Monday, March 02, 2020

जाकिर हुसैन से मुलाकात

 


कल जाकिर हुसैन से मिलना हुआ। शाहजहांपुर में 1992 से 2001 की पोस्टिंग के दौरान जाकिर हुसैन लंबे समय तक हमारे दफ्तर में अर्दली के रूप में रहे।

31 साल की उम्र में लेबर के रूप में भर्ती हुए जाकिर 60 में लेबर की उम्र में ही रिटायर हो गए -'जस की तस धर दीन चदरिया।'
हमारे दफ्तर में रहने के दौरान जाकिर हमारा पूरा ख्याल रखते थे। चाय-पानी और दीगर जरूरतों के अलावा फोन अटेंड करना, डाक लाना-ले जाना। नफीस लेकिन समझ में आने वाली उर्दू बोलते सुनकर लगता कि हमको भी उर्दू बोलने का अभ्यास करना चाहिए। कल मुलाकात के बाद फिर यह एहसास हुआ।
दफ्तर की देखभाल करने के साथ-साथ जाकिर साहब हमारी भी बखूबी देखभाल करते थे। कभी दफ्तर आने में देर हुई तो किसी सीनियर का फोन आने पर कहते -'हुजूर आपकी ही तरफ गए हैं।अभी निकले हैं, बस पहुंचते ही होंगे।' इसके बाद हमको खोजकर बताते -'आपको बड़े साहब पूंछ रहे हैं।'
दफ्तर में चाय पिलाने के अलावा कभी-कभी बतकही में भी शरीक होते। शायरी के भी शौकीन। कुछ पसंदीदा शेर कभी सुना देते।
1995-96 की एक मजेदार याद। उन दिनों हमारी फैक्ट्री में ISO-9000 प्रमाणपत्र पाने के लिए कोशिश चल रही थी। हम भी लगे थे। जानकारी और अनुभव की जो कमी थी उसे अपनी मेहनत से पाटने की कोशिश में लगे थे। रात देर तक काम करते।
ISO-9000 में क्वालिटी पॉलिसी भी घोषित करनी होती है। उसपर अमल सुनिश्चित करना होता है। निरीक्षण टीम यह देखती है कि निर्माणी के लोगों कम से कम अपनी क्वालिटी पॉलिसी के बारे में पता हो। हम लोग अलग-अलग तरीके से लोगों को अपनी क्वालिटी पॉलिसी याद करा रहे थे। सिलाई के लिए कटिंग के बंडल में भी घुसा देते क्वालिटी पॉलिसी। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में। बण्डल खोलेने वाला पढ़ेगा ही । याद भी हो जाएगा।
दफ्तर में काम करते हुए और दिन-रात क्वालिटी , आईएसओ-9000 की बातचीत सुनते हुए जाकिर हुसैन भी काम भर की जानकारी हासिल कर चुके थे। लेकिन उनके परफेक्शन का हमको कत्तई अंदाज नहीं था।
ऑडिट के दौरान जाकिर हुसैन की भेंट ऑडिट टीम के लीडर नीलकंठन जी से हुई। उन्होंने जाकिर जी से पूंछा -'आपकी फैक्ट्री की क्वालिटी पॉलिसी क्या है?'
फरवरी के महीने की गुनगुनी धूप में खड़े जाकिर हुसैन ने अपना मफलर फटकार कर गले में डाला और पूरे भरोसे के साथ हाथ पर हाथ रखकर बोलते हुए नफीस उर्दू में क्वालिटी पॉलिसी सुना दी। इसके बाद आईएसओ के फायदे भी गिना डाले। हमको भी ताज्जुब हुआ कि कभी इसके लिए जाकिर हुसैन को तैयार तो किया नहीं गया था।
टीम लीडर ने पूंछा कि आप कहां काम करते हैं? जाकिर हुसैन ने हमारी तरफ इशारा करके बताया -'हुजूर की खिदमत में लगे हैं।'
नीलकण्ठन जी ने मुझसे कहा -'यू आर वेस्टिंग ए टेलेंट। इनको तो ट्रेनिग देने के काम में लगाना चाहिए आपको।'
नीलकंठन जी की बात सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई। आज वह बात याद करके लगता है कि हम अपनी तमाम मेधा, टेलेंट बर्बाद करते हैं। एक से एक जहीन लोग सही काम न मिलने से बर्बाद हो जाते हैं या फिर लोग उनका उपयोग नकारात्मक काम, दंगे, फसाद, फिरकापरस्ती में उपयोग करते हैं।
2001 में शाहजहांपुर से ट्रांसफर होने के बाद भी जाकिर जी से बात होती रही। शाहिद रजा और लतीफ से उनके हाल मिलते रहे। जब भी बात हुई जाकिर जी ने घर में सबकी खैरियत पूँछी।
