Monday, July 30, 2018

मांगने वाले नखरे के अधिकारी नहीं रह जाते

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग
मांगने वाले लाइन से बैठे हैं
कल सबेरे निकले टहलने। अगले पहिये में हवा कुछ कम थी। लेकिन चल चकाचक रही थी। जरा भी नखरे नहीं। हमारी साइकिल गऊ है इस मामले में। कोई दूसरी सवारी होती तो उलाहना देती कि हफ़्ते भर से छुआ तक नहीं, आज सवार होने आ गये।

मोड़ पर फ़ुटपाथ पर रहने वाला परिवार झोपड़ी के बाहर बैठा था। मां, बेटिय़ां और लड़का शायद। बीच घेरे में पत्थर के टुकड़े रखे थे। शायद ’गुट्टा’ खेलने के लिये। आपस में चुहल टाइप करते बतिया रहे थे।

स्कूल की चहारदीवारी के गेट पर छुटके से बोर्ड पर लिखा था-’ कृपया यहां गाड़ी पार्क न करें।’ बताओ भला सड़क से छह फ़ुट ऊपर कौन गाड़ी खड़ी करेगा आकर।

सड़क पर ढलान थी। साइकिल सरपट उतरती चली गयी। उतरने मतलब नीचे गिरती। नीचे गिरने में कोई ताकत थोड़ी लगानी पड़ती है। ऊर्जा का रूपान्तरण होता है बस्स। स्थितिज ऊर्जा से गतिज ऊर्जा में। इसीलिये दुनिया भर में तमाम लोग उतरते चले जा रहे हैं। पतित होते। पतन में मेहनत नहीं लगती है न।

सामने से एक आदमी साइकिल के हैंडलों में प्लास्टिक के डब्बों में पानी भरे लिये जा रहे था। चढाई पर उचक-उचककर साइकिल चलानी पड़ रही थी उसको। पसीना-पसीना होते हुये। साइकिल पर पानी ले जाते देखकर देश में पानी की कमी के बारे में सोचने लगे। कल को पानी और दुर्लभ हो जायेगा तब शहर भर में पानी की जगह-जगह दुकाने खुल जायेंगी। ठेलियों पर पानी बिकेगा। जगह-जगह पानी के चलते-फ़िरते बाथरूम मिलेंगे। ओला-उबेर की पानी टैक्सियां चलेंगी। ओला-उबेर ट्वायलेट चलेंगे। जहां प्रेशर बढा गाड़ी बुक कीजिये, निपटिये और सुकून की सांस लीजिये।

ढलान से उतरते हुये गंगा घाट की तरफ़ मुड़ गये। सीमेंट की सड़क किनारे बस्ती गुलजार थी। एक घर के सब लोग मिलकर झोपड़ी की छत की मोमिया दुरस्त कर रहे थे। जहां उघड़ी थी वहां दूसरी मोमिया का पैबन्द लगा रहे थे। लकड़ियां रखकर बरसाती उड़ने से बचने का इंतजाम कर रहे थे। वहीं सड़क पर एक बुजुर्गवार दो फ़ुट की एक मोमिया को सिलते दिखे। किसी के लिये कूड़ा हो चुकी पालीथीन को सिलकर अपने काम की बनाते हुये। बुजुर्गवार को तसल्ली से मोमिया सिलते देखकर हमको अपनी अम्मा की याद आई जो गर्मियों की दोपहरी में तमाम तरह के छोटे कपड़े के सैम्पलों को सिलकर दरी, चादर जैसी चीजें बनाती रहती थीं।

दुनिया में एक का कूड़ा दूसरे के लिये काम की चीज हो जाता है।

घाट किनारे मांगने वाले लाइन से बैठे थे। ईंटों की कुर्सियों पर। कुछ लोग जमीन पर भी। एक आदमी आया। झोले से खाना निकालकर सबको देने लगा। मांगने वालों में से एक ने बंटवारे में सहयोग किया। सहयोग करने वाला एक मांगने वाले की बुराई कर रहा था- ’ रोज पांच रोटी, चावल मिलता था। आज चावल नहीं तो आठ रोटी मिली। उस पर नखरे कर रहा कि आज चावल नहीं मिले।’ यहां के पहले ’चरस’ में था। वहां भी ऐसे ही नखरे पेलता था। नये (मांगने वालों) पर रोआब गांठता था, पुरानों से झगड़ता था। भगा दिया उन लोगों ने। यहां आया तो हमने मना नहीं किया। लेकिन इसके नखरे ही नहीं मिलते।

’चरस’ से हमें लगा कि अगला चरस का लती होगा लेकिन फ़िर मालूम हुआ कि वह ’चरस’ नहीं ’चरच’ कह रहा। चरच माने चर्च। चर्च में मांगता था ये तथाकथित नखरेबाज मांगने वाला। नखरे पर उसके साथी को एतराज है। मतलब कि आप मांगने पर नखरा करने के अधिकारी नहीं रह जाते।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर और पानी
गंगा में नाव
अंदर चले गये। गंगा में पानी बढ गया था। जल-स्वस्थ हो गयीं थी। जल-चर्बी चढी गंगा में नावें भी चल रहीं थीं। बाढ के पानी के साथ कूड़ा-कचरा भी बह रहा था। मटमैला पानी हड़बड़ी में भागता चला जा रहा था। उसको डर था कि कहीं रुका तो अपहरण न हो जाये। कोई कैद न कर ले पानी को। 

दो बच्चियां घाट पर पानी की बढत देखती हुई आपस में बतिया रहीं थीं। कल दो ईंट नीचे था पानी। आज वो ईंट डूब गयी है।
घाट पर कुछ कमरों के बाहर बोर्ड लगा था - ’महिलाओं के कपड़े बदलने का कमरा।’ कुछ महिला शौचालय/पुरुष शौचालय वाले बोर्ड भी लगे थे। सब कमरों/शौचालयों में ताले जड़े हुये थे। लिंक के ताले जो सिर्फ़ अपनी ही चाबी से खुलते हैं। जनसुविधाओं पर शायद किसी -महंत का कब्जा होगा।

बाहर फ़िर वही लाइन से बैठे भिखारी। मंदिर से निकलते ही एक आदमी ने उनके पास खड़े होकर पूछा-’कितने लोग हो?’ एक ने पहले पन्द्रह। फ़िर बोला- बारह। उस आदमी ने जेब से सिक्के निकालकर गिनती बताने वाले को थमा दिये। उसने सबमें बराबर-बराबर बांट दिये। कोई घपला नहीं हुआ। यही काम किसी सरकारी विभाग को दिया जाता तो भीख-घोटाला हो जाता।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और लोग बैठ रहे हैं
प्लास्टिक के बोर्ड को साफ करता बालक
एक झोपड़ी के सामने दो बच्चियां चारपाई पर बैठी स्टील के ग्लास में चाय पी रहीं थीं। उसके बगल में एक बच्चा एक प्लास्टिक के साइनबोर्ड को पानी से साफ़ कर रहा था। साइनबोर्ड हुंडई सर्विस सेंटर का था। शायद सर्विस सेंटर के बाहर लगा हो उसको उतारकर कोई लाया हो। बच्चे की देखा-देखी एक और बच्चा दूसरे सिरे से उसको साफ़ करने लगा। बोर्ड पर पानी के चलते वह फ़िसल रहा था बार-बार। एक बार कुछ ज्यादा फ़िसल गया। लद्द से गिर पड़ा बोर्ड पर ही। रोने लगा। उसको रोते देखकर चारपाई पर बैठी बच्ची ने ग्लास की चाय का आखिरी घूंट लिया और ग्लास जमीन पर धरकर उठकर छोटे बच्चे की पीठ पर एक धौल जमाया। छुटका और जोर से रोने लगा। छुटके के बाद उसने जिम्मेदारी से सफ़ाई में जुटे बड़के की पीठ पर दो हाथ जमाये और वापस चारपाई पर आकर बैठ गई। मतलब घुन के साथ गेहूं भी पिस गया। बड़ा, सफ़ाई करता बच्चा भी बुक्का फ़ाड़कर छुटके के साथ ’रोने की जुगलबंदी’ करने लगा। स्वच्छता अभियान बाधित हो गया। अच्छी मंशा से शुरु किये जाने वाले तमाम अभियान इसी तरह बाधित होते रहते हैं।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर
ठेले पर सोता बालक, छत को बरसाती से ढंकते लोग और सड़क पर गुजरती जिंदगी
आगे एक महिला कांक्रीट की सड़क को आंगन की तरह इस्तेमाल करती हुई अपनी धोती धो रही थी। हैंडपम्प के पानी में एक आदमी नहा रहा था। धोती रगड़ने-फ़ींचने से निकलता हुआ साबुन सड़क से होते हुये पास की नाली तक जा रहा था।
इस बीच वह भिखारी आते हुआ था जिसकी आलोचना कर रहे थे लोग। हमें लगा नाराजगी में भिखारी-दल का बहिष्कार करके आया है। लेकिन पूछने पर बताया कि उसको कपड़े धोने हैं इसलिये वापस जा रहा था। कुछ वैसे ही जैसे लोग जरूरी काम होने पर सोशल मीडिया से कट जाते हैं। काम होने पर फ़िर जुड़ जाते हैं।
लौटते हुये सोचा कि शायद झोपड़ी के बाहर लोग अभी भी गुट्टा खेलते दिखें। लेकिन वहां अब कोई नहीं था। सब शायद काम पर जा चुके थे।

