फ़ेसबुक पर कुछ लोग इतने ग़ुस्से में दिखते हैं कि उनकी पोस्ट पढ़ते हुए सहम जाता हूँ। कभी कभी किसी पोस्ट पर इतनी हड़काऊ टिप्पणियाँ आती हैं कि उनको दुबारा पढ़ते हुए डर लगता है। ऐसी टिप्पणी करने वाले अधिकतर लोगों के प्रोफ़ाइल बंद होते हैं।
जिन पोस्ट्स में धर्म आधारित मसले होते हैं उनमें यदि कोई अल्पसंख्यक समुदाय के पक्ष में अपने तर्क रखता है तो अक्सर बहुसंख्यक समुदाय के कुछ लोग इतनी ग़ुस्से से भरी टिप्पणी करते हैं कि लगता है सामने होते तो पीट ही देते।
ऐसे धर्म के नुमाइंदे अपने धर्म के उदार मूल्यों को एकदम से भूल जाते हैं। "उदारचरितानाम वसुधैव च कुटुमबकम" को अपने जीवन से एकदम से ख़ारिज कर देते हैं।
हाल यह है कि अब तो यह देख कर ताज्जुब भी नहीं होता कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ग़ैर संवैधानिक बातें धड़ल्ले से कहते दिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट संविधान प्रदत्त अधिकार के तहत वक़्फ़ बोर्ड के क़ानून की समीक्षा करते हुए कुछ सवाल पूछता है उसको देश के मंत्री और उपमहामहिम सुप्रीम कोर्ट द्वारा कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण बताते हैं। मासूम सी शक्ल वाले भाई साहब इतनी ऊलजलूल हरकतें करते हैं कि ताज्जुब होता है देखकर कि कैसे लोग हमारे देश के उच्च पदों पर विराजमान हैं।
तमाम पढ़े-लिखे, ज़िम्मेदार पदों पर काम कर चुके लोग इतनी बचकानी, घृणित, शर्मनाक बातें लिखते हैं कि उनकी सोच देखकर ताज्जुब होता है। यह कल्पना भयावह लगती है कि उनके अधीन दूसरे धर्म के लोग कैसे काम करते होंगे।
लोग इतना ग़ुस्से में हैं कि अपने आदर्श की छाती की नाप फिर से करने लगते हैं। उनको लगता है कि हमारा आराध्य हमारे ग़ुस्से के अनुसार काम क्यों नहीं कर रहा है। अपना आराध्य तक बदलने की बात करने लगते हैं, ऐसा आराध्य जो उनके ग़ुस्से को बेकार न जाने दे।
वक़्फ़ बोर्ड क़ानून पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सवाल पूछे। उसपर इतना ग़ुस्सा हैं कुछ लोग कि उनकी अपनी कोई अदालत होती तो माननीय सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ ही मुक़दमा कर देते। अवमानना का नोटिस जारी कर देते।
अल्पसंख्यक समुदाय से घृणा करने वाले, उनके बारे में नकारात्मक धारणायें बनाने वाले लोगों में शायद ही कोई उनके साथ कभी रहे हों। शायद ही कभी उनके साथ उनकी दोस्ती रही होगी, मिलना-जुलना, उठना -बैठना रहा हो। अगर रहा होता तो शायद इतना भ्रम नहीं होता एक-दूसरे के बारे में।
आज दुनिया में कट्टरता इतनी हावी है कि उदार, उदात्त, सहज मानवीय मूल्यों की वकालत करने वाले लोगों को देश, दुनिया और समाज का दुश्मन साबित किया जा रहा है। हो भी जा रहा है। पूरा तंत्र सा लगा है इस काम में।
इसका कारण शायद यह भी है ऐसे कट्टरपंथी लोग चिंदीचोरी करके, झूठे वादे करके, भ्रम फैलाकर ताकत में आए हैं। नकारात्मक मूल्यों की स्थापना करके उनके काम बनाते हैं तो उनके प्रसार में लगे रहते हैं।
संविधान के नाम पर शपथ लेकर काम करने करने वाले आए दिन ग़ैर संवैधानिक हरकतें करते हैं। भाषण देते हैं। लोगों को भ्रमित करते हैं। लोग होते भी हैं।
आज देश में किसी भी समुदाय में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी बातें लोग इस कारण सुनते हैं कि वह क़ायदे की बात करता है। धर्मपाल अवस्थी जी की एक कविता याद आती है जिसमें नेताओं को 'औना-पौना-बौना' बताया गया था।
हम जिस भी देश, समाज, धर्म, जाति, समुदाय में पैदा हुए हैं, पले, बढ़े हैं वह सिर्फ़ संयोग है। हम राणा के वंशज हैं या औरंगज़ेब के यह भी संयोग है। अपने संयोग पर गर्व करके और दूसरे के संयोग को नीची नज़र से देखना अपने में बेवकूफ़ी है। किसी भी देश, धर्म, जाति, समुदाय का व्यक्ति होने से पहले हम इंसान हैं। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
इंसानियत की बात से साथ साल पहले भोपाल में हुई बेगसाहब का हुई मुलाकात का क़िस्सा याद आ गया। उन्होंने कहा था :
"'सबसे बड़ा रिश्ता इंसानियत का होता है।' यह बात तो तमाम लोग कहते आये हैं। रोज इंसानियत का अंतिम संस्कार करने वाले तक इंसानियत की बात करते रहते हैं। लेकिन बेग साहब ने इसको एक उदाहरण से समझाया । बोले -' आप किसी जंगल मे अकेले फंस गए हों। जंगल का डर, हौवा आपके जेहन में हावी हो जाएगा। ऐसे में कोई इंसान आपको वहां दिख जाए तो आपका डर फौरन खत्म हो जाता है। भले ही वह आदमी गूंगा-बहरा हो। वह अपने इशारों से आपको जंगल से बाहर ले आएगा। उस समय यह फर्क नहीं पड़ता कि अगला हिन्दू है कि मुसलमान कि ईसाई।
बेग साहब अपने किस्से सुनाते हुए अपनी बात भी कहते गए। बोले -'इंसान जिन लोगों बीच रहता है उनसे ही तौर तरीका सीखता है। इसलिए अपने से अलग कोई अगर व्यवहार करता है तो यह नहीं समझना चाहिए कि वह गलत ही है। उसका नजरिया भी समझना चाहिए। '" (पोस्ट का लिंक टिप्पणी में)
इंसान और इंसानियत यह कविता भी याद आ गयी :
"इंसान कहे जाने वाले, इंसान बहुत कम मिलते हैं
पत्थर तो मंदिर-मंदिर हैं, भगवान बहुत कम मिलते हैं।"
विडम्बना है कि दुनिया की बढ़ती आबादी में इंसानों की संख्या कम होती जा रही है।
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