Friday, September 28, 2018

मुस्कान पर कोई टैक्स नहीं लगता


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, Omprakash Rawat सहित, बाहर
साथ साथ मूंगफली पछोरते मियां बीबी
कल सबेरे पुल सालों से ’निर्माणाधीन पुल’ के बगल से गुजरते हुये निकले। पुल की दीवारें खेत की मेड़ सरीखी खड़ी थीं। मेड़ों के बीच की मिट्टी में पुल की फ़सल बोई हुई है। सालों से पक रही हैं। शायद इस साल दिसम्बर तक पक जाये।
शुक्लागंज की तरफ़ जाने वाली सड़क किनारे एक झोपड़ी के बाहर एक महिला अपनी बच्ची को स्कूल के लिये तैयार कर रही हैं। बच्ची खड़ी-खड़ी ऊंघ रही है। महिला भी जम्हुआते हुये उसके बाल काढ रही है। बच्ची ऊंघते हुये थोड़ा ज्यादा हिल गयी तो उसके बाल महिला के हाथ से छूटने को हुये। महिला ने फ़ौरन हाथ के कंघी से उसके सर पर ’कंघी चार्ज’ कर दिया। कुछ ऐसे जैसे स्थिति नियंत्रण के बाहर जाते देख पुलिस लाठीचार्ज कर देती है। ’कंघी चार्ज’ होते ही बच्ची सावधान मुद्रा में बाल कढवाने लगी। बाल काढने के बाद खड़े-खड़े ही उसके कपड़े बदले जाने लगे।
आगे एक झोपड़ी के बाहर एक परिवार के कई लोग सड़क किनारे फ़सक्का मारे बैठे चाय पी रहे थे। एल्युमिनियम की एक लुटिया में रखी चाय एक महिला के कब्जे में थी। वह खुद चाय पीते हुये अपने आसपास बैठे लोगों के कप में चाय एलाट करती जा रही थी। केन्द्र में बैठी चाय पर नियंत्रण वाली महिला से किसी ने अपने कप को मेरे सामने ’विशेष कप’ का दर्जा देने की मांग नहीं की।
सामने से एक बच्ची एक अल्युमिनियम का डब्बा हिलाते आती दिखी। हमें लगा शायद गंगाजल हो डब्बे में। बगल से गुजरी बच्ची तो देखा डब्बे में चाय थी। सुबह उठते ही दौड़ा दी गयी होगी बच्ची चाय लाने के लिये।
सुरेश सड़क पार सुलभ शौचालय के बाहर निपटने के लिये अपनी बारी का इंतजार करते खड़े थे। शुलभ शौचालय की सुविधा अभी मुफ़्त है। पता नहीं कब इस पर शुक्ल लग जाये। क्या पता कल को शौचालय की व्यवस्था इलाकेवार हो जाये। जैसे चुनाव के लिये पोलिंग बूथ होते हैं वैसे ही हर इलाके के लिये शौचालय बूथ बन जायें। एक इलाके के लोगों के लिये दूसरे इलाके के बूथ इस्तेमाल करने पर पाबंदी लग जाये। शौचालय का इस्तेमाल आधार से जुड़ जाये। मतलब कुछ भी हो सकता है किसी आधुनिक होते समाज में। कुछ लोगों को इससे तकलीफ़ भी हो सकती लेकिन आधुनिक होने में तकलीफ़ तो उठानी पड़ेगी। स्वच्छता की कीमत तो चुकानी पड़ेगी।
गंगा पुल पर खड़े होकर नदी को निहारा। नदी के बीच बालू उभर आई थी। अभी बरसात कायदे से खत्म भी नहीं हो पायी लेकिन नदी दुबली हो गयी है। इसके पानी का बड़ा हिस्सा बांधों/बैराजों ने अपने कब्जे में कर रखा है। जैसे दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों के एटीएम कार्ड उनके ठेकेदारों के कब्जे में रहते हैं और मजदूरों की मजदूरी का बड़ा हिस्सा ठेकेदार हड़प लेते हैं कुछ उसी तरह नदियों का पानी बांध/बैराज अपने कब्जे में कर लेते हैं। नदियां सिकुड़ जाती हैं।
हिमालय से इठलाती, इतराती निकली गंगा मैदानों में आते-आते सिकुड़-सिमट गयी हैं जैसे मायके की तमाम चंचल लड़कियां ससुराल में आकर सहमते हुये जीना सीख जाती हैं।
लौटते हुये एक झोपड़ी के बाहर आदमी औरत पूरी तल्लीनता से मूंगफ़लियां पछोरते दिखे। हमें लगा कि जीवन साथियों में समानता का आधार उनके बीच समान काम ही हो सकता है। ये नहीं कि महिला पसीना बहाये, पति सामने बैठे बीड़ी पीते हुये टांगें हिलाये। महिला ने बताया कि पिछले साल की हैं मूंगफ़ली। इस साल की फ़सल कुछ दिन बाद आयेगी।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर
तख्त नसीन बकरी
एक तख्त पर दो बकरियां खड़ी-बैठी दिखीं। खड़ी बकरी की मुद्रा देखकर लगा कि उसको माइक का इंतजार है बस। माइक सामने आते ही ’भाइयों-बहनों’ करने लगेगी।
आगे एक दुकान पर कुछ लोग बुफ़े सिस्टम में नाश्ता कर रहे थे। नाश्ता करते आदमी की शर्ट पर लिखा था ’आलवेज ग्रेसियस’। जिसको सुबह-सुबह नाश्ता मिल जाये वह हमेशा शानदार दिखेगा ही। यह भी लगा कि जिसको शानदार देखना हो उसको पकड़कर नाश्ता करा दिया जाये। राजनीतिक पार्टियां तो करती भी हैं ऐसा। हुजूम के हुजूम को नाश्ता-पानी-पूड़ी-सब्जी खिलाकर जानदार और शानदार बनाकर अपना काम निकाल लेती हैं।
स्कूल के बच्चे आने लगे थे। कुछ बच्चे नुक्कड़ पर खड़े आपस में बतिया रहे थे। वे शायद सब बच्चों के स्कूल जाने के बाद स्कूल जाने में यकीन रखते हों। इसी बीच एक बच्ची साइकिल से आई। उससे एक बच्चा बातें करने लगा। बाकी बच्चे दोनों के बीच होती बात को अलग-अलग कोण से अलग-अलग अंदाज में सुनते-देखते रहे। बातें कुछ ही देर में खत्म हो गयीं मतलब शुरु होते ही खल्लास टाइप। बच्ची साइकिल पर आगे चली गयी। बच्चे फ़िर आपसे में अलग-अलग तरह बतियाने लगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, साइकिल, वृक्ष और बाहर
बीड़ी से दोस्ती के 42 साल
वहीं कुछ रिक्शे वाले खड़े थे। बच्चों को स्कूल छोडकर सुस्ताते हुये। एक रिक्शेवाले ने पूरी ताकत से बीड़ी का सुट्टा लगाया। मुझे लगा कि बीड़ी का दम घुट जायेगा। हमसे बीड़ी की दशा देखी नहीं गयी। हमने उससे कहा- ’ इत्ती जोर से सुट्टा मार रहे हो बीड़ी की जान लोगे क्या भाई?’ सुनते ही उसे बीड़ी को मुक्त करके सड़क पर फ़ेंक दिया। बीड़ी को शायद चोट आई हो लेकिन सुट्टा मुक्त होकर सुकून की सांस जरूर ले रही होगी।
दूसरे रिक्शेवाले ने मेरे कहने के बावजूद बीड़ी नहीं छोड़ी। तसल्ली से पीता रहा। बहुत अधिक शोषण करने वालों और तसल्ली से शोषण करने वालों में यही अंतर होता है। विकट शोषण के बाद मुक्ति होने की संभावना ज्यादा होती है। तसल्ली से होने वाला शोषण देर तक चलता है ।
बात बीड़ी की होने लगी तो बताया कि आठ साल की उमर से बीड़ी पी रहे हैं। अब पचास के होने वाले हैं। मतलब बीड़ी का बयालीस साल का साथ। शुरुआत छोटा बालक बीड़ी से हुई थी। इसके बाद गणेश छाप, सेठ बीड़ी, श्याम बीड़ी , गोली छाप और न जाने किन किन बीडी की बात हुई। दिन में पचास-साठ बीड़ी सुलग जाती हैं। हमने पूछा घर में कोई टोकता नहीं तो पता चला कि बाल-बच्चे हैं नहीं और बीबी दारू के चलते छोड़कर मायके चली गयी है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं, वृक्ष और बाहर
इस्टाइल कोई हीरो की बपौती थोड़ी है
इस बीच एक रिक्शे बगल से गुजरा। रिक्शे पर बैठा आदमी टांग पर टांग धरे ऐसे बैठा हुआ था जैसे शंहशाह लोग सिंहासन पर बैठते हैं। टांग पर टांग धरा आदमी स्वभाव से सामंती मन का होता है। जैसे आदमी दूसरे आदमी पर कब्जा करना चाहता है वैसे ही उसकी एक टांग दूसरे पर सवार रहना चाहती है। लाखों साल हुये इंसान को पैदा हुए लेकिन बेचारा दूसरे पर कब्जा करने की कब्ज से ही मुक्त नहीं हो पाया अब तक। इसी चक्कर में अपना और पूरा कायनात का हाजमा बिगाड़े रहता है।
सूरज भाई हमको देखकर मुस्करा रहे हैं। शायद कह रहे हैं दूसरे के हाजमें की डाक्टरी करने के पहले देख लो तुम्हारा पेट ठीक है क्या? दफ़्तर नहीं जाना क्या आज?
हम सूरज भाई को गुडमार्निंग करके मुस्कराये। वे भी मुस्कराये। आप भी मुस्करा लीजिये। मुस्कान पर फ़िलहाल कोई शुल्क नहीं है और न ही मुस्कराने के लिये आधार से लिंक करना जरूरी है।