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Saturday, July 28, 2018

डम्प्लाट दुनिया में अपना सूरज


बिस्तर पर पड़े-पड़े मुंह उचकाकर सूरज भाई को देखते हैं। गायब हैं। शायद देर रात तक चंद्रग्रहण देखते रहे होंगे। वैसे भी सूरज भाई अपने हिसाब से आते हैं। उनको कोई बायोमेट्रिक हाजिरी तो लगानी नहीं होती है। हमेशा ड्यूटी पर तैनात रहने वाले की क्या बायोमेट्रिक और क्या हाजिरी।
वैसे अगर सूरज भाई को हाजिरी लगानी हो तो कैसे लगाएंगे? अंगूठा लगाने के बहुत पहले ही बायोमेट्रिक डिवाइस उबलकर परमाणु-परमाणु हो जाएगी।
कल अखबार में खबर पढ़ी -'अपनी आकाश गंगा में इतने तारे हैं जितने कि दुनिया भर के समुद्र तटों पर पसरे बालू के कण।' खबर के बाद कई शून्य लगाकर बता दिया कि इतने तारे हैं दुनिया में। लब्बो लुआब कि दुनिया बड़ी डम्प्लाट है।
कल्पना की जाए कि सूरज भाई इत्ते विशाल हैं कि उसमें 600000 पृथ्वियां समा जाएं। हमारे खुद के जैसे आठ अरब लोग धरती पर चिल्लपों करते रहते हैं। सूरज में कितने लोग समा जाएं। लेकिन कभी सूरज भाई को अपनी हांकते नहीं सुना। कभी लाउड स्पीकर लगाकर हल्ला नहीं मचाते कि हममें ये किय्या, वो किय्या, कब्भी छुट्टी नहीं ली।
दुनिया के बाद सूरज भाई खुद एक मध्यम तारे। इस तरह के अगणित तारे आकाशगंगा में। फिर अपनी आकाश गंगा भी मझोली साइज की। इस तरह की अगणित आकाशगंगाएं ब्रह्मांड में। मतलब समझा जाए कि अपन की औकात कितनी है इस कायनात में। जब कभी मन में घमंड मुंडी उठाये यह सोचना चाहिए कि हमारा साइज क्या है दुनिया में।
अच्छा सोचिए जैसे अपने यहां बरसात होती है वैसे सूरज भाई के यहां भी होती होगी क्या? आग बरसती होगी वहां भी। आग क्या आग के बाप के भी बाप बरसते होंगे। चारों क्या आठों तरफ आग ही आग दिखती होगी। चाय भी उबलकर प्लाज्मा में बदल जाती होगी। इसीलिए सूरज भाई को जब भी चाय के लिए बुलाते हैं, बड़े मन से भागे चले आते हैं।
जब सूरज भाई हमारे पास आते हैं चाय पीने तो धूप, किरण और गर्मी का तामझाम ऑटो मोड में छोड़ आते हैं जैसे हवाई जहाज में पायलट लोग जहाज को ऑटो मोड में डालकर उड़नबालाओं से गपियाते हैं या फिर चौराहे पर सिपाही ट्रैफिक को सिग्नल सहारे छोड़कर चौराहे की गुमटी पर चाय पीने चले जाते हैं।
चाय की बात से फिर चाय पीने का मन हो गया। सबेरे से तीन बार चाय पीने के बाद अब चौथी बार का इंतजार है।देरी हो रही है। सोंचते हैं धमकी दे दें -'दो मिनट में चाय नहीं मिली तो दफ्तर चले जायेंगे।' लेकिन अकेले इंसान की धमकी देने की क्या औकात। धमकी वही दे सकता है आज के समय में जिसके पीछे बावली भीड़ की ताकत हो।अपन के पीछे खुद भी नहीं खड़े।
अब निकलते दफ्तर को वर्ना न जाने कित्ते लोग पीछे पड़ जाएंगे। 

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Thursday, July 19, 2018

तकनीेक के लफ़ड़े

यह 2016 का फ़ोटो है। गोवा में समुद्र तट पर चाय पीते हुये।

तकनीक की अज्ञानता भी मजेदार लफ़ड़े कराती है।
पिछले साल हम अपने मोबाइल में अपने परिवार के लोगों के फ़ोटो लगाये थे। दोनों बेटे, अम्मा और घरैतिन ! फ़ोटो हमने खुद खींचा था और खींचकर लगा था कि अच्छा खींचा। बिटिया स्वाती नहीं थी उस समय वर्ना और मुकम्मल बनती फ़ोटो ! दिन में जब भी मोबाइल देखते, फ़ोटो दिख जाता। याद हो जाती।
पिछले हफ़्ते मोबाइल का कोई बटन दब गया तो फ़ोटो दायें-बायें हो गयी। स्थिर पारिवारिक फ़ोटो की जगह हर बार अलग-अलग सीन आने लगे। खूबसूरत प्रकृति के फ़ोटो और भी तमाम इधर-उधर के फ़ोटो! लेकिन हम सोचते कि फ़ेमिली वाला फ़ोटो लगा रहे थे अच्छा !
दो दिन पहले सुबह सोचा मोबाइल के प्रोफ़ाइल पिच्चर में फ़ेमिली फ़ोटो लगा लें। टहलते हुये फ़ेसबुक का फ़ोटो फ़ेमिली वाला डाउनलोड हो गया। उसके बाद वही प्रोफ़ाइल पिक्चर में लग गया। कवर फ़ोटो और प्रोफ़ाइल फ़ोटो एक से। जब तक समझ में आया तब तक कुछ लोग लाइक कर चुके। कुछ दोस्त आत्मीय टिप्पणी भी कर चुके।
बहरहाल जब देखा तो फ़िर से वही गोवा में समुद्र तट वाली फ़ोटो लगाई प्रोफ़ाइल पिक्चर वाली। लगते ही शानदार प्रतिक्रियायें आनी शुरु हो गयी:
-गोवा में साइकिल
- साइकिल किसकी है, झोला किसका है?
-गोवा में चाय, बियर क्यों नहीं?
-हसीन लग रहे हैं?
-मडगार्ड कहां है साइकिल का
-ये साईकल व थैला अपना ही है सर जी
-अरे वाह !! छैल छबीले बांका अंदाज
-दरअसल अपडेट तो महज एक बहाना है
-सुकुल जी का ये पीपी तो बहुत पुराना है ।
-कित्ती बार ये फोटू डालोगे दद्दा, लेकिन टिकट आपको नी मिलने वाला
-गोआ और चाय हाय हाय हाय

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, Anany Shukla, Saumitra Mohan और Suman Shukla सहित, लोग खड़े हैं और बाहर
दोनों सुपुत्र, अम्मा और घरैतिन — Saumitra Mohan औरSuman Shukla के साथ.
मतलब जितने दोस्त उससे ज्यादा मजेदार टिप्पणियां। तकनीकी अज्ञानता के साइड इफ़ेक्ट हैं ये। जिस फ़ोटो को लगाना नहीं चाह रहे थे वह लग गई। फ़िर दुबारा पुरानी फ़ोटो लगाई तो रोचक टिप्पणियां मिलीं। सबके जबाब देने का मन होते हुये भी दे नहीं पाये। टिप्पणियों के जबाब देना मुझे पोस्ट लिखने से कम रोचक नहीं लगता लेकिन समय मुआ इत्ता हरजाई कि पास आते ही फ़ूट लेता है।
कवि यहां यह कहना चाहता है कि तकनीकी मोबाइल , फ़ेसबुक और अन्य जगहों पर कई काम तकनीकी अज्ञानता के चलते होते हैं। उनमें से कुछ हसीन भी हो जाते हैं। जैसे यह वाला हुआ।
ऐसे ही एक और लफ़ड़ा हुआ रखा है मेरे मोबाइल में। वीडियो सेव करते हैं मोबाइल में वो चलते नहीं। बताता है - अपनी सेटिंग में बदलाव करो। सेटिंग अभी तक न बदल पाये। जो भी (खुद का बनाया) वीडियो देखना होता है वो किसी को फ़ेसबुक पर पोस्ट करते तब देख पाते हैंं। तकनीकी जाहिलियत है न अपन की।
कल ऐसे ही एक संदेश मिला। फ़ेसबुक मेसेंजर पर। उसका लब्बोलुआब यह कि आजकल हैकर लोग फ़ेसबुक खाते को हैक करके अश्लील वीडियो संदेश भेज रहे हैं। यदि आपको मेरे नाम से कोई संदेश मिले तो वह इन्हीं हैकरों की वजह से है। मैंने कोई संदेश नहीं भेजा आपको।
कल को वर्चुअल तकनीक का चलन बढेगा। क्या पता कुछ ऐसा हो कि आपका आभासी व्यक्तित्व कोई अपराध टाइप कर डाले और आप उसकी सजा भुगतो। ऐसे में सक्षम लोग खुद कोई अपराध करके अपने वर्चुअल को जेल भेज देंगे। पचीस लोगों की हत्या, बलात्कार में अगर उनको सजा हुई तो वे अपने सैकड़ों आभासी भक्तों को जेल भेज देंगे सजा भुगतने के लिये।
तकनीक जितनी तेजी से प्रगति कर रही है , उस गति से उसको उपयोग करने की समझ नहीं बढ रही। अनजाने में तमाम लफ़ड़े होने की जबर संभावना है।
यह तो खैर हुई सोशल मीडिया की बात। कल को यही लोचे किसी खतरनाक तरीके से भी हो सकते हैं। किसी जमूरे या फ़िर तानाशाह शासक के हाथ में संहारक हथियारों के संचालन का बटन हो और मजाक-मजाक में वह उसे दबा दे। पानी मांगने के लिये दबाये जाने वाले बटन की जगह लाखों लोगों के संहार की क्षमता करने वाले परमाणु बम चलाने वाला बटन दब जाये। मजाक-मजाक में दुनिया निपट जायेगी फ़िर तो। बंदर के हाथ में उस्तरे से तो केवल बंदर या एकाध आदमी ही निपटते लेकिन ऐसे में तो दुनिया ही इधर-उधर हो जायेगी।
कहने का मतलब यही है बेवकूफ़ियां हसीन होती हैं लेकिन तभी तक जब कोई नुकसान न हो।
नुकसान पहुंचाने वाली बेवकूफ़ियां खतरनाक होती हैं। लेकिन अफ़सोस यही है कि बेवकूफ़ियां खतरनाक हैं कि हसीन यह होने के बाद ही पता चलता है। लेकिन खतरे के डर से हसीन बेवकूफ़ियों का गला न घोंटे। मस्त रहें। बेवकूफ़ियां करते रहें। निर्मल मन से। बेवकूफ़ीं का सौंदर्य अद्भुत ही होता है।

