Tuesday, July 29, 2025

जैसे उनके दिन बहुरे


 कई दिनों से आमिर खान की 'सितारे जमीं पर' देखने का मन था। कल सुबह टिकट खरीदी। आन लाइन। 1055 का शो। पास के मॉल के पीवीआर में।

नाश्ता करके मॉल पहुंचे। मॉल अभी खुला नहीं था। लोग बाहर इंतजार कर रहे थे। लेकिन सिनेमा देखने वालों के टिकट देखकर उनको अंदर जाने दिया जा रहा था। हम भी टिकट दिखाकर अंदर पहुंचे।
अंदर सिनेमा हाल के अंदर जाने के लिए फिर टिकट देखा गया। काउंटर पर मौजूद बच्ची ने टिकट देखकर कहा -"आपका टिकट तो रात 1055 का है।"
ऐसा हमारे साथ पहले भी एकाध बार हो चुका है। नजीततन कोई भी टिकट बुक करते समय दिन, तारीख़, महीना ग़लत हो जाने की आशंका इतनी ज़्यादा रहती है कि टिकट बुक करने के फौरन बाद लगता है कि कुछ गड़बड़ हो गई है । यह आशंका टिकट का उपयोग हो जाने तक बनी रहती है।
अब टिकट हमने ख़ुद ख़रीदा था इसलिए किसी दूसरे को दोष भी नहीं दे सकते थे । हमने यह सोचकर अपने को संभाला कि बड़े-बड़े लोगों से इस तरह की चूक हो जाती है। आपदा में अवसर शायद इसी को कहते हैं। अपनी गलती पर ख़ुद को बड़ा मान लिया।
मॉल में 12 सिनेमा हाल हैं। सोचा आए हैं तो सिनेमा देख ही लें। रास्ते में सोच रहे थे कि 'सैयारा' भी देखनी है । आजकल इसके भी बड़े चर्चे हैं। सुना है कि युवा पीढ़ी इसको देखकर बहुत रो-धो रही है। बहुत रील्स बन रहे हैं इसका मजाक उड़ाते हुए।
पता चला कि कुछ देर बाद का शो था सैयारा का । ख़रीद लिया टिकट। घुस गए पिक्चर देखने। सिनेमा हाल चौथाई भरा था।
सैयारा में युवा पीढ़ी के प्रेम की कहानी है। बालीवुड को प्रेमी हीरो लफ़ंडर दिखाने का शौक है। बिना हेलमेट के चलता है हीरो, गुस्सैल है, जरा-जरा सी बात पर मारपीट कर लेता है। लेकिन हीरोइन से अच्छे से बात करता है। हीरोइन फ़िदा हो जाती है। प्रेम कहानी आगे बढ़ती है। हीरोइन के लिखे गाने गाकर हीरो स्टार हो जाता है।
हीरो के स्टार बनने के बाद कहानी में ट्विस्ट आता है। हीरोइन को भूलने की बीमारी का पता चलता है। इसके बाद हीरो अपने प्रेम का मुजाहिरा करता है। हीरोइन का ख्याल रखता है। लेकिन हीरोइन उसे छोड़कर चली जाती है ताकि हीरो के स्टार बनने के रास्ते में बाधा न बने।
हीरो नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे हीरोईन को खोजता है। वह नहीं मिलती।फिर हीरो को ध्यान आता है कि हीरोइन ने एक गाना लिखकर कहा था -"इसे सुनते ही प्रेमी दुनिया में कहीं भी होगा, भागता आयेगा।"
हीरो उस गाने को लंदन में गाता है। हीरोइन उस गाने को मनाली में दोहराते हुए दिखती है। हीरो अपना शो छोड़कर मनाली आता है। दोनों मिलते हैं। कहानी पूरी होती है। हम सत्यनारायण कथा की तरह सोचते हुए बाहर निकलते हैं -"जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके बहुरें।"
जैसा हल्ला है इस फ़िल्म के बारे में तो इसे देखकर न तो बोर हुए , न ही आँसू आए। तसल्ली से पूरी फ़िल्म देखी। जो बातें जो अच्छी लगीं :
-फ़िल्म में नायक , नायिका के साथ किया वादा हमेशा निभाता है। उसका साथ नहीं छोड़ता।
- कठिन से कठिन परिस्थिति में 'अभी कुछ पल बाकी हैं' वाला भाव बना रहा है। यह हमें अपने सूत्र वाक्य -'सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है' के अनुरूप लगा।