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Tuesday, September 25, 2018

झूठ बोलने का मन


आज थोड़ा झूठ लिखने का मन हुआ। एक से बढ़कर एक झूठ हल्ला मचाने लगे- 'हम पर लिखो, हम पर कहो।'
हमने सब झूठ को हड़काते हुए कहा -'अनुशासन में रहो। लाइन लगाकर आओ। सबका नम्बर आएगा। हल्ला मत मचाओ।'
सारे झूठ बमकने लगे। हमको सच समझ लिया है क्या ?
एक झूठ हल्ला मचाते हुए बोला-'हम लाइन लगाकर आएंगे तो हमारा तो वजूद ही निपट जाएगा। हम तो एक के ऊपर एक लदफद कर आते हैं। इसीलिए जब तक पहचाने जाते हैं, तब तक अपना काम करके निकल जाते हैं।'
हम जब तक उसकों कहें तब तक वह पलटकर फूट लिया। भागते हुए दिखा उसकी शर्ट पर 'सत्यमेव जयते लिखा' था।
हमको झूठ की कमीज पर लिखे लिखे 'सत्यमेव जयते' से आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि आजकल झूठ बोलने का यही फैशन चलन में है। बड़े झूठ सच के लिबास में ही बोले जाते हैं। देश सेवा के नाम पर स्वयंसेवा का चलन है। हमको अचरज उसकी स्पीड पर था। जितनी तेज वह भागा उतनी तेज ओलंपिक में भागता तो गोल्ड मेडल मिल जाता ।
हमने उसकी स्पीड पर ताज्जुब किया तो उसकी जगह ले चुके झूठ ने बताया -'उसकी 'सत्यमेव जयते' वाली ड्रेस किराए की है। घण्टे भर के लिए लाया था। देर करता तो अगले घण्टे का किराया भी ठुक जाता। बहुत मंहगा होता जा रहा है झूठ बोलना भी आजकल। आप समझते हो सिर्फ पेट्रोल ही ऊपर जा रहा है।'
हम कुछ और कहें तब कुछ और झूठ हल्ला मचाने लगे। हल्ला मचाने वाले 'मूक विरोध' की कमीज पहने थे। हमें लगा कि कुछ देर और ठहरे यहां तो सब मिलकर हमको पीट देंगे। हमारे शक की वजह उनकी कमीजों पर लिखा नारा था। सबकी छाती पर लिखा था -'अहिंसा परमों धर्म:। '
हम फूट लिए कहकर कि अभी आते हैं। सारे झूठ हमारी बात सुनकर खुश हो गए। वे आपस में धौल धप्पा करते हुए बोले -'ये तो अपना ही आदमी निकला। हमारी ही तरह झूठ बोलता है। इसको अब लौटकर आना नहीं। चलो फालतू टाइम क्या खोटी करना।'
हमको लगा कि समय सही में कीमती है। झूठ बोलने वाले तक इसको बर्बाद नहीं करते। बिना समय बर्बाद किये झूठ बोलते रहते हैं।

Monday, September 24, 2018

नकली असली से ज्यादा चमकता है

सूरज भाई बहुत दिन बाद दिखे आज

सूरज भाई बहुत दिन बाद दिखे आज। आसमान कि छत पर खुपड़िया का जरा सा हिस्सा दिखा पहले। शायद थाह ले रहे हों कि उगते समय कोई ढपली न मार दे। जैसे कोई चोर दीवार फांदने से पहले चारो तरफ देखता होगा उसी अंदाज में मुंडी उठाकर इधर उधर देख रहे थे। किरणें दोनों तरफ रोशनी की टार्च मारते हुए अपने पप्पा की सहायता कर रहीं थीं।
उगते समय लाल सुर्ख मुंह वाले सूरज भाई ऐसे अफसर की मानिंद दिखे जो यह मानता है कि सुबह सुबह गर्म होकर दो-चार लोगों को हड़का देने से दिन शुरू करने से लोग अनुशासन में रहते हैं। यह बात अलग की सूरज भाई से अंधेरा छोड़कर कोई हड़का नहीं। अंधेरा तो उनके आने की खबर पाते ही फूट लिया। चिड़िया चहकते हुए सूरज भाई को गुडमार्निंग कह रहे थीं। सूरज भाई भी सबकी चोंच पर किरणें बरसाते हुए सुप्रभात कह रहे थे।
निकलने के बाद सूरज भाई बड़ी धीरे से ऊपर उठे। ऐसा लगा उनके रथ की क्लच प्लेट घिस गयी हो। इसी चक्कर में स्पीड कम हो गयी हो। या यह भी हो सकता है कि पहली चढ़ाई में रथ पहले गियर पर चल रहा हो। कुछ देर बाद धड़ल्ले से ऊपर उठने लगे। बिना दाएं-बायें देखे दुनिया भर को रोशनी बाँटने लगे। उनकी रोशनी बाँटने की स्पीड काम इकट्ठा हो जाने पर आंख मींचकर बाबू द्वारा क्लियर किये कागजों पर दस्तखत करने वाले साहब की स्पीड को भी मात कर रही थी।
सूरज भाई की फोटो हमारे बरामदे में के फर्श पर चमक रही थी। फोटो मने प्रतिबिम्ब। प्रतिबिम्ब देखकर फिर लगा कि नकली असली से ज्यादा चमकता है, चमचा नेता से ज्यादा बमकता है। सब कुछ उधार का है इस प्रतिबिम्ब का। फर्जी स्टार्टअप सरीखा। उधार की रोशनी, हराम की जमीन लेकिन चमक ऐसी जैसे असल का बाप हो।
किरणें सूरज भाई की कुछ ज्यादा ही खिलखिल करती दिखीं। सूरज भाई का वात्सल्य देखकर लगा कि शायद उनको भी पता चल गया कि आज बेटी दिवस है। इसीलिए 'पिता पोज' में हैं।
बहुत दिन बाद मिलने पर चाय-साय भी हुई। सूरज भाई अपनी बच्चियों की तरफ निहारते हुए बोले - मुकेश तिवारी जी सही कहते हैं:
'बेटियां अपने आप में मुक्कमल जहां होती हैं।'
और कुछ बात होती तब तक किरणों ने अपने पापा की चमकते हुए बुला लिया। सूरज भाई लपकते हुए बिना बाय बोले चल दिये। बेटी दिवस के दिन बच्चियों को नाराज करने का जोखिम उठाने की हिम्मत कहाँ उनके पास।
हम भी निकलते अब दफ्तर। आप भी मजे करिये।

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Tuesday, September 11, 2018

हम सो गए हैं बड़ी देर से, नींद बड़ी गहरी है

हम सो गए हैं बड़ी देर से, नींद बड़ी गहरी है,
खबरदार, जो गुडनाइट के बहाने जगाया तो।
मिला था पेट्रोल मुझे, मुख्तसर से सपने में,
डपट दिया - लुट जाएगा अकेले नजर आया तो।
ठीक है शेर बढिया है, बड़ा डम्प्लाट भी है
खफा हो जाएंगे गर, किसी ने मुझे बताया तो।
-कट्टा कानपुरी

Thursday, September 06, 2018

आंखों में रंगीन नजारे, सपने बड़े-बड़े

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
राजोल से बचकर रहना कहने के मुस्कराहट बिखेरते पंकज बाजपेयी