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Wednesday, July 18, 2018

जियो बालक ! शाबास

इतवार को हमारे छोटे सुपुत्र न्यूयार्क में हवाई कुदान करते पाये गये। नई और पहली नौकरी ज्वाइन करने के बाद कम्पनी (गोल्डमैन सैक्श) की तरफ़ से दो हफ़्ते की ट्रेनिग के लिये भेजे गये। वहां घूमने के बाद स्काई ड्राइविंग की दिली तमन्ना पूरी की। एक्सपर्ट स्काई डाइवर पीठ पर बेताल की तरह लदा वीडियोग्राफ़ी करता जा रहा था। वही वीडियो बालक ने फ़ेसबुक पर अपलोड किया।
अपन यही सोच रहे हैं कि अभी अपन पैराशूट बना रहे हैं और बच्चा पैराशूट से कूद रहा है। मतलब पैराशूट का उपयोग कर रहा। एक बार की कूद का खर्चा आया 300 डालर मतलब लगभग 20 हजार रुपये।
जियो बालक ! शाबास 👌 

Tuesday, July 17, 2018

बहुत कम में खुश हो जाता आदमी

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग
सड़क किनारे चूल्हे में रोटी सेंकते कामगार
बादल एक खेप बरसकर फ़ूट लिये। पुलों, इमारतों का उद्घाटन करके निकले लिये नेताओं की तरह। जिन्दगी भर उद्घाटन का श्रेय लेते रहेंगे। उद्घाटित इमारत मुकम्मल होने का इंतजार करती हुई खंडहर हो जाती है। कभी-कभी दुबारा उद्घाटित हो जाती है, कायदे से उद्घाटित होने के लिये।
देश क्या दुनिया में ही देखें तो शुरु की हुई चीजों के पूरा होने का औसत वही होगा जो इंसान के शुक्राणुओं-डिम्बाणुओं मिलकर बच्चा होने का। अरबों-खरबों ऐसे ही बेकार चले जाते हैं। उद्घाटन हुआ लेकिन पूरी नहीं हुई।
बारिश भी हरजाई की तरह मुंह दिखाकर फ़ूट ली। सड़क के गढ्ढे, नालियां उफ़नाकर रह गये। कहीं-कहीं सड़कें तलैयों में तब्दील हो गयीं। ऐसी ही एक मिनी तलैया में एक कुत्ता अपनी गर्मी दूर कर रहा था। कमर तक पानी में डूबा बैठा था। मुद्रा ऐसी जैसे लोग स्वीमिंग पूलों में बैठकर दारू, चाय पीते हैं। जीभ से हवा अंदर खींच रहा था। हवा अभी मुफ़्त है। कुछ दिन और खींच ले। बाद में क्या पता हवा पर भी टैक्स लग जाये। हवा में सांस लेने पर टैक्स लग जाये। नाक में सांस मीटर फ़िट हो जायें। लोग छोटी-छोटी सांस लेने लगें। लंबी सांस लेना विलासिता माना जाये।

कुत्ते को छोड़कर हम आगे बढे। सड़क किनारे भुट्टे बिक रहे थे। सिंक रहे थे। कुछ भुट्टों के दाने इतने कम थे गोया किसी बुजुर्ग के उखड़े हुये दांत। एक बच्चा नंगे बदन, कंधे में पट्टी टाइप बांधे भुट्टा सिंकवा रहा था। आंखों में धूप का चश्मा लगाये हुये। जम रहा होगा। यकीन से इसलिये नहीं कह सकते क्योंकि वह हमारी तरफ़ पीठ किये खड़ा था। पास ही 100 नंबर वाली पुलिस की गाड़ी के सिपाही नीचे उतरकर भुट्टा चबाते हुये कानून व्यवस्था की देखभाल कर रहे थे।
रिक्शे वाले अड्डे पर सुरेश मिले। राधा गंगा किनारे गयीं थीं। पटना की हैं। बताते हैं वहां जमीन-जायदाद, घर-परिवार सब लेकिन वे घूमते-घामते यहां आ गयीं। एक रिक्शेवाला सड़क किनारे ही ईंटों का चूल्हा सुलगाये रोटी पाथ रहा था। गोल मोटी रोटी सेंककर वहीं लकड़ी के पटरे पर धरता जा रहा था। वही उसका कैशरोल था। बातचीत का लब्बो-लुआब यही कि गर्मी बहुत है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, बादल, महासागर, बाहर, प्रकृति और पानी
नदी बादलों का दर्पण है
गंगा पुल पर खड़े हुये बहुत् देर गंगा को देखते थे। पानी कुछ बढा था लेकिन कम था। एक् नाव नदी में टहल रही थी। इवनिंग वाक सरीखा करती हुई। पुल पर जाती रेल भी गंगा को निहारने लगी। कुछ लोग नहाते हुये पानी में छप्प-छैंया कर रहे थे। बादलों का रंग नदी पर खिल रहा था। नदी दर्पण की तरह बादले के हर रंग की फ़ोटोकापी करती जा रही थी। कहीं लाल, कहीं सफ़ेद, कहीं मटमैली। अलग-अलग भाग का पानी अलग-अलग रंग में इठला रहा था। नदी सबको साथ समेटते हुये आगे बढती जा रही थी। बिना किसी हड़बड़ी के। ठीक है आगे जाना है लेकिन यह थोड़ी कि आगे जाते हुये दायें-बायें इठलायें भी न।
पुल के ऊपर से नीचे रहने झोपड़ी में रहने वाले लोग दिखे। झोपड़ी में रहने वाली महिला शायद घास छीलकर और बेंचकर वापस आ गयी थी। वो वहीं अपनी झोपड़ी के बाहर बैठी गंगा के पानी को देख रही। उसकी बिटिया हाथ में स्मार्टफ़ोन लिये अलग-अलग पोज में सेल्फ़ी टाइप ले रही थी। मोबाइल का उपयोग दर्पण के रूप में होने लगा है। क्या पता कल को गाना - ’मोरा मन दर्पण कहलाये’ की जगह बदलकर ’मोरा मोबाइल दर्पण कहलाये’ हो जाये।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, बादल, महासागर, बाहर, प्रकृति और पानी
सतरंगे बादल, बहुरंगी नदी।

नदी किनारे कुछ लोग मछली पकड़ रहे थे। मछली फ़ंसाने वाली कटिया नदी में डाले बैठे समाधिस्थ योगी से बैठे। कुछ-कुछ देर में जाल नदी से निकालते। लेकिन मछली न मिलती। फ़िर जाल नदी में घुसा देते। कविता उकसाती होगी:
’एक बार और जाल फ़ेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो।’
कितनी छलावे भरी, भरमाऊ आकर्षण वाली कविता है यह बुद्धिनाथ मिश्र जी की। मतलब मछली जिसके गलफ़ड़े जाल में फ़ंसकर कट जाते हैं, जान चली जाती है जाल में फ़ंसने के बाद। उसके मन में जाल में फ़ंसने की चाह होगी। क्या गजब !

लौटते में मंदिर किनारे बैठे गुप्ता जी दिखे। आंख का आपरेशन हो गया है। चश्मा बनवाना है। बनवा नहीं पा रहे। शुक्लागंज में 500 का बनेगा, नाथ चश्मे वाले ने 900 बताये हैं। पैसे का जुगाड़ हो तो बनवायें। अभी तो दुकान चल नहीं रही। रिक्शे रिपेयर की दुकानें अब कौन चलती हैं। रिक्शे भी तो चलन से बाहर हो गये। मंहगे, धीमे, मेहनत मांगते। अब तो सब बैटरी रिक्शे पर चलते हैं।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: Birendra Sharma, बैठे हैं और खड़े रहना
अपनी झोपड़ी के बाहर बैठे गुप्ता जी
हम कहते हैं- ’चश्मा बनवा लो। हम पैसे दे देंगे।’ आगे तय भी किया-’ आप नाथ चश्मे वाले के यहां चले जाना। उनको हम पैसे दे देंगे। आप चश्मा बनवा लेना।’ गुप्ता जी गदगद होकर कहने लगे हैं- ’आपने कह दिया यही बहुत है हमारे लिये।’ अपने देश का आदमी बहुत कम में खुश हो जाता है। अल्पसंतोषी है। कोई खुशहाली का वादा कर देता है, इसी में खुश हो जाता है। जाने कब से लोग वादे करते हुये अपने देश के लोगों को खुश करते आ रहे हैं। लोग खुश होकर फ़ंसते, लुटते, बरबाद होते जाते हैं। लेकिन फ़िर किसी के वादे पर खुश हो जाते हैं। फ़िर झांसे में आ जाते हैं।
चलते हुये गुप्ताजी पैदल चलने की सलाह देते हैं। बोले-’ पूरे शरीर की नसें खिंचती हैं। पंजे तक खिंचते हैं। खून क बहाव ठीक होता है। पसीना निकलता है।’ हम साइकिल पर बैठे सड़क से पैर टिकाये उनकी बात सुनते रहे, हामी भरते रहे। फ़िर उनको हमारे ऊपर तरस आया और बोले-’साइकिल भी अच्छी सवारी है। बढिया एक्सरसाइज होती है। लेकिन पैदल चलना चाहिये।’
एक्सरसाइज तो खैर चलती रहेगी। अब घड़ी कह रही है - ’समय हो गया बाबू। दफ़्तर भी चलना चाहिये।’

