Friday, October 18, 2013

गड़े खजाने को खोजता समाज

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गड़े खजाने को खोजता समाज

सोते बाबाबाबा जी को सपना आया है। जमीन में सोना दबा है। सोना निकालने के लिये पुरातत्व विभाग बरसाती नदी सा उमड़ पड़ा है। लिये फ़ावड़ा, केंलवा, कुदाल खुदाई अभियान चालू हो गया है। खजाने के दावेदार हाजिर हो गये हैं। आंखे बेचैन हैं दीदार के लिये। आसपास के लोग खजाना देखने के भागे चले आ रहे हैं। जिसे देखो सुने-सुनाये किस्से दोहरा रहा हैं। स्कूलों ने भी छुट्टी कर दी है अपने यहां। जाओ बेट्टा खजाना देख के आओ। स्कूल कहीं भागा थोड़ी जा रहा है।
खुदाई स्थल के आसपास मेले सा माहौल बन गया है। चाय की दुकाने खुल गयीं हैं, पकौड़ी छन रही हैं, जलेबी कड़ाही में तैरने लगीं हैं। खजाने के इंतजार में लोगों के हाल- अंखड़ियां झाईं पड़ी पंथ निहारि-निहारि टाइप हो रहे हैं। बाबा जी जब बोले हैं तो खजाना मिलेगा कईसे नहीं! मिलेगा तो है ही। बस समय की बात है। बाबाजी कोई गलत थोड़े ही बोलेंगे।
मजेदार है अपना देश। हजार टन सोना दबा के चले गये राजाजी। लड़ रहे थे अंग्रेजों के खिलाफ़। हजार टन सोना दबाये धरे रहे और पराये देश के हुक्मरान उनके ही देश के सिपाहियों को नौकर बनाकर उनको निपटाय दिेये। जित्ता सोना उनके पास था उत्ता अगर सिपाहियों को देकर अपनी फ़ौज में भर्ती कर लेते तो अंग्रेज डेढ़ दिन में निपटा के फ़ांसी पर न लटका न पाते।
डेढ़ सौ साल बाद बाबाजी के सपने पर खुदाई हो रही है। मिलता है कि नहीं यह तो समय बतायेगा। लेकिन यह सारा कुछ अपने लोगों के दीवालियेपन की कहानी है। सोचा जा रहा है कि सोना मिलते ही सब कुछ बल्ले-बल्ले हो जायेगा। पेट्रोल पांच रुपये लीटर मिलने लगेगा, अनाज दो रुपये किलो। मंहगाई देश बदर हो जायेगी, भुखमरी आत्महत्या कर लेगी। गैरबराबरी का नामोनिशान मिट जायेगा।
देश की सारी समस्यायें भुखमरी, मंहगाई बेचारी थरथर कांप रही हैं। इधर खजाना मिला नहीं उधर उनकी गरदन हलाक। नामोनिशान मिट जायेगा उनका देश से।
भ्रष्टाचार इस सबसे बेपरवाह किसी कोने में खड़ा मुस्करा रहा होगा। अगले घोटाले का नाम सोच रहा होगा- बाबा घोटाला, खुदाई घोटाला, खजाना घोटाला या फ़िर सपना घोटाला।
सोना मिलते ही जिस तरह तमाम समस्याओं के हल की बात कही जा रही है उससे लगता है कि भारतीय समाज के हाल मानसिक रूप में उस फ़टेहाल परिवार की तरह हो गये हैं जो घरैतिन के गहने कपड़े बेचकर समस्याओं के तात्कालिक हल खोजने के उपाय सोचता है।
खजानाखजाने की कीमत कई लाख करोड़ आंकी गयी है। जो खजाना जमीन के अंदर गड़ा हो सकता है उसको खोदने में कुछ लोग लगे हैं। बाकी निठल्ले ताक रहे हैं। करोड़ों लोग ऐसे ही निठल्ले बैठे किसी चमत्कार की आशा में दिन गुजारते रहते हैं। न्यूनतन मजूरी अगर तीन सौ रुपया माने तो दस करोड़ लोगों के निठल्लेपन की रोज की कीमत 3000 करोड़ होगी। साल भर के निठल्लेपन की कीमत लाख करोड़। सैकड़ों सालों से हम ऐसे ही निठल्ले बैठे इंतजार कर रहे हैं कहीं कुछ खुदेगा और हमारा कल्याण होगा। जब अंतत: कल्याण होना ही है तो ससुर काहे को मेहनत की जाये।
खुदा न खास्ता अगर खजाना मिला तो सोना मिलते ही देश में हर विभाग में ’सपना बाबा’ की भर्ती चालू हो जायेगी। बाबा लोगों का काम सिर्फ़ सपना देखना होगा। सपने पर अमल करके विभाग फ़टाफ़ट कार्यवाही करेंगे। इनकम टैक्स वाले ’सपना बाबा’ छिपे हुये काले धन का सपना देखेंगे। कोयला मंत्रालय वाले ’सपना बाबा’ खोयी हुयी फ़ाइलों को। सेल्स टैक्स वाले बाबा ट्रकों में छिपाकर ले जाते सामान का सपना देखेंगे। फ़ौरन माल पकड़ा जायेगा। फ़ौज वाले ’सपना बाबा’ बंकर में बैठकर सपना देखेंगे और बतायेंगे कि घुसपैठ किधर से हो रही है। बन्दूकें किधर ताननी हैं। किसी घपले की बात चलेगी तो बाबाजी बुलाये जायेंगे। बाबा जी सपना देखकर बतायेंगे कि घपला हुआ है कि नहीं? बाबा कहेंगे हुआ है तब FIR दर्ज होगी। नहीं तो नहीं। लोग हल्ला मचायेंगे कि घपला हुआ है भाई । ये देखो सबूत। लेकिन उनको जबाब दिया जायेगा – अरे भाई सबूत सब ठीक है लेकिन जब बाबाजी को सपना नहीं आया घपले का तो कैसे मान लिया जाये गड़बड़ी हुई है। कैसे लिख लें FIR? जाओ भागो, सोने दो।
देश के विश्वविद्यालयों में सपने के पाठ्यक्रम लागू हो जायेंगे। सपने पर एम.ए., पी.एच.डी, होगी। सबसे बढिया सपना देखने वालने ’सपना बाबा’ को शेखचिल्ली सम्मान से नवाजा जायेगा। हर तरफ़ सपने ही सपने होगे। हकीकत की ऐसी-तैसी हो जायेगी।
पहले के महापुरुष समाज निर्माण का सपना देखने थे और अमल के लिये पुरुषार्थ की बात करते थे। आज के समाज में निठल्ले बाबा खजाने का सपना देख रहे हैं और पुरुषार्थी उसे खोदने के लिये पसीना बहा रहे हैं। हरामखोरी ने पुरुषार्थ को पटखनी दे दी है। पुरुषार्थ सर झुकाये निठल्ले की गुलामी कर रहा है।
बहुत हुआ यार अब चलते हैं। फ़टाक से सोते हैं। क्या पता अपन को भी सपने में कोई खजाना दिख जाये।
अनूप शुक्ल