बहुत दिन से गंगा दर्शन नहीं हुये थे। मन किया देखा जाये। निकल लिये। पैदल। पुल के बगल से गुजरते हुये। नुक्कड़ तक पहुंचते-पहुंचते बारिश के पानी और मिट्टी के गठबंधन से सड़क पर कीचड़ ही कीचड़ हो रखा था।
कीचड़ पतला था। गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की तरह मरगिल्ला सा और अस्थाई भी। शायद इसीलिये उसमें कोई कमल नहीं खिला था। कमल खिलने के लिये भी काम भर का कीचड़ चाहिये होता है। कम कीचड़ में नहीं खिलता। खिलता होता तो अनगिनत अभावग्रस्त कीचड़ाई आंखों में कमल खिल रहे होते। उनकी जिंदगी से अंधेरा छंट गया होता।
कमल भले न खिला हो लेकिन अपन के चरण कमल तो थे ही। कीचड देखते ही चिपकने के लिये लपका। वो तो कहो ’पच्चल’ पहने थे वर्ना चिपक ही गया होता। लेकिन लाख बचाव के बावजूद कीचड की कुछ महत्वाकांक्षी बूंदे चप्पल के पीछे से होत हुई पांव, घुटन्ने, कमीज तक पहुंच ही गईं।
सड़क पर सवारियों की सबसे पहले निकलने की मारामारी थी। इस चक्कर में सबके निकलने में देर हो रही थी। कोई किसी को बगलियाकर निकला भी तो आगे फ़ंस गया। उसको फ़ंसा देखकर पीछे रह गयी सवारी के चेहरे के संतोष का वर्णन करने की क्षमता नहीं है अपने में। आप बस समझ लीजिये।
सड़क थोड़ी साफ़ हुई तो कुछ बच्चे सुट्टा लगाते दिखे। एक बच्चा सुट्टा लगाकर धुंआ दूसरे के मुंह पर फ़ेंक रहा था। सिगरेट के धुंये से अगले के गाल गरम करम करने के पीछे शायद उसकी मंशा ऊर्जा के अधिकतम संभावित उपयोग की रही होगी।
एक लड़की सर झुकाये चुपचाप सड़क पर चली जा रही थी। सड़क के अराजक माहौल से बचे रहने के लिये सर झुकाकर चुपचाप नामालूम तरीके से गुजर जाना ही समझदारी है आजकल के समय। समाज में जो अराजक नही है वे इसी तरह चुपचाप गुजरते हुये जी रहे हैं। मेरे बगल से गुजरते हुये लड़की ने अपनी मुट्ठी में दबाई हुई गुटका की पुडिया से कुछ मसाला निकालकर मुंह में रखा और शांति से आगे निकल गयी। पुडिया कसकर मुट्टी में दबा ली। शायद उसको डर हो कि कोई देखकर मांगने न लगे।
आगे सुरेश के रिक्शे के अड्डे पर राधा और सुरेश कुछ और लोगों के साथ बैठे थे। पता चला राधा कुछ दिनों से बीमार हैं। झटक गयी हैं। सुरेश दवा लाये हैं। प्राइवेट डॉक्टर से। अब कुछ फ़ायदा है। सुरेश की बात से एहसास हुआ कि आजकल किसी को सरकारी डाक्टर की दवा का भरोसा नहीं। प्राइवेट डाक्टर से इलाज नहीं कराया तो क्या कराया?
गंगा बढी हुई हैं। दोनों तरफ़ के पाट तक पानी ही पानी। अंधेरे में पानी और खतरनाक सा दिख रहा था। नाव वाले ने बताया कि अभी भी नाव चलती है। दो दिन पहले एक लड़का और एक लड़की पुल से कूद गये। लड़की को नाव वालों ने बचा लिया, लड़का डूब गया। फ़ूलने पर ही ऊपर आ पाया। पता नहीं अमूल्य जीवन को बरबाद करने का हौसला और मन कैसे बना पाते हैं लोग।
लौटते हुये एक झोपड़ी के बाहर रखे एक तख्त पर एक बच्ची गीले आटे की बहुत छोटी गोल लोई सी बनाकर एक लाइन में धर रही थी। दोनों हथेलियों के बीच रगड़कर आटे की गोलियां बनाती हुई बच्ची की उमर चार साल की है। स्कूल नहीं जाती अभी। पता नहीं आगे भी जायेगी क्या?
एक ठेलिया पर चना बेचते दुकानदार से बतियाता हुआ रिक्शावाला चना-चबेना बंधवाकर रिक्शे की गद्दी के नीचे धर रहा है। दोनों प्राणी सीतापुर के पास के हैं। इसीलिये सौदेबाजी के बाद भी बतिया रहे हैं। बतियाने में कोई पैसा थोड़ी लगता है। यहां ज्यादातर रिक्शेवाली, अस्थाई दुकानदार सीतापुर के हैं। भुजिया की दुकानपर एक बच्ची तख्त पर ठोडी सटाये सबकी बातचीत सुन रही है। पता चलता है कि १४-१५ की बच्ची की पढाई घर वालों ने तीसरी के बाद छुड़ा दी। स्कूल भेजना बन्द कर दिया, इत्ता खर्चा कहां से करें। लौंडा जा रहा है स्कूल। हम बताते हैं कि पास के सरकारी स्कूल में मुफ़्त में पढाई होती है, वहां क्यों नहीं भेजते? वो कई तर्क देते हुये हमारी बात इधर-उधर कर देते हैं। बच्ची मुस्कराते हुये हमारी बात सुनती है। उसकी मुस्कान से लगता है मानो वह कह रही हो- ’आप नहीं समझ पाओगे यह सब बात।’
बच्ची की आंखे देखकर अनायास नंदन जी की कविता याद आई:
आंखों में रंगीन नजारे,
सपने बड़े-बड़े
भरी धार लगता है जैसे
बालू बीच खड़े।
इस कविता का बच्ची के चेहरे के भाव से कोई साम्य नहीं। वह पता नहीं क्या कुछ सोच रही हो। उसके सोच से एकदम अलग हमको यह कविता पंक्ति याद आ रही थी। हम अपने अनुभव संसार, याद गिरोह की जकड़ से बाहर भी कहां निकल आते पाते हैं।
रिक्शेवाला लंबा, स्वस्थ और घनी मूंछो वाला है। बताता है कि वो किसानी करते हैं। कुछ दिन रिक्शा चलाते हैं। हजार-बारह सौ जहां जमा हुए वापस लौट जाते हैं। आजकल नये रिक्शे का किराया ६० रुपये, पुराने का ४० है। रिक्शे वाले मालिक के कोई बीमारी है। हज्जारों फ़ूंक दिये लेकिन ठीक नहीं हो पाये।
सुबह पंकज बाजपेयी से भी मिले। दोपहर बाद। बोले –’माल कहां है?’ माल मतलब पालीथीन मतलब जलेबी, दही। हमने कहा आज देर हुई इसलिये नहीं लाये। अगले इतवार को लायेंगे।
फ़िर शिकायत कि मिठाई वाले ने मिठाई नहीं दी। दिलवाई। चाय पी गयी। चाय पीते हुये किसी को देखकर उसकी तरफ़ लपके। शायद उसने पैसे दिये। सटककर जेब में धर लिये। हमने पूछा –क्या है? बोले –’नोट जलाने को दिये हैं।’
हमने बताया कि हमको इनाम मिला है। बोले- ’बैंक में धरना पैसा। हम खाता खुलवा देंगे। रजोल को न बताना। मर्डरर है वह। तुम चिंता न करना। हम उसको देख लेंगे।’
चलते हुये बोले-’ सिक्का देते जाओ।’
हमने कहा-’ तुमको अभी वो पैसे दे गया है। सिक्का क्या करोगे?’
बोले –’ वो तो नोट दिया है जलाने को।’
दस रुपये का सिक्का देकर चलने लगे तो बोले- ’अबकी बार माल जरूर लाना। पालीथीन वाला।’ आंख नचाते हुये कहा-’ वहां की जलेबी बढिया रहती हैं। मालदार है।’
विदा होते समय हाथ त्रिशूल की तरह पैतालीस डिग्री झुकाते हुये बोले –भाभी को चरण छूना कहना।


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Friday, August 31, 2018

’सूरज की मिस्ड कॉल’ को सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय पुरस्कार

कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.
सूरज की मिस्ड कॉल

आज शाम को हम दफ़्तर से घर के लिये निकलने वाले थे कि हमारे हमनाम Anoop Mani Tripathi का संदेशा व्हाट्सएप पर मिला। पहले हम सोचे घर जाकर देखेंगे लेकिन फ़िर मन किया देखकर चलें। संदेश उप्र हिंदी संस्थान द्वारा जारी पुरस्कारों की सूची थी। हमने सोचा हमको काहे भेजा भाई जी ने! फ़िर उत्सुकतावश देखा तो एक जगह ’अनूप शुक्ल’ का नाम था। हम सोचे होंगे कोई हमारे नामराशि। अनूप नाम वाले वैसे भी जलवे दिखाते रहते हैं। लेकिन फ़िर बगल में किताब का नाम देखा तो दिखा - ’सूरज की मिस्ड कॉल।’ हम थोड़ा चौकन्ने हो गये।
ऊपर देखा तो इनाम राशि थी ७५०००/- हमें लगा मौज ली जा रही है। लेकिन फ़िर जब देखा तो लगा नहीं ये तो सही में इनाम की घोषणा है हमारे नाम से। ’सूरज की मिस्ड कॉल ’ को यात्रा/ रेखाचित्र / डायरी वर्ग में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय पुरस्कार मिला। सभी पुरस्कारों की सूची का लिंक यह रहा : https://satyodaya.com/…/lucknow-live/hindi-institute-awards/
मजेदार अनुभव रहा यह। सूरज भाई अभी अमेरिका में चमक रहे होंगे। सुबह मिलेंगे तो बतायेंगे उनको भी। खुश हो जायेंगे। पक्का कहेंगे - ’यार, मजा आ गया। चाय पिलाओ इसी बात पर। किरणें भी खिलखिलाते हुये मजे लेते हुये कहेंगी- आपको इनाम मिल गया। ताज्जुब है, मतलब बधाई हो। किरणें कब बदमाश थोडी हैं।"
किताब आनलाइन http://rujhaanpublications.com/ से प्राप्त कर सकते हैं। किंडल का लिंक नीचे कमेंट बक्से में दिया है।
मजाक-मजाक में मिले इस इनाम के पीछे हमारे तमाम वे पाठक हैं जो हमारी सूरज भाई से जुड़ी पोस्ट्स बांचते रहे और हमारी सच्ची-झूठी तारीफ़ करते हुये हमको लिखने के लिये उकसाते रहे। अपने सभी प्यारे पाठक मित्रों-सहेलियों का आभार।


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Thursday, August 30, 2018

स्टेटस लिंचिंग



चित्र में ये शामिल हो सकता है: साइकिल
साइकिल की फोटो बड़े बेटे ने भेजी। अमेरिका से। इससे वह दफ्तर जाता है आजकल। 

