Sunday, January 28, 2007

पहिला सफेद बाल

[परसाईजी के लेखों की श्रंखला में आज पेश है उनका प्रसिद्ध व्यंग्य लेख- पहिला सफेद बाल। इस लेख में जो यौवन की परिभाषा परसाईजी ने बतायी है वह मुझे खासतौर पर आकर्षित करती है-यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम हैं,; यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है। और सबसे ऊपर, बेहिचक बेवकूफ़ी करने का नाम यौवन है। | यह लेख पढ़िये और देखिये आपमें कितना यौवन बचा है। कितना बेहिचक बेवकूफ़ी करने का माद्दा बचा है आपमें ]

पहिला सफेद बाल

हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई
आज पहिला सफ़ेद बाल दिखा। कान के पास काले बालों के बीच से झांकते इस पतले रजत-तार ने सहसा मन को झकझोर दिया।

ऎसा लगा जैसे बसन्त में वनश्री देखता घूम रहा हूं कि सहसा किसी झाड़ी से शेर निकल पड़े;या पुराने जमाने में किसी मजबूत माने जानेवाले किले की दीवार पर रात को बेफ़िक्र घूमते गरबीले किलेदार को बाहर से चढ़ते हुए शत्रु के सिपाही की कलगी दिख जाय;या किसी पार्क के कुंज में अपनी राधा को ह्रदय से लगाये प्रेमी को एकाएक राधा का बाप आता दिख जाय।

कालीन पर चलते हुए कांटा चुभने का दर्द बड़ा होता है। मैं अभी तक कालीन पर चल रहा था। रोज नरसीसस जैसी आत्म-रति से आईना देखता था, घुंघराले काले केशों को देखकर, सहलाकर, संवारकर, प्रसन्न होता था। उम्र को ठेलता जाता था, वार्द्धक्य को अंगूठा दिखाता था। पर आज कान में यह सफ़ेद बाल फ़ुस-फ़ुसा उठा, ‘भाई मेरे, एक बात ‘कानफ़िडेन्स’ में कहूं- अपनी दूकान समेटना अब शुरू कर दो!’



मरण को त्यौहार
माननेवाले ही म्रत्यु से सबसे अधिक भयभीत होते हैं। वे त्योहार का हल्ला करके अपने ह्रदय के सत्य भय को दबाते हैं।
तभी से दुखी हूं। ज्ञानी समझायेगें-जो अवश्यम्भावी है, उसके होने का क्या दु:ख? जी हां, मौत भी तो अवश्यम्भावी है। तो क्या जिन्दगी-भर मरघट में अपनी चिता रचते रहें? और ज्ञानी से कहीं हर दुख जीता गया? वे क्या कम ज्ञानी थे, जो मरणासन्न लक्ष्मण का सिर गोद में लेकर विलाप कर रहे थे- ‘मेरो सब पुरूषारथ थाको!’ स्थितप्रज्ञ दर्शन अर्जुन को समझानेवाले की आंख उद्धव से गोकुल की व्यथा-कथा सुनकर, डबडबा आयी थी। मरण को त्यौहारमाननेवाले ही म्रत्यु से सबसे अधिक भयभीत होते हैं। वे त्योहार का हल्ला करके अपने ह्रदय के सत्य भय को दबाते हैं।

मैं वास्तव में दुखी हूं। सिर पर सफ़ेद कफ़न बुना जा रहा है; आज पहिला तार डाला गया है। उम्र बुनती जायगी इसे और यह यौवन की लाश को ढंक लेगा। दु:ख नही होगा मुझे? दु:ख उन्हें नहीं होगा, जो बूढ़े ही जन्मे है।
मुझे गुस्सा है, इस आईने पर। वैसे तो यह बड़ा दयालु है, विक्रति को सुधार-कर चेहरा सुडौल बनाकर बताता रहा है। आज एकाएक यह कैसे क्रूर हो गया! क्या इस एक बाल को छिपा नहीं सकता था? इसे दिखाये बिना क्या उसकी ईमानदारी पर बड़ा कलंक लग जाता? उर्दू-कवियों ने ऎसे संवेदनशील आईनों का जिक्र किया है, जो माशूक के चेहरे में अपनी ही तस्वीर देखने लगते है, जो उस मुख के सामने आते ही गश खाकर गिर पड़ते है; जो उसे पूरी तरह प्रतिबिम्बित न कर सकने के कारण चटक जाते हैं। सौन्दर्य का सामना करना कोई खेल नहीं है। मूसा बेहोश हो गया था। ऎसे भले आईने होते हैं, उर्दू-कवियों के। और यह एक हिन्दी लेखक का आईना है।

मगर आईने का क्या दोष? बाल तो अपना सफ़ेद हुआ है। सिर पर धारण किया, शरीर का रस पिलाकर पाला, हजारों शीशियां तेल की उड़ेल दीं- और ये धोखा दे गये। संन्यासी शायद इसीलिए इनसे छुट्टी पा लेता है कि उस विरागी का साहस भी इनके सामने लड़खड़ा जाता है।

आज आत्मविश्वास उठा जाता है; साहस छूट रहा है। किले में आज पहिली सुरंग लगी है। दुश्मन को आते अब क्या देर लगेगी! क्या करूं? इसे उखाड़ फ़ेंकूं? लेकिन सुना है, यदि एक सफ़ेद बाल को उखाड़ दो, तो वहां एक गुच्छा सफ़ेद हो जाता है। रावण जैसा वरदानी होता, कमबख्त। मेरे चाचा ने एक नौकर सफ़ेद बाल उखाड़ने के लिए ही रखा था। पर थोड़े ही समय में उनके सिर पर कांस फ़ूल उठा था। एक तेल बड़ा ‘मनराखन ‘ हो गया है। कहते हैं उससे बाल काले हो जाते है (नाम नही लिखता, व्यर्थ प्रचार होगा), उस तेल को लगाऊं ? पर उससे भी शत्रु मरेगा नहीं, उसकी वर्दी बदल जायेगी। कुछ लोग खिजाब लगाते है। वे बड़े दयनीय होते हैं। बुढ़ापे से हार मानकर, यौवन का ढोंग रचते हैं। मेरे एक परिचित खिजाब लगाते थे। शनिवार को वे बूढ़े लगते और सोमवार को जवान- इतवार उनका रंगने का दिन था। न जाने वे ढलती उम्र में काले बाल किसे दिखाते थे! शायद तीसरे विवाह की पत्नी को। पर वह उन्हें बाल रंगते देखती तो होगी ही। और क्या स्त्री को केवल काले बाल दिखाने से यौवन का भ्रम उत्मन्न किया जा सकता है? नहीं, यह सब नहीं होगा। शत्रु को सिर पर बिठाये रखना पड़ेगा। जानता हूं, धीरे-धीरे सब वफ़ादार बालों को अपनी ओर मिला लेगा।

याद आती हैं, मेरे समानधर्मी, कवि केशवदास की, जिसे ‘चन्द्रवदन म्रगलोचनी’ ने बाबा कह दिया, तो वह बालों पर बरस पड़ा था। हे मेरे पूर्वज, दुखी, रसिक कवि! तेरे मन की ऎंठन मैं अब बखूबी समझ सकता हूं। मैं चला आ रहा हूं, तेरे पीछे। मुझे ‘बाबा’ तो नहीं, पर ‘दादा’ कहने लगी है- बस, थोड़ा ही फ़ासला है! मन बहुत विचलित है। आत्म-रति के अतिरेक का फ़ल नरसीसस ने भोगा था, मुझे भी भोगना पड़ेगा। मुझे एक अन्य कारण से डर है। मैने देखा है, सफ़ेद बाल के आते ही आदमी हिसाब लगाने लगता है कि अब तक क्या पाया, आगे क्या करना है और भविष्य के लिए क्या संचय किया। हिसाब लगाना अच्छा नहीं होता। इससे जिन्दगी में वणिक-व्रत्ति आती है और जिस से कुछ मिलता है, और जिस दिशा से कुछ मिलता है, आदमी उसी दिशा में सिजदा करता है। बड़े-बड़े ‘हीरो’ धराशायी होते है। बड़ी-बड़ी देव-प्रतिमाएं खण्डित होती है। राजनीति, साहित्य, जन-सेवा के क्षेत्र की कितनी महिमा-मण्डित मूर्तियां इन आंखों ने टूटते देखी हैं; कितनी आस्थाएं भंग होते देखी है। बड़ी खतरनाक उम्र है यह; बड़े समझौते होते सफ़ेद बालों के मौसम में। यह सुलह का झण्डा सिर पर लहराने लगा है। यह घोषणा कर रहा है-’अब तक के शत्रुओ! मैने हथियार डाल दिये हैं। आओ, सन्धि कल लें।’ तो क्या सन्धि होगी-उनसे, जिनसे संघर्ष होता रहा? समझौता होगा उससे, जिसे गलत मानता रहा?
यौवन सिर्फ़ काले बालों का नाम नहीं है। यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तात्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम हैं,; यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है। और सबसे ऊपर, बेहिचक बेवकूफ़ी करने का नाम यौवन है।
पर आज एकदम ये निर्णायक प्रश्न मेरे सामने क्यों खड़े हो गये? बाली की जड़ बहुत गहरी नहीं होती! ह्र्दय से तो उगता नहीं है यह! यह सतही है, बेमानी? यौवन सिर्फ़ काले बालों का नाम नहीं है। यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तात्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम हैं,; यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है। और सबसे ऊपर, बेहिचक बेवकूफ़ी करने का नाम यौवन है। मैं बराबर बेवकूफ़ी करता जाता हूं। यह सफ़ेद झण्डा प्रवचना है। हिसाब करने की कोई जल्दी नहीं है। सफ़ेद बाल से क्या होता है?