-हीरो जब हीरोइन से कहता है -" तुम सब कुछ भूल जाओगी तुम्हें कुछ याद नहीं रहेगा तब हम नयी यादें गढ़ेंगे। तुम एक भूलोगी , हम दस यादें गढ़ेंगे। दस भूलोगी, हम सौ, हज़ार यादें गढ़ेंगे।" हीरो का कहा हुआ यह डायलाग मुझे इस फ़िल्म का सबसे अच्छा हिस्सा लगा।
सबेरे की फ़िल्म देखने के बाद रात को खाना खाकर सुबह की गलती से बुक की गई पिक्चर 'सितारे जमीं पर' देखने गए। पूरे सिनेमा हाल में हम 'पति-पत्नी' केवल दो लोग थे। काफ़ी देर तक सोचते रहे और लोग आयेंगे, लेकिन कोई आया नहीं।
'सितारे जमीं पर' अलग तरह के उन बच्चों के ऊपर बनाई फ़िल्म है जो उम्र के लिहाज से तो बड़े हो जाते हैं लेकिन दिमाग़ी तौर पर सामान्य तरह से बड़े नहीं होते। अलग तरह से विकसित होते हैं। आमिर ख़ान ऐसे बच्चों को बालीबॉल की कोचिंग देते हैं। टीम शून्य से शुरुआत करके फ़ाइनल तक पहुँचती है। हार जाने के बाद भी टीम के खिलाड़ी विजेता टीम के साथ ख़ुशियाँ साझा करते हैं। यह देखकर आमिर ख़ान कहते हैं -"इनको हम सिखा नहीं रहे, इनसे हम सीख रहे हैं।"
पिक्चर अच्छी है लेकिन आमिर खान की ही फ़िल्म "तारें जमीं पर " जितनी अच्छी नहीं लगी मुझे।
आजकल फ़िल्मों में समाज की रूढ़ियों के विपरीत बुजुर्गों के बड़ी उम्र के प्यार को सहमति देते हुए सीन दिखते हैं। 'सितारे जमीं पर' में हीरो की माँ बुज़ुर्गियत में साथी खोजती है और इसके लिए उनको पछतावा नहीं है। ऐसे ही 'आप जैसा कोई' में भी हीरो की बड़ी उम्र की भाभी अपने पति से अलग दूसरे इंसान में अपना साथी खोजती हैं जिसे उसकी बेटी भी समर्थन देती है।
सिनेमा हाल में एक ही दिन में दो फ़िल्में देखने का पहला अनुभव रहा यह। दो फिल्मों के बीच में एक रोचक किस्सा भी हुआ। उसे सुनने के लिए थोड़ा फ़्लैश बैक में चलना होगा।
हुआ यह कि सुबह वाली फ़िल्म को देखकर लौटने के बाद खा-पीकर आराम किया। शाम को टहलने गए। रात की फ़िल्म को देखने के लिए तैयार होते हुए दूसरा मोबाइल जेब में रखने की सोची तो वो मिला नहीं। रिंग किया, घंटी बजी लेकिन घर में आवाज सुनाई नहीं दी। लगा सुबह कहीं छूट गया।
सुबह जहाँ-जहाँ गए थे, वहाँ-वहाँ की याद की। ज्यादातर जगहें मॉल में ही थीं। जल्दी-जल्दी गए मॉल। रास्ते में कैब वाले को फ़ोन करके उससे भी पूछा लिया। एक दुकान गए थे उसको भी खड़खड़ा दिया। दुकान बंद हो गई थी। दुकान वाले को बताया तो उसने कहा सुबह देख लेंगे।
मॉल पहुंचकर उस बंद दुकान के बाहर खड़े होकर फ़ोन बजाया यह सोचते हुए कि अगर मोबाइल होगा वहाँ तो चमकेगा । नहीं चमका। सिक्योरिटी वाले को बताया तो उसने परमिशन लेकर उन दुकानों के वीडियो मुझे दिखाये जिन पर सुबह हम गए, चाय-पानी के लिए। उनमें कहीं मेरा दूसरा मोबाइल नहीं दिखा।
सबेरे जिस सिनेमा हाल में पिक्चर देखी थी उसमें भी घुस गए। जिन सीटों पर हम बैठे थे उसपर दूसरा जोड़ा बैठा था। वही पिक्चर चल रही थी (सैयारा) जिसे हमने सुबह देखा था। जोड़े को डिस्टर्ब करके मोबाइल खोजा , मिला नहीं।
