Friday, April 21, 2006

मिस़रा उठाओ यार…

http://web.archive.org/web/20140210215302/http://hindini.com/fursatiya/archives/123

मिस़रा उठाओ यार…

दो दिन पहले अनूप भार्गव जी मिल गये नेट पर। पता चला कि २३ जुलाई को न्यूयार्क में होने वाले कवि सम्मेलन की तैयारी कर रहे हैं। तैयारी में कोई कमी न रह जाय इसलिये पत्नीश्री को भारत भेज दिया है।(समाचार लिखने तक पता चला कि जब कुछ नहीं बना तो सहायता के लिये वापस भी बुला लिया।) हमने सोचा कि अनूपजी को कुछ टिप्स दे दिये जायें। सो हम बतियाते रहे कि अइसा करना ,वइसा करना। ये सुनते रहे । लेकिन जब पता चला कि ये जनाब तो सात साल से ही कविता का दामन थामे हुये हैं तब लगा कि जैसे हम न्यूटन को गति के नियम समझा रहे हों।
कवि तथा कवि सम्मेलनों से मैं काफी समय से जुड़ा रहा हूं। इस दौरान लटके-झटके,अदायें देखने को मिलीं। यूं तो हर कवि की अदायें जुदा होतीं हैं लेकिन कुल मिलाकर लगभग सारे कवि की तमाम अदायें लगभग मिलती जुलती हैं। खासकर मंच से पढ़ते समय। नये कवि अपने पूर्वजों से सीखता रहता है कुछ अपना जोड़ता रहता है।
किसी भी कवि के लिये शुरुआत बहुत अहम होती है। अगर शुरुआत अच्छी हो गयी तो बहुत खुशनुमा माहौल में सफर गुजरता है वर्ना कवि तथा श्रोता दोनों सफर करते हैं। विरले ही कवि होते हैं जो खराब शुरूआत के बाद सफर को खुशनुमा माहौल में तब्दील कर लें।
अच्छी शुरूआत के फार्मूले होते हैं। कविगण अपनी क्षमता के अनुसार उनका उपयोग करते हैं। ज्यादातर कविगण शुरुआत के लिये कुछ बहुत छोटी परिचयनुमा कवितायें पढ़ते हैं जिससे श्रोताओं का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित हो जाये। हमारे कानपुर के कवि प्रमोद तिवारी शुरुआत बहुत दिलकश अंदाज में गाते हुये करते हैं:-
सच है गाते गाते हम भी थोड़ा सा मशहूर हुए,
लेकिन इसके पहले पल-पल,तिल-तिल चकनाचूर हुए।
चाहे दर्द जमाने का हो चाहे हो अपने दिल का,
हमने तब-तब कलम उठाई जब-जब हम मजबूर हुए।
स्व.कवि बलबीर सिंह ‘रंग’ चार लाइन की कविता पढ़ते थे जिसमें बताया गया है कि सितारों में यह बहस चल रही है कि रंग जैसे लोग इतने कम क्यों हैं। कविता की आखिरी लाइन है:-
धरा पर ‘रंग’ जैसे लोग अब पाये नहीं जाते।
किसी भी कवि सम्मेलन की सफलता-असफलता का मापदंड श्रोताओं की प्रतिक्रिया होती है। श्रोता अगर खुश ,समझो कवि हिट। श्रोता बादशाह होता है कवि सम्मेलन का। श्रोता को पटाने के लिये कवि,शायर भी अपने-अपने अंदाज में कोशिश करते रहते हैं।ज्यादातर लोग कहते हैं अगर कविता पसंद आये तो प्रतिक्रिया जरूर कीजियेगा।तमाम डायलाग जो बोले जाते हैं वे कुछ इस तरह के होते हैं:-
-कविता पढ़ रहा हूं आपका आशीर्वाद चाहूंगा।
-आपसे जुड़ने का प्रयास कर रहा हूं ।
-अगर कोई पंक्ति आपके दिल को छुये तो इजहार जरूर कीजियेगा।
-अगर लगे कि मैंने आपकी बात रखी है तो इसका प्रमाण जरूर दीजियेगा।
-तालियों से हमारी हौसला आफजाई जरूर करियेगा।
कुछ लोग बहाने से तालियां बजवाते हैं। एक कवि बोले – अभी मुझसे पहले जो कविता पढ़ी गयी वैसी कवितायें बहुत कम सुनने को मिलती हैं। आप एक बार फिर से इनके लिये तालियां बजायें।
जैसे-जैसे कवि अनुभवी,प्रसिद्ध होता जाता है वैसे-वैसे वह श्रोताओं के मूड को समझता जाता है। फिर श्रोताओं को अपने अंदाज में काबू रखना आ जाता है।सबसे अच्छा तरीका कवियों के पास होता है कि जिस शहर में कविता पढ़ रहे हों वहां की तारीफ़ कर दो, वहां के महापुरुषों के लिये माथा नवा दो तथा वहां के कवियों की तारीफ के कसीदे काढ़ दो। आधा काम हो गया।फिर स्थानीय कवियों के चेले-चपाटी हुल्लड़ मचाने से परहेज करेंगे या हुल्लड़ की तेजी कम होगी।
हर कवि का अपना अंदाज़ सा बन जाता है। प्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी एक बार शाहजहांपुर में पढ़ने के लिये खड़े हुये। उनसे पहले प्रसिद्ध गीतकार विष्णु सक्सेना श्रोताओं की तालियां बटोर चुके थे। जब कोई कवि बहुत तारीफ पा चुका हो तो अगले कवि की चुनौती होती है कि श्रोताओं को पहले के आकर्षण से मुक्त करके अपने से जोड़े। राहत इंदौरी बोले- अभी ये लड़का बहुत पढ़ रहा था। बहुत उम्दा। मेरे लिये बहुत आसान है कि जिस जमीन को इसने छोड़ा वहीं से अपनी बात शुरू कर दूं। लेकिन किसी दूसरे की जमीन पर खेती करना मुझे पसंद नहीं । इसलिये जो माहौल इसने बनाया है पहले तो मैं इसे बिगाड़ूंगा,फिर अपनी जमीन बनाऊंगा तब अपने शेर पढ़ूंगा।आप लोग ध्यान से सुनियेगा क्योंकि मैं अपने शेर दोहराता नहीं हूं।
अब अगर पचास साल की उमर के किसी जमे हुये कवि को राहत इंदौरी अपने खास मलंगो वाले अंदाज में लड़का बताकर राहत इंदौरी पढ़ना शुरू करेंगे तो पहले का हवापानी तो हवा हो ही जायेगा।
डा.नसीम निकहत ऐसी शायरा हैं जिनको देखते हुये सुनने का मजा ही कुछ और है।उनकी एक खास गजल है:-
मिलना है तो आ जीत ले मैदान में हमको
हम अपने कबीले से बगावत नहीं करते

