Saturday, March 14, 2026

अधिसंख्य अमेरिकी ईरान के साथ लड़ाई खत्म करने का पक्ष में


 युद्ध हमारा ध्येय होना चाहिए (War should be our Motto)

करीब पच्चीस साल पहले यह बात हमारे फाइनेंस के सलाहकार ने खरीदारी का निर्णय लेने वाली मीटिंग में कहीं थे। रक्षा उत्पादन से जुड़े संस्थान से संबद्ध होने के चलते आम धारणा थी कि युद्ध होता रहेगा उससे जुड़ी चीजों की माँग बनी रहेगी। काम मिलता रहेगा। स्थिति अच्छी रहेगी।
हालांकि युद्ध से हमारा कोई व्यक्तिगत फ़ायदा नहीं जुड़ा था। फिर भी यह लगता था कि लड़ाई से जुड़े सामान का बनाने का आर्डर मिलता रहेगा तो अच्छा रहेगा। उनसे बना हुआ सामान किसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल होगा यह सोचने की जहमत कौन उठाता है।
लेकिन दुनिया तमाम हथियार बनाने वाली तमाम कंपनियों का तो अस्तित्व ही इस बात पर टिका होता है कि उनके बनाए हथियार बिकते रहें। इसके लिए लॉबीइंग करते हैं। चुने हुए राष्ट्राध्यक्ष को पटाते हैं। अपने हिसाब से राष्ट्राध्यक्ष चुनते हैं। चुनाव में चंदा देते हैं। जीत जाने के बाद अपने हिसाब से नीतियां बनवाते हैं। अपने हथियार बिकवाने के लिए लड़ाई करवाते हैं। लड़ाई रुकवाते हैं। शांतिकाल में अगली लड़ाई की तैयारी के लिए फिर हथियार बेचते हैं। फिर लड़ाई करवाते हैं ताकि उनका धंधा चलता रहे।
लाखों-करोड़ों लोगों से जुड़े जीवन का फ़ैसला दो-चार लोग अपने फायदे नुकसान के हिसाब से लेते हैं। उनको देश के लोगों की भावनाओं से कोई मतलब नहीं होता। अपने हिसाब से नैरेटिव बनाते हैं वे लोग। ट्रम्प का 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नैरेटिव भी इसी तरह का एक झांसा है। महान बनकर अमेरिका कैसा होगा यह किसी को नहीं पता है, बस हमला किए जा रहे हैं ताकि उन लोगों को फ़ायदा हो जिन्होंने उनको चंदा दिया होगा, राष्ट्रपति बनवाया होगा। नमक का कर्ज उतारना है।
अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया। हमले का निर्णय अमेरिका के राष्ट्रपति ने लिए। अमेरिकी अखबार वासिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक सर्वे के अनुसार अधिकांश अमेरिकी लोग चाहते हैं कि ईरान के साथ युद्ध खत्म किया जाए। सर्वे के कुछ निष्कर्ष इस तरह से हैं :
-आपके अनुसार अमेरिका को ईरान के ख़िलाफ़ हवाई हमले जारी रखने चाहिए या बंद कर देंने चाहिए?
इस सवाल के जबाब में 1 मार्च को 25% लोग हमले जारी रखने के पक्ष में थे, 47% लोग चाहते थे कि हमले बंद कर देने चाहिए। 28% लोगों का कोई मत नहीं था।
हफ़्ते भर बाद 6-9 मार्च को यह प्रतिशत बदलकर क्रमश: 34% , 42% और 24% हो गया। मतलब सर्वे में शामिल अधिसंख्यक अमेरिकी अभी भी चाहते हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ हवाई हमले बंद होने चाहिए।
- आपको क्या लगता है कि ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के ख़िलाफ़ हमले के उद्देश्य के बारे में स्पष्ट रूप से समझाया है कि वो क्या करना चाहता है?
इस सवाल के जबाब में 65% लोगों को लगता है कि ट्रम्प प्रशासन ने हमलों के उद्देश्य के बारे में ठीक से नहीं बताया है। 35% लोग मानते हैं कि ऐसा किया गया था।
-युद्ध के लक्ष्य को देखते हुए लड़ाई में हुआ खर्च और नुकसान ( मौतें) उम्मीद से कम हैं या ज़्यादा?
इस सवाल के जवाब में 63% लोग मानते हैं कि खर्च और नुकसान उम्मीद से ज़्यादा हुआ है। 37% लोग मानते हैं कि खर्च और नुकसान उम्मीद के मुताबिक ही है।
- ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई से अमेरिका की दीर्घकालिक सुरक्षा में योगदान क्यों नहीं मिलेगा?
इस सवाल के जवाब में 19 % लोगों का मानना है ईरान के ख़िलाफ़ लड़ाई फालतू की है, ईरान (अमेरिकी) सुरक्षा के लिए कभी खतरा था ही नहीं। 14 % लोग मानते हैं कि युद्ध बेकार है (ये लोग युद्ध के ख़िलाफ़ हैं), 9% लोग मानते हैं हमला इजरायल के उकसावे पर, पैसे और ध्यान बंटाने के लिए हुआ, 6% लोग मानते हैं इससे अमेरिका और उसके साथियों को नुक़सान होगा, 6% लोगों का मानना है कि इससे तनाव बढ़ेगा, 5% लोग कोई कारण नहीं बता पाये।
यह सर्वे 1005 आनलाइन और फ़ोन से कराया गया। सर्वे में शामिल अधिकांश लोग ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी हमले को ग़ैर ज़रूरी बताते हैं। 1005 लोगों के सर्वे से पूरे देश के लोगों के मिजाज को भाँपना मुश्किल है। लेकिन फिर भी एक सैंपल तो ऐसा कहता कि लोग इस लड़ाई को ग़ैरज़रूरी मानते हैं।
लड़ाई में तमाम संसाधन लगते हैं। अमेरिका में ही गैस के दाम 17% बढ़ गए हैं। महंगाई बढ़ने के साथ लोगों की नाराज़गी भी बढ़ेगी। लोग लड़ाई के ख़िलाफ़ होते जाएँगे।
एक तरफ़ अमेरिका लड़ाई में कूदा हुआ है। दूसरी तरफ़ अख़बार में छपी एक रपट के अनुसार अमेरिका के एक तिहाई लोग आपने इलाज के अपने खाने में कटौती करते हैं। पेट काटकर इलाज करवाने वाले अमेरिकी अपने ज्यादातर बड़े खर्चे मकान खरीदना आदि टालते रहते हैं।
जिस देश की एक तिहाई आबादी अपना पेट काटकर इलाज का इंतजाम करती हो उस देश का राष्ट्रपति द्वारा बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह अपने देश के संसाधन लड़ाई में फूंकते देखकर कहावत याद आती है -'घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने।'

