Saturday, August 20, 2005

फुरसतिया:कुछ बेतरतीब यादें

आज बीस अगस्त है। आज के ही दिन एक साल पहले मैंने ब्लाग लिखना शुरु किया था। रवि रतलामी के अभिव्यक्ति में छपे लेख तथा देवाशीष के ब्लाग पर उपलब्ध की बोर्ड की सहायता से जो पहली पोस्ट मैंने लिखी थी वह एक मायने में 'हायकू' पोस्ट थी।आज भी इससे भी छोटी पोस्ट लिखने का हुनर सिवाय हिंदी के आदि चिट्ठाकार आलोक के अलावा किसी को नहीं पता।शुरुआती दिनों में देवाशीष ,अतुल तथा पंकज के चिट्ठे तथा आलोक के कमेंट काफी पढ़े। देबाशीष की ये पोस्ट देखी जाये:-

याज़ाद ने अनिल के एक चिट्ठे के हवाले से हिन्दी ब्लॉग‍ गीत की बात छेड़ी। तो अपन कहां पीछे रहने वाले थे। हाजिर है कुछ ब्लॉग गीतः

ये अपने बाप्पी दा इश्टाईल में:

ब्लॉगिंग बिना चैन कहां रेSSS
कॉमेन्टिंग बिना चैन कहां रेSSS
सोना नहीं चांदी नहीं, ब्लॉग तो मिला
अरे ब्लॉगिंग कर लेSSS

..ये कुछ अल्ताफ राजा की शैली:

तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।
सुबह पहले मौके पे
नेट पे बैठ जाओगे।
तुम तो ठहरे बलॉगवाले
साथ क्या निभाओगे।

और ये जॉनी वॉकर का बयानः

जब सर पे ख्याल मंडराएं,
और बिल्कुल रहा ना जाए।
आजा प्यारे ब्लॉग के द्वारे,
काहे घबराए? काहे घबराए?

सुन सुन सुन, अरे बाबा सुन
इस ब्लॉगिंग के बड़े बड़े गुन
हर बलॉगर बन गया है पंडित
गूगल भी थर्राए।
काहे घबराए? काहे घबराए?


बहरहाल देखते-देखते कब हम इस ब्लाग मैदान में कूद गये पता ही चला। दस दिन बाद हमारे ठेलुहा महाराज भी आ गये मैदान में। कुछ इसी के आसपास ही
जीतेन्द्र ने भी अपनी दुकान खोली। हम लिखना तो शुरु कर दिये लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि लिखा क्या जाये(अभी भी हालात वैसे ही हैं)। उस समय तक स्वागत-सत्कार की ऐसी मिसाइलें नहीं दगती थीं दनादन। सो हम आपस में वाह-वाह करके मस्त थे।

फिर हमें हमारे दोस्त ने बताया कि 'काउंटर' कैसे लगता है। लगाया तो देखा कि हमारा 'ब्लाग' तो देश-विदेश में पढ़ा जा रहा है। हम तो बौरा गये अपने 'ग्लोबलाइजेशन' से।हम खुशफहमी के नशे में थे कि हमें झटका मिला एक टिप्पणी से। अश्ररग्राम पर देबाशीष ने हमारा स्वागत-सत्कार करते हुये आशा की कि हम भाषा की शालीनता का ख्याल रखेंगे। हमने अवस्थी को लिखा-देखो ये बालक क्या कह रहा है! बताओ ,मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये।अवस्थी ने कहा -छोड़ना तो बालक के साथ अन्याय होगा। न्याय की रक्षा की जानी चाहिये। तोहमने तथा अवस्थी ने अपने-अपने ब्लाग पर न्याय किया। लेख लिखा जिसमे मौज तथा खिंचाई थी। देबाशीष ने टिप्पणी लिखी तथा हम अफसोस के शिकार हुये।अगर किसी अपनी एक पोस्ट के लिखे जाने का अफसोस है मुझे तो वह यही पोस्ट है।

इसके बाद तो दनादन सारा जमा पड़ा माल बाहर आता गया।मूल रूप से मौज-मजे के अंदाज में लेखन चलता रहा। एक टिप्पणी में अतुल ने लिखा:-

आपने और जीतेंद्र भाई ने हिंदी चिठ्ठा जगत के शांत तालाब में पत्थर मारकर जो हलचल मचायी तो मजा ही आ गया|


इस बीच दनादन लोग लिख रहे थे तथा टिप्पणियां भी लिखीं जा रहीं थीं। उधर भारतीय ब्लाग मेला में हिंदी के पोस्ट के नामीनेशन शुरु हो गयेथे। किसी एक महीने में हिंदी की कुछ पोस्ट ज्यादा थीं तो अतुल कीउछलती मेल आयी-छा गई रे हिंदी छा गई। हालांकि यह खुशी कुछ दिन बाद ही गायब हो गई जब वहां लोगों ने हिंदी पोस्ट कोशामिल नहीं किया। अतुल ने अक्षरग्राम पर लेख लिखा-तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं? हालांकि लिखा अतुल ने था 'तुझे' लेकिन मुझेलग रहा था कि मिर्ची तो अतुल को लगी हैं। बहरहाल इसपर लेख लिखागया -अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है! तथा कालान्तर में चिट्ठाचर्चा
की शुरुआत की गई।

उधर अनुगूंज की शानदार शुरुआत हुई। कुछ बहुत बेहतरीन पोस्ट अनुगूंज के माध्यम से लिखींगईं। बाद में बुनो कहानी मेंभी तीन कहानियां भी लिखी गईं । कुछशिथिलता फिलहाल बुनो कहानी में चल रही है। शायद समय के साथ कुछ तेजी आये।

इस बीच हिंदी ब्लाग मंडल का आभामंडल तेजी से फैल रहा था। वागर्थ में बहुत उत्साहित करने वाला लेख छपा। अन्य जगह भी जिक्र आया।

रविरतलामी के बाद अतुल भी अभिव्यक्ति में अपने संस्मरण लिख कर मिठाई खिलाने लगे थे।कुछ दिन के सलाह-मशवरे के बाद हिंदी जगत की पहली ब्लागजीन 'निरंतर' शुरु हुई। शानदार पत्रिका के बावजूद पाठक बहुत कम तथा काम ज्यादा । फिलहाल पत्रिका निकालना दिन पर दिन मुश्किल लगता जा रहा है।इस बीच ब्लागनाद भी चालू हुआ तथा काफी हल्ला भी हुआ। जीतेन्द्र,अतुल तथा स्वामीजी में। वह भी मजेदार कहानी है।कहानियां तमाम हैं। सिलसिलेवार लिखना काफी मजेदार हो सकता है-हिंदी ब्लागजगत के यादगार विवाद।

जब हमने लिखना शुरु किया था तब ३० के लगभग ब्लाग थे ।अब आंकड़ा लगभग ९० तक आ गया है। जल्द ही मामला तीन अंकों तक पहुंचेगा।

साथी ब्लागर कुछ तो बहुत अच्छा लिखते हैं। मैंने कुछ लेख संकलित करने शुरु किये थे-'हाल आफ फेम टाईप'के।कामआधा ही हो पाया लिहाजा उसे अभी प्रकाशित नहीं कर पा रहा।पहले कमेंट काफी अनौपचारिक तथा बिंदास किस्म के करते थे लोग।अब कुछ सभ्यता की बीमारी लग गई है। इधर कमेंट करने में कंजूसी भी काफी होने लगी है। मुझे लगता है कि यादगार टिप्पणियों का संग्रह भी किया जाना चाहिये।

मैं १ अप्रैल से नियमित रूप से हिंदिनी पर लिखने लगा। यहां कभी-कभी लिखता हूं। हिंदिनी पर शुरुआत भी मजेदार रही। स्वामीजी ने मेरा दिसम्बर में लेख पढ़ा था । फिर वे हिंदी मे ब्लाग लिखने लगे। सनसनीखेज भाषा के मालिक स्वामी शुरु में बराबर यह अवसर उपलब्ध कराते रहे कि लोग समझें कि ये हिंदी सीख रहा है। बाद में कुछ हमपर ज्यादा ही फिदा हो गये ये। एक दिन फोन पर करीब तीन घंटे बातचीत हुई । फिर हम इनके कहने पर हिंदिनी में लिखने लगे। पर मेरा लगाव यहां से बराबर बना हुआ है। जब निर्जीव तथा तकनीकी रूप से कमतर चीजों से लगाव इतना हैतो सजीव लोगों से लगाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि जब मैंने हिंदिनी में लिखना शुरु किया तब जीतेन्द्र-अतुल-स्वामी का प्रेमालाप चरम पर था। जीतेन्द्र ने कभी मुझसे कहा होगा अपनी साइट में लिखने को। मुझे नहीं याद रहा होगा। पर इनको याद था। तो काफी दिन मुंह फुलाये रहे जीतू। कहते थे -तुम तो अजातशत्रु हो। लेकिन तुम भीष्मपितामह की तरह जिस तरफ नहीं जाना चाहिये वहां चले गये। हम भी मौज लेते रहे।

फिलहाल लिखना जारी है। नेट पर, जहां कि लोग कुछ पोस्ट लिखकर ब्लाग बंदकर देते हैं तथा कुछ अंक निकाल कर पत्रिकायें वहां मुझे लगता है कि मैं लिखता रहा साल भर ,काफी है।हां ,भी कभी मन करता है कि मैं भीरविरतलामीजी तथा सुनीलजी की तरह नियमित लिख पाता!

