Wednesday, February 18, 2026

अख़बार में ख़बरें


 आज अखबार की शुरुआत खबरों से हुई। शायद विज्ञापन कम मिले आज के लिए। कभी टाइम्स ग्रुप के सर्वेसर्वा की कही बात याद आई -"हम विज्ञापन से बची हुई जगह पर ख़बरें छापते हैं।"

अख़बार में पहले पेज पर देश/प्रदेश के नामचीन लोगों से जुड़ी ख़बरें होती हैं। उनके बयान होते हैं। दैनिक जागरण के पूर्व संपादक नवीन जोशी जी ने एक बातचीत में बताया कि आजकल शाम को अखबारों के पास सरकार से जुड़े कार्यालयों से खबरों की सूची आती है। ये छापना है, ये नहीं छापना है।
अख़बार में लोगों के आँय - बाँय -साँय बयान पढ़कर लगता है कि काश इनकी जगह भी विज्ञापन छपते तो बेहतर होता।
आज स्वयं सेवक सर संघ संचालक जी ने आव्हान किया -'हिंदू परिवार के कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए।' मजेदार बात है यह भी। आए दिन कोई भी धर्माचार्य ,ख़ुद गृहस्थ जीवन से दूर रहते हुए , अपनी-अपनी क़ौम के लोगों के लिए बच्चे पैदा करना का लक्ष्य निर्धारित कर देता है। कोई बाबा कहता है चार बच्चे पैदा करो, कोई कहता है पाँच से कम बच्चे पैदा करोगे तो क़ौम ख़तरे में पड़ जायेगी। लेकिन लगता है कि देश के लोग इनकी बात मानते नहीं है। तमाम युवा देर से शादी कर रहे हैं। कुछ बच्चे पैदा करने के मूड में नहीं है।
टूटते संयुक्त परिवार, बढ़ती समस्याओं और तमाम दीगर परेशानियों के चलते बच्चे पैदा करना और पालना कितना कितना कठिन काम है यह वही जानते हैं जो इसके काबिल और इस काम में सहयोग दे सकते हैं। जिनको बच्चे पैदा करना नहीं है वे इसका लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं। 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे'।
कुछ अगल-बगल छपी खबरें होती हैं जिनको देखकर लगता है कि वे एक दूसरे से मजे ले रही हैं। आज दैनिक हिन्दुस्तान की एक खबर का शीर्षक था -'परीक्षा को उत्सव की तरह लें, भय और तनाव से दूर रहें' उसके बगल में सटी हुई ख़बर है ' कीलें निकली बेंचों पर बैठना छात्रों के लिए इम्तहान।'
दोनों खबरों को मिलाकर पढ़ें तो लगेगा -' कीलें निकली बेंचों पर बैठकर इम्तहान देते हुए परीक्षा को उत्सव की तरह लें, भय और तनाव से दूर रहें।'
एक खबर में बताया गया कि लखनऊ के होटलों में बैठकर डिजिटल अरेस्ट का काम अंजाम करने वाले पकड़े गए। होटल में ऑफिस का सेटअप तैयार करके पुलिस की वर्दी में लोगों से संपर्क करके डिजिटल अरेस्ट करते हुए उनसे पैसे बसूलते थे।
डिजिटल अरेस्ट की खबरों में आता है कि कैसे पुलिस की वर्दी में अपराधी लोगों से पैसा उगाहते थे। लोग वर्दी के डर से पैसा दे देते हैं। इससे समाज में पुलिस के आतंकी छवि का अन्दाज़ा लगता है। पुलिस मतलब बवाल। पुलिस महकमें में तमाम अच्छे , मानवीय, सेवा भाव वाले लोग हैं/होंगे लेकिन एक विभाग के रूप में पुलिस की छवि डरावनी ही बनी हुई है।
पुलिस के साथ-साथ अदालत की इमेज भी ऐसी है कि वाहन गए तो बवाल ही है। तमाम चेतावनियों के बावजूद लोग इस शिकंजे में फँस रहे हैं। रोज़ लोगों के डिजिटल अरेस्ट के शिंकजे में फँसने की खबरें आती हैं।
तकनीक के दुरुपयोग, पुलिस और अदालत के डर तथा लोगों की अज्ञानता का फ़ायदा उठाकर लोगों को लूटते लोग 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम को अपने हिसाब से अंजाम दे रहे हैं।
'विदाई कराने पहुंचे दामाद की चाकू से गोदकर हत्या' की खबर बताती है कि समाज में प्रेम विवाह को लोग अभी भी स्वीकार नहीं करते हैं। काकोरी में हुई हत्या का बदला हरदोई में लिया गया जहाँ एक 'दामाद ने सरेराह श्वसुर को हॉकी से पीटकर मार डाला।'
दामाद द्वारा श्वसुर की हत्या में मामला पैसे से जुड़ा बताया गया है । दामाद पैसे माँगता था, श्वसुर ने दिए नहीं। दामाद ने श्वसुर को निपटा दिया। काश श्वसुर के पास वेनेजुएला की तरह संसाधन होते और दामाद के पास अमेरिका जैसी व्यवस्था तो दामाद श्वसुर को उठवा लेता। श्वसुर के संसाधन पर कब्जा लेता। एक हत्या बच जाती।
इन दोनों हत्या की खबरों को जोड़कर देखें तो एक दामाद का क़त्ल हो गया, दूसरा जेल चला गया। इन परिवारों में बच्चे पैदा करने का लक्ष्य अधूरा रह गया। इसी तरह खबरें पढ़कर धर्माचार्य प्रति परिवार बच्चे पैदा करने का लक्ष्य बढ़ा देते हैं।
खबरें और भी हैं लेकिन सब पढ़ेंगे तो जायका ख़राब होगा। फ़िलहाल इतना ही। आपका दिन शुभ हो।