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Friday, March 13, 2026

सैंट्रो सुंदरी की विदाई


और सैंट्रो सुन्दरी विदा हो गई।
1999 के दिसम्बर महीने में आई थी सैंट्रो सुंदरी हमारे घर। शाहजहांपुर में रहते थे उन दिनों। लखनऊ के शो रूम से खरीदी गई थी। तीन लाख बीस हज़ार में। फैक्ट्री से लोन लेकर खरीदी गई थी गाड़ी। वर्षों लोन के पैसे कटते रहे। ब्याज मिलाकर पाँच लाख क़रीब रुपये खर्च हुए होंगे खरीद में।
ब्याज का खेल ऐसा ही होता है।
शाहजहांपुर में क़रीब एक साल चली सैंट्रो। 2001 में कानपुर आ गए। सबसे ज़्यादा कानपुर की सड़कों पर ही चली सैंट्रो। इधर-उधर चोट-खरोंच लगती रही। लेकिन आमने-सामने से कभी कोई भिड़ंत नहीं हुई सैंट्रो से।
कोई एक्सीडेंट तो नहीं हुआ लेकिन एक बार शाहजहांपुर में छोटे बेटे अनन्य ने ड्राइविंग सीट पर बैठकर गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। वो अकेला था उस समय गाड़ी में। घर में ही थी गाड़ी। गियर में थी गाड़ी। चाबी घुमा दी अनन्य ने। गाड़ी उछलकर चल दी। कुछ मीटर आगे चलकर गैरज से टकराई। गैराज का दरवाजा भड़ाम से ज़मीन पर आ गया। बेटा सन्न।चुपचाप गाड़ी में बैठा रहा। उस समय श्रीमती जी के दफ़्तर से आए शमसुद्दीन ने दरवाजा खोलकर उसको गाड़ी से निकाला। बेटा थोड़ी देर में सामान्य हुआ। इसके अलावा सैंट्रो सुंदरी किसी से नहीं भिड़ी आज तक।
इसके साथ आई तमाम गाड़ियाँ विदा हो गईं लेकिन सैंट्रो सुन्दरी बनी रही। कानपुर में लोग पूछते थे कि इतनी पुरानी गाड़ी क्यों चलाते हैं। इतनी कंजूसी भी ठीक नहीं। पंकज बाजपेयी भी जब मिलते तब गाड़ी के बारे में कोई न कोई बयान जारी करते। लेकिन हमको कोई ऐसी कमी नजर नहीं आती थी इसमें जिसके कारण इसको बदलने की सोची जाये। चलती रही गाड़ी।
कानपुर में खन्ना हुंडई में इसकी सर्विसिंग होती रही। शुरुआती दौर में खन्ना हुंडई के अखिलेश इसकी मरम्मत का काम देखते थे। बाद में कभी भी कोई समस्या होती तो हम उनको ही फ़ोन करके समाधान पूछते।
हमारे घर के सब लोगों ने इसे चलाया है। अनगिनत यादें जुड़ी हैं इसके साथ। एक बार घर में देर आने पर इसके पिछले शीशे की धूल पर लिखा मिला -anup you are always late.
पुरानी होते जाने के बाद इस पर मरम्मत का खर्च बढ़ गया था। एक सर्विसिंग में आठ-दस हज़ार रुपये खर्च होते। लेकिन स्टार्ट होने में एकदम युवा गाड़ी की तरह आधी चाबी घुमाने पर स्टार्ट हो जाती। चलती भी आराम से थी। कई अंजर-पंजर (स्प्रिंग) अलबत्ता ढीले हो गए थे। किसी स्पीड ब्रेकर पर लगता इसकी पसलियाँ कमजोर हो गईं हैं।
समय के साथ आगे-पीछे, दायें-बायें तमाम खरोंच लगी सैंट्रो सुंदरी के। बाद के दिनों में कहीं कोई खरोच लगती तो हम फौरन पलटकर देखने की भी जहमत नहीं उठाते। बाद में कभी देखते तो याद आता ये स्क्रैच लगा था इसमें।
सैंट्रो को सैंट्रो सुन्दरी का नाम मिला था कानपुर में। 2017 में कानपुर में उसका किसी गाड़ी की टक्कर से बम्पर पूरा निकलकर बाहर निकल गया। गाडी का पिछवाड़ा दिखने लगा। ऐसा लगा मानो 'सड़क के रैंप पर' चलते-चलते गाड़ी की चड्ढी भारी होने के कारण सरक गयी हो। बम्पर गाड़ी के अंतर्वस्त्र जैसे ही तो होते हैं।
गाड़ियों की दुनिया के अख़बार होते तो खबर छपती-'बम्पर के मैलफंकन के कारण 18 वर्षीया सैंट्रो सुंदरी उफ्स मूवमेंट की शिकार।' तमाम लोग गाडी की उतरी हुई चड्ढी की फोटो देखने के लिए फड़क उठते।