तूफान से लड़ने का सलीका है जरूरी
हम डूबने वालों की हिमायत नहीं करते।
पलकों पे सितारे है न शबनम न जुगनू
इस तरह तो दुश्मन को भी रुखशत नहीं करते।
पढ़ने के दरमियान नोकझोंक ,हाजिरजवाबी का मुजाहिरा करते रहने का उनका खास अंदाज है।एक बार जब वो पढ़ रहीं थीं तो तालियां कुछ कम बज रहीं थीं। संचालक मेराज फैजाबादी बोले- मैं पिछले वर्षों में देखता था कि आप लोग एकाध गजल में देखने का काम खतम करके सुनने का काम शुरू कर देते थे। इस बार मैं देख रहा हूं कि अभी आप पहले ही काम से फारिग नहीं हो पाये हैं।
नसीम निकहत भी बोलीं -हजरात ऐसा लग रहा है कि आप लोग कुछ ज्यादा थके हुये हैं। मैं पिछली तीन रातों से लगातार जग रहा हूं आज भी सो नहीं पायीं। लेकिन जैसा मेराज साहब ने कहा आप लोग देख ज्यादा रहे हैं सुन कम रहें हैं। इधर देख रहे हैं उधर देख रहे हैं न जाने किधर देख रहे हैं क्या देख रहे हैं।
मेराज साहब बोले ये वजाहत भी कर दीजिये कि आप तीन रातों से मुसलसल तीन रातों से मुशायरों में जग रहीं हैं वर्ना लोग न जाने क्या समझेंगे।
नसीम निकहत फिर इठलाती हुई बोलीं-इतने थके हुये लोग हमें अच्छे नहीं लगते।
मंच पर अध्यक्षता कर रहे कवि दादा राजबहादुर ‘विकल’ बोले ये शाहजहांपुर के श्रोता हैं ,थके हैं नहीं सिर्फ मालूम पड़ रहे हैं।
नसीम निकहत ने एक और गज़ल पेश की थी:-
इतना पास आके फिर ये झिझकना कैसा
साथ निकले हैं तो फिर राह में थकना कैसा?

मेरे आंगन को भी खुशबू का कोई झोंका दे
सूने जंगल में ये फूलों का महकना कैसा?
रौशनी दी है तो सूरज की तरह दे मुझको
जुगनुओं की तरह थोड़ा सा चमकना कैसा?
मेरी पलकें मेरा आंचल मेरा तकिया छू लो
आंसुओं इस तरह आंखो में खटकना कैसा
?
कुछ कवि अपनी कविताओं के कारण जितने पसंद किये जाते हैं ,उनका अंदाजे बयां भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। परसाई जी ने अपने संस्मरणों में लिखा है -
जब देश नवनिर्माण में जुटा था तब कुछ कवि पश्चिम से आयातित दुख की मरघटी कवितायें लिख रहे थे। अपनी मरणधर्मा कवितायें जमाने के लिये मैंने कवियों को घंटों आइने के सामने बाल बिगाड़ते ,अपने को लुटा-पिटा बनाते देखा है।वे निराशा की मार्केटिंग कर रहे थे।
परसाई जी ने शिवमंगल सिंह के बारे में लिखा है:- “शिवमंगल सिंह’सुमन’ कविता पढ़ते समय अपनी आंखे नचाते हुये पूरे शरीर का उपयोग करते हुये कविता पढ़ते थे। एक बार कवि गोष्ठी के पहले सुमन जी बोले -मैं कविता पढ़ नहीं पाऊँगा मेरी आंख में तकलीफ है। मैं बोला(परसाई जी) आप कविता पढ़ देना ,आंखें मैं मटका दूंगा।”
समय के साथ कवि सम्मेलनों में सुधी श्रोता कम होते गये हैं। कवि भी चुटकुले सुनाकर श्रोताओं का सस्ता मनोरंजन करके तालियां बटोरने लगे हैं। ज्यादातर चुटकुले स्त्रीपुरुष संबंधों तथा राजनीति से संबंधित होते हैं। तात्कालिकता जिसका मुख्य मुद्दा होता है। कवि श्रोता को सर्वोपरि मानकर उसका मनोरंजन करना अपना धर्म मानने लगा है।
इन सबसे अलग गीतऋषि के रूप में जाने जाने वाले स्व.रमानाथ अवस्थी जी डूबकर कविता पढ़ते थे। लगता है कि पूजा कर रहे हों। जब उन्होंने मंच यात्रा शुरू की थी तो उनके रागात्मकत गीतों की धूम थी:-
सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात ।
बाद के दिनों में रमानाथजी सूफियों वाले अंदाज में पढ़ते थे:-
आज आप हैं हम हैं लेकिन
कल कहां होंगे कह नहीं सकते
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
वे किसी से तालियों की अपेक्षा नहीं करते थे।शाहजहांपुर के कवि सम्मेलन की याद है मुझे जिसमें वे कह रहे थे -‘आप अपने हाथों को बिल्कुल कष्ट न दें। गले पर बिल्कुल जोर न डालें। आप सिर्फ सुनें। कविता से जुड़ेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा।’
वहां उन्होंने पढ़ा था:-
वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गयी तरल बनिये
जिसको पीने से कृष्ण मिलता है
आप मीरा का वह गरल बनिये।
लेकिन कुछ कवि होते हैं जो श्रोताओं को अधिकार पूर्वक डांट भी देते हैं। श्रोता भी कवि की हनक के अनुसार व्यवहार करते हैं।
लोग बताते हैं कि एक बार निराला जी कहीं कविता पढ़ रहे थे । बीच में बिजली चली गयी। माइक की आवाज बंद। लेकिन निराला जी बिना रुके अपनी कविता राम की शक्तिपूजा पढ़ते रहे। जनता भी मौन होकर सुनती रही। निराला जी अपनी अपनी कविता पूरी सुनाई। आज की बात होती लोग हल्ला मचाने लगते । कवि बैठ जाता।
ऐसा ही एक वाकया शाहजहांपुर में हुआ। स्व.वली असी ने शेर पढ़ने शुरू किये। एकदम सफेद बाल, सूफियाने अंदाज वाले वली असी बेहद आकर्षक लगते थे। किसी मनचले सुनने वाले ने कुछ बेहूदगी कर दी।कुछ बोला जो कि साफ सुनाई नहीं पड़ा लेकिन यह लग रहा था कि हूटिंग जैसा कुछ है। वली असी तो कुछ नहीं बोले लेकिन मंच पर बैठे नंदनजी को बुरा लगा। वे लगभग झपटकर माइक पर आये। डांटकर बोले ये किसने बद्तमीजी की? कौन बोला? वहां सन्नाटा था। फिर वो बोले जब वली असी जैसा शायर पढ़ रहा हो तो ये आपका भी इम्तहान होता है कि आप कितना जुड़ पाते हैं उससे। मुशायरे में आये हैं तो सुनने की तमीज भी साथ में होनी चाहिये:-
कश्ती का जिम्मेदार फक़त नाखुदा(मल्लाह) नहीं,
कश्ती में बैठने का सलीका भी होना चाहिये।
वैसे मुझे लगता है कि किसी भी सामूहिक आयोजन की सफलता में यह सलीके वाली बात लागू होती है चाहे कवि सम्मेलन हो मुशायरा हो या फिर ईकविता या निरंतर का प्रकाशन।
वसीम बरेलवी जब शेर पढ़ना शुरू करते हैं तो शुरूआत नये शेरों से करते हैं। वे बरेली से आते थे। शाहजहांपुर के श्रोताओं से उनका अनौपचारिक संबंध है। उनके कुछ पसंदीदा शेर जो मुझे याद आ रहे हैं:-
मुहब्बत में बुरी नजर से कुछ भी सोचा नहीं जाता
कहा जाता है उसे बेबफा,बेबफा समझा नहीं जाता।

थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीका मंद शाखों का लचक जाना जरूरी है।
कुछ शेर पढ़ने के बाद फिर वे तरन्नुम में पढ़ना शुरू करते हैं। जब पहली बार वो पढ़ने आये तो कुछ शेर पढ़ने के बाद बोले-मिसरा उठाओ यार!
हम समझे कि हमारे आयोजक साथी अरविंद मिश्र कहीं गिर गये हैं जिनको उठाने के लिये वसीम साहब कह रहे हैं। लेकिन जब देखा कि मिसिरजी तो हमारे साथ बैठे तालियां पीट रहे हैं तो समझ में आया कि शायर दाद मांग रहा है। मिसरा उठाने के लिये कह रहा है मतलब शायर ‘वाह-वाह’ मांग रहा है।
मिसरा उठाने का मतलब है कि मिसरा/शेर को दोहराया जाय। वाह-वाह क्या बात है,जरा फिर से पढ़ दीजिये,मजा़ आ गया जैसे जुमले उछालना होता है।
मेरी पसंद में इस बार अनूप भार्गव की गज़ल दे रहा हूं।यह गज़ल २३ अप्रैल को न्यूयार्क में होने वाले कवि सम्मेलन की परिचय पुस्तिका में शामिल है। कवि सम्मेलन में शानदार सफलता की शुभकामनाओं के साथ!
आप भी क्या गजब हैं। इतना पढ़ने के बाद भी चुप हैं। कवि क्या सोचेगा?
मिस़रा उठाओ यार!
मेरी पसंद
परिधि के उस पार देखो
इक नया विस्तार देखो ।
तूलिकायें हाथ में हैं
चित्र का आकार देखो ।
रूढियां, सीमा नहीं हैं
इक नया संसार देखो
यूं न थक के हार मानो
जिन्दगी उपहार देखो ।
उंगलियाँ जब भी उठाओ
स्वयं का व्यवहार देखो
मंजिलें जब खोखली हों
तुम नया आधार देखो ।
हाँ, मुझे पूरा यकीं है
स्वप्न को साकार देखो ।
-अनूप भार्गव

13 responses to “मिस़रा उठाओ यार…”

  1. प्रत्यक्षा
    अच्छी रही. इरशाद ,इरशाद
    और ये कामना करते हुये कि कवि सम्मेलन में अनूप जी को ढेर सारी तालियाँ मिले
  2. sanjay | joglikhi
    अनुप भार्गवजी कि कविता के लिए मिसरा उठाता हुं. वाह.. वाह..! लेख पढकर मजा आया. हमारे यहां सालमें एक बार ही कवि सम्मेलन का आयोजन होता हैं, तब हास्य रचनाएं सुनने को मिल जाती हैं बस. बाकि समय इस प्रकार के लेख पढ कर ही संतोष कर लेते हैं.
  3. विजय वडनेरे
    वाह!! वाह!!
    गजल तो कुछ खास समझ नहीं आई, कही कहीं तो छत के भी उपर से गई, पर लेख बडा अच्छा लगा.
    आप यूँ ही लिखते रहो, हम यूँ ही मिसरा उठाते रहेंगे.
  4. जीतू
    मिसरा क्या, हम तो शुकुल को भी उठाने को तैयार है, पहले गिरो तो सही।
    अमां शुकुल ये धीर गम्भीर लेख लिखते समय तुम खाते क्या हो ये बताओ। लेख तो बहुत अच्छा लिखा है, कंही कंही बाउन्सर भी है, हैलमेट का इन्तजाम करके ही लेख को पढा जाए। बकिया चकाचक!
    ये बताया जाए, ठलुवा आजकल कहाँ पाए जाते है, पिछले ठिकाने पर चहकना बन्द कर दिया है उन्होने, आजकल मौनव्रत धारण कर रखे है, दिख्खॆ है, जरा खोजक यंत्र से पता तो करना।
  5. eswami
    मिसरा मतलब पंक्ती. गुलज़ार के मिर्जा गालिब सीरीयल में पहली बार यह वाक्य सुना था “जनाब मिसरा तो उठाईये”!
    सीन था की गालिब की फ़ारसी/उर्दू शायरी उनके पहले मुशायरे मे जनता के सिर पर से जा रही है सब एक दूसरे का मूह देख रहे हैं की बन्दा कह क्या रहा है. गालिब कहते हैं “जनाब मिसरा तो उठाईये” उनके एक समकालीन कवि जवाब देते हैं “बहुत भारी है” “उठ नही रहा” .. फ़िर बाद मे गालिब जरा जनता को पल्ले पडे ऐसे शेर कहते हैं.
    लेख शानदार है!
  6. Manoshi
    वाह अनूप जी, पूरा लेख बिना skip किये पढा। बहुत अच्छा लिखा है आपने। अनूप भार्गव जी को भी बधाई। इस कवि-सम्मेलन में गुलज़ार साहब भी भाग ले रहे हैं। गुलज़ार सहब के साथ एक ही मंच पर कविता पढना सचमुच बहुत सम्मान की बात है।
  7. ratna
    socha na tha ki koi hum se misra udhwayga, unh dhkiya ke sere aam tareef hathiayga ; per parha jo lekhen aapka to juban phisal gai,sambhlay na they ki moun se ‘wah-wah’ nikal gai.
    सोचा न था कि कोई हमसे मिस़रा उठवायेगा,
    उँह धकियाके सरे आम तारीफ़ हथियायेगा,
    पर पढ़ा जो लेखन आपका तो जुबां फिसल गई,
    संभले न थे कि मौन से ‘वाह-वाह’ निकल गई।
  8. समीर लाल
    गज़ब कर डाला, इस लेखनी की विधा की गली से भी निकल जाऊँ, तो बहुत…क्या लिखते हो, अनूप भाई….अनूप भार्गव जी को ढेरों शुभकामनायें मंच लुटने के लिये…अब मान भी जाओ भईये, कुछ उधार दे दो, बिना लाल हुये.:)
    समीर लाल
  9. फ़ुरसतिया » कुछ इधर भी यार देखो
    [...] समीर लाल on मिस़रा उठाओ यार…world from my eyes – दुनिया मेरी नज़र से!! » हम हैं इस पल यहाँ ….. on छत पर कुछ चहलकदमीworld from my eyes – दुनिया मेरी नज़र से!! on छत पर कुछ चहलकदमीratna on मिस़रा उठाओ यार…Manoshi on मिस़रा उठाओ यार… [...]
  10. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] धर्म का महत्व 4.वीर रस में प्रेम पचीसी 5.मिस़रा उठाओ यार… 6.कुछ इधर भी यार देखो 7.भैंस बियानी गढ़ [...]
  11. सतीश पंचम
    गजब की पोस्ट है, एकदम राप्चिक :-)
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..इंतजार वाला दर्शन……..दर्शन वाला इंतजार
  12. Anonymous
    वसीम बरेलवी साहब का लाख टेक का शेर है -”थके हारे परिंदे … ” बरसों बाद अच्छा शेर पढ़कर सुकून मिला . शुक्रिया .
  13. Ankur Jain
    ati sundar

Friday, April 14, 2006

वीर रस में प्रेम पचीसी

http://web.archive.org/web/20140420024801/http://hindini.com/fursatiya/archives/122

