Tuesday, May 27, 2008

ब्लाग की हाफ़ लाइफ़ का हिंदी अनुवाद

http://web.archive.org/web/20140419215819/http://hindini.com/fursatiya/archives/437

ब्लाग की हाफ़ लाइफ़ का हिंदी अनुवाद

ज्ञानजी आज साइंस पढ़ाने लगे। कुछ -कुछ मास्टर मोतीराम की तरह। आज का विषय रहा ब्लाग की हाफ़ लाइफ़!
इस लेख का हिंदी अनुवाद कुछ यों होगा।
संसार में तमाम तरह के रेडियो एक्टिव पदार्थ पाये जाते हैं। ब्लाग भी उनमें से एक है। ब्लाग से पोस्टें रेडियो एक्टिव किरणॊं के रूप में निकलती हैं। कुछ किरणें हानिकारक होती हैं कुछ लाभदायक। कुछ किरणें बस ऐं-वैं टाइप होती हैं।
ब्लाग ऐसा रेडियो धर्मी पदार्थ होता है जिसे चलाने के लिये एक ब्लागर की आवश्यकता होती है। जैसे एक्सरे के लिये रेडियोलाजिस्ट चाहिये होता है वैसे ही ब्लाग के लिये ब्लागिस्ट चाहिये होता है। जैसे रेडियोलाजिस्ट अच्छा होने से एक्सरे अच्छा आता है वैसे ही ब्लागिस्ट अच्छा होने से ब्लाग से उत्सर्जन होता है। जैसे खराब रेडियोलाजिस्ट कामचोरी के चलते एक्सरे मशीन खराब करके सुर्ती मलता है, पान-मसाला खाता है और ऐंडि़याता रहता है वैसे ही ब्लागिस्ट तमाम तरह के बहाने बनाकर ब्लागिंग से कतराता है। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो खाली इसीलिये ब्लाग उत्सर्जन कम कर देते हैं ताकि उनको समथिंग डिफ़रेंट टाइप का माना
कुछ ब्लागिस्ट अपनी ब्लाग मशीन मोहल्ले की शुरुआती गली में रखते हैं। जो आता है उसका एक्सरे उतार देते हैं। अगर फ़ीस चुकाने से कम रहा तो उसका गमछा उतार लेते हैं। इज्जत तो वे मशीन पर लेटाते ही उतार देते हैं। उनका मानना है आदमी जितना हलका रहे उतना अच्छा।
कुछ अगड़म -बगड़म टाइप के ब्लागिस्ट क्या करते हैं कि इधर-उधर के एक्सरे की कापी करके आपको दिखा देते हैं। कहते हैं इस एक्सरे ने टाप किया था जी एक्सरे इम्हान में। आप इसे अपना ही मानो। लोग माले मुफ़्त दिले बेरहम समझ कर मान लेते हैं।
कुछ लोग अपनी एक्सरे मशीन आसमान में उड़ाते हैं। ऊपर से ही फोटो खींचते हैं। गूगल अर्थ से सेटिंग है। फ़्री फोटो बांटते हैं। टिप अलग से। लोग मस्त रहते हैं। सोचते हैं ऊपर वाला भेजिस है। क्या फोटो है।
जिसकी ब्लागिस्ट की दुकान कम चलती है वह अपनी दुकान बन्द करने की धमकी दे देता है। साथ ब्लागिस्ट अपने कुछ ग्राहक उसके यहां भेज देते हैं। जाओ भैया – शिवकुमार की दुकान से एक्सरे करवा लो। बेचारे दुखी हैं। भुनभुनाता अलग होगा- कहीं ऐसे दुकान चलती है। लिखेंगे डायरी कलमुंहे दुर्योधन की और सोचेंगे ग्राहक आयें। ग्राह्क दुर्योधन की डायरी काहे पढ़ेगा। खुद बनेगा नहीं दुर्योधन ?
कुछ फ़ुरसतिया टाइप के ब्लागर होते हैं उनको देखकर लगता है कि शायद आंख के अन्धे नाम नयन सुख इनके लिये ही खास तौर पर बनाया गया है। बात फ़ुरसत फ़ुर्सत की करते हैं और हर बार रोते हैं टाइम नहीं है। इनके समय की कमी के मगरमच्छी आंसू देखकर वे वीर बालक याद आते हैं जो महिलाओं / वंचितों की लड़ाई लड़ते हुये उनकी इज्जत उतारते रहते हैं ताकि वे हल्की रहें और प्रगति की राह में फ़ुर्र-फ़ुर्र उड़ें। इसे अंग्रेजी में कहते हैं- आधुनिक समाज का द्बंदात्मक प्रगतिवाद।
देखिये कित्ते मन से हम पढ़ा रहे थे आपको। लेकिन कोई शैतान घंटा बजा दिया। कायदे से पढ़ाने भी नहीं देते। इसीलिये देश में शिक्षा का स्तर हिंदी ब्लागिंग के स्तर से होड़ ले रहा है।
बहरहाल, हम बड़े दुखी मन से जा रहे हैं। कभी फिर बतायेंगे। सुनियेगा? :)
फ़ीड बैक बताइये कैसा लगा ये पाठ?