12 responses to “गड़े खजाने को खोजता समाज”

  1. संतोष त्रिवेदी
    खजाने की खुदाई वहाँ हो रही है जहाँ पक्का नहीं है कि निकले।
    स्विस बैंक के खजाने को सरकार नहीं खोल रही,जहाँ मिलना तय है:-)
  2. रवि
    हा हा हा…
    ऐसे ही एक बाबा यहीं कहीं आसपास के शहर में किसी व्यापारी के यहां पहुंचे और बताया कि उनके घर में खजाना गड़ा है. व्यापारी ने अपने सामने घर को खुदवाया – भय था कि खोदने वाले माल गायब न कर दें – तो खोदते खोदते आधा मकान ही धराशायी हो गया और वे व्यापारी और बाबा दोनों ही जमींदोज हो गए!
    यह वाकया तो सोच और आस्था के दीवालिये-पन की पराकाष्ठा को भी लांघ गया है!
    रवि की हालिया प्रविष्टी..इन विशिष्ट मक्खियों मच्छरों के हमलों से तो आप भी नहीं बच पाएंगे!
  3. ashok kumar avasthi
    नेहरु जी की मेरे सपनो का भारत याद आ गई. अब बाबा जी के सपनो का चैप्टर लिखा जायेगा. इंडियन संविधान में साइंटिफिक टेम्पर डेवेलोप करने की बात है.सरकार खुदाई करा रही है. आर्थिक सम्पन्नता के लिए फाइव इयर प्लान्निंग्स चल रही हैं .लेकिन हमारे रहनुमा दिवा स्वप्ना देख रहें हैं.इन्ही विरोधाभान्सो का नाम है इंडिया यानि भारत.
  4. देवांशु निगम
    पता नही क्या पागलपन है | सही कहा “हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तान क्या होगा” |
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..The “Talented” Culprit Since 1992
  5. Abhishek Chaturvedi
    बाबाजी के बाद आजकल सभी लोग सपने में सोना देख रहे हैं और सोने की चाह में ठीक से सो तक नहीं पा रहे हैं. सपना बाबा बनने के लिए अभी से तैय्यारी शुरू कर दी है.
  6. arvind mishra
    आप भी तो एक पोस्ट की जुगाड़ कर लिए – :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या…..(तीन दशकीय सेवा संस्मरण- 5)
    1. sanjay jha
      (:(:(:
      प्रणाम.
  7. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    हा हा हा…बढ़िया है। हमने भी अभी ऐसा ही कुछ लिखा था जी….
    सोना नहीं मिला तो बुरा होगा। मिल गया तो बहुत ही बुरा होगा। भगवान करे न मिले। बुरा हो, अधिक बुरा न हो। बहुत बुरा ऐसे होगा कि कल श्रीमति जी को भी सपना आ सकता है। चार-छः फुट का आंगन बचा है, उसकी भी खुदाई करनी पड़ सकती है। नये-नये बाबाओं और नए-नए अंधविश्वासी भक्तों की ऐसी फौज खड़ी हो जायेगी मुल्क में कि जीना दूभर हो जायेगा। पता चला जिसके पास जितनी जमीन है उसी की खुदाई कर रहा है। बड़े-बड़े साहित्यकार, वैज्ञानिक घर के दबाव को न झेल पाने के कारण कलम छोड़ फावड़े लिए फूट-फूट कर रोते नज़र आ सकते हैं। सीमा पर तैनात सैनिक कह सकते हैं- चलो अब गांव चलें..सुना है अपनी जमीन में खजाना छुपा है। कृष्ण का कर्मयोग, अंधविश्वासियों के आगे फीका पड़ जायेगा। भाइयों में झगड़े, पती-पत्नी में नये प्रकार के विवाद होंगे। नेता अपनी जनता को विश्वास दिलाते हांफते नज़र आयेंगे…हाँ हाँ मानता हूँ। तुम्हारे वाले गांव के बाबा बड़े सच्चे बाबा हैं। उनको भी सपना आया है। तुम्हारी वाली जमीन की भी खुदाई का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा चुका है। नये-नये नारे जन्म लेंगे…तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हारे गांव में खुदाई कराऊँगा। भारी अराजकता का सामना करना पड़ सकता है। पुष्ट वैज्ञानिक प्रमाणों के बिना, मात्र सपने के आधार पर ही सोने की लालच में यदि यह खुदाई की जा रही है तो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। सारी ‘खुदाई’ सोने पर सिमट कर रह जायेगी। सुना था कलयुग सोने पर चढ़कर आया है। लगता है सही सुना था।
  8. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    मैंने आपकी यह पोस्ट फेसबुक पर सटायी तो नक्सलवाद के प्रति उदार दृष्टि रखने वाले एक खूंखार बुद्धिजीवी ने मुझे संघी करार दिया। कह रहे थे कि इस प्रकरण पर मीडिया का ध्यान बंट जाने पर मोदी का समाचार कम आ रहा है जिसके कारण मैं खीझ गया हूँ। :)
    अब आप अपनी चिन्ता का टोकरा कहाँ ले जाएंगे? उन्नाव के ग्रामीण अंचल के उन अनपढ़ लोगों तक या तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के पास जो इतनी दूर की कौड़ी लाता है कि जी भन्ना जाता है। वैसे आपने इस प्रभुवर्ग की जाहिली की अच्छी खबर ली है।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..दशहरे के दिशाशूल
  9. amit kumar srivastava
    ‘टी वी’ पैसा देकर न खरीदा होता तो अब तक फोड़ दिया होता । शर्म आती है सरकारी व्यवस्था देख कर । बाबा तो बाबा है ,उसका तो धर्म है लोगो को गुमराह करना ,पर सरकार भी गुमराह हो गई ..ताज्जुब है ।
  10. प्रवीण पाण्डेय
    इतना धन रहता तो फौज खड़ी कर लिये होते।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कितनी पहचानें
  11. Anonymous
    बहुत बढ़िया ……..