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Friday, July 13, 2018

साल की पहली बरसात


चित्र में ये शामिल हो सकता है: पौधा, बाहर और प्रकृति
पहली बरसात में धुला घर का लान
आखिर पानी यहां भी बरसा। पूरे महीने तरसाने के बाद झमाझम हुई। किसी दफ्तर में होता बादल तो आते ही दौड़ा लिया जाता। कोई कड़क अफसर होता तो बिना अनुमति अवकाश लेने पर 'निलंबित' कर देता भले ही फिर ऊपर से दबाब आने पर कुछ ले देकर बहाल कर देता।
बादल की देरी से खफा लोगों ने उसके आते ही मुस्कराकर खुश होकर स्वागत किया। बादलों ने आते ही अनगिनत झोपड़ियां उजाड़ दीं। तमाम खुले घरों को और खोल दिया। तबाह हुए लोगों को और तबाह कर दिया। यह सब देखकर कोई ऊंचा लेखक होता तो शायद फूहड़ रूपक बांधता -'.... लोगों ने देर से आए आये आवारगी करते , उत्पाती बादलों का उसी तरह स्वागत किया जिस तरह माननीय लोग दंगाइयों का स्वागत करते हैं।'
लेकिन हम इन सब चोंचलों में क्यों पड़े। जिसकी जो मर्जी वो वो करे। लोकतंत्र में सब छूट है।
पहली खेप पड़ते ही कुत्तों ने भी बादलों का भौंक-भौंक कर स्वागत किया। धीमे-तेज आवाज में उतार-चढ़ाव के साथ भौंकते हुए कुत्ते सबका ध्यान अपनी तरफ खींचने पर पूरा जोर लगाए थे। जो कुत्ते दमे के कारण जोर से भौंक नहीं पा रहे थे वे भौं का ही आलाप ले रहे थे। एक जगह चार-पांच कुत्ते गोल घेरे में खड़े भौंक रहे थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोल रहे थे लेकिन एक दूसरे पर, बिना काटे, जिस तरह भौंक रहे थे उससे एक बारगी मुझे लगा कि मैं सड़क पर चलने के बजाय किसी चैनल पर प्राइम टाइम बहस देख रहा हूँ। लेकिन अगल-बगल की हार्नबाजी ने मुझे कुछ देर में कुत्तों के चुप हो जाने से कन्फर्म हुआ कि यह कभी न खत्म होने वाली प्राइमटाइम बहस नहीं है।
सड़क पर लोग भीगते हुये और भागते हुए चले जा रहे थे। कम भीगे लोग तेजी से चल रहे थे। पूरा भीगने से बचने की मंशा से। लेकिन जैसे ही वे पूरा भीग जाते आराम से चलने लगते। पूरा भीगा हुआ आदमी सब कुछ लुट चुके आदमी जैसा हो जाता है। कुछ बचा ही नहीं भीगने से तो काहे को डरना बादल से और बरसात से।
एक आदमी साइकिल पर चला रहा था। कमीज के नीचे बनियाइन नहीं पहने थे। कमीज पानी में भीगकर पीठ पर चिपक गयी थी। कोई हीरोइन इस तरह बिना बनियाइन के सड़क पर चिपकी हुई कमीज की शूटिंग के लाखों करोड़ों ऐंठ लेती। फोटो, वीडियो वायरल होता सो अलग। लेकिन उस आम आदमी की पीठ पर चिपकी हुई कमीज का सीन हमारे अलावा किसी ने नोटिस भी नही किया।
उसकी कमीज भीग कर पीठ से चिपक गयी थी। लेकिन कुछ हिस्सा अभी भी पीठ पर गूमड़ की तरह उठा था। उस हिस्से में फंसी हुई हवा कमीज को उठाये हुए थी। झंडे की तरह फहराते हुए। पीठ से चिपकी हुई आधी से अधिक कमीज का चौथाई से भी कम हिस्सा अपने अंदर मौजूद हवा के बल पर तेजी से बरसते पानी का मुकाबला कर रही थी। बहादुरी का परचम लहरा रही थी। दूसरी तरफ बादल 'बूंद-बार्डिंग' करते हुए कमीज में छिपी हवा को नेस्तनाबूद करने की कोशिश कर रहे थे। साइकिल वाले के आंखों से ओझल होने तक दोनों में मुकाबला जारी था।
सड़क किनारे आम की ठेलिया पर लदे आम बरसते पानी में भीगते हुए बारिश के मजे ले रहे थे। चमकते हुए मुस्करा से रहे थे। उनको कपड़े भीगने की कोई चिंता नहीं थी। बारिश की बूंदे उन पर गिरकर उनके साथ ही घुलमिलकर आराम फरमा रहीं थीं।
नालियों के किनारे जमा कूड़ा बारिश के पानी के सहारे वापस नालियों में पहुँच रहा था। बहुत दिन तक नाली के बाहर बैठा कूड़ा बारिश की राह देख रहा था जैसे तिकडमी नौकरशाह मन माफिक अवसर देखते हैं। अवसर मिलते ही खुश होकर फिर लूट में जुट जाते हैं वैसे पानी के गले मिलते ही कूड़ा फिर खुश हो गया। कीचड़ में बदल गया। कूड़े की मात्रा थोड़ी ज्यादा थी, पानी का दम घुटने लगा। उसने बारिश के पानी से गठबन्धन किया। कीचड़ थोड़ा पतला हुआ। दोनों मिलकर तेजी से आगे बढ़े। प्रगति पथ पर अग्रसर हुए।
पुल पर तीन बच्चियां भीगती हुई चली जा रहीं थीं। आराम से। सबने एक दूसरे के हाथ पकड़े हुए थे। खुले में भीगते हुए भी सुरक्षा की सहज चिंता। हमारा भी मन भीगते हुए सड़क पर चलने का हुआ। लेकिन दफ्तर और उससे ज्यादा मोबाइल के भीगने की चिंता में हमने मन कि बात अनसुनी कर दी।मन कुनमुना कर चुप हो गया।
चौराहे पर खड़ा होमगार्ड का सिपाही फुटपाथ पर आ गया था । आड़ में खड़ा हुआ वह ट्रैफिक और बारिश को एक जैसी मोहब्बत से निहार रहा था। ट्रैफिक अपने आप आगे रुक-बढ़ रहा था।
हीर पैलेस के सामने एक आदमी छाता लिए हुए जा रहा। छाते के बावजूद वह भीग रहा था। हमको अपना ही शेर याद आ गया :
तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
भीग तो पूरा गए पर हौसला बना रहा।
साल की पहली बरसात का नजारा था यह। बाकी अगली बार बरसने पर।

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Wednesday, July 11, 2018

बिल्ली रास्ता काट गई


कल घर से निकले ही थे कि सामने बिल्ली दिखी। शायद टहलने निकली होगी। दिख गयी तो देख लिया। देखता रहा कुछ देर। फ़िर लगा कि लगातार देखना घूरना माना जायेगा। वैसे तो बिल्ली को देखना, घूरना अपराध तो नहीं लेकिन अटपटा तो महसूस ही कर सकती है वह भी। यह सोचते ही आंखें सड़क पर कर लीं। सड़क को देखने लगे। फ़िर घूरने लगे। सड़क को तो लोग कुचलते रहते हैं दिन भर। बकौल श्रीलाल शुक्ल जी- ’ट्रकों का अविष्कार ही सड़कों से बलात्कार के लिये हुआ है।’
सड़क और बलात्कार वाली बात श्रीलाल जी ने उस जमाने में कही होगी। आज होते तो आये दिन नवजात बच्चियां भी दरिंदगी का शिकार हो रही हैं। ट्रक पगडंडियों को भी रौंद रहे हैं।
बहरहाल हमने जैसे ही निगाह सड़क पर जमाई, बिल्ली मटकती हुई सड़क पर आ गई। दायें देखा, फ़िर बायें देखा। इसके बाद फ़िर दांये देखकर सड़क पार करने लगी। बिल्ली ने जिस सावधानी से सड़क पार करने के पहले इधर-उधर देखा उससे लगा इंसानों को यातायात के नियम बिल्लियों से सीखने चाहिये। कम से सड़क पार करना तो सीखने ही लायक है। हज्जारों जाने बचेंगी।
सड़क पार कर गयी बिल्ली। दूसरी तरफ़ चलने लगी। हम उसके द्वारा पार की हुई सड़क पर आगे बढे। अचानक याद आया कि बिल्ली रास्ता काट गयी है। मन किया रुक जायें। लेकिन देर हो रही थी दफ़्तर के लिये। बायोमेट्रिक हमारे इंतजार में लुपलुपा रहा होगा। हमारें अंगूठे, अंगुलियों से मिलन को बेताब। कोई हमारा इंतजार कर रहा है यह ख्याल ही अपने में इत्ता खुशनुमा है कि हम आगे बढ गये। अपसगुन वाली सोच को खुशनुमा ख्याल ने पटककर निपटा दिया। आगे बढ गये। बिना प्रयाण गीत गाये:
सामने पहाड़ हो,
सिंह की दहाड़ हो,
वीर तुम बढे चलो,
धीर तुम बढे चलो।
यहां न पहाड़ था , न दहाड़ । फ़िर में हम ठिठक गये। सही में पहाड़ और दहाड़ होते तो सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम हो जाती।
बहरहाल हम बिल्ली के चले हुये रास्ते को समकोण पर काटते हुये आगे बढे। देखा जाये तो बिल्ली का रास्ता तो हमने काटा। देख रही होगी तो जरूर कहेगी अपने कुनबे में -’देखो आदमी ने मेरे रास्ते को काटा है। पता नहीं क्या अशगुन होगा। दिन ठीक गया तो कुल देवी को दो चूहे का प्रसाद चढाऊंगी।’
आगे निकलकर हम खुद को बहादुर समझते रहे। बिल्ली के रास्ता काटने से डरे नहीं। पद्मश्री मिलनी चाहिये। लेकिन थोड़ा और आगे बढे और यही सोचते तो फ़िर यह सोचा कि अगर यही सोचते तो जरूर कहीं भिड़ेंगे। मतलब लफ़ड़ा बिल्ली के काटने में उत्ता नहीं जित्ता अपनी सोच में। मन को बहुत दांये-बायें किया लेकिन वह बिल्ली की सोच से आजाद नहीं हो पाया काफ़ी देर।
आगे जाम लगा था। उससे बचने की जुगत में दायें-बायें होते ही बिल्ली का ख्याल हवा हो गया। मतलब वास्तविक लफ़ड़े देखते ही आभासी बवाल दफ़ा हो गया। इससे यह लगा कि जब किसी मानसिक तकलीफ़ में फ़ंसें तो किसी असली के लफ़ड़े में टांग फ़ंसा ली जाये । आभासी तकलीफ़ दूर हो जायेगी। एक घर में दो किराये दार नहीं रह सकते न ! सही के लफ़ड़े को देखते ही दिमागी लफ़ड़ा फ़ूट लेता है। खाली दिमाग शैतान का घर ऐसे ही थोड़ी कहा जा सकता है।
आभासी बवाल और सही के लफ़ड़े की बात से याद आया कि आज हम लोग तमाम आभासी बवालों से निपटते रहते हैं। सही के लफ़ड़ों से निपटने में बहुत मेहनत लगती है न ! इसीलिये ख्याली लफ़ड़े पैदा करते हुये उनको निपटाते रहते हैं। देश के नेता भी यही करते रहते हैं। फ़ायदे का धंधा है। बहुत बरक्कत है ख्याली वीरता में। मेराज फ़ैजाबादी ने गलत थोड़ी कहा है:
पहले पागल भीड़ में शोलाबयानी बेचना
फ़िर जलते हुये शहरों में पानी बेचना।

