Wednesday, January 25, 2006

कविता के बहाने सांड़ से गप्प

http://web.archive.org/web/20101216174005/http://hindini.com/fursatiya/archives/101

कविता के बहाने सांड़ से गप्प

जीतेन्दर की बुराई की लिस्ट देखी। ये भी पूरे नेता हो गये हैं। बिना दल-बल,झोली-झंडे के। होता है ऐसा। जब आदमी कुछ नहीं करता तब नेतागीरी करना चाहता है। नेता तो बात से कहकर मुकरते हैं ये लिखकर पलट गये। तमाम बुराई की लिस्ट टाइप कर दी लेकिन वह नहीं लिखा जिसे दुनिया जानती है-नापसन्दःनहाने के बाद,पत्नी द्वारा,बाथरूम मे वाइपर लगाने को बाध्य किया जाना हमारे एक दोस्त जीतेन्दर का ब्लाग पढ़ते हैं । वे एक दिन आये ।पूछा कुछ लिखा? हम बोले -नहीं।बोले काहे? हम बोले-बस यूं ही। वो बोले ये तुमने अच्छा किया। कम से कम आज का दिन तो चैन से गुजरेगा वर्ना तुम आते ही टिप्पणी के लिये पीछे पड़ जाते।
फिर वो बोले-उन्होंने कुछ लिखा? हमने कहा-किन्होंने?वे बोले-वही जिनको पत्नी द्वारा नहाने के बाद वाइपर लगाने के लिये बाध्य किया जाना नापसन्द है। हमने बताया अच्छा जीतू!जीतू ने कुछ नहीं लिखा बहुत दिन से। वो बोले -काहे नहीं लिखा? हम बोले -नहीं चाहते होंगे लोगों को परेशान करना।अब यह विवाद का विषय है कि जो बात जीतेंदर को नापसन्द है वह बुरी काहे नहीं लगती। अगर बुरी नहीं लगती तो नापसंद किसलिये है? अगर नापसंद है,बुरी भी लगती है तो उल्लेख किसलिये नहीं किया?
बहरहाल ,जैसे रागदरबारी में किसी एक को कुश की गांठ लगाते देखकर पूरा गांव गांठ लगाने पर उमड़ पड़ता है वैसे ही जीतेंदर की ‘बुरी लिस्ट’ देखकर लोगों ने अपनी भी बुराइयां बता दीं।
मेरा मन भी तमाम बुराइयां बताने का कर रहा है। लेकिन केवल हम सबसे बुरी लगने वाले बात बतायेंगे। आप लोग हंसना हो तो हंस लेना लेकिन यह सच बात है जो मैं बताने जा रहा हूं। हमको सबसे बुरा लगता है कि सांड कविता नहीं सुनते।उससे भी बुरा मुझे यह लगा कि यह बात सांड ने हमसे छिपा कर रखी।
स्वामीजी ने बताया कि सांड तथा भैंस कविता नहीं सुनते। यह सुनकर हमें बहुत खराब लगा । हमें सांड से यह आशा कतई नहीं थी। हमें लगा कि उससे तो अच्छे हम ब्लागर बंधु हैं जो हर कविता पढ़ते हैं। महिलाओं की हुई तो बिना पढ़े तारीफ भी करते हैं। लेकिन नजरअंदाज नहीं करते।टिप्पणी भले न करें लेकिन ठोकर (Hit)जरूर मारते हैं।
लेकिन रह-रहकर हमें सांड़ों के साथ बिताये दिन याद आ रहे थे।अभी भी सांड़-संगति से मरहूम नहीं हुये हैं। मुझे लगा हो न हो यह सांड़ की लोकप्रियता से जले लोगों द्वारा कराया गया फर्जी स्टिंग आपरेशन हो।
सांड आमतौर पर शान्त जानवर होता है। अपनी गरिमा के प्रति जागरूक। हर एक से पंगा नहीं लेता। प्रोटोकाल का हमेशा ख्याल रखता है।हमेशा बराबर वाले से लड़ता है। यह नहीं कि ताकत का मुजाहिरा करने के लिये चींटी के बिल पर हमला करे तथा पूंछ उठा के कहे कि जो हमारे खिलाफ होगा उसका यही हाल होगा।
सांड़ आमतौर पर आलस्य लपेटे रहता है। बंदर की तरह कूदता-फांदता नहीं। जहां खड़ा हो गया देश के विकास की तरह खड़ा रहता है। लेकिन जब मूड में आता है तो वो ‘सांड़ वाक’ करता है कि सारी सड़क पर तहलका मच जाता है। उसका फनफनाता सौन्दर्य अनुपम होता है।जब सांड़ अपने बराबर वाले सांड़ से भिड़ता है तो दो लगता है कि दो तकनीकी ब्लागर आपस में जूझ रहे हैं। उनके नथुनों से निकलती फुफकार से लगता है जैसे ब्लागर बंधु आपस में तकनीकी
लिंक का आदान-प्रदान कर रहे हों। सांडों की लडा़ई भी कभी अंत तक नहीं पहुंचती। कुछ देर माहौल को दहलाने के बाद वे कामर्शियल ब्रेक जैसा कुछ लेकर अपने-अपने धंधे से लग जाते हैं।
तो जब पता चला कि सांड़ कविता नहीं सुनते तो हमने सोचा सीधे सांड़जी से पूछा जाये कि माज़रा क्या है?किसलिये ऐसा हल्ला है?
ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा मुझे। सामने सड़क पर ही सांड़जी दिख गये। बगल में पुलिस का सिपाही ओवरलोडेड ट्रक ड्रायवर से दस का नोट लेकर नो इंट्री जोन से ट्रक पास करा रहा था।
सांड़जी उसे गांधीजी के पहले बंदर के अंदाज में,निर्निमेष कानून व्यवस्था की तरह निहार रहे थे। हमने दुआ -सलाम करके बात शुरू कर दी सीधे।
सांड़जी ऐसी अफवाह है कि आप कविता नहीं सुनते?
सांडजी मौनी बाबा बन गये लेकिन लगा कि वे खफा हैं। जनवरी की कड़क ठंड में भी उनके शरीर को छूकर आती हवा लू की मानिन्द लगी। उनकी आंख देखकर लगा कि किसी सांड़ को देखकर ही गालिब ने लिखा होगा-
सिर्फ रगो में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल,
जो आंख से ही न टपका तो लहू क्या है?

हमने विनम्रता पूर्वक सहमने का नाटक करते हुये कहा-लेकिन हम यह अफवाह सच नहीं मानते।मानते होते तो पूछते काहे?
सांड़जी कुछ शान्त से लगे। बोले यह सब मनगढ़ंत बाते हैं।हम कविता पसंद करते हैं। सुनते हैं ।लेकिन यह नहीं कि हर जोड़-तोड़-मोड़ को कविता मानकर वाह-वाह करें। हम चुपचाप सुनते हैं । झूठी वाह-वाह नहीं करते।
हमने पूछा कि श्रोता आमतौर पर कवि बन जाता है । आप पर कुछ असर हुआ ?
सांड़जी शरमाते हुये बोले-तब क्या? हम तो बाकायदा कवि हैं। स्थितियों ने हमे कवि बनने पर मजबूर कर दिया। हम न चाहते हुये भी कवि बनने को बाध्य हैं।
हमारे चेहरे पर प्रश्नचिन्ह देखकर सांड़जी मुस्कराने भी लगे। बगल की तमाम गायें उनकी तरफ उसी तरह देखने लगीं जिस तरह पाकिस्तानी बालायें परसों आफरीदी को देख रहीं थीं। कुछ माड गायें तो सांड़जी की तरफ देखते हुये जुगाली तक करना भूल गयीं। कुछ भूखी होने के बावजूद बहुत तेज गति से मुंह चलाने लगीं।
सांड़जी ने शंका समाधान किया-कविता कानून की धारा संख्या १ के अनुसार कवि को वियोगी होना अनिवार्य है:-
वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा गान
उमड़कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।

तो हम हमेशा अकेले रहते हैं। कभी किसी के साथ टहलते नहीं पाये गये। लिहाजा हम कवि की उपाधि के सर्वथा अनुकूल हैं। इनटाईटिलमेंट के हिसाब से हम पक्के कवि हैं। हैं कि नहीं?
अब हम कैसे न कहते? सांड़ की भाले सी नुकीली सींगे हमसे हां-हां सही कहते हैं,कहला रहीं थीं।
सांड़जी से हमने अनुरोध किया कि वे कुछ सुनायें। लेकिन उन्होनें बताया कि उनको कवितायें याद नहीं रहतीं। हमने कहा ऐसा कैसे? वे बोले -असल में हम माडर्न कवितायें लिखते हैं जिनको कोई याद नहीं कर सकता। बस पढ़ा-सुनाया जा सकता है।
हमने पूछा कि फिर भी कुछ थीम-वीम ही बता दीजिये किस तरह की कवितायें लिखते हैं।
वे बोले -यार क्या बतायें कुछ समझ में नहीं आती बस लिख देते हैं। फिर भी जहां तक थीम की बात है तो समझ लो (जहां तक मुझे याद है)कुछ इस तरह की पंक्तियां रहती हैं:-
१.तुम मुझे याद करते होगे।
२.रात बिजली चली गयी,हमने मोमबत्ती जला ली।
३.दुख का सुख भी कितना मोहक है?
४.रात तुम आये थे-बताया नहीं!
५.सूरज ठिठुरा,बेचारा,बेमौत मरा।
हमने पूछा किस छंद में लिखते हैं?हायकू वगैरह भी लिखते हैं?
वो बोले हर विधा में लिखता हूं।जब सांस लेते हूं समझो हायकू लिख रहा हूं।डकारता हूं तो वीर रस निकलता हूं। जब कोई गाय देखता हूं तो प्रेम कविता जन्मती है। अभी जब तुमसे बतिया रहा हूं तो हास्य फूट रहा है।वाकई तुम काफी मूर्खता पूर्ण बातें कर लेते हो।
हमने कहा सांड़जी आप ऐसी बातें करेंगे तो हम आप से गुस्सा हो जायेंगे। फिर आपके अगेन्स्ट में पोस्ट लिख देंगे।
सांड़जी बोले-हाऊ स्वीट! कितना प्यारा बुरा मानते हो? इतना प्यारा बुरा तो महिला ब्लागर भी नहीं मान पाती होंगी।
हमने कहा कि सांड़जी कोई कविता संग्रह छपाया?
वे उदास हो गये। बोले यार पता नहीं जबसे ब्लागिंग का चलन चला है तब से देख रहा हूं कि मेरे सारे कागज गायब हो रहे हैं।मैं जिस भी किसी कविता को पढ़ता हूं मुझे लगता है कुछ ऐसा ही तो मैंने भी लिखा था।लेकिन कोई प्रमाण नहीं मिलता तो किससे कहूं? अब देखो ये जो दशहरे वाली रचना लिखी है वो मुझे जीतेंदर चौधरी की लगती है लेकिन देखने से लगता है यह किसी डेस्कजी की अभिव्यक्ति है। कोफ्त की बात तो यह है कि लोग हमारा लिखा हमें ही सुना के हमसे दाद ले जाते हैं।उनके जाने के बाद याद आता है कि यह तो हमारा ही कलाम था।
इसीलिये किसी अनजान आदमी को सुनना-सुनाना बंद कर दिया। शायद इसीलिये लोगों ने अफवाह उड़ा दी कि सांड़ कविता नहीं सुनते।
हम तमाम और बातें पूछने के लिये सवाल जमा रहे थे कि सांड़जी उठकर पास के कैफे की तरफ चल दिये यह कहते हुये कि उनका ब्लागिंग का समय हो गया।
हम यह सोचते हुये लौट रहे थे कि अगर सांड़जी जितना नियमित हमारे ब्लागर होते तो जीतेंदर की एक बुराई तो कम होती -बहुत बुरा लगता है जब हिन्दी ब्लॉगर बहुत दिन तक नही लिखते ।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