13 responses to “ब्लाग की हाफ़ लाइफ़ का हिंदी अनुवाद”

  1. आलोक
    बढ़िया था।
  2. Neeraj Rohilla
    अनूप जी,
    ज्ञान दद्दा ने ठीक से रेडियो एक्टिविटी नहीं पढी, आज पता चला है | हमे तो पूरा मसौदा मिल गया है एक पोस्ट ठेलने का, आप भी इन्तजार करें :-)
    “जिसकी ब्लागिस्ट की दुकान कम चलती है वह अपनी दुकान बन्द करने की धमकी दे देता है। साथ ब्लागिस्ट अपने कुछ ग्राहक उसके यहां भेज देते हैं। जाओ भैया – शिवकुमार की दुकान से एक्सरे करवा लो। बेचारे दुखी हैं। भुनभुनाता अलग होगा- कहीं ऐसे दुकान चलती है।”
    ऐसा लिखने के लिए चांपू आब्सेर्वेशन कहाँ से लाते हैं :-)
  3. आलोक पुराणिक
    जमाये रहिये
  4. Gyandutt Pandey
    यही गड़बड़ है आपके साथ। पाठशाला हमने खोलनी चाही। आपने उससे बड़े साइनबोर्ड के साथ कोचिंग क्लास शुरू कर दी। मोतीराम मास्टर से क्या खास पढ़ेंगे अब छोरे! मोतीराम मास्टर की आटाचक्की चल जाये तो ही गनीमत! :-)
  5. Ghost Buster
    जबरदस्त रहा जी हमेशा की तरह. ऐसी कोचिंग हो तो हम भी ब्लॉगिंग की ऐ बी सी डी जल्द ही सीख लेंगे.
  6. दिनेशराय द्विवेदी
    टीका अच्छी है। क्या ज्ञान जी और मेरे दादा जी की तरह आपके दादा जी भी कथावाचक थे।
  7. balkishan
    “कुछ लोग अपनी एक्सरे मशीन आसमान में उड़ाते हैं। ऊपर से ही फोटो खींचते हैं। गूगल अर्थ से सेटिंग है। फ़्री फोटो बांटते हैं। टिप अलग से। लोग मस्त रहते हैं। सोचते हैं ऊपर वाला भेजिस है। क्या फोटो है।”
    बड़ी बढ़िया फोटो खींची है.
    बाकी सब सुंदर जमाये है.
  8. Shiv Kumar Mishra
    कल ही पहली बार एक दिन में पाँच लोगों का एक्स रे किए. ऐसे ही ग्राहक मिलते रहे तो हमरी दुकान भी चल निकलेगी.
    पाठ तो बहुत शानदार था. अगली बार पाठ शुरू कीजियेगा तो शैतान लोगों से घंटा छुपा कर रख लीजियेगा….:-)
  9. प्रियंकर
    हम आपकी और ज्ञानजी दोनों की आटाचक्की से सापेक्षता का सिद्धांत समझने की जुगाड़ में हूं . अरे हम कौनो अभियंता थोड़े हैं . कला वर्ग के विद्यार्थी हैं,टैम लेकर धीरे-धीरे तसल्ली से समझेंगे . इससे नींव पुख्ता रहती है और दिमाग थिर (दुनिया ओहका जड़ अउर मोटा न जाने का का बोलती है).
  10. यूनुस
    आपका नहीं कानपुर के हवा-पानी का दोष है सर । जो ये पोसट लिखी गयी है ।
    हम क्‍या करें इलाहाबाद और कानपुर जैसा हवा पानी हमको मिलते ही नहीं ससुर ।
  11. समीर लाल
    मोतीराम मास्टर स्कूल में पढ़ाते है और आप घर पर ट्यूशन देते हैं. दोनों ही जरुरी हैं. पढ़ाई और पेपर लीक तो आपसे ही होगा.
    :)
  12. anitakumar
    हम भी बैठे हैं आप की क्लास में, आज तो घंटा बज गया कल हाजिर जरूर रहिएगा नये पाठ के साथ
  13. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] ब्लाग की हाफ़ लाइफ़ का हिंदी अनुवाद [...]