इस बीच हम और हमारी श्रीमती जी दूसरे खोए मोबाइल पर फ़ोन किए जा रहे थे। उस मोबाइल का नंबर बेटे के नाम सेव था। गलती से उसके नंबर पर भी कॉल हो गई। 14000 किलोमीटर दूर घंटी बजते ही बेटे ने फौरन फ़ोन उठाया। हमने फौरन कहा -"गलती से कॉल लग गई।" मतलब मोबाइल का खोना ऐसा हुआ कि बेटे को कहा जाये -"गलती से कॉल लग गई।" बेटे को फ़ोन गुम होने के बारे में नहीं बताया। बताते तो चिंता में वह भी शामिल हो जाता।
इस मौके का फायदा उठाते हुए श्रीमती जी ने मोबाइल खोज अभियान में पहले तो पूरा सहयोग दिया। लेकिन जैसे-जैसे खोज आगे बढ़ी और मोबाइल नहीं मिला वैसे-वैसे उनके रवैये में समझाईश और हमारी चूक की तरफ़ इशारा बढ़ता गया। उनका रवैया देखकर 'आपरेशन सिंदूर' में विपक्षी पार्टियों का रवैया याद आया जिन्होंने आपरेशन के दौरान पूरा समर्थन दिया सरकार को लेकिन बाद में इतने सवाल उठाए की सरकार को जबाब नहीं देते बन पड़ रहे। जबाब देने से बचने के लिए सरकार के मुखिया बाहर निकल लिए।
हमारे मामले में तो लफड़ा यह था कि सवाल पूछने वाली भी सरकार ही थी।
हम अनमने से फ़िल्म देखते रहे। जहाँ दूसरे मोबाइल की याद आती हम घंटी बजा देते। घंटी पूरी बज रही थी इससे अंदाजा लग रहा था कि मोबाइल बेचारा कहीं अकेले में अँधेरे में पड़ा ठिठुर रहा होगा। जेब में, मेज में, दराज में एम बैग में आराम से रहने वाला मोबाइल बेचारा न जाने किन अँधेरों में पड़ा होगा, सोच कर दिल काँप रहा था।
इस बीच हमारे मोबाइल की बैटरी खत्म होती जा रही थी। हमारे खोए मोबाइल में भी खत्म हो रही होगी। हम यह सोचकर हलकान हो रहे थे कि सुबह तक हम अपने साथ वाला मोबाइल तो चार्ज कर लेंगे लेकिन बेचारे हमारे दूसरे मोबाइल की बैटरी खत्म हो जायेगी तो उसकी तो साँसे थम जायेंगी।
खोए हुए मोबाइल के बारे में सोचते हुए हम उन फ़ोटो, डाटा और सूचनाओं के बारे में सोच रहे थे जो उस मोबाइल में थीं और मोबाइल न मिलने पर वे हमेशा के लिए खो जाएँगी।
फ़िल्म देखते-देखते भी हम मोबाइल बजाते रहे। प्लान बनाते रहे कि लौटकर कहाँ-कहाँ खोजेंगे। सेक्योरिटी वाले ने फ़ोन कर दिया था कि सुबह जल्दी आने दिया जाये मॉल में।
इंटरवल में एक बार फ़िर मोबाइल की घंटी बजाई। यह मेरे मोबाइल से पच्चीसवीं घंटी थी। इस बार मोबाइल उठा। पता लगा कि दूसरी तरफ़ हमारी कालोनी के सुरक्षा इंचार्ज थे। उन्होंने बताया कि मोबाइल कालोनी के पार्क में मिला था। शाम को टहलते समय पार्क में छूट गया था। मोबाइल मिलने के बाद हमारी लापरवाही के लिए उलाहने और हिदायतों में तेजी बढ़ गई। हमको दो दिन पहले का देखा हुआ वीडियो याद आया जिसमें पुलिस वाले एक आदमी को गिरने से बचाने के बाद उसको जमकर कूटते हैं।
'सितारे जमीं पर' में अलग तरह के लोग हारने के बाद भी मस्ती कर रहे थे , मिल-जुल कर खुश हो रहे थे। इधर मोबाइल मिल जाने के बाद सामान्य माने जाने वाले को लापरवाही के उलाहने मिल रहे थे।
लौटकर सुरक्षा गेट से अपना मोबाइल लिया। मोबाइल को दुलराया, सहलाया और प्यार से हड़काया यह कहते हुए -"तुमने तो मुझे डरा ही दिया था, बच्चा।"
मोबाइल मिलने के बाद हमने एक बार फिर से वही कहा तो 'सैयारा' में हीरो-हीरोईन के मिलने पर कहा था -"जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके बहुरें।"

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