यहाँ आने के बाद कल जाकिर हुसैन से मिलने गए। संकरी गलियों में गाड़ी फंस न जाये तो काफी बाहर खड़ी कर दी। पहुंचने पर बड़ी गर्मजोशी से मिले जाकिर । कसकर हाथ मिलाया और देर तक थामे रहे जैसे राष्ट्राध्यक्ष मिलते हुए थामे रहते हैं ताकि लोग फोटो ले सकें।
हाल-चाल पूंछने पर पता चला कि तबियत नासाज रहती है उनकी। कई तरह की बीमारियां। सबसे ऊपर चिंता सवार रहती है। डिप्रेशन में रहते हैं। बोले -'दिन भर काहिली सवार रहती है। जरा दूर चलते हैं थक जाते हैं। दिल साथ नहीं देता। हर डॉक्टर को दिखा चुके कोई फायदा नहीं हुआ। किसी से मिलना-जुलना नहीं।बस घर में पड़े रहने का जी चाहता है।'
हमने हौसला बंधाया कि मस्त रहा करो। अकेले मत रहा करो। काहे का डिप्रेशन। बच्चे अपने आप सेट हो जाएंगे। परेशान न हों। चिंता न करो।
बोले -'मैं बहुत कोशिश करता हूँ लेकिन अजीब-अजीब ख्यालात मन में आते हैं। पुरानी बातें अपने आप याद आती हैं उन्हीं में उलझ जाता हूँ।'
पेंशन के कागज देखे हमने। सब दुरस्त। कागज देखे तो जाकिर ने अपने वालिद का जिक्र किया। बोले फैक्ट्री में मुलाजिम थे। अगर उनके कागजात मिल जाएं तो उनकी कॉपी दिलवा दीजिएगा।
हमने कहा देख लेंगे लेकिन वालिद के कागजात किस लिए चाहिये ?
बोले -'कहीं जरूरत पड़ सकती है। ये एनआरसी वगैरह में काम आएंगे।'
हमने कहा -'अरे आप भी कहां की बातें सोचते हैं। मजे में रहिये। इन सबकी चिंता न करिये। हम हैं न।'
जाकिर हुसैन फीकी मुस्कान के साथ बोले -'सो तो है लेकिन कागज मिल जाएंगे तो सुकून रहेगा।'
जाकिर हुसैन के वालिद का इंतकाल सन 1980 के भी पहले हुआ था। वो उनके कागजात खोज रहे हैं कि एन आर सी में काम आएंगे। वह भी तब जब खुद उनके कागज हैं। वो सरकारी मुलाजिम रह चुके। पेंशन मिलती है।
बच्चों से बात की तो पता चला कि जाकिर सोचते रहते हैं । बच्चे अभी पुख्ता तौर पर काम में लगे नहीं हैं। बड़ा सड़क पर कपड़े की फेरी लगाता है, दूसरे नम्बर का लैब असिस्टेंट का काम सीख रहा है, तीसरा टेलरिंग का काम और सबसे छोटा हाईस्कूल कर रहा है।
जाकिर अपने बच्चों के रोजगार की चिंता में परेशान हैं। उनको दिलासा देकर विदा लेकर निकले। रास्ते में बड़े बेटे शोएब से मिले। सड़क पर कपड़ों की बिक्री करते हुए। शोएब ने बताया -'पापा आपका जिक्र करते हुए बहुत तारीफ करते रहते हैं।'
शोएब से बातचीत करते हुये कहीं से नहीं लगा कि वह रोजगार को लेकर परेशान है। तफसील से बताया कि कहां-कहां बिक्री करता है। कैसे-कैसे सामान लाता है। बोला -'दिल्ली में बहुत अंदर से छांट के कपड़े लाते हैं । एक बार जो ले जाता है वो दुबारा वापस जरूर आता है लेने के लिए।' और भी मारकेटिंग के हनर बता डाले शोएब ने खड़े-खड़े।
जाकिर के परेशान रहने की बात पर शोयब ने कहा -'बहुत समझाते हैं लेकिन वो समझते नहीं। न जाने क्या-क्या सोचते रहते हैं। कहीं आते-जाते नहीं। नई गाड़ी खरीदी तो बहुत कहने पर घूमने को राजी हुए। लेकिन जरा देर में ही बोले -घर चलो।'
दो पीढ़ियों की चिंताएं अलग-अलग होती हैं।
हमने जाकिर से पूछा -'दफ्तर में तो चाय बहुत बनाते थे। कभी घर में भी बनाई ? '
बोले -'घर में बनाने के लिए हैं। वही बनाती हैं।'
जाकिर हुसैन 70 के हो गए हैं। ऊपरी तौर पर स्वस्थ दिखते हैं लेकिन तमाम बीमारियों का इलाज करा रहे हैं। चिंता का शौक पाल लिया है।लेकिन एक रिटायर मुलाजिम जिसके बच्चे अभी काम पर न लगें हों चिंता तो करेगा ही। उसके बस में चिंता करने के अलावा और क्या हो सकता है।
हम तो हर चिंतित इंसान से यही कहते हैं -'दम बनी रहे, घर चूता है तो चूने दो।'