Monday, May 26, 2008

हमारा समाज ‘एन्टी ह्यूमर’ है

http://web.archive.org/web/20140419213104/http://hindini.com/fursatiya/archives/436

हमारा समाज ‘एन्टी ह्यूमर’ है


श्रीलाल शुक्ल
पिछ्ले दो दिन लखनऊ में रहे।
वहां तमाम लोगों से मिलना हुआ। श्रीलाल शुक्लजी, अखिलेशजी, प्रभात टंडन जी, कंचन और अपने बचपन के मित्र विकास से।
श्रीलाल शुक्ल जी के पिछले महीने एक-कमरे से दूसरे कमरे जाते हुये गिरने से कमर में फ़्रैक्चर हो गया। सो वे आजकल बिस्तर पर हैं।
शाम के समय उनके घर गया। बिस्तर पर लेटे हुये थे। धीरे-धीरे बात करते रहे।
बता रहे थे पिछले दो वर्ष से जब से एन्जियोप्लास्टी करायी है, लगातार कोई न कोई तकलीफ़ बनी रहती है। लिखना-पढ़ना छूट गया है। याददास्त पर भी असर पड़ा है। बात करते करते किसी बात की कड़ी छूट जाती है।
श्रीलाल जी मैं कई बार मिल चुका हूं। अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत सजग रहने वाले हैं वे। एकाध बार कहा भी कि -मैं बिस्तर पर पड़े-पड़े नहीं जाना चाहता।
हालचाल पूछते हुये मैंने बताया कि आज रागदरबारी की पाडकास्ट हुआ है तो वे मुस्कराये। अपनी नयी किताबों के बारे में बताया। उनके सारे लेखन के कुछ -कुछ अंश लेकर
एक किताब जल्द ही आने वाली है।
बात करते-करते हड्डी के डाक्टर आ गये। अपने कानमोबाइल में किसी से बतियाते हुये कमरे में घुसे। श्रीलाल जी को देखा और बताया कि कल एक्सरे करायेंगे और अगर सब कुछ सही हुआ तो चलने के लिये कहेंगे।
डाक्टर के जाने के बाद श्रीलाल जी ने डाक्टर के बारे में बताया। बताया कि हमारा परिवार कमजोर कमर वालों का परिवार है। परिवार के कई सदस्य इसी कमरे में इन्ही डाक्टर से अपनी कमर का इलाज करवा चुके हैं। डाक्टर अपनी तमाम व्यस्तता के बावजूद समय से उनके घर आते हैं और देखते हैं।
डाक्टर के बारे में बताते हुये उन्होंने बताया कि एक बार उन्होंने डाक्टर को उनकी सेवाओं केब भुगतान करने का प्रयास किया तो डाक्टर ने कहा- अगर मुझे पता होता कि आप इसका भुगतान करने की बात करेंगे तो मैं आपके घर नहीं आता।
श्रीलाल जी से अपनी बीमारी और कमजोर आवाज के बावजूद धीरे-धीरे बात करते रहे। गिरिराज किशोर जी का जिक्र मैंने उनको बताया कि गिरिराज की कोई नयी किताब आयी है। वे तुरन्त बोले -कित्ती मोटी है? :)

