Tuesday, April 15, 2025

होटल में पानी में कूदे- छपाक



 


गैले के क़िले से निकलते-निकलते रात शुरू हो गई थी। हम लोग होटल लाया बीच सुबह छोड़ आए थे। अगला ठिकाना नए होटल में था- होटल लाँग बीच।

रात क़रीब आठ बजे हम लोग होटल पहुँचे। बस से सामान उतरवाया गया। सारे सामान लाबी में लाबी में रखकर होटल लोग अपने-अपने कमरे की तरफ़ जाने लगे। हमारा सामान हमारे कमरे में पहुँच चुका था। हमको भी कमरे में पहुँचना था।
कमरे में पहुँचने से पहले सोचा कि काउंटर से इंटरनेट का वाई-फ़ाई का पासवर्ड ले लिया जाए। बैग हाथ में था। बैग में लैपटाप, चार्जर, मोबाइल और कुछ और काग़ज़ थे। पहले भी कई बार होटल के गेट से काउंटर पर आना-जाना हो चुका था। इस बार भी हुआ लेकिन अलग तरह से हुआ।
हुआ यह कि मुख्य द्वार से काउंटर तक की दूरी तक कई खम्भे थे। हर बार हम खंभों की दाईं तरफ़ से होते हुए काउंटर तक गए। इस बार उधर कुछ लोग खड़े थे। सो हम लपककर बाईं तरफ़ से काउंटर की तरफ़ बढ़े। उधर से काउंटर थोड़ा नज़दीक भी लगा।
लेकिन हम जैसे ही खम्भे की बाईं ओर से होकर आगे बढ़े वैसे ही 'छपाक' की आवाज़ हुई। जब तक हम कुछ समझें तक तक पता चला हम घुटनों तक पानी में थे। बैग और मोबाइल हाथ से छूटा तो नहीं लेकिन पानी में फ़ौरन नहा गया। पता चला कि खम्भे के बग़ल में एक कम गहराई का तालाब था। लेकिन वहाँ कोई रोशनी नहीं थी। इसलिए हमको दिखा नहीं। पानी के ऊपर पाँव रखते ही गुरुत्वाकर्षण के नियम का सम्मान करते हुए हम पानी में धँस गए।
हालाँकि पानी गहरा नहीं था लेकिन तलहटी में पूरा कीचड़ था। उसने हमारे जूते को गले लगाकर स्वागत किया। कपड़े भी भीग ही गए। हालांकि नीचे गिरते ही हम फ़ौरन ऊपर आ गये। बैग और मोबाइल को पोंछा। पानी दोनों के अंदर नहीं गया था लेकिन हमको लगा कि क्या पता मोबाइल का मदरबोर्ड ख़राब हो गया हो। लेकिन बाद में पता चला ऐसा कुछ हुआ नहीं।
शरमाते हुए पानी से बाहर आकर हमने काउंटर पर सलाह दी कि गेट के पास तालाब है तो वहाँ रोशनी का इंतज़ाम तो करना चाहिए। काउंटर वाले ने चुपचाप सुन ली मेरी सलाह। कोई कनपुरिया होता तो पलट के कहता -"रोशनी के इंतज़ाम तो हो जाएगा लेकिन आपको भी देखकर चलना चाहिए।" कानपुर में अपनी गलती मानने की ग़लत रिवाज नहीं है।
कमरे में पहुँचकर कपड़े बदले। कोई चोट न लगने का साइड इफ़ेक्ट यह हुआ कि अगले कई दिनों तक पानी में गिरने से लगे कीचड़ की बदबू की शिकायत कई दिन तक होती रही। देखकर न चलने का इल्ज़ाम लगता रहा सो अलग- "देखकर चलते नहीं , ध्यान तो मोबाइल में रहता है" घराने के मुफ़्त उलाहनों का जुगाड़ हो गया।
अगले दिन सुबह सूरज की रोशनी में तालाब की स्थिति , वहाँ रोशनी जरुरत आदि बताते हुए हमने पूरी कोशिश की हमारी गलती न मानी जाए। लेकिन लापरवाही के जो इल्ज़ाम लग चुके थे उनमें कोई कटौती नहीं हुई।
सुबह देखने पर यह भी पता चला कि पानी में कीचड़ के साथ मछलियाँ भी थीं। रात के समय उनकी नींद में भी ख़लल पड़ा होगा। अचानक पानी में हलचल मचने से इधर-उधर हुईं होंगी। क्या पता उनके अख़बारों में खबर छपी हो -"हमारे इलाक़े में बाहरी हमला।" हो सकता है उनके सोशल मीडिया में मीम्स वग़ैरह बनें हों। किसी ने ट्विट किया हो -"संकट की घड़ी में हम सब साथ हैं।" रात का तो पता नहीं लेकिन सुबह सारी मछलियाँ रात के हादसे को भूलकर मज़े से पानी में तैर रहीं थीं। ।
होटल में पानी में गिरने से हमको कभी अपने ब्लाग फ़ुरसतिया पर गयी तुकबंदी याद आ गई -"मेढक ने पानी में कूदा,छ्पाऽऽऽक।" (तुकबंदी पढ़ने के लिए पोस्ट का लिंक टिप्पणी में )
नहा-धोकर खाने के लिए हम होटल के हाल में पहुँचे। बड़े से हाल में लगी कुर्सी-मेज़ें देखकर लगा किसी कालेज के मेस हाल में आ गए हैं। वेज-नानवेज दोनों तरह का खाना लगा था वहाँ। होटल का आर्केस्टा भी मौजूद था हाल में। गायक लोगों की फरमाइश पर गाने गा रहे थे।
हम लोगों की रुचि गाना सुनने में कम खाने में ज़्यादा थी। वैसे भी गाने या तो स्थानीय भाषा में गाए जा रहे थे या फिर अंग्रेज़ी में। गाने वालों के लहजे के कारण दोनों ही हम लोगों को समान रूप से समझ में नहीं आ रहे थे।
सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक ही बग़ल की टेबल के एक बुजुर्ग खाना परोसने वाले पर चिल्लाने लगे। पहले शायद सिंहली में, फिर अंग्रेज़ी में। इसके बाद सिंहली और अंग्रेज़ी में दोनों में। वेटर ने अपनी सफ़ाई में कुछ कहना शुरू किया तो उन्होंने उस पर निख़ालिश अंग्रेज़ी में हमला कर दिया। वेटर बेचारा चुप हो गया। थोड़ी देर में बुज़ुर्गवार की सारी अंग्रेज़ी खर्च हो गयी और वे चुप हो गए। वेटर चुपचाप दूसरी टेबल पर चला गया। बुज़ुर्गवार को भी उनके साथ के लोग उनकी मिज़ाजपुर्सी सरीखी करते हुए ले गये।
हम लोग भी खाना-पीना निपटाकर कमरे में आ गए।
कमरे में आने पर पता पता चला कि जो स्विच वहाँ दिए थे वे लग तो अपने यहाँ जैसे ही रहे थे लेकिन मोबाइल का चार्जर उनमें घुस नहीं रहा था। यह समस्या श्रीलंका में कई जगह आई। होटल से चार्जर का एडाप्टर लाए। मोबाइल चार्जिंग पर लगाया। वाई-फ़ाई पहले ही कनेक्ट हो चुका था। थोड़ी देर में हम मोबाइल देखते-देखते निद्रागति को प्राप्त हुए।
होटल समुद्र के पास ही था। रात भर समुद्र की लहरें गरजते हुए अपने होने का एहसास करातीं रहीं।

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