कल की यह बात आज ऐसे ही याद आ गयी। सोचा आपसे भी साझा कर लें।

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राजनीति की मुश्किल समझो भैया


राजनीति की मुश्किल समझो भैया,
कैसे आयें नेता अच्छे,बढिया भैया।
ढेर पईसा चहिये चुनाव लड़ने को,
वोटर को दारू-पानी चहिये भैया।
जाति-वाति भी तो देखनी पड़ती है,
नेता मतलब लिकड़मी हो भैया।
सीधा-साधे को तो सब खा जायेंगे,
नेता तो बाहुबली ही चहिये भैया।
ऐसे में तो कुछ केस बनेंगे ही जी,
कुछ में सजा तो हो जायेगी भैया।
अब उनको भी यदि बैन करोगे जी,
कैसे फ़िर अपना देश चलेगा भैया।
राजनीति तो वैसे ही मुश्किल है जी,
अब ये नया लफ़ड़ा भी झेलों भैया।
जनता की सेवा कित्ती मुश्किल है,
राजनीति की मुश्किल समझो भैया।
-कट्टा कानपुरी

Tuesday, July 10, 2018

जल है तो कल है

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, आकाश और बाहर
बन्द होने की कगार पर बहुत दिनों से बन्द लाल इमली

हर शहर अपने में अनूठा है। कानपुर भी। सालों साल हो गए लाल इमली को देखते। किसी कम्युनिस्ट देश की सरकार सी जमी खड़ी है। हर साल चलाने चलने की खबर आती है। इसके पीछे ही बन्द होने की खबर चल जाती है। एक दूसरे पर जमी ईंटें आपस में गपियातीं होंगी -इन लोगों का कोई ठिकाना नहीं, कब कौन खबर चला दें।
नुक्कड़ पर होर्डिंग है। मोबाइल नम्बर लिखा है। विज्ञापन के लिए जगह खाली है। मन जगह खरीद ले और अपना विज्ञापन चिपका दें। अच्छा मान लो अपना विज्ञापन करते हैं तो लिखेंगे क्या ? बताइये इनमें से कुछ हो सकता है:
1. अनूप शुक्ल के शहर कानपुर में आपका स्वागत है।
2. अनूप शुक्ल की अगली किताब - कानपुर जिंदाबाद
3. बोर होने के लिए पढ़ते रहिये अनूप शुक्ल को
4. बेसिर पैर की हंकाई का ठिकाना
5.
तमाम और विज्ञापन हो सकते हैं। आप बताइए। लेकिन हम फोन तो किये नहीं जगह के लिए। क्या पता बिक गयी हो जगह। आजकल कब, कोई कितने में बिक जाए कुछ पता नहीं चलता।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश और बाहर
विज्ञापन के लिए जगह खाली है
लेकिन लफड़ा यह भी है कि कहीं कोई कानपुर से जुड़ा हमारा विज्ञापन देखकर ग़दर न काटने लगे -'कानपुर क्या इनके बाप का है। क्या कानपुर में स्वागत करने का ठेका इस फुरसतिये को किसने दिया?'
लाल इमली के अगल-बगल दो स्कूल हैं जहां हम 6 से 12 तक पढ़े। एक तरफ राजकीय इंटर कॉलेज, दूसरी तरफ बीएनएसडी इंटर कॉलेज। राजकीय इंटर कॉलेज में 10 तक पढ़े। इसके बाद दो साल बीएनएसडी में। बीएनएसडी में हमको सबसे बढ़िया गुरु जी मिले। आज भी मन करता है एफ वन सेक्सन में जाकर बैठ जाएं। लेकिन यह सोचकर मन मार देते हैं कि अब वे गुरुजी कहाँ होंगे।
तिराहे पर एक महिला टेम्पो वाले से अपने दो रुपये मांग रही थी। साथ में बच्चा था। दस दिए होंगे, आठ हुये होंगे। टेम्पो वाला किराया कुछ कह रहा होगा। महिला कुछ और। आखिर में लेकर ही मानी। जबर विश्वास।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, बादल और बाहर
समय से आगे चलती केसा की घड़ी। सुबह ग्यारह बजे समय बता रही साढ़े तीन।
आगे केसा की घड़ी उसके हमेशा समय से आगे चलने की कहानी कह रही थी। ग्यारह बजे थे सुबह के। घड़ी साढ़े तीन बजा रही थी। ये बड़ी घड़ियां रखरखाव के लिहाज से बवाल ही हैं।
सामने बस स्टैंड टाइप शेड में एक आदमी नंगे बदन बैठा था। पेट अंदर पिचका। मानो कपाल भाती करते हुये हवा पूरी तरह बाहर करते हुए किसी ने उसके पेट को स्टेच्यू बोल दिया हो। लंबी दाढ़ी। थूक-बलगम लगा हुआ। हम सड़क पर गाड़ी में। वह सड़क, खुदी हुई नाली, फुटपाथ पार करके शेड में बैठा था। इतनी दूरी बहुत होती है सम्वाद हीनता के लिए। कुछ देर उसको देखते रहे चुपचाप। उसने तो हमको देखा भी नहीं। फिर चले आये।
एक रिक्शा वाला बर्फ की सिल्ली लादे चला जा रहा था। सिल्ली चुपचाप आंसू बहाती चली जा रही थी। सूरज भाई उसको चुप करने की कोशिश में और पिघलाएं दे रहे थे। अब तक तो ठिकाने लग गयी होगी। उसके टुकड़े होकर किसी के पेट में, फिर नालियों में होते हुये गंगा में मिल गए होंगे।
लाल इमली वाली फोटो फिर से देखी। लिखा है जल है तो कल है। देखकर और सोचकर डर लगा। कल क्या होगा?
जल पर संकट है, कल पर संकट है
। 

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Tuesday, July 03, 2018

जाम का झाम



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घर से निकले सुबह। बाहर जाम लगा है। ओवरब्रिज बन रहा है। सड़क दोनों ओर खुदी है। फुटपाथ के बराबर बची है सड़क दोनों ओर। सुबह शुक्लागंज से कानपुर ओर आने वाले खूब होते हैं। दो स्कूल पड़ते हैं इसी ओवरब्रिज के पार। केंद्रीय विद्यालय और वीरेंद्र स्वरूप। दोनों तरफ जाम। वीरेंद्र स्वरूप की बसें पुल के बीच उल्टी तरफ खड़ी होकर होकर जाम के हाथ मजबूत कर रही हैं। किसी और गाड़ी का निकलना मुश्किल बना रही हैं।
हम जाम दर्शन के घुस गए भीड़ में। लोग सरकते हुए बढ़ रहे हैं आगे। चीटिंयों की तरह चुपचाप लाइन में लगे, जोंक की रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं। एक स्कूल की बच्ची अपने से छोटे बच्चे को अभिभावक वाली जिम्मेदारी के साथ उसके कंधे पर हाथ रखे आगे बढ़ रही है। वीरेंद्र स्वरूप के कुछ बच्चे जाम से निर्लिप्त अंदाज में थोड़ा अलग खड़े बतिया रहे हैं।
एक बुढ़िया आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ रही है। अचानक सामने से एक सांड आता दिखा। सुबह का समय, सांड शरीफ सा लगा। लेकिन था तो सांड ही। सबने उसको खुद सिकुड़कर रास्ता दिया। वह वीआईपी की जाम से निकल गया। सांडों को हर जगह रास्ता मिल जाता है। सांड सड़क का वीआईपी होता है। उसके लिए हर कोई रास्ता दे देता है।
एक आदमी शायद दिहाड़ी वाला मास्टर है। बताता है बगल वाले को -'गाड़ी जाम के बाहर छोड़कर आ गए। अटेंडेंस लगानी है। जाम में फंसे आदमी का जाम के प्रति अपना विनम्र सहयोग है। जहां गाड़ी खड़ी की होगी वहां कोई छुटभैया जाम लग गया होगा।
पत्नी जी का फोन आया। पता चला आधे घण्टे पहले स्कूल से निकलने के बावजूद घर से 100 मीटर की दूरी पर 'जाम-भंवर' में उलझी हैं। हम आकर सहायता की पेशकश करते हुए डरते हैं कि कहीं हां न कह दें। लेकिन तब तक उनकी तरफ जाम कम हुआ होगा। वे निकल गईं।
हम दफ्तर जाने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। जाम से दो-दो हाथ करने के लिए। इस बीच यह भी सोचते हैं कि जाम से बचने के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता होना चाहिए बच्चों को स्कूल जाने के लिए। लेकिन हम सोंच को बड़ी तेजी से हड़काते हुए भगा देते हैं -'ये सब विकसित देशों के चोंचले हैं। हम विश्वगुरु हैं। इन सब फालतू के लफड़ों में हम नहीं पड़ते।'
अब निकलते हैं वर्ना जाम में देर तक फंसने के चलते देर हो जाएगी दफ्तर पहुंचने में। जाम का झाम बावलिया होता है।