मेरे लेखों के बारे में लोग बतायेंगे। मैं लंबे लेख लिखने के लिये बदनाम रहा ।पर कुछ अपने कुछ लेख बार-बार पढ़ने का मन करता है। तमाम दूसरे लेख भी हैं जिन्हें देखकर कोफ्त भी होती है। कथाकार कृष्णबिहारीजी अक्सर हौसला बढ़ाते हुयेकहते हैं-तुमको तो मुख्यधारा में आकर लिखना चाहिये। पूर्णमा वर्मनजी कहती हैं कि मेरे एक लेख में दो-तीन लेखों की बात मिली होती है।थोड़ा मेहनत से और बेहतर लेख लिखा जा सकता हैं। नंदनजी कहते हैं -तुम लिखते रहो ।दिशा अपने आप तय होती जायेगी।

मैं हर लेख लिखने के बाद यही सोचता हूं कि ये वाला पोस्ट कर दो आगे देखा जायेगा।

आप क्या सोचते हैं?

Friday, August 19, 2005

उनका डर



वे डरते हैं
किस चीज से डरते हैं वे
तमाम धन -दौलत
गोला-बारूद-पुलिस-फौज के बावजूद?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना बंद कर देंगे।
-गोरख पांडेय

7 responses to “उनका डर”

  1. अनाम
    छोटी परन्तु बहुत तीखी कविता है| पान्डेय जी का नाम सुना है पहले| इनके बारे में कुछ बताइये|
  2. सुनील
    वाह, बहुत अच्छा. मैं इसका इतालवी में अनुवाद करने की कोशिश करुँगा. सुनील
  3. kali
    I have read this one before in English ! (basically same thought, different translation). Humm that makes it rather interesting, will try to find out where i read it. You are sure this was not plagarized, correct :) Even if it was who cares sounds good by itself.
  4. रवि कामदार
    अरे इन लोगो को तो इस जनता का कोइ डर नही होगा क्योकि वह जानते हे कि गरीब लोग और वह भी इस देश के, कभी भी नहि जागेन्गे. इसि लिये तो इन्दिरा गान्धी तक ने गरीबो कि भावना ओ से खेल लिया और शाशन भी कीया…मगर कविता बढिया है. अछ्ह्छ्ही कल्पना..
  5. फ़ुरसतिया » आशा का गीत
    [...] /www.flickr.com/photos/94063381@N00/36277299/” title=”Photo Sharing”> पिछली पोस्ट में गोरख पांडेय के बारे में पूछा था-� [...]

Monday, August 15, 2005

ऐ मेरे वतन के लोगों



आज पन्द्रह अगस्त है। सबेरे उठा तो देखा नल में पानी नहीं आ रहा था। पता किया चार पम्प पिछले पांच दिन से ‘डाउन’ थे । जो थोड़ा बहुत पानी आ भी रहा था वह सब नलों की जगह आंखों में सप्लाई किया जा रहा है। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ,जरा आंख में भर लो पानी’ के साथ संगत देने के लिये। देश के लिये रोने के लिये पानी भी तो देश को ही देना पड़ेगा। सोचा जब पानी नहीं आ रहा है तो कुछ लिख -पढ़ ही लिया जाये। जहां लिखने पढ़ने की बात सोची तीन जोड़ा हायकू बारिस में मेढकों की तरह के की बोर्ड पर बैठ गये:-
आजाद हुये
अभी तो और होना
बड़ा झमेला!

सब रो रहे
तू पाल न झमेला
चल अकेला!
आगे चलोगे
सब दौड़ेंगे पीछे
बनेगा रेला!
चलूं तो यार
जाने क्या हो आगे
डर लागेला!
चल भाग जा
तुझ से नहीं होगा
हम चलेला!
मैं चला आगे
भीड़ भी साथ जुटी
हो गया रेला।

मैं और भी लिखता तब तक किसी ने टोक दिया -ये क्या लिख रहे हो? हायकू को तुमदर्पण समझ लिये हो जो जब देखो तब बंदरों की तरह थाम लेते हो!डा.व्योम पकड़ लेंगे तो दौड़ा लेंगे। हमने खतरे को महसूसा तथा गियर बदला । हायकू के पल्ले को किसीअल्पमत में आती सरकार की तरह झटककर देशभक्ति की विशाल उत्पत्यकाओं में विचरण करने लगा। विचरण में बाधा पहुंचाई लल्लन गुरु ने जो आते ही मेरे बच्चे से बोले -बेटा जरा दो कप चाय बनवा लाओ। पत्ती कड़क ,चीनी कम । पापा पियें तो इनके लिये भी ले आना।
चाय की व्यवस्था करने के बाद वो मुझसे मुखातिब हुये। फुरसतिया-लल्लन संवाद शुरु हुआ:-
लल्लन:- और सुनाओ ,कुछ नया लिखा या अभी तक चिमटा बजा रहे हो।
फुरसतिया:- लिखा तो नहीं पर सोच रहा हूं लिखने की।
लल्लन:- ये तुम लिखने के लिये सोचने की आदत काहे पाल रहे हो?ये बड़ी गंदी आदत है। इसके चक्कर में पड़े तो ठेलुहों की तरह फ्रीज हो जायेगा ‘फुरसतिया’ भी। तुम लिखते रहो। सोचने का काम पाठकों पर छोड़ दो।
फुरसतिया:- हां यह तो सच है। चलो अच्छा आज तुम्हीं बताओ क्या लिखा जाये?
लल्लन:- आज लिखने के लिये कैसा सोचना! लिखो आजादी के बारे में। ये आजादी झूठी है।देश नरक में जा रहा है।भ्रष्टाचार, अशिक्षा,लालफीताशाही, भाई-भतीजावाद का बोलबाला है। यही सब लिखो । तल्खी का दरिया उड़ेल दो की बोर्ड पर। इसके अलावा कुछ लिखने की आदत भी तो नहीं है तुम्हारी।
फुरसतिया:- यह तो है ।पर लगता है कि क्या सच में देश में कुछ प्रगति नहीं हुई! मध्यवर्ग गुब्बारे की तरह फूल रहा है। तमाम जगह हम दुनिया के चंद देशों में हैं। विकसित देशों तक से लोग इलाज करवाने यहां आ रहे हैं। हमारे देश के वैज्ञानिक,डाक्टर,इंजीनियर और कम्प्यूटर विशेषज्ञ पूरी दुनिया मेंअपनी मेधा का झंडा फहरा रहे हैं।हमारे जो बच्चे कभी कानपुर से लखनऊ नहीं गये वे न्यूयार्क से दिल्ली ऐसे आते जाते हैं जैसे ड्राइंगरूम से बाथरूम आ-जा रहे हैं। क्या इसमें देश का कोई योगदान नहीं है?
हम खुद पूरी जिंदगी राष्ट्रगान गाने की मुद्रा में खड़े रहें और दूसरों से अपेक्षा करें कि वह देश के लिये दौड़ते रहें।यह कहां तक जायज है।
लल्लन:- यार,ये सब पचड़े में पड़े तो हो गया तुम्हारा लिखना। रोते रहो रांड की तरह। अपराधबोध पाले। जो ट्रेन्ड है उसको पकड़ो। कोसना शुरु करो। बिस्मिल्ला करो नेता,अधिकारी,अपराधी गठजोड़ से।
फुरसतिया:- हमें समझ नहीं आ रहा कि खाली कोसने से क्या होगा? जो हालात हैं उन पर हमेशा स्यापा करने की बजाय कुछ करने की कोशिश की ।
लल्लन:- वत्स,तुम पर भावुकता का दौरा पड़ रहा है। यह खतरनाक लक्षण हैं।तुम भला अकेले क्या कर सकते हो? चने बराबर भी तो नहीं हो जो कोई भाड़ फोड़ने के ख्वाब देखो।
फुरसतिया:- अगर हम कुछ कर नहीं सकते तो फिर हमें दूसरे को कोसने का क्या हक है? हम खुद पूरी जिंदगी राष्ट्रगान गाने की मुद्रा में खड़े रहें और दूसरों से अपेक्षा करें कि वह देश के लिये दौड़ते रहें।यह कहां तक जायज है।
लल्लन:- अरे भाई, यही तो एक जागरूक नागरिक तथा एक आम नागरिक का फर्क है। जागरुक आदमी का काम है दिशा दिखाना ,कोसना,चिल्लाना, आगे बढ़ने के लिये उकसाना तथा कुछ असफलता मिलने पर गरियाना। जबकि आम नागरिक का काम है जागरूक नागरिक के कहे को सुनना और चुपचाप सिर हिलाना!इनसे अलग कुछ सिरफरे नागरिक होते हैं जिनकी आदत होती है जो ठीक लगे वह चुपचाप करते जाना। तुम चूंकि जागरूक नागरिक हो इसलिये ‘कोसना यज्ञ’ में अपनी आहुति देना शुरु करो।
फुरसतिया:- मित्र तुम कितनेभले हो। तुम मुझे कर्तव्य पथ से भटकने से हमेशा बचाते रहते हो। अब यह भी बताओ कि किस विषय को लेकर आज बात शुरु की जाये?
लल्लन:- जैसा कि अनुनाद सिंह जी बताते हैं कि ऐसा कोई अक्षर नहीं जिससेकोई मंत्र न बनता हो, ऐसी कोई जड़ नहीं जिससे कोई औषधि न बनती हो उसी तरह ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर देश को कोसा न सके।
फुरसतिया:- अच्छा यार ये बताओ कि बिना देश को कोसे हमारा खाना क्यों हजम होता। जो खराब है उसे बदलने का खुद प्रयास क्यों नहीं करते।
लल्लन:- तुम बार-बार बहक रहे हो। बार-बार खुद कुछ करने की बात वैसे ही कर रहे हो जैसे अपने ब्लाग को बार-बार देखते हो शायद कोई तारीफी टिप्पणी की गयी होगी।
फुरसतिया:- यार यह सच है । फिर भी ऐसा क्यों है कि हमें यह नहीं लगता कि हमने भी कुछ किया है या हम भी कुछ कर सकते हैं?
लल्लन:- तुम भी कहां सबेरे-सबेरे हमको उपदेश देने के लिये बाध्य कर रहे हो! अपने महामहिम कहते हैं:-
लगता है भारत का अपने ऊपर से भरोसा उठ गया है। भारत नकल का देश हो गया है। आजादी की नकल। अर्थव्यवस्था की नकल। उद्योग-व्यापार की नकल । यहां तक की साहित्य और मीडिया की नकल।मौलिक सोच करीब-करीब पूरे भारत से सिरे से गायब है। हर विदेशी चीज को श्रेष्ठ मानकर स्वीकारने का भाव। विदेशी के प्रति अंध आकर्षण का सीधा असर यह हुआ कि अपनी क्षमताओ से भरोसा जाता रहा। सबसे ज्यादा दुखद बात यह है कि विदेश की श्रेष्ठता का ढिंढोरा पीटने वाले में ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें पता है कि सौ फीसदी सही नहीं है।
फुरसतिया:-आगे क्या बोले महामहिम अब्दुल कलाम जी ! बताओ सुनने का मन कर रहा है!
लल्लन:- वे आगे बोले-यह सामूहिक विस्मृति की अद्भुत मिसाल है।भारत को अपना अतीत और उपलब्धियां याद नहीं हैं। जिन्हें याद है उन्हें इस पर भरोसा नहीं है। एक अजीब सी पराजित मानसिकता। टीपू सुल्तान के राकेट में विलियम कानग्रेव द्वारा किये गये सुधारों का पूरा ब्योरा मौजूद है लेकिन इसका विवरण किसी के पास नहीं है कि टीपू का राकेट किसने बनाया।उसका निर्माण कैसे हुआ। भारत के पढे-लिखे लोग भी जैसे मान बैठे हैं कि कोई अच्छा काम ,नया काम या बड़ा काम कोई भारतीय कर ही नहीं सकता।वह मानसिक रूप से हार गया है। किसी भी दिशा में आगे बढ़ने के लिये के लिये उसे सबसे पहले यह जंग जीतनी होगी। यही विजय उसे आत्मविश्वास देगी। इसी से उसके सोचने की क्षमता लौटेगी। हमारी सोचने की आजादी किसी ने हमसे छीनी नहीं हैं । उसे हमने खुद स्थगित कर रखा है। जब हम सवाल पूछेंगे-जवाब सामने आयेंगे।
हमारी सोचने की आजादी किसी ने हमसे छीनी नहीं हैं । उसे हमने खुद स्थगित कर रखा है। जब हम सवाल पूछेंगे-जवाब सामने आयेंगे।
फुरसतिया:-बात तो ठीक ही कहते हैं -महामहिम जी! अब फिलहाल किसी को भी कोसने का काम आज के लिये स्थगित। अब जो हम कर सकते हैं करेंगे।
लल्लन:- तुम हो किस लायक! क्या कर सकते हो?
फुरसतिया:- हम संकल्प ले सकते हैं:-
हम जहाँ हैं,
वहीं सॆ ,आगॆ बढॆंगॆ।