Sunday, October 13, 2013

रावण जी आज होते तो….

http://web.archive.org/web/20140420082702/http://hindini.com/fursatiya/archives/4958

रावण जी आज होते तो….

रावणआज दशहरा है। आज जगह-जगह रावण का पुतला फ़ूंका जाता है। भलाई की बुराई पर जीत का जश्न मनाया जाता है। रावण का पुतला जलाकर लोग खुश हो लेते हैं कि बुराई स्वाहा हो गयी। साल भर की छुट्टी। अब अगले साल फ़िर निपटा जायेगा बुराई से।
अब राम और रावण तो हमारे पूर्वज थे। उनका आपस में क्या बवाल था ये तो वे लोग ही जान सकते हैं। लेकिन सुनी-सुनाई बातों को अगर सच माने तो रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया था। जिसके चलते पहले तो राम जी बहुत रोये ताकि लोग उनको पत्नी को प्रेम करने वाला आदर्श पति मानें। इसके बाद हनुमान, सुग्रीव आदि की मदद से रावण पर हमला कर लिया और उनको मार डाला।
अब ये बात तो पुरानी है तो कहा नहीं जा सकता कि उस समय के लिहाज से क्या किसी स्त्री की अपहरण की सजा मौत रही होगी? आज के हिसाब से तो देखा जाये तो सजा जरा ज्यादा है। स्त्री से दुराचार तक की सजा सात है मात्र। जबकि रावण जी तो सीता के साथ फ़ुल इज्जत के साथ पेश आये। खाने-पीने का ख्याल रखा। अशोक वाटिका नाम फ़ार्म हाउस में रखा। इत्ती सुविधायें तो बड़े-बड़े वीआईपी कैदियों तक को नहीं मिलतीं। त्रिजटा नामक के सेविका भी उनके लिये रखी। इत्ती सुविधा देने के बावजूद उनको मार दिया राम जी ने! तो भाई ये उन दोनों पूर्वजों के बीच के मामला है हम कुछ कह नहीं सकते लेकिन लगता है कुछ सजा ज्यादा हो गयी।
हमें तो ये लगता है राम जी के इरादे कुछ और थे और उन्होंने बताये कुछ और। कुछ-कुछ अमेरिका की तरह हिसाब था उनका। जैसे अमेरिका हर देश में शांति स्थापना के लिये बमवर्षाता रहता है वैसे ही राम जी ने भी रावण को बहाने से मार दिया। रामजी के इरादे कुछ और भी रहे होंगे। जैसे अमेरिका हर देश की सरकारें उलट-पुलट कर अपने चेले-पिट्ठू बैठाता रहता है वैसे ही रामजी ने भी किया। पहले बालि को निपटाकर सुग्रीव को गद्दी दिलाई। फ़िर लंका में आग लगवा दी ताकि वहां अस्थिरता हो जाये और फ़िर धीरे से रावण को निपटाकर विभीषण को गद्दी पर बैठा दिया। जैसे आजकल अमेरिका अरब देशों के तेल पर कब्जे की नीयत से उलट-पुलट करता है उसी तरह शायद राम जी की नजर लंका के सोने पर रही हो। रावण को मारने के पहले उसको कायदे से बदनाम करवा दिया ताकि उसके मारे जाने पर ज्यादा हल्ला न मचे।
दशहरालगता है कि उस समय के मानवाधिकार वाले भी कमजोर रहे होंगे। नहीं तो खाली एक स्त्री के अपहरण के अपराध में किसी को खुले आम मारने पर तो वे आसमान सर पर उठा लेते और टांगे-टांगे घूमते रहते। जबकि उसी समय में तमाम देवताओं ने ॠषियों ने छल-बल से न जाने कित्ती स्त्रियों से दुराचार किया लेकिन उनको कोई सजा नहीं मिली। यह सजा का भेदभाव है।
यह भी हो सकता है कि राम जी ने रावण को इसलिये मार दिया हो जिससे कि उन्होंने जो खर दूषण, ताड़का, सुबाहु को मारा, सूर्पणखा की नाक काट दी और रावण के दूसरे रिश्तेदारों को निपटा दिया उसकी फ़ाइलें रावण न खुलवा सकें। उनको लग गया होगा कि अगर कहीं रावण जिन्दा बचा रहा और बाद में इन सब मामलों की सच्चाई सामने आई तो उनका ’मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनने के अभियान में बाधा आ सकती है।
सीता जी के प्रति राम के अगाध प्रेम की बात भी इसलिये कम समझ में आती है क्योंकि अगर खाली सीता के प्रति लगाव के चलते राम ने रावण को मारा होता तो बाद में सीता जी को त्यागते नहीं। वह भी तब जब सीता जी गर्भवती थीं। आजकल की सरकारें तक मातृत्व/पितृत्व अवकाश देती हैं स्त्रियों की देखभाल के लिये। ऐसे में रामजी ने उनको जंगल भेज दिया। यह कुछ समझ में नहीं आया मामला। ये अच्छा नहीं किया राम जी ने। वो तो कहो सीता जी भले घर की थीं वर्ना इसके चलते और बाद में सीता जी की आत्महत्या के चलते उनको लेने के देने पड़ जाते।
अब जबकि हजारों साल बीत गये होंगे इस घटना को तो कुछ कहा नहीं जा सकता कि सच क्या था लेकिन लगता यही है कि रावण के साथ कुछ ज्यादती हुयी। आज के समय में इत्ते बड़े अपराध की सजा हद से हद दो-तीन साल होती। वह भी पचीस तीस साल मुकदमा चलने के बाद। आज के समय में होता तो रावण देश के सबसे बढिया वकील करता और वकील साबित कर देता कि रावण सीता की रक्षा के लिये उनको अपने फ़ार्म हाउस में ले आया। उसका कोई गलत इरादा नहीं था। हो सकता है वो अपने फ़ार्म हाउस का खर्चा राम से वसूल लेता। क्या पता काटजू जी टाइप का कोई जज होता तो वो राम जी को चार बातें भी सुनाता कि अपनी पत्नी की देखभाल ठीक से नहीं कर पाते तो उनको साथ में लेकर जंगल क्यों आये।
लोग कहते हैं कि अंत में सत्य की विजय होती है। लेकिन हमें तो यही लगता है कि जो अंत में होता है उसी को लोग सत्य मान लेते हैं। यही रावण जी के साथ हुआ। बेचारे छोटे अपराध में बड़ी सजा पा गये। विद्वान बेचारा, बदनाम होकर मरा। रावण के मुकाबले कई गुना बड़े अपराधी उसको बुराई का प्रतीक मानकर जलाते हैं। पर्यावरण का नुकसान करते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत का गाना गाते हैं।
लगता है इस बार रावण के साथ हुये अन्याय का आभास हुआ आसमान को इसीलिये पानी बरसा है। जगह-जगह रावण के पुतले भीग गये। समन्दर भी गवाह रहा था रावण के साथ हुये अन्याय का सो वह भी गरजता हुआ तूफ़ान के रूप में आया है रावण की दुर्दशा बचाने।
आपको क्या लगता है?