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Tuesday, February 17, 2026

जुगाड़ू मोबाइल स्टैंड


 रास्ता पहचानने के लिए गूगल मैप का चलन आजकल आम बात है। कहीं जाने के लिए लोग पता कम लोकेशन ज़्यादा पूछते हैं। नई कारों में स्क्रीन पर मैप आता जाता है। पुरानी कारों में मोबाइल स्टैंड लगाने की व्यवस्था होने लगी है।

हमने भी अपनी सैंट्रो सुन्दरी में मोबाइल स्टैंड लगवाया है। कार की विंड स्क्रीन पर फिर हो गया। मोबाइल स्टैंड के जबड़े में मोबाइल फँसा लीजिए। देखते जाइए। गूगल मैप देखिए या मोबाइल से जुड़ा और कोई काम कीजिए।
हमारा मोबाइल स्टैंड कुछ दिन तो चला। एक दिन हमने मोबाइल स्टैंड के जबड़े को थोड़ा ज़्यादा खोल दिया। जबड़ा मोबाइल की चौड़ाई से ज़्यादा खुल गया। मोबाइल जबड़े के रखकर हमने जबड़े को वापस करके मोबाइल को फिट करना चाहा। लेकिन जबड़ा बंद नहीं हुआ। अकड़ गया। ज्यादा मसाले खाने वालों के होंठ जिस तरह ज़्यादा खुल नहीं पाते हैं कुछ उसी तरह हमारे मोबाइल के जबड़े ने बंद करने से इंकार कर दिया।
दुकान ले गए तो मैकेनिक ने बताया -'इसका कोई इलाज नहीं। जबरदस्ती करेंगे तो जबड़ा टूट जाएगा। अब आप मोबाइल को जबड़े में गेटिस लगाकर फँसा। यही एक उपाय है।'।
हमने सोचा यह भी एक बवाल है। लेकिन पता लगा यह बवाल हमारे साथ ही नहीं हुआ। और लोगों के साथ भी होता है ऐसा। अपने-अपने हिसाब से लोग इसका जुगाड़ करते हैं।
ऐसे ही एक ऑटो में मैंने देखा कि ड्राइवर ने दो लंबी लकड़ियों के बीच एल्युमिनियम के जबड़े में अपना मोबाइल फँसा रखा था। मोबाइल स्टैंड के टूटने, खराब होने की कोई गुंजाइश नहीं। हमको यह बढ़िया तरीका है। जुगाड़ू मोबाइल स्टैंड।
आपको कैसा लगा यह जुगाड़?
जुगाड़ू मोबाइल स्टैंड 👇