किसी अखबार में खबर छपती - ’सड़कों पर गाडियांं तक महफ़ूज नहीं। शाम को बीच सड़क आवारा बुलेरो बुजुर्ग सैंट्रो का बम्पर नोचकर फ़रार।’
कानपुर से लखनऊ आकर गाड़ी महीनों खड़ी रही। बिना चले। लगता है इससे वह नाराज हो गई। एक दिन चलाने के लिए निकाली तो स्टार्ट तो हो गई लेकिन आगे बढ़ने से मना कर दिया। क्लच प्लेट ख़राब हो गई थी। 26 साल के दरमियान पाँच-छह बार तो बदली गई होगी क्लच प्लेट। गाड़ी सर्विस सेंटर भेजी गई। उसके कई पार्ट मिले नहीं। महीने भर से ऊपर जमा रही गाड़ी। ठीक होकर वापस आई तो लगा अब चलेगी आराम से।
लेकिन एक दिन अचानक फिर खड़ी हो गई चलते-चलते। शायद उसका अल्टरनेटर 'ख़त्तम' हो गया था। फिर क़रीब हफ़्ते भर इलाज हुआ उसका हुंडई सर्विस सेंटर में। अल्टरनेटर बदलने के बाद टनाटन चलने लगी। चलती रही। इसके बाद कोई नखरे नहीं दिखाये उसने।
इन छब्बीस सालों में गाड़ी कुल सवा लाख किलोमीटर से ऊपर ही चली। मतलब पाँच हज़ार किलोमीटर /साल । बाकी सफ़र साइकिल, मोटरसाइकिल, किराए की सवारी या और सरकारी गाड़ी में हुआ।
गाड़ी में जब पेट्रोल भराने के लिए जब भी ढक्कन खुलता तो पेट्रोल पंप वाला कहा -'इसमें ढक्कन तो डीजल का लगा है।' पता नहीं कब, कैसे ईंधन भराने का ढक्कन बदल गया था।
सैंट्रो सुंदरी टनाटन चल रही थी। रजिस्ट्रेशन भी अगले चार साल तक था। इस बीच घर में एक और गाड़ी आ गई थी। दो गाड़ियाँ घर के सामने खड़ा मुश्किल काम था। जगह नहीं थी। घर के अंदर पोर्टिको में खड़ा करने में आने-जाने में परेशानी होती। बाहर कहीं और खड़ा करना सैंट्रो सुन्दरी के लिए ठीक नहीं था। आते-जाते अकेली देखकर कोई छेड़ जाता सैंट्रो सुंदरी को। ख़राब लगता। इसलिए उसको विदा करना जरूरी हो गया था।
सैंट्रो सुंदरी भले ही 26 साल पुरानी हो गई थी। लेकिन उसके चाहने वाले अनेक थे। कानपुर, लखनऊ में कई लोगों ने कह रखा था कि इसे हमको बेंच दें। लेकिन अपनी प्यारी सैंट्रो सुन्दरी को बेचने का हमारा कोई इरादा नहीं था। हमने आजतक अपना घर का कोई पुराना सामान आज तक बेचा नहीं है। किसी जान पहचान वाले को ही दिया है। सैंट्रो सुंदरी के साथ भी यही हुआ। शाहजहांपुर में रहने वाले भांजे से पूछा तो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी इसे लेना स्वीकार कर लिया।
26 साल पुरानी गाड़ी किसी को देने में संकोच भी हुआ। हमने देने के पहले बता दिया कि गाड़ी पुरानी है। कहीं भी खड़ी हो सकती है। लेकिन भांजे का इरादा पक्का रहा। इसके बाद हमने गाड़ी उनके नाम रजिस्टर करा दी। शाहजहांपुर के निवासी होने के कारण ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। परिवहन विभाग में मित्र मोहित के सहयोग से गाड़ी का रजिस्ट्रेशन भांजे के नाम हो गया। शाहजहांपुर की गाड़ी शाहजहाँपुर वाले के नाम हो गई।
रजिस्ट्रेशन के बाद गाड़ी देने शाहजहांपुर गए। चलते हुए फ़ोटो ली। मन में सोचते -'ख़ुशी -ख़ुशी कर दो विदा, सैंट्रो सुंदरी राज करे।'
हाई वे पर चलते हुए गाड़ी कई बार 80 किमी प्रति घंटे के ऊपर चली। उसको चलाते हुए कहीं से नहीं लगा कि इतनी उम्रदराज हो गई है सैंट्रो सुन्दरी। लगा कि अपने रजिस्ट्रेशन की उम्र तक अगले चार साल तो आराम से चलेगी सैंट्रो सुन्दरी।