हम कह सकते हैं:-
जो होता है वह होने दो ,यह पौरुष-हीन कथन है,
जो हम चाहेंगे वह होगा,इन शब्दों में जीवन है।
यह कहकर लल्लन-फुरसतिया जोड़ी लपक ली झंडारोहण के लिये।मैदान में राष्ट्रीय ध्वज आशाओं के खंभे पर सवार आसमान में भविष्य की सम्भावनाओं की तरह फहरा रहा था।
मेरी पसंद
जा ,
तेरे स्वप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतरकर
जल्द पृथ्वी परचलना सीखें
चांद-तारों सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिये
मचलना सीखें।
हंसे
मुस्कराएँ
गाएँ
हर दिये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलायें
अपने पावों पर खड़े हों।
जा ,
तेरे स्वप्न बड़े हों।
-दुष्यन्त कुमार

4 responses to “ऐ मेरे वतन के लोगों”

  1. आशीष
    बहुत खूब शुक्लाजी, व्यंग्य भी है, सच्चाई और यथार्थ भी। मानता हूं कि कोसने से कुछ न होगा लेकिन यदि आलोचनायें ने हों तो कमियां कैसे दिखेंगी। कमी को जानकर ही उसका निवारण किया जा सकता है। समाधान के लिये समस्या का होना आवश्यक है लेकिन साथ साथ इस बात का भी खयाल रखा जाये कि समस्या को इतना गंभीर न बना दिया जाये कि समाधान ही न मिले।
  2. Laxmi N. Gupta
    फुरसतिया जी,
    आपका लेख और लेखन शैली बहुत पसन्द आयी। बधाई।
    लक्ष्मीनारायण
  3. kali
    chaape raha kalattarganj ! Bahut bhadiya likhe rahe fursatiya ji. aapne to sochne per majboor kar diya aur agli bhaunkach ka topic bhi de diya !
  4. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहानी है 6.ऐ मेरे वतन के लोगों 7.उनका डर 8.फुरसतिया:कुछ बेतरतीब यादें [...]