दस स्टेटस लिखने की सोची सुबह से। सब अपलोड होने के पहले फूट लिए। बोले - 'हम न जाएंगे टाइम लाइन पर। लोग हमको कूट डालेंगे। ' स्टेटस लिंचिंग' चल रही है आजकल सोशल मीडिया में। हमारी जान को खतरा है। हम न जाते टाइमलाइन पर कुर्बान होने।'
हमने सबको हड़का दिया -'दफा हो जाओ मेरी निगाह के सामने से। मुंह मत दिखाना हमको। दफ्तर जाना है।'
सारे स्टेटस डरपोक बहादुर की तरह खिलखिल करके हंस रहे हैं। नठिया, हरजाई, मौसमी, बरसाती बदमाश कहीं के।
लौटकर निपटते सबसे। अभी जरा दफ्तर हो आएं।
साइकिल की फोटो बड़े बेटे ने भेजी। अमेरिका से। इससे वह दफ्तर जाता है आजकल। 

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Thursday, August 16, 2018

नानक दुखिया सब संसार

पेड़ से अलग हुआ पेड़ धूप में आराम करता हुआ

कल झंडा फहराते हुए घर लौटे। रास्ते में एक पेड़ दिखा। धूप में आराम सा करता हुआ। उसकी भी छुट्टी रही होगी। हवा में टांग फैलाकर अलसाया पेड़।

हमको पेड़ अलसाया, सोता और आराम करता दिखा। किसी को पेड़ से अलग हुआ पेड़ दिखेगा। अलग मतलब बड़े पेड़ की पार्टी छोड़कर छोटा पेड़ बना। अलग हुआ पेड़ अलफ़ नँगा पसरा था जैसे समुद्र तटों पर सैलानी धूप स्नान करते हैं। सैलानी तो फिर भी एकाध कपड़े पहने रहते हैं, पेड़ तो एकदम मुक्त अर्थव्यवस्था की तर्ज पर पूरा दिगम्बर। कोई कहेगा, बेहया है, बेशर्म है। दूसरे कहेंगे बोल्ड है, ब्यूटीफुल है। आप क्या कहते ?

सड़क और फुटपाथ से उतर कर दो रिक्शेवाले अपने रिक्शे में बैठे बतिया रहे थे। आम तौर पर स्कूली बच्चों को लाने का काम करते हैं। आज उनकी छुट्टी तो इनकी भी । बतिया रहे है तसल्ली से।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: लोग बैठ रहे हैं, बाहर और प्रकृति
फुरसत से गप्पाष्टक
हमने पूछा आज छुट्टी तो रिक्शा लिया क्यों? किराया बेकार में दोगे। बोले -'आज किराया नहीं पड़ता।

आसपास के जिलों के रहने वाले रिक्शेवाले पता नहीं क्या बतिया रहे होंगे। गुफ्तगू का विषय क्या होगा हम कल्पना नहीं कर सकते। उन्होंने लालकिले का भाषण सुना नहीं होगा, चुनाव चर्चा भी नहीं करते लगे, अंतरिक्ष मे जाने का भी कोई प्लान नहीं दिखा उनके चेहरे पर। पता नहीं क्या कुछ बतिया रहे होंगे लेकिन उनकी तसल्ली देखकर बड़ा सुकून लगा। बिना किसी शिकायती अंदाज में तसल्ली से किसी को बतियाते देखना भी सुकून देह है।

वहीं फुटपाथ पर पानी का पाउच हाथ में लिए एक और आदमी दिखा। अपनी मर्जी से ही उसने देश के हाल पर कमेंट्री शुरू कर दी। लब्बोलुआब यह कि सब अमीर लोग खुश हो रहे हैं, गरीब पिट रहे हैं। कोई किसी की चिंता नहीं करता, सब अपना पेट भरने में लगे हैं।

'नानक दुखिया सब संसार' कहते हुए बोले --'किसी के सामने अपना दुखड़ा नहीं रोना। सबके पास अपने रोने हैं। तुम नौ आने का दुख सुनाओगे अगला बारह आने का पेल देगा। उसके दुख की बाढ़ में तुम्हारा दुख बह जाएगा। इसलिए अपने में मस्त रहो।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, वृक्ष, बाहर और प्रकृति
नानक दुखिया सब संसार
बतियाने पर पता चला कि वो ज्ञानी बुजुर्ग ओएफसी से 2012 में रिटायर हैं। सेल मशीन में थे। गोला छीलते थे। शाम को लौट कर अपनी पान की दुकान चलाते थे। आज भी बैठते हैं पर शाम को। साहू पान भंडार ।
हमने उस समय के अधिकारियों के नाम लेते हुए पूछा सुशील ठाकुर जी को जानते हो? ए एन श्रीवास्तव को जानते हो?
बोले - ठाकुर साहब को कौन नहीं जानता। वो तो अब रिटायर हो गए। श्रीवास्तव साहब भी बहुत बढिया अफसर था। हमारे लिए रेस्ट रूम बनवाया। खूब काम किया, करवाया।
सुशील ठाकुर जी हमारे पहले बॉस थे। अकेले ऐसे अधिकारी जिनकी मेहनत के चलते हम उनका अदब करने के साथ डरते भी थे। 
ए एन हमारे साथ के हैं। आजकल अंबाझरी में हैं। डिपार्टमेंट के सबसे कुशल अधिकारियों में से एक।
हमने बताया - हम भी वहीं थे। आजकल ओपीएफ में हैं।
हमारा हाथ जबरन अपने सर पर धरकर आशीर्वाद ले लिए।
उसी समय हमने ए एन से बात की। बताया कि उनके फैन सड़क पर, फुटपाथ पर मिले। संयोग यह भी कि आज ही सुबह सुबह ठाकुर साहब ने हमारी पुरानी पोस्ट्स पढ़ने के बाद हमको फोन किया यह कहते हुये-- 'तुम्हारी पोस्ट पढ़ने में मजा बहुत आता है। रिटायरमेंट के बाद पढ़ते हुए समय बढिया कटता है।'
आगे हीर पैलेस के सामने झंडे बिक रहे थे। टीवी पर स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम आ रहे थे।

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Sunday, August 12, 2018

संपन्न होते देश की बढ़ती गरीबी

फुटपाथ पर देश का बचपन
सबेरे सड़क दर्शन को निकले। सड़क पर एक कुत्ता टहलता दिखा। टहलता कम घिसटता ज्यादा। आगे के दो पैर इंजन की तरह चलते। पीछे के पैर डब्बे की तर्ज पर घिसटते हुए।
आगे के पैर सीधे जा रहे थे। पीछे के पैर दाईं तरफ घिसटते हुए। आगे के पैरों की दिशा से समकोण बनाते हुए। परिणामी दिशा कहीं बीच की होगी लेकिन अंततः कुत्ता सीधे ही बढ़ रहा था। शायद किसी स्कूटर, मोटरसाइकिल ने ठोंक दिया होगा। कमर की हड्डी बोल गई होगी। किसी समर्थ घर में होता तो जानवरों के डॉक्टरों को दिखाया जाता। न्युरो इलाज होता। लेकिन सड़क के कुत्ते को यह कहां नसीब।
सामने से एक बच्चा बारिश से बचने के लिए थर्मोकोल का बक्सा ओढ़े चला जा रहा था। पूरी मुंडी बक्से के अंदर घुसी हुई। पहले बारिश से बचने के लिए लोग बोरा ओढ़ते दिखते थे। लेकिन वह भीगने के बाद भारी हो जाता होगा।
सड़क किनारे काली बरसातियों की तंबू नुमा झोपड़ियां बनी हुई है। लोग उनमें शरण लिए हुए सो रहे हैं। पालिथिन ने प्रदूषण बहुत मचाया है लेकिन पालीथिन 'गरीब मित्र' मने 'पुअर फ्रेंडली' है। सस्ती और टिकाऊ। जहाँ जगह दिखी, जमा दिया घर।
एक चाय की दुकान पर रुके। चाय पी। लोग ठेलिया के आसपास जमे, चौपाल लगाए चाय पी रहे थे। सड़क पर उकडू बैठे चाय पीते।
सामने फुटपाथ पर एक बच्ची कांच के ग्लास में चाय पीती दिखी। उससे बतियाये। आरती नाम है बच्ची का। मां-बाप कबाड़ बीनते-बेचते हैं।
हमने पूछा -'पढ़ने जाती हो?'
बोली -'नहीं।'
हमने पूछा -' क्यों?'
यहाँ पुलिस वाले रोज-रोज झोपड़ी तोड़ देते हैं। सब सामान उठा कर ले जाना होता है। ठेलिये पर ले जाते हैं। कुछ दिन बाद फिर आ जाते हैं। कुछ दिन बाद फिर आ जाते हैं। जगह तय नहीं इसलिए स्कूल नहीं जाती।
बगल की झोपड़ी में दो बच्चियां एक खटिया में गुड़ी-मुड़ी हुई सो रहीं थी। उनमें से एक स्कूल जाती हैं। दूसरी नहीं जाती। अपने देश का बहुत बड़ा हिस्सा इसी तरह जिंदगी जीता है। रोज उजड़ता-रोज बसता। इस हिस्से के लिए अनगिनत योजनाएं बनती हैं लेकिन वे सब की सब भटके हुए ड्रोन की तरह इन तक पहुंचने के पहले ही फुस्स हो जाती हैं।
हम इन जैसे बच्चों के पढाई के इंतजाम के बारे में सोचते हैं। संवेदना प्रकट करके जिम्मेदारी के पूरा होने का एहसास कर लेते हैं। आज भी यही किया। बहुत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बावजूद इस मामले में दिन पर दिन गरीब होते जा रहे हैं।
बच्ची की झोपड़ी के पास से नाली बहती है। संभ्रांत इलाके के पास होने के नाते उसमें बदबू और गैस नहीं बनती। लकड़ियां बीनकर खाना बनाता है परिवार। हमारे देखते ही लड़की चाय का खाली ग्लास लेकर उठकर बगल की झोपड़ी के लोगों से मिलने चली जाती है।
हम लौट आते हैं।
गंगा दर्शन बहुत दिन से नहीं हुए। आज देखने गए तो गंगा खूब पानीदार हो गयी हैं। गर्मी में सुस्त सी बहती, दुबली पतली गंगा अब खूब 'जल स्वस्थ' हो गयी हैं। दोनों किनारों तक विस्तार। पानी में तमाम कूड़ा-कचरा भी है। अचानक अमीर/ताकतवर हुये आदमी के पास दांए-बायें से भी संपत्ति/ताकत आती है उसी तरह अचानक बढ़ी हुई नदी में कूड़ा-कचरा भी आता है। ताकत के साथ नदी की तेजी भी बढ़ गयी है। बहुत तेजी से बह रही है। किसी की परवाह किये बिना।
सूरज भाई अभी दिखे नहीं हैं। दिखेंगे कुछ देर में। लेकिन दिन तो शुरू ही हो चुका है।

