथ कांट्रैक्ट करना चाहते थे। सालाना बढ़ोत्तरी भी वे पाँच-दस प्रतिशत से अधिक करने को राजी नहीं थे। इसीलिए कांट्रैक्ट अभी तक नहीं हो पाया।
बातचीत के दौरान टैक्सी ड्राइवर ने flightradar24 एप के बारे में बताया जिससे किसी भी उड़ान की ताजा स्थिति पता चल सकती है। अमौसी हवाई अड्डे से सवारी के लिए वह इसी एप का इस्तेमाल करता है। मेरे लिए यह रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी थी। बाद में इसी का इस्तेमाल करके मैं अपने बेटे को लेने समय पर हवाई अड्डे पहुँचा।
अमौसी हवाईअड्डा भले ही लिखा पढ़ी में चौधरी चरणसिंह हवाई अड्डा हो गया है लेकिन बोलचाल में लोग उसे अमौसी हवाई अड्डा ही कहते हैं।
कैब ड्राइवरों से बातचीत के पहले का एक रोचक क़िस्सा याद आया। सुबह कालोनी के गेट पर तीन लोग कालोनी के गेट पर X का निशान लगाकर उसके आगे 150 लिखकर वापस जा रहे थे। X का निशान लगाकर जाते लोगों को देखकर मुझे अलीबाबा चालीस चोर की मरजीना द्वारा लोगों के घरों पर निशान लगाने की कहानी याद आई। हमने उनसे निशान लगाने का कारण पूछा।
उन लोगों ने बताया कि वे सरकार के पल्स पोलियो अभियान से जुड़े लोग हैं। वे नवजात शिशुओं को पल्स पीलियो का टीका लगवाने के लिए सर्वे करने निकले हैं। कॉलोनी के प्रेसिडेंट उनको सर्वे की अनुमति नहीं दी यह कहकर कि जिसको पल्प पोलियो का टीका लगवाना होगा वह अपने आप लगवा लेगा।
सुबह-सुबह सर्वे करने के लिए निकले लोगों यह बात सरकारी पहल का अपमान लगी। उसने झुँझालते हुए कहा -" लगवा लेना प्राइवेट अस्पताल में टीका। कुछ दिन में सब कुछ प्राइवेट ही कर देगी सरकार।"
इसके जबाब में दरबान ने कहा -" सरकार सब कुछ प्राइवेट तो कर ही रही है। फलाने जी सब कुछ तो प्राइवेट को बेचे दे रहे हैं। बचा क्या है?"
हमको लगा कि सुबह-सुबह कैसी-कैसी बातें सुनने को मिल रही हैं। कोई सुनेगा तो क्या कहेगा। हम इसीलिए आज सुबह निकले ही नहीं टहलने। बिस्तर में बैठे-बैठे समाचार देख रहे हैं। पता चला कि मनरेगा का नाम बदलने पर पर बवाल मचा हुआ है संसद में। हमको शेक्सपियर की बात याद आई -"नाम में क्या रखा है।" लेकिन शेक्सपियर को कौन समझाए जाकर कि सब कुछ तो नाम में ही रखा है। इसीलिए तो आज काम के बजाय नाम (बदलने) पर जोर है।
फोटो तीन साल पहले का। जगह अमेरिका का स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय। Know Justice , Know Peace (मतलब न्याय को जानो, शांति को जानो) । हमें डर है कि कहीं अपने यहाँ न्याय और शांति के नाम भी न बदल दिए जाएँ। जब होगा तब देखा जाएगा। अभी तो न्याय और शांति ही चल रहे हैं।

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Monday, December 15, 2025

जिंदा रहने के लिए




 कल शाम को बाहर 'जोमेटो' से कुछ खाने का आर्डर किया। बताया गया कि पौन घंटे में डिलीवर हो जाएगा। हम तसल्ली से मैच देखते हुए खाने का इंतजार करते रहे। बीच-बीच में कुछ-कुछ पढ़ते भी रहे थे। इसके साथ मोबाइल में आए नोटिफिकेशन भी टनटन बजते तो उनको भी देख लेते। कुल मिलाकर एक 'व्यस्त इंतज़ार' करते रहे।