Friday, February 28, 2020

बम का व्यास



तीस सेंटीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव पडता था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ एक और बड़ा घेरा है - दर्द और समय का ।
दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जो दफ़नाई गई शहर में
वह रहने वाली थी सौ किलोमीटर दूर आगे कहीं की
वह बना देती है घेरे को और बड़ा।
और वह अकेला शख़्स जो समुन्दर पार किसी देश के सुदूर किनारों पर
उसकी मृत्यु का शोक कर रह था - समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में।
और मैं अनाथ बच्चों के उस रूदन का ज़िक्र तक नहीं करूंगा
जो पहुँचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक
और उससे भी आगे
और जो एक घेरा बनाता है
बिना अंत और बिना ईश्वर का ।
रचनाकार -यहूदा आमिखाई
अनुवाद :Ashok Pande

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Thursday, February 27, 2020

चलाना पड़ता है





 सुबह का समय। कोहरे की दुकान अभी पूरी तरह सिमटी नहीं है। सूरज भाई अभी नमूदार नहीं हुए हैं। लगता है कोहरे को मौका दे रहे हैं -' फहरा लो थोड़ी देर और अपना झंडा।'

पार्क के बाहर पुलिस जीप में बैठा ड्रॉइवर मुस्तैदी से मुंह चला रहा है। मुंह में गिरफ्तार आइटम की हड्डी पसली एक कर दे रहा है। मुंह में साबुत घुसा आइटम चकनाचूर होकर लुगदी बनते हुए उसके पेट में घुसता जा रहा है। जैसे-जैसे मुंह का आइटम पेट की तरफ बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे उसके चेहरे पर संतुष्टि का परचम लहराता जा रहा है।
पार्क में लोग मुस्तैदी से कसरत कर रहे हैं। कोने में बैठा एक आदमी तेजी से सांसें अंदर करते हुए ढेर सारी हवा पेट में इकट्ठा करता जा रहा है। उसकी तेजी से लग रहा मानो उसको डर है कहीं हवाबंदी न हो जाये दुनिया में। क्या पता कल को हवाबन्दी के बाद पूरी दुनिया को हवासप्लाई का ठेका किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को हो जाएगा। फिर तो यह भी मुमकिन है कि हर इंसान की सांस की जांच की जाए। जिसकी साँसों में उस कम्पनी की हवा न पाई जाए उसकी जिंदगी को सस्पेंड कर दिया जाए। जब तक वह पूरी हवा उस कंपनी से न भरवा ले तब तक वह दुनियबदर कर दिया जाए।