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Sunday, August 05, 2018

मित्रता दिवस पर मित्र से मुलाकात

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर और क्लोज़अप
हैप्पी फ़्रेण्डशिप दिन - पंकज बाजपेयी
आज इतवार का दिन ! मित्रता दिवस साथ में। मतलब सोने में सुहागा! कुछ लोगों के लिए यही करेला ऊपर से नीम चढ़ा लगा होगा।

सबेरे से सोशल मीडिया पर मित्रता दिवस के संदेश दंगाईयों की भीड में कट्टे की तरह या फ़िर नेताओं की सभा में जुमलों की तरह लहराने लगे। जिधर देखो उधर मित्र भाव।

वैसे तो बजरिये फ़ेसबुक अपन के हज्जारो मित्र/सहेलियां हैं लेकिन ऐसे मित्र कम ही होंगे जो मिलने का इंतजार करें। हमारे पंकज भाई शायद ऐसे अकेले दोस्त होंगे जो रोज डेली हमारा इंतजार करते होंगे। पिछले कई इतवार मुलाकात हुई नहीं। आज सोचा मिला जाये।
घर से निकले तो सड़क पर एक कुत्ता लेटा दिखा। ऐसे जैसे अपने घर के आंगन में लेटा हो। उसकी नींद में खलल डाले बिना हम आगे निकल गये। तिवारी स्वीट्स हाउस से पंकज भाई के लिये जलेबी, दही,समोसे लिये। मन किया अपन भी भोग लगा लें। लेकिन फ़िर सोचा लौटकर तसल्ली से खायेंगे।
सुबह के समय सड़क साफ़ थी। मने भीड़ नहीं थी। कुछ ही देर में पंकज भाई के पास पहुंच गये। देखते ही लपककर आये और शिकायत की- ’दो महीने आये नहीं। हम इंतजार करते थे।’
बहुत दिन बाद आने का बहाना व्यस्तता बताकर हाल-चाल पूछा। पंकज बाजपेयी ने अपडेट दिया:
-रजोल गुंडा है। उसको पकड़वाना है।
-कोहली दाउद का आदमी है। बच्चे चुराता है।
-बुआ जी को सब खबर रहती है। उनसे मिल लो।
- गाड़ी बढिया वाली ले लो। टॉप क्लास की। ये पुरानी हो गयी। हम दिला देंगे नयी गाड़ी बढिया।
और भी कई बातों के अलावा मिठाई वाले की शिकायत कि वो मिठाई देता नहीं। हमने पूछा -क्या खाओगे?
बोले - दूध की बरफी।
१०० ग्राम दूध की बर्फ़ी दिलाई। लेकर झोले में धर ली। बोले- ’बाद में खायेंगे।’
हमने कहा - हमको नहीं खिलाओगे?
बोले- ’इससे नहीं खिलायेंगे। इसको हम शाम तक खायेंगे।’
इसके बाद छांटकर सबसे बड़ा वाला बिस्कुट का पैकेट लिया। फ़िर मामा की दुकान से चाय। इसके बाद हमारी लाई हुई दही, जलेबी, समोसा कब्जे में लेकर धर लिये।
चलते समय दस रुपये खर्चे के मांगे। हमने दे दिये। बोले -’जल्दी आया करो।’
हमने कहा - ’आयेंगे लेकिन तुम इत्ती मिठाई क्यों खाते हो? बहुत मिठाई प्रेमी हो।’
हंसने लगे। साथ की जलेबी की तरफ़ इशारा करते हुये बोले -’इसमें माल है।’
हमने फ़्रेंडशिप डे की बधाई दी। हाथ मिलाया। उन्होंने पांव छूने वाले मुद्रा में हाथ बढाया। बोले - ’तुम भाई हो। किसी बात की चिन्ता न करना। हम सबको देख लेंगे।’
फ़्रेंडशिप का फ़ीता काटकर हम वापस लौटे। बरस्ते चमनगंज, परेड, कोतवाली। रास्ते में तमाम लोग सड़क किनारे ऊंधते हुये दिखे। एक जगह रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर बैठा सुबह का अखबार बांच रहा था। कोतवाली के पास चाय की दुकान पर चाय पी।वहीं दो आदमी आपस में बीड़ी सुलगाते हुये एक दूसरे के बहुत नजदीक आये और बीड़ी सुलग जाने पर अलग थोड़ा दूर हो गये।
बीड़ी लोगों को पास लाने , जोड़े का बहुत उत्तम साधन है। बीड़ी पीते लोग बिना किसी बहस के आपस में जुड़ जाते हैं। उनके बीच बीड़ीचारा बहुत तेजी से पनप जाता है। बड़ी बात नहीं कि इस बीड़ीचारे की भावना का उपयोग राजनीतिक पार्टियां चुनाव के समय करने लगें। साथ मिलकर बीड़ी पीने लगें।
सामने से एक प्यारा , मासूम सा बच्चा बस्ता टांगे अपने से बतियाता सा चला जा रहा था। उसकी मासूमियत से खुद से बतियाती सी मुद्रा देखकर अपने बच्चे याद आ गये। वे भी कभी ऐसे ही किसी ख्यालों में गुम खुद से बतियाते सड़क पर आते जाते गुजरे होंगे।
वहीं दो महिलायें एक दूसरे का हाथ कसकर थामे तेजी से चली जा रही थीं। ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेगें वाली मुद्रा में थमा हाथ सड़क पार करते हुये और कस गया। सामने से आते ट्रक को देख दोनों भागती हुई सड़क पार करके फ़िर मुस्कराते हुये दुलकी चाल से चलते हुयी चली गयीं।
एक जगह पेड़ की डाल पर बच्चियां झूला झूल रहीं थीं। धोती को झूले की रस्सी की तरह फ़ंसा कर झूलती हुई। कुछ देर में वही रस्सी खुल गयी और झूले के पाटे की तरह फ़ैल गयी। बच्चियां मजे से झूलने का मजा लेती रहीं।
एक ठेले के नीचे दो बकरियां सहमी सी मुद्रा में बैठी पगुरा रहीं थीं। उनके सहमने का कारण शायद राजस्थान आई बकरी से सामूहिक दुष्कर्म की खबर रही होगी। शायद उनकी बिरादरी में चर्चा भी हुई हो। क्या पता - ’आजकल जमाना बड़ा खराब है’ कहते हुये बकरियों ने गाना भी मिमियाया हो:
दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा,
जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा।
इसी तरह के नजारे देखते हुये वापस लौटे। लौटने तक आधा मित्रता दिवस निपट गया था। बाकी का भी बस निपटा ही समझा जाये।
आपको मित्रता दिवस की शुभकामनायें।

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Monday, July 30, 2018

मांगने वाले नखरे के अधिकारी नहीं रह जाते

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग
मांगने वाले लाइन से बैठे हैं
कल सबेरे निकले टहलने। अगले पहिये में हवा कुछ कम थी। लेकिन चल चकाचक रही थी। जरा भी नखरे नहीं। हमारी साइकिल गऊ है इस मामले में। कोई दूसरी सवारी होती तो उलाहना देती कि हफ़्ते भर से छुआ तक नहीं, आज सवार होने आ गये।

मोड़ पर फ़ुटपाथ पर रहने वाला परिवार झोपड़ी के बाहर बैठा था। मां, बेटिय़ां और लड़का शायद। बीच घेरे में पत्थर के टुकड़े रखे थे। शायद ’गुट्टा’ खेलने के लिये। आपस में चुहल टाइप करते बतिया रहे थे।

स्कूल की चहारदीवारी के गेट पर छुटके से बोर्ड पर लिखा था-’ कृपया यहां गाड़ी पार्क न करें।’ बताओ भला सड़क से छह फ़ुट ऊपर कौन गाड़ी खड़ी करेगा आकर।