लेख का ड्राफ्ट
इसके बाद उन्होंने गिरिराजजी और तमाम लेखकों के बारे में कई संस्मरण सुनाये। गिरिराज की किताब पहला गिरमिटिया की तारीफ़ करते हुये कहा- गिरिराज जी ने इस किताब पर बहुत मेहनत से काम किया है।
मोटी किताबों का जिक्र करते हुये उन्होंने बताया कि ये ‘मुग्दर साहित्य’ हैं। आप एक किताब को एक हाथ में और दूसरी को दूसरे हाथ में लेकर कसरत कर सकते हैं। मुगदर की कमी आप किताबों से दूर कर सकते हैं।
युसुफ़ी साहब की किताब खोया पानी का भी जिक्र आया। उन्होंने उसकी बहुत तारीफ़ की। यह भी कहा कि उनकी बाकी किताबें भी पढ़ने का बहुत मन है लेकिन एक तो वे मिलीं नहीं और दूसरे अब पढ़ने-लिखने में तकलीफ़ होती है।
दो साल पहले एक उपन्यास लिखना शुरू किया था। रोज दो पेज लिखते थे। २० दिन काम करके चालीस पेज लिख लिये थे लेकिन इसके बाद बीमारी के कारण लिखना स्थगित हो गया। खुद लिखना हो नहीं पाता, बोल के लिखवाना जमता नहीं।
अमरकान्त जी की बीमारी का जिक्र भी आया। उनका कहना था कि हम लोग जब कोई साहित्यकार बीमार हो जाता है , सरकार से गुहार-पुकार करने लगते हैं। उसी समय हमें सरकार की संवेदन हीनता दिखती है। इसके अलावा तमाम लोग अस्पतालों में बेइलाज मर जाते हैं उनके लिये मूलभूत स्वास्थ्य की जरूरतें मुहैया कराने के लिये न कोई मुहिम चलाते हैं न कोई दबाब बनाते हैं।
बाते करते-करते हल्के-फ़ुल्के साहित्य की बात चली। श्रीलाल जी ने कहा- हिंदी में हल्का साहित्य बहुत कम है। हल्के-फ़ुल्के ,मजाकिया साहित्य, को लोग हल्के में लेते हैं। सब लोग पाण्डित्य झाड़ना चाहते हैं। :)
हमने पूछा -ऐसा क्यों है कि हल्का साहित्य कम लिखा गया?
श्रीलाल जी का कहना था- हमारा समाज ‘एन्टी ह्यूमर’ है। हम मजाक की बात पर चिढ़ जाते हैं। व्यंग्य -विनोद और आलोचना सहन नहीं कर पाते। राजेन्द्र यादव ने
हनुमान कह दिया तो उनकी क्या हालत हुयी! यही गमीनत रही कि बस पिटे नहीं। परसाईजी को लोगों ने उनके घर में पीट दिया। खुशवंत सिंह की एक कहानी ‘बैन’ हो गयी क्योंकि उसमें सरदारों का मजाक उड़ाया गया था।
मैंने पूछा- जब हमारे गांवों ने हंसी-मजाक की परम्परा है और वहीं से जुड़े लेखक लेखन करते हैं तो फ़िर हल्के साहित्य का अकाल क्यों है?
श्रीलालजी का कहना था- गांवों में जो हंसी-मजाक है , गाली-गलौज उसका प्रधान तत्व है। वहां बाप अपनी बिटिया के सामने मां-बहन की गालियां देता रहता है। लेखन में यह सब स्वतंत्रतायें नहीं होतीं। इसलिये गांव-समाज हंसी-मजाक प्रधान होते हुये भी हमारे साहित्य में ह्यूमर की कमी है।
इसी सिलसिले में श्रीलाल जी ने एक किताब का जिक्र किया। एनाटामी आफ़ आफ़सीन राइटिंग। इस किताब में विश्व में तमाम (आफ़सीन)अश्लील लेखन के बारे में जिक्र था।
अपनी बीमारी के चलते वे पद्मभूषण सम्मान लेने भी न जा पाये। हिंदी में यशपाल, भगवतीचरण वर्मा के बाद साहित्यकार की हैसियत से पद्म भूषण से सम्मानित होने वाले तीसरे साहित्यकार हैं श्रीलाल जी।
तमाम बातें होती रहीं। चलते समय उनकी एक फोटो लेने के लिये मैंने अनुरोध किया तो वे बोले- ठीक हो जाऊं तो फोटो लेना आकर। इस मुद्रा में फोटो खिंचवाकर मैं अपनी बीमारी का प्रचार नहीं करना चाहता। :)
दुआ करता हूं कि श्रीलाल शुक्ल जी जल्दी स्वस्थ हों और अपना अधूरा उपन्यास पूरा करें।