वीर रस में प्रेम पचीसी

हमारे पिछली पोस्ट पर समीरजी ने टिप्पणी की :-
मजाक का लहज़ा, और इतनी गहराई के साथ अभिव्यक्ति, मान गये आपकी लेखनी का लोहा, कुछ तो उधार दे दो, अनूप भाई, ब्याज चाहे जो ले लो.
सच में हम पढ़कर बहुत शरमाये। लाल से हो गये। सच्चाई तो यह है कि हर लेख को पोस्ट करने के पहले तथा बाद तमाम कमियां नज़र आतीं हैं। लेकिन पोस्ट करने की हड़बड़ी तथा बाद में आलस्य के चलते किसी सुधार की कोई संभावना नहीं बन पाती।
अपनी हर पोस्ट लिखने के पहले (डर के मारे प्रार्थना करते हुये)मैं नंदनजी का शेर दोहराता हूं:-
मैं कोई बात तो कह लूं कभी करीने से
खुदारा मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।

जबसे रविरतलामीजी ने बताया कि हम सब लोग कूडा़ परोसते हैं तबसे यह डर ‘अउर’ बढ़ गया। हालांकि रविजी ने पिछली पोस्ट की एक लाइन की तारीफ की थी लेकिन वह हमारी नहीं थी लिहाजा हम उनकी तारीफ के गुनहगार नहीं हुये।
बहुत दिनों से ई-कविता तथा ब्लागजगत में कविता की खेती देखकर हमारे मन में भी कुछ कविता की फसलें कुलबुला रहीं थीं। यह सोचा भी था कि हिंदी ब्लाग जगत तथा ई-कविता की भावभूमि,विषय-वस्तु पर कुछ लेख लिखा जाय ।सोचा तो यह भी था कि ब्लागरों की मन:स्थिति का जायजा लिया जाय कि कौन सी ऐसी स्थितियां हैं कि ब्लागजगत में विद्रोह का परचम लहराने वाले साथी
यूँ तो सीधा खडा हुआ हूँ,
पर भीतर से डरा हुआ हूँ.

तुमको क्या बतलाऊँ यारो,
जिन्दा हूँ, पर मरा हुआ हूँ.

जैसी, निराशावादी मूड की, कवितायें लिख रहे हैं।
लेकिन फिर यह सोचकर कि शायद इतनी काबिलियत तथा कूवत नहीं है मुझमे मैंने अपने पांव वापस खींच लिये क्रीज में। यह भी सोचा कि किसी के विद्रोही तेवर का जायजा लेने का हमें क्या अधिकार है!
इसके अलावा दो लोगों की नकल करने का मुझे मन किया। एक तो लक्ष्मी गुप्त जी की कविता पढ़कर आल्हा लिखने का मन किया । दूसरे समीरलाल जी की कुंडलिया पढ़कर कुछ कुंडलियों पर हाथ साफ करने का मन किया।
बहरहाल,आज सोचा कि पहले पहली चीज पर ही हाथ साफ किया जाय। सो आल्हा छंद की ऐसी तैसी कर रहा हूं। बात लक्ष्मीजी के बहाने कह रहा हूं क्योंकि इस खुराफात की जड़ में उनका ही हाथ है। इसके अलावा बाकी सब काल्पनिक तथा मौजार्थ है। कुछ लगे तो लिखियेगा जरूर।
सुमिरन करके लक्ष्मीजी को सब मित्रन का ध्यान लगाय,
लिखौं कहानी प्रेम युद्ध की यारों पढ़ियो आंख दबाय।
पढ़िकै रगड़ा लक्ष्मीजी का भौजी गयीं सनाका खाय,
आंक तरेरी,मुंह बिचकाया नैनन लीन्ह कटारी काढ़।
इकतिस बरस लौं चूल्हा फूंका कबहूं देखा न दिन रात
जो-जो मागेव वहै खवाया तिस पर ऐसन भीतरघात।
हम तौ तरसेन तारीफन का मुंह ते बोल सुना ना कान
उनकी मठरी,पान,चाय का इतना विकट करेव गुनगान।
तुमहि पियारी उनकी मठरी उनका तुम्हें रचा है पान
हमरा चोला बहुत दुखी है सुन तो सैंया कान लगाय।
करैं बहाना लक्ष्मी भैया, भौजी एक दिहिन न कान,
उइ तौ हमरे परम मित्र हैं यहिते उनका किया बखान।
नमक हमैं उइ रहैं खवाइन यहिते भवा तारीफाचार
वर्ना तुम सम को बनवइया, तुम सम कउन इहां हुशियार।
सुनि हुशियारी अपने अंदर भौजी बोली फिर इठलाय,
हमतौ बोलिबे तबही तुमते जब तुम लिखौ प्रेम का भाव।
भइया अइठें वाहवाही में अपना सीना लिया फुलाय
लिखबे अइसा प्रेमकांड हम सबकी हवा, हवा हुइ जाय।
भौजी हंसिके मौज लिहिन तब अइसा हमें लगत न भाय,
तुम बस ताकत हौ चातक सा तुमते और किया न जाय।
भैया गर्जे ,क्या कहती हो ‘इलू ‘अस्त्र हम देब चलाय,
भौजी हंसी, कहते क्या हो,तुरत नमूना देव दिखाय।
बातन बातन बतझड़ हुइगै औ बातन मां बाढ़ि गय रार
बहुतै बातैं तुम मारत हो कहिके आज दिखाओ प्यार।
उचकि के बैठे लैपटाप पर बत्ती सारी लिहिन बुझाय,
मैसेंजर पर ‘बिजी’ लगाया,आंखिन ऐनक लीन लगाय।
सुमिरन करके मातु शारदे ,पानी भौजी से मंगवाय
खटखट-खटखट टीपन लागे उनसे कहूं रुका ना जाय।
सब कुछ हमका नहीं दिखाइन बहुतै थ्वारा दीन्ह दिखाय,
जो हम देखा आपहु द्याखौ अपनी आप बतावौ राय।
बड़े-बड़े मजनू हमने देखे,देखे बड़े-बड़े फरहाद
लैला देखीं लाखों हमने कइयों शीरी की है याद।
याद हमें है प्रेमयुद्ध की सुनलो भइया कान लगाय,
बात रसीली कुछ कहते हैं,जोगी-साधू सब भग जांय।
आंख मूंद कर हमने देखा कितना मचा हुआ घमसान
प्रेमयुद्ध में कितने खपिगे,कितनेन के निकल गये थे प्रान।
भवा मुकाबिला जब प्रेमिन का वर्णन कछू किया ना जाय,
फिर भी कोशिश हम करते हैं, मातु शारदे होव सहाय।
चुंबन के संग चुंबन भिरिगे औ नैनन ते नयन के तीर
सांसैं जूझी सांसन के संग चलने लगे अनंग के तीर।
नयन नदी में नयना डूबे,दिल सागर में उठिगा ज्वार
बररस की तब चली सिरोही,घायल का सुख कहा न जाय।
तारीफन के गोला छूटैं, झूठ की बमबारी दई कराय
न कोऊ हारा न कोऊ जीता,दोनों सीना रहे फुलाय।
इनकी बातैं इनपै छ्वाड़व अब कमरौ का सुनौ हवाल,
कोना-कोना चहकन लागा,सबके हाल भये बेहाल।
सर-सर,सर-सर पंखा चलता परदा फहर-फहर फहराय,
चदरा गुंथिगे चदरन के संग,तकिया तकियन का लिहिन दबाय।
चुरमुर, चुरमुर खटिया ब्वालै मच्छर ब्लागरन अस भन्नाय
दिव्य कहानी दिव्य प्रेम की जो कोई सुनै इसे तर जाय ।
आंक मूंद कै कान बंद कइ द्‌याखब सारा कारोबार
जहां पसीना गिरिहै इनका तंह दै देब रक्त की धार।
सुनिकै भनभन मच्छरजी की चूहन के भी लगि गय आग
तुरतै चुहियन का बुलवाइन अउर कबड्डी ख्यालन लाग।
किट-किट दांत बजि रहे ,पूछैं झण्डा अस फहराय
म्वाछैं फरकैं जीतू जैसी ,बदन पसीना रहे बहाय।
दबा-दबउल भीषण हुइगै फिर तौ हाल कहा न जाय,
गैस का गोला बम अस फूटा,खटमल गिरे तुरत गस खाय।
तब बजा नगाड़ा प्रेमयुद्ध का चारों ओर भवा गुलज़ार
खुशियां जीतीं धकापेल तब,मनहूसन की हुइगै हार।
हरा-हरा सब मौसम हुइगा,फिर तौ सबके लगिगै आग
अंग-अंग फरकैं,सब रंग बरसैं,लगे विधातौ ख्यालन फाग।
इहां की बातैं हियनै छ्वाड़व आगे लिखब मुनासिब नाय
बच्चा जो कोऊ पढ़ि ल्याहै तो हमका तुरत लेहै दौराय।
भैया बोले हंसि के ब्वालौ कैसा लिखा प्यार का हाल
अब तौ मानेव हमहूं है सरस्वती के सच्चे लाल।
भौजी बोलीं तुमसा बौढ़म हमें दिखा ना दूजा भाय,
हमतौ सोचा ‘इलू’ कहोगे ,आजौ तरस गये ये कान।
चलौ सुनावौ अब कुछ दुसरा, देवरन का भी कहौ हवाल
कइसे लफड़ा करत हैं लरिका नयी उमर का का है हाल?
भैया बोले मुस्का के तब नयी उमर की अजबै चाल
बीच सड़क पर कन्या डांटति छत पर कान करति है लाल।
डांटि-डांटि के सुनै पहाडा़, मुर्गौ कबहूं देय बनाय
सिर झटकावै,मुंह बिचकावै, कबहूं तनिक देय मुस्काय।
बाल हिलावै,ऐंठ दिखावै , नखरा ढेर देय बिखराय,
छत पर आवै ,मुंहौ फुलावै लेय मनौना सब करवाय।
इतनेव पर बस करै इशारा, इनका गूंगा देय बनाय
दिल धड़कावै,हवा सरकावै ,पैंटौ ढीली देय कराय।
कुछ दिन मौका देकर देखा ,प्रेमी पूरा बौड़म आय,
पकड़ के पहुंची रतलामै तब,अपना घर भी लिया बसाय।
भउजी की मुसकान देखि के भइया के भी बढ़ि गै भाव
बूढ़े देवर को छोडो़ अब सुन लो क्वारन के भी हाल।
ये है तुम्हरे बबुआ देवर चिरक्वारें और चिर बेताब
बने हिमालय से ठहरे हैं ,कन्या इनके लिये दोआब।
दूर भागतीं इनसे जाती ,लिये सागर से मिलने की ताब
जो टकराती सहम भागती ,जैसे बोझिल कोई किताब।
नखरे किसके चाहें उठाना ,वो धरता सैंडिल की नोक
जो मिलने की रखे तमन्ना, उसे दूर ये देते फेंक।
ये हैं धरती के सच्चे प्रतिनिधि तंबू पोल पर लिया लगाय,
कन्या रखी विपरीत पोल पर, गड़बड़ गति हो न जाय।
सुनिके देवर की अल्हड़ता भौजी मंद-मंद मुस्कांय,
भैया समझे तुरत इशारा सबको कीन्हा फौरन बाय।

