Saturday, February 11, 2006

आपका संकल्प क्या है?

http://web.archive.org/web/20110926115402/http://hindini.com/fursatiya/archives/106

आपका संकल्प क्या है?

हमारे एक मित्र हैं। उनकी कन्या पढ़ने में बहुत अच्छी रही। कम्प्यूटर में बीटेक करने के बाद फिलहाल एक अच्छी फर्म में नौकरी करती है। दो-तीन साल में ही उसकी तन्ख्वाह रिटायरमेंट के नजदीक पहुंच चुके पिता की तन्ख्वाह से काफी ज्यादा हो गयी है।पिता अपनी कन्या की सफलता से जितना गर्व महसूस करते हैं उससे ज्यादा वे अपनी बच्ची के लिये लड़का तलाशने में चिंतित रहते हैं।
एक लड़के के बारे में वे बातचीत करने लड़के के घर गये। लड़के के पिता बड़े प्रसन्न लड़की के कैरियर से। प्रतिभा-गुण समुच्चय से। कन्या पक्ष भी संतुष्ट लड़के के घर-परिवार से। लड़का इंग्लैंड में इंजीनियर है। बातचीत सरपट दौड़ रही थी।
यह तय हो गया कि शादी कैसे होगी,कब होगी ,कहां होगी।तमाम खुशनुमा बातचीत के बाद बस चला-चली के पहले वर के पिताजी ने अपनी सारी मासूमियत से कन्या पिता से पूछा -आपका संकल्प क्या है?
कन्या के पिता ने कहा -मुझे कुछ अंदाजा नहीं कि आपकी आशा क्या है। आप बतायें क्या ठीक रहेगा?
वर पिता ने निर्लिप्त होकर कहा-मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा। आप स्वयं बतायें कि आपका संकल्प क्या है?
कन्या के पिताने सारा साहस बटोर कर कहा- हम लोग ५-६ लाख खर्चा करने के लिये तैयार हैं।
वर पिता ने कहा -इतने में कैसे होगा? दस-दस लाख की शादियां तो यहां मारी-मारी फिर रही हैं।
कुछ और मोलभाव के बाद लड़के के दाम एकाध लाख बढ़ाये गये। लेकिन बाप ने अपने जिगर के टुकड़े की कीमत कम करने में असमर्थता जाहिर की।वह मजबूर था। हर तरह से लड़के के लिये उपयुक्त लड़की मिलने के बावजूद वह कम दाम में लड़के को बेचकर अपनी बदनामी नहीं कराना चाहता था।
लड़की के पिता लड़की की कुंडली तथा अपना मुंह लेकर वापस लौट आये।
संकल्प का सवाल उनके लिये वाटरलू साबित हुआ।
हमें जब यह बताया गया तो बेशाख्ता मेरे मुंह से निकला -लड़का क्या भीख मांगता है?
दोस्त ने बताया -नहीं वह तो इंग्लैंड में है।
यह आम बात है आजकल।जो लड़का जरा से कहीं हिल्ले से लग गया उसके भाव आसमान छूने लगते हैं।मजे की बात है कि मां-बाप से अबे- तबे तक करने वाले लड़के इस मामले में श्रवणकुमार बन जाते हैं। वे लड़की खूबसूरत चाहेंगे,पढ़ी-लिखी चाहेंगे,साइंस साइड,कान्वेंटी,नौकरी करने वाली चाहेंगे । यह सब कुछ लड़का तय करता है। सीधे या ‘थ्रू प्रापर चैनेल’। इसके बाद वह नेपथ्य में चला जाता है -कमान अपने पिता को सौंपकर। पिताजी संकल्प का बीमर मारकर लड़की वाले को घायल कर देते हैं।
कुछ उदार वर पिता उत्साह वर्धन भी करते रहते हैं-मारुति तो आप खुद कह रहे हैं देने को। थोड़ा और हिम्मत करिये -सैंट्रो तक तो आइये। हमें अपने लिये तो कुछ चाहिये नहीं जो करेंगे आप अपनी लड़की के लिये करेंगे।
मध्यमवर्ग में लड़की की शादी बहुत बड़ा पराक्रम का काम है। जिस तरह राणा सांगा के अस्सी घाव उनके पराक्रम के प्रतीक माने जाते हैं उसी तर्ज पर कहा जाता है-साहब ये बहुत पराक्रमी हैं,तीन लड़कियों की शादी निपटा चुके हैं।
इसीलिये हमारे शाहजहांपुर के कवि अजयगुप्तजी ने ,जिनकी तीन बेटियां हैं, लिखा है:-
सूर्य जब-जब थका हारा ताल के तट पर मिला,
सच बताऊँ बेटियों के बाप सा मुझको लगा।

हरिशंकर परसाई कहा करते थे-देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है। चौथाई ताकत छिपाने में जा रही है-प्रेम करके छिपाने में,पाप करके छिपाने में। बाकी चौथाई ताकत देश की प्रगति में लगी है। सो जो प्रगति हो रही है चौथाई ताकत से बहुत हो रही है।
इस सारे घटनाक्रम में लड़कों की भूमिका बहुत निराशाजनक है।लड़का अपनी कीमत लगते देखता है तथा नीलाम होता रहता है। पता नहीं कहां की आज्ञाकारिता आ जाती है उसमें! आजकल तमाम घटनायें सुनने में आ रही हैं जिसमें लड़कियां दहेज की जिद करने वाले लड़कों से शादी करने से इंकार रही हैं लेकिन लड़कों के बारे में ऐसी बहुत कम कहानियां सुनने को आती हैं।
चोटी के संस्थान में कन्याओं द्वारा तोते से अपना भाग्यफल बंचवाने की विसंगति से कड़वी विसंगति यह है कि पढ़े-लिखे समझदार लड़के इस स्थिति से उदासीन अपने को तरह-तरह से खुशी-खुशी या निर्लिप्त भाव से बेंच रहे हैं।
कारण पता नहीं क्या हैं लेकिन बाजार का बहुत बड़ा दखल है इसमें। आराम के तमाम साधन जो पहुंच के बाहर हैं वह दूल्हा शादी में एक मुश्त पा लेना चाहता है। वह जिंदगी को शानदार अंदाज में जीना चाहता है। टुटही मेज ,फिर साबुत मेज ,फिर डायनिंग टेबल का सफर उसे बड़ा नागवार लगता है। एक क्लर्क अपनी तन्ख्वाह से कार कभी नहीं खरीद पायेगा लेकिन मंडप को वह कल्पवृक्ष मानकर सब कुछ तुरंत हासिल कर लेना चाहता है।
ऐसा नहीं कि सारे लड़के ऐसे होते हैं। कुछेक होते हैं जो आदर्शों के चलते इससे टकराने का प्रयास करते हैं लेकिन समाज का मकड़जाल उनको ऐसा धोबीपाट मारता है कि वे घुग्घू बने रह जाते हैं।
ऐसा ही एक किस्सा हमारे पड़ोस में हुआ। लड़का ने अपने तथा कन्या के पिता से साफ कहा कि शादी में कोई लेनदेन न होगा। दोनों ने कहा -ठीक। लड़का काफी दिन खुशफहमी में रहा कि उसने समाज को अच्छा बनाने की दिशा में एक आदर्श प्रस्तुत किया है।लेकिन उसकी खुशफहमी तब हवा हो गयी जब उसे पता लगा कि पिताद्वय में गुपचुप लेनदेन हुआ था। लेकिन उसे बाद में पता चला। वह बेचारा बहुत दिनों तक उदास रहा।
तमाम लोग कह सकते हैं कि लड़कियां भी चाहती हैं कि उनकी शादी में दहेज दिया जाये ताकि वे सुख से रह सकें। कुछ लोगों का सच होगा यह भी लेकिन कड़वा सच यह है कि लड़की की शादी आजकल बहुत बड़ा पराक्रम है। खासकर उसके लिये जिसके पास दूल्हा खरीदने के लिये पैसे नहीं हैं। पहले लोग एक बढ़िया फसल में एक शादी निपटा देते थे। आज मध्यमवर्गीय बाप जिंदगी भर बचत करने के बाजजूद संकल्प की पिच पर पिट जाता है।
यह और दुखद है जब आजकल आदर्श प्रस्तुत करने को लड़के बेवकूफियां मानने लगे हैं। वे भी क्या करें उनके सामने भी आदर्शों का अकाल है। उन्हें तो मीडिया करीना कपूर की राजसी शादी दिखाता है ।लक्ष्मी मित्तल की लड़की की ,शाही महल खरीदकर ,शादी का ताम-झाम दिखाता है। इन चकाचौंध भरे मुख्य समाचारों से चौंधियाया युवा, फिलर की तरह ,एक कालम के दहेज रहित,सामूहिक विवाह के समाचार से कैसे प्रभावित हो सकता है!
भारत में युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है।युवा किसी भी परिवर्तन के वाहक होते हैं। जब तक युवा ,खासकर लड़के , दहेज के खिलाफ नहीं होंगे तब तक वे बिकते रहेंगे। हो सकता हो कि वे मजबूरी में बिकें क्योंकि उन्हें भी बहन के लिये लड़का खरीदना है। लेकिन यह तय है कि इस मंडी के ताले की चाबी युवाओं के ही हाथ में हैं । वे जब तक पहल नहीं करेंगे,उनके खरीदने-बेचने का बाजार बदस्तूर आबाद रहेगा। संकल्प पूछे जाते रहेंगे।
मेरी पसंद
हम तो समाज के सेवक हैं,हमका दहेज बिलकुल न चही।
बस एक रुपइया धरि दीन्हेव,बाकी सब कुछ तुम्हरहै रही।।
तुम एक हजार बरातिन का अच्छा स्वागत करि दीन्हेव,
टी.वी.,फ्रिज,अलमारी सोफा-सेट,डबल-बेड सजवा दीन्हेव।
अपनी बिटिया के पहिरे का सारा जेवर बनवा दीन्हेव,
अपने दमाद के घूमै का मारुती याक मंगवा दीन्हेव।
हीरा अस लरिका सौंपि दीन अब यहिके आगे काह कही,
हम तो समाज के सेवक हैं,हमका दहेज बिलकुल न चही।
-काका बैसवारी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “आपका संकल्प क्या है?”