यह सब मैं किसी दूसरे से नहीं कह रहा हूं, अपने आपको ही समझा रहा हूं। द्विमुखी संघर्ष है यह- दूसरों को भ्रमित करना और मन को समझाना। दूसरों से भय नही। सफ़ेद बालों से किसी और का क्या बिगड़ेगा? पर मन तो अपना है। इसे तो समझाना ही पड़ेगा कि भाई तू परेशान मत हो। अभी ऎसा क्या हो गया है! यह् तो पहिला ही है। और फ़िर अगर तू नही ढीला होता, तो क्या बिगड़नेवाला है!

पहले सफ़ेद बाल का दिखना एक पर्व है। दशरथ को कान के पास सफ़ेद बाल दिखे, तो उन्होने राम को राजगद्दी देने का संकल्प किया। उनके चार पुत्र थे। उन्हें देने का सुभीता था। मैं किसे सौपू? कोई कन्धा मेरे सामने नही हैं, जिस पर यह गौरवमय भार रख दूं। किस पुत्र को सौपूं? मेरे एक मित्र के तीन पुत्र हैं। सबेरे यह मेरा दशरथ अपने कुमारों को चुल्लू-चुल्लू पानी मिला दूध बांटता है। इनके कन्धे ही नही है-भार कहां रखेगें? बड़े आदमियों के दो तरह के पुत्र होते हैं- वे जो वास्तव में हैं, पर कहलाते नहीं है और वे जो कहलाते है, पर हैं नहीं। जो कहलाते हैं, वे धन-सम्पत्ति के मालिक बनते हैं और जो वास्तव में हैं, वे कही पंखा खीचते हैं या बर्तन मांजते हैं। होने से कहलाना ज्यादा लाभदायक है।

अपना कोई पुत्र नही। होता तो मुश्किल में पड़ जाते। क्या देते? राज-पाट के दिन गये, धन-दौलत के दिन है। पर पास ऎसा कुछ नहीं है, जो उठाकर दे दिया जाय। न उत्तराधिकारी है, न उसका प्राप्य। यह पर्व क्या बिना दिये चला जायेगा।

पुत्र तो पीढ़ियों के होते हैं। केवल जन्मदाता किसी का पिता नहीं होता। विराट भविष्य को एक पुत्र ले भी कैसे सकता हैं? इससे क्या कि कौन किसका पुत्र होगा, कौन किसका पिता कहलायेगा! मेरी पीढ़ी के समस्त पुत्रों! मैं तुम्हें वह भविष्य ही देता हूं।
पर हम क्या दें? महायुद्ध की छाया में बढ़े हम लोग; हम गरीबी और अभाव में पले लोग; केवल जिजीविषा खाकर जिये हम लोग। हमारी पीढ़ी के बाल तो जन्म से ही सफ़ेद हैं। हमारे पास क्या हैं? हां, भविष्य है, लेकिन वह भी हमारा नहीं, आनेवालों का है। तो इतना रंक नही हूं-विराट भविष्य तो है। और अब उत्तराधिकारी की समस्या भी हल हो गयी। पुत्र तो पीढ़ियों के होते हैं। केवल जन्मदाता किसी का पिता नहीं होता। विराट भविष्य को एक पुत्र ले भी कैसे सकता हैं? इससे क्या कि कौन किसका पुत्र होगा, कौन किसका पिता कहलायेगा! मेरी पीढ़ी के समस्त पुत्रों! मैं तुम्हें वह भविष्य ही देता हूं। यद्यपि वह अभी मूर्त्त नहीं हुआ है, पर हम जुटे हैं, उसे मूर्त्त करने। हम नीव मे धंस रहे है कि तुम्हारे लिए एक भव्य भविष्य रचा जा सके। वह एक वर्तमान बनकर ही आयेगा- हमारा तो कोई वर्तमान भी नही था। मैं तुम्हें भविष्य देता हूं और इसे देने का अर्थ यह है कि हम अपने-आपको दे रहे हैं, क्योकि उसके निर्माण में अपने-आपको मिटा रहे हैं।

लो सफ़ेद बाल दिखने के इस पर्व पर यह तुम्हारा प्राप्य संभालो। होने दो हमारे बाल सफ़ेद। हम काम में तो लगे है-जानते है कि काम बन्द करने और मरने का क्षण एक ही होता है। हमें तुमसे कुछ नही चाहिए। ययाति-जैसे स्वार्थी हम नही है जो पुत्र की जवानी लेकर युवा हो गया था। बाल के साथ, उसने मुंह भी काला कर लिया।

हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिए। हम नीव में धंस रहे है; लो हम तुम्हें कलश देते है।

http://web.archive.org/web/20140419215911/http://hindini.com/fursatiya/archives/235


-हरिशंकर परसाई

24 responses to “पहिला सफेद बाल”

  1. राकेश खंडेलवाल
    परसाई जी के अब्वितीय लेखन को सादर नमन.
    केशव केसन असि करी जस अरिहुं न कराय
    चन्द्रबदन, मॄगलोचनी बाबा कहि कहि जायें.
  2. हिंदी ब्लॉगर
    जैसा कि परसाई जी की रचनाओं में होता है- शुरू से अंत तक मज़ा आया!
    सुलह-समझौते वाला ये अंश कुछ ज़्यादा ही मज़ेदार है:- “बड़ी खतरनाक उम्र है यह; बड़े समझौते होते सफ़ेद बालों के मौसम में। यह सुलह का झण्डा सिर पर लहराने लगा है। यह घोषणा कर रहा है- अब तक के शत्रुओं! मैने हथियार डाल दिये हैं। आओ, सन्धि कल लें।”
  3. सृजन शिल्पी
    मजेदार रचना। आपके कहने पर अपने भीतर के यौवन को हम भी टटोलने में जुट गए हैं और जो कुछ पता चलेगा वह चिट्ठे के माध्यम से आप सभी तक पहुँचता रहेगा।
    वैसे आजकल बाबा रामदेव सफेद बालों को काला करने के नुस्खे सिखा रहे हैं। सुनते हैं कि कई लोगों के बाल काल हुए भी हैं। परसाईजी यदि आज होते तो लोगों को नाखून रगड़कर बाल काला करने के इस प्रयास पर जरूर कुछ न कुछ लिखते। आप कुछ कल्पना दौड़ाइए और उनके अंदाज में इस प्रसंग पर कुछ प्रस्तुत करें तो मजा आ जाए।
  4. समीर लाल
    पुनः परसाई जी के एक सुंदर लेख से रुबरु कराने हेतु साधुवाद. शिल्पी जी की बात पर नजर दें, आपका लिखा पढ़ने में आनन्द आयेगा- :)
  5. bhuvnesh
    anup ji parsaiji ki is series ko shuru karne ke liye bahut bahut shukriya………
  6. भारत भूषण तिवारी
    इस बार भारत-यात्रा में परसाई रचनावली उठा लाया हूँ. मगर उसमें उनका संस्मरणात्मक संग्रह ‘हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं’ और रेखाचित्र संग्रह ‘जाने पह्चाने लोग’ नदारद हैं. आपके पास ये पुस्तकें हों तो कभी समय मिलने पर इनमें से भी कुछ हो जाए.इस लेख के लिए धन्यवाद.
  7. आशीष
    हम्म याद आया..
    ययाति के बारे सबसे पहले मैने इसी लेख मे पढा था। उसके बाद मैने इस ययाति कथा को सुखसागर मे पढा था ! और हाल ही मे खांडेकर जी का उपन्यास पढा !
    परसाई जी की उपमाये लाजवाब होती है
    या किसी पार्क के कुंज में अपनी राधा को ह्रदय से लगाये प्रेमी को एकाएक राधा का बाप आता दिख जाय।
  8. ajay dandhanadhan
    bilkul bindas andaj me likha ha.upmayao ka kaoi jawab nahi . bhahut badi samasya ko khol kar rakh diya hai . Maza aaya.
  9. शिवजी की चिट्ठी का जबाब
    [...] प्रशंसक हैं उन्होंने( परसाई जी ने) लिखा है- और इस सबसे अलग बेहिचक बेवकूफ़ी करने [...]
  10. saatyendra
    it is a great comment over our whole system in which everyday compromise is done against our humanity
  11. VIVEK SINGH
    अच्छा लगा पढकर आनन्द आ गया
  12. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] निराला 9.ठिठुरता हुआ गणतंत्र 10.पहिला सफेद बाल 11.काव्यात्मक न्याय और अंतर्जालीय [...]
  13. परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 1)
    [...] पहिला सफेद बाल [...]
  14. हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)
    [...] पहिला सफेद बाल [...]
  15. dileep shakya
    parsaiji ke prati aapka esa aadarbhav dekhkar man ko khoob prasannata hui hai…unhen dhoond dhoond kar prastut karna zari rakhen …..
  16. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] निराला 9.ठिठुरता हुआ गणतंत्र 10.पहिला सफेद बाल 11.काव्यात्मक न्याय और अंतर्जालीय [...]

