हर जगह का बाजार का हिसाब अलग-अलग होता है। कानपुर में नीबू, खीरा, केला आदि गिनती के हिसाब से मिलते हैं। दिल्ली/NCR में तौल के भाव। कानपुर में आधा दर्जन केला, पाँच नीबू के हिसाब से ख़रीद होती है। नोयडा, दिल्ली में किलो, पाव के हिसाब से। और भी जगह तौल के हिसाब से मिलती होंगी चीजें जो कानपुर और दूसरी जगह गिनती के हिसाब से मिलती हैं।
ग्राहक और दुकानदार के बीच में तराजू एक बिचौलिये के रूप में शामिल है दिल्ली/एनसीआर में। बिना बिचौलिए के यहाँ काम नहीं होता।
क्या पता कल को और मामलों में भी तराजू घुस जाये। गिनती में गिनी जाने वाली चीजें तौल के हिसाब से गिनी जाने लगें।
क्या पता कल को इंसान की गिनती भी तौल के हिसाब से होने लगे। इंसान की क़ीमत उसके वजन के हिसाब से लगने लगे। किसी घर में पाँच वोट के तर्ज पर कहा जाये वहाँ -350 किलो वोट हैं। जिसको सबसे ज्यादा वजन के वोट मिलेंगे वह उम्मीदवार जीता हुआ कहा जाएगा। धर्मकाँटे मतदान केंद्र के रूप में प्रयोग होंगे।
यह भी हो सकता है लोगों की संपत्ति के आधार पर उनके वोट की क़ीमत आँकी जाये। जिसके पास जितना ज्यादा संपत्ति उसके वोट की उतनी ज्यादा क़ीमत। ऐसा हो तो फिर किसी दल को सरकार बनाने के लिए दुनिया भर के ताम-झाम की जरूरत नहीं होगी। देश के पचीस-तीस लोग मिल-बैठ कर सरकार बना लेंगे। देश का समय, संसाधन, पैसा बचेगा। एक दिन में चुनाव निपट जायेगा।
हालांकि हो तो अभी भी वैसा ही रहा है। लेकिन अभी दबे-छुपे तरीक़े से होता है, फिर सीधे होने लगेगा। मामला पारदर्शी हो जाएगा।
दुनिया के लगभग सभी देशों में जहाँ चुनाव होते हैं, वहाँ के पैसे वाले लोग चुनाव का नतीजा तय करते हैं। अमेरिका के हालिया चुनाव में एलन मस्क के सहयोग की चर्चा है। अमेरिका के बारे में वहीं के एक भूतपूर्व राष्ट्रपति ने कहा था -"अमेरिका में कारपोरेट सड़क चलते किसी आदमी को पकड़कर अमेरिका के लोगों से कहता है -यह तुम्हारा राष्ट्रपति है।"
अभी तो आम जनता अपने वोट से सरकार बनाती है। वोट डालने के लिए देश का नागरिक होना अनिवार्य है। नागरिकता के लिए देश में जन्म लेना अनिवार्य है या फिर नागरिकता मिलना जरूरी है।
बिहार में कुछ दिन बाद होने वाले चुनाव के लिए चुनाव आयोग मतदाता सूची को तैयार कर रहा है। 2004 के बाद पैदा हुए लोगों से जन्म प्रमाण पत्र जमा करने को कहा गया है। उनके पिता का भी जन्मप्रमाण चाहिये नागरिकता साबित करने के लिए। इसका विरोध हो रहा है अलग-अलग कारणों। लोगों का कहना है कि उनके पास जन्मप्रमाण पत्र है ही नहीं तो कहाँ से लायें?
जन्मप्रमाण पत्र की कहानी भी अनूठी है। अपने सेवा काल में हमने देखा कि पेंशन वगैरह के लिए लोग अपने परिवार के जन्म प्रमाण अलग-अलग हिसाब से बदलवा लेते। एक केस में एक पिता ने अपने बच्चे की जन्मतिथि दो-साल आगे-पीछे करवाने की अनुमति मांगी। हमको चूँकि असलियत पता थी इसलिए हमने मना कर दिया था। नाम और दूसरे विवरण भी बदलते ही रहते हैं लोग। फोटो के लिए तो लोग मजे लेते हुए कहते हैं -"हमारी शक्ल इतनी ख़राब हो गई है कि आधार कार्ड/वोटर कार्ड से मिलने लगे है।"
बिहार मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने आधार कार्ड और राशन कार्ड को नागरिकता का आधार मानने का सुझाव दिया है। माननीय न्यायाधीश महोदय ने कहा -"ये कागज तो हमारे पास भी नहीं है।"
लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय का सुझाव चुनाव आयोग मानता है या नहीं यह अभी पता नहीं है। माननीय उच्चतम न्यायालय का सुझाव दफ़्तरी भाषा में कोई पत्र "जारी करने के पहले/बाद में देखना चाहें" घराने का है। अब यह देखने वाले पर निर्भर है कि वह इस पर क्या रूख अपनाता है।
चुनाव आयोग क्या निर्णय लेता है , इसका बिहार के चुनाव पर क्या असर पड़ता है यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन अगर एक बड़ी आबादी कागजी कार्यवाही के कारण वोट डालने से वंचित रह गई तो इसका गंभीर परिणाम हो सकता है।
इसी सिलसिले में मुझे अपने पढ़ाई के दिनों का एक क़िस्सा याद आता है। हम लोग बीएचयू में पढ़ते थे। एम टेक में हम लोगों को स्कालरशिप मिलती थी। एक बार मिलने में देरी हुई। हम बार -बार पूछताछ करते थे, जबाब नहीं मिलता था।
एक दिन हम लोग दफ़्तर में संबंधित बाबू के पास गए। पूछा। बाबू ने झुँझलाकर थोड़ा ऊँची आवाज़ में कहा -"हम तुम्हारे नौकर नहीं है।"
यह सुनते ही हमारे साथी यादव जी का पारा हाई हो गया। उन्होंने बाबू से दोगुनी ऊँची आवाज में कहा -" सुनो, तुम हमारे नौकर हो और सामने जो HOD बैठे हैं वो भी हमारे नौकर हैं।"
अपनी बात को समझाते हुए यादव जी ने आगे कहा -"हम लोग यहाँ इस लिए नहीं पढ़ने आते हैं कि तुम लोग यहाँ नौकरी करते हो। तुमको नौकरी यहाँ इसलिए मिली है क्योंकि हम यहाँ पढ़ने आते हैं।"
ऊँची आवाज़ में यादव जी की कही यह बात सामने कमरे में बैठे विभागाध्यक्ष महोदय ने सुनी या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन यह जरूर हुआ कि हमारी स्कालरशिप अगले दिन हमारे खाते में आ गई।
यह घटना करीब 39 साल पुरानी है। यादव जी और हम भी पढ़ाई करके और अपनी-अपनी नौकरी करके रिटायर हो चुके हैं। लेकिन यादव जी की कही बात हमको अभी आज सुनी लगती है। अपने क़रीब 36 साल के सेवा काल में लोगों से जुड़े निर्णय लेते समय हमेशा याद रही कि हमारी नौकरी लोगों की सेवा के लिए है।
चुनाव आयोग और किसी भी सरकार को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे जनता के लिए हैं, जनता उनके नहीं है। भारत का संविधान भी यही कहता है -"हम भारत के लोग।"
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