  1. Manoshi
    अनूप जी, आपने एक बडे ही संगीन विषय को छुआ है इस बार | मेरे एक लेखक मित्र ने भी शादी की, दहेज़ के खिलाफ कई लेख लिखे और दहेज़ भी ली| पूछने पर कहा कि अगर नहीं लेता तो शादी होनी भी मुश्किल थी क्योंकि लडकी वाले शक करते हैं, लडके में ऐसी क्या बुराई है कि दहेज़ नहीं लिया जा रहा| देश के कुछ प्राँतों में ये ज़्यादा है और कुछ जगहों पर बिल्कुल भी नहीं या बहुत कम |
  2. Amit
    भई, मैंने तो अपने संकल्प जग ज़ाहिर कर दिये हैं। :D
    मारुति तो आप खुद कह रहे हैं देने को। थोड़ा और हिम्मत करिये -सैंट्रो तक तो आइये। हमें अपने लिये तो कुछ चाहिये नहीं जो करेंगे आप अपनी लड़की के लिये करेंगे।
    इस तरह की बात पर लड़की के माता-पिता को उत्तर देना चाहिए कि यदि वे अपनी लड़की के लिए यह दे रहें हैं तो अपनी इच्छा और हैसियत के अनुसार देंगे, लड़के वाले कौन होते हैं माँगने वाले!! ;)
    अनूप जी, लड़के बिक रहे हैं क्यों कि खरीदने वाले मौजूद हैं। बाज़ार का नियम है कि कोई चीज़ तभी बिकती है जब खरीददार उपलब्ध हो। मैं यह समझता हूँ कि इसमें जितना दोष लड़कों और उनके माता-पिता का है, उतना ही लड़की के माता-पिता का भी है। मानसी जी से मैं सहमत हूँ, कई बार ऐसा भी होता है कि यदि लड़के के अभिवावक दहेज लेने से मना कर देते हैं तो लड़की वाले सोचने लग जाते हैं कि लड़के में ऐसा क्या ऐब है कि वे दहेज को मना कर रहे हैं या इसी प्रकार की शंकाएँ उनकी सोच को घेर लेती हैं।
    ऐसी आम धारणा है कि अकेला चना क्या भाड़ फ़ोड़ेगा। पर यदि अपनी पर आ जाए तो अकेला चना भी भाड़ फ़ोड़ सकता है। हर कोई सोचता है कि हम अकेले क्या क्रांति लाएँगे, परन्तु यदि जब सभी अपना अपना प्रयास करें तो कैसे नहीं क्रांति आएगी? महात्मा गांधी अकेले चले थे, और उनको देख लोग उनके साथ होते गए। चूँकि लड़कियाँ लड़कों के अनुपात में कम हैं, तो लड़कियों के अभिवावकों को इस बात का लाभ उठाना चाहिए, अपनी बात पर अड़ जाना चाहिए कि दहेज नहीं देंगे, तो लड़के कहाँ जाएँगे, कुँवारें तो रहने से रहे, तो दहेज बिन ब्याह करना ही पड़ेगा, क्योंकि आऊटसोर्स तो करने से रहे!! ;) साथ ही लड़कों को भी समझना चाहिए कि उन्हे दहेज किस बात का दिया जाए, यदि अच्छी पढ़ाई आदि हुई है और अच्छी नौकरी है तो उसका लाभ क्या केवल लड़की को मिलेगा?
    और एक बात और, लड़कियाँ भी कुछ कम तेज़ नहीं होती, वह ज़माना गया जब नई नवेली दुल्हन चुप चाप घर आती थी और गृहस्थी में लग जाती थी। आजकल आधुनिकता की मारी लड़कियाँ आते ही सबसे पहले तो अपने मियाँ को सास-ससुर से अलग होने के लिए उकसाती हैं। कई तो ऐसी भोली गाय होती हैं कि शादी से पूर्व किसी और से नैन-मटक्का होने के बावजूद किसी और से शादी कर लेती हैं और बाद में अपने ग़रीब ससुराल वालों को दहेज प्रतारणा आदि के इल्ज़ाम में फ़ंसा के अपने माँ-बाप द्वारा दिए गए गहनों आदि के साथ ससुराल से मिले जेवरात को भी लेकर चलती बनती हैं(आँखों देखी घटना)।
  3. आशीष
    दहेज एक कडवी सच्चाई है, जिस से कम से कम आज हम मुख मोड नही सकते. हम कितना भी निश्चय कर ले कि दहेज नही देंगे लेकिन कन्यापक्ष की मजबूरी हो जाती है. बिना दहेज के अच्छा रिश्ता मिलना मुश्किल हो जाता है.
  4. प्रत्यक्षा
    आईये , हाथ उठायें हम भी.
    कहा जाता है न कि हज़ार मील की यात्रा में सबसे महत्त्वपूर्ण है ,पहला कदम !
    प्रत्यक्षा
  5. Amit
    दहेज न लेने पर दुनिया वाले सोचेंगे कि लड़की में ऐसी क्या कमी है जो दहेज नहीं ले रहा है?
    यह सबसे लचर कुतर्क है इसे जायज ठहराने का।
    मैं नहीं समझता कि यह कुतर्क है। इससे दहेज प्रथा को जायज़ ठहराने का प्रयत्न नहीं किया जा रहा वरन् एक पहलू रखा जा रहा है जो कि सत्य है। ऐसा मेरे एक मित्र के बड़े भाई के साथ हो चुका है, तो कम से कम मैं तो नहीं कहूँगा कि यह असत्य या कुतर्क है।
    लड़कियों की संख्या कम है तो लड़के शादी के लिये मज़बूर होंगे!
    यह लिखते समय यह सोचना भी जरूरी है कि लड़कियों की संख्या कम क्यों है?
    मुझे ज्ञात है कि लड़कियों की संख्या कम क्यों है(भारत में लड़के लड़कियों का लगभग १००/९४ का अनुपात है)। परन्तु मेरे कहने का तात्पर्य यह था कि यदि लड़कियों के माता-पिता दहेज देने से मना कर दें, तो लड़के कहाँ जाएँगे? ज़ाहिर है कि लड़कों के माँ-बाप उन्हें कुँवारा तो रखेंगे नहीं तो मजबूरन उन्हें बिना दहेज अपने लड़कों की शादी करनी ही पड़ेगी। परन्तु यह एकाध लड़कियों के माता-पिता के करने से नहीं होगा, वरन् एकजुट हो ऐसा कदम उठाना पड़ेगा, तभी कुछ बात बनेगी। परन्तु समस्या भी यहीं है, कि एकजुट हो काम करना तो हम लोगों ने सीखा ही नहीं, वरना भारत १९० वर्षों तक अंग्रेज़ों का गुलाम थोड़े न रहता!! तो यह सुझाव क्रियात्मक भी है और नहीं भी।
    इस सामाजिक बुराई की जड़ में तमाम बातों के अलावा झटके से बिना कुछ किये अमीर बन जाने की प्रवृत्ति है। मीडिया का हाथ है जो तमाम चकाचौंध दिखाता है जिसे आदमी हासिल करना चाहता है।
    अनूप जी, यह कहना कि मीडिया का हाथ है जो तमाम चकाचौंध दिखलाता है जिसे लड़के पा लेना चाहते हैं, बिलकुल वैसा है कि सिगरेट तंबाकू के विज्ञापन टीवी आदि पर न आने से लोग धूम्रपान करना छोड़ देंगे!! अब टीवी पर सिगरेट-बीड़ी-तंबाकू-गुटखे आदि के विज्ञापन नहीं आते, और बाकी शहरों की तो नहीं जानता परन्तु दिल्ली में हर सिगरेट-तंबाकू बेचने वाले को यह घोषणा पत्र अपनी दुकान पर टांगना अनिवार्य हो गया है कि १८ वर्ष से कम की आयु वाले को यह बेचना अपराध है। तो क्या टीवी पर विज्ञापन न आने से सिगरेट-तंबाकू आदि की बिक्री कम हो गई है? १८ वर्ष से कम की आयु वाले ये चीज़े बेचना गैरकानूनी करने से क्या उन बालकों ने इसे खरीदना और दुकानदारों बेचना बंद कर दिया है? क्या यह ठीक वैसे नहीं है जैसे शतुरमुर्ग रेत में अपनी गर्दन छुपा के समझता है कि उसे अब कोई नहीं देख सकता? दिल्ली में कुछ समय सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर प्रतिबंध लगा था, और परिवाहन निगम की बसों में तो आज भी है, तो क्या लोगों ने धूम्रपान करना बंद कर दिया? बसों के संवाहक स्वयं बीड़ी पीते नज़र आ जाते हैं। तो इसलिए मैं नहीं समझता कि मीडिया ऐशो-आराम के नए उत्पादों की चकाचौंध दिखाने के कारण दहेज प्रथा को बढ़ावा देने वालों में से है।
  6. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] 2.हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती 3.आपका संकल्प क्या है? 4.वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है [...]