Friday, January 26, 2007

ठिठुरता हुआ गणतंत्र

http://web.archive.org/web/20140419213351/http://hindini.com/fursatiya/archives/234

ठिठुरता हुआ गणतंत्र

[आज गणतंत्र-दिवस है। इस मौके पर मैंहरिशंकर परसाईजीका लिखा अपनी पसंद का एक लेख पोस्ट कर रहा हूं- ठिठुरता हुआ गणतंत्र। यह लेख मुझे कई कारणों से पसंद है। आज के मौके पर जब समाजवाद की बातें भी होनी बन्द हो गयीं हैं और भूमंडलीकरण, मुक्त अर्थव्यवस्था के हल्ले में समाजवाद की आवाजें मध्यम हो गयीं हैं, यह लेख एक प्रतिबद्ध लेखक की चिंताओं से हमें परिचित कराता है। लेखक का कथन -'इस देश में जो जिसके लिये प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है' किसी भी संवेदनशील मन को बहुत कुछ सोचने के लिये बाध्य करता है। मेरी पसंद में आज प्रख्यात जनवादी कवि-पत्रकार स्व. रघुवीर सहाय की कविता अधिनायक पोस्ट की जा रही है। ]

ठिठुरता हुआ गणतंत्र

हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई
चार बार मैं गणतन्त्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूं। पांचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतन्त्र-समारोह
देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छ्ब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ़ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूंदाबांदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डालर, पौण्ड, रुपया, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष या भारत सहायता क्लब
से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।
इतना बेवकूफ़ भी नहीं कि मान लूं , जिस साल मैं समारोह देखता हूं, उसी साल ऐसा मौसम रहता है। हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतन्त्र-दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है।
आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है?
जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है।
जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस मंत्री से पूछा था कि यह क्या बात है कि हर गणतन्त्र-दिवस को सूर्य छिपा रहता है? सूर्य की किरणों के तले हम उत्सव क्यों नहीं मना सकते?उन्होंने कहा-जरा धीरज रखिये। हम कोशिश में हैं कि सूर्य बाहर आ जाये। पर इतने बड़े सूर्य को बाहर निकालना आसान नहीं हैं। वक्त लगेगा। हमें सत्ता के कम से कम सौ वर्ष तो दीजिये।
दिये। सूर्य को बाहर निकालने के लिये सौ वर्ष दिये, मगर हर साल उसका छोटा-मोटा कोना तो निकलता दिखना चाहिये। सूर्य कोई बच्चा तो है नहीं जो अन्तरिक्ष की कोख में अटका है, जिसे आप आपरेशन करके एक दिन में निकाल देंगे।
इधर जब कांग्रेस के दो हिस्से हो गये तब मैंने एक इंडिकेटी कांग्रेस से पूछा। उसने कहा-’हम हर बार सूर्य को बादलों से बाहर निकालने की कोशिश करते थे, पर हर बार सिण्डीकेट वाले अडंगा डाल देते थे। अब हम वादा करते हैं कि अगले गणतन्त्र दिवस पर सूर्य को निकालकर बतायेंगे।
एक सिण्डीकेटी पास खडा़ सुन रहा था। वह बोल पड़ा- ‘यह लेडी(प्रधानमंत्री) कम्युनिस्टों के चक्कर में आ गई है।वही उसे उकसा रहे हैं कि सूर्य को निकालो। उन्हें उम्मीद है कि बादलों के पीछे से उनका प्यारा ‘लाल सूरज’ निकलेगा। हम कहते हैं कि सूर्य को निकालने की क्या जरूरत है? क्या बादलों को हटाने से काम नहीं चल सकता?
मैं संसोपाई भाई से पूछ्ता हूं। वह कहता है-’सूर्य गैर-कांग्रेसवाद पर अमल कर रहा है। उसने डाक्टर लोहिया के कहने पर हमारा पार्टी-फार्म दिया था। कांग्रेसी प्रधानंमंत्री को सलामी लेते वह कैसे देख सकता है? किसी गैर-कांग्रेसी को प्रधानमंत्री बना दो, तो सूर्य क्या ,उसके अच्छे भी निकल पड़ेंगे।
जनसंघी भाई से भी पूछा। उसने कहा-’ सूर्य सेक्युलर होता तो इस सरकार की परेड में निकला आता। इस सरकार से आशा मत करो कि भगवान अंशुमाली को निकाल सकेगी। हमारे राज्य में ही सूर्य निकलेगा।
साम्यवादी ने मुझसे साफ़ कहा-’ यह सब सी.आई.ए. का षडयंत्र है। सातवें बेड़े से बादल दिल्ली भेजे जाते हैं।’
स्वतन्त्र पार्टी के नेता ने कहा-’ रूस का पिछलग्गू बनने का और क्या नतीजा होगा?
प्रसोपा भाई ने अनमने ढंग से कहा-’ सवाल पेचीदा है। नेशनल कौंशिल की अगली बैठक में इसका फ़ैसला होगा। तब बताउंगा।’
राजाजी से मैं मिल न सका। मिलता, तो वह इसके सिवा क्या कहते कि इस राज में तारे निकलते हैं, यही गनीमत है।’
मैं इन्तजार करूंगा, जब भी सूर्य निकले।
स्वतंत्रता-दिवस भी तो भरी बरसात में होता है। अंग्रेज बहुत चालाक हैं। भरी बरसात में स्वतन्त्र करके चले गये। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाये। वह बेचारी भीगती बस-स्टैण्ड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है।
अंग्रेज बहुत चालाक हैं। भरी बरसात में स्वतन्त्र करके चले गये। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाये। वह बेचारी भीगती बस-स्टैण्ड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है।
स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतन्त्र-दिवस ठिठुरता है।
मैं ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूं। प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है-’घोर करतल-ध्वनि हो रही है।’ मैं देख रहा हूं, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं।बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जायेंगे।
लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियां बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिये कोट नहीं है। लगता है,
गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा़ नहीं है।
पर कुछ लोग कहते हैं-’गरीबी मिटनी चाहिये।’ तभी दूसरे कहते हैं-’ऐसा कहने वाले प्रजातन्त्र के लिये खतरा पैदा कर रहे हैं।’
गणतंत्र-समारोह में हर राज्य की झांकी निकलती है। ये अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ‘सत्यमेव जयते’ हमारा मोटो है मगर झांकियां झूठ बोलती हैं। इनमें विकास-कार्य, जनजीवन इतिहास आदि रहते हैं। असल में हर राज्य को उस विशिष्ट बात को यहां प्रदर्शित करना चाहिये
गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा़ नहीं है।
जिसके कारण पिछले साल वह राज्य मशहूर हुआ। गुजरात की झांकी में इस साल दंगे का दृश्य होना चाहिये, जलता हुआ घर और आग में झोंके जाते बच्चे। पिछले साल मैंने उम्मीद की थी कि आन्ध्र की झांकी में हरिजन जलते हुये दिखाये जायेंगे। मगर ऐसा नहीं दिखा। यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाये,लेकिन झांकी सजाये लघु उद्योगों की। दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं। मेरे मध्यप्रदेश ने दो साल पहले सत्य के नजदीक पहुंचने की कोशिश की थी। झांकी में अकाल-राहत कार्य बतलाये गये थे। पर सत्य अधूरा रह गया था। मध्यप्रदेश उस साल राहत कार्यों के कारण नहीं, राहत-कार्यों में घपले के कारण मशहूर हुआ था। मेरा सुझाव माना जाता तो मैं झांकी में झूठे मस्टर रोल भरते दिखाता, चुकारा करनेवाले का अगूंठा हजारों मूर्खों के नाम के आगे लगवाता। नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच लेन-देन का दृश्य दिखाता। उस झांकी में वह बात नहीं आयी। पिछले साल स्कूलों के ‘टाट-पट्टी काण्ड’ से हमारा राज्य मशहूर हुआ। मैं पिछले साल की झांकी में यह दृश्य दिखाता- ‘मंत्री, अफसर वगैरह खड़े हैं और टाट-पट्टी खा रहे हैं।
दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं।
जो हाल झांकियों का, वही घोषणाऒं का। हर साल घोषणा की जाती है कि समाजवाद आ रहा है। पर अभी तक नहीं आया। कहां अटक गया? लगभग सभी दल समाजवाद लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वह नहीं आ रहा।
मैं एक सपना देखता हूं। समाजवाद आ गया है और वह बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है। बस्ती के लोग आरती सजाकर उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हैं।पर टीले को घेरे खड़े हैं कई समाजवादी। उनमें से हरेक लोगों से कहकर आया है कि समाजवाद को हाथ पकड़कर मैं ही लाऊंगा।
समाजवाद टीले से चिल्लाता है-’मुझे बस्ती में ले चलो।’
मगर टीले को घेरे समाजवादी कहते हैं -’पहले यह तय होगा कि कौन तेरा हाथ पकड़कर ले जायेगा।’
समाजवाद की घेराबंदी कर रखी है। संसोपा-प्रसोपावाले जनतान्त्रिक समाजवादी हैं, पीपुल्स डेमोक्रेसी और नेशनल डेमोक्रेसीवाले समाजवादी हैं। क्रान्तिकारी समाजवादी हैं। हरेक समाजवाद का हाथ पकड़कर उसे बस्ती में ले जाकर लोगों से कहना चाहता है-’ लो, मैं समाजवाद ले आया।’
समाजवाद परेशान है। उधर जनता भी परेशान है। समाजवाद आने को तैयार खड़ा है, मगर समाजवादियों में आपस में धौल-धप्पा हो रहा है। समाजवाद एक तरफ
उतरना चाहता है कि उस पर पत्थर पड़ने लगते हैं।’खबरदार, उधर से मत जाना!’ एक समाजवादी उसका एक हाथ पकड़ता है, तो दूसरा हाथ पकड़कर खींचता है। तब बाकी समाजवादी छीना-झपटी करके हाथ छुड़ा देते हैं। लहू-लुहान समाजवाद टीले पर खड़ा है।
इस देश में जो जिसके लिये प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है। लेखकीय स्वतंत्रता के लिये प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं। सहकारिता केलिये प्रतिबद्ध इस आन्दोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं।
इस देश में जो जिसके लिये प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है। लेखकीय स्वतंत्रता के लिये प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं। सहकारिता केलिये प्रतिबद्ध इस आन्दोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं। सहकारिता तो एक स्पिरिट है। सब मिलकर सहकारितापूर्वक खाने लगते हैं और आन्दोलन को नष्ट कर देते हैं। समाजवाद को समाजवादी ही रोके हुये हैं।
यों प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि अब समाजवाद आ ही रहा है।
मैं एक कल्पना कर रहा हूं।
दिल्ली में फरमान जारी हो जायेगा-’समाजवाद सारे देश के दौरे पर निकल रहा है।उसे सब जगह पहुंचाया जाये। उसके स्वागत और सुरक्षा का पूरा बन्दोंबस्त किया जाये।
एक सचिव दूसरे सचिव से कहेगा-’लो, ये एक और वी.आई.पी. आ रहे हैं। अब इनका इन्तजाम करो। नाक में दम है।’
कलेक्टरों को हुक्म चला जायेगा। कलेक्टर एस.डी.ऒ. को लिखेगा, एस.डी.ऒ.तहसीलदार को।
पुलिस-दफ्तरों में फरमान पहुंचेंगे, समाजवाद की सुरक्षा की तैयारी करो।
दफ्तरों में बड़े बाबू छोटे बाबू से कहेंगे-’काहे हो तिवारी बाबू, एक कोई समाजवाद वाला कागज आया था न! जरा निकालो!’
तिवारी बाबू कागज निकालकर देंगे। बड़े बाबू फिर से कहेंगे-’अरे वह समाजवाद तो परसों ही निकल गया। कोई लेने नहीं गया स्टेशन। तिवारी बाबू, तुम कागज
दबाकर रख लेते हो। बड़ी खराब आदत है तुम्हारी।’
तमाम अफसर लोग चीफ-सेक्रेटरी से कहेंगे-’सर, समाजवाद बाद में नहीं आ सकता? बात यह है कि हम उसकी सुरक्षा का इन्तजाम नहीं कर सकेंगे। पूरा फोर्स
दंगे से निपटने में लगा है।’
मुख्य सचिव दिल्ली लिख देगा-’हम समाजवाद की सुरक्षा का इंतजाम करने में असमर्थ हैं। उसका आना अभी मुलत्वी किया जाये।’
जिस शासन-व्यवस्था में समाजवाद के आगमन के कागज दब जायें और जो उसकी सुरक्षा की व्यवस्था न करे, उसके भरोसे समाजवाद लाना है तो ले आओ। मुझे खास ऐतराज भी नहीं है। जनता के द्वारा न आकर अगर समाजवाद दफ्तरों के द्वारा आ गया तो एक ऐतिहासिक घटना हो जायेगी।
-हरिशंकर परसाई
मेरी पसन्द