Monday, February 16, 2026

चलिए , वियतनाम चलें


 वियतनाम घूमना मेरे लिए बड़ा सपना रहा है। वियतनाम के बारे में न जाने तमाम किस्से सुने हैं। सबसे चमकदार क़िस्सा वियतनाम के लोगों द्वारा अमेरिका की फौज का मुक़ाबला करना और अपने यहाँ से भागने के लिए मजबूर कर दिया जाना है।

वियतनाम घूमने का सपना अब पूरा होने जा रहा है। आगामी 3 अप्रैल से 9 अप्रैल तक वियतनाम घूमने जाने का प्लान है। साथ में कई मित्र भी चलेंगे।
वियतनाम टूर मेरे सुपुत्र Anany Shukla के सौजन्य से होगा। 45+ की उमर के लोगों को साथ लेकर अनन्य अपनी नई कंपनी , निकल बेवजह, (Nikal Bewajah) की शुरुआत कर रहे हैं।
इसके पहले भी 45+ उमर के लोगों के साथ अनन्य ने तीन टूर किए थे। कश्मीर श्रीलंका और लक्षद्वीप। मैं तीनों में गया था। सारी मजेदार ट्रिप रही।
वियतमान ट्रिप के दौरान कई जगहें घूमेंगे। नए लोगों से मुलाकात होगी। नए अनुभव होंगे। वियतनाम के बारे में जानने के लिए पढ़ाई कर रहे हैं। शुरुआत हो ची मिन्ह की जीवनी से कर रहे हैं।
वियतनाम की हफ़्ते भर की ट्रिप का खर्च करीब साठ हज़ार रुपए (60000/-) प्रति व्यक्ति है। इसमें वियतनाम में रहने, घूमने और नाश्ते और डिनर का खर्च शामिल है। वियतनाम आने-जाने और लंच का खर्च (3/4 दिन का लंच शामिल है) इसमें शामिल नहीं है।
कश्मीर, श्रीलंका और लक्षद्वीप यात्रा के समय कुछ मित्रों ने कहा कि उनको पता होता तो वे भी साथ चलते। ऐसे ही मित्रों के सूचनार्थ यह पोस्ट लिखी जा रही है। इस ट्रिप से जुड़े प्रोग्राम/विवरण की फ़ोटो भी यहाँ लगाई जा रही हैं।
इस ट्रिप से जुड़े लोगों का अलग व्हॉट्सप ग्रुप बनाया गया है। इस ग्रुप से जुड़कर वियतनाम ट्रिप के बारे में और अपडेट मिल जायेंगे। इस ग्रुप से जुड़ने में रुचि रखने वाले मित्र अपना नंबर मुझे या अनन्य को मेसेज में भेजेंगे तो उनको जोड़ लिया जाएगा।
चलना है आपको भी वियतनाम। चलिए। नए अनुभव होंगे, नए दोस्त बनेंगे। निकल बेवजह का थीम सांग सुनिए टिप्पणी में।

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Sunday, February 15, 2026

प्यार हुआ, इकरार हुआ


 आज सुबह 'सैंट्रो सुंदरी' को दिखाने के लिए सर्विस सेंटर गए। 26 साल की युवा सैंट्रो सुंदरी पिछले महीने ही सर्विस कराकर घर लौटी है। चकाचक चलती है। लेकिन दो दिन पहले चलते-चलते अचानक रुक गई। ऐसे जैसे हिचकी आई हो उसे। हमने थोड़ी देर रुककर इंतज़ार किया। फिर स्टार्ट किया। नहीं हुई स्टार्ट। थोड़ी देर बाद घुर्र-घुर्र किया लेकिन चली नहीं। शायद नई गाड़ी के मुकाबले अपनी बेकदरी से नाराज हो गई है। हम उसको खड़ी करके घर आ गए।

