सबेरे नीचे उतरे तो सामने ही धुली-पुछी गाड़ियाँ लाइन से खड़ी दिखीं। सभी के वाइपर तोपों के मुँह की तरह आसमान को सलामी मुद्रा में तने हुए थे। ऊपर उठे हुए वाइपर इस बात की निशानी थे कि उनकी साफ़-सफ़ाई हो चुकी है।
सड़क पर सफाई करने वाली एक युवा सफाईकर्मी बगल में सफ़ाई कर रही बीच की उमर की महिला से बतियाती दिखी। उनके बगल से गुजरते हुए मुझे सुनाई दिया -"हमको यह बात पसंद नहीं है।" क्या बात पसंद नहीं है इसका कयास आप लगाइए। हम तो आगे बढ़ गए थे।
आगे एक आदमी अपने हाथ में काग़ज़ का जहाज और दूसरे बने हुए माडल लेकर लपकते हुए गोयनका स्कूल की तरफ़ गया। शायद अपने बेटे/बेटी का प्रोजेक्ट वर्क ले जा रहा हो।
सामने से एक युवा महिला दो तंदुरुस्त कुत्तों के पट्टे हाथ में थामे आती दिखी।ऐसा लगा जैसे कोई बड़ा पूँजीपति अपने साथ दो विरोधी राजनीतिक पार्टियों को टहलाने के बाद वापस लौट रहा हो। कुत्ते महिला के पीछे भक्ति भाव से दाँत चियारते, पूंछ हिलाते चलते हुए चुपचाप बगले में घुस गए।
सड़क किनारे घरों के बाहर कई कारें खड़ी दिखीं। कुछ कारों के पिछले पहिए पर ताला लगा था। ताले कार पर लगी बेड़ी की तरह लगे। स्टेरियरिंग पर हथकड़ी पहले से ही लगी थी। उनको देखकर अमेरिका में पकड़े गए अवैध प्रवासियों का क़िस्सा याद आ गया जिनको हथकड़ी -बेड़ी में वापस भेजा गया था। कुछ दिन तो बड़ा हल्ला हुआ इसका। अभी पता नहीं क्या हाल है? अभी तो उपराष्ट्रपति के इस्तीफे का किस्सा चल रहा है।
अमेरिका की बात चली तो चलते-चलते यूट्यूब पर किस्सा सुना बतायें आपको । किस्से के अनुसार चंद्रशेखर जी देश के प्रधानमंत्री थे। अमेरिका से रात तीन बजे फ़ोन आया। समय के अंतर के कारण अमेरिका वालों को ध्यान नहीं रहा होगा। चंद्रशेखर जी के स्टाफ़ ने कहा -"साहब सो रहे हैं।" अमेरिका से बताया गया -"जगा दो साहब को। अमेरिका के राष्ट्रपति जरूरी बात करना चाहते हैं।" चंद्रशेखर जी के स्टाफ़ ने जवाब दिया -"कोई भी बोल रहे हों। साहब सो रहे हैं। हम उनको अभी नहीं जगा सकते हैं।"
बाद में राजदूत के माध्यम से संदेश भेजा गया। वे आए। बात कराई।
यह मजेदार किस्सा सुनकर चंद्रशेखर जी का एक इंटरव्यू याद आया। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था -" देश के प्रधानमंत्री के रूप में काम करते हुए तमाम दबाब होते हैं। बहुत अधिक इधर-उधर करना संभव नहीं होता।"
उनकी बात सुनते हुए अपने वर्तमान सरकार की मजबूरी का अंदाज़ लगता है। अमेरिका के राष्ट्रपति आए दिन ऊल-जलूल बयान देते रहते हैं अपने देश के ख़िलाफ़। उनको जब कुछ समझ नहीं आता कि क्या करें तब ही भारत के ख़िलाफ़ एक बयान जारी कर देते हैं। 25 बार तो भारत-पाकिस्तान के बीच सीज फायर करवाने की बात कह चुके। लेकिन अपने प्रधानमंत्री जी खुलकर कुछ नहीं कहते। अकेले में भले हड़का चुके हों। जो लोग अपेक्षा करते हैं कि अमेरिका को इसका जवाब दिया जाना चाहिए वे सरकार की चुप्पी को उसकी कमजोरी मानते हैं। वहीं प्रधानमंत्री जी के समर्थक इस तथाकथित चुप्पी को उनका मास्टर स्ट्रोक बताते होंगे।
राजनीति अनगिनत झेमेलों, झाँसो, चालबाज़ियों, कूटनीति और न जाने किन-किन पैतरों का खेल है। आजकल देश दुनिया के तमाम देशों में एक से एक नमूने, जमूरे , सिरफिरे लोग सत्ता पर काबिज हैं जिन्होंने अपने दायें-बायें करके कुर्सियों पर कब्जा कर रखा है। लोकतंत्र के मुखौटे में तानाशाह लोग। किसी भी सभ्य समाज के नैतिक मूल्यों से रहित लोग। ऐसे देशों की बहुसंख्यक जनता उनसे त्रस्त है लेकिन उसके पास कोई उपाय नहीं है सिवाय अपने ऊपर काबिज कर्णधारों को झेलने के।
आगे एक नाई की दुकान दिखी। दुकान बंद थी। कुर्सी नाई की दुकान पर रखी मेज पर औंधी रखी थी। दुकान अभी खुली नहीं थी। मेज पर रखी लकड़ी की कुर्सी देखकर मुझे अपने दोस्त मनोज अग्रवाल Manoj Agarwal की कविता याद आ गई :
"मेरे घर के सामने
हुआ करता था एक सूखा पेड़
पेड़ पर बैठता था
एक उल्लू रोज़
एक दिन
वो
पेड़ कट गया।
और उसकी लकड़ी से बनी
एक सुविधा जनक कुर्सी
अजीब इत्तफ़ाक़ है
पेड़ पर उल्लू आज भी बैठा है ।"
सड़क से टहलते हुए पार्क में आए। पार्क में टहलते हुए कई दोस्तों से बतियाये। करीब घंटे भर टहलने के बाद घर वापस आ गए। सबेरे की कुल टहलाई हुई 9319 कदम, तय की गई दूरी 6.48 किलोमीटर, समय 82 मिनट। बाकी की टहलाई शाम को होगी।
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