Sunday, January 13, 2008

दम बनी रहे , घर चूता है तो चूने दो

http://web.archive.org/web/20140419212708/http://hindini.com/fursatiya/archives/384

जिज्ञासु यायावर
अरे यायावर रहेगा याद
साल बीत गया। नया लग गया। साल जब बीत रहा था तो साथी लोग हिसाब लगा रहे थे उपलब्धियों का, खास घटनाओं का। हम भी सोचे कि कुछ मौज ली जाये। सो तुकबंदी का मजनून बना। शुरुआत करते हुये सोचा- साल गया , बवाल गया।

फिर जैसा होता है हमेशा, आलस्य हावी हो गया। फ़ैक्ट्री बदली तो फोन बदला और पुराने फोन के साथ ब्राड बैंड कनेक्शन भी चला गया। अब नये फोन पर ब्राड बैंड कनेक्शन का इंजतार है।

पिछले साल दफ़्तर में तमाम झंझट रहे। नयी जगह पर सुकून से काम करने शुरुआत हुयी थी। इसीलिये लिखना शुरू किया था -साल गया बवाल गया।

लेकिन नये साल की शुरुआत और भयावह रही। साल की शुरुआत हुयी ही थी कि बवाली चले गये।

हां, यह अभी-अभी याद आया कि हमारे बड़े , सबसे बड़े भाई को बचपन में गांधीनगर मोहल्ले में लोग , उनके हम उमर दोस्त बवाली कहते थे। उनका एक सड़क दुर्घटना में अचानक नौ जनवरी को निधन हो गया।
हम तीन भाई थे, दो रह गये।

बड़े भाई जिनका नाम अशोक था, असमय हमें शोकाकुल करके चले गये।

एक के बाद एक घटनायें होती रहीं जिससे लगता है कि कन्हैयालाल बाजपेयी की ये पंक्तियां हमारे घर वालों के लिये खासकर लिखीं गयीं हैं-

संबंध सभी ने तोड़े लेकिन,
पीड़ा ने कभी नहीं तोड़े।
सब हाथ जोड़कर चले गये,
चिंता ने कभी नहीं जोड़े॥
हम तीन भाई और एक बहन हजारों-लाखों परिवारों के बच्चों की तरह अभावों में पले-बढ़े। पिताजी गांव से शहर आये थे। रोजी-रोटी के इन्तजाम में लगे रहे। हम तीनों भाई और एक बहन अपने-आप पढ़ते-लिखते, बड़े होते गये।

बड़े भाई का पढ़ने-लिखने में मन कम लगता था। दो बार हाई-स्कूल का इम्तहान देकर पढ़ाई छोड़ दी। कमाई में सहयोग देने के लिये अठारह-उन्नीस साल की उमर में नौकरी करने लगे। मुझे याद है कि वे संगीत टाकीज के पास एक जिब बनाने के कारखाने में कारीगर की तरह काम करने लगे थे। मैं खाना लेकर जाता दोपहर को।
इसके बाद न जाने कितने काम बदले, छोड़े। कपड़ा बाजार, गांव में खेती, लाटरी का व्यापार , कपड़े की फ़ेरी और न जाने क्या-क्या। गांव में पहला ट्रैक्टर शायद हमारे यहां ही लिया गया था लोन पर उनके लिये । खेती करने के उनके इरादे भी बहुत जल्द खेत रहे।

इस बीच उनकी शादी हुयी। मैं हाईस्कूल में पढ़ता था। इम्तहान के कारण बारात में दूसरे दिन पहुंचा। दो दिन और रहकर खैरनगर, तिर्वा से वापस कानपुर आये।

दो साल बाद मैं इंजीनियरिंग में पढ़ने के लिये इलाहाबाद चला गया। मुझे याद है कि घर से लेकर संगीत टाकीज तक वे रिक्शे के साथ-साथ भागते आये थे। हम दोनों भाई रोते रहे। मैं रिक्शे पर और वे भागते हुये।
वे बचपन में मुझे बहुत प्यार करते थे। लड़ाई-झगड़े उनके अक्सर हो जाते लोगों से। एक बार किसी बात पर नाराज होकर घर से बाहर जाने लगे। मैं साथ भागता चला गया। वे मुझे मारते हुये चलते गये। लेकिन मैं मार खाता उनके साथ ही चलता गया। वापस उनको साथ लेकर ही लौटा। यह बात वे अक्सर याद करके बताते रहते अभी हाल के दिनों तक।

सन १९९० तक हम सभी एक साथ एक ही घर में रहे। ८२-८३ तक एक कमरे के घर में गांधीनगर में और फिर किदवई नगर में। इसके बाद अलग-अलग होना शुरु हुये। मैं पहले ही बाहर चला गया था। दोनों बड़े भाई भी अलग-अलग किराये के मकान में।

आर्थिक स्थिति के हिसाब से हमारे बड़े भाई सबसे कम मजबूत थे। अम्मा के मन में उनकी चिंता हमेशा रही। इसीलिये जब वे हमारे साथ रहने लगीं तो उनकी सबसे बड़ी बिटिया स्वाति को साथ लाईं। वो छुटपन से हमारे साथ रही। उसकी पिछले साल ही हमने शादी की। बाली उमर में ससुर बनने का सुख मिला। इसके बाद दूसरी भतीजी के लिये संबंध करने की योजनायें बनने लगीं थीं।