लेकिन अगले दिन चाबी घुमाते ही स्टार्ट हो गई। पिछली रात की नाराज़गी दूर हो गई शायद। जितनी बार स्टार्ट किया स्टार्ट हुई। पिछली रात के एकदम ऊपट व्यवहार। हमें लगा ठीक हो गई। बल्कि लगा, खराब हुई ही नहीं थी। लेकिन सोचा दिखा लें।
आज ले गए सर्विस सेंटर। आज भी फौरन चल दी। ख़ुशी-ख़ुशी। लगा कि हमारा वहम था कि स्टार्ट होने में कुछ दिक्कत है। लेकिन हमने सोचा कि दिखा ही लें। सर्विस सेंटर के रास्ते में एक जगह फिर हिचकी के साथ रुकी तो दुबारा स्टार्ट नहीं हुई। हमने उसको धकिया के किनारे किया। ढाल में तेजी से लुढ़कने लगी। हम दरवाजा खोलकर उचक कर गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठ गए। गियर में डाला। गाड़ी स्टार्ट हो गई। चल दी।
हमने गाड़ी सर्विस सेंटर में जमा की। लौट लिए। पैदल।
लौटते हुए याद आया कि पिछले हफ़्ते वहीं कहीं एक चाय की दुकान दिखी थी। उस पर नाम लिखा था -'शुक्ला टी स्टॉल।' उस दिन तो कहीं जा रहे थे। पूछा नहीं। आज सोचा कि पता किया कि कहाँ के 'सुकुल जी ' यहाँ दुकान खोले बैठे हैं। पता करना इसलिए भी जरूरी लगा कि कोई देखकर कहे रिटायरमेंट के बाद बेच रहे हैं अनूप शुक्ल तो उसको असलियत तो बता सकें।
'शुक्ला टी स्टॉल' तो किन्ही शुक्ला जी की दुकान होगी। लेकिन आजकल दुकानों के नाम बड़े रोचक दिखते हैं। कानपुर के 'ठग्गू के लड्डू' की दुकान तो बहुत पुरानी है। उसी की नक़ल करते हुए लखनऊ में भी कई दुकानों के नाम दिखे।कल आशियाना में 'लड्डू बेईमान' का बोर्ड दिखा। मतलब कोई खराबी बताये लड्डू में तो दुकान वाला कह सकता है -हम तो पहले ही बताये थे 'लड्डू बेईमान' है। बेईमान लड्डू से आप ईमानदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। हम बेईमान बताये हैं तो बेईमान हैं। कोई ईमानदारों की तरह थोड़ी कि कहें ईमानदार लेकिन निकलें बेईमान।
ऐसे ही कल एक स्टेशनरी की दुकान भी दिखी -'माँ बाऊ जी स्टेशनरी हाउस।' माता-पिता को समर्पित होगी शायद दुकान। उनके नाम पर चल रही होगी। माँ-पिता के प्रति प्यार प्रदर्शित करने के तरीक़ा होगा। इसी से याद आया कि बहुत पहले एक दोस्त ने अपनी मेल का पासवर्ड बनाया था -'मम्मी-पापा।'
बहरहाल 'शुक्ला टी स्टॉल' की तरफ़ बढ़ते हुए रास्ते में और चाय की दुकान दिखी -'जायका दरबार।' तरह-तरह के सामानों का दरबार लगा था 'जायका दरबार' में। जायका दरबार की फ़ोटो जितने अच्छी आई, वास्तव में वैसी थी नहीं। सरकारी योजनाओं की तरह मामला था यहाँ भी। घोषणा कुछ, असलियत कुछ और।
'शुक्ला टी स्टॉल' की ठेलिया जहाँ देखी थी वहाँ दुकान थी नहीं। बगल में जूस वाले ने बताया -'आज आए नहीं शुक्ला जी।' बगल में इंदौरी पोहे की दुकान वाला मोबाइल में कुछ देख रहा था। शायद Pradeep Sharma जी की पोस्ट पढ़ रहा हो। लखनऊ से उनको समर्थन दे रहा हो। हमने उसको डिस्टर्ब नहीं किया। लौट लिए। पैदल।