Thursday, August 11, 2005

ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहानी है




मेरे लेखहैरी पाटर का जादू तथा हामिद का चिमटा पर स्वामीजी की प्रतिक्रिया थी:-
विडियो गेम खेलने से कबड्डी खेलना मन और स्वास्थ्य के लिये ज्यादा सही है.गालिब की गज़लें“कांटा लगा” छाप रीमिक्स से ज्यादा स्तरीय हैं. पिज्जा से दलिया ज्यादा उचित है. ऐसी तमाम तुलनाएं साहित्य के अलावा भी हर जगह कर सकता हूं. दुनिया मे हर चीज की एक जगह,एक बाजार और एक भूमिका है और कोई भी काम करने का तरीका अलग-अलग समाजों मे अलग-अलग हो सकता है.
अगर आपने बचपन मे कामिक्स कथाएं नही पढीं तो आप स्पाईडर मेन किल-बिल १ और २, सिन सिटी जैसी फ़िल्मों मे दिखाई कलात्मक हिंसा – जी हां, कलात्मक हिंसा बहुत ही सुंदर, कलात्मक हिंसा सराहने के काबिल नही – बाकायदा बाउंसर निकल जाएगी – “इस मे क्या है” टाईप! भले ही सत्यजित राय वाली शतरंज के खिलाडी को समीक्षित कर सको और उपन्यास से कितना न्याय हुआ इस पर पेल मचा सको!पर आप किल-बिल मे क्विंटन टेरेन्टिनो ने क्या कमाल किया है समझ नही सकोगे संदेश कैसे दिया है समझ नही सकोगे!
साहित्य का उद्देश्य हमेशा शिक्षित करना ही क्यों हो? मनोरंजित करना भी तो हो – मनोरंजन के बाद, पढने की लत के बाद धीरे से स्वाद बदलो ना आप!आज हिंदी पढने वाले इस लिये कम है की या तो साहित्य मेलोड्रामा, कविता-शविता परोसता है या प्रवचन और उनको पढने वाले अपने आप को ज्यादा एलीट समझते हैं.
हामिद का चिमटा उन तमाम बच्चों को गिल्ट देता है जिन्होंने मध्यमवर्गिय परिवारों मे भी पैदा हो कर बाल हठ किये होंगे – सारे हामिद जैसे स्याने नही होते इस का ये मतलब नही की बाकी बच्चे अपने माता-पिता की आर्थिक सीमितता नही समझे होंगे, बाल-मन है खिलौना चाहेगा. और उन तमाम मा-बाप को ये शिक्षा देता है की तुम्हारा बच्चा हामिद है या नही इस की लिटमस टेस्ट लो और ना हो तो पडोसी की औलाद हामिद है वो नही है ये तुलना करने से मत चूको!क्या ये नही होता? क्या ये नही हुआ?? भाड मे गया हामिद और उसका चिमटा – मेरी चले तो ये कहानी कालिज के लेवल पर कोर्स मे होना चाहिए स्कूल के लेवल पर नही! गिल्ट-मांगरीग देसी मेन्टेलिटी को प्रमोट करती है ये कहानी!!
स्वामीजी को मैं बहुत सजग पाठक मानता हूं लिहाजा उनकी टिप्पणी को अनदेखा नहीं कर पाया।इस टिप्पणी ने मुझे सोचनेको मजबूर किया।कुछ बातें मुझे लगीं कि उनकी फिर से पड़ताल जरूरी है।लिहाजा टिप्पणी की बातों को लेते हुये अपने विचारलिख रहा हूं।
हैरी पाटर,वीडियो गेम,कांटा लगा तथा पिज्जा की तरह आज के फैशन की चीज है।यह मानने में ज्यादा आपत्ति नहीं है मुझे। हालांकि इसे इतना हल्का न स्वामीजी बताना चाहते थे न ही मैं समझा हूं।यह सच है कि कोई भी काम करने का तरीका अलग-अलग समाजों मे अलग-अलग हो सकता है।
बचपन में बेताल,मैंण्ड्रेक,चाचा चौधरी तथा अन्य हर तरह की किताबें पढ़ने के बावजूद हम अभी तक कलात्मक हिंसा को सराहने के काबिल नहीं बन पाये हैं।मुझे लगता है कि कलात्मक हिंसा को सराहने के लिये पढ़ाई-लिखाई के अलावा जो सामाजिक वातावरण का खाद-पानी चाहिये वह शायद न मिल पाना ही कारण रहा इसका।जितनी बढ़िया कलात्मक हिंसा माहौल की संगत में मिल सकती है वो मजा खाली पढ़ने-लिखने से नहीं आ पाता।
यह कलात्मक हिंसा का परिवेश ही है कि अमेरिका के किसी हाईस्कूल का छात्र बस यूं ही मूड आ जाने पर अपने दस-बारह साथियों को बिना किसी कारण के हंसते-हंसते गोली से उड़ा देता है।यह कलात्मक हिंसा ही बारूद के शक का बहाना लेकरकिसी देश को ‘कारपेट बाम्बिंग’से रौंदकर बताती है कि हमारा शक गलत निकला।ऐसी कलात्मकता खाली साहित्य,फिल्मों से नहीं आती। समाज को भी कुछ करते रहना पढ़ता है। कामना है कि कलात्मक हिंसा का यह भाव बाउन्सर बनकर ही निकल जाये।
साहित्य का उद्देश्य बल्कि ज्यादा सही होगा दिशा कहना तो समाज तत्कालीन समाज की स्थिति पर निर्भर करता है। भारत जब आजाद हो रहा था तो लोगों को जोड़ने के लिये वंशीधर शुक्ल लिख रहे थे-
उठ जाग मुसाफिर भोर भई,अब रैन कहां जो सोवत है।
आजादी के बाद नई उमंगों के गीत वातावरण में गूंज रहे थे:-
नये खून से लिखेंगे हम फिर से नई कहानी।
इसके विपरीत दूसरे विश्वयुद्ध में पश्चिम में बरबादी के मंजर लिखे जा रहे थे क्योंकि वहां लड़ाई में बहुत टूट-फूट हुई। हालांकि अपने देश में भी देखादेखी लुटा-पिटा लिखने वाले भी थे।
यही बात बाल साहित्य की भी है। पढ़ने की आदत डालना भी बहुत अच्छा उद्देश्य है। हैरी पाटर इस मायने में बहुत सफल किताब है कि छपने के पहले ही उसका इतना हल्ला मचा कि दुनिया भर में उसे खरीदने की मारामारी मच गई। इस मारामारी में किताब की तो क्या बाजारू लटकों झटकों की अहम भूमिका रही।
अब बात जिस पर मैंने बहुत विचार किया वह यह क्या सच में ईदगाह कहानी अपराधबोध (गिल्ट मांगर)पैदा करने वाली कहानी है! बहुत विचार किया गया लिहाजा विचार बेतरतीब हो गये। उन्हें जस का तस रखा जा रहा है।
किसी कहानी का प्रभाव पाठक पर कैसा पड़ता है यह इस बात पर निर्भर करता है कि पाठक कहानी से किस रूप में जुड़ता है। प्रभाव के लिये जुड़ाव जरूरी है। अगर कोई मध्यवर्गीय बच्चा इससे जुड़ाव महसूस करता है तो उस पर इसका प्रभाव उस रूप में ही पड़ेगा जिस रूप में यह कहानी से जुड़ा होगा। हामिद की भावनाओं से जुड़ा बच्चा तमाम लालचों से निकलकर अनायास जीतते हामिद की जीत को अपनी मानेगा। दूसरे बच्चों के साथ जिनका मन मिला होगा वे भी झटका भले खायें लेकिन असलियत यह भी है से ज्यादा परेशान नहीं होंगे।
ईदगाह कहानी साधनहीन को अपने सीमित साधनों में अकड़कर जीने की कहानी है। गरीब भी अपने साधनों में खुशियों की खोज कर सकता है। यह बताती है। अपने सुख को स्थगित करके अपने से जुड़े लोगों को सुखी करने की कोशिश अपना उदात्तीकरण है।
वो क्या कहते हैं:-
तुम्हारे सीने की जलन जरूर कम होगी,
किसी का पांव का कांटा निकाल के देखो।
टाइप बात है। परदुखकातरता ,परहित-त्याग दुनिया की हर संस्कृति में उदात्त, अनुकरणीय आदर्श माने गये हैं।किसी को दूसरे के दुख को महसूस करते हुये आचरण करते देख यदि किसी के मन में अपराधबोध आता है तो इसका मतलब यह है कि या तो वह हामिद की जीत से दुखी है। या फिर वह यह सोचता है कि ये देखो हामिद अपनी दादी के लिये इतना त्याग करता है जबकि मैं अपने सुख के ही लिये परेशान करता हूं। यदि दूसरी बात है तो यह कहानी की सफलता है जिसने बालक की संवेदनायें उभार दीं।
जीवन तमाम विसंगतियों से घिरा है। दुनिया का सबसे बेहतर समाज भी विसंगतियों से पूरी तरह मुक्त नहीं होगा। भावनाओं के घात-प्रतिघात चलते रहते हैं। सहज रूप में यदि उदात्त गुणों की स्थापना हो सके तो साहित्य का उद्देश्य पूरा हुआ ।
भावनाओं के घात-प्रतिघात चलते रहते हैं। सहज रूप में यदि उदात्त गुणों की स्थापना हो सके तो साहित्य का उद्देश्य पूरा हुआ
ईदगाह तो प्रतीकात्मक कहानी है। चिमटा भी प्रतीक है। यह कहानी तो कम साधन वाले को ज्यादा साधनों के सामने बिना समर्पण किये अपना सुख तलासने की कहानी है। मध्यमवर्गीय बच्चे के भी कुछ सपने होंगे जो वह अपनी आर्थिक स्थिति के दायरे में पूरा नहीं कर पाता होगा । ऐसा में वह बच्चा हामिद से सीख लेकर अपने साधनों में सुख तलाश सकता है। किसी बच्चे की हैसियत स्कूटर लेने की नहीं है तो वह ज्यादा लालच किये बिना साईकिल के पक्ष में तमाम तर्क( प्रदूषणहीनता, कसरत,कम खर्चा ,शोर से मुक्ति आदि) देकर अपना सुख तलाश सकता है।
ईदगाह कहानी में दुखी अगर कोई होगा तो वह बाजार का पैरोकार होगा।उधार बांटने वाली कम्पनियां होंगी। बच्चे निश्चित तौर पर दुखी नहीं होंगे-यदि उनमें बचपना बचा है।
बच्चे अपराधबोध महसूस करेंगे यह कुछ उसी तरह लगता है जैसे -यहां से पचास-पचास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता है तो उसकी मां कहती है -बेटा,सो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा। वैसे ही -ये कहानी मत पढ़ बेटा नहीं तो अपराध बोध आजायेगा।
आज के जटिल समाज में हम अपने मनोभावों की ‘कंडीशनिंग’ के आदी हो रहे हैं। जहां रोना चाहिये वहां मुस्कराते हैं।जहां क्रोध करना चाहिये वहां ‘लाफ्टर थिरेपी’ से (मुन्ना भाई एमबीबीएस) हंसने का अभ्यास करते हैं। इसीक्रम में आम तौर पर आत्मविश्वास पैदा करने वाली कहानी में अपराधबोध तलाश रहे हैं। यह भावों की ‘कंडीशनिंग’ हमें न जाने कितने ‘साइड -इफेक्ट’ देगी।यह भाव-विस्थापन की प्रवृत्ति हमें न जाने कहां ले जायेगी!
आज के जटिल समाज में हम अपने मनोभावों की ‘कंडीशनिंग’ के आदी हो रहे हैं। जहां रोना चाहिये वहां मुस्कराते हैं
इस तरह के सुरक्षित अहसासों मे बच्चों की परवरिश होने से बच्चे इतने नाजुक हो जायेंगे कि जहां किसी भावना का झटका लगा तो गये काम से। जीवन के हर आवेग का अपना महत्व होता है। हरा ही हरा देखकर पले-बढ़े बच्चे कोई दूसरा रंग देखकर चौंधिया जायेंगे। सुख-दुख तो सापेक्ष हैं। जीवन को संवारने मे दुख का भी महत्व होता है। फिराक गोरखपुरी का एक शेर है:-
इक ग़म वो है इन्साँ को जो रहने न दे इन्साँ,
इक ग़म वो है इन्साँ को जो इन्सान बना दे।
तो अगर हामिद की कहानी पढ़कर किसी बच्चे को कोई दुख होता है यह इन्सान बनने का ग़म है:-
मेरे सीने में न सही , तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये।
हैरी पाटर तथा ईदगाह का अंतर यथार्थ तथा कल्पना का है। हैरी के समाज में यथार्थ में कोई कष्ट नहीं है। कोई अभाव नहीं है। लिहाजा वह अपने खिलाफ काल्पनिक दुश्मनों की रचना करता है तथा फिर उनका संहार करता है। यह नेट प्रैक्टिस टाइप का मामला है।
ईदगाह के सवाल यथार्थ के सवाल हैं। अभाव , दुख ,गरीबी से टकराते हुये अपना स्वाभिमान बचाये रखकर जीतने की कहानी है। ईदगाह जमीन से जुड़ी कहानी है जबकि हैरी पाटर हवा-हवाई है।
आठ सौ रुपये में आप कूड़ा भी खरीदें तो उसका गुणगान करना आपकी मजबूरी बन जाती है। फिर यह तो एक बेस्टसेलर लेखक की बेहतरीन किताब है।
हैरी पाटर के दूसरे पहलू भी काबिले गौर हैं .हैरी पाटर आठ सौ रुपये की किताब है। दुनिया के औसत मध्यवर्गीय मां-बाप जिनको पढ़ने की लत नहीं लगी है इस किताब को खरीदने के पहले पचास बार सोचेंगे। उनमें भी किताब खरीद भारत जैसे देश के मध्यमवर्गीयों की यह चिन्ता ज्यादा बड़ी भूमिका अदा करेगी कि हमारा बच्चा इस हीन भावना से पीड़ित न हो जाये कि हाय,हमने हैरी पाटर नहीं पढ़ी। दुनिया के ‘लेटेस्ट ट्रेन्ड’ से कदमताल करते रहने की मजबूरी ज्यादा बड़ा कारण है इस किताब
की धुआंधार बिक्री । आठ सौ रुपये में आप कूड़ा भी खरीदें तो उसका गुणगान करना आपकी मजबूरी बन जाती है। फिर यह तो एक बेस्टसेलर लेखक की बेहतरीन किताब है।
हैरी पाटर के हल्ले में बाजार का हल्ला ज्यादा है। यही बिंदु है जो इसे बहुप्रचारित ,बहुचर्चित बनाता है। यही वह बिंदु भी है जहां यह मुझे कमजोर लगती है। ईदगाह कहानी सत्तर साल बाद भी उतनी ही प्रासंगिक कहानी लगती है। देखना है हैरी पाटर की हवा कितने दिन बहती है।
ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहानी है।
हां ,अगर स्वामीजी माने तो यह कहना चाहूंगा कि ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहानी है। लेट गिल्टमांगर बि रिप्लेस्ड बाई लाईफ मांगर।
स्वामीजी का मैं खास तौर पर आभारी हूं कि उन्होंने मेरे लेख को इतने ध्यान से पढ़कर सवाल उठाये थे। आशा है कि मेरी बात से कुछ सहमति होंगे। असहमति का भी स्वागत है। बाकी साथियों जिन्होनें मेरा लेख पढ़ा तथा पसंद किया उनका भी मैं आभारी हूं।