सैंट्रो सुंदरी को शाहजहाँपुर में भांजे को सौंप कर वापस चले आए। वह विदा हो गई लेकिन उसके साथ जुड़ी यादें सो साथ ही हैं। हमेशा रहेंगी। यादें कहाँ कहीं विदा होती हैं।


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Thursday, March 12, 2026

अमेरिका ईरान इजरायल युद्ध


 अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध में परस्पर विरोधी ख़बरें पढ़ने को मिल रहीं हैं। सभी पक्ष अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। इजरायल-अमेरिका समर्थक के अनुसार तेहरान धुंआ-धुंआ हो रहा है। ईरान के साथ खड़े लोगों ने अनुसार इजरायल और अमेरिका की हवा ख़राब है। दुनिया में तेल की किल्लत शुरू हो गई है। पाकिस्तान में वर्क फ़्राम होम शुरू हो गया है। स्कूल बंद हो गए हैं। हिंदुस्तान में कुछ शहरों में होटल बंद हो गए हैं। कमर्शियल सिलेंडर की क़िल्लत है। रसोई गैस के लिए लाइन। नोटबंदी के समय की लाइनों की याद दिला रही हैं। लड़ाई चलती रही तो आने वाले समय में परेशानियाँ बढ़ेंगी।

अमेरिका के राष्ट्रपति परस्पर विरोधी बयान दे रहे हैं। कभी कहते हैं कि युद्ध लंबा चलेगा कभी कहते हैं लड़ाई जब मन आए ख़त्म कर दूँगा। ईरान के लोग कह रहे हैं लड़ाई ईरान ख़त्म करेगा। इज़रायल और ईरान दोनों देशों में लड़ाई की खबरें देने पर पाबंदी है। दुनिया में लोग अपने-अपने स्रोतों से खबरें बता रहे हैं।
खबरों से पता चलता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ठीक-ठीक बता नहीं पा रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों किया। कोई कहता है अमेरिका दुनिया के ऊर्जा स्रोतों पर कब्जा करना चाहता है। कुछ लोगों का कहना है कि इपस्टीन फाइलों से ध्यान हटाने के लिए हमला करने के आदेश दिए राष्ट्रपति ट्रम्प ने। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति की लड़कियों के साथ अश्लील फोटो तैर रहे हैं। पीड़ित लड़कियों ने उनके बोले डायलॉग भी बताए हैं।
आज अमेरिका अख़बार वासिंगटन पोस्ट में छपे एक लेख के अनुसार ट्रम्प की अश्लील मुद्रा में वायरल तस्वीर फर्जी है और ईरान के इशारे पर सर्कुलेट हो रही है ताकि ट्रम्प को बुरा बताया जा सके।
एक कहानी यह भी चल रही है कि ट्रम्प को उनके यहूदी दामाद ने ईरान पर हमला करने के लिए सलाह दी। ट्रम्प का दामाद इजरायल का मोहरा है। एक तरह से ट्रम्प इजरायल की कठपुतली है। वह इजरायल के इशारों पर नाच रहे हैं। इजरायल के नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमा चल रहा है। लेकिन वह देश के शासक बने हुए हैं और लड़ाई कर रहे हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने चुनाव प्रचार करते हुए वायदा किया था कि वो दुनिया में लड़ाई बंद करवा देंगे। रूस-यूक्रेन लड़ाई ख़त्म हो जायेगी। गाजा में शांति स्थापित हो जायेगी। रूस-यूक्रेन अभी चल ही रहा है। गाजा में अभी भी कभी भी बमबारी की खबरें आती रहती हैं। अब वह ख़ुद लड़ाई में कूद पड़े हैं। 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नारा देने वाला राष्ट्रपति दुनिया को बर्बाद करने में जुट गया है।
एक खबर के अनुसार अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने पिछले कुछ वर्षों में कई मुस्लिम देशों के लोगों को आतंकवादी होने का नैरेटिव गढ़कर लाखों मुस्लिम लोगों को मरवा दिया। बमबारी में निरीह लोगों की हत्याएं की। उनके समर्थन में बेशर्म और बयान बयान दिए। परसाई जी कहते थे -" अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं।बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है।"
अमेरिका की करतूतों के अनगिनत पढ़ने को मिलते हैं। लोकतंत्र की हिमायत करने वाला देश दुनिया में अराजकता फैलाने में जुटा है। ये अजीब विकसित देश है जिसके विकास की नीव दूसरे देशों के संसाधनों की लूट और मनमानी पर आधारित है।
ईरान-इजरायल-अमेरिका की लड़ाई का क्या हस्र होगा कहना मुश्किल है लेकिन यह साफ़ है कि दुनिया में चंद लोग अपनी सनक में दुनिया को बर्बाद करने पर तुले हुये हैं। ताक़त के केंद्रीकरण कितना ख़तरनाक हो सकता है दुनिया के लिए यह साफ़ देखने में आ रहा है।
इस बारे में अपने देश की भूमिका के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं। अंतर्राष्ट्रीय फ़ोरम पर इतनी बेइज्जती पहले कभी हुई हो याद नहीं आता। कोई इसे अपना साहब का मास्टरस्ट्रोक बताता है। कोई कहता है वे भी कंप्रोमाइज्ड हैं। उनकी भी कोई फाइल्स दबी हैं। लोग यह भी कहते हैं कि अपने कॉर्पोरेट साथियों के हित साधन के कारण साहब चुप हैं।
एक आम नागरिक के रूप में हमारी जानकारी के स्तर की सीमायें हैं लेकिन जो सुनते हैं उनसे लगता है कि क्या कारण है जिन फाइल्स में नाम आने पर दुनिया के लोगों के अपने पद छोड़ दिए उसी इपस्तीन फ़ाइल में नाम आने पर मंत्री ने अपना पद छोड़ा न उनको निकाला गया। लगता है अपने राजनीतिक गुरु से भी कुछ नहीं सीखा साहब ने जिन्होंने जैन हवाला कांड में नाम आने पर लालकृष्ण आडवाणी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और घोषणा की थी कि जब तक अदालत से बेदाग साबित नहीं हो जाते, तब तक चुनाव नहीं लड़ेंगे। तीस साल में पार्टी की नैतिकता की परिभाषाएँ इतनी बदल गईं।
लड़ाई कितने दिन चलेगी, कहना मुश्किल है। जितनी देर चलेगी उतनी बर्बादी होगी। लोग मारे जाएँगे। उजड़ेंगे। किसी भी देश के हों युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं होता। जितनी जल्दी यह बंद हो उतना दुनिया के लिए अच्छा होगा।
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Tuesday, March 10, 2026