17 responses to “वीर रस में प्रेम पचीसी”

  1. ई-स्वामी
    बसंत में श्रिंगार रस बरस रहा है! ये सीधे हाल-ओफ़-फ़ेम लेवेल एन्ट्री है! अपन तो मस्त मस्त! माहौल एकदम सेट है … गौर किया जाए मैं कितना समझदार हूं जो साईट भर पे इस मौसम में फूल बिखराए हूं!(जरा अपनी पीठ भी थपथपा लूं ;-) )
  2. राजीव
    प्रिय अनूप जी,
    आप के द्वारा posted (स्वरचित मानते हुए) आल्हा शैली की काव्य रचना, प्रेम युद्ध बहुत ही मौलिक और चुलबुलाती हुयी लगी। कदाचित ऐसी रचना आल्हा की चिर-परिचित लय में सस्वर प्रकशित होती (स्वर-ब्लॉग / podcast के द्वारा) तो आनन्द और ही होता! और हां, एक बात और – एक क्षेत्र विशेष में अधिक प्रचलित होने के कारण, यदि कुछ पाठक आल्हा लोक-शैली के प्रस्तुतीकरण एवं लय से परिचित नहीं हैं तो वे इस रचना का समुचित रसास्वादन नहीं कर पायेंगे, तो अनूप जी, यदि सम्भव हो, तो इस रचना को MP3 प्रारुप में भी प्रकशित करें, धन्यवाद!
  3. समीर लाल
    “इहां की बातैं हियनै छ्वाड़व आगे लिखब मुनासिब नाय
    बच्चा जो कोऊ पढ़ि ल्याहै तो हमका तुरत लेहै दौराय।”
    अरे अनूप भाई, इतना जोर का झटका..लेकिन भाई, हम तो आल्हा के सुर मे गाते गाते हिचकोले खाते चले जा रहे थे..कि एकाएक स्टोरी मे टर्न… :)
    वाह, बहुत खुब. आन्नद विभोरित समीर लाल की अनूप भाई को बधाई.
  4. नितिन
    अनूपजी,
    बहुत ही सुंदर लिखा है, बचपन के वो दिन याद आ गये जब बुंदेलखंड में आल्हा
    सुनने को मिलता था। राजीव जी ने सही कहा है यदि इस रचना को स्वरबध्द कर सकें
    तो बात ही क्या!!
  5. रवि
    अंततः आपने सिद्ध कर ही दिया कि पोस्टें कूड़ा नहीं हुआ करतीं…
    क्या हीरे – मोती – माणिक्य बिखेरे हैं आपने!
    मैं अपनी वे कूड़ा टिप्पणियाँ आधिकारिक रुप से वापस लेता हूँ .
  6. sanjay | joglikhi
    चिट्ठा जगत के ‘कुङे-करकट’ में आपके इन मोतीयों का आल्हा लोक-शैली कि लय से अपरिचित होने के कारण समुचित रसास्वादन नहीं कर पाया, इस बात का खेद रहेगा. वैसे आपके उम्मदा प्रयास के लिए बधाई.
  7. समीर लाल
    अनूप भाई,
    शर्मा शर्मी मे देखत है कैसन लाली लिये हैं गाल
    फ़िर भी कौनो कसर ना छोडी सबको करे आप बेहाल
    हमरी मांग पढिके उस पर धरे तुरत ही अपने कान
    आगन कि कथा जोडिके लगभग पूरा किया बखान
    तुमको कैसे धन्नबाद दे इसहि सोच मे बीती शाम
    शायद इससे नेता सिखें कुछ तो दें जनता पर ध्यान
    तुरत ना माने मांगें फ़िर भी कभी तो धर दें उनपे कान.
    समीर लाल
  8. जीतू
    अमा शुकुल आल्हा का मजा पढने से ज्यादा सुनने मे आता है, इसलिए आधी तारीफ़ ही करुंगा, बकिया आडियो वर्जन सुनाओ तब करेंगे।
    वैसे अब तुम्हारे हाथ कविताओं मे भी काफ़ी खुल गये है, तुम तो फ़्री स्टाइल पहलवान की तरह हो गये हो, चाहे WWF मे लड़वा दो या चाहो तो गाँव के दंगल में। लगे रहो…टकाटक।
  9. आशीष
    चलो मै बच गया इस बार :-)
  10. फ़ुरसतिया » कुछ इधर भी यार देखो
    [...] बहरहाल ये तो ऐसे ही कुछ ऊँची हांकने के लालच में लिख दिया। अगर ठीक समझे हों तो मिस़रा उठाइये नहीं तो हियां की बातें हियनै छ्‌वाडौ़ अबआगे का सुनौ हवाल। [...]
  11. फ़ुरसतिया » भैंस बियानी गढ़ महुबे में
    [...] लक्ष्मी नारायण जी की नकल करते हुये हमने जब कुछ तुकबंदियां कीं तो पता चला कि कुछ साथी आल्हा से परिचित नहीं हैं। वास्तव में आल्हा उत्तरभारत के गांवों में बहुतायत में प्रचलित है। जिनका संपर्क गांवों से कम रह पाया वे शायद इसके बारे में कम जानते हों। साथियों की जानकारी के लिये आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखित ‘हिंदी साहित्य का इतिहास ‘से आल्हा से संबंधित जानकारी यहां दी जा रही है:- ऐसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहाँ जगनिक नाम के एक भाट थे,जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों -आल्हा और ऊदल(उदयसिंह)- के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया। जगनिक के काव्य का कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषाभाषी प्रांतों के गांव-गांव में सुनाई देते हैं। ये गीत ‘आल्हा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाये जाते हैं। गावों में जाकर देखिये तो मेघगर्जन के बीच किसी अल्हैत के ढोल के गंभीर घोष के साथ यह हुंकार सुनाई देगी- [...]
  12. anitakumar
    वाह पढ़ कर ही इतना अच्छा लगा तो सुनने में कितना अच्छा लगेगा हम इसकी कल्पना कर सकते हैं। जैसा आप ने सही कहा हम जैसे लोग जिनका उत्तर प्रदेश के गावों से कोई संबध नहीं रहा तो आल्हा के बारे में हमारी जानकारी काफ़ी कम है। इसे पोडकास्ट कर सुनाए तो कुछ ज्यादा आनंद आये। आल्हा से संबधित और जानकारी भी दें (पोडकास्ट के साथ) तो हम जैसे जो उत्तर प्रदेश को कुछ कम जानते है उनकी भी जानकारी बड़े। आशा करती हूँ कि समीर जी का कहा कि आप फ़ौरन मांग पूरी करते है वो सच ही साबित होगा…:)
  13. अभय तिवारी
    आप धन्य हैँ महाराज!
  14. कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता
    [...] वीर रस में प्रेम पचीसी हमारे पिछली पोस्ट पर समीरजी ने टिप्पणी की :- [...]
  15. Anonymous
    हरी गोविन्द विश्वकर्मा ग्राम व पोस्ट बील्हापुर घोरहा भादर
  16. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] क्या थी? 3.मेरे जीवन में धर्म का महत्व 4.वीर रस में प्रेम पचीसी 5.मिस़रा उठाओ यार… 6.कुछ इधर भी यार देखो