लौटते हुए एक दुकान का पर बोर्ड लगा देखे -'मन की चाय, मन की लस्सी।' हमें लगा कि कहीं 'मन की बात' भी न करने लगे चाय वाला। हम आगे बढ़ गए। बाद में पीछे मुड़ के देखा तो वहाँ श्री सीता राम भोजनालय का बोर्ड भी लगा था।
ट्रांसपोर्टनगर आज बंद था। सड़कें सुनसान। एक जगह रिक्शे पर नवाब की तरह दो आदमी बैठे थे। पता होने के बाद भी बात करने के लिहाज से हमने उनसे पूछा कि आज इतवार को बंद रहता है क्या ट्रांसपोर्ट नगर?
उनमें से एक जिनकी आँखों में काला चश्मा लगा था उन्होंने बताया -'इतवार के अलावा आज महाशिवरात्रि भी है। इसलिए बंद है ट्रांसपोर्टनगर।' आँख में काला चश्मा के बारे में बताया कि 'माड़ा' पड़ गया था। ऑपरेशन कराया है। अगले हफ़्ते नंबर मिलेगा नम्बर तब बनेगा चश्मा। हमने सोचा उनका फ़ोटो लिया जाये लेकिन सोच पर अमल करने तक हम आगे बढ़ गए थे। फिर आगे बढ़कर सोचा कि लौटकर फ़ोटो लिए जाये लेकिन नहीं लौटे। एक बार फिर सोच पर अमल नहीं किया। दो मिनट के भीतर दो बार सोच पर अमल मुल्तवी करना कितने लोग कर पाते हैं? बड़े जिगर का काम है ।
रास्ते में तमाम दुकानों पर मुरादाबादी चिकन और बिरियानी की दुकानें दिखीं। क्या पता मुरादाबाद में इसी तरह लखनऊ के तमाम सामान बिकते हों। एक नुक्कड़ पर अंडा सेल, मुरादाबादी चिकन बिरियानी कार्नर के बगल में द्विवेदी पूड़ी बिकती दिखीं। दुकानों का सांप्रदायिक सद्भाव देखकर अच्छा लगा।
गोमती नदी के शहर में गंगा मैया कैफ़े देखकर नदियों के आपसे सद्भाव का अंदाज़ लगा।
आगे दो लड़के पोस्टर लगाते दिखे। सड़क पर पोस्टर को पेट के बल लिटाकर उसकी पीठ पर गोंद लगाकर पोस्टर पास की दीवार पर चिपकाया। गोंद से पोस्टर लगाते देखकर लगा कि अब शायद लेई का चलन कम हो गया है।
पोस्टर एसी रिपेयर से संबंधित था। सद्दाम नाम था कारीगर का। बताया पंद्रह साल बॉम्बे में एसी का काम किया। कमाई की। अब लखनऊ में काम करेंगे। परिवार के कारण वापस लौट आए। हमने मजे लेते हुए कहा -‘ परिवार के कारण घर वापसी हुई। बीबी ने बुलाया है।’ सद्दाम मुस्कराते हुए पोस्टर लगाते रहे।
दुकान का साई A/C सर्विसिंग है। शिरडी वाले साई बाबा के नाम पर। साई बाबा मतलब सबका मालिक एक है। एक एसी की सर्विसिंग 425 रुपए में। दो की आठ सौ रुपये में। लखनऊ वाले साथी लोगों को सर्विसिंग करानी हो तो संपर्क करें।
मोटर साइकिल में बैठते हुए सद्दाम के साथ वाले बालक ने कहा -' आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। हमने कहा। हमको भी अच्छा लगा।दुकान अच्छी चलने के लिए शुभकामनाएँ।'
चलते समय सद्दाम के साथ वाले वाले बालक का नाम पूछा तो उसने बताया -'इकरार।'
हमको गाना याद आ गया -' प्यार हुआ, इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल। अभी गाना सुनते हुए यह पोस्ट कर रहे हैं। आप भी सुनिए गाना। लिंक टिप्पणी में दिया है।