सड़क पर ढलान थी। साइकिल सरपट उतरती चली गयी। उतरने मतलब नीचे गिरती। नीचे गिरने में कोई ताकत थोड़ी लगानी पड़ती है। ऊर्जा का रूपान्तरण होता है बस्स। स्थितिज ऊर्जा से गतिज ऊर्जा में। इसीलिये दुनिया भर में तमाम लोग उतरते चले जा रहे हैं। पतित होते। पतन में मेहनत नहीं लगती है न।

सामने से एक आदमी साइकिल के हैंडलों में प्लास्टिक के डब्बों में पानी भरे लिये जा रहे था। चढाई पर उचक-उचककर साइकिल चलानी पड़ रही थी उसको। पसीना-पसीना होते हुये। साइकिल पर पानी ले जाते देखकर देश में पानी की कमी के बारे में सोचने लगे। कल को पानी और दुर्लभ हो जायेगा तब शहर भर में पानी की जगह-जगह दुकाने खुल जायेंगी। ठेलियों पर पानी बिकेगा। जगह-जगह पानी के चलते-फ़िरते बाथरूम मिलेंगे। ओला-उबेर की पानी टैक्सियां चलेंगी। ओला-उबेर ट्वायलेट चलेंगे। जहां प्रेशर बढा गाड़ी बुक कीजिये, निपटिये और सुकून की सांस लीजिये।

ढलान से उतरते हुये गंगा घाट की तरफ़ मुड़ गये। सीमेंट की सड़क किनारे बस्ती गुलजार थी। एक घर के सब लोग मिलकर झोपड़ी की छत की मोमिया दुरस्त कर रहे थे। जहां उघड़ी थी वहां दूसरी मोमिया का पैबन्द लगा रहे थे। लकड़ियां रखकर बरसाती उड़ने से बचने का इंतजाम कर रहे थे। वहीं सड़क पर एक बुजुर्गवार दो फ़ुट की एक मोमिया को सिलते दिखे। किसी के लिये कूड़ा हो चुकी पालीथीन को सिलकर अपने काम की बनाते हुये। बुजुर्गवार को तसल्ली से मोमिया सिलते देखकर हमको अपनी अम्मा की याद आई जो गर्मियों की दोपहरी में तमाम तरह के छोटे कपड़े के सैम्पलों को सिलकर दरी, चादर जैसी चीजें बनाती रहती थीं।

दुनिया में एक का कूड़ा दूसरे के लिये काम की चीज हो जाता है।

घाट किनारे मांगने वाले लाइन से बैठे थे। ईंटों की कुर्सियों पर। कुछ लोग जमीन पर भी। एक आदमी आया। झोले से खाना निकालकर सबको देने लगा। मांगने वालों में से एक ने बंटवारे में सहयोग किया। सहयोग करने वाला एक मांगने वाले की बुराई कर रहा था- ’ रोज पांच रोटी, चावल मिलता था। आज चावल नहीं तो आठ रोटी मिली। उस पर नखरे कर रहा कि आज चावल नहीं मिले।’ यहां के पहले ’चरस’ में था। वहां भी ऐसे ही नखरे पेलता था। नये (मांगने वालों) पर रोआब गांठता था, पुरानों से झगड़ता था। भगा दिया उन लोगों ने। यहां आया तो हमने मना नहीं किया। लेकिन इसके नखरे ही नहीं मिलते।

’चरस’ से हमें लगा कि अगला चरस का लती होगा लेकिन फ़िर मालूम हुआ कि वह ’चरस’ नहीं ’चरच’ कह रहा। चरच माने चर्च। चर्च में मांगता था ये तथाकथित नखरेबाज मांगने वाला। नखरे पर उसके साथी को एतराज है। मतलब कि आप मांगने पर नखरा करने के अधिकारी नहीं रह जाते।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर और पानी
गंगा में नाव
अंदर चले गये। गंगा में पानी बढ गया था। जल-स्वस्थ हो गयीं थी। जल-चर्बी चढी गंगा में नावें भी चल रहीं थीं। बाढ के पानी के साथ कूड़ा-कचरा भी बह रहा था। मटमैला पानी हड़बड़ी में भागता चला जा रहा था। उसको डर था कि कहीं रुका तो अपहरण न हो जाये। कोई कैद न कर ले पानी को। 

दो बच्चियां घाट पर पानी की बढत देखती हुई आपस में बतिया रहीं थीं। कल दो ईंट नीचे था पानी। आज वो ईंट डूब गयी है।
घाट पर कुछ कमरों के बाहर बोर्ड लगा था - ’महिलाओं के कपड़े बदलने का कमरा।’ कुछ महिला शौचालय/पुरुष शौचालय वाले बोर्ड भी लगे थे। सब कमरों/शौचालयों में ताले जड़े हुये थे। लिंक के ताले जो सिर्फ़ अपनी ही चाबी से खुलते हैं। जनसुविधाओं पर शायद किसी -महंत का कब्जा होगा।

बाहर फ़िर वही लाइन से बैठे भिखारी। मंदिर से निकलते ही एक आदमी ने उनके पास खड़े होकर पूछा-’कितने लोग हो?’ एक ने पहले पन्द्रह। फ़िर बोला- बारह। उस आदमी ने जेब से सिक्के निकालकर गिनती बताने वाले को थमा दिये। उसने सबमें बराबर-बराबर बांट दिये। कोई घपला नहीं हुआ। यही काम किसी सरकारी विभाग को दिया जाता तो भीख-घोटाला हो जाता।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और लोग बैठ रहे हैं
प्लास्टिक के बोर्ड को साफ करता बालक
एक झोपड़ी के सामने दो बच्चियां चारपाई पर बैठी स्टील के ग्लास में चाय पी रहीं थीं। उसके बगल में एक बच्चा एक प्लास्टिक के साइनबोर्ड को पानी से साफ़ कर रहा था। साइनबोर्ड हुंडई सर्विस सेंटर का था। शायद सर्विस सेंटर के बाहर लगा हो उसको उतारकर कोई लाया हो। बच्चे की देखा-देखी एक और बच्चा दूसरे सिरे से उसको साफ़ करने लगा। बोर्ड पर पानी के चलते वह फ़िसल रहा था बार-बार। एक बार कुछ ज्यादा फ़िसल गया। लद्द से गिर पड़ा बोर्ड पर ही। रोने लगा। उसको रोते देखकर चारपाई पर बैठी बच्ची ने ग्लास की चाय का आखिरी घूंट लिया और ग्लास जमीन पर धरकर उठकर छोटे बच्चे की पीठ पर एक धौल जमाया। छुटका और जोर से रोने लगा। छुटके के बाद उसने जिम्मेदारी से सफ़ाई में जुटे बड़के की पीठ पर दो हाथ जमाये और वापस चारपाई पर आकर बैठ गई। मतलब घुन के साथ गेहूं भी पिस गया। बड़ा, सफ़ाई करता बच्चा भी बुक्का फ़ाड़कर छुटके के साथ ’रोने की जुगलबंदी’ करने लगा। स्वच्छता अभियान बाधित हो गया। अच्छी मंशा से शुरु किये जाने वाले तमाम अभियान इसी तरह बाधित होते रहते हैं।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर
ठेले पर सोता बालक, छत को बरसाती से ढंकते लोग और सड़क पर गुजरती जिंदगी
आगे एक महिला कांक्रीट की सड़क को आंगन की तरह इस्तेमाल करती हुई अपनी धोती धो रही थी। हैंडपम्प के पानी में एक आदमी नहा रहा था। धोती रगड़ने-फ़ींचने से निकलता हुआ साबुन सड़क से होते हुये पास की नाली तक जा रहा था।
इस बीच वह भिखारी आते हुआ था जिसकी आलोचना कर रहे थे लोग। हमें लगा नाराजगी में भिखारी-दल का बहिष्कार करके आया है। लेकिन पूछने पर बताया कि उसको कपड़े धोने हैं इसलिये वापस जा रहा था। कुछ वैसे ही जैसे लोग जरूरी काम होने पर सोशल मीडिया से कट जाते हैं। काम होने पर फ़िर जुड़ जाते हैं।
लौटते हुये सोचा कि शायद झोपड़ी के बाहर लोग अभी भी गुट्टा खेलते दिखें। लेकिन वहां अब कोई नहीं था। सब शायद काम पर जा चुके थे।