इस बीच बड़े भाई तमाम धंधे बदलते रहे और हम एक में शुरुआती सफ़लता के बाद असफ़ल होते गये। वे कहीं न कहीं झटके से अमीर बनने की सोचते थे लेकिन काम हमेशा जज्बात से लेते थे। पास में चवन्नी होने पर जिस किसी के लिये भी शरणागतवत्सल बन जाते और अठन्नी लुटा देते। धीरे-धीरे लोग उनसे कटते लगे, बचने लगे।

लम्बी कहानी है न जाने कितने सिलसिले हैं। लेकिन वे धीरे-धीरे अकेले पड़ते गये। अकेलेपन के बावजूद उनके मन में अपने परिवार के लिये जान देने का जज्बा हमेशा बना रहा। कमजोरी के बावजूद ऐसा हो नहीं सकता था कि कोई मजबूत से मजबूत आदमी उनसे जुड़े किसी व्यक्ति को कुछ कहकर निरापद चला जाये। वे भिड़ जाते थे, भले ही पिट जायें।

बीच वाले भाईसाहब के मुकाबले मेरे लिये उनके मन में खास लगाव था। हम लोग साथ-साथ रहे भी बहुत। अभावों के जो दिन हमने साथ बिताये उन दिनों न जाने किससे सुनकर वे आये थे और हम अकसर कहते – दम बनी रहे , घर चूता है तो चूने दो। 

बाद में वे किसी बात पर या बिना बात के अपने बच्चों या भाभी के लिये अपने व्यवहार परेशानी खड़ी करते तो हमें बुलाया जाता। हमें देखते ही या तो वे बमकने लगते या शान्त हो जाते। मैं कुछ देर शान्त रहता फिर कहता -अच्छा , अब शान्त हो जाओ। वे शान्त हो जाते। मैं समझाते-समझाते मौज लेने लगता। वे हंसने लगते या कभी -कभी भावुक होकर रोने लगते। शान्त हो जाते।

बाद के दिनों में रोना बढ़ गया था। मेरी तकलीफ़ भी। मैं यह सोच-सोचकर उदास भी होता जाता कि वे मन से इतने कमजोर और अकेले कैसे होते जा रहे हैं।

हम भाई-बहनों में सबसे खूबसूरत रहे मेरे भाई धीरे-धीरे सबसे कम आकर्षक होते गये। तमाम झंझटों में अपने आप को घेरते गये। एक से मुक्त होते दूसरे से लड़ियाने लगते।

अम्मा रहती हमारे साथ थीं लेकिन उनका मन अपने बड़े लड़के की चिंता में परेशान रहता। उनके बारे में चिंता करतीं रहती। तबियत कैसी होगी, ड्यूटी जा रहे हैं कि नहीं, बच्चों के साथ ठीक से सलूक कर रहे हैं या अपने अंदाज में हैं।

कभी फोन करते तो कुछ ऐसी बातें करते जिनको सुनकर अम्मा दुखी हो जातीं। बीपी बढ़ जाता। मैं उनको हड़काता -अम्मा को सही में प्यार करते हो उनको फोन पर परेशान न किया करो। वे चुप हो जाते या कहते अच्छा अनूप बाबू, तुम जैसा कहते हो वैसा ही होगा। अब कभी फोन नहीं करूंगा। लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं। एकाध दिन बाद फोन बजता। अपने मोबाइल से फोन करते- फोन मिलाओ जरा उधर से। हम फिर बतियाते। कभी-कभी झुंझलाते और कभी लड़ियाते हुये।

घर आते। कभी-कभी भरी दोपहर वापस जाने की बात करते। मैं कहता- सो जाओ शाम को जाना। वे चुपचाप सो लेट जाते।

अपने इशारों पर सबको नचाने का जज्बा रखने वाले मेरे भाई चुपचाप बिना किसी प्रतिवाद के बातें चीजें स्वीकार करने लगे थे।

बाद के दिनों में वे होमगार्ड की नौकरी करने लगे। वहीं रात को ड्यूटी पर थे। जब एक डीसीएम ट्रक ने उनको टक्कर मार दी और वे तुरन्त चले गये।

घर में भाभी बता रहीं थीं कि रात को ड्यूटी पर जाते समय कुत्ते ने उनकी टोपी फ़ाड़ दी। वो शायद उनको रोकना चाहता था।

पडो़स के एक बाजपेयीजी बता रहे थे कि शाम को जाते समय उनके भाई साहब कह रहे थे- बाजपेयी, तुम्हारा मोबाइल पुराना, बेकार है। तुमको कल एक अच्छा मोबाइल लाकर देंगे।

एक और बुजुर्ग जिनको वो अक्सर हड़काते रहते थे ने बताया- शुकुलाजी साफ़ दिल के थे। एक दिन हमको बहुत गरियाया। मैं ऊपर घर चला गया। कुछ देर बाद बोले -अरे बुढऊ नीचे आओ, फूल सूख रहे हैं पानी डालो आकर। उनके रहते यहां किसी की हिम्मत नहीं हुयी कि बदमाशी करे किसी से।

९ तारीख को जब फोन सुबह आया तो पता चला कि वे चले गये। भतीजा अखिलेश रोते हुये हमसे चिपट गया। कहते हुये- अंकल मेरा क्या होगा?