संजीव शर्मा से मुलाक़ात


 आज कॉलेज के दोस्त संजीव शर्मा से Sanjiv Sharma मुलाक़ात हुई। लखनऊ से स्कूली पढ़ाई के बाद इलाहाबाद से इंजीनियरिंग करने के बाद संजीव ऑस्ट्रेलिया में बस गए। उनकी पत्नी सुधा ने रायपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। मायका भिलाई में था। फ़िलहाल ऑस्ट्रेलिया में जोखिम विश्लेषण (Risk एनालिसिस) का काम देखती हैं। कॉलेज में कम्प्यूटर की पढ़ाई किए संजीव आजकल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम में जुटे हैं।

मतलब जिस विषय में पढ़ाई की उससे पल्ला छुड़ा लिया। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं। 😊
संजीव ने ऑस्ट्रेलिया के बारे में कई रोचक जानकारियां दीं। तसल्ली की जिंदगी। सुनकर एहसास हुआ कि लोग बेफालतू ही अमेरिका में बसने के लिए हलकान रहते हैं। इसके मुकाबले ऑस्ट्रेलिया में टिकना ज़्यादा आसान और आरामदेह है। वैसे हमें तो अब लखनऊ ही मजेदार लगता है।
संजीव की अम्मा जी से मिलना सबसे सुखद रहा। उनसे एक रोचक याद भी जुड़ी है। शाहजहांपुर में रहने के दौरान संजीव ने बताया था कि उनकी माताजी के पास सत्यनारायण की कथा कविता वाले फार्म में है। उसका वे अक्सर पाठ करती हैं। पढ़ते-पढ़ते वह कथा की किताब फट गई थी। संजीव चाहते थे कि कोई उसको टाइप कर दे ताकि वे उसका प्रिंट लेकर नई सत्यनारायण कथा बन सके।
हमने सत्यनारायण कथा की फोटो मंगाये और टाइप करके भेज दी। इससे संजीव की अम्मा जी बहुत खुश हुईं। खूब आशीर्वाद दिए हमको। हमको वो आशीर्वाद साक्षात लेना था इसलिए उनसे मिलने खासतौर पर मिलने गए।
संजीव आस्ट्रेलिया के हिंदी रेडियो दर्पण से भी जुड़े हैं। उनकी माता जी भी इसमें कार्यक्रम देती रहती हैं। हिंदुस्तान में अध्यापन से जुड़ी रहीं श्रीमती गार्गी शर्मा जी आजकल सिडनी में बच्चों को हिंदी पढ़ाती हैं। उनके रेडियो दर्पण से जुड़े व्याख्यानों का संकलन दर्पण नाम से छपा है। किताब दिखाते हुए माताजी बार-बार उसके आवरण के बारे में बताती रहीं कि इसे हमारी नन्ही परी गौरा (संजीव की छोटी बिटिया गरिमा गौरा शर्मा ) ने बनाया है।
अपने साथ मैं विनीत कुमार Vineet Kumar की किताब 'बैचलर्स किचन' ले गया था। माताजी को किताब भेंट की और विमोचनी मुद्रा में फ़ोटो खींचा। जल्द ही विनीत बाबू की किताब ऑस्ट्रेलिया पहुंचेगी। सुधा जी ने किताब पलटते हुए कहा -' मनोरमा की रसोई के किस्से रोचक हैं। मेरी बेटियों को भी पसंद आयेगी किताब।'
संजीव, सुधा और माताजी से थोड़ी देर की मुलाकात में तमाम सारी बातें हुईं। अम्मा जी जिद करके कुछ-कुछ खिलाया। संजीव की शिकायत भी -'कोई काम करो तो ये लड़ता है कि अम्मा काम क्यों करती हो? आराम करो।' हमको अपनी अम्मा की याद आ गई कि कैसे एक बार उनको कानपुर के घर में किचन के प्लेटफार्म पर चढ़े देखकर हमारी श्रीमती ने उनको कहा था -'आप अगर ऐसे काम करेंगी तो हम अभी इनसे शिकायत करते हैं।' मैं उन दिनों जबलपुर में था। लेकिन सुमन की यह बात सुनते ही वे फौरन प्लेटफार्म से लगभग कूद गई थीं।
माताजी मथुरा की हैं। हमने उनको अर्चना चतुर्वेदी के बारे में बताया। भल्लो बुआ की एक रील दिखाई। सुनाई। जल्दी ही भल्लो बुआ का एक और श्रोता आस्ट्रेलिया में जुड़ेगा।
कॉलेज से 41 साल पहले निकले थे हम। इतने दिनों में छुटपुट बातचीत का सिलसिला बना रहा। मुलाकात कम ही हुई। आज की मुलाकात में पिछले तमाम सालों की यादें जल्दी-जल्दी साझा हुईं। आशा है जल्दी ही फिर मुलाक़ात होगी। तसल्ली से बातें होंगी।