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहले जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मख़मल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पच्छिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन-
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।
-रघुवीर सहाय

19 responses to “ठिठुरता हुआ गणतंत्र”

  1. रवि
    “…लगता है,
    गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है।…”
    व्यंग्य में परसाईं का जवाब नहीं.
    आज भी सामयिक है यह रचना.
  2. राकेश खंडेलवाल
    पूरब-पच्छिम से आते हैं
    नंगे-बूचे नरकंकाल
    सिंहासन पर बैठा, उनके
    तमगे कौन लगाता है
    गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के स्वागत गान के दूसरे चरण का सटीक विश्लेषण है
    अहरह तव आव्हान प्रचारित, सुनि तव उदार वाणी
    हिन्दू बौद्ध सिख ईसाई, मुसलमान क्रिस्तानी
    पूरब पश्चिम आसे, तव सिंहासन पासे, संकट दु:ख त्राता
    जन गण मंगल दायक जय हे भारत भाग्य विधाता
    और परसाईजी की रचना के बारे में कुछ कहना असंभव है.
    आपको एक बार पुन: धन्यवाद. साहित्य के खज़ाने से यह रत्न निकाल कर लाने के लिये
  3. rachana
    परसाई जी के बेहतरीन व्यंग लेख से परिचित करवाने के लिये धन्यवाद. आपकी कविता की पसन्द भी हमेशा की तरह अच्छी लगी.
  4. समीर लाल
    गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा़ नहीं है।
    -मानें न मानें, आज सुबह ही यह लेख पुनः किताब में पढ़ता था, फिर आपको देखा, पुनः पढ़ा. वाह वाह क्या बात है.परसाई जी का कोई सानी नहीं है. आप ऐसे ही पेश करते रहें और ब्लाग जगत को आनन्दित करते रहें..यह परचम लहराता रहे. :) आपका साधुवाद.
  5. SHUAIB
    परसाई जी का लेख शेयर करने के लिए शुक्रिया अनूप जी। लेख बहुत पसंद आया
  6. संजय बेंगाणी
    बहुत ही सटीक व आज भी प्रासंगिक.
    बिना शब्दाडाम्बर के कसा गया व्यंग्य.
    “गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है।”
    यह पंक्ति दर्दभरी मुस्कान लाने के लिए काफी है.
    लेख और कविता दोनो ही सुन्दर.
    यह बात यहाँ लिखनी चाहिए या नहीं, पता नहीं. अस्थान लगे तो अनूपजी यहाँ से हटा सकते है.
    मेरा ध्यान इस बात पर गया की गुजरात दंगो को भी झंकी में स्थान मिलता तो अच्छा रहता. यह रचना हालकि नहीं है. क्या उस समय भी दंगे होते थे? तब तो कट्टर पंथियो का राज न था. दरअसल यहाँ मुगलकाल से दंगे होते आए हैं, कभी छह-छह महिने शहर बन्द रहा करता था. बाद में भी छोटी-मोटी ‘नेट-प्रेक्टिस’ हर रोज का क्रम था, जो अब मोदी के भय से बन्द हो गए है.
  7. प्रेमलता
    कटु-सत्य!!!महान साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़वाने हेतु धन्यवाद।
  8. हिंदी ब्लॉगर
    सदा प्रासंगिक लगती है ये व्यंग्य कृति. प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद!
  9. नाहुष
    बहौत अच्छा लेख हैं। आपकी RSS बहुत रुचिकर है।
  10. विवेक सिंह
    परसाई जी का व्यंग्य और रघुवीर जी की कविता एक से बढकर एक .
  11. परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 1)
    [...] ठिठुरता हुआ गणतंत्र [...]
  12. हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)
    [...] ठिठुरता हुआ गणतंत्र [...]
  13. सतीश पंचम
    कल परसाई जी का लेख पीडीएफ फॉर्म में ‘विकलांग राजनीति’ पढ रहा था। पढ कर लगा कि परसाई जी ने कितना जबर्दस्त व्यंग्य लिखा था जो कि आज भी शब्दश: सच लग रहा है।
    अमिताभ बच्चन के साथ दो पार्टीयों का उछलना कूदना, हत्त तेरे की धत्ते तेरे की पढते हुए लग रहा है परसाई जी की टांग औऱ अमिताभ में गजब की साम्यता है।
    दोनो पार्टियां पहले टांग को लेकर भिडी और दोषारोपण करते करते साले और मादर तक जाने को तैयार लग रही है :)
    मजा आ रहा है, परसाई जी को पढते हुए।
  14. Tweets that mention गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। "ठिठुरता हुआ गणतंत्र" परसाईजी की दृष्ट
    [...] This post was mentioned on Twitter by fightclub, Pavan Jha. Pavan Jha said: गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है। "ठिठुरता हुआ गणतंत्र" परसाईजी की दृष्टि से http://goo.gl/kdlZO #RepublicDay #26January [...]
  15. dr. haroon khan
    आज परसाई को पड़ने पैर एसा लगता है की जैसे हमारे सहर जबलपुर
    की बात कर रहे है,
  16. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] अपनी जनता का 8.यह कवि अपराजेय निराला 9.ठिठुरता हुआ गणतंत्र 10.पहिला सफेद बाल 11.काव्यात्मक न्याय और [...]
  17. चंदन कुमार मिश्र
    इसे बाँटना था आज… यहाँ पहुँच कर इसे बाँट दिया… अनुमति नहीं माँगूँगा क्योंकि परसाई जी जितने आपके हैं, उतने ही मेरे हैं… …
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..आज छब्बीस जनवरी है (कविता)
  18. : हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)
    [...] ठिठुरता हुआ गणतंत्र [...]