Wednesday, April 12, 2006

मेरे जीवन में धर्म का महत्व

http://web.archive.org/web/20110925231056/http://hindini.com/fursatiya/archives/121

मेरे जीवन में धर्म का महत्व

अनुगूंज-१८
हम अनुगूंज के लेख का मसौदा सोच रहे थे।हमसे पहले तमाम लोग लिख चुके हैं जो कि बकौल रविरतलामी कूड़ा ही होगा। हम संकोच में थे कि कूड़े में और क्या कूडा़ मिलाया जाय। लेकिन दिल है कि मानता नहीं।दिल के आगे संकोच ने हथियार डाल दिये। हमने सोचा कि कुछ लिख ही डाला जाय। विषय खोजा-मेरे जीवन में धर्म का महत्व.
हमने धर्म के बारे में किताबें खोजीं लेकिन पता चला  कि बकौल हरिवंशराय बच्चन सारे धर्मग्रंथ तो मधुशाला जला चुकी है। हमें बहुत गुस्सा आया मधुशाला पर।ये क्या मजाक है! धर्म न हो गया किसी भ्रष्टाचारी नेता का पुतला हो गया,जला दिया। अब तो मधुशाला के बारे में सुनी अफवाहें मुझे सच सच लगने लगीं कि यह लोगों के घर जला देती है।
हमने फिर सोचा कि क्या किसी किताब का ‘टोपो’ मारा जाय।कूडा़ ही फैलाना है तो दूसरे का काहे फैलाया जाय। अपना ही ‘कुटीर उद्योग’ खोला जाय। और ये लो,कच्चा माल जुगाड़ के हम जुट गये उत्पादन में।
पहले देखा जाय कि धर्म है क्या?

धर्म वह व्यवस्था होती है जिसका उदय तथा शुरूआती प्रसार अन्याय, गैरबराबरी, दुख तथा शोषण मिटाकर समानता , न्याय की स्थापना करना होता है लेकिन होता असल में यह है कि धर्म के जहां पंख निकल आते हैं वहीं से अन्यायी,शोषक तथा ताकतवर लोग धर्म पर कब्जा कर लेते हैं।धर्म के कल्याणकारी तत्वों को तलाक देकर अन्यायपूर्ण मानव विरोधी व्यवस्था से निकाह पढ़वा लेते हैं।
हर धर्म की शुरूआत मनुष्य के भले के लिये हुई। मनुष्य का दुख दूर करने के लिये हुई।लेकिन कालांतर में वही धर्म मनुष्य के दुख का कारण बन जाता है।फिर मनुष्य दूसरा धर्म खोजता है। फिर वही कहानी चलती रहती है।मुझे लगता है कि धर्म भी एक आइटम की तरह होता है। इसकी भी एक ‘सेल्फ लाइफ’ होती है।अगर समसामयिक चुनौतियों के अनुरूप धर्म में संसोधन होते रहते हैं तो धर्म की प्रासंगिकता बनी रहती है वर्ना धर्म की स्थिति बेरोजगार,अपाहिज बुजुर्ग की तरह हो जाती है ,अपने तक नजर चुराते हैं उससे।
हर धर्म कुछ विशेष परिस्थितियों में जन्म लेता है। स्थान,समय ,सामाजिक स्थिति के अनुसार कुछ व्यवस्थायें बनायी जाती हैं। स्थान,समय ,सामाजिक स्थिति बदलने पर संभव हो कि उतना गहरा प्रभाव न पड़े उसका। जो धर्म जितना अधिक लोगों की खुशी की व्यवस्था कर सकेगा उसका उतना ही अधिक प्रसार होगा।वह उतने ही अधिक दिनों तक प्रासंगिक रहेगा।
हर धर्म में मनुष्य के सुख,सन्तोष,प्रगति और आत्मा के उत्थान के तत्व होते हैं।दया,करुणा,न्याय,सदाचार आदि सब धर्म सिखाते हैं।कटुता,घृणा,द्वेष की शिक्षा कोई धर्म नहीं देता ।अहंकार का सब धर्म निषेध करते हैं।सारे धर्म दूसरे धर्मों का आदर करने की बात करते हैं। हर धर्म मूल रूप में आत्मा में सौन्दर्य,प्रेम,उदात्त भावनायें,कोमल संवेदनायें जगाता है।
लेकिन यह विडम्बना हर धर्म के साथ होती है कि उस पर शक्ति सम्पन्न वर्ग कब्जा कर लेता है-सामन्त, साम्राज्यवादी, व्यापारी, पूंजीपति । वे प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तनों को रोकते हैं। धर्म के जन-कल्याणकारी तत्वों को छोड़ देते हैं तथा अन्यायपूर्ण मानव-विरोधी व्यवस्था चलाते हैं।धर्म को दिखावा बना देते हैं:-