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Sunday, March 08, 2026

विनीत की किताब 'बैचलर्स किचन'


 पिछले दिनों Vineet Kumar की 'बैचलर्स किचन' पढ़ी। विनीत की यह चौथी किताब है। इसके पहले की दो किताबें उनके मीडिया के अनुभव पर आधारित थीं। एक किताब दिल्ली से जुड़े अनुभवों पर आई। 'बैचलर्स किचन' में उनके रसोई से जुड़े अनुभव हैं।

विनीत की किताब आते ही उसको पढ़ना शुरू कर दिया था। शुरुआती कुछ पन्ने पढ़ने तक Ashok Pande द्वारा अनूदित लौरा एस्कीवेल की जैसे 'चॉकलेट के लिए पानी' आ गई तो 'बैचलर्स किचन' को थोड़ा रुकने को कहकर उसे पढ़ने लगे। बेस्ट सेलर्स किताब के अनुवाद के आकर्षण में इतना फँसना तो चलता है। 'चॉकलेट के लिए पानी' पढ़ने के बाद फिर 'बैचलर्स किचन' में घुस गए।
कोई सुधी समीक्षक जब किसी किताब के बारे में लिखता है तो उसके पास समीक्षा से जुड़े तमाम टूल होते हैं। वह अपने अनुभव और ज्ञान के सहारे किताब को देखते-पलटते ही किसी न किसी खाने में रखकर अच्छे से समीक्षा कर सकता है। स्त्री विमर्श, बदलते समय में अकेले रहते लड़कों की मन:स्थिति, सोच जैसे तय जुमलों से व्याख्यायित करके बढ़िया समीक्षा कर सकता है। लेकिन हमारे जैसे अनगढ़ और कमपढ़ लोगों के लिए यह मुश्किल काम है। हम तो एक दोस्त और पाठक की हैसियत से ही अपनी बात कह सकते हैं।
विनीत कुमार से अपना परिचय ब्लॉगिंग के जमाने से है। एकाध साल इधर-उधर लगभग दो दशक। शुरुआत में तानाबाना ब्लॉग, फिर हुंकार साइट में लिखे विनीत के लेख पढ़ते रहे। इसके बाद उनकी मीडिया पर लिखीं किताबें मंडी में मीडिया (2013), मीडिया का लोकतंत्र (2023) आईं। बीच में दिल्ली से मोहब्बत बयान करते हुए इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं (2015) भी आईं। कई मुलाक़ातें भी हुईं। पहली मुलाक़ात 2009 में इलाहाबाद में हुए पहले ब्लॉगर सम्मेलन में हुई। उसमें विनीत के संबोधन और विदा होते समय हिंदी ब्लॉगिंग से हम लोगों का परिचय कराने वाले रवि रतलामी जी के साथ हुलसकर फ़ोटो खिचवाने वाले विनीत की छवियाँ मेरे मन में अंकित हैं।
ब्लॉगिंग के दिनों से अभी तक विनीत ने जितना भी लिखा है वह लगभग सारा मैंने पढ़ा है। विनीत के लेखन की खूबियाँ, ख़मियाँ तो सुधी लोग बता सकते हैं हमको तो विनीत का लिखा सब कुछ किसी घर के बच्चे का लिखा लगता है। प्यारा, सुंदर, पठनीय। कभी गुस्से में लिखी कोई पोस्ट पढ़कर लगता -'आज बाबू का मूड ख़राब है। लगता है खाना ठीक से खाया नहीं।'
विनीत ने मीडिया से जुड़े विषयों पर जो लिखा है उसका अकादमिक महत्व है, होगा। लेकिन मुझे उनकी सबसे बेहतरीन वो पोस्ट लगती हैं जिनमें उन्होंने अपने से जुड़े लोगों के बारे में लिखा है। इतने संवेदनशील , तरल, भावुक संस्मरण कम लोगों ने लिखे हैं। माँ और पिता के बारे में विनीत की पोस्ट्स इतनी आत्मीय और अपनी सी लगती हैं कि उनको खोजकर फिर-फिर पढ़ने का मन करता है। पढ़ते हैं।
विनीत की 'बैचलर्स किचन' में उनके रसोई से जुड़े अनुभवों के किस्से हैं। अधिकतर लोगों ने शायद इसी तरह से उसको देखा भी होगा। लेकिन मुझे यह किताब विनीत द्वारा अपने माँ को याद करने का जरिया लगा। साल भर से ऊपर हुआ जब विनीत की माँ नहीं रहीं। उनकी माँ मनोरमा जो पहले रूबरू थीं, बातचीत होने पर विनीत की कुशल पूछती रहती थीं वो न सांसारिक रूप में न रहने पर यादों में समा गईं। उसी का एक हिस्सा 'बैचलर्स किचन' के रूप में सामने आया है। विनीत की माँ मनोरमा की रसोई विनीत के 'बैचलर्स किचन' के रूप में सामने आई।
'बैचलर्स किचन' के पढ़ने के पहले भी विनीत के बारे में जानने का मौक़ा उनकी पोस्ट्स से मिलता रहा । घर, मोहल्ले की दीदियों, भाभियों की संगत में पले-बढ़े , बिंदी-टिकुली के संसार से परिचित विनीत के लिए उनकी माँ का साथ उनके जीवन की शुरुआती पाठशाला बनी जिसमें सीखे सबक उनके व्यक्तित्व में रच -बस गए हैं। माँ के न रहने पर इस पाठशाला में सीखे पाठ उनको जीवन के सूत्र के रूप में याद आते हैं। इनका जिक्र 'बैचलर्स किचन' में जगह-जगह मिलता है। उनकी माँ की कही कुछ बातें :
- इंसान जात भाव का भूखा होता है, भाव मिलने से दुख-तकलीफ़ का गठरी खोल देता है, रहे तब भी, नहीं रहे तब भी।