9 responses to “कविता के बहाने सांड़ से गप्प”

  1. प्रत्यक्षा
    तो भैंस/सांड के आगे आपने बीन बजा ही दी.हम रिंग साईड पर बैठे अगले मैतादोर को देखने का इंतज़ार करें. इस बार बीन या लाल मुलेता ?
    प्रत्यक्षा :-)
  2. प्रत्यक्षा
    तो भैंस/सांड के आगे आपने बीन बजा ही दी.हम रिंग साईड पर बैठे अगले मैतादोर को देखने का इंतज़ार करें. इस बार बीन या ‘मुलेता’ ?
    प्रत्यक्षा :-)
  3. जीतू
    शुकुल तुम डटे रहो, सांड के सामने, लेकिन ध्यान रखना।
    सांड को तुमने वीर रस दिखे ठीक है, हास्य रस दिखे वो भी ठीक है, लेकिन ध्यान रखना कंही उसे श्रृंगार रस या प्रेम रस दिख गया तो दिक्कत हो जायेगी। कंही ऐसा ना हो तुम आगे आगे भागो और सांड पीछे पीछे।इसलिये सांड की संगति जरा बच के करो।
    रही बात हमारे लेख की, तो भैया हमने साइट देखी है, ये हमारे संजय विद्रोही है, पूरी साइट ही कंही की ईट कंही का रोड़ा दिख रही है, कम से कम हमारा नाम ही दे दिया होता तो हमे सकून होता। अब तो लग रहा है सारे लेख कापीराइट करवा लें, ताकि केस वगैरहा तो किया जा सके।
  4. आशीष
    फुरसतया जी, आप तो साँड से गपियाने लग गये और आपकी साइकिल रूक गयी. उसे भी तो चालू किजीये
    आशीष
  5. kali
    What happened to your cycle my friend !!! Please fill air in tube, repair the pancher and go peddling again.
  6. फ़ुरसतिया » बिहार वाया बनारस
    [...] े हमें साइकिल यात्रा लिखने के लिये कोंच रहे हैं। कालीचरन भी आशीष की आवाज में [...]
  7. Tarun
    बस अनुप जी,एक बात का ध्यान रहे, वैसे तो आप इस बार सकुशल आ गये है, कभी भी लाल कपडा पहन ना जाये नही तो सांड सिर्फ वीर रस की कविता ही नही लिखता वरन गदर मचा देता है. ;)
    वैसे कोई कुछ भी कहे, लेख लिखा अच्छा है.
  8. फुरसतिया » आवश्यकता है डिजाइनर सांडों की
    [...] के बहाने सांड़ से गप्प सूचनाPopularity: 1% [?]Share This (No Ratings Yet)  Loading …  [...]
  9. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] पंथ है 4.देबाशीष चक्रबर्ती से बातचीत 5.कविता के बहाने सांड़ से गप्प 6.बिहार वाया बनारस 7.श्रीलाल शुक्ल-विरल [...]