Wednesday, January 24, 2007

यह कवि अपराजेय निराला

http://web.archive.org/web/20140419213717/http://hindini.com/fursatiya/archives/233

यह कवि अपराजेय निराला

[निरालाजी के बारे में पोस्ट किये मेरे पिछले लेख पर साथियों की प्रतिक्रियाओं को देखते हुये निरालाजी के बारे में और जानकारी देने का मन किया। यहां मैं उनके जीवन के उन पक्षों की जानकारी देने का प्रयास करना चाहता हूं जिनसे उनके मानसिक संतुलन खोते जाने के कारणों के संकेत मिलते हैं। यहां मैं फिर से स्पष्ट कर देना चाहता हूं उसमें से मेरा कुछ भी लिखा हुआ नहीं है। अधिकांश सामग्री स्व. डा. रामविलास शर्मा जी के द्वारा लिखित 'निराला की साहित्य साधना' से ली गयी है। यह किताब अद्भुत है। अगर रामविलाश शर्माजी ने यह किताब न लिखी न होती तो शायद निरालाजी के बारे में आज सम्यक जानकारी न मिलती। शायद अपने जीवन में घटी घटनाऒं के अतिरंजित वर्णन से निरालाजी एक अबूझ पहेली बनकर रह जाते। मेरा योगदान केवल इस पुस्तक में से जो ज्यादा जरूरी लगा उसे पोस्ट करने तक है इससे अधिक कुछ नहीं]

निराला
निराला ने बीस साल की उमर होते-होते अपनी पत्नी, भाई और तमाम परिवारी जनों को खो दिया था। पत्नी के जीवित रहते उन्होंने उनकी कद्र न की। उनके बालों को लेकर उन पर ताने कसे। गोस्त खाने के पीछे गढ़ाकोला में अपने साथ रहना दूभर कर दिया। अपने निठल्लेपन के कारण एन्ट्रेन्स परीक्षा न पास कर पाये। इससे अपने साथ उन्हें भी अपमानित कराकर घर से निकले। पर वह कितनी उदार थीं! कभी पति या ससुर के रूखे व्यवहार की शिकायत न की। मात्र अठारह की उम्र में संसार छोड़कर चलीं गयीं। कैसा सुन्दर कंठ, कैसा म्रदुल स्वभाव,कैसा सात्विक सौन्दर्य! निराला ने देखा कि उनके हृदय में पत्नी के प्रति अगाध प्यार है। यह प्यार अब तक क्यों नहीं दिखाई दिया था? किस मोह ने उनकी आंखों पर पर्दा डाल दिया था? क्या मृत्यु ही यह पर्दा उठा सकती थी कि वह मनोहरा देवी की वास्तविक छवि देखें?
निराला गढ़ाकोला से डलमऊ गये। गंगा के किनारे रात-रात भर व श्मशाम में घूमा करते जहां मनोहरा देवी की चिता जली थी। दिन में वह अवधूत टीले पर बैठ जाते और गंगा में बहती लाशें देखते रहते। पत्नी और भाई के निधन के बाद मौत का अब ऐसा कोई दृश्य न था जिससे उनको भय होता। जीवन में जो सबसे वीभत्स और भयानक है, उसे भर आंखों देखना वे सीख गये थे।
अपने बच्चों को सास के पास छोड़कर वे काम में जुट गये। साधना पथ पर अपने को समर्पित कर दिया।
निरालाजी की आर्थिक स्थिति कभी ऐसी नहीं रही कि आराम की जिंदगी जी सकें। कष्टों में जीवन चल रहा था।
इसी बीच अपनी पुत्री सरोज के विवाह की चिंता भी उन्हे सता रही थी। सरोज अपनी नानी के साथ रह रही थी। अपने एक मित्र को उन्होंने सरोज के लिये लड़का देखने के लिये लिखा। उनके मित्र दयाशंकर बाजपेयी ने अपने दोस्त शिवशेखर द्विवेदी से सरोज के विवाह के लिये पहले हामी भरी फिर द्विवेदीजी सूचित किया। इस बारे में द्विवेदीजी लिखते हैं:-

उनकी (निरालाजी) कामना थी कि सरोज का विवाह पास-पडो़स के किसी कुलीन घर में हो जाये। दो एक जगह उन्होंने चर्चा भी की। तब उन्होंने हमारे लिये श्री दयाशंकर बाजपेयी को लिखा। बाजपेयीजी ने हमें कुछ बताने से पहले ही स्वीकृति भेज दी। फिर हमें बताया। इसके तीन माह बाद हमें गड़ाकोला जाने का समाचार मिला। हम बहुत ही श्रद्धा करते थे। हम गये और वहां जाकर देखा, कुछ भी पास नहीं है। सिर्फ नब्बे रुपये हमारे पास थे। यही धन हमारी शादी में सहायक था। बिना किसी आडम्बर के उन्होंने जैसा चाहा,वैसा हमने किया। पुरोहित को मनोनुकूल देने में असमर्थ थे। इसीलिये वे (निराला) खुद पुरोहित थे। माली का काम भगवान वेदव्यास और महाकवि तुलसीदास ने किया-गीता रामायण ही मौर्य-मौरी थे।

सरोज की शादी के ड़ेढ़ साल बाद गौना हुआ। बाद में वे बीमार हो गयीं। साल भर बीमार रहीं। पता चला बायां फेफड़ा छलनी हो गया है। वैद्यों ने कहा उसे गंगा धारा में रखना चाहिये। निराला को पैसों की सख्त जरूरत थी। लेकिन कुछ इंतजाम न हो पा रहा था। प्रकाशक अपने अर्थभाव का रोना रो रहे थे। बाद में सरोज की मौत हो गयी। इस घटना के बारे में डा. रामविलास शर्मा लिखते हैं:-

गर्मी बीत चुकी थी। वर्षा का आरम्भ था।
डाकिये ने आवाज दी-पंडितजी।
वह खुद ही नीचे गये।
लौटते हुये जीने से ही बोले-डाक्टर सरोज इस नो मोर।
मैं हत्बुद्धि- सा बैठा रहा। वह कार्ड लिये कमरे में आये। मैंने एक बार उनके चेहरे की तरफ़ देखा, दुख के मारे जैसे स्याह हो गया हो।
उन्होंने एक आंसू न गिराया, एक शब्द भी न कहा। कुछ देर कमरे में चक्कर लगाते रहे। फिर कुर्ता पहना,छड़ी उठाई और घर से बाहर निकल गये।

सरोज की मौत ने निराला के सारे जीवन की सार्थकता और निर्थकता का प्रश्न विकट रूप में उनके सामने रख दिया। जियें तो किसके लिये। अब तक जीकर जो कुछ झेलते रहे उसका क्या फल मिला? महिषादल में नौकरी करते रहते तो बेटी की यह दुर्दशा नहीं होती। सब-कुछ छोड़ा साहित्य के लिये लेकिन साहित्य सेवा के लिये हमेशा पेट के लाले रहे।आलोचना सुनने से मालूम होता है कि हिंदी में लिखकर निराला ने भारी अपराध किया है। नेकनामी कम बदनामी ज्यादा मिली।
इसी मन:स्थित में रहे होंगे निराला जब उन्होंने राम की शक्ति पूजा में लिखा-धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध,
धिक साधन, जिसके लिये किया सदा ही शोध।

निराला ने आंसू नहीं गिराये। उनक दुख उनके अन्तस में कहीं जम गया। अब वह पहले वाले निराला नही रह गये, अब वह पहले जैसे कभी नहीं हो सकते थे।
खून में किसी ने जहर घोल दिया है और वह जल रहे हैं। निराला ने मन की सारी ताकत बटोरकर अपने को दुख से अलग किया। खुद से अलग किया। खुद को देखा-दुखी, उदास, जर्जर। और अपना यह रूप देखकर उनका मन सजग हुआ। अन्तस में जमे हुये दुख को निराला ने सहेजना शुरू किया, उसे निहारते-समेटते निराला अनजाने ही उसे मूर्त रूप देने लगे। उन्होंने कविता लिखी- सरोज स्मृति|
सरोज स्मृति में निरालाजी ने अपनी पुत्री के तमाम चित्र खींचते हुये अपने बारे में भी लिखा है। उनकी अपनी कथा है यह। उन्हें जब याद आया कि कुंडली में लिखे भाग्य अंक को मिटाने का फैसला लिया था, दूसरा विवाह नहीं करेंगे यह तै किया था ,तब अपने पुरुषार्थ पर गर्व हुआ और उन्होंने लिखा-
खंडित करने को भाग्य अंक,
देखा भविष्य के प्रति अशंक।

दुनियादारी में असफल रहे पिता का दर्द व्यक्त किया-
धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित कर न सका!
जाना तो अर्थागमोपाय
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ समर।

सम्पादकों के हाल बयान किये-

कवि जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त
लिखता अबाध गति मुक्त छन्द,
पर सम्पादकगण निरानन्द
वापस कर देते पढ़ सत्वर
रो एक-पंक्ति-दो में उत्तर।

ब्राह्मणों को कोसा :-
ये कान्यकुब्ज-कुल-कुलाड्गार;
खाकर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
इस विषय-बेलि में विष ही फ़ल,
यह दग्ध मरूस्थल-नहीं सुजल।
परेशानी के बावजूद अपात्र से अपनी कन्या का वरण न करने की बात याद की-
कल घ्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऎसी नहीं शक्ति।
ऎसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह।
इस कविता का सबसे उल्लेखनीय पक्ष कवि पिता के द्वारा अपनी पुत्री का सौन्दर्य वर्णन करना लगता है। प्रेमिका, प्रेयसी के सौन्दर्य वर्णन के विपरीत यहां कवि होने के अलावा पिता की मर्यादा की चुनौती थी। निरालाजी ने लिखा-
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारूण्य सुधर
आयी, लावण्य-भार थर-थर
कांपा कोमलता पर सस्वर
ज्यों मालकौश नव वीणा पर :
नैश स्वप्न ज्यों तू मन्द-मन्द
फ़ूटी ऊषा जागरण-छन्द,
कांपी भर निज आलोक-भार,
कांपी वन, कांपा दिक प्रसार।
परिचय-परिचय पर खिला सकल-
नभ, पृथ्वी,द्रुम,कलि, किसलय-दल।
युवा पुत्री के लिये लिखी ये लाइने मैंने पहली बार तीस वर्ष पढ़ीं थीं और आज भी याद करता हूं-

उर में भर झूली छबि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रंगार-मुखर
तू खुली एक-उच्छ्वास-संग,
विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग,
नत नयनो से आलोक उतर
कांपा अधरों पर थर-थर-थर।

पर जैसे-जैसे कविता के अंतिम चरण की ऒर पहुंचे, उनका धैर्य टूट गया, प्रकाश देखने वाले कवि का सपना चूर हो गया-
मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल,
युग वर्ष बाद जब हुयी विकल।

पर इसके बाद क्या हुआ ,निराला में कहने की सामर्थ्य न रही। वाक्य विश्रंखल हो गया-

दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूं आज जो कही नहीं।

निराला ने हिन्दी को, हिन्दी-साहित्य सेवा को, अपने को शाप दिया-

हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मो का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!