मैं आंसूओं से उसे चुप करा रहा था- बेटा, हम हैं न! तुम क्यों चिंता करते हो?

अब हम लोगों के लिये इम्तहान है कि हम लोग अपने भतीजे, भतीजी और भाभी का कितना ख्याल रख पाते हैं।

अब समझ में नहीं आता कि क्या करें, क्या कहें, क्या लिखें।

तमाम यादें गड्ड-मड्ड हो रही हैं आखों के सामने। भारतीय विद्यालय मैदान में पायजामा पहने क्रिकेट खेलते हम तीनों भाई, हमारे ऊपर किसी भी उठने वाले हाथ को तोड़ देने का जज्बा और हिम्मत रखने वाला भाई, पढ़ाई में असफ़ल हो जाने पर परिवार के लिये कमाई करने में जुट जाने वाला भाई, गांव में अनाज के लिये चाचा लोगों से अनुरोध और करने और मना करने पर भिड़ जाने वाला भाई, बच्चों के बड़े होने तक पिताजी से चुपचाप पिट जाने वाला बेटा, खुद परेशान और असहाय होने के बावजूद किसी बीमार रिश्तेदार को देखने के लिये हड़कने वाला भाई। और सबसे ऊपर अपने किसी भी प्रिय की खुशी को शानदार तरीके से जीने का ताना-बाना बनाने के लिये हर संभव कोशिश करने वाला भाई।

उनको डांस करना हम बाकी भाइयों की तरह ही बिल्कुल नहीं आता था। लेकिन मेरी शादी में बारात के संग रास्ते भर नाचते रहे। अपनी पत्नी का ट्रांसफ़र मैं करा नहीं पाया। जगह ही न थी। लेकिन वे जब-तब आते और कहते- बहू, अपना डिटेल दो। फ़लाने से कहकर तुम्हारा काम करवाता हूं।

मुझे याद है कि हम दोस्त साइकिल से भारत यात्रा करके वापस लौट थे। भाई ने पूरे मोहल्ले का मजमा इकट्ठा कर लिया था। फोटोग्राफ़र बुलाया। और मोहल्ले के सब लोगों के साथ खूब फोटो खिंचाये। ऊपर फोटो में हम दो साथियों के सबसे पीछे खंबे के पास खड़े भाई की फोटो से अपने भाई की उपलब्धि के प्रति गर्व और प्यार छलका पड़ रहा है।

हमने खाना बनाना अपने बड़े भाई से सीखा और शायद हर हाल में हिम्मत न खोने का हौसला के पीछे भी उनके ही मुंह से सबसे पहले सुने डायलाग ( दम बनी रहे , घर चूता है तो चूने दो) से ही बना होगा।

यह हमारा अपना दुख है। आपको नाहक दुखी करना ठीक नहीं। मैं इसके बारे में शायद न लिखता अगर मामा वुधकरजी अपने ब्लाग में इसका जिक्र न करते। आज मेरे मामा कन्हैयालाल नंदन जी घर आये थे। उनसे मैंने हरिद्वारी मामा और उनके ब्लाग का जिक्र भी किया था। सो उन्होंने फोन पर बात की होगी। मामाओं का भरोसा करना अच्छी बात नहीं। :)

भाई जब बचपन में घर से गये थे तो उसका अंदेशा मुझे हो गया था। मैं साथ-साथ भागता चला गया था और सारे रास्ते पिटते रहने के बावजूद अपने भाई को वापस लेकर लौटा था।

इस बार ऐसा हुआ कि भाई दुनिया से चला गया बिना किसी सूचना के। हमें मौका भी न मिला कि हम पीछा करते हुये उसको पकड़कर वापस ले आते। सिर्फ़ समय के हाथ पिट रहे हैं। समय शायद को पता है कि हमारे पीटने के लिये उठने वाले किसी भी हाथ को तोड़ देने वाला भाई चला गया है।

हम पिट रहे हैं लेकिन हमें अपने भाई की आवाज साफ़ सुनाई दे रही है - दम बनी रहे , घर चूता है तो चूने दो।

81 responses to “दम बनी रहे , घर चूता है तो चूने दो”