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Friday, January 20, 2006

देबाशीष चक्रबर्ती से बातचीत


देबाशीष चक्रबर्ती से बातचीत

कुछ दिन पहले शब्दांजलि में हमने साक्षात्कार की शुरुआत की थी। पहली बातचीत देबाशीष से की गई थी।आजकल देबाशीष अभी इंडीब्लागीस का काम खत्म करके तमाम लोगों की तारीफ बुराई समेट रहे हैं। यह साक्षात्कार जिन लोगों ने शब्दांजलि में नहीं पढ़ा उनके लिये खासतौर पर यहां पेश किया जा रहा है-जस का तस।
[शब्दांजलि के इस अंक से हम अपने पाठकों के लिये खास स्तम्भ शुरु कर रहे हैं। यह खास स्तम्भ है हिंदी जगत की जानी-मानी हस्तियों से साक्षात्कार का । स्तम्भ की शुरुआत ऐसे शख्स से की जा रही है जिसे हिंदी ब्लाग जगत की तमाम गतिविधियों को शुरु करने तथा उनको जारी रखते हुये हिंदी चिट्ठाकारी को बुलंदियों तक पहुंचाने के लिये सतत प्रयत्नशील व्यक्ति के रूप में जाना जाता है । हिंदी ब्लाग नुक्ताचीनी तथा अंग्रेजी ब्लाग जेरोलर के लेखक देबाशीश चक्रबर्ती मेधावी ,मेहनती तथा हिंदी-अंग्रेजी भाषाओं पर जबरदस्त अधिकार रखते वाले व्यक्ति हैं। देबाशीष के बारे में उनके मित्र पंकज का मानना है- देबू 'गीक' टाइप शख्सियत है। जिनको नयापन आकर्षित करता है। चुनौतियां काम करने को उकसाती हैं। जहां चुनौती खत्म वहां रुचि समाप्त। देबू बेचैन रूह के परिंदे हैं जो हरदम कुछ नया,आकर्षक तथा उपयोगी करने को छटपटाते रहते हैं। हिंदी चिट्ठाकारी की लगभग सभी गतिविधियॊं वो चाहे अनुगूंज हो या बुनोकहानी.निरंतर हो या ब्लागनाद.ब्लागरोल हो या फिर चिट्ठाचर्चा सभी में देबाशीष का योगदान रहा है।इंडीब्लागर तथा चिट्ठा विश्व के तो ये पीर-बाबर्ची-भिस्ती-खर रहे हैं।
यही कारण है कि हिंदी ब्लाग जगत के जाने-माने लेखक रविरतलामी देबाशीष को हिंदी हिन्दी ब्लॉग जगत का पितृपुरूष मानते हैं ।
जब देबाशीष से साक्षात्कार के लिये अनुरोध किया गया तो तमाम व्यस्तताऒं के बावजूद तुरन्त तैयार हो गये। सारे सवालों के
जवाब ऐसे टाइप करके भेजे कि कहीं सुधार की गुंजाइस नहीं पायी गयी । इसी 'परफ़ेक्शनिस्ट अप्रोच के लिये देबाशीष जाने जाते हैं। आइये पढिये विविध विषयों पर देबाशीष चक्रवर्ती के विचार। शब्दांजलि के लिये देबाशीष से बातचीत की अनूप शुक्ला ने]
देबाशीष चक्रवर्ती
बचपन में किस रूप में जाने जाते रहे? पढ़ाकू, धीर-गंभीर या शरारती?
अनूप भाई,पहचान का पैमाना तो सापेक्ष ही होता है। जो नज़दीकी हैं, खास मित्र हैं, संबंधी हैं वे शायद मेरा मज़ाकिया और बातूनी स्वभाव जानते हैं, बाकी शायद धीर गंभीर और कुछ हद तक दंभी भी मानते हों, क्योंकि मूलतः मैं अंतर्मुखी हूँ और मित्रता करने में काफी समय लगता है। बाकी शरारतें तो बहुत कीं, मार भी खायी पर कह सकता हूँ कि शरारती शायद कम ही था।
जब दसवीं में म.प्र. में चौथा स्थान पाया तो कैसा लगा? इससे ज्यादा खुशी किसी उपलब्धि हासिल करने में हुई?
यह तो काफी पहले यानी १९८७ की बात है, स्कूली शिक्षा के दौरान मेधावी छात्र माना जाता रहा था शायद इसलिये बात का महत्व तब समझ नहीं आया, प्रदेश के मुख्यमंत्री का बधाई संदेश, अखबारों में चित्र परिचय से माता पिता ज्यादा गौरवान्वित होते रहे। हाँ ज्यादा खुशी २००० में हुई जब मैंने नौकरी छोड़ कर सी.डैक का कोर्स पूर्ण किया। विवाहित था। स्वयं के पैसे और कैरियर दांव पर लगा था और निर्णय स्वयं का ही था शायद इसलिये परिणाम ज्यादा मीठे लगे। साथियों और माता पिता व जीवनसाथी सभी की दाद भी मिली। काफी रिस्की काम था, बस मलाल यही रहा कि सूचना प्रौद्योगिकी की गाड़ी पकड़ने में ५ साल गंवा दिये।
हॉस्टल के अनुभव कैसे रहे? हॉस्टल के किन्ही दोस्तों से अभी भी संपर्क हैं?
वे चार साल तो स्मरणीय दिन हैं, पहली बार घर से बाहर रहा। जब डिग्री मिल जाने के बाद शहर छोड़ने का मौका आया तो लिपट कर खूब रोया भी यारों से। ‘ईग्रुप्स’ व ‘वेबसाईट्स’ के ज़रिये अब भी यदा कदा संपर्क बना रहता है। जो अपने ही शहर के हैं उनसे तो मेल मिलाप बना ही रहा। कुछ यहाँ पुणे में भी हैं। इतनी नौकरियाँ छोड़ने के बाद कई बार तो याद करना पड़ता है कि फलां परिचित का नाता कहाँ का है, कॉलेज का, कि पहले जॉब का कि सीडैक का या…।
कालेज में जो भित्ति पत्रिका(Wall Magzine) निकालते थे उसका विचार कैसे आया? उसकी आवृत्ति, भाषा, विषय क्या रहते थे आम तौर पर?
अपना प्रकाशन तो मैं हमेशा से चाहता था। तो मेरे एक खास मित्र के साथ यह विचार बना कि पत्रिका निकले, छपाई,’साइक्लोस्टाईलिंग’ का व्यय सहने की बात कॉलेज प्रशासन तुरंत टाल गया, सरकारी कॉलेज था तो सीमायें हमें भी मालूम थीं। तो सबसे सस्ता उपाय निकला कि इंजीनियरिंग की ड्राईंग शीट पर ही निकाला जाय, मित्र ने संभाला लेआउट और साज सज्जा का काम और हमने मोर्चा संभाला सामग्री का। पहला प्रयास था सो नाम रखा “द पायनियर“। अब तलाश की गई कैम्पस में ऐसे नोटिस बोर्ड की जिसमें शीशा साबुत हो, एक भी ऐसा बोर्ड मिला नहीं, अंतत: प्रिंसिपल साहब ने अपने आफिस के पास वाले बोर्ड के प्रयोग की अनुमति दी। बड़ा मज़ा आता था। भाषा, अंग्रेज़ी हिन्दी का मिश्रण होती थी। मेधावी छात्र-छात्राओं के साक्षात्कार, प्रोफेसरों के प्रोफाईल, कविताएँ, क्विज़, हास्य और विज्ञान से संबंधित विषय होते थे। काफी अंक निकले, कुछ तो मैंने सहेज कर रखे हैं अपने पास। फिर जब पढ़ाई का दबाव बढ़ा तो बंद भी कर देनी पड़ी। वैसे मेरे पिताजी अब भी मानते हैं कि इस ‘वॉल मैगेजीन’ की वजह से ही बी.ई. में मेरी आनर्स नहीं बनी।
तमाम ब्लागर दोस्त आपको दादा या चक्कू दादा भी कहते हैं। कभी दादा गीरी भी की क्या?
दादा तो बंगालियों के नाम के साथ अक्सर जुड़ जाया करता है। कुछ अब उम्र के तकाज़े से कह देते हैं। रही बात दादागिरी करने की तो भैया शादी के बाद तो दादागिरी करने की छोड़ो हर पति को बीवी की दादागिरी सहने की आदत डालनी पड़ती है।
कालेज से निकल के तमाम जगह नौकरी की। सबसे ज्यादा मनपसंद नौकरी कहां की रही?
नौकरी तो हर जगह की ठीक लगी, पर शायद मार्केटिंग का काम मेरे लिये या मैं इस कार्य के लिये उतना उपयुक्त नहीं था। अनुभव तो शॉप फ्लोर का भी लिया, प्रोडक्शन मैनेजमेंट का भी, विपणन का भी। पर आश्चर्य यह लगता है कि शुरुआती दिनों में कभी सूचना प्रोद्योगिकी में जाने की नहीं सूझी, हालांकि पाठ्यक्रम में पढ़ा पर कभी यह छुपा अनुराग सामने नहीं आ पाया। मेरी पहली नौकरी के दौरान एक कंप्यूटर संस्था ‘ईंवेंट्री मैनेजमेंट’ के लिये ‘फाक्सप्रो’ पर एक ‘कस्टम तंत्रांश’ बना रही थी, मैं ‘फंक्शनल’ जानकारी के लिये उनकी मदद करता था पर कई दफा में लॉजिक बनाने में भी सुझाव देता, एक दफा उनके संचालक महोदय सामने बैठे थे तो अनायास बोल पड़े, “बॉस आपको प्रोग्रामिंग में जाना चाहिये“। १९९५ में सीडैक के बंदे इंदौर आये थे, तब मैं वहीं से विद्युत सुरक्षा उपकरण के एक निर्माता एमडीएस स्विचगियर के लिये नियुक्त था। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिये हम “सी” का टेस्ट लेते हैं, मैं मुँह बना कर चला आया। फिर १९९९ में जाने क्या सूझी कि यही “सी” की एबीसी पढ़ी, अपनी ही जीवन संगिनी से, और आईटी का रुख किया, काश वे मुझसे चार साल पहले मिली होतीं।
देबू-मिताली
एक-दूजे के लिये
अपनी पत्नी की काफी तारीफ की है आपने अपनी साइट में। यह पारिवारिक दबाव है या सच?
मैं अपने पूरे होशो हवास में खुदा को हाज़िर नाज़िर जान कर यह कहता हूँ कि मेरे जीवन को संवारने में मेरी श्रीमतीजी का भारी योगदान है (कितना भारी, यह मत पूछियेगा)। मिताली मेरी फ्रेंड फिलॉस्फर और गाईड रही है, हौसला मैं उन्हीं से पाता हूँ। इसके अलावा वे हमारी कुशल होममेकर तो हैं ही, वरना मेरा क्या होता।
आमतौर पर लोग मेल, सर्फिंग, चैटिंग से होते हुये ब्लाग तक आते हैं। आपका सफर कैसा रहा?
चैटिंग मुझे खास नहीं भाती। कार्यस्थलों पर ज्यादातर इसकी मनाही भी कारण रही इस मोहभंग का। मेरे जियोसिटीज़ पर कुछ जालस्थल थे जो अद्यतन रखता था, ईमेल के अकाउंट भी खूब बनाये पर टिकाऊ तो याहू का ही रहा। अमिताभ, जावा सर्टीफिकेशन, अपना होमपेज जैसे जालस्थल बनाते बनाते न जाने कब ब्लॉगर पर भी खाता खोल लिया पर शुरुवात रेडिफ ब्लॉग से की, फिर ब्लॉगर और फिर जेरोलर। अब लगता है कि ब्लॉगिंग न होता तो जाने कैसी होती ज़िंदगी।
काफी लोग अपनी ब्लागिंग की शुरुआत का श्रेय आपको देते हैं। कैसा लगता है यह सुनकर?
बड़ा ही अच्छा लगता है, आलोक का ब्लॉग देखकर मैंने पद्मजा का ब्लॉग बनवाया, वो तब वेबदुनिया में मेरी सहकर्मी थीं, नाम भी सुझाया, फिर रहा न गया तो खुद भी कूद पड़ा मैदान में। यूनीकोड के बारे में जानता तो था पर ब्लॉग में प्रयोग आलोक के जालस्थल से ही सीखा। फिर अतुल, जीतू, संजय, पंकज जैसे लोग आये। ये लोग तकनीकी रूप से काफी जानते थे तो काम आसान रहा पर तकनीक ही बाधा भी बनती है तो मदद ज़रूरी होती है। कई लोगों को यूनिकोड के प्रयोग को लेकर शंका होती है, कौन सा फाँट प्रयोग करूं, टाईप कैसे करूं…कई किसी फाँट के प्रयोग के इतने आदी हो जाते हैं कि यूनिकोड का प्रयोग जंचता नहीं, कुछ और ब्लॉगवेयर की सेटिंग इत्यादि से परेशान हो जाते हैं। मैं ज्यादातर ईमेल के ज़रिये उन्हें मदद और प्रोत्साहन देता रहा, सार्वजनिक फोरम और मेलिंग लिस्ट पर कई लोग पूछने से हिचकिचाते हैं। खुशी होती है जब वे धन्यवाद कहते हैं।
जिनको लिखना बताया नेट पर उनको रोज लिखते देख कैसा लगता है? गुरु गुड़ चेला शक्कर या कुछ और?
लिखना तो किसी को नहीं सिखाया, इतना योग्य भी नहीं मानता खुद को। सब गुणी हैं और अपने फ़न में माहिर, हर ब्लॉग का अपना अलग ज़ायका है। आज तक किसी को यह बताने की हिम्मत तो नहीं हुई कि भैया फलां लिखो या फलां न लिखो, बताने वाले हम हैं भी कौन, बस हाँ हिन्दी अंग्रेज़ी मिक्स करके लिखने वालों से गुज़ारिश ज़रूर की कि हो सके तो अलग ब्लॉग बना दो, कईयों ने कृतार्थ भी किया।
जो लोग नियमित लिखते हैं, विविध विषयों पर लिखते हैं, आशुकवि हैं, खूब पढ़ कर लिखते हैं, उनसे ईर्ष्या होती है, मैं टाईप करने के मामले में आलसी ठहरा, आफिस में होता नहीं, घर आकर मन कहता है कंप्यूटर का फेर छोड़।
हिंदी ब्लागिंग की अभी तक की लगभग हर गतिविधि में आपका योगदान रहा । सबसे ज्यादा खुशनुमा अनुभव क्या रहा?
मेरा सौभाग्य है कि मैं कई गतिविधियों से जुड़ा जो मैंने स्वयं या ब्लॉगबंधुओं के साथ शुरु कीं। चिट्ठा विश्व के निर्माण ने दिल को काफी सुकून दिया है और नया संस्करण वैसा ही बन पड़ा जैसा मैंने चाहा। इंडीब्लॉगीज़, अनुगूँज, बुनो कहानी, चिट्ठाकार समूह सब ही बढ़िया कार्य रहे पर निःसंदेह निरंतर मन को सबसे ज्यादा प्रिय रहा है और रहेगा।
किस अनुभव से कोफ्त होती है?
कोफ्त तो नहीं होती पर स्वभाववश मैं उकता जाता हूँ किसी भी एकरस से कार्य से, मेरे कई जालस्थल बरसों से अपडेट नहीं हुए, जिस काम में जब लग गया तो फिर रात-दिन वही सोचता रहता हूँ और जहाँ मन तृप्त हो गया या काम में आनंद मिलना खत्म हुआ कि लगता है बस अब अलग हो जाओ। जब काम में नित दिन चैलेंज मिलता है तो उत्साह बना रहता है।
निरंतर में मेहनत बहुत पड़ गयी आपको। समय का अभाव भी इसके प्रकाशन के स्थगन का कारण रहा । अभी भी क्या इसके प्रकाशन की संभावनायें बनी हैं? क्या न्यूनतम आवश्यक्तायें चाहिये?
यह सच है कि नौकरी के साथ मासिक पत्रिका निकालना, भले जाल पर ही सही, मुश्किल रहा। समयाभाव तो टीम के सभी सदस्यों को रहा ही। हम पेशेवर प्रकाशक या पत्रकार तो हैं नहीं सो ‘रिसोर्सेस’ का अभाव तो बना रहता ही है। मसलन, मेधा पाटकर का साक्षात्कार लेने में मुझे खासी परेशानी हुई, व्यक्तिगत मुलाकात कई दिनों टलने के बाद अंतत: फोन पर बात हुई पर रिकार्डिंग इतनी खराब हुई कि केवल ६० फीसदी ही छाप पाये। साक्षात्कारों के लिये कई नामचीन सीधे मना कर देते हैं, कई टालते रहते हैं तो कई जवाब ही नहीं देते। यदि आप फुलटाईम यह करें तो शायद काम आसान हो जाय। प्रकाशन की जिम्मेवारी भी महती है। एक अच्छी कॉपी बनाना, जालस्थल के अनुरूप साज सज्जा व प्रस्तुतीकरण में समय तो लगता है। अगर यह काम कोई और संभाल लेता तो भी शायद पत्रिका चलती रहती। सारा काम संपादक मंडल को स्वयं संभालना ही शायद भारी पड़ा।
हिन्दी में अच्छी मौलिक सामग्री का मिलना भी मुश्किल होता है। इसलिये हमारी ५० फीसदी निर्भरता अनुदित सामग्री पर होने लगी। जो हिन्दी में लिखते हैं, ज्यादातर साहित्य सामग्री ही दे पाते हैं, प्रकाशन की व्यग्रता भी रहती है, आपने छापने में एक महीना से ज़्यादा लगा दिया तो जनाब दूसरे ही दिन अपने ब्लॉग पर छाप देते हैं। ब्लॉग और पत्रिका का भेद समझना ज़रूरी है। जैसा व्यवहार आप किसी प्रिंट पत्रिका के साथ करते हैं वह वेब पत्रिका के साथ क्यों नहीं करते।पर जो बात मुझे और संपादक मंडल के भी कुछ सदस्यों को खलती रही वह है पाठक संख्या। मैं यह मानता हूँ कि निरंतर पर उल्लेखनीय संख्या में ब्लॉग नहीं करने वाले पाठक भी रजिस्टर हुए पर फिर भी पाठक से जिस संवाद की, निरंतर प्रतिक्रिया की अपेक्षा रही वह कभी भी पूरी नहीं हुई। मुझे आश्चर्य होता है कि किसी महिला ब्लॉगर के नितांत साधारण पोस्ट पर भी दर्जनों टिप्पणी कर सकने वाले पाठक क्या जल जीवन विशेषांकजैसे अंक को भी महत्वहीन मान कर कुछ कहना मुनासिब नहीं समझते। क्या हमें पाठक पाने के लिये अधनंगे चित्रों और पेज थ्री जैसी सामग्री छापनी पड़ेगी?
ब्लॉग के मुकाबले पत्रिका को किस रूप में देखते हैं?
ब्लॉग हो या पत्रिका या टीवी आजकल निर्माता व प्रकाशक इंटरेक्टिविटी को तरजीह देते हैं। पाठकों, दर्शकों की राय मिलती रहे तो प्रयास कैसा बन पड़ रहा है यह पता चलता रहता है इससे दिशा निर्धारण में मदद मिलती है। ब्लॉग तो बने ही बातचीत के तत्व को लिये, अगर कमेंट हटा दें तो ब्लॉग की आत्मा ही निकल जावे। ब्लॉग वे पार्टिसिपेटरी वेब के उदाहरण भी हैं। जब कई मस्तिष्क एक साथ काम करें, जब वृहद विचारों का विलय हो जाये तो, “भीड़ चतुर हो जाती है”। निरंतर को हमने इसी लिये ब्लॉगज़ीन का रूप दिया था, एक आनलाईन पत्रिका भी ब्लॉग भी। आवृत्ति तय है, स्तंभ तय हैं, कलेवर और दिशा तय है यह पत्रिका के गुण और हर लेख पर पाठक तुरंत वहीं राय ज़ाहिर कर सके, वार्तालाप हो सके, यह ब्लॉग का गुण।
पत्रिका की कुछ सीमायें होती हैं, कलेवर और संपादकीय नीति के अंतर्गत चलने की बाध्यता है, सदा सटीक और त्रुटिरहित रहने का अनुशासन पालन करना होता है, पर ब्लॉग में यह सारी हदें और मजबूरियाँ नहीं हैं, आप बेपरवाह हो कर लिख सकते हैं, हिज्जों और तथ्यों की गलतियाँ, अशुद्ध वर्तनी, बिंदास-अनसेंसर्ड-भाषा ब्लॉग में चलेंगी पर पत्रिका के जानकार पाठक नाक-भौं सिकोड़ेंगे। माध्यमों का अंतर है, शायद इसीलिये ब्लॉगरों का पत्रिका निकालने का प्रयास उतना सफल नहीं रहा।