19 responses to “हमारा समाज ‘एन्टी ह्यूमर’ है”

  1. यूनुस
    बहुतय फुरसतिया पोस्‍ट ।
    अखिलेश जी का केवल जिक्र आया ।
    क्‍या पिच्‍चर अभी बाकी है दोस्‍त ।
    और हां एंटी-ह्यूमर वाली बात बेहद पसंद आई ।
  2. प्रमोद सिंह
    अरे, इत्‍ती सी बात जानने के लिए आपको लखनऊ तक की यात्रा करनी पड़ी? फ़ोन पर मुझसे पूछ लेते, मैं दस गालियां देकर सच्‍चायी प्रकट करता?
    वैसे ईश्‍वर श्रीलाल जी को जल्‍द कमर व दूसरे हिस्‍सों से दुरुस्‍त करें.
  3. कुश
    हम श्रीलाल शुक्ल जी के मंगल स्वास्थ्य की कामना करते है..
  4. काकेश
    बहुत सही रहा यह संस्मरण.समाज ऐंटी ह्यूमर होता जा रहा है इसका प्रमाण ब्लॉगजगत में ही मिल जायेगा.लोगों की अपने प्रति मजाक सहने की आदत कम होती जा रही है.
    युसूफी साहब की हिन्दी में एक ही किताब छ्पी है “खोया पानी”. दूसरी किताब “धन-यात्रा” की तैयारी चल रही हैं. कुछ दिनों पहले तुफैल जी से बात हो रही थी तो उन्होने बताया था कि वह मई में पाकिस्तान जाने की योजना बना रहे हैं और जल्द ही युसूफी साहब की नयी रचनाओं से हिन्दी पाठकों को परिचित करवायेंगे.
  5. vivek
    बुढापा सच में बेजार कर देता है, हालत देखकर लगता नहीं की अपने (शयद आखिरी) अगले उपन्यास में राग-दरबारी वाली बात ला पाएंगे. पर ‘राग-दरबारी’ के दम पर ही इनका नाम विश्व साहित्य में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा.
  6. Gyandutt Pandey
    बहुत सुन्दर और कीमती इण्टरव्यू। पक्का याद रहेगा। पढ़वाने के लिये बहुत धन्यवाद।
  7. आलोक पुराणिक
    श्रीलालजी को चरण स्पर्श
  8. Sanjeet Tripathi
    शुक्रिया जनाब!
  9. संजय बेंगाणी
    हम मजाक की बात पर चिढ़ जाते हैं। व्यंग्य -विनोद और आलोचना सहन नहीं कर पाते।
    एकदम सही कहा.
  10. balkishan
    मैं भी शुक्ल जी के जल्दी स्वस्थ होने कि कामना करता हूँ.
    और हमारा समाज भले ही एंटी हुय्मर हो पर आप मे तों प्लेंटी हुय्मेर है. क्यों?
  11. kanchan
    Shrilal ji ke vishay me jaankaari achchhi lagi..ishwar aise logo ko kashta de kar shrishti se bahut kuchh chin leta hai.
  12. bhuvnesh
    आपके बहाने श्रीलाल शुक्‍लजी के बारे में पता लगता रहता है….बहुत शुक्रिया.
    वैसे बहुत सही फरमाया उन्‍होंने….मेरे ख्‍याल में हमारा ह्यूमर भी ह्यूमर कम किसी का मजाक उड़ाने के लिए आशयित होता है….
    ईश्‍वर से उनके अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य की मंगलकामना.
  13. समीर लाल
    अच्छा लगा श्रीलाल जी से आपकी मुलाकात का विवरण. ईश्वर से उनके शीघ्र स्वास्थय लाभ की कामना है. उनका नया उपन्यास जल्द ही पूरा हो, शुभकामनायें.
    आभार आपका कि आपने अपनी मुलाकात का विवरण हमें पढ़वाया.
  14. नीरज रोहिल्ला
    सुकुलजी,
    आप चिन्ता न करें, ह्यूमर भी आयेगा और अपना रंग लेकर आयेगा ।
    श्रीलाल शुक्ला जी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करता हूँ ।
    विद्यार्थी जीवन में तो ह्यूमर भरकर होता है उसके बाद कुछ कम सा हो जाता है, अन्य लोगों से बात करके ऐसा महसूस किया है ।
  15. दिनेशराय द्विवेदी
    शुक्ल जी शीघ्र स्वस्थ हों। नया उपन्यास मिले पाठकों को। आजकल मुग्दर साहित्य की कमी है। ढूंढे नहीं मिलता।
  16. anitakumar
    श्री लाल जी के बारे में पढ़ कर अच्छा लगा। सही है बहुत कम लोग ह्युमर सहन कर पाते हैं खास कर अगर वो खुद निशाने पर हों पर हम नीरज रोहिल्ला की बात से आशावादी हैं। सही है विद्धार्थी जीवन में ह्युमर दोस्ती का एक खास अंग होता है। जरुरत है तो सिर्फ़ उस उम्र की मानसिकता को बनाए रखने की। ये बहुत ही अहम मुद्दा उठाया आप ने कि अगर समाज में ह्युमर है तो साहित्य में क्युं नहीं। ब्लोग जगत के खिलाड़ी इसमें अगुवाई कर सकते हैं। कुछ तो कर ही रहे हैं पर उनके भी और पैने होने की जरुरत है।
  17. satish yadav
    Bahoot achchi jaankaari di. Dhanyavaad.
  18. अन्य होंगे चरण हारे
    [...] माह जब हम लखनऊ गये थे तो श्रीलालशुक्ल जी और अखिलेशजी के अलावा कंचन और टंडनजी [...]
  19. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] हमारा समाज ‘एन्टी ह्यूमर’ है [...]