11 responses to “रावण जी आज होते तो….”

  1. देवांशु निगम
    हमको तो ई लग रहा है कि कोई तगड़ा विचार-विमर्श (लड़ाई – झगड़े का शुद्ध भाषा में नाम)शुरू होने वाला है :) :)
    बाकी, सीता जी के त्याग वाले मुद्दे पर राम चन्द्र जी का पक्ष मुझे समझ नहीं आता |
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..The “Talented” Culprit Since 1992
  2. संतोष त्रिवेदी
    बहुतै सटीक ठोंके हैं आज के राम को :-)
  3. rachana tripathi
    कौन जाने कहीं इससे भी बड़का रावण तैयार हो रहा हो. बादल उसी की भविष्यवाणी कर रहा हो
    rachana tripathi की हालिया प्रविष्टी..राजनीति अब शरीफों के लिए नहीं रही…
  4. प्रवीण पाण्डेय
    सच में, सत्य कुछ और लिखा गया होता, रावणजी अपना दृष्टिकोण अवश्य बताते। ओसामाजी को अवसर मिला भी था।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कानपुर से बंगलोर
  5. arvind mishra
    रावण की परम्परा साबित है
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..और ज़िंदगी चल पडी …..(नौकरी के तीस वर्ष-श्रृंखला )
  6. arvind mishra
    अध्यात्म की नायाब भेंट
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..और ज़िंदगी चल पडी …..(नौकरी के तीस वर्ष-श्रृंखला )
  7. PN Subramanian
    बहुत सुन्दर. अब यह बहस का मुद्दा बन गया है और चारों तरफ हो भी रही है.
    PN Subramanian की हालिया प्रविष्टी..ब्रेड फ्रुट ट्री – हमारा कल्प वृक्ष
  8. अन्तर सोहिल
    यही लगता है कि
    नायक विजयी नहीं होता, बल्कि विजयी ही नायक होता है।
    कहानी या इतिहास तो बाद में लिखा जाता है।
    प्रणाम स्वीकार करें
  9. Abhishek
    मीडिया -विडिया भी मिला के मामला बहुत टीआरपी वाला बनता :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..संयोग
  10. Anonymous
    दशहरा है। आज जगह-जगह रावण
    का पुतला फ़ूंका जाता है। भलाई की बुराई पर
    जीत का जश्न मनाया जाता है। रावण
    का पुतला जलाकर लोग खुश हो लेते हैं कि बुराई
    स्वाहा हो गयी। साल भर की छुट्टी। अब अगले
    साल फ़िर निपटा जायेगा बुराई से।
    अब राम और रावण तो हमारे पूर्वज थे। उनका आपस
    में क्या बवाल था ये तो वे लोग ही जान सकते हैं।
    लेकिन सुनी-सुनाई बातों को अगर सच माने
    तो रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर
    लिया था। जिसके चलते पहले तो राम जी बहुत रोये
    ताकि लोग उनको पत्नी को प्रेम करने
    वाला आदर्श पति मानें। इसके बाद हनुमान, सुग्रीव
    आदि की मदद से रावण पर हमला कर लिया और
    उनको मार डाला।
    अब ये बात तो पुरानी है
    तो कहा नहीं जा सकता कि उस समय के लिहाज
    से क्या किसी स्त्री की अपहरण की सजा मौत
    रही होगी? आज के हिसाब से तो देखा जाये
    तो सजा जरा ज्यादा है। स्त्री से दुराचार तक
    की सजा सात है मात्र। जबकि रावण
    जी तो सीता के साथ फ़ुल इज्जत के साथ पेश आये।
    खाने-पीने का ख्याल रखा। अशोक वाटिका नाम
    फ़ार्म हाउस में रखा। इत्ती सुविधायें तो बड़े-बड़े
    वीआईपी कैदियों तक को नहीं मिलतीं।
    त्रिजटा नामक के सेविका भी उनके लिये रखी।
    इत्ती सुविधा देने के बावजूद उनको मार दिया राम
    जी ने! तो भाई ये उन दोनों पूर्वजों के बीच के
    मामला है हम कुछ कह नहीं सकते लेकिन लगता है
    कुछ सजा ज्यादा हो गयी।
    हमें तो ये लगता है राम जी के इरादे कुछ और थे और
    उन्होंने बताये कुछ और। कुछ-कुछ अमेरिका की तरह
    हिसाब था उनका। जैसे अमेरिका हर देश में
    शांति स्थापना के लिये बमवर्षाता रहता है वैसे
    ही राम जी ने भी रावण को बहाने से मार दिया।
    रामजी के इरादे कुछ और भी रहे होंगे। जैसे
    अमेरिका हर देश की सरकारें उलट-पुलट कर अपने
    चेले-पिट्ठू बैठाता रहता है वैसे ही रामजी ने