थोड़ी देर में जोमैटो से मेसेज आया। डिलीवर करने वाले का नाम और संदेश कि वह निकल चुका है। बताया कि बीस मिनट में पहुंचेगा। मैच में भारत की स्थिति मजबूत दिख रही थी। पहले बॉलिंग और फिर बैटिंग दोनों में बढ़िया रहा प्रदर्शन खिलाड़ियों का। थोड़ी देर में मैच जीत भी गया भारत। लेकिन खाना नहीं आया। डिलीवरी करने वालो को करीब घंटे भर से सत्ताईस मिनट की दूरी पर ही दिखाता रहा जोमैटो।
मैच ख़त्म होने के बाद रेस्टोरेंट वाले ने बताया कि डिलीवरी वाला तो उनके यहाँ से तो निकल चुका है खाना लेकर। डिलीवरी वाले को फ़ोन लगाया तो पता चला कि वह तो अभी गोमतीनगर में है। वहाँ से डिलीवरी करने के बाद आयेगा हमारा खाना लेकर। गोमतीनगर हमारे घर से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर है। मतलब क़रीब आधा घंटा की दूरी।
डिलीवरी वाला काफ़ी देर तक सत्ताईस मिनट की दूरी पर ही रहा। शायद वह पहले वाली डिलीवरी ही निपटा रहा होगा। इसके बाद उसने चलना शुरू किया। हमारे पास पहुँचने के मिनट कम होते गए। अंतत: वह आ ही गया।
अपना सामान लेने के बाद हमने देरी का कारण पूछा तो उसने बताया कि साथ ही उसको तेलीबाग में डिलीवरी का आर्डर मिला था( तेलीबाग हमारे घर के पास ही है ) । वहाँ पहुँचने पर पता चला कि डिलीवरी गोमती नगर करनी है। जोमैटो वालों ने कहा -"जाना ही पड़ेगा। तो जाना ही पड़ा।"
गलती किसकी है पता नहीं लेकिन इस चक्कर में डिलीवरी वाले को करीब चालीस किलोमीटर अतिरिक्त गाड़ी चलानी पड़ी। ग्राहक भगवान होता है। भगवान की सेवा जरूरी है। जाड़े के मौसम में मोटरसाइकिल पर चालीस किलोमीटर गाड़ी अतिरिक्त चलानी पड़ी डिलीवरी वाले को।
बातचीत करने पर डिलीवरी वाले ने बताया कि सुबह ग्यारह बजे से रात नौ बजे तक उसने 14 आर्डर निपटाए। सात सौ रुपये क़रीब कमाई हुई। दो सौ रुपए करीब पेट्रोल के निकालकर पाँच सौ रुपये बचे।
डिलीवरी वाला बालक जाड़े के हिसाब से कपड़े पहने था। टोपा भी लगाए था। लेकिन हाथ में दास्ताने नहीं पहने था। पूछने पर बोला -" गाड़ी चलाने में असुविधा होती है।"
हमारा खाना काफ़ी देर से मिला। ठंडा भी हो गया था। लेकिन हमने डिलीवरी में सबसे अच्छी रेटिंग ही दी। खाना गर्म करके खा लिया। खाने के बाद हर बार की तरह यह भी सोचा कि खाना घर में ही बनाकर खाना चाहिए।
सामान डिलीवरी करने वाले लोगों को देखता हूँ तो लगता कि कितना कठिन काम है यह । ऐसा काम जिसमें आगे कोई उन्नति का स्कोप नहीं है। लेकिन लोग कर रहे हैं। मजबूरी है। करना पड़ता है। जिंदा रहने के लिए जरूरी है।
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Saturday, December 13, 2025

धुरंधर फ़िल्म


 

देश के तमाम टीवी चैनलों के एंकर यह बताने में हलकान हैं धुरंधर फ़िल्म को देखकर पाकिस्तानी लोग हलकान हैं। ग़ज़ब बेइज्जती ख़राब हो रही है इस फ़िल्म से। कुछ एंकरों का अंदाज़-ए-बयाँ देखकर लग रहा है कि फ़िल्म ने पाकिस्तान के फ़िल्मी हल्के में सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है।