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Friday, February 10, 2006

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती

http://web.archive.org/web/20110926081942/http://hindini.com/fursatiya/archives/105

इतवार के हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में तीन साइकिल सवार के भारत दर्शन का समाचार छपा था। पिछले चार वर्षों में कुल ८४००० किमी की सड़क नाप चुके नवजवान। चार साल में यूपी के इन लड़कों ने तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक,पूर्वोत्तर भारत,पश्चिम भारत,कश्मीर भारत तथा पंजाब आदि घूम लिया। आठ लड़कों ने यात्रा शुरू की थी। कुछ लोग बिछड़ते गये। लेकिन इनका सफर जारी है।

इनकी कहानी पढ़कर हमें लगा कि अपनी कहानी आगे बढ़ाई जाये।

सासाराम से निकलते-निकलते सबेरे के आठ बज गये थे। गोलानी की आंख लाल हो रही थी। हम एक मेडिकल स्टोर में ‘लाकोला’ खरीदने गये। वहां के दुकानदार ने जिसका नाम कमलकिशोर था हमसे दवा के पैसे लेने से इंकार कर दिया तथा लगभग जबरदस्ती नाश्ता भी कराया। साथ में ‘आज‘ अखबार भी दिया जिसमें हमारी साइकिल यात्रा का समाचार छपा था।

कमलकिशोर ने बिहार की समस्याओं के बारे में अपनी समझ से बताया। उनके अनुसार-
बिहार में सभी तरह की समस्यायें हैं जो कि किसी भी राज्य में हो सकती हैं। यहां परीक्षाओं में अनुचित साधनों का प्रयोग धड़ल्ले से होता है।समस्याओं के मूल में राज्य की भृष्ट राजनीति है। जनता भी दोषी है। सासाराम में कुछ भी रचनात्मक कर पाने का अवसर एवं वातावरण न के बराबर है। बिहार के इंजीनियरिंग तथा मेडिकल कालेजों में प्रवेश में तमाम अनियमिततायें होतीं हैं।
सासाराम से बिना किसी उल्लेखनीय घटना के हम शेरघाटी पहुंचे। वहां से २० किमी दूर गया जाने के लिये हमें जीटी रोड छोड़ना पड़ा।गया लोग पुरखों का पिंडदान के लिये जाते हैं। हम घूमने के लिये गये। वहां अपने कालेज के संजीव कुमार सिंह के घर रहे-ठाठ से। बहुत बढ़िया खाना मिला। बहुत शानदार सत्कार। मजा आ गया।
ये तो अब पता चला कि प्रत्यक्षाजी पैदाइश भी गया की ही हैं। तब पता होता तो साथ ले लेते इनको भी बिहार से । रास्ते में हायकू,कविता वगैरह लिखतीं रहती।लेकिन इनके भाग्य में कहां बदी थी यायावरी।

गया के मच्छर सासाराम के मच्छरों से भी जबर थे। उनसे खून चुसवाते-चुसवाते सबेरा हो गया। वे दिलीप गोलानी पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हुये। मच्छरों तथा कीड़ों ने उसके मुंह को काट-काट के सुजा दिया था। जहां हम रुके थे उसके बगल के मद्रासी परिवार ने हमें बड़े अपनापे से नास्ते पर बुलाया। हमें यही लग रहा था कि भइये ये सभी जगह भारतीय संस्कृति के ‘अतिथि देवो भव’ की ही सरकार चल रही है। इतने अपनापे भरे माहौल से जल्दी उठने का मन नहीं कर रहा था। लेकिन हम उठे तथा करीब ९ बजे गया के विष्णुपद की ओर चले।