17 responses to “ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहानी है”

  1. Atul
    हैरी पॉटर बनाम हामिद की तुलना ने किस तरह से दो सभ्यताओं के अँतर को उकेर कर रखा है यह लेख उसका सुँदर उदाहरण है। फिलहाल तो इतना ही कर सका हूँ कि अपनी पूरी इमेल लिस्ट को यह लेख अग्रसारित कर दिया है। अति सुँदर तुलनात्मक अध्ययन।
  2. eswami
    इक ग़म वो है इन्साँ को जो रहने न दे इन्साँ,
    इक ग़म वो है इन्साँ को जो इन्सान बना दे।

    तो अगर हामिद की कहानी पढ़कर किसी बच्चे को कोई दुख होता है यह इन्सान बनने का ग़म है.
    सालों पहले दूरदर्शन पर प्राख्यात अभिनेता शशी कपूर के इंटरव्यू मे उन्होने वाकया कहा था की जेनिफर (उनकी पत्नी)गर्भवती थीं, और वो शिकार खेलने जाने का कार्यक्रम बना रहे थे. जेनिफर ने कहा – “इधर मैं एक जीव को इस दुनिया मे लाने का यत्न कर रही हूँ उधर आप एक जीव की जान लेने जा रहे हो!” शशी कपूर ठिठके! शशी कपूर ने फिर कभी शिकार नही खेला! ये इन्सान हो जाना एक झटके मे होता है. कईयों का यह रूपाँतरण जीवन भर नही होता.
    आज जब अमरीका मे टीवी पर शिकार खेलने को “रिक्रियेशनल हॉबी” और निशानेबाजी को कला कहलाते, शिकार की सुंदरता पर शिकारी को मोहित होते देखता हूँ तो इस “कलात्मक हिंसा” पर शशी कपूर का इंटरव्यु याद आता है! किसी की जान लेना खेल नही है, कुरूप है, विभत्स है और इस प्रकार का मनोरंजन विकृत है. ये समझदार आदमी की कुरूपता है.
    जब ९/११ को टावर मे हवाई जहाज घुसे कई घरों के बच्चे टीवी पर देखते हुए बोले “वॉव .. कूल ” इन्हे लगा कोई फिल्मी दृश्य है – अब आप बच्चे का नजरिया देखो! उन्हे किसी की जान जा रही है पता नही पर पूरा सेट-अप आँखो को जबरदस्त लगा होगा – था भी! ये बचपन है – जब बच्चों को हकीकत बताई माता-पिता ने वो बहुत उदास हुए और दुखी, अपने जेब खर्च उन्होने सहायतार्थ भेजे गर्व के साथ – ये बच्चों की मासूमियत है. ये इन्सान होजाना नही है – बच्चों मे इन्सानियत तो थी ही मसूमियत भी पर नासमझी ज्यादा थी. जो मुझे सुंदर लगती है – इस बचपन और नासमझी की उम्र यूँ भी ज्यादा नही होती. ये बहुत कीमती चीज है .
    क्या आप बच्चों जैसे भोलेपन से हिंसक हुए बिना हिंसा की सुंदरता सराह सकते हो? उसे मे अनलर्निंग लगती है और वो भी बहुत कीमती चीज है. :)
    मेरा बस चले दुनिया इतनी कुरूप ना हो की बच्चों को समय से पहले बडा होना पडे और फिर ये समय से पहले बडा होना महिमामंडित हो. मेरे लिये हामिद के को समय से पहले बडा होना पडा मै इसे जस्टिफाई नही कर पाता! इस के लिए हामिद से हमदर्दी होती है – वो कोई हीरो नही मजबूर है – समय से पहले बडा होने के लिए मजबूर क्योंकि उन्हे सही दुनिया और परिवेश नही बना कर दिया गया.
    हामिद की कहानी हो या की जीवन की और कुरूपताओं के दुख – दोनो परेशान करते हैं और मेरे विचार मे बच्चों को समय से पहले उन दुखों और परेशानियों को दुखद तरीके से परिचित करवाते हैं. इस मे नाजुक बनाने वाली कोई बात नही है, मै बच्चों को नाजुक बनाने का पक्षधर नहीं – टाईमिंग की बात है और तरीके की! मुझे तो लगता है की आज-कल बच्चे यूँ भी बहुत जल्दी समझदार हो जाते हैं -शायद दोनो ही ओर (समाज और बच्चों मे) मासूमियत की उम्र कम ही होती जा रही है और मियाद भी! शायद इसीलिए बच्चे भी हिंसक होते जाते हैं.
    एक शेर मै भी पेल देता हूँ –
    बच्चों को छोटे हाथों को चाँद-सितारे छूने दो
    चार किताबें पढकर ये भी हम जैसे हो जाएंगे.
  3. आशीष
    क्या लिखा है शुक्ला जी। हामिद हमारे दिलोदिमाग में हमेशा रहेगा और उसकी प्रासंगिकता भी, हैरी का पता नहीं। ये जो ८०० रूपये की किताब का टोटा है वो ही शायद इस किताब को भारत में ज़्यादा मशहूर बना रहा है और वैसे भी जिस चीज़ को विदेशी आका अच्छा बोलें, उसको तो हमारे पढ़े लिखे वर्ग को अच्छा बोलना ही है वरना पिछड़े न कहलायेंगे। जिन्होंने हैरी पॉटर पढ़ी है, उनको एक बार पंचतंत्र की कहानियां या चंद्रकांता ही पढ़ा दो फिर पता चलेगा कि तिलिस्मी कहानियां कैसी होती हैं।
  4. आशिष
    हामीद का समय से पहले बडा हो जाना अखरता तो है लेकिन ये एक जमीनी सच्चाई है जिससे मुख नही मोडा जा सकता. कितने बच्चे है जिन्होने बचपन क्या होता है कभी जाना ही नही. कितने बच्चे है जिन्हे खिलौना या पुस्तके तो तो दुर की बात पढना लिखना भी नसीब नही होता. सुबह उठते साथ रोजी रोटी के लिए निकलना पडता है. ये समस्या गांवो कस्बो तक ही सीमित नही, शहरो मे तो ये समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है.
    हामीद का समय से पहले बडा हो जाना, हमे चुभता है यह इस कहानी की सफलता है.
    रहा सवाल हरी पुत्तर(हैरी पोटर) का चन्द्रकांता उसका सबसे बडा जवाब है, लेकीन हमारी मानसीकता ही कुछ ऐसी बन गयी है कि हमे आयातीत चिजे ही पसंद आती है. हमारे चाचा चौधरी, बिल्लु, पिन्की किसी से कम हैं क्या ?
    पंचतत्र या हितोपदेश की कहानिया बच्चो को मायावी दुनिया मे नही ले जाती, वे स्वस्थ मनोरंजन के साथ एक अच्छे व्यक्तित्व की निवं भी डालती है. लेकीन हम अपनी चिजो पर ध्यान उस वक्त देते है जब कोई विदेशी हमे बताता है कि आपकी ये चिज काफी अच्छी है(योग, आयुर्वेद इसके उदाहरण है).
    आशिष
  5. ई-स्वामी » तिलस्म का राज और फ़ंडेबाजी की खाज
    [...] �े हैं – “जनता टेस्ट-लैस भई है, देखो कुछ नही समझते!” मूलभूत रूप से मै इसे [...]
  6. eswami
    ये मै नही मानता की हामिद का चिमटा ही संदेश देता है हैरी पाटर नहीं देता.
    हैरी पाटर कल्पनाशीलता को उभारता है और इस के लिए अनोखे चरित्रों का सहारा लेता है. आज के सेल फोन कभी विज्ञान फँतासी स्टार-ट्रेक का हिस्सा थे तब के बच्चो ने उसे आज कर दिखाया. आज उडने वाली कारों की परिकल्पना कल का सच होंगी. आईंस्टाईन ने कहा था “कल्पना ज्ञान पर भारी है!” कौन जाने हैरी का कोई जादूई नुस्खा कोई बालक कल हकीकत मे बदल दे.
  7. फ़ुरसतिया » ‘ऐ मेरे वतन के लोगों
    [...] ��लन:- और सुनाओ ,कुछ नया लिखा या अभी तक चिमटा बजा रहे हो। फुरसतिया:- लिखा तो नहीं � [...]
  8. फुरसतिया » पत्रकार ब्लागिंग काहे न करें, जम के करें!
    [...] बहसें पहले भी होती रहीं हैं। हैरी पाटर बनाम हामिद और अमेरिकी जीवन पर तमाम ब्लागर्स ने इसके पहले तमाम गर्मागर्म बहसें कीं लेकिन इतनी श्रद्धापूर्वक नहीं। हिंदी ब्लागिंग के कुछ बेहतरीन लेख अनुगूंज में मिल सकते हैं। [...]
  9. सतीश
    हाल ही में ऐक विज्ञापन देखा जिसमें ऐक सात आठ साल का बच्चा अपनी मां को रोटी बनाते समय ऐक केबल से बना चिमटा देता है ताकि उसके हाथ न जले। यह विज्ञापन बरबस ही हामिद की याद दिला जाता है, ईदगाह आज भी हिट है।
  10. Rohan paul
    THe story is Ok . not the best of Premchand. Interesting for vibrant readers
  11. ईमानदारी - खरीद न सको तो मैनेज कर लो
    [...] न: 1. हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा 2. ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहा… 3.हामिद का चिमटा बनाम हैरी की झाड़ू [...]
  12. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 4.अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी 5.ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहा�… 6.ऐ मेरे वतन के लोगों 7.उनका डर [...]
  13. सतीश पंचम
    पहले भी एक बार यह पोस्ट पढ़ चुका था, कल वाली चिट्ठाचर्चा के बाद फिर पढ़ा। अच्छा लगा फिर पढ़ कर।
    यह बात तो बहुत बढिया लगी।
    @ मध्यमवर्गीयों की यह चिन्ता ज्यादा बड़ी भूमिका अदा करेगी कि हमारा बच्चा इस हीन भावना से पीड़ित न हो जाये कि हाय,हमने हैरी पाटर नहीं पढ़ी। दुनिया के ‘लेटेस्ट ट्रेन्ड’ से कदमताल करते रहने की मजबूरी ज्यादा बड़ा कारण है इस किताब
    की धुआंधार बिक्री । आठ सौ रुपये में आप कूड़ा भी खरीदें तो उसका गुणगान करना आपकी मजबूरी बन जाती है।
    और हां, ईस्वामी जी ने जो शशि कपूर का वाकया बयां किया है तो एक वाकया मुझे भी याद आ रहा है जिसे मैंने मन्नू भण्डारी जी की आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ में पढ़ा था जिसमें उन्होंने लिखा है कि जब उनकी छोटी सी बच्ची की तबीयत खराब हुई और वह उसे अस्पताल ले जाने की जद्दोजहद में लगीं थी तब राजेन्द्र यादव उसे अस्पताल ले जाने की बजाय अपने लेखकीय मित्र मंडली से मिलने गये एक अदद बहाना बनाकर। यह भेद बाद में किसी फोन से पता चला कि उन्हें अपनी बच्ची की चिंता की बजाय अपने मित्र मंडली में समय बिताना ज्यादा ठीक लगा।
    खैर, इंसान इंसान में फर्क होता है, किसी पर किसी बात का क्या असर पड़ता है यह बहुत कुछ परिस्थितियों और मानसिकता पर भी डिपेंड करता है।
    पुरानी पोस्टें लगता है अभी और खंगालनी होगी ।
  14. चंदन कुमार मिश्र
    क्यों भाई। काहे दिल दुखाते हैं स्वामी जी का? आठ सौ की किताब तो हम नहीं खरीदनेवाले और बता दें कि हमारे पूरे शहर में कोई नहीं खरीदेगा। मीडिया और चोट्टे लोगों का तो काम ही है प्रचार करना। और बात ईदगाह की तो यह सही है ऐसी स्थिति शर्मनाक है लेकिन रोलिंग का नाम प्रेमचन्द के साथ रखूँ, इसका सोचना भी महापाप है जी। जबकि हम पाप-पुण्य के विभाग से दूर हैं, फिर भी…कुछ कह दिया और बहुत कुछ कहने का मन था। लेकिन हर बात लेख लिखना ठीक नहीं…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..एक बार फ़िर आ जाओ (गाँधी जी पर एक गीत)
  15. चंदन कुमार मिश्र
    आशिष जी की बात तो सही लग रही है…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..एक बार फ़िर आ जाओ (गाँधी जी पर एक गीत)