यूट्यूबर तरह-तरह से यह बताने में लगे हैं कि इस फ़िल्म को देखकर कुछ लोगों को मिर्ची क्यों लगी है। कुछ लोग अपने एजेंडे के हिसाब से इसमें अपना एजेंडे देखने वालों की आलोचना कर रहे हैं।
खबरों के अनुसार फ़िल्म ने अब तक 210 करोड़ रुपये कमा लिए हैं। आन लाइन टिकट बेचने वाली साइट बुक माई शो के अनुसार फ़िल्म के सबसे कम टिकट के दाम 220 रुपए हैं। मतलब लगभग एक करोड़ से कम लोगों ने अब तक फ़िल्म देखी। मतलब देश की आबादी (146 करोड़) के लगभग 0.7 प्रतिशत ने अब तक देखी होगी फ़िल्म।
यह तब है शहरों के लगभग हर मल्टीप्लेक्स में धुरंधर फ़िल्म लगी है। कोई विकल्प नहीं है धुरंधर फ़िल्म के अलावा कोई और फ़िल्म के देखने। अगर आप फ़िल्म देखने जाते हैं तो झक मारकर धुरंधर ही देखना होगा। कोई दूसरी फ़िल्म भी चल रही होती तो शायद मामला अलग होता।
देश के 5000 से अधिक मल्टीप्लेक्स में रिलीज हुई है फ़िल्म। मतलब औसतन हर मल्टीप्लेक्स में 2000 लोगों ने देखी यह फ़िल्म अब तक। आठ दिन का हिसाब लगायें तो प्रतिदिन 250 लोगों ने प्रतिदिन हर मल्टीप्लेक्स में यह फ़िल्म देखी। दिन में पाँच शो लगा लें तो औसतन 50 लोगों ने देखी होगी फ़िल्म हर शो में। एक हाल में पचास लोग फ़िल्म देखने वाले हैं तो क्या बड़ी बात है?
इंटरनेट की जानकारी के अनुसार हाल के वर्षों में सबसे अधिक कमाई करने वाली फ़िल्म दंगल( 2016) बताई गई है। दंगल ने 2000 करोड़ की कमाई की थी। देखना है धुरंधर कितनी कमाई तक पहुंचती है।
फ़िल्म की कहानी में पाकिस्तानी गैंगस्टर, हिंदुस्तानी जासूसी, सेना के लोग, मुंबई हमला और वो तमाम घटनायें शामिल हैं जिनको देखकर देशभक्त लोगों को खून खौल उठता है और पाकिस्तानी लोगों को ठिकाने लगाने के बाद ख़ुशी का एहसास होता है। इसी बहाने अपने देश की तमाम समस्याएं थोड़ी देर के लिए किनारे हो जाती हैं।
हमने तो देखी नहीं है फ़िल्म। देखी नहीं इसीलिए इसके बारे में लिख रहे हैं। सिनेमा हाल में जाकर देखने का मन भी नहीं है। आपने देखी है क्या? कैसी लगी?

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Friday, December 12, 2025

नियमित लेखन




 Prabhat Ranjan जी ने एक पोस्ट (लिंक टिप्पणी में) में उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक एंथनी ट्रॉलोप(Anthony Trollope) के बारे में बताया। एंथनी ट्रॉलोप(Anthony Trollope) को ब्रिटिश साहित्य के इतिहास में महान और सबसे लिक्खाड़ लेखों में माना जाता है। वे ब्रिटिश पोस्ट ऑफिस में पूर्णकालिक नौकरी भी करते रहे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने बहुत लिखा।