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Friday, February 13, 2026

पैर में लिपस्टिक


 आज सुबह दूध लेने गए। दुकान कालोनी के पास ही है। आम जरूरत का सामान मिल जाता है दुकान में । दुकान पर पहुंचकर दूध के लिए बोला।दुकान वाले भाई हमसे पहले वाले ग्राहक को निपटा रहे थे। इंतजार में खड़े हो गए।

हमको बगल में खड़े देख दुकान पर पहले से खड़ी महिला ग्राहक ने मुझे अवांछित आइटम की तरह देखा। पहली बार उसका देखना मुझे घूरना लगा। बाद में लगा कि वह मुझे घूर नहीं बस देख ही रही थी। उनके चेहरे पर थोड़ी नाराजगी सी लगी मुझे । ऐसे मुझे लगा लेकिन क्या पता वह उनका सामान्य अंदाज़ हो। हम दूसरे के चेहरे के भाव अपने हिसाब से ग्रहण करते हैं न।
मुझे देखे जाने के जवाब में मैने भी महिला को देख देखा। पहले चेहरे पर और फिर निगाह पैर की तरफ गई। पैर में चमकदार गुलाबी 'लिपस्टिक' लगी थी। 'पैर में लिपस्टिक' पढ़कर किसी को ताज्जुब हो सकता है। हमको भी हुआ। मुझे पता है कि पैर के नाखून में लिपस्टिक नहीं नेल पॉलिश लगाती हैं महिलाएं। लेकिन सुबह मुझे सबसे पहले मुझे लिपस्टिक ही याद आई। मौके पर सही शब्द अक्सर याद नहीं आता। अक्सर होता है यह मेरे साथ। आपके साथ भी होता होगा। हो सकता है कुछ और होता हो।
सही समय पर सही बात/चेहरा/नाम/शब्द याद न आने को भूलने की बीमारी कहा जाता है। आज अखबार में पढ़ा कि नई भाषाएं सीखने से भूलने की बीमारी पर अंकुश लगाया जा सकता है। तय किया कि स्पेनिश और उर्दू का अभ्यास दुबारा शुरू करेंगे। लेकिन यह बात भी अक्सर भूल ही जाती है।
दूध लेकर वापस लौटे। दो लीटर दूध के 138 रुपए हुए। मतलब एक लीटर का 69 रुपया। आधे-आधे लीटर के पैकेट लेते दो रुपये और लगते। आजकल दूध में मलाई की पर्याप्त मात्रा देखकर लगता है कि कहीं नकली दूध तो नहीं पी रहे। हालांकि मलाई से घी बनाया जाता है तो लगता है ठीक ही होगा दूध।
कल किसी रील में सुनी हुई बात याद आई कि स्वस्थ रहने के लिए सारी सफेद चीजें छोड़ देनी चाहिए - चीनी, चावल, नमक, मैदा और तमाम सफेद चीजें। तसल्ली हुई कि रील बनाने वाले ने सफेद झूठ से परहेज के बारे में कुछ नहीं कहा।
लौटते हुए कालोनी का कूड़ा बटोरने वाले मिले। बालक कृष्णा ने हमारे घर की सफाई में काफी सहायता की थी। हमने उससे हाल - चाल पूछे तो साथ में गीता बोली - " हम कहती रहन कृष्णा ते कि तुम्हार अंकल नाई दिखे बहुत दिन ते। दिखात तौ चाय पानी करवावात।" (मैं कह रही थी कृष्णा से कि तुम्हारे अंकल नहीं दिखे बहुत दिन से। दिखते तो चाय-पानी करते) हमने कहा -" घर तौ पता है। चली अवतिऊ । चलो अबही पियो चले चाय। (घर तो पता है। चली आती। चलो अभी पियो चल कर चाय)"
गीता बोली - " अब और कौनों दिना आईबे। अभय छुट्टी का टाइम हुई गवा।"