Wednesday, August 10, 2005

अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी



आजकल मुझे कन्हैयालाल नंदन की कविता सूरज की पेशीबार-बार याद आ रही है:-
नजरों के ओछेपन जब इतिहास रचाते हैं,
पिटे हुये मोहरे पन्ना-पन्ना भर जाते हैं,
बैठाये जाते हैं सच्चों पर पहरे तगड़े,
अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी,
किरणें ऐसे करें गवाही जैसे परदेसी ,
सरेआम नीलाम रोशनी ऊंचे भाव चढ़े,
भरी धार लगता है जैसे बालू बीच खड़े।
ये अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी का मामला आजकल चल रहा है। महाभ्रष्ट आई.ए.एस. अफसरों को प्रतिवर्ष चिन्हित करने की मुहिम छेड़ने वाले उ.प्र. के वरिष्ठ नौकरशाह श्री विजय शंकर पांडे के खिलाफ शासन हरकत में आ गया है। कुछ और लिखने के पहले थोड़ी जानकारी विजयशंकर पांडे के बारे में।
विजय शंकर पांडे उन चंद बेहद ईमानदार आई.ए.एस. अधिकारियों में माने जाते हैं जो शासन के बेईमान अधिकारियों के खिलाफ लगातार मुहिम छेड़ते रहे हैं । उनकी ईमानदारी की लोग मिसाल देते हैं। जैसा सुना जाता है कि वे अपने कलक्टर के कार्यकाल के दौरान अपने बंगले में उगी फसल का पैसा भी सरकारी खजाने में जमा कराते रहे। जिन जगहों में रहे वहां की नौकरशाही परेशान हो जाती थी इन सिरफरे ईमानदार साहब से। समयपालन होने लगता। लखीमपुर में जब डी.एम. थे तो उगाही करने वाले दफ्तरों के कर्मचारियों पर अंकुश लगाने के लिये नियम बनाया था कि कार्य के दौरान इतने रुपये से अधिक किसी के पास पाये गये तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। बहुतों के खिलाफ की भी।फतेहपुर में पोस्टिंग के दौरान अपने अनुभव लिखते हुये तफसील से बताया कि गुंडा तत्वों का मनोबल कैसे ध्वस्तकियाजा सकता है। कैसे जनता में आत्मविश्वास जगाया जा सकता है। ऐसे सिरफिरे नौकरशाह की नौकरी कभी सुकूनदेह नहीं रही। लगातार उनके तबादले होते रहे। महत्वहीन पदों पर भेजे जातेरहे।
लोग कहते हैं कानून अंधा होता है लेकिन यह सच नहीं है। कानून काना होता है। यह जिधर मन होता है उधर देखता है।- हरिशंकर परसाई
बात यहीं तक नहीं रही। उन्होंने आईएएस एशोसियेशन के माध्यम उ.प्र. के भ्रष्टतम अधिकारियों को चिन्हित करने का काम किया। इनमें भूतपूर्व मुख्यसचिव श्री अखंड प्रताप सिंह भी थे जिनके खिलाफ रिटायर होने के बाद ही मुकदमा शुरु हो सका। वर्तमान मुख्यसचिव को भी आईएएस एशोसियेशन ने महाभ्रष्ट अधिकारी के रूप में चिन्हित किया था।इस बार भी यहप्रक्रिया शुरु होने वाली थी।
अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक- इस बीच ८,अगस्त ,२००५ को जारी शासनादेश के अनुसार निजी मतदान के द्वारा किसी को अधिकारी को भ्रष्ट बताने को दुराचरण करार दे दिया गया है। मतलब अब एशोसियेशन किसी को अपने विवेक से भ्रष्ट ठहराने का काम करेगी तो गैरकानूनी काम होगा।इस बीच विजयशंकर पांडे को भी एक जांच में फंसाया गया था। कुछ अनियमितताओं को लेकर जांच की गई थी ।जांच में वे निर्दोष पाये गये थे लेकिन रिपोर्ट को स्वीकृत करने वाले अधिकारियों को भी भ्रष्ट अधि कारी के रूप में चिन्हित कर चुके थे लिहाजा शायद रिपोर्ट में फेर बदल किया गया । तथा अब उनके खिलाफ कार्रवाई की कवायद चल रही है। कल गिरफ्तारी की भी अफवाह रही। जिसके लिये पांडेजी का कहना है- “मैं तो गिरफ्तारी के लिये तैयार बैठा हूं ।कोई आये तो।”
श्री पांडे ने हाईकोर्ट में शरण लेकर अपने खिलाफ चल रही सतर्कता जांच में हेराफेरी व खुद को फंसाये जाने का आरोप लगाते हुये पूरे प्रकरण की जांच सी.बी.आई. से कराने की गुहार की है।उनकी याचिका पर आज सुनवाई होने वाली है। आगे क्या होगा यह समय बतायेगा। लेकिन यह तय है कि ईमानदारी का परचम लहराने का खामियाजा श्री पांडे को तो भुगतना पड़ रहा है।
भारत में आई.ए.एस. लाबी सबसे ताकतवर मानी जाती है। देश के सबसे जहीन लोग इस सेवा में आते रहे हैं। इन जहीन लोगों का बहुमत या तो श्री पांडे के खिलाफ होगा या निर्लिप्त-यह सोचकर कि यह तो पांडेजी का मामला है वे खुद निपटेंगे-व्हाट कैन आई डू?
जब पड़ोसी के घर में आग लगने पर आप सोचते हैं कि आप तो सुरक्षित हैं तब यह भी सोच लेना चाहिये कि अगला जलने वाला घर आपका भी हो सकता है।
देश की यह सबसे जहीन ,ताकतवर लाबी -”यू सो मी द फेस ,आई विल सो यू द रूल” के स्वर्णिम नियम का अनुपालन करते हुये शानदार ढंग से काम करती है।
शासन के लोग बतायेंगे कि उनके खिलाफ मामला चल रहा है लिहाजा हम कुछ नहीं कह सकते हैं। अखबार को कल से दूसरा मसाला मिल जायेगा। उनको भी तो अपना अखबार चलाना है। पूरी दुनिया को देखना है। कहां तक एक ईमानदार माने जाने वाले अधिकारी का साथ देते रहें?
हरिशंकर परसाई जी ने कहीं लिखा है- लोग कहते हैं कानून अंधा होता है लेकिन यह सच नहीं है। कानून काना होता है। यह जिधर मन होता है उधर देखता है।
लोग कहते हैं कि जब पड़ोसी के घर में आग लगने पर आप सोचते हैं कि आप तो सुरक्षित हैं तब यह भी सोच लेना चाहिये कि अगला जलने वाला घर आपका भी हो सकता है।
लोग कहते हैं कि ब्लाग में बड़ी ताकत होती है। क्या सच में ऐसा है?
मेरी पसंद
तुम्हारा हर काफिला
मतलब की सुरंग से गुजरता है
हर कदम
फायदे के राजमार्ग पर
पड़ता है।
तुम ,
अभी बदले नहीं,
इसीलिये बहुमत में हो।
-अनूप शुक्ला