  1. Arimardan Kumar Tripathi
    प्रस्तुतिकरण का तरीका जबरदस्त है.
  2. अंतर्मन
    कुछ कहने को शब्द नहीं हैं। पढ़ कर आंखें नम हो आईं। दो वर्ष पूर्व मैं अपने एक बड़े भाई को खो चुका हूँ। यह पोस्ट तो लग रहा है मेरे जीवन का हिस्सा है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिवार को संबल प्रदान करे।
  3. h
    far
  4. hi
    mujhe baut rona aaya aapki ye post padkar…
    yaad dila gaya kuch gujre hue pal…
  5. और ये फ़ुरसतिया के चार साल
    [...] खो दिया। मैं आज भी उनके बारे में लिखी पोस्ट पढ़ता हूं तो उदास हो जाता हूं, आंसू आ [...]
  6. दीपक
    आँखे नम हो आयी !!मेरी श्रद्धांजली उन्हे !
  7. दीपक
    यह लेख ना जाने क्यो मै बार-बार पढ रहा हुँ ।शाय्द इससे मेरे घर के चुने की भी यादे जुडी है इसलिये!किसी ने सही कहा है जब बातें दिल से की जाये तो बातें दिल तक जाती है!!
    दम बनी रहे घर चूता है चूने दो॥
  8. seema gupta
    इस बार ऐसा हुआ कि भाई दुनिया से चला गया बिना किसी सूचना के। हमें मौका भी न मिला कि हम पीछा करते हुये उसको पकड़कर वापस ले आते। सिर्फ़ समय के हाथ पिट रहे हैं। समय शायद को पता है कि हमारे पीटने के लिये उठने वाले किसी भी हाथ को तोड़ देने वाला भाई चला गया है।
    हम पिट रहे हैं लेकिन हमें अपने भाई की आवाज साफ़ सुनाई दे रही है – दम बनी रहे , घर चूता है तो चूने दो।
    ” uf bdaa dukh hua ye pdh kr…..ab itne dino ke baad kya khen aaj hee pdha hai…. magar mahol gumgeen ho gya hai , kya beete hogee us waqt…”
    Regards
  9. हादसे राह भूल जायेंगे
    [...] दुर्घटना प्रधान सा रहा। हमारे बड़े भाई साथ छोड़ गये। याद आती है तो आंसू पहले आते हैं। अभी [...]
  10. विवेक सिंह
    पढकर रुलाई आरही है . फिर भी कहेंगे कि, “दम बनी रहे घर चूता है तो चूने दो !”
  11. मृत्य जिजीविषा से बहुत डरती है
    [...] में मरने वाला ही नहीं मरता उसके साथ मरते हैं बहुत [...]
  12. Arvind Mishra
    आँखे भर आयी हैं -आप पर बड़ी जिम्मेदारी है .ईश्वर आपको शक्ति दें ! और क्या कहूं ! यह जगत ऐसा ही है ! और निर्वाह करते जाना है!
  13. ताऊ रामपुरिया
    ये कष्ट महा भयानक है और क्षति अपूर्णिय है. आपने जिस तरह से पूरी तसवीर आपके और भाई साहब के संबंधों की खींची है उस तसवीर ने सचमुच मे रुला दिया. अनूप जी, जो पीडा है आपकी वो तो शायद ही कभी मिट पायेगी, पर आप जिस तरह से हर बात को मौज मे ऊडा देते हो उस तरह आपने कोशीश जरुर की है पर आपकी रुलाई हमे यहीं से दिखाई दे रही है.
    मैं बहुत कुछ लिखना चाहता हूं पर लिख नही पा रहा हूं, ईश्वर आपको इस दुख को सहन करने की ताकत दे, और आप अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहें, यही ईश्वर से प्रार्थना है.
    रामराम.
  14. कौतुक
    अनूप जी
    दारुण अभिव्यक्ति है एक प्रगाढ़ सम्बन्ध की. भगवन उनकी आत्मा को शान्ति दे और आपको शक्ति की आप उनकी छोरी हुई जिमेदारियां निभा सकें.
    साथ ही मेरे ब्लॉग पर आपके टिपण्णी के लिए धन्यवाद्. यह मेरा पहला प्रोत्साहन है और याद रहेगा.
    कौतुक
  15. बेटी को वाणी से संवार दे ओ वीणापाणि
    [...] आज खास तौर से पेश कर रहा हूं। आज हमारी छोटी भतीजी सुधा का विवाह संपन्न होना तय हुआ है। आप [...]
  16. kanchan
    अम्मा अक्सर एक बात कहती हैं…..!
    कबहुँक भईया है सौदईया, कबहुँक दाहिन बाँह
    जिस तरह का चरित्र आपने अपने भईया का बताया उन से कुछ ऐसा ही रिश्ता हो जाता है, कभी कभी बहुत खीझ और कभी बहुत प्यार…..लेकिन मन ये नही कहता कि ये छोड़ कर कहीं जायें, ये अपनी बातें मनवाते रहें और यहीं रहें। लेकिन सारी शर्तें मानने के बावजूद अगर कोई यूँ अचानक हाथ छुड़ा के चल दे, बिना बताये बिना कुछ कहे, तो सिवाय हाथ मलने के रह ही क्या जाता है।
    भतीजे से ये हम हैं ना कहते हुए जरूर मन में आया होगा लेकिन मेरे लिये कौन है…! मैं जानती हूँ..! मै समझती हूँ…! आज उनक पुत्री की शादी पर कहीं बहुत खुश होंगे शायद वो भी…!
  17. kanchan
    बेटी की शादी….! बहुत सारे भाव कुछ इसी तरह के मेरे मन में भी चल रहे हैं आजकल…! यूँ अभी बस बाते हीं चल रही हैं, भांजी की शादी की, लेकिन कल रात ही गुनगुना रही थी
    राज की बात बताएं, ये पूँजी जीवन की,
    शोभा आज से है ये आपके आँगन की