खड़े खड़े बात होती रही। पता चला गीता मौरावां की रहने वाली है। इंद्र अवस्थी Indra Awasthi के गांव की। मौरावां के कई किस्से याद आए। कहा जाता है कि मौरावां का रावण कभी नहीं मरता। हमने यह बात कही तो गीता बोली - "रावण तौ हर साल मरत है हुआं।" हमने उनको रावण के न मरने की कथा नहीं सुनाई।
कृष्णा उन्नाव जिले के मोहान कस्बे के रहने वाले हैं। लेकिन उनको हसरत मोहानी के बारे में पता नहीं। सुबह से दोपहर तक काम में जुटे रहने वाले कृष्णा को कोई काम, जैसे कि ड्राइविंग, सीखने की सलाह दी जिसे वह करते हुए अपनी कमाई में इजाफा कर सके। उसने मेरी बात उसी तरह सुनी जिस तरह मन की बात को देश के बच्चे सुनते होंगे।
पता चला उनको कूड़ा उठाने के आठ हजार रुपए महीने के मिलते हैं। इस महीने की तनख्वाह अभी तक नहीं मिली है। ऐसा अक्सर होता है।
मुझे याद आया कि फैक्ट्री में कामगारों का वेतन दस तारीख तक हर हाल में भुगतान करना संस्था प्रमुख की जिम्मेदारी होती थी। एक बार कुछ तकनीकी कारणों से बैंक वाले खातों में पैसा नहीं भेज पाए तो हमारे हाल कई घंटे बेहाल रहे। यूनियन की तरफ से कोई बवाल न हो इसके लिए देर तक बातचीत की।
असंगठित क्षेत्रों के कामगारों का कोई माई बाप नहीं होता। वेतन अक्सर लेट हो जाता है। अक्सर ठेकेदार पैसे दबा भी लेता है।
हाल के दिनों में श्रम कानूनों में तमाम संशोधन हुए हैं पता नहीं उन पर यूनियन के लोगों में प्रतिक्रिया कैसी है?
चलते समय फोटो ली। गीता बोली - "हमार तौ दिन भर फोटो खिंचत रहत है। हर आधा घंटा मां फोटो। कहां हौ, का करि रहे हौ? जित्ता काम नहीं, ओहते जादा फोटू।" (हमारी तो दिन भर फ़ोटो खिंचती रहती है। हर आधे घंटे में फोटो। कहाँ हो, क्या कर रहे हो? जितना काम नहीं उससे ज़्यादा फ़ोटो।)
गीता को उनकी फोटो दिखाई तो बोली -" बढ़िया नाई आई।" (अच्छी नहीं आई)
हमने दुबारा ली फोटो। इस बार साथ में दूसरी कामगार की भी ली फोटो। बोली -" हां, या वाली बढ़िया आई है।"
साथ वाली महिला का नाम पूछा तो उन्होंने बताया -" श्रीमती।"
हमने पूछा - " कुछ तो नाम होगा श्रीमती के आगे।"
बोली -" नहीं। यही हमारा नाम है। पूरा नाम।"
हम ताज्जुब करते रहे कि ऐसा कैसा नाम? श्रीमती। लेकिन उन्होंने बताया कि हमारा यही नाम है।
हमको कानपुर में गंगा पुल पर हुई एक बातचीत याद आई। एक महिला ने कहा था - " हमार नाम हेरा गा है।" (हमारा नाम खो गया है)
हम वापस लौट आए। सोचते हुए कि फिर कभी मुलाकात हुई तब पूछेंगे कि बचपन में श्रीमती नाम कैसे रखा गया होगा।
1. मौरावाँ जहाँ का रावण कभी नहीं मरता : https://www.facebook.com/share/p/1Gsmnr1SGU/
2. नाम कुछ नाईं है हमार, नाम हेरा गा है: https://www.facebook.com/share/p/1BszdLvcQN/