बहुत लिखने वाले हर भाषा में होते हैं। यह अलग बात है कि उनका लिखा कितना पढ़ा जाता है। कितना आगे पहुंचता है।
लिखने का हर एक का अंदाज़ अलग-अलग होता है। कोई रोज़मर्रा के किस्से लिखता है, कोई राजनीति पर, कोई साहित्य पर। जिसका जिसमें मन आता है उस पर लिखता है। कई बार लिखने हुआ पोस्ट करने के बाद सोचते हैं ये फालतू बात लिख दी। लेकिन एकाध लोग तारीफ़ी टिप्पणी कर देते हैं तो लगता है ठीक किया, पोस्ट कर दिया।
पोस्ट के साथ फोटो लगाने का क़िस्सा भी मजेदार होता है। कई बार पोस्ट से जुड़ी फोटो मौजूद रहती है। बल्कि फ़ोटो ही पोस्ट का आधार रहती है। कई बार पोस्ट से एकदम अलग फ़ोटो ध्यान में आ जाती है और वह लग जाती है। फोटो के चलते पोस्ट वायरल टाइप हो जाती है।
तीन दिन पहले रेलवे स्टेशन का किस्सा लिखते हुए घर की फ़ोटो लगा दी। साथ में रामदरश मिश्र जी की कविता। पोस्ट को 2600 लोगों ने लाइक किया, 437 टिप्पणियाँ हुईं, 66 लोगों ने पोस्ट साझा की। कुछ लोगों ने फ़ोन भी किया, घर की बधाई देते हुए। व्यक्तिगत सूचनाओं, उपलब्धियों पर सोशल मीडिया में भरपूर प्रतिक्रिया मिलती है। हम सभी को धन्यवाद भी नहीं दे पाये। इस पोस्ट के माध्यम से सभी मित्रों को धन्यवाद दे रहे हैं।
बहरहाल, बात नियमित लिखने की हो रही थी। लिखने के तमाम विषय हमेशा सूझते हैं। मसाला भी रहता है। लेकिन संकोच हमेशा हाथ रोक लेता है। आसपास इतने किस्से हैं, राजनीति, समाज, साहित्य से जुड़ा लोगों का इतना लेखन है उद्धरत करने के लिए। लेकिन आलस और संकोच के चलते लिखना स्थगित हो जाता है। कुछ विवादास्पद लिखने पर होने वाले बवाल की सोचकर बहुत कुछ लिखना रह जाता है। राजनीति पर कुछ लिखने की सोचते ही अज्ञानी बुद्धिजीवियों के ठस हमलेनुमा टिप्पणी के बारे में सोचकर लिखना स्थगित हो जाता है।
मुझे लिखने का सबसे ज्यादा मसाला घूमने,फिरने के दौरान हुए अनुभवों से मिलता है। अभी तक जितनी यात्रायें की उनके बारे में थोड़ा बहुत लिखा। एक हफ़्ते के यात्रा विवरण पर तीस-चालीस पोस्ट तक लिखीं। यह अब की बात है। लेकिन अफ़सोस कि 43 साल पहले की साइकिल से भारत यात्रा के बारे में कुछ ही पोस्ट लिख पाये। उन दिनों डायरी में शुरुआती दिनों के अनुभव लिखे थे। बाद में केवल कहाँ से कहाँ गए यही दर्ज करके रह गए। अब तो सारे विवरण बिसरा गए। यादें धुंधला गयीं। लेकिन कभी-कभी कुछ-कुछ यादें उछलकर सामने आ जाती हैं।
अभी Shambhunath Shukla जी के दक्षिण भारत के यात्रा विवरण पढ़ते हुए मुझे कई किस्से याद आए। एक किस्सा विजयवाड़ा का।
हम लोग विजयवाड़ा में एक दुकान पर सुबह का नाश्ता कर रहे थे। हमारी साइकिलों पर 'जिज्ञासु यायावर' और 'भारत दर्शन' लिखा देखकर एक लड़के ने हमसे बातचीत की। उसको जब पता चला कि हम लोग इलाहाबाद से आए हैं तो उसने हमसे घर चलने की ज़िद की। हमने कहा-"हमको आगे जाना है।" उसने कहा -"मेरी माँ इलाहाबाद में पढ़ी हैं। महादेवी वर्मा जी ने उनको पढ़ाया है। उनको जब पता चलेगा कि इलाहाबाद से आये लोगों को बिना घर लाए, बिना कुछ खिलाये पिलाये जाने दिया तो वे वे बहुत नाराज होंगी। इसलिए आप लोगों को तो मेरे घर चलना ही होगा।"
हम लोग गए। उनकी माता जी हमसे मिलकर बहुत ख़ुश हुईं। खाना बनाया। खिलाया। तब आगे जाने दिया। हम अपने प्रोग्राम से आधे दिन पीछे हो गए। लेकिन बहुत खुशनुमा अनुभव साथ लेकर आगे बढ़े।
बाद में इलाहाबाद लौटकर एक दिन मैं महादेवी वर्मा जी से मिलना। शायद दोपहर का समय था। वे आराम कर रहीं थीं। थोड़ी देर में आई अपनी बैठक में। थोड़ा नाराज थीं इस बात से कि बिना बताये, असमय मिलने चले आए। मैंने उनको विजयवाड़ा में उनकी शिष्या से मुलाक़ात का क़िस्सा सुनाया। वे थोड़ा ख़ुश हुईं, लेकिन असमय मिलने आने की खिन्नता उनके चेहरे पर बनी रही। कुल मिलाकर पाँच-दस मिनट रहे होंगे उनके साथ।
चलते समय याद आया कि आटोग्राफ ले लिए जाये। कोई आटोग्राफ बुक तो ले नहीं गए थे। जेब में एक कागज था। उसी पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए। उन्होंने दस्तखत कर दिया। हम उनको प्रणाम करके वापस लौट आए। पुराने तमाम कागजों में याद-कदा वह कागज दिख जाता है। फिर कहीं इधर-उधर हो जाता है।
विजयवाड़ा में उस लड़के (जिसके नाम अब मुझे याद नहीं रहा) की फ़ोटो मुझे पिछले दिनों दिखी। क्लिक -III कैमरे से खींची बदरंग हो चुकी काली-सफेद फ़ोटो फेंकी जाने वाली चीजों में शुमार हो चुकी थी। हमने देख ली। सुरक्षित रख ली इसलिए अभी मिल नहीं रही है। मिलेगी तो पोस्ट करेंगे। मिल तो वह डायरी भी भी नहीं रही है जिसमें 43 साल पहले की यात्रा के कुछ किस्से और जगहों के नाम लिखे हैं जहाँ हम गए थे। कभी मिलेगी तो लिखेंगे इसके बारे में। साइकिल यात्रा के कुछ किस्से हमने अपने ब्लॉग में लिखे हैं। चाहें तो टिप्पणी में दी कड़ी में जाकर पढ़ सकते हैं।
इतना लिखने के बाद लगा कि पोस्ट दो हिस्सों में बंट गई है। एक में लिखने से जुड़ी बातें हैं, दूसरे में साइकिल यात्रा से जुड़ा एक संस्मरण। अब सोच रहे हैं कि पूरी पोस्ट साझा करें कि दो हिस्से अलग-अलग। फ़िलहाल हम पूरा लिखा हुआ पोस्ट कर रहे हैं। आपको जो पसंद आए पढ़ लीजिएगा। एंथनी ट्रॉलोप जैसे लिक्खाड़ की याद में इतना जुलुम तो चलता है।
वैसे आप बतायें कि पोस्ट पूरी ही ठीक लगी या दो हिस्सों में होती तो बेहतर रहता है। दो हिस्सों में कौन सा हिस्सा बेहतर रहता पोस्ट के लिहाज़ से।
फोटो अपनी साइकिल से जिसकी हवा निकली हुई है। हवा भरने का पंप खोजा जा रहा है। जल्दी ही साइकिल सड़क पर भी चलेगी। फ़िलहाल इतना ही। बकिया फिर कभी।