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Saturday, June 30, 2018

फ़ुटबाल


मानसून आने की खबर हो चुकी है। लेकिन बरस नहीं रहा है। लगता है कहीं रुककर फ़ुटबाल मैच देखने लगा है। पूरी दुनिया में आजकल फ़ुटबाल मचा है न!
बादल-बदलियों के साथ अपनी पसंदीदा टीमों को चीयरअप करने में जुटे होंगे। इसीलिये बरसने में देर कर रहे हैं शायद। जैसे दफ़्तरों में लोग चाय की चुस्कियां लेते हुये क्रिकेट मैच देखते हुये काम-तमाम करते हैं वैसे बादल-बदलियां धूप की चुस्कियां लेते हुये नैन-मटक्का कर रहे होंगे।
हो तो यह भी सकता है कि बादल-बदलियों को कहीं मुफ़्त का नेटवर्क मिल गया हो। अच्छे सिग्नल मिलते ही वे अपने दोस्त-सहेलियों से हाऊ-डू-यू-डुआने लगे हो। हम्म, यप्प, के, लोल मचाने लगे हों।
फ़ुटबाल का हल्ला मचा है। रोमांच के क्षणों में उचकते लोगों को देखकर लगता है कि कम ऊंचाई के बच्चों को बचपन से फ़ुटबाल देखने की आदत डाल दी जाये तो उनके कद निकल आयें। मैच के दौरान दर्शकों की तेज धड़कने देखकर अंदेशा होता है कि हो न हो फ़ुटबाल की शुरुआत किसी दिल के डॉक्टर ने की होगी। खेल के दौरान धकधक के चलते गड़बड़ाते दिल के इलाज के मरीज मिलते होंगे।
श्रीलाल शुक्ल जी ने लिखा है-’ हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे जो मन आता है लात लगा देता है।’ फ़ुटबाल देखकर मुझे यह अपने देश के विकास योजनाओं सा लगता है। कभी कोई आगे लात मारता है, कभी पीछे। कभी आसमान तक पहुंचती है, कभी लद्द से जमीन पर मुंह के बल गिरती है। गेंद दिन भर में मीलों भटकने के बाद भी रहती मैदान में ही है जैसे गंगा सफ़ाई में अरबों-खरबों खर्चने के बाद भी गंगा वैसे ही बहती हैं।
फ़ुटबाल में क्रिकेट की तरह चीयरबालायें नहीं होती। इसका कारण शायद उनके ठुमकने के लिये मौका तय करने में असफ़लता रही होगी। अगर हर गोल के बाद ठुमकने का नियम बनता तो किसी मैच में कोई गोल न होने पर चीयरबालाओं का ’ठुमका-उपवास’ हो जाता। अगर हर लम्बी किस पर मटकने का नियम होता तो क्या पता चीयरलीडर कमर उनके शरीर से एक ही मैच में समर्थन वापस ले लेती। उनके शरीर की सरकार गिर जाती। उस पर आई.सी.यू. लागू हो जाता। चीयरलीडरानियों की कमी की भरपाई खिलाड़ी लोग नाच-गाकर, एक दूसरे पर कूद कर लेते हैं।
हमारी फ़ुटबाल के बारे में जानकारी उतनी ही अच्छी है जितनी स्नूकर के बारे में हैं। दोनों के बारे में एक-बराबर जानकारी होने के नाते अपन पूरे दावे से कह सकते हैं कि दोनों ही क्रिकेट से अलग हैं। कम खर्चीला और ज्यादा वर्जिश वाला खेल होने के बावजूद अपने देश में क्रिकेट फ़ुटबाल के मुकाबले ज्यादा चलन में है तो उसका कारण सिर्फ़ यही समझ में आता है कि फ़ुटबाल में क्रिकेट जितनी समय की बर्बादी और निठल्लेपन की गुंजाइश नहीं बनती।
गेंद के पीछे भागते खिलाड़ी देखकर विदर्भ और अन्य इलाकों में पानी के टैंकर के पीछे भागती जनता की याद आती है। मैदान में भागते-भागते गिर जाने वाले खिलाड़ी गिरकर नाटक करते हुये तड़फ़ने लगने वाले खिलाड़ी देखकर लगता है कि दुनिया के सारे फ़ुटबालर अपने देश की नाट्य संस्थाओं के टॉपर होते हैं।
फ़ुटबालर फ़्री किक, पेनाल्टी किक हथियाने के लिये विरोधी खेमे में जितनी गिरा-गिरौव्वल करते हैं उसे देखकर कुर्सी हथियाने के लिये पतित होते जनप्रतिनिधियों की याद आती है। दूसरी टीम के खिलाड़ी को धकियाने वाले खिलाड़ी गिरे हुये को ही दोषी साबित करने की कोशिश करते हैं जैसे राजनीति में विरोधी को पीटकर उसी के खिलाफ़ पुलिस रिपोर्ट कराने का चलन है।
फ़ुटबाल में खेल कुल जमा 90 मिनट चलता है। सारी गिरा-गिरौव्वल डेढ घंट ही चलती लेकिन कुर्सी के लिये गिरौनी हरकतें साल-दर-साल जारी रहती हैं। सबसे बड़ी बात फ़ुटबाल के नाटक में भाषण नहीं होते। इसीलिये फ़ुटबाल मैदान के नाटक राजनीति की तरह बेहूदे, फ़ूहड़ और गलीज भरे नहीं लगते।
फ़ुटबाल के बारे में हमारी सिफ़र जैसी जानकारी और उड़ती-उजड़ती जैसी रुचि के बावजूद हमें यह खेल पसंद है तो सिर्फ़ इसलिये कि आजकल फ़ुटबाल मैचों के चलते फ़ूहड़ बयानों के घमासान में मंदी है। दुनिया की औसत खूबसूरत बढ गई लगती है। इसी समय लगता है कि काश दुनिया भर में खेले जाने वाली सारी फ़ुटबाली किकों को एक जगह इकट्ठा किया जा सकता और जहां कोई बेहूदे बयान देता, रिमोट किक अपने आप उसके मुंह में पड़ जाती। लेकिन चाहने मात्र से अगर कुछ होता तो अब तक दुनिया कहां से कहां पहुंच चुकी होती।
फ़िलहाल तो दुनिया कहीं नहीं पहुंची है। अपनी ही धुरी पर कदमताल कर रही है। उसकी ही गोद में फ़ुटबाल के अगले मैच की सीटी बज चुकी है। मैच की बात करते-करते मैच सही में शुरु हो गया। इससे यह लगता है बदलाव की बात करते रहना चाहिये। पता नहीं कब सही में कुछ बदल जाये। है कि नहीं?