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Thursday, February 12, 2026

काजीरंगा में हाथी सफारी


 काजीरंगा में 'जीप सफारी' से घूमने के बाद अगले दिन 'एलिफ़ेंट सफारी' से भी घूमने गए। हाथी से जंगल में घूमने का समय सुबह का होता है। हमें पहले सात बजे का समय मिला था। बाद में यह सुबह छह बजे हो गया। सही समय पर पहुँचने के लिए सुबह पाँच बजे जाग गए। सफारी शुरू होने वाली जगह पर समय पर पहुँच गए।

सबेरे का समय था। उजाला अभी हुआ नहीं था। हाथी सफारी की तैयारी हो रही थी। हाथियों के ऊपर हौदे रखे जा रहे थे। हौदों को हाथियों की पीठ पर बाँधा जा रहा था। हाथी पर बैठने के लिए एक ऊँचा प्लेटफार्म बना हुआ था। हाथी के ऊपर हौदा बाँधकर उसको प्लेटफार्म के बगल में खड़ा किया जाता। लोग हाथी के हौदे पर बैठ जाते। एक हाथी पर दो और कुछ पर तीन लोग भी बैठाये जा रहे थे। हाथी पर लोग बैठ जाते तो हाथी आगे बढ़ जाता।
हाथियों पर बैठने के लिए बने प्लेटफार्म देखकर मुझे अपनी फैक्ट्रियों में बने ऊँचे प्लेटफार्म याद आए जो ट्रकों पर सामान लादने के लिए बनाए जाते थे।अपनी बारी आने पर हम भी सामान की तरफ़ लद गए। हौदे पर टांगे इधर-उधर करके बैठे जैसे मोटर साइकिल पर बैठते हैं। मोटरसाइकिल तो कम चौड़ी होती है। लेकिन हौदा काफ़ी चौड़ा होता है। बैठते ही लगा हड्डियाँ बोल जायेंगी। कुछ देर तक जांघ के जोड़ में दर्द होता रहा। बाद में वह सामान्य हो गया।
हाथी पर बैठकर जंगल की तरफ़ बढ़े। अंधेरा अभी भी पूरी तरह छँटा नहीं था। लेकिन उजाला अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहा था। हाथी मस्तानी चाल में चलते हुए ऊँची-ऊँची घास के बीच चलते हुए जंगल के बीच पहुँच गए।
कुछ देर में अंधेरा छंट गया। जंगल साफ़ दिखने लगा। जंगल के जानवर आसपास टहलते दिखे। कोई जानवर कपड़े पहने नहीं दिखा। किसी ने गुड मार्निंग नहीं बोला। कोई सुबह की चाय पीते नहीं दिखा। बस उठे और सीधे घास चरने लगे। उनके यहाँ फार्मेलिटी के चोंचले नहीं होते। कोई दिखावा नहीं।
छोटे-छोटे जानवर, हिरण, सुअर के बाद गैंडे दिखे। एकदम पास में। घास चरते हुए गैंडे। गैंडों को पास से देखने के लिए हाथी रोक दिए गए। गैंडों को घास खाते, खाने के बाद जंगल में जाते हुए फ़ोटो/वीडियो बनाते रहे लोग।
गैंडों के साथ हाथी भी दिखे। एक जगह गैंडे और हाथी अगल-बगल घास खाते दिखे। उनके सामने घास लगी हुई थी। ऐसा लगा मानों में 'बफे सिस्टम' में दोनों हाथी और गैंडे साथ-साथ घास खा रहे। उनके यहाँ घास को प्लेट में रखकर खाने का चलन नहीं। सीधे-सीधे मुँह में रखकर घास खाते दिखे दोनों जानवर।
हाथियों पर बैठे लोग आपस में भी एक-दूसरे के फ़ोटो ले रहे थे। ताकि सनद रहे। एक जगह एक हाथी चलते-चलते रुक गया। उसको पेशाब लगी थी। वह खड़े होकर पेशाब करने लगा। जंगल में सुलभ शौचालय नहीं होता। जानवरों के लिए पूरा जंगल ही सुलभ शौचालय होता है।
हाथी को पेशाब करते देखकर लोगों ने उसका वीडियो बनाया। हाथी की निजता का उल्लंघन हुआ लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की। आराम से खड़े-खड़े पेशाब करता रहा। पेशाब करने के बाद वह आगे बढ़ा।
हाथी की देखा-देखी एक गैंडे ने भी जंगल को 'रेस्ट रूम' के रूप में प्रयोग करते हुए अपना पेट साफ़ किया। लोगों ने उसका भी वीडियो बनाया। इंसान का यह व्यवहार मजेदार है। ख़ुद की जिन क्रियाओं को गोपनीय मानता है और उसको किसी के द्वारा छिपकर देखे जाने पर शिकायत करता है, जानवरों की उन्हीं क्रियाओं की खुले आम फ़ोटो खींचता है।
करीब घंटे भर जंगल में हाथी पर टहलने के बाद हाथी वापस लौटे। जंगल से चढ़ाई पर बनी सड़क पर चढ़कर हाथी उसी प्लेटफार्म के पास जाकर खड़े हो गए जहाँ से उन पर लोग बैठे थे। लोग एक-एक करके उतरते गए।
प्लेटफार्म से उतरने के बाद सब लोग बाहर की तरफ़ चले। वहीं एक चाय की दुकान थी। सबने वहाँ खड़े होकर चाय पी। जंगल में सुबह की चाय पीने के यह अच्छा अनुभव था। चाय पीकर हम लोग वापस होटल लौट आए। होटल में खिले हुए फूल मुस्कराते हुए पूछते हुए लगे -'मजा आया काजीरंगा में जंगल सफारी में?'
हम वापस लौटने की तैयारी लग गए। सामान और ख़ुद को तैयार करने लगे।
पोस्ट में फोटो के साथ वीडियो भी संलग्न हैं। देखिए अच्छा लगेगा।
काजीरंगा में जीप सफारी के किस्से यहाँ पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/v/16f3rCvZi6/

https://www.facebook.com/share/v/1BBHsUcvZY/