    भी किया। पहले बालि को निपटाकर सुग्रीव
    को गद्दी दिलाई। फ़िर लंका में आग
    लगवा दी ताकि वहां अस्थिरता हो जाये और
    फ़िर धीरे से रावण को निपटाकर विभीषण
    को गद्दी पर बैठा दिया। जैसे आजकल
    अमेरिका अरब देशों के तेल पर कब्जे की नीयत से
    उलट-पुलट करता है उसी तरह शायद राम
    जी की नजर लंका के सोने पर रही हो। रावण
    को मारने के पहले उसको कायदे से बदनाम
    करवा दिया ताकि उसके मारे जाने पर
    ज्यादा हल्ला न मचे।
    लगता है कि उस समय के मानवाधिकार वाले
    भी कमजोर रहे होंगे। नहीं तो खाली एक स्त्री के
    अपहरण के अपराध में किसी को खुले आम मारने पर
    तो वे आसमान सर पर उठा लेते और टांगे-टांगे घूमते
    रहते। जबकि उसी समय में तमाम देवताओं ने
    ॠषियों ने छल-बल से न जाने कित्ती स्त्रियों से
    दुराचार किया लेकिन उनको कोई
    सजा नहीं मिली। यह सजा का भेदभाव है।
    यह भी हो सकता है कि राम जी ने रावण
    को इसलिये मार दिया हो जिससे कि उन्होंने
    जो खर दूषण, ताड़का, सुबाहु को मारा,
    सूर्पणखा की नाक काट दी और रावण के दूसरे
    रिश्तेदारों को निपटा दिया उसकी फ़ाइलें रावण
    न खुलवा सकें। उनको लग गया होगा कि अगर
    कहीं रावण जिन्दा बचा रहा और बाद में इन सब
    मामलों की सच्चाई सामने आई
    तो उनका ’मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनने के अभियान में
    बाधा आ सकती है।
    सीता जी के प्रति राम के अगाध प्रेम की बात
    भी इसलिये कम समझ में आती है क्योंकि अगर
    खाली सीता के प्रति लगाव के चलते राम ने रावण
    को मारा होता तो बाद में
    सीता जी को त्यागते नहीं। वह भी तब जब
    सीता जी गर्भवती थीं। आजकल की सरकारें तक
    मातृत्व/पितृत्व अवकाश देती हैं
    स्त्रियों की देखभाल के लिये। ऐसे में रामजी ने
    उनको जंगल भेज दिया। यह कुछ समझ में
    नहीं आया मामला। ये अच्छा नहीं किया राम
    जी ने। वो तो कहो सीता जी भले घर
    की थीं वर्ना इसके चलते और बाद में
    सीता जी की आत्महत्या के चलते उनको लेने के देने
    पड़ जाते।
    अब जबकि हजारों साल बीत गये होंगे इस
    घटना को तो कुछ कहा नहीं जा सकता कि सच
    क्या था लेकिन लगता यही है कि रावण के साथ
    कुछ ज्यादती हुयी। आज के समय में इत्ते बड़े अपराध
    की सजा हद से हद दो-तीन साल होती। वह
    भी पचीस तीस साल मुकदमा चलने के बाद। आज के
    समय में होता तो रावण देश के सबसे बढिया वकील
    करता और वकील साबित कर देता कि रावण
    सीता की रक्षा के लिये उनको अपने फ़ार्म हाउस
    में ले आया। उसका कोई गलत इरादा नहीं था।
    हो सकता है वो अपने फ़ार्म हाउस का खर्चा राम
    से वसूल लेता। क्या पता काटजू जी टाइप का कोई
    जज होता तो वो राम जी को चार बातें
    भी सुनाता कि अपनी पत्नी की देखभाल ठीक से
    नहीं कर पाते तो उनको साथ में लेकर जंगल
    क्यों आये।
    लोग कहते हैं कि अंत में सत्य की विजय होती है।
    लेकिन हमें तो यही लगता है कि जो अंत में होता है
    उसी को लोग सत्य मान लेते हैं। यही रावण जी के
    साथ हुआ। बेचारे छोटे अपराध में
    बड़ी सजा पा गये। विद्वान बेचारा, बदनाम होकर
    मरा। रावण के मुकाबले कई गुना बड़े
    अपराधी उसको बुराई का प्रतीक मानकर जलाते
    हैं। पर्यावरण का नुकसान करते हैं। बुराई पर अच्छाई
    की जीत का गाना गाते हैं।
    लगता है इस बार रावण के साथ हुये अन्याय
    का आभास हुआ आसमान को इसीलिये
    पानी बरसा है। जगह-जगह रावण के पुतले भीग गये।
    समन्दर भी गवाह रहा था रावण के साथ हुये
    अन्याय का सो वह भी गरजता हुआ तूफ़ान के रूप में
    आया है रावण की दुर्दशा बचाने।
    आपको क्या लगता है?
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] रावण जी आज होते तो…. [...]