चिट्ठाविश्व की कल्पना कैसे हुई?चिट्ठाविश्व की मेरी कल्पना में पहले पहल दो चीजें थीं ब्लॉग ऐग्रीगेटर और चिट्ठाकारों के परिचय। ऐग्रीगेटर का काम तो ब्लॉगडिग्गर की संयुक्त फीड ने आसान कर दिया। शुरुआत की २००३ में। फिर और चीजें जुड़ती गईं जैसे चिट्ठासूची, चिट्ठों के रिव्यू, ट्रिविया, अन्य भाषाओं के चिट्ठों से सुर्खियाँ आदि। लोगों ने रुचि दिखाई, आप जैसों ने योदगान दिया, तो जोश भी मिला और सुधार करने का। आज का चिट्ठाविश्व भारतीय भाषाओं के चिट्ठों की डाईरेक्टरी, ऐग्रीगेटर, चिट्ठाजगत की गतिविधियों का समाचार स्रोत, ब्लॉग आँकड़ों, ट्रिविया, टैगक्लाउड — जो हिन्दी ब्लॉगजगत में चल रहे विषयों का एक अनूठा चित्र प्रस्तुत करता है — जैसे अनेक प्रकल्पों का समागम स्थल है, अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर इसे एक मिनी पोर्टल की संज्ञा दे दूँ। चिट्ठा चर्चा जैसे स्तंभों में आप की भागीदारी से यह और भी लोकप्रिय और मजबूत हुआ है।
हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की आज नेट पर क्या स्थिति है?
जाल पर चिट्ठों कि सही संख्या का पता लगा पाना टेड़ी खीर है। भारतीय भाषाओं में विशेषकर दक्षिण भारतीय भाषाओं में अपनी ही लिपि का ही प्रयोग कर जबरदस्त ब्लॉगिंग हो रही है। मैं बस उड़िया, पंजाबी जैसी कुछ भाषाओं के ही चिट्ठे नहीं खोज पाया अब तक। भारतीय भाषाओं में जालस्थलों की बात हो तो शायद स्थिति अलहदा हो, जो हैं ज्यादातर साहित्यिक पत्रिकायें हैं, या इक्का दुक्का पोर्टल। पर मेरे ख्याल से स्थिति काफी अच्छी है, बस “जानकारी की सटीक जानकारी होने” का ही अभाव है।
संभावनायें क्या हैं? सीमायें क्या हैं?
हमारे देश में हमने हर क्षेत्र में प्रगति अंग्रेज़ी का दामन पकड़ कर ही की है। हम विदेश में जाकर चीनी या जापानी कीबोर्ड पर काम करने को राजी रहते हैं पर अपने देश में हिन्दी कीबोर्ड की सोचना पिछड़ापन लगता है। मध्यप्रदेश जैसे हिन्दी बहुल प्रदेश में भी ऐसे कैफे खोज निकालना असंभव नहीं तो मुश्किल होगा जहाँ हिन्दी जालस्थल आसानी से देखे जा सकें। मुझे तो लगता है कि निज भाषा में कंप्यूटिंग का विचार कभी सरकारी योजनाओं में झलका ही नहीं। मैं सुनता आया हूँ कि लिनक्स के अवतरण से और सिंप्यूटर जैसे सस्ते माधयमों से कंप्यूटिंग का प्रसार होगा, ई गवर्नेंस परियोजनाओं से ग्रास रूट स्तर पर संचार क्रांति के फायदे महसूस किये जा सकेंगे, पर लगता है बातें कागजी ज्यादा हैं।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि कंप्यूटिंग के इस्तेमाल में शहरी और ग्रामीण स्तर पर काफी अमानताएं हैं। अव्वल तो यह कि गाँव देहात में जब बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएँ ही न हों तो कंप्यूटर, ईंटरनेट और ई-गवर्नेंस का ज़िक्र बेमानी हो जाता है, दूसरी बात यह कि जहाँ पहुँच है वहाँ इनका प्रयोग आसान और सटीक बनाना एक चुनौती है और जब तक ऐसे काम की ‘इकॉनामिक वायेबिलिटी’ न हो तो निजी क्षेत्र की कंपनियाँ इसमें हाथ डालेंगी नहीं, नतीजा सरकारी योजनाओं पर निर्भरता। और देश के नीति निर्धारक कैसे यह तय करते हैं कि क्या विकास योजनायें होंगी यह तो खैर लंबी बहस का विषय है। मैं तो इतना जानता हुँ कि अगर ईंटरनेट पर किसान को काम की जानकारी, मौसम का हाल, बीज-खाद के दाम और उपलब्धता, बाजार भाव सब पता चलने का तरीका मालूम चले तो वह कंप्यूटर का महत्व क्यों नहीं मानेगा। इसके बाद अगला कदम है जानकारी क्षेत्रीय भाषा में सुलभ कराना ताकि अंग्रेज़ी न जानना कंप्यूटर के प्रयोग में बाधक न बने। सब प्रशासकीय इच्छाशक्ति पर निर्भर होता है।
नेट पर हिंदी प्रसार की तात्कालिक जरूरत क्या हैं?
मुझे लगता है कि हिन्दी के प्रति रुचि बढ़ाने का एक बेहतर तरीका है कि हिन्दी साहित्य, अच्छे लेखकों की रचनाओं को मुफ्त मुहैया कराया जाय। स्कूल में अच्छी अंग्रेज़ी भाषा भी तो हमने उनके साहित्य से ही सीखी है। ज़माना ऐसा है कि हिन्दी साहित्य कोई खरीद के तो पढ़ नहीं रहा पर जाल पर मुफ्त में मिले तो शायद पढ़ें। जब अच्छा पढ़ेंगे तो अच्छा लिखेंगे भी। प्रयोग बढ़ा तो हिन्दी का प्रसार खुद ब खुद होगा।
जब हिंदी में ब्लागिंग शुरु हुयी थी तो बहुत कम लिखते थे लोग। अब लगभग रोज एक नया ब्लाग बन रहा है। १०० संख्या पार होने पर कैसा लगा?
बेहद खुशी का एहसास होता है कि लोगों के यूँ जुड़ते रहने से कारवां बनता गया, पर अभी तो यह आरंभिक दौर है, दक्षिण भारतीय ब्लॉगर ५०० का आंकड़ा पार कर गये हैं। हिन्दी चिट्ठाकारी के सैकड़ा पार करने पर यह कहना चाहूँगा कि संभवतः ऐसे बहुत होंगे जो इस पल की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब हम रोजमर्रा की बातचीत हिन्दी में कर सकते हैं तो बातचीत के लहज़े में नेट पर हिंदी क्यों न हो, खुशकिस्मती से ब्लॉगिंग ने यह कर दिखाया है। चिट्ठाकारी में हिन्दी “हिन्दी दिवस” के समारोहों के उद्बोधनों सरीखी क्लिष्ट और अनोखी नहीं है। लेखन में नियमितता आने से हिन्दी के प्रयोग की हिचक भी दूर हो जाती है। हम हिन्दी में सोचना शुरु कर देते हैं। मैं हिन्दी बचाओ जैसे आंदोलनों में कभी भी विश्वास नहीं रखता । चंद निबंध, सुलेख या स्लोगन प्रतियोगिताओं से हिन्दी भला क्या लोकप्रिय होगी? प्रयोग से ही प्रसार बढ़ेगा और ब्लॉगिंग से हिन्दी ने यही डगर पकड़ी है ।
आपके ब्लॉग नुक्ताचीनी का अंदाज अक्सर धीर-गंभीर सा रहता है? क्या कारण है कि ब्लागिंग का खिलंदड़ापन अक्सर कम देखने को मिलता है?
आपका विचार सही है, मैं लिखते वक्त काफी ‘कांशियस’(सजग) हो जाता हूँ, लंबे पोस्ट तो लगभग हर बार पहले स्क्रैप बुक में लिखता हूँ फिर टाईप करता हूँ। लगता है यह लिखना सही होगा या नहीं। सच कहूँ तो उम्र के तकाज़े से लिखना चाहता हूँ। लिखने के बाद, यहाँ तक की पोस्ट करने के बाद भी कई दफा बदलाव करता रहता हूँ, जो पाठक फीड के माध्यम से मेरा ब्लॉग पढ़ते हैं वो इसका असर झेलते होंगे। तो इस सारी जोड़तोड़ में शायद हास्य का पुट खत्म हो जाता है। मेरी ब्लॉगिंग की एक कमी जो पाठक कहते भी रहते हैं कि मैं नियमित नहीं लिखता, इसका मूल तो आलस्य ही है, कई बार जब विषय दिमाग में खलल मचा रहे होते हैं अगर तभी कहीं नोट कर लूँ तो ध्यान रहे, पर ऐसा होता नहीँ और खयाल फुर्र हो जाते हैं, कई दफा लिखने में इतनी देर हो जाती है कि विषय ही बासी हो जाने की वजह से लिखना टालना पड़ता है।
मेरा मानना है कि अंग्रेजी के ज्यादातर ब्लागर अखबार से समाचार कापी करके अपने ‘एक्सपर्ट कमेंट’ मार देते हैं। क्या यह सच है?
इतने वर्षों में जितने ब्लॉग मैं पढ़ता हूँ उनमें यह बात तो सच है कि ज्यादातर सामयिक घटनाक्रम पर कमेंट्री करते हैं। चूंकि कई समाचार पत्रों के आनलाईन अंक ताज़ा तरीन खबरें लगातार प्रकाशित करते हैं तो कड़ी देना स्वाभाविक है। इस तरह से कई ब्लॉग, और इसमें लोकप्रिय ब्लॉग भी शामिल हैं, केवल लिंक ब्लॉग बन कर रह गये हैं। सच कहूं तो सामयिक धटनाक्रमों पर टिप्पणी और परिचर्चा जैसी जिव्हा के ब्लॉग पर होती थी वैसी भारतीय ब्लॉगजगत में न हुई और निकट भविष्य में इसके आसार भी नज़र नहीं आते।
वैसे यह व्यक्तिगत चयन की बात है। उद्धरण करें या नहीं, करें तो कितना करें, यह सब तय नहीं रहता और तय हो भी नहीं सकता। ध्यान देने की बात शायद यही है कि स्रोत का उल्लेख अवश्य करें और अपने लेख और उद्धरित सामग्री का भेद स्पष्ट रखें। यदि पूरा पोस्ट केवल उद्धरित सामग्री से ही पटी है तो मुझे नहीं लगता कि पाठकों में ऐसे ब्लॉग ज़्यादा दिन रुचि बनाए रख पायेंगे।
जो ब्लाग हिंदी में लिखे जा रहे हैं वे अंग्रेजी के ब्लाग के मुकाबले कहां ठहरते हैं? गुणवत्ता तथा विषय सामग्री में?
यदि लोग नाराज न हों तो पूरी विनम्रता के साथ यही कहूँगा कि अभी दिल्ली दूर है। हिन्दी के पचास फीसदी ब्लॉग तो कविता और कहानियों के ब्लॉग से अटे पड़े हैं। मेरा साहित्य से कोई बैर नहीं और यह लेखक की अपनी रुचि की बात भी है कि वह क्या प्रकाशित करें पर मुझे लगता है कि ब्लॉग का एक मुख्य तत्व है इसकी अप्रत्याशितता। और ब्लॉग की विषय वस्तु अगर विविध है तो आप का पाठकवर्ग निश्चित ही विशाल होगा। यही कारण है कि ब्लॉग में श्रेणियों कि सुविधा दी गई। अगर कोई नहीं जानें कि कल मैं किस विषय पर लिखूंगा तो जिज्ञासा बनी रहे शायद। मुझे इस लिहाज़ से सुनील दीपक का चिट्ठा बड़ा अच्छा लगता है। इसके ठीक उलट टॉपिकल (विषय केंद्रित)ब्लॉग का भी अपना आकर्षण होता है, यदि आप किसी खास विषय पर महारत या रुचि रखते है तो लोग विषय की खोज करते वक्त शायद आपको ज़ेहन में रखें। हिन्दी ब्लॉगजगत में ज्ञान विज्ञान जैसे चिट्ठों को छोड़ दें तो टॉपिकल ब्लॉग की खासी कमी है, खेल, अर्थनीति जैसे विषयों पर यदा-कदा ही लिखा जाता है। १०० में से शायद ५ या दस लोग ही ब्लॉग नियमित अपडेट करते हैं।
इंडीब्लॉगीज़ शुरु करने का विचार कैसे आया? बहुत दिन तक आपके ब्लागर दोस्त भी नहीं जानते थे कि यह कौन करता है।
इंडीब्लॉगीज़ शुरु तो ब्लॉगीज़ की तर्ज़ पर ही की थी। भारतीय ब्लॉगमंडल तब काफी छोटा था पर मुझे लगता था कि हर कोई सीमित दायरे में ही पढ़ पाता होगा। कई दफा ऐसा हुआ कि किसी ब्लॉग पर गया और उसके ब्लॉगरोल पर नज़र डाली तो एक भी जाना पहचाना नाम नहीं मिला, तब एहसास होता कि जैसे-जैसे ब्लॉगमंडल विस्तार पा रहा है हम कई अच्छे ब्लॉग पढ़ ही नहीं पाते, समय की कमी तो अलग बात है, उनके बारे में हम जानते तक नहीं। मैंने अपना नाम गुप्त इसलिये रखा क्योंकि मुझे लगा कि लोग समझेंगे कि मैं इससे कुछ लाभ पाना चाहता हूँ, पर मेरी सोच शायद गलत थी। मेरा नाम सामने न आने का बहाना लेकर कई लोग ,जानबूझकर,उलजलूल टिप्पणी करने लगे। निर्णयों की निष्पक्षता पर आपत्ति करने लगे। जब मैंने २००४ के आयोजन के लिये ‘ज्यूरी मेम्बरों’ का समूह बनाया तो उनकी राय से मुझे यह लगा कि लोग आयोजन को ज़्यादा निष्पक्ष मानेंगे यदि मैं अपना नाम ज़ाहिर कर दूं। यह बात सही है कि यह करने के बाद कुछ अपवादों को छोड़ कर सभी का सहयोग बढ़ा और हमने काफी इनाम भी बाँटे- प्रायोजकों की बदौलत। खुशी होती है यह जानकर कि यह अवार्ड भारतीय ब्लॉगारों के अवार्ड के रूप में बाहर भी जाना जाता है।
हिंदी अंग्रेजी के किन ब्लागर को पसंद करते हैं किस लिये?
हिन्दी लेखकों में अनूप आप का लेखन तो मुझे शुरू से ही भाता है पर आपसे पहले से मैं मुरीद रहा हूँ अतुल का जिनका लाईफ इन एचओवी लेन बड़ा पसंद है। इनके अलावा जीतू और पंकज का बिंदास लेखन, सुनील दीपक, ईस्वामी भी पसंद हैं। पर हाँ हिन्दी के सभी चिट्ठे पढ़ता जरूर हूँ। अंग्रेज़ी के तो काफी ब्लॉग पढ़ता हूँ, किसी एक को चुनना मुश्किल है।
यह देखा गया है कि जब भी आपने साक्षात्कार की सोची तो अपने क्षेत्र के दिग्गज को ही चुना। क्या इस सोच की नींव बेबदुनिया में पड़ी?
शायद आप मेरे जालस्थल पर दी कड़ियों की बात कर रहे हैं। दरअसल मैं इंदौर में लगभग एक साल तक फ्री प्रेस जर्नल नामक एक अखबार के सूचना प्रोद्यिगिकी पर आधारित आधे पृष्ठ का साप्ताहिक सप्लीमेंट निकालता था। ये सारे साक्षात्कार इंदौर स्थित आईटी कंपनियों के संचालकों के हैं। वैसे संपादक के तौर पर साक्षात्कार के लिये व्यक्ति का चुनाव करते समय हमेशा मेरा उद्देश्य यही रहा कि पत्रिका को इनके नाम से नाम मिले। दूसरा ,जैसा मैने कहा, हर बार उत्साहवर्धक नतीजे नहीं मिलते जैसे निरंतर के जल-जीवन विशेषांक के लिये बार-बार करने पर भी राजेन्द्रसिंह और वंदना शिव के जवाब नहीं मिल पाये। वेबदुनिया की टीम से मेरा इतना संपर्क नहीं रहा तो उसके असर के बारे में तो नहीं कह सकता पर जाहिरा तौर पर कौन नहीं चाहता जानी-मानी हस्तियों को अपने मंच पर लाना।
भाजपा वालों पर अक्सर बरसते रहते हैं। क्या कारण है?
धर्म-संप्रदाय-जाति की राजनीति से मुझे नफरत है, चाहे दल कोई भी हो।
सईदन बी के अलावा रोजमर्रा के जीवन के दूसरे पात्र के बारे में नहीं लिखा। क्यों?
कहानियाँ तो और भी लिखीं हैं पर हर बार कुछ संदेश देने के लिये ही लिखीं। कुछ छपीं भी हैं, कोशिश करूंगा कि इन्हें जाल पर भी प्रकाशित करूं ।
अगर आपको अपना रोल माडल चुनना हो तो देश में किस व्यक्ति की तरह बनना चाहेंगे आप?
मेरा कोई रोल माडल तो नहीं है पर हां कुछ पसंदीदा व्यक्ति जरूर हैं- जैसे अमिताभ बच्चन। उनके अभिनय से ज्यादा मैं इस बात का कायल रहा कि उन्होंने अपनी गरिमा को बनाये रखा । सारे जीवन मीडिया उनके पीछे लगा रहा लेकिन उन्होंने मीडिया को उसकी औकात में ही रहने दिया। साथ ही गर्दिश से किस तरह संघर्ष करके ऊपर उठा जा सकता है इसका भी उदाहरण प्रस्तुत किया।ये अमिताभ ही हैं जो कौन बनेगा करोड़पति के प्रति वचन निभाने दुबारा टीवी पर लौटे वर्ना जिस बुलंदी पर वे हैं उनको कोई दरकार नहीं इसकी। अपनी कम्पनी को दुबारा सही हालत में लाने के लिये हर संभव उपाय किये,आलोचना की परवाह नहीं की । आर्नोल्ड सेवर्जनेगर का भी प्रशंसक हूं। सालों तक बाडी बिल्डिंग के क्षेत्र में एकक्षत्र राज्य करने और उससे सन्यास लेने के बाद दुबारा मि.यूनीवर्स बन कर दिखा दिया। बाबा आम्टे और अन्ना हजारे जैसे लोगों को मैं काफ़ी सम्मान देता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि समाज सेवा ,भ्रष्टाचार का खात्मा जैसे वाक्यों का इन्होंने सिर्फ़ बोलने में ही इस्तेमाल नहीं किया ,कार्यरूप में उदाहरण रखा। जो कहा,कर के दिखाया । शायद इन सबकी संघर्ष करने की मनोवृत्ति (Fighing Attitude) से प्रभावित हूं। इनकी संघर्षशीलता बहुत आकर्षित करती है मुझे।
देश के सामने मुख्य समस्या तथा उसका निदान क्या मानते हैं आप?
निसंदेह भ्रष्टाचार सबसे बडी़ समस्या है और इसकी एक मुख्य वजह है कि हम देशभक्त नहीं हैं। हर व्यक्ति कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में चोरी कर रहा है । ये भ्रष्टाचार इस तरह से हमारे लहू में समा गया है कि भ्रष्ट आचरण ही सही आचरण लगता है। यात्री को लगता है कि बिना पैसे दिये रिजर्वेशन नहीं देगा टीटी । टीटी सोचता है कि पैसे लिये बगैर रिजर्वेशन दे दूं तो जाने ये क्या सोचेगा? हमारे देश में अपना मतलब साधने के लिये हर चीजे की गुटबंदी होती है पर विडम्बना है कि
देश सुधार के लिये कोई गुट नहीं है ।
शब्दांजली एक गैरतकनीकी महिला का एकल प्रयास है। इस रूप में इस पत्रिका को कैसे देखते हैं। क्या सुधार तुरंत अपेक्षित हैं?क्या आगे आने वाले समय में?
बड़ा ही सुंदर प्रयास है यह सारिका का। निरंतर के बाद तो सोचता हूँ कि जाने कैसे अकेले ही संभाल लेती हैं वे माह दर माह प्रकाशन का भार। मेरे ख्याल से पत्रिका का उद्देश्य सामने रख कर यूं ही प्रकाशन करती रहें। पत्रिका अगर यह विविधता लिये हो तो हर तरह के पाठक को कुछ न कुछ ज़रूर मिलेगा यहाँ। प्रचार पर भी ध्यान दें। शब्दांजलि के निरंतर निखरने और लोकप्रिय होने के लिये मेरी मंगलकामनायें।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