    और आँखें नम होने लगी…!
    ईश्वर करे बिटिया जहाँ जाये वहाँ से सिर्फ खुशियाँ पाये और खुशियाँ लुटाये और हमें भी वहाँ से खुशियाँ लौटाये…!
  18. चल सनीमा देखन को जायें गो्री
    [...] वर्ष हममें से सबसे बड़े भाई अशोक का निधन हो गया और चलती हुई गाड़ी पंक्चर हो [...]
  19. pankaj upadhyay
    :(:(:(
    एक फ़लसफ़ा और मिला..
    कुछ और कह नही पाऊगा..
  20. हिमान्शु मोहन
    प्रिय (आदरणीय) शुक्ल जी,
    आपने जो लिखा है, वैसी ही लगभग हर घर में एक कहानी है, कम से कम कानपुर या कहें बैसवारे के इलाके में तो है ही। दर्द की शिद्दत हम तक पहुँची तो ये लगा कि अभी इन्सानियत बाक़ी है हम में। अब ये अपनी अपनी सलीबें अपने-अपने काँधे पे लिए – मसीहा बनने की अनचाही कोशिश में, जितनी गुज़र जाए – अच्छा।
    आप ने भाई खोने का दर्द जाना है, मगर भाई के होने का सुख भी तो लिया है न!
    ज़िन्दगी के इन्सान से खिलवाड़ और हौसले के सहारे इन्सान के जी पाने की इस जद्दोजहद के बयान से प्रेरित हो कर अपनी एक विचारों की गाँठ आज लगता है खोलनी पड़ेगी – जाता हूँ अपने ब्लॉग पर राहत के लिए।
    शुभेच्छु,
  21. vd ojha
    इस पोस्ट का जिक्र आपने एक बार फ़ोन पर किया था इसलिए हल्का सा याद था इधर ४ तरिख तक ट्रेड अप्प्रेंतिस की एक्साम फिर बच्चे को छओड़ने कोटा चला गया था आज इस पोस्ट को पढ़ा और आँखों में आंसू लेकर जो महसूस करता रहा उन्हें शब्दों में बयां नहीं कर सकता मुझे एक बार यद् है में अपने पिताजी की आँखों का ऑपरेशन अमृत्षर से करा के वापास आया था आपसे मिलने गया तो अपने पूछा था कहाँ गए थे जब मेने बताया की पिताजी की आँखों का ऑपरेशन करआने गया था तो अपने पिताजी की उम्र पूछी थी मेरे द्वारा उम्र ६० से उपर बताने पर आपने कहा था की इत्ती उम्र में इत्ता रुपया खर्च करने का क्या फयदा तो मुझे बहुत बुरा लगा था फिर २ ३ दिन बाद आपने मुझे बुलाकर उस हॉस्पिटल के बारे में पूछा था अपने पिताजी के आँखे दिखने के लिए तब में जाना की उस दिन आप मौज ले रहे थे
    में नहीं जनता की आप कितने अछे हैं या कितने बुरे लेकिन ऊपर बाले से इतनी दुआ जरुर करना चाहूँगा की हर माँ बाप को आप जेसा बेटा हर भाई बहिन को आप जेसा भाई हर भाभी को आप जेसा देवर हर कर्मचारी को आप जेसा ऑफिसर हर ब0 ऑफिसर को आप जेसा ऑफिसर जरूर मिले
    मेरे जीवन के साथ आप के बहुत से सुखद संस्मरण मेरे लिए पूंजी की तरह जुड़े हैं
  22. : बरसात, बचपन,वजीफ़ा और मित्रता दिवस
    [...] गये। मन किया कि वह कारखाना देखें जहां भैया बचपन में काम करते थे। धीरे-धीरे चलते हुये एक-एक इमारत देखते [...]
  23. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] दम बनी रहे , घर चूता है तो चूने दो [...]
  24. Anonymous
    मुंशी प्रेमचंद की बड़े भाईसाब कौंध गयी पर यह कहानी भर नहीं है फिर भी कहानी ही है भाइ साब के पीछे रोते हुए भागना प्रेम का अतीव लगाव का जीवंत चित्र है जो हम देहातियों के जीवन मैं लगभग सार्व है लिखते रहो देखते और दीखते रहो खुश रहो आबाद रहो यही ख्वाहिश है! लिंक भेजने के लिए धन्यवाद ! वैसे तो ईमेल अकाउंट भी मेरा तुम्हारा बनाया हुआ ही है. पर कितना देख पाता हूँ -
    केवट कुंती द्रौपदी इन जाना कछु मर्म,
    दर्द प्रेम का धर्म है प्रेम दर्द का कर्म
  25. धीरेन्द्र पाण्डेय
    मन भीग गया
    धीरेन्द्र पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..चीनी हमला और फिल्म हकीकत का पुनरावलोकन
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Wednesday, December 26, 2007

कुछ टिप्पणी चर्चा

http://web.archive.org/web/20140419214548/http://hindini.com/fursatiya/archives/386