Wednesday, May 21, 2008

ऐसा अक्सर होता है….

http://web.archive.org/web/20140419215532/http://hindini.com/fursatiya/archives/435

ऐसा अक्सर होता है….

ऐसा आजकल रोज होता है।
रात देर आफ़िस से आते हैं। चाय-चुस्की के बीच घर वालों से बतियाते हैं। बतियाते क्या, अपने बारे में ही शिकायतें सुनते हैं। ये कहा था वो कहा था। ये नहीं किया वो नहीं हुआ।
सोचते हैं कुछ लिखा जाये ब्लाग पर। फ़िर पढ़ने में इतना मशगूल हो जाते हैं कि लिखना बिसरा जाता है। और फिर खाना खाकर लेटे-लेटे किताब/किताबें पढ़ते -पढ़ते सो जाते हैं।
सोते समय पढ़ने की आदत न जाने कब से है। चाहे जितना थके हों, चाहे जितना परेशान हों, चाहे जहां हों -कुछ न कुछ पढ़ने का मन हमेशा रहता है। चाहे आधा पन्ना पढ़ें। पढ़ लेते हैं तो सुकून मिलता है।
ऐसा नहीं है कि रोज कुछ नया पढ़ते हों या ऐसा कुछ दुर्लभ पढ़ते हों जो आपने या किसी और न पढ़ाअ हो। जो पसंदीदा है वही बारबार लौट-लौट के पढ़ते हैं। तमाम अनपढ़ी किताबें पढ़ने के इंतजार में अपनी बाट जोह रही हैं।
यह बेवकूफ़ी की बात भले लगे, लगेगी ही(मुझे खुद लगती है) लेकिन मैं अक्सर ऐसा सोचता हूं कि मेरे घर में घर के सदस्यों के अलावा सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण चीज अगर कुछ है तो वो हैं मेरी किताबें। और सब कुछ चला जाये और किताबें बचीं रहे तो लगेगा कि कुछ खास नहीं गया।
इसके बावजूद मैं किताबें ठीक से नहीं रखता। सजा के , करीने से रखने की आदत नहीं। इधर-उधर न जाने किधर-किधर पड़ी रहती हैं। जहां पढ़ते हैं वहीं छोड़ देते हैं। लेकिन कहीं जाती नहीं। तुरन्त मिल जाती हैं। कभी-कभी पत्नी किताबें करीने से आलमारी में लगा देती हैं। तब अगर मुझे नहीं मिलती तो थोड़ा , औकात भर, झल्लाता हूं- तुम्हारा तो बस चले तो हमें भी अलमारी में सजा दो। :)
किताबों बेतरतीब रहती हैं तो मिल जाती हैं। कायदे से रखने में बिला जाती हैं। कायदे से रखने में खोजना पड़ता है। यह अजीब विरोधाभास है न! शायद अपने अस्त-व्यस्त , लस्टम-पस्टम व्यक्तित्व को सही साबित करने का लचर बहाना।
तमाम चीजे खोयीं हैं। एक पासबुक, कुछ सर्टिफ़िकेट, जरूरी कागज और न जाने क्या अगड़म-बगड़म। लेकिन लगता है सब मिल जायेंगे। कहीं नहीं गये हैं। घर में ही हैं। कई को इसीलिये खोजने की कोशिश भी नहीं करता क्योंकि डर है कि यह ‘लगना’ कहीं छलावा न साबित हो। :)
अरे, ई क्या हुआ। हम रात की कथा बताते ही रह गये और इधर सुबह हो गयी। जो कहना चाहते थे वो कह ही न पाये। :)
हां, तो होता यह है कि सबेरे आजकल जल्दी उठ जाते हैं तो सोचते हैं कि अपनी आज की पोस्ट लिखें। फिर सोचते हैं कि देखें और लोगों ने क्या लिखा? ज्ञानजी और आलोक पुराणिक ने क्या कहा-सुना? उनके ब्लाग पर और लोगों ने क्या टिपियाया है। इसी में आठ बज जाते हैं और आफ़िस जाने का समय हो जाता है। तब मन में लगता है एक पोस्ट घसीट दी जाये। अक्सर नहीं कर पाते। :)
फिर शाम से वही कहानी दोहराई जाती है।
ऐसा रोज भले न हो लेकिन अक्सर होता है।
आपके साथ भी क्या ऐसैइच होता है?