कई गलियों में घुसने-निकलने -चलने के बाद कुछ स्लेटी रंग लिये मंदिर दिखाई दिया। बादल छाये थे।पेट भरा था। मौसम ठंडा खुशनुमा था। शानदार नाश्ते तथा खूबसूरत मौसम की जुगलबंदी से मन प्रसन्न था। हम गया मंदिर न जाकर पास में स्थित शंकराचार्य मठ के पुरोहित तथा बिहार प्रेस से संबद्ध प्रसिद्ध जर्नलिस्ट श्री दत्तात्रेय शास्त्री से मिलने गये। शास्त्रीजी को हमारे आने के बारे में पहले ही श्रीमती चित्रा स्वामी ने( जिनके घर सबेरे नाश्ता किया था) बता दिया था। शास्त्रीजी ने हमें गया के इतिहास के बारे में बताया। जनहित में यहां बताया जा रहा है:-
गया/ विष्णुपद की चर्चा अष्टादश पुराणों में की गयी है। कहा जाता है कि भष्मासुर के वंशज गयासुर नामक राक्षस ने कोलाहल पर्वत पर अंगूठे के बल पर एक हजार वर्ष(!) तक तप किया। इन्द्र की कुर्सी डगमगायी। वे चिन्तित हुये। ब्रह्माजी को भेजा गया मामला निपटाने के लिये। गयासुर ने वरदान मांगा कि उसका शरीर देवताओं से भी पवित्र हो जाये तथा लोग उसके दर्शन मात्र से पापमुक्त होंने लगें। जैसा कि होता है कि देवता लोग वरदान देने का काम हमेशा बिना अकल लड़ाये करते हैं सो ब्रह्माजी ने भी किया। तथास्तु कह दिया।

वरदान का असर हुआ। लोग गयासुर के दर्शनकर उसी तरह पापमुक्त होने लगे जिस तरह थानेदार के दर्शन कर चोर-डकैत भयमुक्त हो जाते हैं।स्वर्ग की जनसंख्या विकासशील देशों की तरह बढ़ने लगी। इसी जनसंख्या बोझ से देवगण उसीतरह भुनभुनाने लगे जिस तरह विकसित देशों के लोग अपने यहां प्रवासियों की की बढ़ती संख्या देखकर भुनभुनाते हैं।फिर से ब्रह्माजी की ड्यूटी लगायी गयी।

ब्रह्माजी गये गयासुर के पास। बोले-मुझे यज्ञ के लिये पवित्र जगह चाहिये। तुम्हारा शरीर देवताओं से भी पवित्र है। अत: तुम लेट जाओ ताकि यह स्थान पवित्र हो जाये। गयासुर झांसे में आकर लेट गया। उसका शरीर पांच कोस में फैल गया।एक कोस में उसका सिर फैला था।यही छह कोस आगे चलकर गया की सीमा बने-पवित्र सीमा।ब्रह्माजी ने लेटे हुये गयासुर के सिर पर पहाड़,नदियां,पितर,धर्मशिला आदि को रखा। फिर भी उसका सिर हिलना बन्द नहीं हुआ। तो फिर विष्णुजी की सेवायें ली गयीं। विष्णुजी अपने चरण उस धर्मशिला के ऊपर रखे। वही चरण-चिन्ह आज विष्णुपद नाम से प्रसिद्ध हैं।
गयासुर ने फिर विष्णुजी से तीन वरदान मांगे-
१.यह स्थान गयासुर के नाम पर प्रसिद्ध हो।
२.यहां पिण्डदान हों।
३.यहां रोज एक शव आना चाहिये।
गयासुर ने यह धमकी भी दी कि जिसदिन यह बंद हो जायेगा उसदिन वह फिर से उठ खड़ा होगा। विष्णुजी के वरदान के कारण वह स्थान आज भी पूज्य है। विष्णुपद करीब डेढ़ फुट के अष्टभुजाकार सीमा के अंदर पत्थर की शिला पर बने हैं।
ऐसे देखने पर विष्णुपद नहीं दिखते लेकिन जब यहां दूध डाला जाता है तो पद-चिन्ह दिखते हैं। गया में हर तरफ पण्डों की आपाधापी ,लूटपाट दिखती है। यह धार्मिक,आध्यात्मिक केन्द्र कम कचहरी ज्यादा दिखती है। वकीलों के बस्तों की तरह पण्डे हर तरफ दिखते हैं।

बोधगया:-यहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई थी। भगवान बुद्ध के अनुयायी सम्राट अशोक ने बुद्ध की स्मृति में यहां स्तूप का निर्माण कराया था। बाद में सम्राट समुद्रगुप्त ने इस स्थान पर वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया।बाद में २८० फुट ऊंचा यह मंदिर बख्तियार खिलजी के कोप का शिकार हुआ जिसने सन्‌ १२०५ में इसे तुड़वा दिया।बख्तियार खिलजी इस मंदिर के अलावा नालन्दा विश्वविद्यालय को भी नष्ट किया।बाद में ब्रिटिश काल में लार्ड कैनिंग ने १८८० में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। भगवान बुद्ध यहां कुल ४९ दिन रहे। इन उन्चास दिनों में सात विभिन्न स्थानों पर प्रत्येक में सात दिन के हिसाब से रहे।इन सातों स्थानों के नाम उन स्थानों पर भगवान बुद्ध द्वारा किये गये विभिन्न कार्यकलापों के अनुसार हैं।इन सात स्थानों का विवरण निम्नवत है:-
१)बुद्धकुण्ड:-इस स्थान पर आकर भगवान बुद्ध से सबसे पहले तपस्या की।पहले यहां बियावान जंगल था। अब एक कुण्ड बना हुआ है।जिसमें कमल खिलते हैं। कुण्ड के बीचोबीच चबूतरा है।
२)अशोक रेलिंग:-जिस वृक्ष के नीचे तथागत को ज्ञान प्राप्ति हुई थी उसके चारो ओर सम्राट अशोक ने जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिये रेलिंग बनवाई थी। रेलिंग से पूरा मंदिर घिरा हुआ है। रेलिंग वास्तव में पत्थरों से बने स्तूप हैं।कुल ४८० स्तूपों में से कुछ समय के साथ टूट गये। भारत सरकार ने टूटे स्तूपों के अनुरूप स्तूप बनवाकर लगवा दिये हैं।
३)बोधिवृक्ष:-इसी पीपल के पेड़ के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई तथा वे बुद्ध कहलाये।यहां पर बैठकर ही उन्होंने सात दिन तक तपस्या की थी।इस वृक्ष के तीन मूल नष्ट किये जा चुके हैं।वर्तमान मूल चौथा मूल है। पहला मूल अशोक की पत्नी ने नष्ट करवाया था तथा उसकी शाखायें सीलोन भेज दीं थीं ताकि उनके पति सांसारिक मोह से विमुख न हो जाये। दूसरा मूल राजा शशांक ने तथा तीसरा मूल ब्रिटिश शासन के दौरान नष्ट किया गया।
४) चक्रपाणि:-ज्ञानप्राप्ति के बाद बोधिवृक्ष से नीचे से उठकर तथागत सात दिन तक लगातार चलते रहे एक ही स्थान पर ।उनके चलने से उनके चरणों के नीचे कमल के फूल खिलने लगे(?)। सम्राट अशोक ने इस स्थानों पर स्तूप बनवाये हैं।
५)अनिमेषलोचन:-इस स्थान से भगवान बुद्ध सात दिन तक बोधि वृक्ष को देखते रहे।
६)रत्नागिरि:-यहां बैठकर भगवान बुद्ध ने सात दिनों तक तपस्या की।
७)अजापाल:-ज्ञानप्राप्ति के बाद बुद्ध ने जंगल से बाहर जाते हुये सबसे पहली बार जानवर चराने वालों के समूह को धर्मोपदेश दिया था।यहां सम्राट अशोक ने प्रवेश द्वार बनवा दिया था बाद में बख्तियार खिलजी ने इसके तीन टुकड़े कर दिये थे। यहीं पर वर्मा के राजा द्वारा लगवाया गया १२ मन का अष्टधातु का घंटा भी लगा है।
बुद्ध मंदिर से आगे जाने पर चीन,थाईलैंड तथा जापान आदि देशों के बौद्ध मंदिर हैं।चीन के बुद्ध मंदिर में तो बस एक प्रतिमा मात्र है।थाईलैंड का मंदिर भव्य,विशाल है।सुंदर पीले रंग का मंदिर तेज बारिश में अनूठा लग रहा था। जापान मंदिर व म्यूजियम हम देख नहीं पाये। इन मंदिरों में छोटे-छोटे बच्चे लपकते हुये परिक्रमा कर रहे थे।इतनी छोटी उम्र में धर्मपारायण बच्चे देखकर कुछ आश्चर्य भी हुआ।
बोधगया से आगे बढ़कर मगध विश्वविद्यालय के पास से गुजरते हुये सोचा यहां भी पांव फिरा लिया जाये। भौतिकी विभाग के प्रवक्ता यल.बी.श्रीवास्तव से मिले। श्रीवास्तवजी बलियाटिक थे।उन्होंने बिहार की शिक्षा व्यवस्था के बारे में तमाम बातें बताईं।उन दिनों अधिकांश विश्वविद्यालयों के सत्र दो-तीन साल पीछे थे।कभी-कभी परीक्षायें आठ-आठ महीने चलतीं थीं।
हम लोग मगध विश्वविद्यालय में काफी देर रुक गये। रात को फिर डोबी कस्बे में ही रुक गये।