कुछ टिप्पणी चर्चा

कुछ दिन पहले श्रीलाल शुक्लजी के बारे में लिखी एक पोस्ट पर नितेश एस. जी की यह टिप्पणी थी-
हिन्दी मे इतना जबरदस्त माल नेट पर उपलब्ध है, सोचा न था. ज्ञानदत्त जी और आप सभी के ब्लोग्स को कुछ ही दिन पहले नारद द्वारा देखने का मौका मिला.तिस पर शुक्ल जी के रागदरबारी के बारे में पड़ कर, हिन्दी साहित्य का मेरा पुराना सोया हुआ कीडा फिर जाग्रत हो गया है.
रागदरबारी ले आया हूँ. पता नहीं मेरी मेडिकल की बुक्स का क्या होगा :-)
आप देखिये कि हम लोगों (अरे आप भी शामिल हैं हममें) ब्लागिंग से लोगों के साहित्य के कीड़े जाग रहे हैं। मतलब ब्लागिंग को ऐसा-वैसा न समझो ये बड़े काम की चीज है।
शास्त्रीजी की टिप्पणी का कुछ ऐसा होता है कि वह हमेशा स्पैम में पाई जाती है। मामला आचार संहिता का बनता है। ये कुछ ऐसा ही है कि धर्मोपदेशक आचार-सदाचार की बातें करते-सकते अनायास अनाचार करते रहने वालों के मोहल्ले में पाया जाय। आखिर उसको उनका भी उद्धार करना है। वे भी खुदा के बंदे हैं। पहले अतुल की कुछ टिप्पणियां भी स्पैम में मिलीं। ऐसा कैसे होता है? क्या ई-मेल पते में कुछ लफ़ड़ा होता है। शास्त्रीजी ने टिपियाते हुये कहा-

सन 2007 में इतना लिखा कि लगभग सारा मसाला खतम सा हो गया था एवं खाली हुए भेजे को 2008 की फिकर खाये जा रही थी की भईया अब भला क्या लिखोगे!! देवयोग से इस लेख पर नजर पड गई एवं कम से कम साल भर लिखने के लिये तकनीक मिल गई है. बीच बीच में इस तरह का मसाला देते रहें, हम सब का कल्याण हो जायगा!!! – शास्त्री
पुनश्च: गंभीर से गंभीर पाठक/चिंतक के जीवन में भी हास्य का होना जरूरी है. काश कुछ और चिट्ठाकर इस विधा को समझ लें तो रोज कुछ न कुछ “मानसिक ऊर्जा” मिलती रहेगी.
अब आप देखिये शास्त्रीजी ने मेरी पोस्ट के कन्धे पर रख कर बन्दूक चला दी है। अगले साल वे जो कुछ भी लिखेंगे लोग यही समझेंगे कि अगर उनको फ़ुरसतिया तकनीक न पता चलती तो इतना सब न लिख पाते। उन्होंने गंभीर से गंभीर पाठक के लिये हास्य जरूरी बता दिया है। आपको हंसना शुरू कर देना चाहिये।
रविरतलामीजी ने बहुत कठिन मांग रखी है। उन्होंने लिखा-

अब अगले पोस्ट में फुरसतिया टाइप सफल ब्लॉगिंग करने के अतिसुगम उपाय बताएँ तो हमारा भी कुछ फायदा हो. क्योंकि ऊपर बताए सब उपाय हमने आजमा लिए और हमारे लिए अब तक कोई भी मुफीद नहीं बैठा है :)
अब आपै बताओ कि उनकी मांग कैसे पूरी की जाये? वे एक तो फ़ुरसतिया टाइप ब्लागिंग के सूत्र जानना चाहते हैं। उसको सफ़ल भी बनाना चाहते हैं। और इन सब के लिये एकदम्मै सुगम उपाय जानना चाहते हैं। कित्ता मुश्किल है ई सब बताना? हम फ़ुरसतिया टाइप ब्लागिंग के सुगम उपाय बता सकते हैं लेकिन सफ़ल ब्लागिंग के कैसे बता सकते हैं? हम तो असफ़ल ब्लागर हैं जिससे चार दिन में एक ठो पोस्ट नहीं ठेली जाती। :)
जब से राखी सावंत नच बलिये में दूसरी नम्बर पर आयीं आलोक पुराणिक दुखी से हैं। उनको अच्छा नहीं लग रहा है। उनको डर भी लग रहा है कि राखी सावंत भी उनसे जब भी मिलेंगी पूछेगी- आपने भी मुझे एस.एम.एस. नहीं किया! आप बड़े बेवफ़ा हैं। लगता है आप दिल से मेडोना टाइप ग्लोबल सुन्दरियों से जुड़ने लगे हैं। देशी लगाव का केवल बहाना करते हैं सरोकार आपके परदेशी हैं।

ज्ञानजी यहां जो कहते हैं सो कहते ही हैं वे वहां चिट्ठाचर्चा में भी मौज लेते रहते हैं। दो दिन पहले की पोस्ट में उन्होंने लिखा-

एक जोरदार फोटोयुग्म हमने भी लगाया था आज – इस चर्चा में छपनीय! आपने सेंसर कर दिया!
अब आप देखिये वे अपनी पोस्ट में लिखते क्या हैं-