22 responses to “ऐसा अक्सर होता है….”

  1. mehek
    hota hai aisa hi hota hai,dusron ke post padhne aur tippani padhne mein anand bahut aata hai aur khud kuch bhi nahi likh pate:);).
  2. आलोक पुराणिक
    ये सारे क्रियेटिव बंदों के लक्षण हैं
    बहुत व्यवस्थित लोग बहुत महान क्रियेटिव लोग नहीं होते। अव्यवस्था क्रियेटिविटी की पहली शर्त है।
    पत्नी को समझाइये कि वह आपको महानता और क्रियेटिवटी के रास्ते पर देखना चाहती हैं या सिर्फ साफ आलमारीयुक्त पति।
    जमाये रहिये।
  3. मुक्ति
    चाय कौन बनाता है?…:-)
  4. काकेश
    जी ऐसाइच होता है.हमारे साथ रोज ऐसाइच हो रहा है. किताबों के बारे में हमारी पत्नी जी से अक्सर लड़ाई होती है. हमें फैली हुई किताबें अच्छी लगती है. सामने रहती हैं तो पढ़ने लग जाते हैं और पत्नी जी उन्हे अलमारी में रख देती हैं. यदि कभी पढ़ने की सुध आ गयी तो फिर उन्ही से मांगनी पड़ती हैं.
  5. bhuvnesh
    हा हा….सही कहा अक्‍सर मैं भी सोचता हूं कि कुछ लिखा जाए पर पहले बाकी के ब्‍लॉग्‍स पढ़ लें और इधर-उधर की खाक छान लें फिर फुर्सत से लिखेंगे.
    इस चक्‍कर में सिर्फ पाठक बनकर ही संतोष करना पड़ रहा है.
  6. प्रतीक पाण्डे
    अगर आपके साथ ऐसा हो रहा है, तो हम बेचारों का क्या होगा? पोस्ट लिखिए धड़ाधड़, ताकि हम भी कुछ प्रेरणा ले सकें। :)
  7. kirtish
    ऐसैइच होता है सरजी. :D
  8. प्रत्यक्षा
    कौन सा पढ़ा पढ़ रहे हैं आजकल ?
  9. Ghost Buster
    कहा तो यही जाता है कि किताबें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र हैं. तो अगर आपको घर में परिवारिजनों के बाद सबसे महत्वपूर्ण यही लगती हैं तो इसमें बेवकूफी की कोई बात हमें तो नहीं लगती. हमारी किताबें तो अलमारियों में बड़े करीने से सजी रहती हैं, इतनी ज्यादा कि निकाल कर पढ़ने का समय ही नहीं मिलता. नयी नयी जुड़ती रहती हैं और पुरानी वहीं की वहीं. अब आपकी तरह अस्त-व्यस्त करके देखते हैं, शायद बात बन जाए.
  10. Gyan Dutt Pandey
    यही तो हम कहना चाह रहे थे। डिट्टो!
    और आपने हमारे स्टाइल की मुन्नी पोस्ट लिखना क्यों शुरू कर दिया जी? इनमें वो मजा नहीं आता।
  11. यूनुस
    फुरसतिया जी
    हमारी आपबीती अपने नाम से छापकर आपने ठीक नहीं किया ।
    जे बहुत बेईमानी है ।
    आपसे किसने कहा कि ये आपकी आपबीती है ।