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Saturday, July 28, 2018

डम्प्लाट दुनिया में अपना सूरज


बिस्तर पर पड़े-पड़े मुंह उचकाकर सूरज भाई को देखते हैं। गायब हैं। शायद देर रात तक चंद्रग्रहण देखते रहे होंगे। वैसे भी सूरज भाई अपने हिसाब से आते हैं। उनको कोई बायोमेट्रिक हाजिरी तो लगानी नहीं होती है। हमेशा ड्यूटी पर तैनात रहने वाले की क्या बायोमेट्रिक और क्या हाजिरी।
वैसे अगर सूरज भाई को हाजिरी लगानी हो तो कैसे लगाएंगे? अंगूठा लगाने के बहुत पहले ही बायोमेट्रिक डिवाइस उबलकर परमाणु-परमाणु हो जाएगी।
कल अखबार में खबर पढ़ी -'अपनी आकाश गंगा में इतने तारे हैं जितने कि दुनिया भर के समुद्र तटों पर पसरे बालू के कण।' खबर के बाद कई शून्य लगाकर बता दिया कि इतने तारे हैं दुनिया में। लब्बो लुआब कि दुनिया बड़ी डम्प्लाट है।
कल्पना की जाए कि सूरज भाई इत्ते विशाल हैं कि उसमें 600000 पृथ्वियां समा जाएं। हमारे खुद के जैसे आठ अरब लोग धरती पर चिल्लपों करते रहते हैं। सूरज में कितने लोग समा जाएं। लेकिन कभी सूरज भाई को अपनी हांकते नहीं सुना। कभी लाउड स्पीकर लगाकर हल्ला नहीं मचाते कि हममें ये किय्या, वो किय्या, कब्भी छुट्टी नहीं ली।
दुनिया के बाद सूरज भाई खुद एक मध्यम तारे। इस तरह के अगणित तारे आकाशगंगा में। फिर अपनी आकाश गंगा भी मझोली साइज की। इस तरह की अगणित आकाशगंगाएं ब्रह्मांड में। मतलब समझा जाए कि अपन की औकात कितनी है इस कायनात में। जब कभी मन में घमंड मुंडी उठाये यह सोचना चाहिए कि हमारा साइज क्या है दुनिया में।
अच्छा सोचिए जैसे अपने यहां बरसात होती है वैसे सूरज भाई के यहां भी होती होगी क्या? आग बरसती होगी वहां भी। आग क्या आग के बाप के भी बाप बरसते होंगे। चारों क्या आठों तरफ आग ही आग दिखती होगी। चाय भी उबलकर प्लाज्मा में बदल जाती होगी। इसीलिए सूरज भाई को जब भी चाय के लिए बुलाते हैं, बड़े मन से भागे चले आते हैं।
जब सूरज भाई हमारे पास आते हैं चाय पीने तो धूप, किरण और गर्मी का तामझाम ऑटो मोड में छोड़ आते हैं जैसे हवाई जहाज में पायलट लोग जहाज को ऑटो मोड में डालकर उड़नबालाओं से गपियाते हैं या फिर चौराहे पर सिपाही ट्रैफिक को सिग्नल सहारे छोड़कर चौराहे की गुमटी पर चाय पीने चले जाते हैं।
चाय की बात से फिर चाय पीने का मन हो गया। सबेरे से तीन बार चाय पीने के बाद अब चौथी बार का इंतजार है।देरी हो रही है। सोंचते हैं धमकी दे दें -'दो मिनट में चाय नहीं मिली तो दफ्तर चले जायेंगे।' लेकिन अकेले इंसान की धमकी देने की क्या औकात। धमकी वही दे सकता है आज के समय में जिसके पीछे बावली भीड़ की ताकत हो।अपन के पीछे खुद भी नहीं खड़े।
अब निकलते दफ्तर को वर्ना न जाने कित्ते लोग पीछे पड़ जाएंगे। 

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Thursday, July 19, 2018

तकनीेक के लफ़ड़े

यह 2016 का फ़ोटो है। गोवा में समुद्र तट पर चाय पीते हुये।

तकनीक की अज्ञानता भी मजेदार लफ़ड़े कराती है।
पिछले साल हम अपने मोबाइल में अपने परिवार के लोगों के फ़ोटो लगाये थे। दोनों बेटे, अम्मा और घरैतिन ! फ़ोटो हमने खुद खींचा था और खींचकर लगा था कि अच्छा खींचा। बिटिया स्वाती नहीं थी उस समय वर्ना और मुकम्मल बनती फ़ोटो ! दिन में जब भी मोबाइल देखते, फ़ोटो दिख जाता। याद हो जाती।
पिछले हफ़्ते मोबाइल का कोई बटन दब गया तो फ़ोटो दायें-बायें हो गयी। स्थिर पारिवारिक फ़ोटो की जगह हर बार अलग-अलग सीन आने लगे। खूबसूरत प्रकृति के फ़ोटो और भी तमाम इधर-उधर के फ़ोटो! लेकिन हम सोचते कि फ़ेमिली वाला फ़ोटो लगा रहे थे अच्छा !
दो दिन पहले सुबह सोचा मोबाइल के प्रोफ़ाइल पिच्चर में फ़ेमिली फ़ोटो लगा लें। टहलते हुये फ़ेसबुक का फ़ोटो फ़ेमिली वाला डाउनलोड हो गया। उसके बाद वही प्रोफ़ाइल पिक्चर में लग गया। कवर फ़ोटो और प्रोफ़ाइल फ़ोटो एक से। जब तक समझ में आया तब तक कुछ लोग लाइक कर चुके। कुछ दोस्त आत्मीय टिप्पणी भी कर चुके।
बहरहाल जब देखा तो फ़िर से वही गोवा में समुद्र तट वाली फ़ोटो लगाई प्रोफ़ाइल पिक्चर वाली। लगते ही शानदार प्रतिक्रियायें आनी शुरु हो गयी:
-गोवा में साइकिल
- साइकिल किसकी है, झोला किसका है?
-गोवा में चाय, बियर क्यों नहीं?
-हसीन लग रहे हैं?
-मडगार्ड कहां है साइकिल का
-ये साईकल व थैला अपना ही है सर जी
-अरे वाह !! छैल छबीले बांका अंदाज
-दरअसल अपडेट तो महज एक बहाना है
-सुकुल जी का ये पीपी तो बहुत पुराना है ।
-कित्ती बार ये फोटू डालोगे दद्दा, लेकिन टिकट आपको नी मिलने वाला
-गोआ और चाय हाय हाय हाय

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, Anany Shukla, Saumitra Mohan और Suman Shukla सहित, लोग खड़े हैं और बाहर
दोनों सुपुत्र, अम्मा और घरैतिन — Saumitra Mohan औरSuman Shukla के साथ.
मतलब जितने दोस्त उससे ज्यादा मजेदार टिप्पणियां। तकनीकी अज्ञानता के साइड इफ़ेक्ट हैं ये। जिस फ़ोटो को लगाना नहीं चाह रहे थे वह लग गई। फ़िर दुबारा पुरानी फ़ोटो लगाई तो रोचक टिप्पणियां मिलीं। सबके जबाब देने का मन होते हुये भी दे नहीं पाये। टिप्पणियों के जबाब देना मुझे पोस्ट लिखने से कम रोचक नहीं लगता लेकिन समय मुआ इत्ता हरजाई कि पास आते ही फ़ूट लेता है।
कवि यहां यह कहना चाहता है कि तकनीकी मोबाइल , फ़ेसबुक और अन्य जगहों पर कई काम तकनीकी अज्ञानता के चलते होते हैं। उनमें से कुछ हसीन भी हो जाते हैं। जैसे यह वाला हुआ।
ऐसे ही एक और लफ़ड़ा हुआ रखा है मेरे मोबाइल में। वीडियो सेव करते हैं मोबाइल में वो चलते नहीं। बताता है - अपनी सेटिंग में बदलाव करो। सेटिंग अभी तक न बदल पाये। जो भी (खुद का बनाया) वीडियो देखना होता है वो किसी को फ़ेसबुक पर पोस्ट करते तब देख पाते हैंं। तकनीकी जाहिलियत है न अपन की।
कल ऐसे ही एक संदेश मिला। फ़ेसबुक मेसेंजर पर। उसका लब्बोलुआब यह कि आजकल हैकर लोग फ़ेसबुक खाते को हैक करके अश्लील वीडियो संदेश भेज रहे हैं। यदि आपको मेरे नाम से कोई संदेश मिले तो वह इन्हीं हैकरों की वजह से है। मैंने कोई संदेश नहीं भेजा आपको।
कल को वर्चुअल तकनीक का चलन बढेगा। क्या पता कुछ ऐसा हो कि आपका आभासी व्यक्तित्व कोई अपराध टाइप कर डाले और आप उसकी सजा भुगतो। ऐसे में सक्षम लोग खुद कोई अपराध करके अपने वर्चुअल को जेल भेज देंगे। पचीस लोगों की हत्या, बलात्कार में अगर उनको सजा हुई तो वे अपने सैकड़ों आभासी भक्तों को जेल भेज देंगे सजा भुगतने के लिये।
तकनीक जितनी तेजी से प्रगति कर रही है , उस गति से उसको उपयोग करने की समझ नहीं बढ रही। अनजाने में तमाम लफ़ड़े होने की जबर संभावना है।
यह तो खैर हुई सोशल मीडिया की बात। कल को यही लोचे किसी खतरनाक तरीके से भी हो सकते हैं। किसी जमूरे या फ़िर तानाशाह शासक के हाथ में संहारक हथियारों के संचालन का बटन हो और मजाक-मजाक में वह उसे दबा दे। पानी मांगने के लिये दबाये जाने वाले बटन की जगह लाखों लोगों के संहार की क्षमता करने वाले परमाणु बम चलाने वाला बटन दब जाये। मजाक-मजाक में दुनिया निपट जायेगी फ़िर तो। बंदर के हाथ में उस्तरे से तो केवल बंदर या एकाध आदमी ही निपटते लेकिन ऐसे में तो दुनिया ही इधर-उधर हो जायेगी।
कहने का मतलब यही है बेवकूफ़ियां हसीन होती हैं लेकिन तभी तक जब कोई नुकसान न हो।
नुकसान पहुंचाने वाली बेवकूफ़ियां खतरनाक होती हैं। लेकिन अफ़सोस यही है कि बेवकूफ़ियां खतरनाक हैं कि हसीन यह होने के बाद ही पता चलता है। लेकिन खतरे के डर से हसीन बेवकूफ़ियों का गला न घोंटे। मस्त रहें। बेवकूफ़ियां करते रहें। निर्मल मन से। बेवकूफ़ीं का सौंदर्य अद्भुत ही होता है।