Saturday, October 12, 2013

ये गुंडागर्दी नहीं चलेगी

http://web.archive.org/web/20140420081753/http://hindini.com/fursatiya/archives/4954

ये गुंडागर्दी नहीं चलेगी

Mafiaअखबार में एक पुलिस अधिकारी का बयान आया – शहर में नहीं होने देंगे गुंडागर्दी। बयान पढ़कर बड़ा खराब लगा। अरे भाई, शहर में नहीं चलने दोगे तो गुंडे क्या गुंडागर्दी करने गांव जायेंगे? जंगल में ’गुंडाकैंप’ करेंगे? अरे गुंडे भी इस देश के नागरिक हैं भाई। उनका भी हक है जहां मन आये वहां रहने का। अपना काम धंधा करने का। आप कानून व्यवस्था के नाम पर किसी का काम धंधा बंद कर दोगे क्या? किसी के पेट पर लात मार दोगे? यह तो देश के कानून का सरासर उल्लंघन है भाई। कानून कहता है कि देश का नागरिक कहीं भी रह सकता है, आ सकता है, जा सकता है, काम धंधा कर सकता है। देश के चलाने में गुंड़ों का भी योगदान होता है। गुंडे माफ़िया न हों तो न जाने कित्ते धंधे बंद हो जायें, आई.पी.एल. बन्द हो जाये, फ़िल्में न बनें, ठेकेदारी ठप्प हो जाये। सरकारें तक भहराकर गिर पड़ें। बकौल ’राहत इंदौरी’ –
सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में,
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है।
सच पूछा जाये तो गुंडों के साथ हमेशा से अन्याय होता आया है। समाज और सरकार निर्माण में गुंडे जितना योगदान करते हैं उसके हिसाब से उनको श्रेय नहीं मिलता। काम निकल जाने के बाद उनको भुला दिया जाता है या किनारे कर दिया जाता है। इससे गुंडों के मनोबल पर असर पड़ता है। कभी-कभी तो इतना असर पड़ता है कि वे नेता तक बन जाते हैं। चुनाव लड़ते हैं। जीत जाते हैं। मंत्री बन जाते हैं। दूसरे गुंडों को राह दिखाते हैं। हाशिये पर पड़े गुंडों को समाज की मुख्य धारा में लाते हैं।
गुंडों का विरोध करने वालों को समाज निर्माण में उनका योगदान समझना चाहिये। जो काम सरकारें नहीं कर पातीं वह गुंडे करके दिखाते हैं। सरकार का काम लोगों के भले के लिये काम करना होता है। वह नहीं कर पाती तो कोई गुंडा अपने कुछ लोगों का भला करने लगता है। भलाई का कुटीर उद्योग चलाता है। लोग कानून की बजाय गुंडे को पसन्द करने लगते हैं। यह सहज भी है। कानून और गुंडे में जो भला करेगा उसी को तो पसंद करेगा न आम आदमी। उसी को तो वोट देगा। चुनाव जितवायेगा। मंत्री बनायेगा। अब अगर किसी गुंडे से कुछ लोगों को तकलीफ़ है तो वो अपना गुंडा बनाये। अपना भला करवाये।
समाज निर्माण में गुंडों की सफ़लता को देखते हुये गुंडों की संख्या बढ़ती जा रही है। लेकिन समाज में उनको अभी स्वीकार्यता खुले मन से मिली नहीं है। दकियानूस समाज अभी भी गुंडो को बुरा मानता है। सरकारें इस बारे में उदार हैं। अपने मंत्रिमंडल में गुंडों को रखने में हिचकती नहीं। उनको क्लीनचिट वगैरह दिलवाती हैं। ताकि कोई हल्ला मचाये तो कह सकें कि भाई एक भले आदमी को खाली आरोपों के आधार पर कैसे जनता के सेवा के मौके से वंचित कर दिया जाये।
ऐसे ही एक जनसेवक को उसकी लोकप्रियता के चलते जलने वाले लोगों ने उस भले आदमी को लोगों ने झूठे आरोपों में फ़ंसा दिया। कानून ने फ़ौरन अपना काम किया। जनसेवक को क्लीन चिट मिली। फ़िर सरकार ने फ़टाक से अपना काम किया। जनसेवक को मंत्री बनाया। फ़िर विपक्ष भी अपना काम करने में जुट गया और सरकार की बुराई करने लगा। यह सब देखकर शायर ’कट्टा कानपुरी’ ने भी अपना काम किया और जनसेवक के मंत्री बनने का विरोध करने वालों को धिक्कारते हुये लिखा:


“क्लीन चिट मिली है भाई, मंत्री काहे न बने,
तेरा सिर है तू चाहे, इसे सहलाये या धुने। अरे भाई गुंड़ों के भी सीने में दिल होता है,
बाहुबली होने से क्या, कोई नेता न बने?
अरे तुमने वोट दे दिया अब ये उनकी मर्जी,
सरकार चलाने के लिये चाहे जिनको चुनें।
अरे यार जनता हो,देखो सब पर चुप रहो,
चलेगी ऐसी ही सरकार, चाहे जिसकी बने।
लगता है पुलिस अधिकारी ने अपना बयान ऐसे ही बिना सोचे समझे दे दिया। लगता है पुलिस अधिकारी ने ’पापुलर मेरठी’ का शेर नहीं सुना:
मवालियों को न देखा करो हिकारत से
न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए ।
मान लिया कि शेर नहीं पढ़ा लेकिन बयान देने से पहले यह तो सोचना चाहिये कि अगर गुंडे शहर से बाहर चले गये तो फ़िर थाने को कौन पूछेगा? उनकी रौनक का क्या होगा?
काम करें चाहे न करें लेकिन अधिकारियों को बयान तो सोच समझकर देने चाहिये। बयान देने के मामले में अधिकारियों की गुंडागर्दी नहीं चलेगी।

7 responses to “ये गुंडागर्दी नहीं चलेगी”

  1. संतोष त्रिवेदी
    गुंडे ही देश के कर्णधार हैं:-)
  2. डॉ राजीव कुमार रावत
    वाह…..
    हम भी अगर गुंडे होते
    नाम हमारा होता ….
    हमको भी मिलती गद्दी…
  3. प्रवीण पाण्डेय
    गुंडे बनने में कितना श्रम पड़ता है, पुलिस वालों को क्या ज्ञात?
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कानपुर से बंगलोर
  4. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    सुबह कट्टा जी के कवित्त पर टिप्पणी में कविता डाली थी। इस समय गायब है।
    अब दुबारा तुक बनाने का मूड नहीं है।
    अस्तु साधुवाद देकर चलता हूँ।
    पोस्ट तो मजेदार है ही।
  5. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    गुंडों को उनका उचित हक़ मिले ;)
    सतीश चन्द्र सत्यार्थी की हालिया प्रविष्टी..फेसबुक पर इंटेलेक्चुअल कैसे दिखें
  6. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] ये गुंडागर्दी नहीं चलेगी [...]
  7. indra
    चकाचक !!
    बड़ी गुंडनीयता के साथ लिखा हुआ व्यंग्य !

Friday, October 11, 2013

सचिन का संन्यास बच्चों के हित में

http://web.archive.org/web/20140420081922/http://hindini.com/fursatiya/archives/4943

सचिन का संन्यास बच्चों के हित में

सचिनआज घर फोन किया तो बच्चे ने बात करने से इंकार कर दिया। कारण पूछने पर पता चला कि सचिन क्रेकेट से रिटायर हो रहे हैं। हमें समझ नहीं आया कि बच्चा हमने नाराज है सचिन से। अरे भाई हमने थोड़ी कोई कहा था सचिन से रिटायर होने को। उसने सन्यास की घोषणा की उससे निपटो। हमसे क्यों खफ़ा हो रहे हो।
क्रिकेट जैसे निठल्ले और समय खपाऊ खेल के देवता की उपाधि पाया खिलाड़ी रिटायर हो रहा है। हर चैनल प्राइम टाइम पर सचिन चालीसा पढ़ने में लगा है। सचिन की उपलब्धियां और खूबियां बखानी जा रही हैं। क्रिकेट के सर्वकालिक बेहतरीन खिलाड़ी की विदाई का मामला है। अगले दस दिन तक मीडिया पलट-पलट कर फ़िर-फ़िर सचिन चर्चा करता रहेगा। एक ही चैनल पर दो एंकर एक के बाद एक सचिन चर्चा कर रहे हैं। सचिन रिकार्ड के लिये खेलते नहीं थे लेकिन रिकार्ड उनके लिये बनते रहते थे। 200 वें टेस्ट की विदाई भी एक ऐसा ही रिकार्ड है।
हमारे दोनों बच्चे सचिन के पक्के फ़ैन हैं। सचिन की बुराई सहन नहीं कर सकते। मैं अक्सर कहता कि सचिन में फ़िनिशिंग हुनर नहीं है। कपिलदेव की वर्ल्डकप की 175 रन सरीखी एक्को पारी नहीं खेले तो वे सचिन की कई पारियां गिना देते। सचिन के मामले में बात करते हुये मेरे बच्चे राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता की तरह बहस करने लगते जो अपनी पार्टी के एक घपले की चर्चा पर विपक्षी पार्टी के पचास घोटाले गिना देते हैं।
आजकल सचिन जल्दी आउट हो जाते थे। उनके जाते ही टीवी बंद कर देते। सचिन के खेलते हुये टीवी देखना बच्चों का सहज अधिकार सा बना रहता है। मैंने बच्चे से कहा – सचिन ने पता है क्यों रिटायरमेंन्ट की घोषणा की?
बच्चे ने कहा कि हां पता है इसलिये कि आजकल वह रन नहीं बना पा रहा था।
हमने कहा – नहीं भाई इसलिये संन्यास लिया उसने ताकि तुम आराम से पढ़ सको। तुम्हारी पढ़ाई के लिये सचिन से खेल को अलविदा कह दिया।
सचिन का रिटायरमेंट देश के बच्चों के हित में है। वे अब आराम से पढ़ सकेंगे। उनके अच्छे नम्बर आयेंगे। लेकिन क्या पता सचिन के प्रभाव से निकले बच्चे विराट इफ़ेक्ट में आ जायें!
सचिन के संन्यास कें पीछे राजनीति का भी बहुत बड़ा हाथ है। सचिन अभी खेलते रहना चाहते थे और कहते भी मैं तब तक खेलते रहना चाहता हूं जब तक आनन्द आता है। सचिन को आनन्द अभी भी आ रहा था लेकिन जबसे राजनीति में आडवाणी जी की गति देखकर उन्होंने सोचा रिटायरमेंट ले लिया जाये वही अच्छा है।
बीच-बीच में बुजुर्गों ने कहा भी कि सचिन को रिटायरमेंट ले लेना चाहिये। लेकिन सचिन एक ठो सैकड़ा ठोक देते। लोग फ़िर गाना गाने लगते- अरे अभी तो सचिन में बहुत क्रिकेट बची है। खेलने दो भाई। अब किसी को तो निकालना ही था भाई तो सहवाग को और भज्जी को निकाल दिया। भले ही कुछ दिन के लिये। अब उनके वापस आने की गुंजाइश कम होती जा रही है।
अनन्यविज्ञापन कम्पनियों को भी विराट और धोनी में ज्यादा मजा आ रहा था। वे भी सोच रहीं होंगी कि अब भगवान विदा हों तो इन नये देवताओं पर और पैसा लगाया जाये।
एक बेहतरीन खिलाड़ी जब विदा हो रहा है। सचिन ने खेल के लिये मेहनत की, पसीना बहाया। आदर्श बने रहे। उनका खेलते रहना घरों में टीवी खुल रहने का कारण बना रहा। सचिन को खेलते देखने के लिये लोग घर जल्दी आ जाते थे, छुट्टी ले लेते थे। मींटिंग दायें-बायें कर देते थे और भी न जाने क्या-क्या?
सचिन के विदा होते समय मैं सोच रहा हूं कि खिलाड़ी तो विदा हो रहा है। लेकिन खिलाने वाले कब विदा होंगे? जिसको खेलते देखने के लिये टीवी खुल जाते थे वह विदा हो रहा है। लेकिन वे कब दफ़ा होंगे जिनको देखते ही लोग टीवी बन्द कर देते थे। बीसीसीआई अध्यक्ष कब रिटायर होंगे? पवार साहब कब सचिन से सीखेंगे? वे देश के बच्चों का भला कब सोचेंगे?