मेरी पसंद

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना,गिरकर चढ़ना न अखरता है,
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती ,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा-जाकर खाली हाथ लौट आता है,
मिलते न सहेज के मोती पानी में,
बहता दूना उत्साह इसी हैरानी में,
मुठ्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो,
क्या कमी रह गयी,देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय-जयकार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

[यह कविता मैंने गांधी को नहीं मारा फिल्म में है। इसका लिंक स्वामीजी से पता चला। इस कविता के रचनाकार सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' बताये गये हैं। लेकिन जब मैंने निराला रचनावली देखी तो अभी तक उसमें यह कविता नहीं मिली।]

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

12 responses to “हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती”

  1. Naam mein kya hai.
    वाह भाई साहब आनन्द आ गया,
    गया बिना गए ही गया गया,
    आप तो हमारे लिए आज के प्रेमचन्द हो गए हैँ.
    जय हो.
  2. जीतू
    सही है, बहुत मौज आ रही है।
    एक चीज और कर दी जाय। प्रत्येक यात्रा वाली पोस्ट के शुरुवात मे पिछले और अन्त मे अगले लिंक की कड़ी दे दी जाय। ताकि पढने वाले को कोई परेशानी ना हो।
    अगर सारी कड़ियों का एक Table of Content बनाया जा सके तो बहुत बढिया रहेगा। किसी सहायता के लिये बन्दा हाजिर है।
  3. प्रत्यक्षा
    आपने बढिया घुमाया गया. सब काम की बातें पता चल गई.गया में पदाईश होने की वजह से लोगबाग यही पूछते हैं गया के विषय में . अब आपका पोस्ट पढ कर आराम से सब बताया जायेगा .
    प्रत्यक्षा
  4. आशीष
    “जैसा कि होता है कि देवता लोग वरदान देने का काम हमेशा बिना अकल
    लड़ाये करते हैं सो ब्रह्माजी ने भी किया। “

    ऐसा इसलिये होता था कि उस जमाने मे वकिल नही हुआ करते थे. आज के तारिख मे तो हर वरदान के लिये भगवान जी को “कांट्रेक्ट” साइन करना पडेगा, साथ मे दो गवाह भी चाहिये होंगे.तथास्तु से काम नही चलेगा.
    अगर जरूरी हुवा थो विडियो रिकार्डीग भी होगी(नही माने तो स्टींग आपरेशन भी हो सकता है)
    आडियो रीकार्डींग मे हो सकता है कि शुकुल देव की आवाज की जगह स्वामीजी आवाज मान ली जाये.
    अब देखो ना हिरण्यकश्यप के फूल्प्रूफ वरदान को कैसे तोडा मरोडा गया ! होलिका के वरदान की वाट लग गयी !
    बेचाते भस्मासूर को नचा नचा के उल्लू बना दिया गया !
  5. Amit
    अब देखो ना हिरण्यकश्यप के फूल्प्रूफ वरदान को कैसे तोडा मरोडा गया
    वो क्या है आशीष भाई कि जो वकील है वे भी भगवान द्वारा ही बनाए गए हैं, क्योंकि कदाचित् ब्रह्मा जी ने सोचा कि कोई तो विष्णु जी की टक्कर का भी होना चाहिए, ताकि आसुरी प्रवत्ति के लोगों को यह न लगे कि उनके हित के लिए ऐसे बुद्धिजीवी न बना परमपिता ब्रह्मा ने उनके साथ कोई अन्याय किया है!! ;)
  6. Ashutosh Dixit
    बहुत अच्छा लिखा है आपने.As far as I know, Harivansh Rai Bachchan is writer of above poem.
  7. फ़ुरसतिया » हमने दरोगा से पैसे ऐंठे
    [...]   रात को बगोदर पहुंच गये थे। प्रोग्राम के अनुसार हमें पांच जुलाई को ही बगोदर पहुंच जाना था लेकिन गया में दत्तात्रेय शास्त्री जी से मिलने के कारण बोधगया  में ठहरना हो गया तथा इसके बाद तेज बारिश ने बाधा पहुंचाई। कुछ समय मगध  विश्वविद्यालय  में भी लग गया।लिहाजा हम पांच जुलाई को केवल डोबी तक ही पहुंच पाये।रात डोबी में रुककर हम छह जुलाई को सबेरे बगोदर के लिये चले। [...]
  8. basant agrawal
    In website
    http://yoogesh.blogspot.com/2006/07/blog-post_26.html
    Harivansh Rai Bacchan claims its his poem
    check it….
  9. amit rai
    amit rai…
    I Googled for something completely different, but found your page…and have to say thanks. nice read….
  10. Pranav Dubey
    I just wanted to correct your information, हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती Kavita Bachchan ki hai.
  11. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] सूधो सनेह को मारग है 2.हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती 3.आपका संकल्प क्या है? 4.वनन में बागन में [...]
  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] सूधो सनेह को मारग है 2.हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती 3.आपका संकल्प क्या है? 4.वनन में बागन में [...]

Friday, February 03, 2006

अति सूधो सनेह को मारग है

http://web.archive.org/web/20110925195744/http://hindini.com/fursatiya/archives/104

अति सूधो सनेह को मारग है

अब ये लो नया लफड़ा। प्रेम के बारे में लिखो। हमारे पास जितना प्रेम का स्टाक था वह हम पहले ही अपने लेख प्रेम गली अति सांकरी तथा ये पीला वासंतिया चांद में उड़ेल चुके हैं। अब प्रत्यक्षाजी तथा आशीष कहते हैं थोड़ा और बयान किया जाय।में अपनी कल्पना के घोड़ों को दौडा़ने के लिये पुचकारता हूं लेकिन वे अड़े खड़े हैं जहां के तहां-ठेलुहा,देबाशीष,अतुल के ब्लाग की तरह। बहरहाल देखा जाये हमारे पहले के शूरमाओं ने क्या किया।
देखा गया कि तो सब सूरमाओं ने अपने-अपने काम के अंदाज में प्रेमियों के गुण बताये। प्रत्यक्षाजी खरीददारी का काम देखती हैं। आदर्श प्रेमी की उनकी जरूरतें भी टेंडर के अनुसार हैं। आठ गुण बतायें गयें हैं। जो लोग इन गुणों को धारण करते हैं वे आदर्श प्रेमी का टेंडर पाने के पात्र हैं। स्वामीजी कम्प्यूटर कर्मी हैं। उन्होंने प्रेमी प्रोग्राम बनाया जो कि तभी चलेगा जब सिस्टम में आठ सुविधायें होंगी। मानोशीजी पिछले समाचार मिलने तक कुछ करती नहीं थीं लिहाजा ये पति को भी कुछ करते नहीं देख सकतीं। न रिमोट चलाते,न समाचार पत्र पढ़ते न ही हूँ-हाँ करते देखना चाहती हैं ये अपने पति को । ये नहीं चाहती कि किसी काम लायक रहे इनका चाहने वाला -पति।
तरुन ने भी अपना रोना रोते हुये लिखा:-
जब से हुई है शादी, आंसू बहा रहा हूँ,
आफत गले पड़ी है उसको निभा रहा हूँ।
चुन्‍नू करे परेशाँ, मुन्‍नी को ढूँढता हूँ,
राशन नहीं है घर पे बाजार जा रहा हूँ।।