मुंह में राम बगल में छूरी,मिल गये राम पेल दिहिन पूरी।
जब धर्म अपने मूल तत्वों से विचलित होता है तब तमाम धर्म के तमाम ठेकेदार पैदा हो जाते हैं। हर एक के पास अपने धर्म की ‘सोलसेलिंग’ एजेंसी होती है।हर एजेंट  हाटलाइन से सीधे परमात्मा से जुड़ा होता है। इधर आप भुगतान करिये  , उधर आपकी बर्थ स्वर्ग में रिजर्व !
आजकल सबेरे हर टीवी चैनेल बाबा लोग धर्म के बारे में उपदेश देते मिल जाते हैं। ‘संसार निस्सार है’ कहने वाले बाबा लोग एअरकंडीशंड गाडियों के काफिले में विलासिता पूर्ण सुविधाओं के घेरे में घूमते हैं। गली-गली कौड़ी के तीन स्वयंभू  भगवान टकराते रहते हैं।
 पिछले माह उत्तरप्रदेश में तीन स्वयंभू भगवान,जो राजकीय सेवाओं में थे, निलंबित हुये हैं ।उ.प्र. में ही  एक पचास की उमर के स्वयंभू भगवान जिनके भक्तों ,सेवकों तथा सुरक्षागार्डों व ड्राइवरों में ज्यादातर जवान माहिलायें ही शामिल थीं को भगवान विरोधियों ने गोलियों से छलनी कर दिया।
कहने का मतलब यह कि आजकल भगवान होना बहुत आसान हो गया। थोड़ी सी गुंडई,थोड़ी सी धूर्तता,थोड़ी से कलाकारी तथा थोड़ा सा वाग्जाल बस हो गया कमाल। इतनी कम लागत में भगवान बनना सुलभ हो जाने के कारण ही भगवानों की संख्या बढ़ती जा रही है।आप कहेंगे कि  ऐसे भगवानों से तो साधारण इंसान बेहतर लेकिन यह तो और लोग भी कहते हैं:-
फरिश्ते से बेहतर है इंसान होना,
लेकिन उसमें लगती है मेहनत जियादा।

इस तरह की लफ्फाजी का कोई अंत नहीं हैं । बात अपने बारे में करना भी जरूरी है। तो भइये, अव्वल तो हमारा न तो ऐसा कोई धार्मिक एजेंडा है न ही कोई झंडा जिसे मैं डंडे में लगाकर फहरा सकूं।हर धर्म के मूल में जो बाते मैं हैं वे अनुकरणीय  हैं। उनके प्राणतत्व का अनुकरण ही सच्चा धर्म है।
यहां पर धूमिल की कविता ‘मोचीराम’ के अंश देने का मन कर रहा है:-
जिंदा रहने के पीछे
अगर सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेचकर
या रंडियों की दलाली करके
रोजी कमाने में
कोई फर्क नहीं है।

कोई भी धर्म रिन साबुन की टिकिया नहीं है जिसकी चमकार दूसरे धर्म के मुकाबले ज्यादा हो। जो धर्म मानव जीवन को बेहतर बनाने में सहायक हो सके,मानवमन को उदात्त बना सके,परदुखकातर बना सके वही धर्म अनुकरणीय होगा।
वही शायद मेरा भी धर्म होगा।
मेरी पसंद
लोग तुम्हारे पास लेकर आते हैं प्रार्थना
मैं तुम्हारे दरबार में एतराज़ लेकर आ रहा हूं।
और उसी एतराज़ में
अपनी अर्जी लगा रहा हूं।
क्षमा करना दया सागर
वैसे तो यहां सभी कुछ चलता है
लेकिन तुम्हारा समदर्शी होना
अब मुझे बहुत खलता है।
पता नहीं तुम्हें कैसा लगता है
जब पीड़ित और पीड़क
दोनों एक साथ
तुम्हारे पास आते हैं
और याचना भरी निगाहों से
तुम्हारे लिये गुहार मचाते हैं
तब फिर बोलो कृपानिधान,
उन दोनों को तुम कितना पहचानते हो?
तुम्हीं बताओ ,
जिस मां की बेती की अस्मत
किसी दरिंदे की हवस का शिकार हुई हो
वह अपनी दरकती हुई छाती में
तुम्हारे न्याय का विश्वास टिकाए
तुमसे  न्याय मांगे
और तुम्हारी उसी अदालत में
वही दरिंदा
चढ़ावे का थाल लिये
खड़ा हो सबसे आगे।
तब भी तुम कैसे रह लेते हो शांत
कैसे सह लेती है तुम्हारी निगाह
दोनों को एक साथ?
बोलो दीनानाथ ,
ऐसा समदृष्टा होना
न्याय के कौन से मानक बनायेगा?
मैं पूछता हूं
तुम्हारा चक्र-सुदर्शन
धनुष-बाण
तीर-तलवार
आखिर किस दिन काम आयेगा?
क्या यह जरूरी नहीं
कि अब अन्याय के खिलाफ
तुम बेहिचक सामने आओ
और मजलूम को उसकी यातना से
छुटकारा दिलाओ?
कम से कम इतना तो मानो
कि जालिम को मज़लूम के समकक्ष रखकर
देखना गुनाह है,
प्रभुवर,आपकी दृष्टि का
यह कौन सा प्रवाह है,
जो तुम्हारी अपनी ही कथाओं को
झूठा ठहराता है,
अन्याय के खिलाफ लड़ने की
तुम्हारी प्रतिष्ठा में दाग लगाता है?
ऐसा तो नहीं
कि हमारे जमाने के अन्याय से टकराना
तुम्हें भी पड़ने लगा हो भारी?
तब फिर मेरी प्रार्थना है
कि मुझे भी ले लो साथ
और फिर करो तैयारी।
समदर्शी बहुत रह लिये
अब प्रत्यक्षदर्शी हो जाओ
देखो, कि यहां जल को जल
और रेत को रेत बताने वाले
किस तरह मार खाते हैं!
निरी रेत,जल बनकर
उन्हें कैसे छलती है
और वे बेचारे उसी मगजल से
देखते-देखते कैसे हार जाते हैं।
मुझे ले चलोगे साथ
तो जिन जिन अंधेरों से होकर गुजरा हूं
वहां वहां तुम्हें भी ले जाऊंगा
अदना ही सही ,लेकिन इस तरह
कुछ तो तुम्हारे काम आऊंगा।
छोड़ो समदृष्टि का चक्कर मेरे करतार,
होने दो दूध का दूध
और पानी का पानी
ज़रूरी है कि अब थोड़ी बहुत बदले
तुम्हारी भी कहानी।
उठाओ चक्र सुदर्शन,धनुष-बाण
कुठार-तीर-तलवार
हो सके तो सब एक साथ
ताकि मज़लूम
खुले मन इस दुनिया में रह सके
 और तुम सचमुच
न्याय के साथ हो,
यह बात वह पूरे विश्वास के साथ कह सके।
-कन्हैयालाल नंदन