मन करे तो ये भी देखें

  1. सचिन का खेल, संन्यास और गुस्सा
  2. सचिन राज्यसभा में- कुछ सीन

14 responses to “सचिन का संन्यास बच्चों के हित में”

  1. हितेन्द्र अनंत
    शत प्रतिशत सहमत!
    1. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
      तेंदुलकर के बारें में नौ प्रसिद्ध उक्तियाँ :
      1. मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा सचिन तेंदुलकर बने- ब्रायन लारा
      2. हम एक टीम से नहीं हारे जिसका नाम इंडिया है; बल्कि हम एक आदमी से हार गये जिसका नाम सचिन है- मार्क टेलर
      3. हमारे साथ कुछ भी बुरा नहीं हो सकता अगर भारतीय जहाज में हमारे साथ सचिन तेंदुलकर बैठे हों- हाशिक अमला
      4. वह उस लेग-ग्लान्स को एक छड़ी से भी खेल सकता है- वकार यूनुस
      5. दुनिया में दो तरह के बल्लेबाज हैं : (1) सचिन तेंदुलकर (2) दूसरे सभी – एंडी फ्लॉवर
      6. मैंने भगवान को देखा है। वे टेस्ट मैंचों में भारत की ओर से चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करते हैं – मैथ्यू हेडेन
      7. जब सचिन बैटिंग करते हैं तो मैं उसमें खुद को देखता हूँ – डॉन ब्रैडमैन
      8. जब सचिन बैटिंग कर रहे हों तो अपने अपराध कर डालो, क्योंकि उस समय भगवान भी उसकी बैटिंग देखने में व्यस्त रहते हैं- आस्ट्रेलियाई प्रशंसक
      9. सर्वश्रेष्ठ बयान जो बराक ओबामा ने दिया- “मुझे क्रिकेट नहीं मालूम; फिर भी मैं सचिन को खेलते देखता हूँ… इसलिए नहीं कि मुझे उसका खेलना पसन्द है, बल्कि इसलिए कि मैं वह कारण जानता चाहता हूँ कि क्यों जब वह बैटिंग कर रहे होते हैं तो मेरे देश के उत्पादन में पाँच प्रतिशत की गिरावट आ जाती है।”
      सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..सेकुलरिज्म का श्रेय हिंदुओं को: विभूति नारायण राय
  2. ashok kumar avasthi
    सचिन के रिटायरमेंट से उनके भारत-रत्न मिलने की संभावना पर विचार नहीं किया?
  3. प्रवीण पाण्डेय
    आप भ्रम में न रहियेगा, सचिन के बाद दूसरे को हीरो बना लेंगे बच्चे।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..वर्धा से कानपुर
  4. संतोष त्रिवेदी
    संन्यास सचिन के हित में भी है:-)
  5. विवेक रस्तोगी
    क्रिकेट अपने को कभी पसंद नहीं आया २२ खिलाड़ी खेलते हैं और पूरी दुनिया उन्हें देखकर अपना वजन बड़ा लेती है, दरअसल आलस फैलाने वाला खेल है।
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..बस तुम्हें… अच्छा लगता है.. मेरी कविता
  6. HARSHVARDHAN
    आज की विशेष बुलेटिन जेपी और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।
  7. Anonymous
    सही….मगर बच्‍चे फि‍र कि‍सी को ढूंढ लेंगे
  8. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    :)
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