    हंय जी ।
  12. दिनेशराय द्विवेदी
    आप ने अपना नहीं सब का हाल सुना दिया पर किताबें अगर तरतीब से रखी हों तो घर में सब पढ़ सकते हैं। यह होना चाहिए। आप भाभी को या किसी और को पुस्तकालयाध्यक्ष क्यों नहीं बना देते इस से औरों के साथ आप को भी आसानी हो जाएगी।
  13. Shiv Kumar Mishra
    आप एक दिन के लिए इस कार्क्रम को स्थगित कर एक फुरसतिया पोस्ट लिखिए भइया….वैसे हमारे साथ भी ऐसा ही होता है.
  14. abha
    अपन के साथ भी ऐसा होता है पर देर सबेर चीजें मिल जाती वही भ्रम वाली बतिया मै भी नहीं ढूढती और क्या कहें ,कहेगें यही कि इ पूरी पोस्ट अपनी लग रही है…….
  15. anitakumar
    चलिए सब की प्रतिक्रियाएं पढ़ कर एक बात की तो शांती हो गयी मन में कि अगर कभी कोई ब्लोगर मित्र हमारे घर अचानक आ गया तो हमें अपने घर के रद्दी की दुकान दिखने पर कोई शर्म नहीं आयेगी। अपना भी हाल तेरे जैसा है क्या करे हम भी लाइफ़ स्टाइल ऐसा है…।:)
  16. Dr.Anurag Arya
    बिल्कुल ऐसा ही होता है श्रीमान जी…
  17. समीर लाल
    सबकी राम कहानी कह गये आप तो. :)
    पढ़िये पढ़िये, खूब मन लगाकर पढ़िये.
  18. आशा जोगलेकर
    पहली बार आपके ब्लॉग पर आई बडा मजा़ आया । सबके साथ एसा ही होता हे पर फिर भी लिखने का वक्त भी निकाल ही लेते हैं ।
  19. रजनी भार्गव
    आप क्यों हमारी कैटगरी में शामिल हो रहे हैं। हमारे साथ तो ये हमेशा होता है।
  20. ajay dandhanadhan
    kitabbe agar bhikri nahi hongi to pata kaise chalega ki abhi tak kaun si kitab padni baki hai? aur agar kitabye padhi nahi jaingee , tho sabdho ka bhandar kaise …….
    lage raho fursathiya bhai…..
  21. डा० अमर कुमार
    एक मैं ही अपवाद हूँ क्या ?
    मेरी लगभग 300 किताबें एक ज़गह पर सजा कर रखने की वज़ह
    से दीमकें चट कर गयीं ।शायद किसी शोध में उनको मेरा संग्रह
    खंगालना पड़ा होगा । किंतु दुःख बहुत हुआ जब रामप्रसाद बिस्मिल
    की ज़ेल में आत्मकथा भी साफ़ कर गयीं । सोचा होगा क्रांतिकारियों
    की जीवनी का तुम क्या करोगे ?
    लेकिन मैं अब ज़्यादा सजा कर किताबों की कँटिया लगा कर बैठा हूँ ।
    कभी तो घूमफिर कर टोह लेने तो आयेंगी, बेचारी विद्वान दीमकें !
  22. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] ऐसा अक्सर होता है…. [...]