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Friday, June 29, 2018

व्यंगैत, लिखैत की इंद्रधनुषी छटाएँ


व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार कराता है,जीवन की आलोचना करता है,विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का परदाफाश करता है। - परसाई
आज देश भर के अखबारों और पत्रिकाओं में धड़ाधड़ व्यंग्य लिखा जा रहा है। व्यंग्य जिसको परसाई जी स्पिरिट मानते थे अब विधा टाइप कुछ होने की तरफ़ अग्रसर है। पता नहीं विधा हुआ कि नहीं क्योंकि कोई गजट नोटिफ़िकेशन नहीं हुआ इस सिलसिले में। जो भी है इत्ता बहुत है कि व्यंग्य धड़ल्ले से लिखा जा रहा है।
व्यंग्य लिखा जा रहा है तो लेखक भी होंगे, लेखिकायें भी। कई पीढियां सक्रिय हैं लेखकों की। पीढियों से मतलब उमर और अनुभव दोनों से मतलब है। कई उम्रदराज लोगों ने हाल में ही लिखना शुरु किया है। कई युवा ऐसे हैं जिनकी लिखते-लिखते इत्ती धाक हो गयी है कि काम भर के वरिष्ठ हो गये हैं।
लिखैत खूब हैं तो लिखैतों की अपनी-अपनी रुचि के हिसाब से बैठकी भी है। व्यंग्य लेखकों के अलग-अलग घराने भी हैं। जहां चार व्यंग्यकार मिल गये वो अपने बीच में से किसी को छांटकर सबसे संभावनाशी्ल व्यंग्यकार घोषित कर देता है। कभी मूड़ में आया तो किसी ने सालों से लिख रहे किसी दूसरे व्यंग्यकार को व्यंग्यकार ही मानने से इंकार कर दिया। इन्द्रधनुषी स्थिति है व्यंग्य की इस मामले में। कब कौन रंग उचककर दूसरे पर चढ बैठे किसी को पता नहीं।
सभी व्यंग्यकार अलग-अलग बहुत प्यारे लोग हैं लेकिन जहां चार व्यंगैत इकट्ठा हुये वहीं लोगों को व्यंग्य सेनाओं में बदलते देर नहीं लगती।अनेक व्यंग्य के चक्रवर्ती सम्राट हैं व्यंग्य की दुनिया में जिनका साम्राज्य उनके गांव की सीमा तक सिमटा हुआ है।
बहरहाल यह सब तो सहज मानवीय प्रवृत्तियां हैं। हर जगह हैं। व्यंग्य में भी हैं। इन सबके बावजूद अक्सर बहुत बेहतरीन लेखन देखने को मिलता है। सोशल मीडिया के आने के बाद आम लोग भारी संख्या में लिखने लगे हैं । उनमें से कुछ बहुत अच्छा लिखते हैं। उनकी गजब की फ़ैन फ़ालोविंग है। उनके पढ़ने का इंतजार करते हैं लोग। सोशल मीडिया के लोगों के बारे में स्थापित व्यंग्यकारों की शुरुआती धारणा जो भी रही हो लेकिन उनको अनदेखा करना किसी के लिये संभव नहीं है।
कहने का मतलब टॉप टेन और बॉटम टेन की माया में उलझने के बेफ़ालतू चक्कर में पड़कर टाइम खोटी मती करिये। मस्त रहिये। देखिये, पढिये, सुनिये, गुनिये और धांस के लिखिये। जो होगा देखा जायेगा।
आप बुरा मत मानिये भाई यह हम आपसे नहीं कह रहे। यह खुद से कह रहे हैं। 

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Tuesday, June 26, 2018

मुस्ताक अहमद युसुफ़ी के पंच


1. इस्लाम के लिये सबसे ज्यादा कुर्बानी बकरों ने दी है।
2. मर्द की आंख और औरत की जबान का दम सब से आखिर में निकलता है।
3. इस्लामिक दुनिया में आज तक कोई बकरा स्वाभाविक मौत नहीं मरा।
4. दुश्मनी के लिहाज से दुश्मनों के तीन दर्जे होते हैं- दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार।
5. आदमी एक बार प्रोफ़ेसर हो जाये तो जिन्दगी भर प्रोफ़ेसर ही रहता है , चाहे बाद में वह समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे।
6. उस शहर की गलियां इतनी तंग थीं कि अगर मुख्तलिफ़ जिंस (विपरीत लिंगी) आमने-सामने से आ जायें तो निकाह के अलावा कोई गुंजाइश नहीं रहती।
7. वो जहर देकर मारती तो दुनिया की नजर में आ जाती, अन्दाज-ए-कातिल तो देखो -हमसे शादी कर ली।
8. दुनिया में गालिब वह अकेला शायर है कि जो समझ में आ जाये तो दंगा मचा देता है।
9. कुछ लोग इतने मजहबी होते हैं कि जूता पसन्द करने के लिये भी मस्जिद का रुख करते हैं।
10. मेरा ताल्लुक इस भोली-भाली नसल से है जो यह समझती है कि बच्चे बुजुर्गों की दुआओं से पैदा होते हैं।
11. हमारे जमाने में तरबूज इस तरह खरीदा जाता था जैसे आजकल शादी होती है- सिर्फ़ सूरत देखकर।
12. सिर्फ़ 99 प्रतिशत पुलिस वालों की वजह से बाकी एक प्रतिशत भी बदनाम हैं।
13. हुकूमतों के अलावा कोई भी अपनी मौजूदा तरक्की से खुश नहीं होता।
14. फ़ूल जो कुछ जमीन से लेते हैं उससे कहीं ज्यादा लौटा देते हैं।
15. हमारे मुल्क की अफ़वाहों की सबसे बड़ी खराबी यह है कि वे सच
निकलती हैं।
16. ये वो दौर था जब शौहदों को औरत का एक्स-रे भी नज़र आ जाए तो दिल में अरमान मचल उठते थे।
- मुश्ताक अहमद युसुफ़ी
मुस्ताक साहब के बारे में जानने के लिये आप यहां पहुंचे:

Monday, June 25, 2018

गंगा किनारे स्कूल

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं, जूते और बाहर
गंगा के तट पर इतवारी स्कूल
इतवार को टहलने निकले। साईकल किसी नवजात सरकार सी उचकती-फुचकती चल रही थी। नई सरकारें कसम खाते ही हर तरफ फ़ीता काटने लगती हैं। उसी तर्ज पर साईकल गड्ढे, सड़क सब जगह पहिया घुसाती चल रही थी। सरपट।
सुरेश अपने अड्डे पर रिक्शा सम्भाल रहे थे। रिक्शेवाले नदारद थे। जब मन आता है घर चले जाते हैं। वापस आ जाते हैं। राधा फूलबाग की तरफ अपनी रोजी कमाने गईं थीं। रोजी कमाने मतलब भीख मांगने। मांगने वालों का भी ड्यूटी टाइम होता है। देर करने पर दिहाड़ी कम हो जाती है।
शुक्लागंज के मुहाने पर सड़क डिवाइडर पर एक आदमी 'कम्बल कब्जा' करके टहलने गया था। जिस जगह सोया होगा, वहीं कम्बल छोड़ गया होगा।
डिवाइडर के दूसरे सिरे पर एक महिला घुटने सिकोड़े सो रही थी। कमीज पहने थी। कमर के नीचे बिना कपड़े। बाल उलझे। शरीर पर मैल। पता नहीं कहाँ से आई। कब से यहां है। सो रही थी इसलिए हिम्मत भी नहीं हुई कुछ पूछने की। जागती भी तो क्या कर पाते। मध्यम वर्ग का आदमी खाली दर्शक बना रहता है। कुछ भी होता रहे अगल बगल। देख लेगा। दुखी हो लगा। फोटो खैंच लेगा। वीडियो बना लेगा। कुछ लिख लिखा लेगा। बहुत हुआ तो दुखी होकर अपना अपना काम पूरा कर लेगा।
हमने भी मध्य वर्ग के सच्चे प्रतिनिधि की तरह चुपचाप महिला को कुछ देर देखा। फिर बाकी लोगों के देखने के लिए छोड़कर आगे बढ़ गए। आसपास के लोग अपने हिस्से का काम पहले ही कर चुके थे। महिला तसल्ली से सोती रही।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, जूते, भीड़ और बाहर
हर बच्चे का अपना आसन
घाट किनारे पेड़ के नीचे सुबह वाला स्कूल चल रहा था। 30-35 बच्चे अलग-अलग पढ़ रहे थे। क्लास के हिसाब से बच्चे बंटे थे। छोटे बच्चों को गणित पढ़ाते हुए बड़ी संख्या, बराबर, छोटी संख्या ( ग्रेटर , इक्वल टू, स्मालर दैन) सिखा रहे थे। बड़ी संख्या, छोटी संख्या के लिए चोंच इधर, चोंच उधर। मुंह इधर खुला, उधर खुला मतलब समझ सकने वाली भाषा में सिखा रहे थे बच्चे।
चबूतरे पर कुछ बच्चे पीरियॉडिक टेबल मतलब आवर्त सारणी सीख रहे थे। कक्षा छह में पढ़ते हैं बच्चे। हमें याद आता है कि हमारा परिचय आवर्त सारणी से तब हुआ था जब हम कक्षा ग्यारह में घुसे थे। कक्षा छह में तो अपन एबीसीडी से हेलो, हाउ डु यू डू सीखे थे। जमाना तेजी से आगे बढ़ रहा था।
अंग्रेजी सीखते बच्चे बीच बीच में पानी पीने की छुट्टी मांग रहे थे। कई बच्चों के एक साथ छुट्टी मांगने पर टीचर नाराज़ सी भी हुई। बच्चे चुप हुये। कुछ देर बाद फिर हाथ उठाकर पानी की अर्जी लगा दी।
इस बीच मोटर साइकिल के सहारे टिका ब्लैक बोर्ड हवा के झोंके से हिलकर नीचे गिर गया। ऐसे जैसे कोई गठबंधन सरकार साथी दल के समर्थन वापस लेने पर गिर जाए। बोर्ड फिर टिकाया गया। क्लास फिर शुरू हुई।
कुछ देर बाद योग क्लास शुरू हुई। बच्चों ने विभिन्नता में एकता की तरह एक ही आसन अलग- अलग तरह से करते हुए योग किय्या। योग के बाद बच्चों को जूडो-कराटे सिखाया गया। बच्चे आत्मरक्षा के उपाय सीख रहे थे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, मुस्कुराते लोग, लोग बैठ रहे हैं
संस्था की सदस्य कोषाध्यक्ष रचना
इस बीच जय हो फ्रेंडशिप ग्रुप के लीडर जयसिंह और कोषाध्यक्ष का काम भी देखने वाली रचना आईं। उनसे पता चला कि रजिस्ट्रेशन हो गया है ग्रुप का। लेकिन अभी खाता नहीं खुला। ग्रुप के करीब 50-55 सदस्य हैं। ग्रुप को सहयोग मिलने की बात करने पर पता चला कि अधिकतर सहयोग करने वालों की मंशा ग्रुप पर कब्जे की रहती है। जो भी सहयोग करता है, वह ग्रुप की उपलब्धियों को अपने खाते में जोड़कर खुद को चमकाना चाहता है।
अभी तो कोई ग्रांट नही मिलती तब यह हाल। कल को पैसा आएगा तब तो मारकाट ही मच जाएगी। समाजिक काम काज में भी बड़ी मारकाट है। बड़ी असामाजिकता है।
नई उम्र के बच्चों का उत्साह देखकर अच्छा लगता है। लगता है हम भी पढ़ाएं बच्चों को। एकाध दिन कर भी लेंगे। लेकिन नियमित कठिन लगता है। किसी भी काम को नियमित करना मुश्किल होता है। इसी चक्कर में भले लोग भी अच्छे कामों से दूर रहते हैं। हो नहीं पाते अच्छे काम ज्यादा। बुरे काम धड़ल्ले से होते रहते हैं।
लौटते हुए धूप काफी हो गयी थी। डिवाइडर पर सोती महिला पुल की छांह में सो रही थी। सड़क पर आते-जाते लोग उससे निर्लिप्त बगल से गुज़रते जा रहे थे। हम भी चुपचाप साइकिलियाते हुए घर आ गए।