2 responses to “अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी”

  1. eswami
    गुरुवर्,
    ब्लागमंडल मे किसी ने टिप्पणी की थी की भारत का नुकसान पढे लिखों ने ज्यादा किया है! १६ आने सच बात है.
    हम सब अलग-अलग मामलों मे किसी ना किसी बहुमत या अल्पमत वालों मे शरीक होते हैं मगर एक बहुमत मे सभी शरीक हैं की भारत मे ईमानदार सरकारी पदाधिकारी अल्पसंख्यक हैं.
  2. आलोक कुमार
    ईमानदारी का फल, मिलेगा ही, और वह भी मीठा। यहाँ नहीं तो वहाँ।

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Monday, August 08, 2005

हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा



आज दुनिया में हैरी पाटर का हल्ला है। नित नये तथ्य सामने लाये जा रहे हैं। सारी हैरी पाटर की किताबें साथ-साथ रखी जायें तो दुनिया को इतनी बार घेर लेंगी। एक के ऊपर एक रखी जायें तो चांद तक इतनी बार आने-जाने लायक सीढ़ी बन जायेगी। सारी किताबें मिलाकर पढ़ी जायें तो एक आदमी को सारी किताबों के बराबर शब्द पढ़ने में इतने हजार साल लगेंगे ।आदि-इत्यादि। वगैरह-वगैरह।
हैरी पाटर की लेखिका जोएला कैथलिन रालिंग के बारे में भी दिन-प्रतिदिन नये-नये तथ्य या पुराने तथ्य नये रूप में सामने आते रहते हैं। हैरी पाटर लिखने के पहले की उनकी आर्थिक हालत ऐसी भी नहीं थी कि किताब लिखने के लिये कागज खरीद सकें। आज छह किताबें लिखने के बाद उनके पास इतना पैसा है कि ये खरीद सकतीं हैं वो खरीद सकती हैं।
हैरी पाटर एक चमत्कारी बालक है। जो अपने जादू के जोर से बुराई की प्रतीक शक्तियों पर कब्जा करता है । खतरे में पढ़ता है लेकिन विजयी होता है ,अपनी जादुई ताकतों से। यह फंतासी चरित्र दुनिया में इतना लोकप्रिय है कि बच्चे घंटों लाइन में लगकर किताब खरीद कर रातों-रात जगकर पढ़ रहे हैं।
हैरी पाटर एक चमत्कारी बालक है। जो अपने जादू के जोर से बुराई की प्रतीक शक्तियों पर कब्जा करता है ।
मुझे न हैरी पाटर से कोई चिढ़ है न कोई लगाव । लेकिन जब दुनिया में इतना हल्ला मचा देखता हूं तो उसकी खूबी जरा नजदीक से देखने का मन करता है। पाता हूं कि हैरी पाटर का पूरा कथानक शक्ति तथा गोपनीय ज्ञान प्राप्त करने के प्रयास से गुंथा हुआ है। बच्चे जादूगरी की तालीम पाते हुये सिर्फ अपना भला करना सीख रहे हैं। बच्चे सीख रहे हैं कि पर्यावरण को सुविधानुसार बदल डालो। लोगों को उनकी मर्जी के खिलाफ काम कराने के लिये दवायें पिलाने की मंशा पर जोर है।हर मुश्किल से
निजात पाने के लिये जादुई ताकतों पर कब्जा करने पर जोर है। ऐन-केन-प्रकारेण अपने लक्ष्य पाने की यानी कि साधनों की चिंता बिना काम को अंजाम देने का संदेश है।
हैरी पाटर के लक्ष्य प्राप्ति का अंदाज मुझे उस डायनासोर का अंदाज लगता है जो किसी मंजिल को पाने के लिये दौड़ रहा है तथा उसके रास्ते में जो कोई भी आ रहा है वह भू लुंठित होता जा रहा हैं। जाने -अनजाने मैं जब भी इस मासूम चेहरे वाले बच्चे को देखता हूं तो लगता है कि ऐन-केन-प्रकारेण अकेले दम मंजिल हासिल करने की सीख घुट्टी में पीने वाला यह बच्चा धीरे-धीरे उस मानसिकता में पहुंच जायेगा जब जो यह सोचेगा वही सच मानेगा। जिसे गलत देखेगा ,रौंद डालेगा।
हैरी पाटर के लक्ष्य प्राप्ति का अंदाज मुझे उस डायनासोर का अंदाज लगता है जो किसी मंजिल को पाने के लिये दौड़ रहा है तथा उसके रास्ते में जो कोई भी आ रहा है वह भू लुंठित होता जा रहा हैं।
हैरी पाटर को जब याद करता हूं तो अनायास होरी याद आता है।होरी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान का नायक है जो कर्ज में डूब के मरा। हैरी और होरी दोनों के लेखक संयोग से ३१ जुलाई को पैदा हुये थे। हां दोनों की नियति में अंतर था। प्रेमचंद ने समाज की स्थितियों से प्रभावित होकर अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़ी तथा जब १९३६ में लखनऊ में प्रगतिशील आंदोलन की स्थापना करने आये तो उनके जूते फटे थे। उनका मानना था कि साहित्य, समाज तथा राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। जो समय की मांग थी उसे अपने साहित्य के माध्यम से दुनिया के सामने रखा । तमाम सवालों के हल सोचे। दबे-कुचलों की स्थितियां बयान की तथा उनके बदलाव के लिये जमीन बनाने का रास्ता सुझाया। साम्राज्यवादियों तथा प्रतिगामी राजनीति की पोल खोलने का प्रयास किया । सभी जगह समानता तथा सामूहिकताकी वकालत की।
उसके वरक्स ,अपनी हर किताब से दिन पर दिन संपन्न होती जा रही ,हैरी पाटर की लेखिका अपने पाठक वर्ग को तिलिस्मी संसार में ले जाती हैं। जहां -नहिं कोउ अबुध न लक्षन हीना।हैरी पाटर में प्रेम तथा साहस तो है लेकिन सही गलत में घालमेल है।बाल मन को भूलभुलैया में ले जाकर छोड़ दिया जाता है।जहां वह देखता कि नायक हैरी का जादू अलादीन का वह चिराग है जिसके बाद फिर कुछ करने को नहीं रह जाता। यह हैरी का हल्ला बिकाऊ तो है लेकिन टिकाऊ नहीं है।इसके पांव हवा में हैं। कुछ साल में इसकी हवा निकल जायेगी।
हैरी का हल्ला बिकाऊ तो है लेकिन टिकाऊ नहीं है।इसके पांव हवा में हैं। कुछ साल में इसकी हवा निकल जायेगी।
हैरी पाटर की तुलना प्रेमचंद के ही आसपास रहे देवकीनंदनखत्री की चंद्रकांता सीरीज की किताबों से की जा सकती है। अपने जमाने खत्री जी का लिखा पढ़ने के लिये लोगों ने हिंदी सीखी। आज वे ‘ऐयारी’ के किस्से इतिहास में दफन हैं।हालत यह है कि पचास रुपये में १००० से अधिक पन्नों की‘देवकीनंदनसमग्र’ की बिक्री ठप्प है। ऐयारी का नशा उतर गया, हर नशे का समय होता है।
होरी का नाम तो ऊपर लिया गया नाम साम्य के लिये। हैरी का मुकाबला करा लीजिये हामिद से। तीस के दशक का हामिद का चिमटा आज भी हैरी के सैकड़ों डिजाइनर जादुओं तथा ताम-झाम पर भारी पड़ेगा। ईदगाह में उस जमाने के मंहगे खिलौनों की हवा निकालते हुये हामिद अपने चिमटे के बारे में बताता है:-
उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।
हामिद के पास अभाव की पूंजी है । वह तमाम दुनियावी ताम-झाम में भी अपनी दादी को नहीं भूलता। बाजार की चीजों के प्रति ललक है लेकिन अंधा लालच नहीं कि ० डाउनपेमेंट की किस्तों पर लुभावनी चीजें खरीद ले।
हैरी पाटर की नकारात्मकता यह है कि खास लोगों की सोच का प्रतिनिधित्व करती है। गरीब अश्वेत बच्चे कहीं नहीं हैं यहां। अपने साधनों पर खुशी हासिल करने के बजाय ताकत ,किसी भी कीमत पर , हासिल करने की सीख साम्राज्यवादी अंदाज है। हैरी पाटर को हर हाल में जीतना है क्योंकि वह साम्राज्यवादी प्रभुता का प्रतीक है।
हैरी का मुकाबला करा लीजिये हामिद से। तीस के दशक का हामिद का चिमटा आज भी हैरी के सैकड़ों डिजाइनर जादुओं तथा ताम-झाम पर भारी पड़ेगा।
आज हैरी के दिन हैं । समय से बड़ा कोई नहीं होता । पर मुझे न जाने क्यों‘ईदगाह’ कहानी के कुछ पन्ने हैरी पाटर के हजारों पन्नों पर भारी लगते हैं तथा हामिद का चिमटा हैरी के किसी भी जादू से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा लगता है। कारण शायद यह भी है कि हामिद का सच मुझे अपना सच लगता है जबकि हैरी पाटर का सच किसी का सच नहीं है सिवाय चंद लोगोंकी फंतासी के।
आपको क्या लगता है?