एक आदमी सीमेंट की फर्श पर बैठा बड़ी तेजी से अपने कंधे हिला रहा है। गोलगोल। उसकी तेजी देखकर हमको एकबारगी लगा कहीं उसके कंधे उखड़कर हाथ में न आ जाएं। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कंधे की एक्सरसाइज करके वह तेजी से उठा और पार्क में थूककर टहलते हुए बाहर की तरफ चल दिया। बगल से गुजरते हुए उस आदमी को टोकने का मन हुआ कि कहें पार्क में क्यों थूकते हो? लेकिन फिर यह सोचकर नहीं टोंका कि कहीं हमसे पूंछ न बैठे -'पार्क और होते किसलिए हैं? यहां भी न थूंके तो कहां थूंके?' टोंका इसलिए भी नहीं कि उसका चेहरा गुस्से में लग रहा था और उसके मुंह में बहुत कुछ इकट्ठा था।
एक आदमी एक कुत्ते को टहला रहा था। कुत्ता जंजीर घसीटते हुए आदमी को टहला रहा था। आदमी कुत्ते के मालिक का सेवक होगा। कुत्ता अपने मालिक के सेवक को अपना सेवक समझते हुए उससे चिपटकर मस्तिया रहा था। आदमी के कपड़े खराब हो रहे थे लेकिन वह कुछ कर नहीं रहा था। कुत्ता कमउम्र था। लेकिन बदमाशी में मैच्यर्ड लग रहा था। कुछ देर मस्तियाने के बाद वह आदमी के साथ जिस तरह की हरकतें करने लगा उसे देखकर लगा मानो अपनी पार्टनर के साथ डेटिंग का रियाज कर रहा हो।
कुत्ते को टहलाने के साथ वह आदमी दो बच्चों को झूला भी झूला रहा था। बच्चों और कुत्ते की देखभाल के लिए आदमी के बच्चों की देखभाल कौन करता होगा ? यह सोचने की फुरसत ही नहीं मिली मुझे।
एक लड़का पार्क में टहलते हुए चने बेंच रहा था। बताया कि मां-बहन की देखभाल करता है। पिता नहीं रहे। पिता के न रहने की बात कहते हुए आंसू आ गए उसकी आंख में। पहले किसी दुकान में नौकरी करता था। कुछ ऊंचाई से कूदने के चलते पांव लचक गया। लंगड़ाते हुए चलता है।
'कितनी कमाई हो जाती है चने बेंचकर? 'पूछने पर बताया 250/- तक हो जाती है। 50-60 बच जाते हैं।
' इतने में कैसे खर्च चल जाता है ?' पूछने पर कहा -'चलाना पड़ता है।
और बात होने पर पता चला कि बच्चे जैसा वह इंसान शादीशुदा है। पत्नी और बच्चा उसके साथ नहीं रहते। कारण पूछने पर बताया कि पत्नी को खर्च के लिए दो सौ रुपये रोज चाहिए। इतने कहां से लाये हम ?
हम कुछ सोचने लगे। हमको सोच में डूबा देखकर वह बच्चा धीमी चाल से आगे जमा लोगों के पास जाकर 'चने ले लो' का आह्वान करने लगा। हम वापस चल दिये।
वापस आते समय बच्ची मिली जिसने सी-सा पर गद्दी लगवाने को कहा था। पार्क में होती हुई सफाई देखकर उसके पिता-माता ने कहा -'इसने बताया कि इसके कहने पर सफाई करा रहे हैं अंकल। गद्दी भी लगवाएंगे।'
बच्ची मुस्कराती हुई खेलने लगी। हम तैयार होकर दफ्तर आ गए।