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Sunday, June 24, 2018

मुश्ताक अहमद युसुफ़ी नहीं रहे

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मुस्ताक अहमद युसुफ़ी
आज फ़ेसबुक पर एक पोस्ट से पता चला कि मुश्ताक अहमद युसुफ़ी साहब नहीं रहे। 20 जून को उनका इंतकाल हुआ। हिन्दी व्यंग्य की दुनिया में इसकी खबर पता नहीं चली।
94 साल की उमर में मुश्ताक साहब का इंतकाल हुआ। मैंने पाकिस्तान के अखबार देखे। मुश्ताक साहब को पाकिस्तान में गालिब के पाये का गद्य लेखक माना गया है।
मुश्ताक साहब के कई वीडियो देखे सुबह से। एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया -’अहमद युसुफ़ी के युग में जीते हुये कैसा लगता है?’
उन्होंने जबाब दिया। अच्छा लगता है। लेकिन हर एक को अपने खुद के युग में जीना चाहिये।
एक सवाल के जबाब में उन्होंने जबाब दिया -’अपने से कमजोर पर तंज नहीं कसना चाहिये। मजा तो अपने से मजबूत पर तंज कसने का है।’
मुश्ताक साहब के बारे में खबरों का और उनके इंटरव्यू के लिंक नीचे दिये हैं। इन वीडियो में उनको उनकेे कुछ कलाम पढते हुये भी सुन -देख सकते हैं।
मुश्ताक साहब ने अपने एक बयान में कहा था- ’पश्चिमी समाज में लोग किसी इमारत को तब तक तवज्जो नहीं देते जब तक वह उजाड़ न होने लगे। इसी तर्ज पर अपने यहां लेखक को उसके मरने के चालीस दिन बाद से तवज्जो मिलती है।’
हास्य व्यंग्य के बेहतरीन लेखक मुश्ताक अहमद के निधन पर श्रद्धांजलि ।
मुश्ताक साहब के लेखन के कुछ अंश यहां पेश हैं:
1. हर ऐसी मुहिम पर शक करो, फ़जीहत भरी जानो जिसके लिये नये कपड़े पहनने पड़ें।
2. मूंगफ़ली और आवारगी में खराबी ये है कि आदमी एक बार शुरू कर दें तो समझ नहीं खत्म कैसे करें?
3. जब कोई किसी पुराने दोस्त को याद करता है तो दरअस्ल अपने को याद करता है।
4. बुढापे की शादी और बैंक की चौकीदारी में जरा फ़र्क नहीं। सोते में भी एक आंख खुली रखनी पड़ती है और चुटिया पे हाथ रखकर सोना पड़ता है।
5. मर्द भी इश्क-आशिकी सिर्फ़ एक बार ही करता दूसरी मर्तबा अय्यासी और उसके बाद निरी बदमाशी।
6. जवानी दीवानी की तेजी बीबी से मारी जाती है। बीबी की तेजी औलाद से मारते हैं औलाद की तेजी साइंस से और साइंस की तेजी मजहबी शिक्षा से। अरे साहब तेजी का मारना खेल नहीं है, मरते-मरते मरती है।
7. इससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा कि आदमी एक गलत पेशा अपनाये और उसमें कामयाब होता चला जाये।
8. दुनिया में पीठ पीछे की बुराई से हजम होने वाली कोई चीज नहीं।
9. एक पांव लंगड़ाना दोनों पांव लंगड़ाने से बेहतर है।
10. मुगल बादशाह जिस दुश्मन को अपने हाथ से मारना नहीं चाहते थे उसे हज पर रवाना कर देते या झंडा, नक्कारा और खिलअत (शाही पोशाक) देकर दक्खिन या बंगाल जीतने के लिये भेज देते।
11. इतिहास पढने से तीन लाभ हैं। एक तो यह कि पूर्वजों के विस्तृत हालात की जानकारी होने के बाद आज की हरामजदगियों पर गुस्सा नहीं आता। दूसरे याददास्त तेज जाती है। तीसरे , लाहौल विला कूवत, तीसरा फ़ायदा दिमाग से उतर गया। कराची भी अजीब शहर है हां तीसरा भी याद गया। तीसरा फ़ायदा यह कि खाने, पीने, उठने, बैठने , भाइयों के साथ मुगलिया बरताव की सभ्यता से परिचय होता है।
12. ऐसा लगता है मनुष्य में अपने आप पर हंसने का साहस नहीं रहा। दूसरों पर हंसने में उसे डर लगता है।
13. व्यंग्यकार को जो कुछ कहना होता है वो हंसी-हंसी में इस तरह कह जाता है कि सुनने वाले को भी बहुत बाद में खबर होती है।मैंने कभी किसी ठुके हुए मौलवी और व्यंग्यकार को लिखने-बोलने के कारण जेल में जाते नहीं देखा।
14. बिच्छू का काटा रोता और सांप का काटा सोता है। इंशाजी (इब्ने इंशा)का काटा सोते में मुस्कराता भी है। जिस व्यंग्यकार का लिखा इस कसौटी पर न उतरे उसे यूनिवर्सिटी के कोर्स में सम्मिलित कर देना चाहिए।
15. समाज जब अल्लाह की धरती पर इतरा-इतरा कर चलने लगते हैं तो धरती मुस्कराहट से फट जाती है और सभ्यताएं इसमें समा जाती हैं।
16. मुस्कान से परे वो विपरीतता और व्यंग्य जो सोच-सच्चाई और बुद्धिमत्ता से खाली है, मुंह फाड़ने , फक्कड़पन और ठिठोल से अधिक की सत्ता नहीं रखता।
17. धन, स्त्री और भाषा का संसार एक रस और एक दृष्टि का संसार है, मगर तितली की सैकड़ों आँखे होती हैं और वो उन सबकी सामूहिक मदद से देखती हैं। व्यंग्यकार भी अपने पूरे अस्तित्व से सब कुछ देखता, सुनता, सहता और सराहता चला जाता है। फिर वातावरण में अपने सारे रंग बिखेरकर किसी नए क्षितिज, किसी और रंगीन दिशा की खोज में खो जाता है।
18. जैसे-जैसे साम्राज्य पर अहंकार और हवस बढ़ती जाती है डिक्टेटर अपने निजी विरोधियों को ईश्वर का विरोधी और अपने चाकर-टोले को बुरा बताने वालों को देशद्रोही बताता है। जो उसके कदमों में नहीं लोटते, उन पर ईश्वर की धरती का अन्न, उसकी छांव और चांदनी हराम कर देता है। लेखकों, कवियों को शाही बिरयानी खिलाकर ये बताता है कि लिखने वाले के क्या कर्तव्य हैं और नमकहरामी किसे कहते हैं।
19. कभी-कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत ओढ़ लेता है।गौर से देखा जाए तो एशियाई ड्रामे का असल विलेन अतीत है। जो समाज जितना दबा, कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही उज्ज्वल और दुहराये जाने लायक लगता है।हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की और उन्मुख होता है और अतीत भी वो नहीं, जो वस्तुत: था, बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरन्त गढ़ कर बनाया है।
20. लीडर भ्रष्ट, विद्वान लोग स्वार्थी, जनता भयभीत-आतंकित और हर आदेश का पालन करने वाली। जब संस्थान खोखले और लोग चापलूस हो जायें तो जनतंत्र धीरे-धीरे डिक्टेटरशिप को रास्ता देता जाता है। फिर कोई डिक्टेटर देश को कुपित आंखों से देखने लगता है। तीसरी दुनिया के किसी भी देश के हालात पर दृष्टिपात कीजिए। डिक्टेटर स्वयं नहीं आता, लाया और बुलाया जाता है और जब आ जाता है तो प्रलय उसके साथ-साथ आती है।
21. कभी-कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत को ओढ़ लेता है। गौर से देखा जाये तो एशियाई ड्रामे का अस्ल-विलेन अतीत है। जो समाज जितना दबा, कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही अधिक उज्ज्वल और दुहराये जाने लायक दिखाई पड़ता है। हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की ओर उन्मुख होता है और अतीत भी वो नहीं, जो वस्तुतः था, बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरंत गढ़ कर बनाया है।
संबंधित कड़ियां
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1. https://epaper.dawn.com/DetailNews.php… मुश्ताक साहब के बारे में समाचार
3. https://www.youtube.com/watch?v=g7eFB0oJUeE
https://www.youtube.com/watch?v=d_Hdc6k_DX8 मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -1
4. https://www.youtube.com/watch?v=TxNe5tVA5eU मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -2
5. https://www.youtube.com/watch?v=RcT6SPaPOUY मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -3
6.https://www.youtube.com/watch?v=YoJqFbK2dYo मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -4
7. https://www.youtube.com/watch?v=5BCRS86SoPY मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -5
8. https://www.youtube.com/watch?v=B_2PtMjsUZM मुश्ताक साहब का व्यंग्य पाठ -6
9. http://www.hindisamay.com/…/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%… मुश्ताक साहब का उपन्यास - खोया पानी