मैडम है घर से गायब, सखियों से जा मिली है,
जलता नही है चूल्‍हा, कब से जला रहा हूँ।
आयेगा मेरा भी एक दिन, मैं भी राजा बनूँगा,
फिर कहूँगा आजा, नहीं तो दूजी ला रहा हूँ।।

आशीषके बारे में क्या कहें? अविगत गति कछु कहत न आवै! इनकी कहानियां सुनकर इनके कुंवारेपन का घिसा-पिटा राज समझ में आता है:-
एक लड़का बहुत दिन से अपने लिये लड़की तलाश रहा था। काफी दिन बाद मिलने पर उसके दोस्त ने शाश्वत सवाल दोहराया-कोई लड़की पसन्द आई?
लड़के ने कहा हां मिल गई लड़की जिसे मैं बहुत पसन्द करता हूं।
दोस्त बोला -फिर क्या शादी कर लो जल्दी से।
लड़के ने अपने आपको दुख पूर्वक उचकाते हुये कहा- यार शादी तो मैं कर लूं लेकिन एक ट्रेजेडी है।
दोस्त बोला -कैसी ट्रेजेडी?क्या समस्या है?
लड़का बोला-यार प्राब्लम यह है कि वह अपने पसन्द के लड़के से शादी करना चाहती है।
प्रेम के बारे में अपने विचार हम पिछले साल ही प्रकट कर चुके हैं:-
जब आदमी के पास कुछ करने को नहीं होता तो प्यार करने लगता है.इसका उल्टा भी सही है-जब आदमी प्यार करने लगता है तो कुछ और करने लायक नहीं रहता .प्यार एक आग है.इस आग का त्रिभुज तीन भुजाओं से मुकम्मल होता है. जलने के लिये पदार्थ (प्रेमीजीव), जलने के लिये न्यूनतम तापमान(उमर,अहमकपना) तथा आक्सीजन(वातावरण,मौका,साथ) किसी भी एक तत्व के हट जाने पर यह आग बुझ जाती है.धुआं सुलगता रहता है.कुछ लोग इस पवित्र ‘प्रेमयज्ञ धूम’ को ताजिंदगी सहेज के रखते हैं .बहुतों को धुआं उठते ही खांसी आने लगती है जिससे बचने के लिये वे दूसरी आग जलाने के प्रयास करते हैं.इनके लिये कहा है नंदनजी ने:-
अभी मुझसे फिर उससे फिर किसी और से
मियां यह मोहब्बत है या कोई कारखाना.
पुराने समय से प्रेम को हमेशा अहमकपन माना गया है। कोई समझदार आदमी प्रेम करते हुये नहीं पकड़ा गया। समझदार आदमी प्यार करिच नहीं सकता। प्रेम करने के लिये सबसे जरूरी तत्व है- दुनियावी बेवकूफी। जिसमें जितनी ज्यादा होगा -वह उतना सफल प्रेमी कहलायेगा।
कुछ लोग कहते हैं-प्यार एक सुखद अहसास है.पर यह ठीक नहीं है.प्यार के ‘ब्रांड एम्बेसडर’ लैला मजनू ,शीरी -फरहाद मर गये रोते-रोते.यह सुखद अहसास कैसे हो सकता है?
लोगों ने तमाम गुण बतायें हैं आदर्श प्रेमी के । गोया प्रेमी नहीं अपनी कंपनी के लिये कर्मचारी चुनना हो। जबकि दुनिया में प्रेम हमेशा वह दुर्घटना मानी गई है जो पहली नज़र में होती है।”लव एट फस्ट साइट।“साथी को देखा नहीं उधर प्रेम का नगाड़ा बजने लगा। मन कसमसाने लगा:-
नैन लड़ जइहैं तो मनवा मां कसक हुइबै करी
प्रेम का बजिहै जब पटाखा तो मनवा मा कसक हुइबै करी।

सच तो यह है कि प्रेम का कोई गणित नहीं होता। कुछ पता नहीं होता कि आप किन गुणों को धारण करने वाले पर अपने दिल की लुटिया डुबा देंगे। सर्वथा अनिश्चित। वास्तव में ज्यादातर मामलों में प्रेम के तत्व ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ से तय होते हैं। जो आपको अच्छा लगता है आप मान लेते हैं कि वही गुण आदर्श प्रेमी के गुण होते हैं।पता नहीं किसके लिये आप कहने लगें-आप मुझे अच्छे लगने लगे।
यह भी संभव हो कि किसी शख्स में वो सारे गुण मौजूद हों जो कि आप अपने प्रेमी में देखना चाहते हैं लेकिन असेम्बली‘ हो उन गुणों की वो निहायत बेतरतीब हो। जब आप सहिष्णुता की अपेक्षा करें साथी से तब वह स्पष्टवादी (मुंहफट) हो जाये तथा जब आप आशा करते हों कि वह आपके बारे में सच बताये तब वह सहिष्णुता धारण कर ले।
कुछ लोग कहते हैं कि हम अपने प्रेम में खुद को खोजते हैं। जो हम होना चाहते हैं वह खोजते हैं। वहीं दूसरे लोग कहते हैं प्रेमी में हम उन तत्वों की तलाश करते हैं जिनकी हमारे में कमी होती है। यह दूसरी बात मुझे सच के करीब लगती है जब मैं देखता हूं कि स्वामीजी अपनी होने वाली प्रेमिका में सहिष्णुता,समझदारी आदि-इत्यादि गुणतलाशते हैं।
प्रेम का हमारे देश में कोई उल्लेखनीय इतिहास नहीं रहा है। जो छोटी प्रेम नदियां बहीं भी वे शादी के सागर तुरंत विलीन हो गईं। राजा लोग शादी करते,बच्चे होते फिर रानियों के मर जाने पर प्रेम करके रानियों के मकबरे बनवा डालते। इस तरह इतिहास में उनका प्रेम अमर हो जाता। जिसका जितना उंचा मकबरा उसका उतना गहरा प्रेम।ताजमहल के बारे में पता चलता है कि मुमताज महल जब तेहरवें बच्चे को पैदा करते समय मरी तो उसकी उम्र केवल ३९ साल थी। चूंकि मकबरा बड़ा बना है लिहाजा शाहजहां -मुमताजमहल का प्रेम भी बड़ा है।प्रेम की गहराई मकबरे की ऊंचाई से तय होती है।
आमजीवन में भी लोग तमाम पाबंदियों के बावजूद प्रेम का झण्डा फहराने का कोई मौका नहीं चूकते। हर साल मेरठ, मुजफ्फरनगर, हरियाणा के गांवों में आये दिन पंचायतें घर वालों की मर्जी के खिलाफ शादी करने वाले प्रेमियों-प्रेमिकाओं को सरेआम फूंकती रहती हैं लेकिन प्रेमीजन हैं कि लगे हुये हैं। ये आग ही ऐसी है कि लगाये न लगे बुझाये न बुझे।
पता नहीं प्रेमिकाओं के कौन से गुण देखकर लोग मरने के लिये तैयार हो जाते हैं। काश! उनमें भी तमाम मध्यमवर्गीय लड़कों की तरह की समझदारियां होती जो प्रेम तो अपने साथ की लड़की से करते हैं लेकिन शादी अपने पिताजी के द्वारा तय दहेज की सीढ़ी पर चढ़कर करते हैं।
पुराने जमाने में जब लोग प्रेम के पथ पर डगर बढ़ाते थे तो चुनने में टाइम बरबाद नहीं करते थे। जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिये टाइप प्यार करते थे। राही मासूम रज़ा के पात्र हैं वे तड़ से इश्क करने लगते हैं। रजिया ने मुन्नन को देखा और वो तड़ से उसपे फिदा हो गई। फिदा होने के बाद वो पूछती हाय वो कैसा लगता है?
आशिक लड़के भी संतोषी प्रकृति के होते थे। जो मिल गया उसी में उचक कर गाने लगे-

चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैने सोचा था,
हां तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था।

उन दिनों तो एक ने इजहारे मुहब्बत किया नहीं कि दूसरे ने भी गरदन हिला दी और दोनों चलो भाग चलें पूरब की ओर कहते हुये भागते चले जाते अमराइयों में,पनघटों पर,घाटियों में,पार्कों में,सिनेमाहाल में,सहेली के यहां दोस्त के यहां।
धीरे-धीरे प्रेम के दफ्तर में भी लालफीताशाही आने लगी। प्रेमी कुछ इंतजार के बाद यंग्री यंग मैन होने लगा-
सुन साहिबा सुन,सुन साहिबा सुन
हमने तुम्हें चुन लिया तू भी मुझे चुन।

इसपर भी न मानी कन्या तो लड़का पूरा रंगरूट हो जाता है:-
सीधे-सीधे हां करती है या चलती है थाने?
कलाकार रंगरूट आगे अपने प्रेम संबंधों का वर्णन करता है रेल के डिब्बों में,शौचालयों की दीवारों में,कूडा़ घरों में-कोणार्क ,खजुहारो शैली के चित्रों में।जब सब मेहनत के बाद भी मंजिले मकसूद नहीं मिलती तो वह अपनी प्रेमिका के चेहरे पर अपना सारा प्रेम तेजाब का उडे़ल देता है।अगर तू मेरी नहीं हो सकती तो तुझे किसी दूसरे की भी मैं नहीं होने दूंगा।
विकल्पहीन कन्यायें तो प्रेमी के आवाहन (तू भी मुझे चुन) पर उसे चुनकर, चूना लगाने लगतीं लेकिन कुछ होती जिनके पास विकल्प होते वे अंखियों से गोली सी मारते हुये कहतीं-ज्यादा मत परेशान करो वर्ना भाईसाहब कह दूंगी सरे बाजार । बांध दूंगी राखी तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे। खिलाना पड़ेगा हमारे बच्चों को मामा कहते हुये।
कुछ शरमदार नायिकायें शायद इस तरह विरोध जाहिर करतीं होंगी-
देखिये आपसे मैंने कितनी बार कहा आप मेरे सपनों में मत आया करें प्लीज़। समझा करें मेरी शादी होने वाली है। माना कि हमने साथ-साथ गर्मी की दोपहर में छत पर बैठकर बातें की हैं,हाथ में हाथ पकड़कर पसीने-पसीने हुये हैं इस चक्कर में हम दोनों की डिवीजन खराब हो गयी लेकिन अब तो तंग मत करिये न। आपका क्या आपको तो कहीं नौकरी मिल जायेगी बाहर चले जायेंगे। लेकिन मेरा क्या होगा? मैं तो भले घर की लड़की हूं । बदनामी तो मेरी होगी न! इसलिये अगर आप मुझे जरा सा भी चाहते हों तो प्लीज़ मेरे सपनों में आना बंद कर दें। मेरी अगले महीने शादी है मैं अब ‘इनके’ सपने भी देखना चाहती हूं। अभ्यास जरूरी है न!९ को शादी है ,आइयेगा जरूर। तंबू -कनात लगवाने में पापा की हेल्पकर देना प्लीज़।
आधुनिक बालक-बालिकाओं के सम्पर्क में तो मैं नहीं हूं लेकिन जैसा सुनता हूं कि पुराने जमाने में जिस अंदाज में लोग जहां सस्ते में मिली खरीद के डाल लेते थे कि पड़ी रहेगी बखत-जरूरत काम देगी। जिसकी कितनी जमीन उसका उतना रुआब। या फिर जिस तरह राजा लोग शिकार पर जाते तो एकाध रानी भी ले लाते रनिवास की शोभा तथा संख्या बढ़ाने के लिये ।उसी अंदाज में आजकल प्रेम होने लगा है। जिसके जितने ज्यादा प्रेम उसका उतना रुतबा। मेरे प्रेमी से तेरे प्रेमी ज्यादा कैसे?
ये बालक-बालिकायें प्रेम संबंध के स्थाइत्व के लिये नहीं संबंधों की संख्या बढ़ाने के लिये ज्यादा परेशान रहते हैं। साथी के रकीबों की संख्या बढ़ती रहे। इनकी धमकियां भी कुछ ऐसी होती होंगी-ये रामसजीवन मैं देख रही हूं कि तुम कुछ ज्यादा ही पजेसिव हो गये । अगर यही हाल रहा तो वी कांट गो अ लांग वे। या फिर कुछ धमकाती होंगीं- ज्यादा स्मार्ट मत बनो वर्ना शादी कर लूंगी तुमसे तो रोते नहीं बनेगा।
विज्ञापन भी प्रेम को मैगी नूडल बनाये हुये हैं। जो कन्या आपकी तरफ देखने के लिये भी तैयार नहीं वही कन्या एक खास रेजर से दाड़ी बनाने पर जोंक की तरह आपसे चिपक जायेगी।लड़की नहीं पट रही रही है कोई बात नहीं कुछ हजार में खास फटफटिया लो लड़कियां पटापट पटेंगी। लड़का नहीं पट रहा -अरे ये वाली क्रीम लगाइये न! आप शमा लड़के परवाना न बन जायें तो पूरे पांच रुपये वापस। फलानी साड़ी पहिनिये लड़का लटपटाता चला आयेगा आपकी तरफ!
बाजार यही बताता है कि किसी गुण की जरूरत नहीं आपको किसी के सपनों का राजा या किसी के सपनों की रानी बनने के लिये। बस ये क्रीम लीजिये,वो पाउडर मलिये। ये अंडरवियर पहिनिये वो बनियाइन। ये सूटिंग-वो शर्टिंग। ये टानिक,वो जड़ी बूटीयुक्त तेल। खाना पकाना सीखने की कोई जरूरत नहीं इस कुकर में वो मसाला डालिये बस हो चाट लीजिये अपनी अंगुलियां। अब तो इजहारे मुहब्बत के लिये शेरो शायरी भी रटने के लिये जरूरत नहीं -बस प्रस्टिज कुकर ले आइये:-
जो बीबी से करे प्यार वो कैसे करे प्रेस्टीज से इंकार।
यहां आते-आते मैं विषय के औचित्य पर लौटता हूं। यह विषय मांग करता है कि आप आठ गुण बताओ जो आप अपने प्रेमी-प्रेमिका में चाहते हो। अब आप करने लगे टुकड़े-टुकडे़ अपने प्रेमी के। जो सिर्फ प्रेमिका की चितवन पर मर मिटे ,सिर्फ तिरछी नज़र के तीर से घायल हो गये कहते हुये-
तिरछी नज़र का तीर है,मुश्किल से निकलेगा,
गर दिल से निकलेगा तो दिल के साथ निकलेगा।