जब निरालाजी ने रामविलासजी को कविता पढ़ाई उसके बारे में उन्होंने लिखा-कविता पढ़कर मैंने चुपचाप उसे एक तरफ़ रख दिया। उनकी तरफ़ देखने का साहस मुझमें न था। उन्होंने नहीं पूछा-कैसी है? मैंने नहीं कहा-सुन्दर है।
उन दिनों की निराला की मन:स्थिति के बारे में बताते हुये रामविलासजी ने लिखा- वह आलोचकों के लिये कहते-जिसे देखो, वही निराला को देखकर टिल-टिलाता है।
निराला मानो जीते हुये मृत्यु का अनुभव कर रहे थे। प्रसाद की पंक्तियां वह बड़े दर्द से पढ़ते मानो वह सब प्रत्यक्ष देख रहे हों जो प्रसाद ने देखा था, जो साधारण
लोगों की आंखों से ओझल था-

चढ़कर मेरे जीवन रथ-पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर
मैंने निज दुर्बल पदबल पर
उससे हारी होड़ लगाई।
आह वेदना मिली विदाई।

निराला के मन में व्यथा के केन्द्र कौन थे, वे कब सक्रिय हो उठते हैं, यह सब रहस्य था। अपने दुख की बातें सुनाकर दूसरों को दुखी करना उनके स्वभाव में न था। पर वह किस तरह की पंक्तियां गुनगुनाते हैं, उनके स्वर से, उनकी आखों से मैं समझने लगा था कि इन्हें घोर मानसिक कष्ट है।
वे धीरे-धीरे दुखी आवाज में गालिब का शेर गुनगुनाते:

रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो,
हम-सुखन कोई न हो और हम जबां कोई न हो।
बेदरो दीवार-सा इक घर बनाना चाहिये,
कोई हमसाया न हो और पासबां कोई न हो।
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार,
कोई अगर मर जाये तो नौहख्वां कोई न हो।

धीरे-धीरे निराला के मन में विषाद भरता चला गया। उनके परम प्रिय मित्र बलभद्र दीक्षित’पढ़ीस’ का देहावसान हुआ। उन्होंने अपने आदर्शों के अनुसार सरकारी नौकरी छोड़कर जनता के बीच रहकर उसे शिक्षित करने, उसी की तरह खेतों में काम करने और गांव में रहते हुये साहित्य लिखने का निश्चय किया। पढी़सजी ने कुलीन ब्राह्मणों की रूढ़ियां तोड़कर हल की मुठिया पकड़ी। अछूत बालकों को घर पढ़ाने लगे। उनके दुबले-पतले मुख पर परिश्रम की थकान दिखने लगी पर आंखों में नई चमक आयी, वाणी में नया ओज आया। बलभद्र प्रसाद दीक्षित के देहावसान पर निराला ने लिखा:-

दीक्षित के लिये बहुत सोचता हूं, मगर वह नस मेरी कट चुकी है जिसमें स्नेह सार्थक है। अपने आप दिन-रात जलन होती है। किसी से अपनी तरफ़ से प्राय: नहीं मिलता। मिल नहीं सकता। कोई आता है तो थोड़ी सी बातचीत। आनेवाला ऊब जाता है। मुझे भी बातचीत अच्छी नहीं लगती।कभी रात भर नींद नहीं आती। तम्बाकू छूटती नहीं। खोपड़ी भन्नाई रहती है। चित्रकूट में एक दफा बीमारी के समय छोड़ दिया था खाना, फिर आदत पड़ गयी।

बाद में इलाहाबाद में रहते हुये निराला और फिराक में दोस्ती हो गयी। निराला फिराक के यहां जाते, कभी बहस करते, धमकाते- इस तरह लिखोगे तो अभी सर के बल खड़ा करेंगे।
निराला के अर्थाभाव चल रहे थे तो उनको सहयोग करने वाले भी आगे आ रहे थे। जबलपुर की हितकारिणी संस्था ने निराला को आमंत्रित किया। सुभद्राकुमारी चौहान ने उन्हें देने के लिये तीन सौ रुपये की निधि एकत्रित की। निराला ने विद्यार्थियों से कुछ भी लेने से इन्कार कर दिया। लोगों के आग्रह करने पर राह-खर्च के लिये सौ रुपये रख लिये। दो सौ कांग्रेस को दे देने को कहा। जब उन्हें बताया गया कि कांग्रेस की रकम सरकार जब्त कर लेती है तब उन्होंने दो सौ रुपये जबलपुर के साहित्य संघ को दे दिये।
निराला के एक परम भक्त उन्हें कवि-सम्मेलन में बुलाने आये। सब बातें हो गयीं। भक्त लेखक भी थे, निराला उन्हें मित्रवत मानते थे। संकोचवश पेशगी रुपया न मांग सके। जाड़े के दिन थे। निराला के पास गरम कपड़ों, रजाई-बिस्तर वगैरह की कोई उचित व्यवस्था न थी। भक्त के जाने पर वह बोले- द्याखौ सारे का, कहत है हुआं यहु द्याव, वहु द्याब। हुआं तक जाई कैसे? न गद्दा, न रजाई, न जूता न जड़ावर।मेरी पसन्द
धीरे-धीरे निराला की हालत खराब होती गयी। लेकिन निराला का मन हारकर भी न हारा था, थके हुये मन में हास्य और व्यंग्य का स्रोत सूख न पाया था। परिवेश से जो कुछ कुछ देखते-सुनते थे, उससे विवेकवाला तार जोड़कर वह अब भी हंसते थे।
निराला दारागंज (इलाहाबाद) की गली में घुटनों तक लुंगी बांधे टहलते हुये, अक्सर अपने से बातें करते हुये देखे जाते थे। अब वह आवेश में जोर से कम बातें करते थे, धीरे-धीरे बुदबुदाते ज्यादा थे। वे लोगों से अक्सर अंग्रेजी में बात करने लगे थे। रेणुजी ने पूछा-आप हिंदी में क्यों नहीं बोलते? इस पर क्रुद्ध होकर उन्होंने कहा- No, I hate the language like hell. रेणुजी ने उनकी तुलसीदास कविता की प्रशंसा की। निराला ने कहा- No, it is nothing but trash. रेणुजी और उनके साथियों को मठा पिलाया; स्वयं पानी पीकर रह गये।
वह हिंदी को , कवि निराला के व्यक्तित्व को अस्वीकार कर रहे थे। अपने लिये नित नये-नये नाम चुनते। कलम से अपना नाम लिखने पर आपत्ति करते। इसी सिलसिले में वे अपने जन्म के बारे में कथायें गढ़ रहे थे।
इसी तरह के ध्यान में एक दिन वह बच्चन के यहां पहुंच गये। वहां सुमित्रानन्दन पन्त को देखकर उन्होंने कहा था- मैं निराला नहीं हूं, मैं हूं तुत्तन खां का बेटा मुत्तनखां। मैंने गामा, जेविस्को और टैगोर सबको चित्त किया है। आओ।
कभी-कभी लोग उनका दर्शन करने उनको खोजते-खोजते दारागंज की उनकी गली में आ जाते। निराला कहते- निराला यहां नहीं रहते। जिन निराला को ढूंढते हो, वह कब के मर गये।
निराला का एक मन हिंदी-भाषियॊं से विद्रोह करता था, अपनी हिंदी जातीयता, अपना कवि का व्यक्तित्व अमान्य करता था वहीं उनका दूसरा मन हिंदी से प्रेम करता था, हिंदी लिखने-पढ़ने-बोलनेवालों को अपना परम आत्मीय मानता था। वह अब भी गीत लिखे जा रहे थे।
निराला का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था। सुमित्रानन्दन पन्त उनको देखने गये। निराला ने प्रसन्न होकर कहा-

हम रहें न रहें
तुम सलामत रहो हजार बरस।

…और एक दिन वह समय भी आ गया। निराला की हालत खराब होती गयी। किडनी ने काम करना बन्द कर दिया, नेत्रों की ज्योति जाती रही। तेरह अक्टूबर की शाम से पन्द्रह अक्टूबर सन ६१ के सबेरे तक जलोदर और हार्निया से पीड़ित शरीर में मृत्यु-यंत्रणा झेलने और अनेक बार मित्रों और डाक्टरों को स्वास्थ्य के आभास से प्रसन्न करने के बाद निराला ने अपनी जीवन लीला समाप्त की।
उनकी मृत्यु के कुछ दिन बाद सरस्वती के संपादकीय स्तम्भ में श्रीनारायण चतुर्वेदी ने लिखा-