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Wednesday, February 26, 2020

ऐसे ही इधर-उधर

 


सुबह उठे। टहलने निकले। गेट पर दरबान मिला। नमस्ते ठुकी। हाल पूछने पर बताया कि हीटर फुंक गया। सर्दी में परेशानी । और कोई समस्या पूछने पर बताया कि गुमटी में कोई खूंटी नहीं है कपड़े टांगने की। लग जायेगी कहते हुए हम सड़क पर निकल लिए। कह तो दिया अब देखना है लगती कित्ते दिन में है।

सड़क पर झाड़ू लगाती एक महिला से बात करने लगे। चार बच्चे हैं। पति बीमार। सांस की समस्या। महिला अकेली कमाने वाली। साफ चमकते दांत वाली महिला अपने सर से ऊंची झाड़ू सड़क पर लगाती बतियाती रही। घर में समस्याएं हैं लेकिन खुद कमाई का आत्मविश्वास उसकी आवाज और चेहरे पर चमक रहा था।
सड़क पार करके पार्क में धंस गए। सुबह की टहलाई करते दिखे लोग। एक बच्ची बेंच पर अकेली बैठी थी। उसके मां-पिता-भाई दूर तक टहलने जाते हैं। बच्ची को उसकी छोटी बहन के साथ पार्क में छोड़ जाते हैं। लौटकर साथ ले जाते हैं।
'तुम बैठी क्यों हो? झूला क्यों नहीं झूलती ?' हमारे इस सवाल के जबाब में बच्ची कहती है - 'भाई के आने पर उसके साथ रेस करनी है। झूलने से थक जाऊंगी।फिर उसको हरा नहीं पाऊंगी।' बच्ची भाई से जीतने के लिए अपनी ऊर्जा बचाकर रखती है।
बच्ची अपना रेसिंग ट्रैक दिखाती है। कई जगह से उखड़ा हुआ। उसको भी ठीक कराने की सोंचते हुए उससे पूछते हैं कि पार्क में और क्या कमी है ?
वह मुझे एक सी-सा के पास ले जाकर बताती है -'इसकी सीट नहीं है।' हम जल्दी ही उसकी मांग पूरी करने का वादा करके टहलने लगते हैं।
बच्ची अपनी छोटी बहन के साथ झूला झूलने लगती है। उसको झूला झुलाने वाली लड़की भी बच्ची है। उससे कुछ बड़ी। चेहरे से पता लगता है कि किसी गरीब घर की बच्ची है। छोटी बच्चियों के देखभाल के लिए रखी गयी होगी। बिना स्कूल की पढ़ाई के जिंदगी के स्कूल में नाम लिख गया।
पार्क के बाहर अलग-अलग समय में उद्घाटन, लोकार्पण, वृक्षारोपण के नामपट्ट लिखे हैं। सब रिटायर हो गए। नामपट्ट के नाम भी धूमिल हो गए। लगता है नाम भी रिटायर हो गये। नाम पट्ट पर नाम देखने की ललक भी मजेदार है इंसान में।
कई नामपट्ट देखे पिछले दिनों। कई ऐसे लोग जिनके नाम से लोग कांपते थे उनके नामपट्ट पर बन्दर अपने बच्चों के साथ लिए कूदते रहते हैं। अपनी पूंछ लोगों के नाम के आगे पंखे की तरह फहराते हैं।
अभी याद आया कि बच्ची के कहने पर झूला लगवाने का आदेश दिया है हमने। अब सोच रहे हैं कि झूले के बगल में नामपट्ट भी लगवाने की व्यवस्था करनी चाहिए- 'झूले का उद्घाटन किया फलाने इस दिन।' लेकिन लफड़ा यह कि झूला आयेगा तीन हजार का, नाम पट्ट और उद्घाटन समारोह का खर्च होगा तीस हजार का।' सोचकर शर्मा गए और नामपट्ट का विचार स्थगित कर दिया।
दोपहर में फिर गए पार्क। देखने कि क्या-क्या काम होना है। एक बच्चा पार्क में आल्थी-पालथी मारे पढ़ रहा था। पूछने पर बताया कि घर में लोग पढ़ने नहीं देते। कहीं खेत पर भेज देते हैं , कहीं जानवर चराने। इसीलिए यहां पार्क में आ जाता है पढ़ने।
बच्चे को पार्क में पढ़ता देखकर पास में ही अपनी निर्माणी की इस्टेट लाइब्रेरी को शुरू करने का हमारा इरादा और पुख्ता हो जाता है। लाइब्रेरी पिछले साल उद्घाटन के बाद से बन्द है। जब भी उसको शुरू करने की बात सोची गयी तब यह बात उठी कि पढ़ने कौन आएगा ? हमको जबाब मिल गए -'जयेंद्र जैसे लोग आएंगे।'
जयेंद्र से पूछते हैं -'पास में लाइब्रेरी खुलेगी तो वहां पढ़ने आओगे?'
'पैसे कितने पड़ेंगे लाइब्रेरी में पढ़ने के?' बच्चे का पहला सवाल होता है।
हमने कहा-'कोई पैसा नहीं पड़ेगा।जल्द ही लाइब्रेरी खुलेगी।'
टहलकर वापस आये। दफ्तर चले गए। दिन बीत गया। अभी फिर दिन शुरू हुआ तो सोचा लिखा जाए किस्सा।
अभी इत्ता ही। बाकी फिर कभी।