-बुझाय चाहे नहीं बुझाए लेकिन बड़ा होगा औ अपना बचपन याद करेगा तो ई बात का कसोट तो नहीं रहेगा न कि हमको भैया -दीदी, टोला -पड़ोस का बच्चा सब मारने दौड़ाता था और मेरा माई बस टुकुर -टुकुर देखते रहती थी। कुछ और नहीं तो आटा का हलुआ तो याद रहेगा ही न! यही बहुत है।
-बहुत आसरा लगाये रहते हैं हम-सब कि पढ़-लिखकर कुछ अच्छा करे।पैसा-कौड़ी तो देर-सबेर आ जाएगा लेकिन असल चीज है अपना जिनगी ठीक से संवारे।
-टेम्पू थोड़ा आगे पीछे कर लीजिएगा एक बार ड्राइवर साहब, तब ले जाइएगा।
-खाना सिरफ पेट भरने का चीज नहीं है, मन भरने का भी है। मन नहीं भरेगा तो संतोष नहीं आवेगा और जिसमें संतोष नहीं तो फिर ऊ क्या काम-धाम, रोजी रोजगार, पढ़ाई -लिखाई करेगा। पेट भर भी जावेगा तो मन लुलुआता रहेगा।
-एक होता है कि परसन दे देकर मनुहार करते हैं कि आधा और ले लो, एक कौर और खाने से कुछ नहीं होगा और एक होता है कि थारी -प्लेट देखके ही खवैया को लगे कि बहुत मनुहार से परोसा गया है। ई सब बात एक दिन का नहीं है,इसमें लगे रहना पड़ता है। जो खिलाने वाला, खवैया में तृप्ति नहीं जगा सका, उसका सब करा-धरा पानी समझो। अइसे थोड़े ही कहा जाता है -जहाँ भाव नहीं, वहाँ भात क्या!
विनीत के किचन को में दो बार देखने का मौका हमको भी मिला। अलग-अलग ठिकानों पर। बड़े उत्साह से दिखाया है विनीत ने अपना किचन। मनुहार से परोसकर कुछ खिलाया भी। बनाई हुई चीजों के बारे में बताया भी है। 'बैचलर्स किचन' पढ़ते हुए वो सब याद आया।
'बैचलर्स किचन' में विनीत ने अपने बचपन से आजतक की तमाम यादें साझा की हैं। आगे अगर कभी आत्मकथा जैसा कुछ लिखना होगा विनीत को तो 'बैचलर्स किचन' उसका जरूरी हिस्सा होगा।
'बैचलर्स किचन' में विनीत ने अपनी माँ और पिताजी से जुड़ी यादें साझा करते हुए उन यादों को शामिल नहीं किया है जो वे पहले लिख चुके हैं। उनमें से जुड़ी कुछ पोस्ट्स मुझे उनके शीर्षक से याद हैं। उनमें से एक है 'और दीयाबरनी से प्यार हो जाता'। 2009 में दीपावली के मौके पर लिखी इस पोस्ट (लिंक टिप्पणी में) की शुरुआत करते हुए विनीत में लिखा था :
"दीवाली के मौके पर मां मेरे लिए खास तौर से दीयाबरनी खरीदती। आपको शायद ये शब्द ही नया लगे लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं है। एक ऐसी लड़की जो दीया बारने यानी जलाने का काम करती है,जो पूरी दुनिया को रौशन करती है। प्रतीक के तौर पर उसके सिर पर तीन दीये होते और जिसे कि रात में रुई की बाती,तीसी का तेल डालकर हम जलाते। मां के शब्दों में कहें तो हमारी बहू भी बिल्कुल ऐसी ही होगी जो कि पूरी दुनिया को रौशन करेगी। आज मां दीयाबरनी खरीदे तो जरुर पूछूंगा कि कि क्या माथे पर दीया लादकर पूरी दुनिया को रौशन करने का ठेका तुम्हारी बहू ने ही ले रखी है?"
इस पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए Manisha Pandey ने टिप्पणी की थी :
"बहुत सुंदर विनीत। वो तो बचपन के खेल थे। अब असली वाली दियाबरनी कब ला रहे हो। और हां, ये लड़कियों से प्यार करने की आदत ठीक नहीं है। सिर्फ लड़की से प्यार करो। एक लड़की से। समझे... लखैरा....🙂 "
विनीत की दियाबरनी की खोज अगर मुकम्मल हो गई होती तो इस किताब का शीर्षक शायद 'बैचलर्स किचन ' जगह 'साझे की रसोई' होता।
रोचक, पठनीय, अनूठे अंदाज में लिखी इस किताब में तमाम देशज शब्द हैं। संभव है कोई पाठक इनका सटीक न निकाल पाये लेकिन उनके प्रयोग करने के अंदाज़ से उनका सार समझ में आ जाता है।
किताब की छपाई सुंदर है और हर अध्याय की शुरुआत में बनाये रेखाचित्र प्यारे हैं। प्रूफ की गलतियाँ अगर कहीं होंगी भी तो हमको नज़र नहीं आईं।
घर में माँ की रसोई में विनीत ने रसोई के पाठ कम सीखे जीवन के पाठ ज़्यादा पढ़े। उन्हीं के बदौलत घर से बाहर निकलने पर विनीत ने 'भात तक नहीं पकाना आता' का उलाहना सुनने के बाद ख़ुद खाना पकाना शुरू किया। जिस काम का ककहरा न आता तो उसमें मास्टरी जैसी हासिल करने की प्यारी दस्तान है विनीत की किताब 'बैचलर्स किचन।'
किताब का नाम : बैचलर्स किचन
लेखक : विनीत कुमार
प्रकाशक : अनबाउंड स्क्रिप्ट
पेज : 222
कीमत : 299 रुपये
ख़रीद का लिंक : टिप्पणी में
https://www.facebook.com/share/p/1Foi6sQeUr/