निरालाजी अब नहीं हैं। भारतेन्दु ने अपने बारे में लिखा था, प्यारे हरिचन्द्र की कहानी रह जायेगी। सो अब निरालाजी की कहानी भर रह गयी है। अवश्य ही उनका भौतिक शरीर नहीं रहा,किन्तु जब तक हिन्दी भाषा है, जब तक काव्य के शुद्ध पारखी हैं, जब तक दलित,पतित और पीड़ित मानव हैं और जब तक दलित,पतित और पीडि़त मानव हैं और जब तक उनके कष्टों को वाणी देने की या वकील की आवश्यकता है, तब तक निरालाजी का यश:शरीर अमर है, तब तक उनकी वाणी जीवित है। हिन्दी के तो वे गौरव थे। उनके समान तेजस्वी, मेधावी,मौलिक और ऊंची उड़ान लेने वाला कवि तथा ‘शब्दों का बादशाह’ यदा-कदा ही जन्म लेता है।
मेरी पसन्द

सरोज स्मृति

ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण:
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विराम
पूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह-”पित:, पूर्ण आलोक वरण
करती हूं मै, यह नहीं मरण,
‘सरोज’ का ज्योति:शरण-तरण”-
अशब्द अधरों का,सुना, भाष,
मैं कवि हूं,पाया है प्रकाश
मैंने कुछ अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर।
जीवित-कविते,शत-शर-जर्जर
छोड़कर पिता को पृथ्वी पर
तू गयी स्वर्ग, क्या यह विचार-
“जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति,तब मैं सक्षम,
तारूंगी कर गह दुस्तर तम?”
कहता तेरा प्रयाण सविनय,-
कोई न अन्य था भावोदय।
श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकार
शुक्ला प्रथमा कर गयी पार!
धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित कर न सका!
जाना तो अर्थागमोपाय
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ समर।
शुचिते,पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अत: दधिमुख।
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख सका न वे दृग विपन्न:
अपने आंसुओं अत: बिम्बित
देखे हैं अपने ही मुख-चित।
सोचा है नत हो बार-बार-
“यह हिंदी का स्नेहोपहार,
यह नहीं हार मेरी भास्वर
वह रत्नहार-लोकोत्तर वर।”
अन्यथा, जहां है भाव शुद्ध
साहित्य, कला- कौशल -प्रबुद्ध,
हैं दिये हुये मेरे प्रमाण
कुछ वहां,प्राप्ति को समाधान,-
पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त
गद्य में पद्य में समाभ्यस्त-
देखें वे; हंसते हुये प्रवर
जो रहे देखते सदा समर,
एक साथ जब शत घात घूर्ण
आते थे मुझ पर तले तूर्ण,
देखता रहा मैं खड़ा अपल
वह शर-क्षेप वह रण-कौशल।
व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल
क्रुद्द युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल।
और भी फलित होगी वह छवि,
जागे जीवन जीवन का रवि,
लेकर कर कल तूलिका कला,
देखो क्या रंग भरती विमला,
वांछित उस किस लांक्षित छवि पर
फेरती स्नेह की कूची भर!
अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
कुछ दिन को, जब तू रही साथ
अपने गौरव से झुका माथ,
पुत्री भी, पिता गेह में स्थिर,
छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर।
आंसुऒं सजल दृष्टि की छलक
पूरी न हुई जो रही कलक
प्राणों की प्राणों में दबकर
कहती लघु-लघु उसांस में भर:
समझता हुआ मैं रहा देख
हटती भी पथ पर दृष्टि टेक।
तू सवा साल की जब कोमल,
पहचान रही ज्ञान में चपल,
मां का मुख, हो चुम्बित क्षण-क्षण,
भरती जीवन में नव जीवन,
वह चरित पूर्ण कर गयी चली,
तू नानी की गोद जा पली।
सब किये वहीं कौतुक विनोद
उस घर निशि-वासर भरे मोद;
खायी भाई की मार विकल
रोयी, उत्पल-दल-दृग छलछल;
चुमकारा फिर उसने निहार,
फिर गंगा तट सैकत विहार
करने को लेकर साथ चला,
तू गहकर हाथ चली चपला;
आंसुओं धुला मुख हासोच्छल,
लखती प्रसार वह ऊर्मि धवल।
तब भी मैं इसी तरह समस्त
कवि जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त
लिखता अबाध गति मुक्त छन्द,
पर सम्पादकगण निरानन्द
वापस कर देते पढ़ सत्वर
रो एक-पंक्ति-दो में उत्तर।
लौटी रचना लेकर उदास
ताकता रहा मैं दिशाकाश
बैठा प्रान्तर में दीर्घ प्रहर
व्यतीत करता था गुन-गुन कर
सम्पादक के गुण; यथाभ्यास
पास की नोचता हुआ घास
अज्ञात फ़ेकता इधर-उधर
भाव की चढ़ी पूजा उन पर।
याद है, दिवस की प्रथम धूप
थी पड़ी हुई तुझ पर सुरूप,
खेलती हुई तू परी चपल,
मैं दूरस्थित प्रवास से चल
दो वर्ष बाद, होकर उत्सुक
देखने के लिए अपने मुख
था गया हुआ, बैठा बाहर
आंगन में फ़ाटक के भीतर
मोढ़े पर, ले कुण्डली हाथ
अपने जीवन की दीर्घ गाथ।
पढ़ लिखे हुए शुभ दो विवाह
हंसता था, मन में बढ़ी चाह
खण्डित करने को भाग्य-अंक,
देखा भविष्य के प्रति अशंक।
इससे पहले आत्मीय स्वजन
सस्नेह कह चुके थे, जीवन
सुखमय होगा, विवाह कर लो
जो पढ़ी-लिखी हो-सुन्दर हो।
आये ऎसे अनेक परिणय,
पर विदा किया मैने सविनय
सबको, जो अड़े प्रार्थना भर
नयनों में, पाने को उत्तर
अनुकूल, उन्हें जब कहा निडर-
“मैं हूं मंगली”,मुड़े सुनकर।
इस बार एक आया विवाह
जो किसी तरह भी हतोत्साह
होने को न था, पड़ी अड़चन,
आया मन में भर आकर्षण
उन नयनों का, सासु ने कहा-
“वे बड़े भले जन है, भय्या,
एन्ट्रेंन्स पास है लड़की वह,
बोले मुझसे, ‘छब्बिस ही तो
वर की है उम्र, ठीक ही है,
लड़की भी अट्ठारह की है।
फ़िर हाथ जोड़ने लगे, कहा-
‘वे नहीं कर रहे ब्याह, अहा,
हैं सुधरे हुए बड़े सज्जन !
अच्छे कवि, अच्छे विद्दज्जन!
है बड़े नाम उनके! शिक्षित
लड़की भी रूपवती; समुचित
आपको यही होगा कि कहें
हर तरह उन्हें; वर सुखी रहें।’
आयेंगे कल।” दृष्टि थी शिथिल,
आयी पुतली तू खिल-खिल-खिल
हंसती, मैं हुआ पुन: चेतन
सोचता हुआ विवाह-बन्धन।
कुण्डली दिखा बोला-”ए-लो”
आयी तू, दिया, कहा, “खेलो!”
कर स्नान-शेष, उन्मुक्त-केश
सासुजी रहस्य – स्मित सुवेश
आयी करने को बातचीत
जो कल होनेवाली, अजीज,
संकेत किये मैंने अखिन्न
जिस ओर कुण्डली छिन्न-भन्न;
देखने लगीं वे विस्मय भर
तू बैठी सच्चित टुकड़ों पर।
धीरे-धीरे फ़िर बढ़ा चरण,
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारूण्य सुधर
आयी, लावण्य-भार थर-थर
कांपा कोमलता पर सस्वर
ज्यों मालकौश नव वीणा पर :
नैश स्वप्न ज्यों तू मन्द-मन्द
फ़ूटी ऊषा जागरण-छन्द,
कांपी भर निज आलोक-भार,
कांपी वन, कांपा दिक प्रसार।
परिचय-परिचय पर खिला सकल-
नभ, पृथ्वी,द्रुम,कलि, किसलय-दल।
क्या दृष्टि! अतल की सिक्त-धर
ज्यों भोगावती उठी अपार,
उमड़ता ऊर्ध्व को कल सलील
जल टलमल करता नील-नील,
पर बंधा देह के दिव्य बांध,
छलकता दृगों से साध-साध।
फूटा कैसा प्रिय कण्ठ-स्वर
मां की मधुरिमा व्यंज्जना भर
हर पिता-कण्ठ की दृप्त धार
उत्कलित रागिनी की बहार!
बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि,
मेरे स्वर की रागिनी वहिन
साकार हुई दृष्टि में सुधर,
समझा मैं क्या संस्कार प्रखर।
शिक्षा के बिना बना वह स्वर
है, सुना न अब तक पृथ्वी पर!
जाना बस, पिक-बालिका प्रथम
पल अन्य नीड़ में जब सक्षम
होती उड़ने को, अपना स्वर
भर करती ध्वनित मौन प्रान्तर।
तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि,।
जागा उर में तेरा प्रिय कवि,
उन्मनन-गुज्ज सज हिला कुंज
तरू-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज
बह चली एक अज्ञात बात
चूमती केश-मृदु नवल गात,
देखती सकल निष्पलक-नयन
तू, समझा मैं तेरा जीवन।
सासु ने कहा लख एक दिवस:-
“भैया अब नहीं हमारा बस,
पालना-पोसना रहा काम,
देना ‘सरोज’ को धन्य-धाम,
शुचि वर के कर, कुलीन लखकर,
है काम तुम्हारा धर्मोतर;
अब कुछ दिन इसे साथ लेकर
अपने घर रहो, ढूंढ़कर वर
जो योग्य तुम्हारे, करो ब्याह
होगें सहाय हम सहोत्साह।
सुनकर, गुनकर चुपचाप रहा,
कुछ भी न कहा,-न अहो, न अहा;
ले चला साथ मैं तुझे, कनक
ज्यों भिक्षुक लेकर, स्वर्ण-झनक
अपने जीवन की, प्रभा विमल
ले आया निज गृह-छाया-तल।
सोचा मन में हत वार वार-
“ये कान्यकुब्ज-कुल-कुलाड्गार;
खाकर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
इस विषय-बेलि में विष ही फ़ल,
यह दग्ध मरूस्थल-नहीं सुजल।”
फ़िर सोचा-”मेरे पूर्वजगण
गुजरे जिस राह, वही शोभन
होगा मुझको, यह लोक-रीति
कर दूं पूरी, गो नहीं भीति
कुछ मुझे तोड़ते गत विचार;
पर पूर्ण रूप प्राचीन भार
ढोते मैं हूं अछम; निश्चय
आयेगी मुझमें नहीं विनय
उतनी जो रेखा करे पार
सौहार्द-बन्ध की, निराधार।
वे जो जमुना के-से कछार
पद फ़टे बिवाई के, उधार
खाये के मुख ज्यों, पिये तेल
चमरौधे जूते से सकेल
निकले, जी लेते, घोर-गन्ध,
उन चरणों को मैं यथा अन्ध,
कल घ्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऎसी नहीं शक्ति।
ऎसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह।”
फ़िर आयी याद-मुझे सज्जन
है मिला प्रथम ही विद्धज्जन
नवयुवक एक, सत्साहित्यिक,
कुल कान्यकुब्ज, यह नैमित्तिक
होगा कोई इंगित अदृश्य,
मेरे हित है हित यही स्पृश्य
अभिनन्दनीय। बंध गया भाव,
खुल गया ह्रदय का स्नेह-स्राव,
खत लिखा, बुला भेजा तत्क्षण,
युवक भी मिला प्रफ़ुल्ल,चेतन।
बोला मैं-”मैं हूं रिक्त-हस्त
इस समय, विवेचन में समस्त-
जो कुछ है मेरा अपना धन
पूर्वज से मिला, करूं अर्पण
यदि महाजनों को, तो विवाह
कर सकता हूं, पर नहीं चाह
मेरी ऎसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूं, यह नहीं सुधर,
बारात बुलाकर मिथ्या व्यय
मैं करूं, नही ऎसा सुसमय।
तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम,
लग्न के; पढूंगा स्वयं मन्त्र
यदि पण्डितजी होंगे स्वतन्त्र।
जो कुछ मेरे, वह कन्या का,
निश्चय समझो, कुल धन्या का।”
आये पण्डितजी, प्रजावर्ग,
आमन्त्रित साहित्यिक, ससर्ग
देखा विवाह आमूल नवल,
तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल।
देखती मुझे तू, हंसी मन्द,
होठों में बिजली फ़ंसी, स्पन्द
उर में भर झूली छबि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रंगार-मुखर
तू खुली एक-उच्छ्वास-संग,
विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग,
नत नयनो से आलोक उतर
कांपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति
मेरे वसन्त प्रथम गीति-
श्रंगार, रहा जो निराकार
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिय-संग-
भरता प्राणों में राग-रंग,
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदलकर बना मही।
हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन
कोई थे नहीं, न आमन्त्रण
था भेजा गया, विवाह-राग
भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;
प्रिय मौन एक संगीत भरा
नव जीवन के स्वर पर उतरा।
मां की कुल शिक्षा मैने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में-”वह शकुन्तला,
पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।”
कुछ दिन रह गृह तू फ़िर समोद,
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यों अपार;
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त;
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;
वह लता वहीं की, जहां कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली,
अन्त भी उसी गोद में शरण
ली मूंद दृग वर महामरण!
मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल,
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दु:ख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूं आज, जो नही कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मो का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!
-