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

12 responses to “मेरे जीवन में धर्म का महत्व”

  1. Tarun
    तो आपने भी जबरिया लिख ही दिया, धर्म और धार्मिक होना वैसा ही है जैसा ‘बद अच्‍छा बदनाम बुरा’।
  2. समीर लाल
    मजाक का लहज़ा, और इतनी गहराई के साथ अभिव्यक्ति, मान गये आपकी लेखनी का लोहा, कुछ तो उधार दे दो, अनूप भाई, ब्याज चाहे जो ले लो.
    शुभेक्षु
    समीर लाल
  3. अभिनव
    ‘जो धर्म मानव जीवन को बेहतर बनाने में सहायक हो सके,मानवमन को उदात्त बना सके,परदुखकातर बना सके वही धर्म अनुकरणीय होगा।’ बढ़िया बात कही आपने। नंदन जी की कविता पढ़कर आनंद आया।
  4. रवि
    बहुत अच्छे!
    वैसे , अब मैं प्रमाणपत्र देता हूँ कि यह लाइन कूड़ा नहीं है, बल्कि हीरे की कनी है – चमक बिखेरती हुई-
    फरिश्ते से बेहतर है इंसान होना,
    लेकिन उसमें लगती है मेहनत जियादा।
    आइए, हम सभी थोड़ी मेहनत कर लें :)
  5. sanjay | joglikhi
    इस युग के भगवानों पर लिखने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे. समझ में नहीं आ रहा था क्यो लिखुं, कैसे लिखुं. लेकिन आपने तो एकदम सरल भाषा में सहजता से आधुनिक भगवानों को निपटा दिया. बहुत खुब.
  6. विजय वडनेरे
    बहुत अच्छा लिखे हैं आप.
    दरअसल यही सब देखते हैं आजकल आप और हमसब. चिढ भी होती है, गुस्सा भी आता है. मगर, कुछ ना कर सकने की मजबूरी सी रहती है.
    बिलकुल सच बात है:
    गली-गली कौड़ी के तीन स्वयंभू भगवान टकराते रहते हैं।
    यही दास्तां बयां करता हुआ एक शेर अर्ज है:
    हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ,
    सामने जिनके ‘वो’ सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं!
    शुभकामनायें.
  7. फ़ुरसतिया » वीर रस में प्रेम पचीसी
    [...] विजय वडनेरे on मेरे जीवन में धर्म का महत्व sanjay | joglikhi on मेरे जीवन में धर्म का महत्व रवि on मेरे जीवन में धर्म का महत्व अभिनव on मेरे जीवन में धर्म का महत्व समीर लाल on मेरे जीवन में धर्म का महत्व [...]
  8. जोगलिखी » चिट्ठाकारों द्वारा लगभग 18,000 शब्द लिखे गये
    [...] अनुगूंज 18 के लिए इन्होने लिखा हैं : दुनियाँ मेरी नजर से (अमित) (30 मार्च) जोगलिखी (संजय बेंगाणी) दिनांक 1 अप्रैल दस्तक (सागर चन्द नाहर ) दिनांक 2 अप्रैल खाली-पीली (आशीष श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निठल्ला चिंतन (तरूण) दिनांक 4 अप्रैल छींटे और बौछारें (रविशंकर श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निनाद गाथा (अभिनव) दिनांक 5 अप्रैल मेरा पन्ना (जितेन्द्र चौधरी) दिनांक 5 अप्रैल बीच-बजार (परग कुमार मण्डले) दिनांक 5 अप्रैल उन्मुक्त (उन्मुक्त) दिनांक 9 अप्रैल झरोखा (शालिनी नारंग) दिनांक 10 अप्रैल उडन तश्तरी (समीरलाल) दिनांक 11 अप्रैल फ़ुरसतिया (अनूप शुक्ला) दिनांक 12 अप्रैल मन की बात (प्रेमलता पाण्डे) दिनांक 12 अप्रैल (ई-स्वामी) दिनांक 14 अप्रैल मेरा चिट्ठा (आशीष) दिनांक 14 अप्रैल इधर उधर की (रमण ) दिनांक 14 अप्रैल [...]
  9. चिट्ठाकारों द्वारा लगभग 18,000 शब्द लिखे गये at अक्षरग्राम
    [...] अनुगूंज 18 के लिए इन्होने लिखा हैं : दुनियाँ मेरी नजर से (अमित) (30 मार्च) जोगलिखी (संजय बेंगाणी) दिनांक 1 अप्रैल दस्तक (सागर चन्द नाहर ) दिनांक 2 अप्रैल खाली-पीली (आशीष श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निठल्ला चिंतन (तरूण) दिनांक 4 अप्रैल छींटे और बौछारें (रविशंकर श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निनाद गाथा (अभिनव) दिनांक 5 अप्रैल मेरा पन्ना (जितेन्द्र चौधरी) दिनांक 5 अप्रैल बीच-बजार (परग कुमार मण्डले) दिनांक 5 अप्रैल उन्मुक्त (उन्मुक्त) दिनांक 9 अप्रैल झरोखा (शालिनी नारंग) दिनांक 10 अप्रैल उडन तश्तरी (समीरलाल) दिनांक 11 अप्रैल फ़ुरसतिया (अनूप शुक्ला) दिनांक 12 अप्रैल मन की बात (प्रेमलता पाण्डे) दिनांक 12 अप्रैल (ई-स्वामी) दिनांक 14 अप्रैल मेरा चिट्ठा (आशीष) दिनांक 14 अप्रैल इधर उधर की (रमण ) दिनांक 14 अप्रैल [...]
  10. अवलोकन : अनुगूजँ 18- मेरे जीवन में धर्म का महत्व at अक्षरग्राम
    [...] धर्म के उदय और अंजाम को समझाना हो तो अनूप शुक्लाजी के पास फुरसत ही फुरसत हैं  “धर्म वह व्यवस्था होती है जिसका उदय तथा शुरूआती प्रसार अन्याय, गैरबराबरी, दुख तथा शोषण मिटाकर समानता , न्याय की स्थापना करना होता है। लेकिन यह विडम्बना हर धर्म के साथ होती है कि उस पर शक्ति सम्पन्न वर्ग कब्जा कर लेता है-सामन्त, साम्राज्यवादी, व्यापारी, पूंजीपति ।“ नतिजा आज कल हम सब देख रहें हैं ”गली-गली कौड़ी के तीन स्वयंभू  भगवान टकराते रहते हैं।“  ऐसे में इनके लिए तो “वही धर्म अनुकरणीय होगा जो धर्म मानव जीवन को बेहतर बनाने में सहायक हो सके,मानवमन को उदात्त बना सके,परदुखकातर बना सके”   [...]
  11. कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता
    [...] पिछली पोस्ट पर समीरजी ने टिप्पणी की [...]
  12. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] की आंख 2.जरूरत क्या थी? 3.मेरे जीवन में धर्म का महत्व 4.वीर रस में प्रेम पचीसी 5.मिस़रा उठाओ [...]