वैसे इस पुच्छल्ले पर लगाने के लिये “अनूप शुक्ल” का गूगल इमेज सर्च करने पर दाईं ओर का चित्र भी मिला। अब आप स्वयम अपना मन्तव्य बनायें। हां, सुकुल जी नाराज न हों – यह मात्र जबरी मौज है!Red heart
आप ऊपर वाला का फोटो देखें। अब आप ही बतायें कि हम इत्ते क्यूट लगते हैं जित्ती क्यूट ये फोटो ये है। लेकिन हम सोचते हैं कि अगर इस फोटो को चिठेरा-चिठेरी बताया जाये तो कैसा रहेगा। :)
कुछ दोस्तों ने राय जाहिर की है कि चिठेरा-चिठेरी में हम जो लिखते हैं वह महिलाओं को ‘हर्ट’ करता है। क्या सच में ऐसा है? यही सोचते हुये हमने अभी तक अगली सूटिंग नहीं की इन हीरो-हीरोइन को लेकर। सारा मेकअप का पैसा बरबाद हो गया। इसी लफ़ड़े में न जाने कितने डायलाग बेजार-बेकार हो रहे हैं। कुछ मुलाहिजा फ़र्मायें। यहां चिठेरा-चिठेरी आपस में भन्नाये हुये कि ज्ञानजी के हाथ में उनकी फोटो कैसे पड़ी! एक का मत है कि ज्ञानजी अब नौकरी पर ध्यान कम देते हैं, स्टिंग आपरेशन में ज्यादा
रुचि ले रहे हैं। दूसरा कहता है कि ये फोटो जानबूझकर लीक कराई गयी है ताकि रेटिंग बढ़े। दोनों एक दूसरे को कोस रहे हैं-
चिठेरा- जा ,तू ब्लागरों में इलाकाई हो जा।
चिठेरी- जा, तू बांगलादेश में भाजपाई हो जा।
चिठेरा-जा, तू पब्लिक स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई हो जा।
चिठेरी-जा, तू किसी बंद ब्लाग से विज्ञापन की कमाई हो जा।
हम विचार कर रहे हैं कि ये डायलाग किस तरह से महिलाओं को ‘हर्ट ‘करते हैं। :)
चिट्ठाचर्चा में , पेशे से जर्नलिस्ट ,देवप्रकाश चौधरी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है-

टिप्पणियां अच्छी हैं, लेकिन बिना पढ़े टिप्पणी करना रस्म अदायगी की करह लगता है। हर ब्लॉग पर टिप्पणी करने से पहले उसे पढ़ें भी। किस नाम का ब्लॉग है, लेखक कौन है,क्या लिखा है….धन्यवाद
हम बूझ ही न पाये कि किसकी टिप्पणियों के लिये ये बात कही गयी? हमारे वनलाइनर के लिये या पाठक की टिप्पणियों के लिये। वैसे सच तो यह है कि पाठक बादशाह होता है। उससे यह नहीं कहा जा सकता है पहले पढ़े फिर लिखे। उसकी जो मन में आयेगा वह करेगा! :)
इसी बहाने एक सच्ची घटना याद आ गयी। करीब आठ-नौ साल पहले जब हम शाहजहांपुर में थे तो दफ़्तर में हेडक्वार्टर से आया एक पत्र मिला। उसका जबाब तुरन्त जाना था। दोपहर को बास से बात करने गये। बास न जाने किस बात भन्नाये हुये थे। शायद उनको भी पत्र अबूझमाड़ लगा होगा। :) वे छूटते ही बोले- तुमने इसे पढ़ा तो है नहीं इसका जबाब कैसे लिखोगे?
हम भी तुरन्ता जबाब दे दिये- देखिये साहब , आप ये नहीं कह सकते कि हम इसे पढ़े नहीं हैं। आप शायद एक बार भी न पढ़े हों लेकिन हम इसे दो बार पढ़ चुके हैं। अब ये अलग बात है कि हमें इसकी अंग्रेजी समझ में न आयी हो ।या फिर हमारी और आपकी समझ में अलग-अलग आया हो। आखिर अंग्रेजी-अंग्रेजी में फ़रक होता है।
साहब शरीफ़ थे। बेचारे चुपा गये। क्या बोलते। पेंसिल मुंह में लालीपाप की तरह चूसते हुये जबाब सुधारने में जुट गये।
हम भी शरीफ़ बनने के प्रयास हैं। यह पोस्ट इधर ही रोकते हैं। दफ़्तर जाना है जी। :)

13 responses to “कुछ टिप्पणी चर्चा”