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Wednesday, July 18, 2018

जियो बालक ! शाबास

इतवार को हमारे छोटे सुपुत्र न्यूयार्क में हवाई कुदान करते पाये गये। नई और पहली नौकरी ज्वाइन करने के बाद कम्पनी (गोल्डमैन सैक्श) की तरफ़ से दो हफ़्ते की ट्रेनिग के लिये भेजे गये। वहां घूमने के बाद स्काई ड्राइविंग की दिली तमन्ना पूरी की। एक्सपर्ट स्काई डाइवर पीठ पर बेताल की तरह लदा वीडियोग्राफ़ी करता जा रहा था। वही वीडियो बालक ने फ़ेसबुक पर अपलोड किया।
अपन यही सोच रहे हैं कि अभी अपन पैराशूट बना रहे हैं और बच्चा पैराशूट से कूद रहा है। मतलब पैराशूट का उपयोग कर रहा। एक बार की कूद का खर्चा आया 300 डालर मतलब लगभग 20 हजार रुपये।
जियो बालक ! शाबास 👌 

Tuesday, July 17, 2018

बहुत कम में खुश हो जाता आदमी

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग
सड़क किनारे चूल्हे में रोटी सेंकते कामगार
बादल एक खेप बरसकर फ़ूट लिये। पुलों, इमारतों का उद्घाटन करके निकले लिये नेताओं की तरह। जिन्दगी भर उद्घाटन का श्रेय लेते रहेंगे। उद्घाटित इमारत मुकम्मल होने का इंतजार करती हुई खंडहर हो जाती है। कभी-कभी दुबारा उद्घाटित हो जाती है, कायदे से उद्घाटित होने के लिये।
देश क्या दुनिया में ही देखें तो शुरु की हुई चीजों के पूरा होने का औसत वही होगा जो इंसान के शुक्राणुओं-डिम्बाणुओं मिलकर बच्चा होने का। अरबों-खरबों ऐसे ही बेकार चले जाते हैं। उद्घाटन हुआ लेकिन पूरी नहीं हुई।
बारिश भी हरजाई की तरह मुंह दिखाकर फ़ूट ली। सड़क के गढ्ढे, नालियां उफ़नाकर रह गये। कहीं-कहीं सड़कें तलैयों में तब्दील हो गयीं। ऐसी ही एक मिनी तलैया में एक कुत्ता अपनी गर्मी दूर कर रहा था। कमर तक पानी में डूबा बैठा था। मुद्रा ऐसी जैसे लोग स्वीमिंग पूलों में बैठकर दारू, चाय पीते हैं। जीभ से हवा अंदर खींच रहा था। हवा अभी मुफ़्त है। कुछ दिन और खींच ले। बाद में क्या पता हवा पर भी टैक्स लग जाये। हवा में सांस लेने पर टैक्स लग जाये। नाक में सांस मीटर फ़िट हो जायें। लोग छोटी-छोटी सांस लेने लगें। लंबी सांस लेना विलासिता माना जाये।

कुत्ते को छोड़कर हम आगे बढे। सड़क किनारे भुट्टे बिक रहे थे। सिंक रहे थे। कुछ भुट्टों के दाने इतने कम थे गोया किसी बुजुर्ग के उखड़े हुये दांत। एक बच्चा नंगे बदन, कंधे में पट्टी टाइप बांधे भुट्टा सिंकवा रहा था। आंखों में धूप का चश्मा लगाये हुये। जम रहा होगा। यकीन से इसलिये नहीं कह सकते क्योंकि वह हमारी तरफ़ पीठ किये खड़ा था। पास ही 100 नंबर वाली पुलिस की गाड़ी के सिपाही नीचे उतरकर भुट्टा चबाते हुये कानून व्यवस्था की देखभाल कर रहे थे।
रिक्शे वाले अड्डे पर सुरेश मिले। राधा गंगा किनारे गयीं थीं। पटना की हैं। बताते हैं वहां जमीन-जायदाद, घर-परिवार सब लेकिन वे घूमते-घामते यहां आ गयीं। एक रिक्शेवाला सड़क किनारे ही ईंटों का चूल्हा सुलगाये रोटी पाथ रहा था। गोल मोटी रोटी सेंककर वहीं लकड़ी के पटरे पर धरता जा रहा था। वही उसका कैशरोल था। बातचीत का लब्बो-लुआब यही कि गर्मी बहुत है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, बादल, महासागर, बाहर, प्रकृति और पानी
नदी बादलों का दर्पण है
गंगा पुल पर खड़े हुये बहुत् देर गंगा को देखते थे। पानी कुछ बढा था लेकिन कम था। एक् नाव नदी में टहल रही थी। इवनिंग वाक सरीखा करती हुई। पुल पर जाती रेल भी गंगा को निहारने लगी। कुछ लोग नहाते हुये पानी में छप्प-छैंया कर रहे थे। बादलों का रंग नदी पर खिल रहा था। नदी दर्पण की तरह बादले के हर रंग की फ़ोटोकापी करती जा रही थी। कहीं लाल, कहीं सफ़ेद, कहीं मटमैली। अलग-अलग भाग का पानी अलग-अलग रंग में इठला रहा था। नदी सबको साथ समेटते हुये आगे बढती जा रही थी। बिना किसी हड़बड़ी के। ठीक है आगे जाना है लेकिन यह थोड़ी कि आगे जाते हुये दायें-बायें इठलायें भी न।
पुल के ऊपर से नीचे रहने झोपड़ी में रहने वाले लोग दिखे। झोपड़ी में रहने वाली महिला शायद घास छीलकर और बेंचकर वापस आ गयी थी। वो वहीं अपनी झोपड़ी के बाहर बैठी गंगा के पानी को देख रही। उसकी बिटिया हाथ में स्मार्टफ़ोन लिये अलग-अलग पोज में सेल्फ़ी टाइप ले रही थी। मोबाइल का उपयोग दर्पण के रूप में होने लगा है। क्या पता कल को गाना - ’मोरा मन दर्पण कहलाये’ की जगह बदलकर ’मोरा मोबाइल दर्पण कहलाये’ हो जाये।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, बादल, महासागर, बाहर, प्रकृति और पानी
सतरंगे बादल, बहुरंगी नदी।

नदी किनारे कुछ लोग मछली पकड़ रहे थे। मछली फ़ंसाने वाली कटिया नदी में डाले बैठे समाधिस्थ योगी से बैठे। कुछ-कुछ देर में जाल नदी से निकालते। लेकिन मछली न मिलती। फ़िर जाल नदी में घुसा देते। कविता उकसाती होगी:
’एक बार और जाल फ़ेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो।’
कितनी छलावे भरी, भरमाऊ आकर्षण वाली कविता है यह बुद्धिनाथ मिश्र जी की। मतलब मछली जिसके गलफ़ड़े जाल में फ़ंसकर कट जाते हैं, जान चली जाती है जाल में फ़ंसने के बाद। उसके मन में जाल में फ़ंसने की चाह होगी। क्या गजब !

लौटते में मंदिर किनारे बैठे गुप्ता जी दिखे। आंख का आपरेशन हो गया है। चश्मा बनवाना है। बनवा नहीं पा रहे। शुक्लागंज में 500 का बनेगा, नाथ चश्मे वाले ने 900 बताये हैं। पैसे का जुगाड़ हो तो बनवायें। अभी तो दुकान चल नहीं रही। रिक्शे रिपेयर की दुकानें अब कौन चलती हैं। रिक्शे भी तो चलन से बाहर हो गये। मंहगे, धीमे, मेहनत मांगते। अब तो सब बैटरी रिक्शे पर चलते हैं।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: Birendra Sharma, बैठे हैं और खड़े रहना
अपनी झोपड़ी के बाहर बैठे गुप्ता जी
हम कहते हैं- ’चश्मा बनवा लो। हम पैसे दे देंगे।’ आगे तय भी किया-’ आप नाथ चश्मे वाले के यहां चले जाना। उनको हम पैसे दे देंगे। आप चश्मा बनवा लेना।’ गुप्ता जी गदगद होकर कहने लगे हैं- ’आपने कह दिया यही बहुत है हमारे लिये।’ अपने देश का आदमी बहुत कम में खुश हो जाता है। अल्पसंतोषी है। कोई खुशहाली का वादा कर देता है, इसी में खुश हो जाता है। जाने कब से लोग वादे करते हुये अपने देश के लोगों को खुश करते आ रहे हैं। लोग खुश होकर फ़ंसते, लुटते, बरबाद होते जाते हैं। लेकिन फ़िर किसी के वादे पर खुश हो जाते हैं। फ़िर झांसे में आ जाते हैं।
चलते हुये गुप्ताजी पैदल चलने की सलाह देते हैं। बोले-’ पूरे शरीर की नसें खिंचती हैं। पंजे तक खिंचते हैं। खून क बहाव ठीक होता है। पसीना निकलता है।’ हम साइकिल पर बैठे सड़क से पैर टिकाये उनकी बात सुनते रहे, हामी भरते रहे। फ़िर उनको हमारे ऊपर तरस आया और बोले-’साइकिल भी अच्छी सवारी है। बढिया एक्सरसाइज होती है। लेकिन पैदल चलना चाहिये।’
एक्सरसाइज तो खैर चलती रहेगी। अब घड़ी कह रही है - ’समय हो गया बाबू। दफ़्तर भी चलना चाहिये।’

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