6 responses to “देबाशीष चक्रबर्ती से बातचीत”

  1. Pratik Pandey
    विभिन्‍न मुद्दों पर देबाशीष जी की राय जान कर अच्‍छा लगा। देबाशीष जी अपने उदात्त चिन्‍तन और ऊर्जस्विता की वजह से सभी हिन्‍दी चिट्ठाकारों के लिये प्रेरणा-स्रोत हैं।
  2. Amit
    अगले सेलेब्रिटी साक्षात्कार की बेसब्री से प्रतीक्षा है!! :)
  3. फ़ुरसतिया » एक पोस्ट हवाई अड्डे से
    [...] बहुत दिन से हुये हमने घोषणा की थी देबाशीष को तीन किताबें देने के लिये। पोस्ट आफिस घर के एकदम पास होने के बावजूद हम किताबें पोस्ट नहीं कर पाये। आज सोचा खुद ही दे आते हैं। सो हम चले किताबें लेकर पूना की तरफ। कानपुर से लखनऊ टैक्सी से तथा लखनऊ से दिल्ली सबेरे हवाई जहाज से आ गये। अब इस समय पूना जाने के लिये लिये मुम्बई के हवाई जहाज का इंतजार किया जा रहा है। [...]
  4. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] में न फारस में 3.प्रशस्त पुण्य पंथ है 4.देबाशीष चक्रबर्ती से बातचीत 5.कविता के बहाने सांड़ से गप्प 6.बिहार [...]
  5. हिन्दी तेरा रूप अनूप- श्रीलाल शुक्ल
    [...] में पहले लिखे लेख आप यहां , यहां , यहां ,यहां , यहां , यहां पढ़ सकते हैं। इन लेखों में [...]
  6. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    अच्छा लगा!!! पुराना इतिहास जानकार!!