  1. प्रमेन्‍द्र
    आप लोगों का लेखन निश्चित रूप से बहुआयामी जो पाठको को खीचने में सफल होता है। आप लोगों के पास विषय और समय की कमी नही है। अच्‍छा लगा टिप्‍पणी चर्चा
  2. आलोक
    टिप्पणी करने के पहले कुछ पढ़ना भी होता है?
  3. शास्त्री जे सी फिलिप्
    वाह !! सुबह सुबह कुछ अच्छा पढने को मिल गया!
  4. सृजन शिल्पी
    पिछली पोस्ट पढ़कर हमारा भी मन किया था कि अपनी फरमाईश करने का। लेकिन देखा कि कतार लंबी है, हमारी बारी इतनी जल्दी नहीं आएगी।
    हमें भी नियमित और सफल ब्लॉगर बनने के गुर सीखने हैं। हमारे लिए कुछ अलग टाइप के फंडे सोचकर बताइए, पुराने फंडों के लायक हम नहीं हैं।
  5. परमजीत बाली
    बढिया पोस्ट है।अच्छी चर्चा की।
  6. Gyan Dutt Pandey
    “तू ब्लागरों में इलाकाई हो जा।”
    ************************
    येल्लो, चिठ्ठाजगत में इलाकाई होना बद-दुआ का मामला है? अब तो मुझे खोजना पड़ेगा कि मेरी कितनी पोस्टों को उन्होने इलाकाई मॉडरेट किया है। आपने बता दिया, अच्छा किया। अब जबलपुर पर पोस्ट लिखूंगा तो उसमें दो-दो लाइन जकार्ता और जोहानसबर्ग पर भी ठेल दूंगा! :-)
  7. Nitesh S
    कलम ने तो सिंघासन हिला दिए थे . अब लोगों की कुंगिपटल-थाप हमारे कॅरिअर चौपट करने मे लगी है .
    भाई साहब इतना अच्छा लिखकर हमें पड़ने को इतना मजबूर करेंगे तो हमारे बेचारे मरीजों का क्या होगा?
    फिलहाल रागदरबारी को इस तरह पन्ना पन्ना पड़ रहे हैं जैसे कोई महंगी ब्रांडी कड़ाके की ठंड में घूँट घूँट कर पीता है, और डरता है की ख़त्म हो गई तो क्या होगा. अरे भाई कोई श्रीमान श्रीलाल शुक्ल साहब से ये कहे की इतनी छोटी क्यों बनाईं. मेरी मेडिकल की बोरिंग किताबें तो ३-४ हज़ार पन्नों से कम की नहीं होती.
    अमृत इतना थोड़ा क्यों?
  8. अजित वडनेरकर
    बढ़िया माल है साहेब। कभी कभी सोचता था कि सफल ब्लागर बनना है। इसके लिए टिप्पणीपुराण के फेर में भी कुछ दिन रहा और कुछ दिन चिट्ठाजगत की सक्रियता सूची के तिलिस्म में भी मुब्तिला रहा। मगर ये मियादी बुखार था। अब उतर गया है। अब तो एक ही उद्धेश्य है कि रोज़ एक शब्द पर कुछ शोध हो , कुछ लिखने का वक्त निकले ताकि जल्दी ही एक पुस्तक के रूप में इस सामग्री को सहेज लिया जाए । सफर तो चलता रहेगा। फुरसतिया नाम सार्थक होता रहे। बधाई…
  9. डा० अमर कुमार
    शुकुल महाराज,
    आप इतना ठाँस दिहो है,
    कि हमार मुंह खुलै के खुला ही रह गवा ।
    हम मूढ़मति का एक बात श्पष्टै कईं दियें ,महराज ।
    ई बिलागर का कबौ परमोशन हुई तौ उई का बनी ?
    खैर हटाओ जउनो बने, तो आप उहै बन जाओ।
    काहे कि कउनो एग्रीगेटर एहिका प्रावीजन नहीं रक्खिस है
    अउर हमार एक डिजर्विंग कन्डिडेट रहा जा रहा है, ई चक्कर मा !
    और भला दुई हज़ारी सम्मान बरै आप एम०पी० तो जईहो ना !
  10. शास्त्री जे सी फिलिप्
    आपको पता नहीं क्या होता जा रहा है. कुछ नया पढने के लिये आये तो पता चला कि जो आदमी चिट्ठा-चर्चा को अंतरिक्षयान की तेजी से चला रहा था उसका अपना चिट्ठा 26 दिसंबर से खाली पडा है. लगता है कि ‘क्रिसमस’ पर आपने कुछ शरारत की होगी और अब कुछ दिन के लिये पश्चाताप कर रहे हैं.
    ऐसा न करें. जबरिया ही लिखे. आप कहते हैं कोई आपका क्या करेगा. क्यों नहीं करेगा. आपका पढेंगे!!
    – शास्त्री
    पुनश्च: कहीं किसी कारण मेरी टिप्पणीयों को एक अमरीकई स्पेम तंत्र पकड रहा था जो कई चिट्ठों में काम आता है. उम्मीद है जनवरी अंत तक समस्या हल हो जायगी.
  11. anita kumar
    हम को अलग से ब्लोगिंग के गुर सीखने हैं, ये गुर अपन से निभने वाले नहीं
  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] कुछ टिप्पणी चर्चा [...]
  13. हिन्दी ब्लॉग लेखन : टिप्पणीकारी : जो मन ने कहा २ | Ramyantar | रम्यांतरRamyantar | रम्यांतर
    [...] जितू जी का यहआलेख , और अनूप शुक्ल जी का यह आलेख पढ़ लें, मैं क्या लिखूँ [...]