सूर्यकान्त त्रिपाठी’निराला’

रचनाकाल:९ अक्टूबर, १९३५

17 responses to “यह कवि अपराजेय निराला”

  1. राकेश खंडेलवाल
    निराला जी के विलक्षण चरित्र की कई बातें अप्रकाशित रही हैं. गया में एक सम्मेलन के अवसर पर सुभद्रा कुमारी चौहान और गुलाब खंडेलवाल के साथ सम्मेलन की समाप्ति के पश्चात आयोजकों द्वारा उन्हें भेंट किये गये ऊनी शाल को उन्होने रेलवे स्टशन पर एक व्यक्ति को ठिठुरता हुआ देख कर उढ़ा दिया और स्वयं शीत में बिना शाल के चल दिये.
    उनकी काव्य साधना और साहित्य के बारे में लिख पाना दुष्कर है. आपने बहुत अच्छा लेख प्रस्तुत किया है.
  2. राकेश खंडेलवाल
    निरालाजी का ज़िक्र उनकी अविस्मरणीय रचनाओं के बिना अधूरा है. राम की शक्तिपूजा के साथ मेरी प्रिय रचनाओं में से एक:-
    वीणा वादिनि
    वर दे, वीणावादिनि वर दे।
    प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे।
    काट अंध उर के बंधन स्तर
    बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
    कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
    जगमग जग कर दे।
    नव गति नव लय ताल छंद नव
    नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
    नव नभ के नव विहग वृंद को,
    नव पर नव स्वर दे।
  3. राजीव
    निराला जी के बारे में अनेक बातें जानकर बहुत अच्छा लगा। निराला जी के बारे में एक और वृत्तांत (सत्यता प्रमाणिक नहीं है – किसी साहित्यकार के द्वारा सुनी थी) पुत्री के विवाह / गौना में दहेज़ के धन से सम्बन्धित कुछ विवाद / मतभेद होने पर पुत्री की विदा के समय जो भी उपलब्ध धन था, उसे पोटली में रख, वर-पक्ष के सम्मुख फ़ेक दिया और स्वयं उस स्थान से दूर / छत पर चले गये और वहीं से पुत्री को आशीर्वाद दिया और विदा किया।
  4. राजीव
    अभी सरोज-स्मृति कविता आंशिक ही पढ़ी है, परंतु है अति काव्यात्मक, साहित्यिक वर्णनात्मक और भावात्मक भी। अस्तु यह त्वरित पुनर्टिप्पणी।
  5. हिंदी ब्लॉगर
    बड़ा ही हृदयस्पर्शी लेख है. ‘सरोज स्मृति’ प्रस्तुत करने के लिए विशेष धन्यवाद!
  6. समीर लाल
    सच में आपको अति साधुवाद और राकेश भाई ने इसमें सलमा जोड़ दिया है, उनका भी साधुवाद. इतने उच्च स्तरिय लेख पर ज्यादा लिखना संभव नहीं, मेरे जैसे सीमित लेखनी के व्यक्ति के लिये.
  7. अतुल शर्मा
    महाप्राण निराला के बारे में वह जानकारी जो अभी तक कहीं पढ़ी नहीं थी। ‘सरोज स्मृति’ के सृजन का मूल बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। इस लेख पर टिप्पणी के लिए शब्द नहीं हैं।
  8. प्रत्यक्षा
    निराला जी के बारे में इतने मार्मिक लेख को प्रस्तुत करने के लिये धन्यवाद ।
  9. Pratik Pandey
    वाह, बहुत सुन्दर लेख है। काफ़ी पहले स्कूल में ‘सरोज स्मृति’ पढ़ी थी, फिर से पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
  10. सागर चन्द नाहर
    इतने महान व्यक्तित्व के लिये टिप्प्णी लिख पाना बहुत मुश्किल है, बहुत ही बढ़िया लेख। एकाध जगह गला रुंध आया।
    एक बात पहले भी पूछी थी आज फिर लिख रहा हूँ हिन्दी के ज्यादातर साहित्यकार -कवियों की जिन्दगी इस तरह अभावों में क्यों गुजरी थी?
  11. प्रेमलता
    धन्यवाद पुनः महाकवि के बारे में लिखने के लिए।
  12. SHUAIB
    निराला जी के बारे मे लेख और उस पर टिप्पणीयों के लिए अनूप जी और और बाक़ी दोस्तों का धन्यवाद – ये मेरे लिए बिलकुल नई जानकारी है।
  13. rachana
    लेख और कविता ‘सरोज स्मृति’ के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.
  14. मैथिली
    फ़ुरसतिया जी; आप तो रुलाना भी जानते हैं
  15. फुरसतिया » अबे ,सुन बे, गुलाब…
    [...] निरालाजी की तमाम कवितायें मुझे पसंद हैं। इनमें सरोज-स्मृति सबसे प्रमुख है। इसके अलावा जो कवितायें निरालाजी की मुझे पसंद है उनमें कुकुरमुत्ता भी है। लंबी कविता होने के कारण शायद अभी तक नेट पर उपलब्ध नहीं है। हमने सोचा हम ही इसे डाल दें। यहां से कापी पेस्ट होती रहेगी। [...]
  16. lalit mohan joshi
    This aspect of nirala ji that you disclosed here is really like a genuine lesson for all those who want to devote their life in pursuit of their destiny. Might be nirala ji was not practical with life but he seems honest with his pursuit.
  17. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] की डायरी 7.यह कवि है अपनी जनता का 8.यह कवि अपराजेय निराला 9.ठिठुरता हुआ गणतंत्र 10.पहिला सफेद बाल [...]