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Wednesday, December 10, 2025

संसद तेली की घानी

 

देश की मौजूदा तमाम समस्यायों पर बातचीत छोड़कर संसद में वंदेमातरम पर घंटों बहस हुई। बहस सुनकर समस्यायें भाग खड़ी हुई होंगी। धूमिल की कविता पटकथा का यह अंश याद आया :

मुझसे कहा गया कि सँसद देश को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है
या यह सच है कि
अपने यहाँ संसद तेली का वह घानी है
जिसमें आधा तेल है आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है तो
यहाँ एक ईमानदार आदमी को अपने ईमानदारी का मलाल क्यों है
जिसने सत्य कह दिया है उसका बूरा हाल क्यों है?
Shambhunath Shukla जी ने इस मसले पर बढ़िया बात कही है। रोचक किस्सा भी सुनाया है -'जिसे न दे मौला उसे दे सिराज-उद-दौला ।' (अपडेट देखें) सुनिए। लिंक यह रहा : https://www.facebook.com/share/v/1PuheFP8J3/
अपडेट : Raj Gopal Singh Verma जी ने टिप्पणी में बताया -"सिराज-उद-दौला नहीं, आसफ-उद-दौला है वह! कृपया संशोधित कर लें।" नेट पर खोजने पर पता चला कि : "यह कहावत "जिसको न दे मौला, उसको दे आसिफ-उद-दौला" है, न कि सिराज-उद-दौला; यह अवध के नवाब आसिफ-उद-दौला की दरियादिली और उदारता को दर्शाती है, जिनका शासनकाल लखनऊ में कला, संस्कृति और भव्य इमारतों (जैसे बड़ा इमामबाड़ा) के लिए मशहूर था और उन्होंने अकाल के दौरान जनता को रोजगार दिया, जिससे लोग उन्हें भगवान का रूप मानने लगे थे, हालांकि उन्होंने खुद को ईश्वर से ऊपर नहीं माना. "

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