Monday, January 16, 2006

प्रशस्त पुण्य पंथ है


प्रशस्त पुण्य पंथ है

इतवार को सबेरे-सबेरे जब शुकुल जी गीजर के पानी से नहाते हुये गाना गा रहे थे-ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिये तभी बाहर से आवाज आई शुकुलजी हैं?शुकुलजी के नहाने तथा गाने में ब्रेक लग गया।
वे बाहर आये । देखा फुरसतिया झोले की तरह मुंह लटकाये बैठे थे। शुकुलजी को देखकर वो हंसे तो शुकुलजी ने बेसाख्ता पूछा -रो काहे रहे हो?((वाक्य रचना साभार अखिलेश)
फुरसतियाजी और जोर से हंसते हुये बोले:-
कल से हम चुल्लू भर पानी की तलाश में हैं। पानी मिले तो डूब जायें। छुट्टी हो। पानी है कि मिल के ही नहीं दे रहा है। लिहाजा हम परेशान हैं।
शुकुलजी:परेशानी का कारण क्या है?
फुरसतिया:ये हम नहीं बतायेंगे। हमें शरम आती है।
शुकुलजी:फिर भी कुछ तो बता रे बेशरम!
फुरसतिया:बतायें क्या इंडिब्लॉगीज़ चुनाव हुये और हम हार गये। हमें मिले वोट कुल जमा २५ ।
शुकुलजी:हारे गये? क्या वहां कोई कुस्ती लड़े थे? फिर तुम्हारा तो समझ में आता है। लेकिन २५ वोट कैसे मिल गये तुम्हे? इत्ते ज्यादा वोट किसने दिये ? जरूर कुछ गड़बड़ किये होगे। पता करो कुछ लफड़ा है। कुछ फर्जी वोटिंग किये होगे। हमें सब पता है।
फुरसतिया:हां किये तो लेकिन केवल दो ही फर्जी वोट डाल पाये थे कि वोटिंग बंद हो गई।
शुकुलजी:तो रोना काहे का? पचीस वोट मिल गये बहुत हैं । क्या किसी का घर लोगे?
फुरसतिया:अरे हम सोचे थे कि हम बहुत पापुलर ब्लागर हैं तो १००-१५० वोट तो मिलबै करेंगे। यहां ससुर अगर अपने फर्जी वोट निकाल दें तो बीस भी नहीं हुये। इससे ज्यादा तो टिप्पणी हो जाती हैं हमारे ब्लाग पर।
शुकुलजी:अरे बच्चा,तुम टिप्पणी और वोट में अंतर कब समझोगे?टिप्पणी तो लोग मौज मजे के लिये भी कर देते हैं। लेकिन वोट तो किसी कायदे के उम्मीदवार को ही न मिलेगा। आजकल की जनता वोट की कीमत जानती है।ये कोई बख्शीश थोड़ी है कि जरा सा खुश हुये -दे दी गयी। लेकिन अगर सही में तुम्हे लगता है कि कम वोट मिले तो यह बताओ कि इतने कम वोट मिलने का कारण क्या है? कौन है इस साजिश के पीछे?
फुरसतिया:कोई एक हो तो बतायें? सारे यार-दोस्त शामिल हैं इस साजिश में।
शुकुलजी:जैसा करोगे वैसा भरोगे।तुम कौन कम बदमाश हो जो लोग तुमसे मौज नहीं लेगें? अच्छा तुम एक काम करो कि सारा मामला एक कागज में लिखकर दे दो हम देखते हैं कि सच्चाई क्या है।
शुकुलजी यह कहने के बाद धूप में लेट गये। वे ऊंघते हुये कह रहे थे -ये फुरसतियाजी, नहा-धोकर जाड़े की गुनगुनी धूप में लंबलेट होकर ऊंघने से बड़ा सुख भी कोई जानते हो तुम दुनिया में ।ये गरफिरदौस बररुये जमीनस्त ,हमीं अस्तो,हमीं अस्तो,हमीं अस्तो.. …वाला मसला तो यहां भी फिट होता है। क्या कहते हो?
लेकिन फुरसतियाजी तो अपनी व्यथा-कथा लिखने में जुटे थे। हमने झांक के पढ़ा ।वे लिख रहे थे:-
आज देबाशीष ने रिजल्ट आउट कर दिया इंडीब्लागीस का। साथ में हमें भी । हमें कुल जमा २५ वोट मिले। पिछले साल मिले थे ३३ वोट। हम इस भ्रम में थे कि हमारा ब्लाग बहुत पापुलर है।तथा यह भी तय माने थे कि पापुलरिटी बढ़ने के साथ वोट बढ़ते हैं। लेकिन यहां तो उल्टी गंगा बह रही है।पापुलरिटी बढ़ रही है वोट घट रहे हैं। रविरतलामी को पिछले साल कुल वोट मिले थे चार। इस बार आधे हो गये तथा मामला कुल दो पर अटक गया। जबकि हम पिले पड़े थे रवि भाई को लाइफ टाइम अचीवमेंट दिलाने के लिये।
देबाशीष बेचारे को इस वार्षिक आयोजन में हर बार की तरह लाखों के बोल सुनने को मिले। हम भी कोसते रहे कि ये बालक हिंदी में लेख क्यों नहीं छापता,फिर कोसा कि मेरा पन्ना को बाहर काहे किया,फाइनल खिंचाई -रविरतलामी को लाइफ टाइप अचीवमेंट के लिये नामीनेट काहे नहीं किया। देबाशीष को जितने डायलाग मारने थे मारे । हमने भी कमी नहीं की। बाकी कुछ लोगों ने और भी तकनीकी आरोप लगाये जो कि हमारे लिये महत्वहीन थे। एक ने यह भी कहा कि यह आयोजन आत्मप्रचार का सस्ता तरीका है। बहरहाल।
मामला झमाझम चलता रहा। फिर जीतेंदर ने ‘कटआफ’ पर कुछ दुख प्रकट किया जिसपर देबाशीष ने सारा मामला ट्रांसपैरेन्ट करके बताया कि हिंदी के जितने भी ब्लाग थे उनके पहले चरण के जूरी के मत के अनुसार ‘कटआफ’ का जुमला पढ़कर उनकी भौंहे टेढ़ी हुईं जो कि बाद में सीधी हो गईं।
चूंकि सभी जूरी ‘बाईडिफाल्ट’ अंग्रेजी के ब्लागर पहले हैं हिंदी के बाद में लिहाजा हमने यह धारणा बनाई कि अंग्रेजी के ब्लागर भी उतने ही कूपमण्डूक होते हैं जितने कि हिंदी के(?)।कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता। किसी को कोई एतराज हो तो बताये।
जब पहले चरण के परिणाम घोषित हुये तो पाया कि हमारे ब्लाग से ज्यादा की रेटिंग जीतू तथा अतुल । पिछले साल इनको धुंआंधार वोट मिले थे। ये हमारे लिये वोट जुगाड़ देगें सो इस बार का अवार्ड तो हमारे ही पल्ले आया समझो।और हां,स्वामी भी है ना। ये कब अपना तकनीकी कौशल दिखायेगा!
लेकिन पहला झटका हमें अपने स्वामी से ही मिला। हमने कहा -बालक देख रहे हो? वोट की सेटिंग-वेटिंग , कुछ कर-वर। बालक की आवाज में सन्यासी का अंदाज आ गया। गुरुदेव ,अपन इन सब सांसारिक पचडों में नहीं पड़ते। हमने कहा-अबे तू मती पड़ लेकिन मेरे को वोट तो दे-दिला?बालक ने फिर समझाया- आप कहां पड़ गये इन चक्करों में? ये लड़कपन आपको शोभा नहीं देता ।हम लड़के की बात का क्या जवाब देते? सोचा अभी हमारी उमर तो बाजपेयीजी की आधी हुयी है । उन्होंने तो अभी छोड़ी राजनीति। हम अभी से छोड़ दें लड़कपन/दुनियादारी?
बहरहाल वोटिंग के मामले में हमारा स्वामी पर भरोसे का सूचकांक गिर गया।
फिर हमने सोचा जीतू,अतुल तो हैं ही। उनको पिछले साल कुल मिलाकर ३४२ वोट मिले थे। उसमें से कम से कम दो सौ तो ये हमारे लिये जुगाड़ेंगे ही। आखिर हम अतुल के भाई साहब हैं। जीतू के भी ‘कनपुरिया खिंचाईबाज’ हैं(हम जीतू की खिंचाई नहीं करते हैं तो इनकी तथा इनसे ज्यादा दूसरों की तबियत खराब हो जाती है)।ये हमें नहीं समर्थन देंगे तो किसे देंगे।
ऐसा नहीं कि हमने सुनीलजी के अच्छे ब्लाग के बारे में नहीं सोचा। सोचा ,खूब हचक के सोचा। हमने सोचा:-
ठीक है कि सुनीलजी अच्छा लिखते हैं। फोटू भी बढ़िया चिपकाते हैं। मुस्कराते भी गजब का हैं। घूमते-घुमाते रहते हैं।सब कुछ अच्छा है। लेकिन वोट तो बंधु-बान्धव, अपने इलाके वाले को ही दिया जायेगा न! अगर काबिलियत,अच्छाई को ही वोट देने का रिवाज हो तब तो चल लिया लोकतंत्र। फिर तो असलहा धारी प्रतिभायें कभी जीत न पायें।
कुल मिलाकर हमने यह सोचा कि सबसे ज्यादा वोट तो हमें ही मिलना है। हम यह सोचकर ‘फीलगुड’ के बुखार में तपने लगे। सोचा कि पाठकों,वोटरों को धन्यवाद भी देना होगा न जीतने के बाद। सो वो मजनून भी सोच लिया। तीन-चार शेर,दस-बारह हायकू, कुछ दोहे भी तैयार कर लिये।
वोटिंग का समय नजदीक आ गया हम प्रकट रूप में तो बगुले की तरह बिना किसी चहल-पहल के शान्त बैठे थे लेकिन शैतान बच्चे की तरह इंडीब्लागीस के अंत:पुर की गतिविधियों के बारे में जायजा लेते रहते थे- ताका-झांकी वाले अंदाज में। समय सरकता गया -हथेली में जकड़ी बालू की तरह लेकिन हमें न जीतू की तरफ से कोई ‘फुरसतिया का टेम्पो हाई है’ की आवाज सुनाई दी न अतुल की तरफ से भाई साहब को जिताने की अपील। हमें अपनी फीलगुड की दीवार में दरार नजर आने लगी। हमें लगा कि हमें खुदै कुछ करना पड़ेगा। कहा भी गया है कि दुनिया में अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता।
फिर हमने वोटिंग में हिस्सा लेना शुरू किया। देबाशीष से सवाल-जवाब के दौरन बहाने से पूछा-ये बताओ भइये फर्जी वोटिंग का क्या जुगाड़ है। देबू के ऊपर भी धर्मराज की आत्मा सवार थी। बहाने से पूछे सवाल का जवाब बहाने से ही मिला। पता चला कि जितनी ई-मेल हमारे पास हैं हम उतने वोट डाल सकते हैं। वैसे यह बात हमें तभी से पता लग गई थी जब वोटिंग में आया -आपका या आपका खाता उपयोग करने वाले का वोट हो गया।
हमने पहले तो इस सूचना की सत्यता परखी । देखा कि हमारे दो ई-मेल से दो वोट पड़ गये। इस बार देबू ने शर्त लगा रखी थी कि वोटिंग के लिये सबसे अच्छे ब्लाग का के लिये वोटिंग जरूरी है। सो हमने बारी -बारी से जिस-तिसको वोट दिया फिर फुरसतिया तथा नारद को वोट दिया। अब हमारे सामने विजय पथ प्रशस्त था।
हमारे मन में फर्जी वोटिंग का अपराधबोध कुछ क्षण को हावी हुआ लेकिन हमने कहा:-
प्रशस्त पुण्य पंथ है,
दृण-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रवीर हो जयी बनो,
बढ़े चलो,बढ़े चलो।

