Monday, April 21, 2025

गाली की बात

 अनुराग कश्यप द्वारा ब्राह्मणों को गाली देने का मुद्दा बहुत गरम है आजकल। गाली की बात से श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'राग दरबारी' का यह प्रसंग याद आ गया:

"कड़कते हुए वे (वैद्य जी) बोले ,"और यह रुप्पन ! यह मूर्ख है ! पशु है ! पतित है ! विश्वासघाती है!
वे इसी तरह बोलते रहे और इस प्रसंग में साबित करते रहे कि गालियों के मामले में संस्कृत भी कोई कमजोर भाषा नहीं है।"
अगर अनुराग कश्यप अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के लिए संस्कृत का उपयोग करते तो शायद उनकी इतनी निंदा न होती। सम्भव है उनको कुछ लोग सम्मानित भी करते यह कहकर कि देवभाषा के प्रसार के लिए कितना अच्छा काम किया है।
लेकिन अनुराग कश्यप का हाथ संस्कृत में तंग होगा। उनको यह भी लगा होगा कि ऐसी भाषा में से क्या फ़ायदा जिसको कहने वाला और सुनने वाला न समझे। संस्कृत तो पूजा करने की और इसकी प्राचीनता और वैज्ञानिकता पर गर्व करने की भाषा बन कर रह गयी है।
शायद अनुराग कश्यप का बयान मुस्ताक अहमद युसुफ़ी साहब के इस डायलाग से प्रेरित होगा :
"गाली, गिन्ती, सरगोशी (कानाफूसी, चुगली या बुराई) और गंदा लतीफ़ा तो सिर्फ़ अपनी मादरी ज़बान में ही मज़ा देता है।"
अनुराग कश्यप ने अपना गुस्सा मादरी ज़बान में व्यक्त कर दिया। अगर कोई बात फँसती है तो अपना दोष युसुफ़ी साहब पर डाल सकते हैं। पैदाइसी हिंदुस्तानी होने के नाते युसुफ़ी साहब हमारे भी बुजुर्ग हैं। इतना तोहमत तो उन पर डाली ही जा सकती है।
कुछ लोगों ने अनुराग कश्यप को जैसे का तैसा की तर्ज़ पर अपना गालियों का पूरा स्टाक ख़ाली कर दिया है। किसी ने तो अनुराग कश्यप का मुँह काला करने वाले के एक लाख रुपए का इनाम तक घोषित किया है। उस समूह ने यह नहीं बताया है कि कालिख का खर्च कौन देगा?
मुँह काला करने पर इनाम वाली घोषणा को लपक कर सरकार दावा कर सकती है कि उसके कार्यकाल में लोगों की सम्पन्नता में इतनी बढ़ोत्तरी हुई है कि "बामन को धन केवल भिक्षा" वाले समुदाय के लोग तक लखटकिया इनाम घोषित करने की स्थित में पहुँच गए हैं।
किसी भी सभ्य समाज में गाली देना ख़राब बात है लेकिन अपने देश के तमाम इलाक़ों में गाँव-घरों में गाली-गलौज बड़ी आम बात है। तमाम लोग अपनी माँ-बहन-बेटियों के सामने मां-बहन की गालियाँ देते रहते हैं। अनुराग कश्यप के किसी क्षोभ के कारण की गयी प्रतिक्रिया को देखकर उनको धमकी देना, उनके घर वालों को कोसना, उनका मुँह काला करने का आह्वान करना बताता है कि हमारे अंदर ग़ुस्सा कितना बढ़ता जा रहा है। हम कितनी जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं।
अनुराग कश्यप के बयान पर उनके घर वालों को धमकी देना तो इसी तरह है मानों किसी माफिया को सजा देने के लिए उसके घर वालों का मकान ज़मींदोज़ कर दिया जाए।
सोशल मीडिया में इस खबर का दो दिन तक छाए रहना यह भी बताता है कि हम कितने खलिहर समाज के लोग हैं। अनुराग कश्यप की ग़लत बात पर अनुराग कश्यप की तरह हरकत करना उचित नहीं है।
अनुराग कश्यप से यही कहना है कि उनको गर्मी के मौसम में पानी खूब पीना चाहिए। पानी पीने से मन शांत रहता है।
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