Wednesday, March 04, 2026

होली के टाइटल


 होली के मौके पर टाइटल देने की परम्परा है। टाइटल के बहाने मौज लेने का रिवाज। इस बार अभी तक Arvind Tiwari जी, Subhash Chander जी और Arun Arnaw Khare जी ने टाइटल दिए हैं। सौ के क़रीब लोगों नाम याद रखना, उनके लिए सटीक टाइटिल सोचना और लिखना बड़ी मेहनत का काम है। इसके लिए अरविंद तिवारी जी, सुभाष चंदर जी और अरुण अर्णव खरे जी बधाई के हकदार हैं।

अरविंद तिवारी जी ने टाइटल देने के अपनी पोस्ट में टाइटल देने के अलावा कुछ वीआईपी टाइटिल अपने जनसंदेश वाले लेख में भी दिए हैं। तीन लोगों द्वारा दिए टाइटल में व्यंग्य से जुड़े लगभग सभी लोगों के लिए टाइटल की व्यवस्था की गई है। जिनको अपना टाइटल न दिखे वो अपने लिए टाइटल की माँग कर सकता है।
मुझे अभी तक ये टाइटल मिले हैं :
1. चार दिन की यात्रा, अस्सी पोस्ट
(अरविंद तिवारी जी द्वारा दिया टाइटल)
2. नुक्कड़ पर साइकिल
(सुभाष चंदर जी द्वारा दिया टाइटल)
3. चलते चलते सड़क पर, काटें खूब बबाल,
खाते में दर्ज हैं सैंकड़ों, सूरज की मिस कॉल।
(अरुण अर्णव खरे जी द्वारा दिया टाइटल)
और टाइटल किसी ने दिए होंगे तो उनको भी लगा देगें। आप बताइए कि इनमें मेरे लिए सबसे सटीक टाइटल आपको कौन सा लगा। आप अगर लिए कोई टाइटल सोचते हैं तो वो भी बतायें। हम उन टाइटल को पोस्ट में अपडेट कर देंगे। धन्यवाद अग्रिम दे रहे हैं।
यहाँ फ़ोटो अभी तक मिले टाइटल के भाव मिलाकर बनाया गया है। बताइए कैसा लगा?
आप सभी को सपरिवार होली की शुभकामनाएँ।
टाइटल अपडेट :
1. पहिया, प्रवासी और पंचायती- Pankaj Sharma
2. कलम रुकी नहीं,
राहों में कितने हुए बबाल
सांझ ढले देखा तो पडी थी
सूरज की मिस्ड कॉल.... -Anamika Soni
3. टहलते, घूमते, बतियाते, जगे जब सुबह की धूप।
फोटो भी खींचते, लिखते तो हैं ही खूब "अनूप"।
-@राम सागर
4. फुर्सतिया को अभी फुर्सत नहीं- Nirupma Ashok
5. दुनिया देखो मेरी नजर से- Ashok Verma
6. फुरसतिया अपडेट हुये टू कट्टा कानपुरी,
नाप लेंगे पूरा देश करके सायकलहि की सवारी।
7. दुनिया के तिराहे पर आई सूरज की मिस्ड कॉल
साइकिल के पहिए चल पड़े जाने किस ठौर।।
- डॉक्टर Manisha Verma
8. व्यंग्यकार, व्यंग्य लाया!
श्रोताओं और पाठकों की तलाश में!

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