13 responses to “हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा”

  1. eswami
    विडियो गेम खेलने से कबड्डी खेलना मन और स्वास्थ्य के लिये ज्यादा सही है.गालिब की गज़लें “कांटा लगा” छाप रीमिक्स से ज्यादा स्तरीय हैं. पिज्जा से दलिया ज्यादा उचित है. ऐसी तमाम तुलनाएं साहित्य के अलावा भी हर जगह कर सकता हूं. दुनिया मे हर चीज की एक जगह,एक बाजार और एक भूमिका है और कोई भी काम करने का तरीका अलग-अलग समाजों मे अलग-अलग हो सकता है.
    अगर आपने बचपन मे कामिक्स कथाएं नही पढीं तो आप स्पाईडर मेन किल-बिल १ और २, सिन सिटी जैसी फ़िल्मों मे दिखाई कलात्मक हिंसा – जी हां, कलात्मक हिंसा बहुत ही सुंदर, कलात्मक हिंसा सराहने के काबिल नही – बाकायदा बाउंसर निकल जाएगी – “इस मे क्या है” टाईप! भले ही सत्यजित राय वाली शतरंज के खिलाडी को समीक्षित कर सको और उपन्यास से कितना न्याय हुआ इस पर पेल मचा सको!पर आप किल-बिल मे क्विंटन टेरेन्टिनो ने क्या कमाल किया है समझ नही सकोगे संदेश कैसे दिया है समझ नही सकोगे!
    साहित्य का उद्देश्य हमेशा शिक्षित करना ही क्यों हो? मनोरंजित करना भी तो हो – मनोरंजन के बाद, पढने की लत के बाद धीरे से स्वाद बदलो ना आप!आज हिंदी पढने वाले इस लिये कम है की या तो साहित्य मेलोड्रामा, कविता-शविता परोसता है या प्रवचन और उनको पढने वाले अपने आप को ज्यादा एलीट समझते हैं.
    हामिद का चिमटा उन तमाम बच्चों को गिल्ट देता है जिन्होंने मध्यमवर्गिय परिवारों मे भी पैदा हो कर बाल हठ किये होंगे – सारे हामिद जैसे स्याने नही होते इस का ये मतलब नही की बाकी बच्चे अपने माता-पिता की आर्थिक सीमितता नही समझे होंगे, बाल-मन है खिलौना चाहेगा. और उन तमाम मा-बाप को ये शिक्षा देता है की तुम्हारा बच्चा हामिद है या नही इस की लिटमस टेस्ट लो और ना हो तो पडोसी की औलाद हामिद है वो नही है ये तुलना करने से मत चूको!क्या ये नही होता? क्या ये नही हुआ?? भाड मे गया हामिद और उसका चिमटा – मेरी चले तो ये कहानी कालिज के लेवल पर कोर्स मे होना चाहिए स्कूल के लेवल पर नही! गिल्ट-मांगरीग देसी मेन्टेलिटी को प्रमोट करती है ये कहानी!!
  2. Anaam
    सही लिखा है बन्धु! शीर्षक बहुत ही बढिया है! शुक्ला जी आपकी बातें मन को छू लेती हैं| लगता है..किसी ने हमारे दिमाग़ से विचार निकाल कर यहान र्रख दिये हों| आप तो गुरु हैं हमारे!
  3. आशीष
    सही कहे हो शुक्ला जी। दम है। लेकिन क्या हमारे चन्दामामा, मधुमुस्कान, लोटपोट और पंचतन्त्र की कहानियां हैरी पॉटर से कम हैं? कम से कम मुझे तो नहीं लगता है। सवाल है बाजारीकरण और भारतीय मानसिकता का। हमारे भारतीय प्रकाशक और भारतीय पाठक विदेशी घटियापन को पढ़ने के लिये काफ़ी रकम खर्च कर सकते हैं लेकिन जब वही रकम अच्छे देसी सामान पर खर्च करने को कहा जाये तो मोलभाव होता है और आलोचनायें होती हैं और ये है गुलाम मानसिकता और हीनता के भाव के कारण।
  4. अनुनाद
    हामिद और हैरी अपनी-आपनी पसन्द और अपनी-अपनी सोच का विषय है |
    ये इससे निर्धारित होता है कि आप साहित्य ( स + हित्य ; या, हित सहित ) का उद्देश्य क्या मानते हैं | जैसे तुलसीदास जी का मानना है कि -
    कीरति भनिति भूति भलि सोई |
    सुरसरि सम सबकर हित होई ||
    ( वही कीर्ति , कविता और धन अच्छा है जो गंगा के समान सबके लिये हितकर हो )
    शुक्ला जी को साधुवाद जो धारा के विपरीत चलने का साहस करते हैं | धारा की दिशा में तो प्राणहीन तिनका भी बह लेता है |
    अनुनाद्
  5. फ़ुरसतिया » ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की कहानी है
    [...] नहीं जीवनबोध की कहानी है मेरे लेखहैरी पाटर का जादू तथा हामिद का चिमटा पर [...]
  6. फुरसतिया » अपनी फोटो भेजिये न!
    [...] जोशीजे बताया कि उन्होंने मेरे लेख हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा और जहां का रावण कभी नहीं मरता पढ़ रखे हैं। इन दोनों लेखों से ही उन्होंने अन्दाजा लगा लिया कि हम कोई लेखक टाइप के आइटम होंगे। और उन्होंने हमारी फोटो मांगी संग्रह के लिये। [...]
  7. फुरसतिया » पत्रकार ब्लागिंग काहे न करें, जम के करें!
    [...] बहसें पहले भी होती रहीं हैं। हैरी पाटर बनाम हामिद और अमेरिकी जीवन पर तमाम ब्लागर्स ने इसके पहले तमाम गर्मागर्म बहसें कीं लेकिन इतनी श्रद्धापूर्वक नहीं। हिंदी ब्लागिंग के कुछ बेहतरीन लेख अनुगूंज में मिल सकते हैं। [...]
  8. ईमानदारी - खरीद न सको तो मैनेज कर लो
    [...] भी पढिये न: 1. हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा 2. ईदगाह अपराधबोध की नहीं जीवनबोध की [...]
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] दिये जायें ? 2.अधूरे कामों का बादशाह 3.हैरी का जादू बनाम हामिद का चिमटा 4.अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी [...]
  10. संतोष त्रिवेदी
    आज की पीढ़ी जिस तरह अपने नए आदर्श गढ़ रही है,हैरी उसी का मोहरा है !इसे हमारा दुर्भाग्य कहिये या सौभाग्य ,हम जिस ज़माने में पैदा हुए और जहाँ लिखाई-पढ़ाई की, वहां हैरी कहीं दूर तक नहीं दिखा! ‘होरी और ‘हामिद’ भले ही हमारे प्रेरणास्रोत रहे हों आज के युवा उनके बारे में सोचना भी पसंद नहीं करेंगे !
    मुंशी प्रेमचंद का लेखन शौकिया और समाजसेवा के लिए था,जबकि रोलिंग साहिबा का विशुद्ध व्यावसायिक.मुंशीजी ने यथार्थ को कागज़ पर उतारा जबकि इनने फंतासी को हवा में!आर्थिक लिहाज़ से रोलिंग की सफलता-दर बहुत अधिक है पर साहित्य का वास्तविक मूल्य उसके पाठक और उसका उद्देश्य होता है,जिसमें कथा-सम्राट प्रेमचंद जी के आगे कोई नहीं टिकता !
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..‘स्लटवाक’ के पैरोकार !
  11. Anonymous
    हर्री पोट्टर एक काल्पनिक कथा है… इसकी तुलना वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित कथाओं से नहीं करनी चाहिए.
  12. चंदन कुमार मिश्र
    हम इतने उदार नहीं क्योंकि हम बुद्ध नहीं जो स्वामी जी की तरह सोच सकें। वे एक साम्राज्यवादी और पूँजीवादी विचारधारा के मानने वाले लगते हैं, हालांकि वे सम्माननीय हैं, आदरणीय हैं, बेहतर लिखते हैं, अन्दाज भी बढ़िया और अनोखा है उनका। लेकिन हैरी और रोलिंग पर आपका लिखा एक नये पक्ष को सामने लाता है। ये सब लूट पाट का नमूना है…जिससे जनता को लगाना चूना है…
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..एक बार फ़िर आ जाओ (गाँधी जी पर एक गीत)
  13. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    ग़ज़ब का आलेख है। बहुत बढ़िया।