वो अपनी माशूका में सात फर्जी गुण खोज रहे हैं। जिनके साथी में सैकड़ों गुण हैं वे उनके केवल आठ गुण चुन के बाकी गुणों को आप सौरभ गांगुली बना दो। ये कैसा प्रेमी-प्रेमिका खोज है जो उसको टुकड़े-टुकड़े कर दे।
सच पूछा जाये तो प्रेम एक अहसास है जिसकी कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं दी जा सकती। इसी तरह प्रेमी के गुण भी । वैसे प्रेम वही है जो हमें उदात्त बनाये,हमारा विस्तार करे। जीवन के प्रति सकारात्मक बनाये। प्रेम व्यक्ति को निर्मल बनाता है,निश्छल बनाता है। घाघ व्यक्ति जिंदगी में सब कुछ हासिल कर सकता है प्रेम नहीं कर सकता-
अति सूधो सनेह को मारग है जहं नैकु सयानप,बांक नहीं।
लोग कहेंगे कि अब कुछ अपने बारे में भी बताया जाय। तो हम साल भर पहले अपनी कहानी लिख चुके हैं :-

मैंने भी कोशिश की.टुकड़ों-टुकड़ों मे तमाम महिलाओं में तमाम गुण चीजें देखीं जो मुझे लगातार आकर्षित करते रहे.पर टुकड़े,टुकड़े ही रहे. उन टुकड़ों को जोड़कर कोई मुकम्मल कोलाज ऐसा नहीं बन पाया आज तक जो मेरी बीबी की जगह ले सके.विकल्पहीनता की स्थिति में खींच रहे हैं गाडी- इश्क का हुक्का गुड़गुड़ाते हुये
.
कुछ नहीं बदला सिवाय समय के ।
बकिया इश्क के बारे में तो गुणी लोग कह गये हैं:-
कबिरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहिं,
शीश उतारै भुईं धरै तब पैठै घर मांहि।

ये तो खाली ट्रेलर है। न जाने कितने पेंच हैं इस प्रेम पाठशाला के। इसका भी रिवाज उल्टा ही है जो प्रेमपाठ पढ़ गया वो गया काम से:-

मकतबे इश्क का ये खेल निराला देखा,
उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ।

आगे जिन लोगों के लेख पढ़ना चाहता हूं इस मसले पर वे हैं:-
१)रमन कौल-चेन मेल मत लिखें लेख तो लिखें।
२)इंद्र अवस्थी- कन्या छात्रावास की ताकाझांकी कब लिखोगे?
३)अतुल अरोरा- सही में अभी भी व्यस्त हो?
४)रवि रतलामी- जिनके लिये लड़े-झगडे़ उनके बारे में कुछ तो लिखा जाये।
५)पंकज नरुला- जहाज का पंछी कुछ इस पर भी उड़े। लिखा जाये कुछ शहजादियों पर।
६) देबाशीष-अब तो हो गये इंडीब्लागर्स चुनाव। तबियत भी ठीक हो गयी होगी। कुछ हो जाये नुक्ताचीनी।
७)राजेश-तुम भी काहे चूको ठाकुर?लिखा मारो सारा किस्सा जो तुम बताये नहीं लेकिन हम जानते हैं।
८)विजय ठाकुर-अपने होने का सबूत दो। पुटुष के फूल फिर खिले होंगे!
९)प्रेम पीयूष- कहां गये बंधुवर? पेंसिल की तरह गुम?
१०)जीतेंद्र-कब तक छिपाओगे छत की बातें जो पूरी बताई नहीं?

मेरी पसंद

मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ
तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो।

संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ
हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ
यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ
लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ।
मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता
तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।
तुम मुझे उठाओ अगर कहीं गिर जाऊँ
कुछ कहो न जब मैं गीतों से घिर जाऊँ
तुम मुझे जगह दो नयनों में या मन में
पर जैसे भी हो पास रहो जीवन में ।
मैं अमृत बाँटने वाला मेघ बनूँ
तुम मुझे उठाने को आकाश बनो ।
हो जहाँ स्वरों का अंत वहाँ मैं गाऊँ
हो जहाँ प्यार ही प्यार वहाँ बस जाऊँ
मैं खिलूँ वहाँ पर जहाँ मरण मुरझाये
मैं चलूँ वहाँ पर जहाँ जगत रुक जाये।
मैं जग में जीने का सामान बनूँ
तुम जीने वालों का इतिहास बनो।
-स्व.रमानाथ अवस्थी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “अति सूधो सनेह को मारग है”

  1. eswami
    कुछ लोग कहते हैं कि हम अपने प्रेम में खुद को खोजते हैं। जो हम होना चाहते हैं वह खोजते हैं। वहीं दूसरे लोग कहते हैं प्रेमी में हम उन तत्वों की तलाश करते हैं जिनकी हमारे में कमी होती है। यह दूसरी बात मुझे सच के करीब लगती है जब मैं देखता हूं कि स्वामीजी अपनी होने वाली प्रेमिका में सहिष्णुता,समझदारी आदि-इत्यादि गुण तलाशते हैं।
    हां जी बिल्कुल, उसे हमारे समान साण्ड-बुद्धि नही होना चाहिए.
    लेकिन गुरुदेव, मैं बच्चों की खुशी के लिए उन के साथ बच्चा तो बना – प्रेम की बात चली और रूमी,खलील जिब्रान और बुल्ले शाह को कोट किए बिना लिखा – कितना मुश्किल था आपको अंदाजा भी नही है! इधर तो पब्लिक को मीर और मज़ाज भी भारी पड जाते हैं. चलो हल्का-फ़ुल्का ही सही संवाद अच्छा है. छोरों-छारियों वाली बातें है – प्रेम का आध्यात्म और उस से जुडा सबकुछ आज कॉर्नी और मेलोड्रामेटिक करार दिया जाता है. लेकिन आल टाईम बेस्ट हाल ओफ़ फ़ेम नंबर १ पीले वसंती चांद की कसम – अपना टाईम सचमुच कुछ और था प्रभु!
  2. Atul
    आशीष,तरूण और अब शुकुल देव जी, यह टैग का खेल कर करके टीपबाजी कर रहे हैं। अब तीन टीप पढ़ने के बाद भी न लिखा तो गाँधी का चेला बन जाऊँगा। खैर लेख जल्द हाजिर होगा गुरुदेव। बकिया आपने हेशा कि तरह झकास लिखा।
  3. Dharni

  4. प्रत्यक्षा
    आपको इसलिये टैग थोडे किया था कि हमारी ही खिंचाई कर दें .
    रिसर्च पेपर बहुत अच्छा था, टैग शिकार बार बार इसी लिये ही तो बनाया गया आपको.
    मज़ा आ गया.
    प्रत्यक्षा
  5. अतुल
    बुरा फँसाया गुरूदेव आपने। यह रही विशलिस्ट की व्यथाकथा।
  6. जीतू
    तुम तो गुरु अवलोकनी लेख लिख दिये, दूसरो को आदेश देकर अपने राज छिपाये रखना चाहते हो? ऐसा नही चलेगा।
    बदनामी तो मेरी होगी न! इसलिये अगर आप मुझे जरा सा भी चाहते हों तो प्लीज़ मेरे सपनों में आना बंद कर दें। मेरी अगले महीने शादी है मैं अब ‘इनके’ सपने भी देखना चाहती हूं। अभ्यास जरूरी है न!९ को शादी है ,आइयेगा जरूर। तंबू -कनात लगवाने में पापा की हेल्पकर देना प्लीज़।
    गुरु ये तो व्यथा कथा दिख रही है, इतना डीप और डिटेल्ड, कोई अनुभवी ही लिख सकता है जिसने इस व्यथा को झेला हो।
    बकिया लेख अच्छा लिखे हो। लगे रहो।
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.अति सूधो सनेह को मारग है 2.हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती 3.आपका संकल्प क्या है? 4.वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है 5.मेरे अब्बा मुझे चैन से पढ़ने नहीं देते 6.जेहि पर जाकर सत्य सनेहू [...]

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