हमें लगा यह उद्‌बोधन हमारी ही मन की कमजोरी को दूर करने ले लिये लिखा गया होगा। हमें लगा कि युद्धभूमि में धर्म-अधर्म के संशय में फंसे अर्जुन के लिये यह कृष्ण का गीता ज्ञान है। लिहाजा हमने अपने मन को मजबूत कर लिया तथा फर्जी वोटिंग के लिये तैयार हो गये।
हमारे घर में मेल-फीमेल को छोड़कर कुल मिलाकर १० ईमेल हैं। हमने अपने बच्चे से कहा कि बेटा जरा इस वोटिंग यज्ञ में अपना योगदान कर। बेटे ने मुस्कराते हुये कहा(पापा आप तो कहते हैं आनेस्टी इज द बेस्ट पालिसी फिर टैक्स की चोरी क्यों?विज्ञापन की तर्ज पर )आपको वोट का इतना लालच! ये अच्छी बात नहीं है।
लेकिन हमने उसे ,प्रेम तथा युद्ध में सब जायज है नुमा डायलाग सुनाकर,प्रेम तथा युद्ध में सब जायज है नुमा डायलाग सुनाकर ,पटा लिया तथा वह फर्जी वोटिंग के लिये तैयार हो गया। हमने सोचा कि सारे गलत काम रात को किये जाते हैं। सो सफलता के लिये जरूरी है कि यह काम भी रात को किया जायेगा। नाइट शो में। ९ से १२ वाले में ।
हमने यह भी सोच लिया था कि जितनी ‘ईमेल आईडी’ पता हैं उसके अलावा ढेर सारी नयी ‘आई डी’ खोल लेंगे। एक मिनट में एक के हिसाब से तीन घंटे में दो सौ करीब तो हो ही जायेंगी। एक व्यक्ति खाते खोलता जायेगा दूसरा वोटिंग करता जायेगा। बस हो जायेगा काम।
लेकिन होनी और देबाशीष को कुछ और ही मंजूर था।
रात को नौ बजे हमने पहला खाता खोला । एक मिनट में खुल गया। इस खाते का ‘यूजर नेम’ तथा ‘पासवर्ड’ लेकर हम इंडीब्लागर में वोटिंग करने गये देखा वहां वोटिंग बंद हो चुकी थी। हम फर्जी वोटिंग के पाप से तो बच गये लेकिन वोटिंग न कर पाने का अफसोस भी था।’फीलगुड’ विदा हो गया।जिस जहाज को लूटने निकले थे वह उड़ गया था।
इसीलिये विद्वानों ने कहा है -काल करे सो आज कर,आज करे सो अब।
बाद की बात तो सबको पता है कि हमें कुल जमा २५ वोट मिले। हमें अफसोस इस बात का है कि हमारे हर दोस्त के पास दस रुपये हो या न हों लेकिन दस आई डी पास वर्ड समेत हमेशा रहती हैं। चाहे वो जीतू हों,अतुल हों,ठेलुहानरेश हों या अपने स्वामी। लेकिन लोगों ने कुछ नहीं किया। कुछ इसी तरह जैसे कि अन्न के गोदाम भरे होने के बावजूद लोग भूखे मरते रहे।
दुख है कि हमारी शानदार धन्यवादी मजनून का उपयोग न हो पाया।
दुख से ज्यादा धबराहट यह भी है कि हमारा नंबर दूसरा है। सरकरी अधिकारी होने के नाते दो नंबर का डर कुछ ज्यादा ही होता है।चाहें वो किसी भी तरह का दो नंबर हो।पता नहीं कौन शिकायत कर दे-इनको दो नंबर कुछ ज्यादा ही भाता है। जांच शुरू हो जाये।
यह सब तो मेरा अपना रोना था ।इस पर भले ही आप हंस लो लेकिन जो कुछ और सोचने लायक बात है कि क्या कारण है कि हिंदी ब्लागरों की संख्या पिछले साल के मुकाबले चार गुनी होने के बावजूद कुल वोटिंग पिछले साल के मुकाबले एक चौथाई रही।
यह कहना कि इस बार फर्जी वोटिंग के मौके कम थे मुझे सही नहीं लगते। क्योंकि पिछली बार तो एक पीसी से एक बार ही वोटिंग कर पाना सम्भव नहीं था।इस बार तो बैठे-बैठे एक ही पीसी से जितनी मन चाहे वोटिंग कर लो।इधर खाता खोलो उधर वोट डालो। सिर्फ थोड़ा आलस्य के त्याग की आवश्यकता थी।
इतना लिखने के बाद फुरसतिया ने शुकुलजी के खर्राटों में विघ्न डाला। बोले -देखो गुरू, ये है हमारा दुख।
शुकुलजी बोले- बालक तुम काहे को इतना दुखी हो? इनाम हमेशा छंटे लोगों को मिलता है। ये तो तुम्हारे लिये अच्छा बहाना है कि तुम बाहर छंट गये। अब अगर इस बार ढेर सारे वोट मिल जाते तो अगले साल क्या करते? सुधार की सारी गुंजाइशें खतम न हो जातीं। तुम दुखी न हो बालक । इस घटना के पीछे के संदेश को पढ़।
फुरसतिया पिनपिनाये- का इसके पीछे भी कोई संदेश/साजिश है?
शुकुलजी उवाचे- तब क्या? तुम देख नहीं रहे जिस-जिस के ब्लाग पर यह हिंदी वाला इंडीब्लागर अवार्ड चिपका उस-उसका लिखना कम बंद होता गया। आलोक को लिखे महीनों हो गये। अतुल ने लिखना स्थगित कर दिया। शशिसिंह ने तो यह ब्लाग ही बंद ही कर दिया पहले से ही-शायद आसन्न खतरे को भांपते हुये। सो बालक यह तुम्हारे भले के लिये है कि तुम बाल-बाल बचे। इसका मतलब है कि तुम्हारे ब्लाग में अभी कुछ और पोस्टें बदी हैं। जाओ शुक्र मनाओ। प्रसाद चढ़ाओ हनुमान
मंदिर में।
फुरसतियाजी की ने सोचा कि गरदन में शहीदाना अकड़ ले आयें। लेकिन शुकुलजी के सामने होने के कारण शुतुरमुर्ग बने रहे। सन्नाटा लंबा खिंचने पर फुरसतियाजी ने सन्नाटे के अनुपात में गरदन को लंबा करते हुये सहमते हुये पूछा-तो हमारे लिये क्या आज्ञा है?
आज्ञा क्या बस मौज करो। अपने इस फर्जी वोटिंग की साजिश को उजागर करो। अपराध बोध से मुक्त होकर दुबारा लेखन में तत्पर हो। यह सारा वाकया पोस्ट कर दो ताकि तुम्हारे सनद रहे।
फुरसतियाजी घबराते हुये बोले- ये पोस्ट करने पर कहीं कोई नाराज न हो जाये?
शुकुलजी मोहनी मुस्कराहट लपेटकर उवाचे-बालक तुम सरीखा चुगद ब्लागर हमने अभी नहीं देखा। तुम अभी तक अपने साथियों की मन:स्थिति नहीं समझ पाये। ये उस महान पत्रकार परंपरा के लोग हैं जो एक जेब में कलम तथा दूसरे में इस्तीफा डाले घूमते थे तथा कलम कम इस्तीफा ज्यादा चलाते थे। ये सब समझदार लोग हैं। कोई नाराज होगा भी तो स्थाई रूप से नहीं होगा?
शुकुलजी की संगति में फुरसतिया की सारी शंकाओं के उसी तरह धुर्रे उड़ गये जिस तरह पहले शाहिद आफरीदी की बैटिंग से भारतीय बालरों के तथा बाद में सहवाग की बैटिंग से पाकिस्तानी बालरों के उड़े थे।
वापस लौटकर वे कम्प्यूटर के ‘की बोर्ड’ पर गरदन झुकाये पकड़े गये।
इस मौज-मजे के बाद हम अब गंभीर होने की इजाजत चाहते हैं। सबसे पहले तो देबाशीष को इस सारे आयोजन को सफलतापूर्वक अंजाम देने की हार्दिक बधाई । तमाम मतभेद,लानत-मलानत के बावजूद यह काम लगभग अकेले पूरा किया । जिस बात को सही समझा उसपर बावजूद तमाम विरोध के कायम रहे। यह काबिले तारीफ है ।लिहाजा हम देबाशीष की तारीफ करते हैं चाहे वो बुरा माने या भला!
जिन ब्लागर्स के ब्लाग को विजेता चुना गया उनको हम बधाई देते हैं। खासतौर पर अपने शशिसिंह को जिनका ‘मुम्बई ब्लाग’ हिंदी के ब्लागों में प्रथम स्थान पाया। शशि ने बहुत कम समय में ब्लागिंग में बहुत कुछ लिखा। खासकर भोजपुरी ब्लागिंग के क्षेत्र में। कामना है कि वे अपने नये ब्लाग में शानदार अंदाज में लिखते रहें। दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करें।
अब कुछ जैसे को तैसा वाला काम भी किया जाय। देबाशीष ने घोषित पुरस्कारों के अलावा हालांकि बताया था कि कुछ इनाम वे देगें जिनका खुलासा नहीं किया गया था। हमारा मन रखने के लिये उन्होंने एक किताब देने की घोषणा की है। हम किताब का इंतजार कर रहे हैं।
पिछले तीन सालों से देबाशीष इंडीब्लागर का आयोजन करते आ रहे हैं। मैं देबू को इन तीन सालों के आयोजन के लिये तीन किताबें भेंट करता हूं। किताबें हैं:-
रागदरबारी-श्रीलाल शुक्ल
कसप़-मनोहर श्याम जोशी
आधा गांव-राही मासूम रजा़
राग दरबारी से अच्छा व्यंग्य उपन्यास,कसप़ से अच्छा प्रेमकथा उपन्यास तथा आधा गांव से अच्छा विभाजन की त्रासदी पर लिखा उपन्यास मैंने दूसरा नहीं पढ़ा।यह सारे सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मैं देबाशीष को भेजूंगा जल्द ही। आशा है कि वे हमारी भेंट स्वीकार करेंगे।
एक भेंट हमारे सबसे कम वोट पाने के रिकार्ड को लगातार दूसरी बार अपने नाम करने वाले रविरतलामी के लिये भी है। रवि भाई जिस अंदाज में लगातार निर्लिप्त भाव से जुटे रहते हैं लेखन में तथा रचनाकार में वह बाकई स्तुत्य है। उनके लिये हमारे पास है हमारा अब तक का पढ़ा सबसे अच्छा उपन्यास-हावर्ड फ्रास्ट का स्पार्टाकस जिसका बहुत खूबसूरत हिंदी अनुवाद किया है अमृतराय ने आदिविद्रोही के नाम से। यह उपन्यास गुलामों के पहले विद्रोह की कहानी कहता है।जल्द ही यह किताब रवि भाई को भेज दी जायेगी।

मेरी पसंद


मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिम्बित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो वहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का
मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल-क्यों है?

-’धूमिल’ की लंबी कविता पटकथा से

15 responses to “प्रशस्त पुण्य पंथ है”

  1. ई-स्वामी
  2. अतुल
    “हमारे घर में मेल-फीमेल को छोड़कर कुल मिलाकर १० ईमेल हैं। ”
    बहुत सही गुरूवर। आपको उपविजेता बनने पर हार्दिक बधाई।इस बात पर जाँच आयोग बैठाल देना चाहिये कि , इस बार ब्लागसंख्या ज्यादा और वोटिंग कम काहे हुई!
  3. रवि
    अगर मुझसे पूछा जाए कि वर्ष का सबसे बढ़िया, सबसे मनोरंजक, सटीक-धारदार व्यंग्य भरा चिट्ठा कौन सा है, तो मैं क्या जवाब दूंगा?
    जवाब आपको पता है.
    इस पोस्ट को पढ़ कर हँसा, ऐसा हँसा कि आँख से आँसू निकल आए.
    आप मुझे इनाम स्वरूप एक किताब भेज रहे हैं. धन्यवाद.
    पर, मेरी ओर से एक अदद इनाम के हकदार तो आप भी हैं ! आखिर मैंने भी तो आपका नामांकन किया था – और क्या सही किया था-
    “… चिट्ठे की हर पंक्ति और हर अक्षर पढ़ने में आनंददायी!…”
    इस पोस्ट को दुबारा पढ़ कर मजे ले रहा हूँ!
  4. जीतू
    तुम हार कर भी जीत गये, लोग जीत कर भी हार गये।
    अब अवार्ड वगैरहा के पचड़े मे ना पड़कर सीधी सीधी बात की जाय। मेरे लिये हिन्दी ब्लॉगिंग मे तुमसे और सुनील से अच्छा लिखने वाला नही दिखा,कम से कम अब तक तो नही।तुम्हारे ब्लॉग की लोकप्रियता बढती रहे, यही सबसे बड़ा पुरस्कार है। इन्डीब्लॉगीज पुरस्कारों के से मुझे लगता है कि इसबार हिन्दी के ब्लॉगर बन्धु ही इससे जुड़ नही सके,कारण क्या रहे, इसके लिये देबू दा खुद आत्म मंथन करें, उनको कुछ कहना, नये पचड़े को न्योता देना है, इसलिये ओम शान्ति शान्ति।
    रही बात हमारे वोटिंग ना करने की, तो भैया हम बीस तारीख के आसपास लौटेंगे, तब तक तो सारी परसादी बँट चुकी होगी। तुम लिखते रहो, मौज लेते रहो, यही सही है, ये अवार्ड वगैरहा से अपने को जितना दूर रख सकते हो, रखो।
  5. प्रत्यक्षा
    चुल्लू भर पानी की तलाश करते लगता है आप गागर भर स्याही पा गये, तभी इतना ज़ोरदार लेख लिख डाला. लोकतंत्र की परिभाषा तो जम गई. बहुत अच्छे !
    अब लगे हाथों कुछ और ईनाम की भी घोषणा की जाय. उम्मीदवारों की लिस्ट हम भेजते हैं आपको.
    प्रत्यक्षा
  6. देबाशीष
    वोटिंग के उलटफेर समझना वाकई टेड़ी खीर है। हाल ही में शशि से बातचीत हुई तो मैंने यही कहा कि हर व्यक्ति के तीन ईमेल पते भी मान कर चलें तो कम से कम तीन सौ वोट तो पड़ने चाहिये थे हिन्दी कैटेगरी में, पर लगता है कि हिन्दी ब्लॉगजगत अंग्रेजी वालों से भी ज्यादा आत्ममुग्ध है, “मैं ही मैं हूँ दूसरा कोई नहीं” वाला भाव है। कुछ यही फेर डिज़ाईन की कैटेगरी में भी हुआ, सीकेसी की बात सुनी थी देखी पहली बार, मोहतरमा पहले पोल में भी आगे थीं फिर रीपोल में भी, बाद में ईमेल कर कहा कि मैंने वोट दिया ही नहीं पर ईमेल आ गया कि वोट देने का शुक्रिया, मैंने कहा की आपके वोट के डिटेल्स और आईपी ये रहे तो फिर चुप्पी साध ली। उनके ब्लॉग के “डिसअपाइंमेंट” वाले चिट्ठे पर सीकेसी की जमात ने पलक पाँवड़ें बिछा कर मुझे कोस कोस कर पानी पिया, जीतने के बाद बोलीं अब ये मायने नहीं रखता।
    सब कहते हैं कि पोल का यह तरीका ठीक नहीं वो गड़बड़ है।फिलहाल तो हाल है यह है कि जो जीते हैँ वो भी सुना रहे हैँ जो नहीँ जीत पाये वे भी कोस रहे हैँ।
    भइयै नैट पर इससे ज्यादा क्या करोगे, व्यक्ति की पहचान ईमेल पते से ही होती है सो यह प्रयोग करना सबसे उचित है। कुकी लोग चट कर जाते हैं और आईपी ब्लॉकिंग से निर्दोष लपेटे में आ जाते हैं, अब रेटिना स्कैन तो करा नहीं सकते, ना ही कीबोर्ड पर स्याही पोत सकते हैं। आपको ज्यादा विश्वस्नीय तरीका पता हो तो हमें भी बतायें।
    रही बात फर्जी वोटिंग की तो यह सारा चुनाव यह मानते हुये किये जाते हैं ताकि कुछ अच्छे/ ब्लाग लेखक सामने आये। लोग उनके बारे में जाने। अब अगर कोई इस बात पर तुल ही गया है कि चुनाव में गड़बड़ी ही करनी है तो ऐसों को तो सरकारें भी नहीं रोक पाती-हमारी क्या औकात?
    जो ईनाम मैंने देने की घोषणा की थी वो यही किताबें थीं जो आपको और शशि को दी जा रही हैं। बकिया यही कहेंगे बीती ताहि बिसार दे, आपकी कलम का जोर बिना आजमाये ही हम पहचानते हैं।
    किताबों के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। हम बेताबी से किताबों के इंतजार में हैं।
  7. अतुल
    देबू भाई
    सफल आयोजन के साधुवाद। बाकी हिंदी ब्लागजगत के बारे में जहाँ तक मेरा ख्याल है, फर्जी वोटिंग के बारे में शायद किसी को शिकवा नही है। अनूप जी ने सिर्फ व्यंग्य किया है, इतना तो आप भी समझ गये हैं। बाकी जीतू जो कहना चाह रहे हैं वह शायद कुछेक लोगो की निर्लिप्तता का उल्लेख भर है। अब यह व्यक्तिगत , समयबद्ध मजबूरियाँ हैं, पूर्वाग्रह है, भ्रम है , अहँकार है या महज निरपेक्ष भाव, यह मनन का विषय है। व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि जीतू शायद निंरतर की (अ)भूतपूर्व टीम की और अधिक भागीदारी चाह रहे थे आयोजन में, अनूप जी ने भी उल्लेख किया था इसका। आपका तर्क अपनी जगह सही था कि ” क्या किसी और भारतीय भाषा का लेख आपको इंडीब्लॉगीज़ पर नज़र आया?” खैर इन सब तर्को के बीच मुझे बार बार कुछ लोगो की कही बातें याद आ रही थी । पर साथ ही याद आ रही थी अपने तीन तीन बार एक एक घँटे खर्च करके तैयार किये गये प्रस्तावों की अकाल मौत। उन सबके किये भी मेरे साथ साथ वह सब भागीदार हैं जिन पर आज निर्लिप्तता की तोहमत है। हमारी अर्ज सिर्फ इतनी ही कि बात जो शुरू की है उसे और सलाह मशविरा करके निंरतर से भी से बड़ा , उपयोगी और एकीकृत प्रयास साकर किया जाये। पर किसी को समय की कमी है तो किसी को प्रोजेक्ट सीधे ही इंप्लिमेंट करना अच्छा लगता है । सबकी अपनी अपनी बँदिशे हैं, अपने अपने व्यक्तित्व। पर यह सब मेरी अपनी सोच है। पर खुद पर शर्म आती है जब सारिका और पूर्णिमा जी को अकेले दम पर मासिक पत्रिकायें निकालते देखता हूँ और साथ ही देखता हूँ कि हम सात आठ लोग मिलकर ऐसा प्रयास भी नही कर सकते जिससे एक ऐसी साईट बने जिससे हिंदी ब्लागजगत की समूची पहचान जाहिर हो। जब ऐसा नही हो सकता तो अनूप भाई जो हो रहा है उसी का यशोगान करना यथोचित है। मौज वहाँ लेने में मजा है जहाँ जिसकी मौज ली जा रही हो उसको भी मजा आये और मौज मौज में वह काम भी हो जाये जिसमें मौज लेने वाले के साथ जनता जनार्दन को भी मौज आये। हय कि नही?
  8. Laxmi N. Gupta
    भइया, हमें तो इन्डीब्लागिंग के बारे में कुछ पता नहीं कि क्या बला है लेकिन आपका लेख बहुत मज़ेदार है। कविता भी अच्छी लगी।
    लक्ष्मीनारायण
  9. अतुल
    क्या कानपुर की फिजाओं ने आपसे चुगली नही की कि आपकी पोस्ट पढ़कर कोई फिलाडेल्फिया के कोने में २५ डिग्री के तापमान में भी मुस्करा रहा है और इंतजार कर रहा है कि ठहाकों की आवाज बाल्टीमोर, पुणे,कुवैत, मेम्फिस, बैंगलोर,रतलाम और सैन होजे से भी सुनाई पड़े।
  10. Shashi Singh
    जय हो गुरुदेव,
    हंसने-हंसाने के मौके ढूंढना तो कोई आपसे सीखे. ये अवार्ड-उवार्ड को एक दिन की बात है बाकी बचे 364 दिन तो आप ही के जलवे हैं.
    बकौल शुकुलजी अवार्ड पाकर हमारा नाम भी आलोकजी और अतुल भाई तरह शहीदों में शुमार हो गया हैं. अब आप बतायें शहीद होकर कोई जीत के मजे ले सकता है भला? मुझे तो लगता है कि मेरे वोटरों (तथाकथित शुभचिंतक) ने मेरे मजे लेने के लिए मुझे वोट किया है. अबतक मैं लेखन की रणभूमि में अक्सर किनारे से निकल जाया करता था… अब वो जरूर खुश हो रहे होंगे कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे.
    मेरे तो हाथ-पांव फूल रहे हैं कि इस ऊंट पर सबने उम्मीदों के ढेरों बोझे लाद दिये हैं, अगर यह ढो न सका तो जुते पड़ने तय है.
    ये खुदा रहम कर.
  11. रवि
    प्रशस्त पुण्य, पंथ है – मंज़िल नहीं….
    यह सच है कि हममें अपने आप पर हँसने का माद्दा कम ही होता है. दूसरों पर तो भले ही गाहे बगाहे हँस लेते हों…
    शशि, आपने अपने आप पर ठहाका लगाकर यह इंगित कर दिया है कि सच में, लोगों ने मज़े लेने के लिए, आपको वोट नहीं दिया है…
  12. छींटे और बौछारें » क्या मनुष्य अपने भीतर की गुलामी से कभी मुक्त हो पाएगा?
    [...] पिछले कुछ समय से अपने अनूप भाई की कृपा से http://hindini.com/fursatiya/?p=99 उपन्यास आदिविद्रोही पढ़ रहा था जो कि हावर्ड फ़ास्ट के मूल अंग्रेजी उपन्यास स्पार्टकस का हिन्दी तर्जुमा (अनुवादक – प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतराय) है. [...]
  13. फ़ुरसतिया » भौंरे ने कहा कलियों से
    [...] हमने पहले ही कहा,ये इंडीब्लागीस बड़ा बवाल, अतुल अंगूठा टेक भये,शशि की भी वैसी ही चाल। [...]
  14. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] बनारस में वो न पेरिस में न फारस में 3.प्रशस्त पुण्य पंथ है 4.देबाशीष चक्रबर्ती से बातचीत 5.कविता [...]