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Monday, February 17, 2020

दिया तले अंधेरा- शिक्षा विभाग की पूरी पोल-पट्टी खोलता रोचक उपन्यास


 “शिक्षा जगत में हजारों कृपाराम अपने-अपने किरोड़ीमल के पीछे संलग्न प्रति की तरह चिपके हुये हैं। ये लोग शिक्षा के घोल में भ्रष्टाचार को मिला रहे हैं। भ्रष्टाचार हर एक द्रव में घुलनशील होता है, अत: शिक्षा का घोल भी दूषित हो गया है। इसे शुद्ध करने के उपकरण का आयात तो कर लिया गया, लेकिन घोटालों के कारण वह घटिया निकला।“

अब आप पूछेंगे कि कृपाराम कौन, किरोड़ीमल कहां ? तो इसके लिये आपको अरविंद तिवारी जी Arvind Tiwari का उपन्यास – ’दिया तले अंधेरा’ पढना होगा।
अरविंद तिवारी जी अपने परिचय में लिखते हैं- ’चर्चित व्यंग्यकार।ग्यारह व्यंग्य पुस्तकों सहित कुल तेरह पुस्तकें प्रकाशित। डाइट के प्राचार्य से रिटायर’। ’डाइट’ मतलब अध्यापकों को पढाने की ट्रेनिंग देने वाला संस्थान। शिक्षा विभाग में लंबी नौकरी के बाद यहां पोस्ट किये जाते हैं। अरविंद तिवारी जी यहीं के प्राचार्य होकर रिटायर हुये। जाहिर है कि शिक्षा विभाग से लम्बे समय तक जुड़े रहे। इसका फ़ायदा उठाते हुये शिक्षा विभाग की पूरी पोल-पट्टी अरविंद जी ने अपने इस पहले उपन्यास में खोलकर रख दी है।
अरविंद तिवारी जी ने तीन व्यंग्य उपन्यास लिखे हैं- ’दिया तले अंधेरा’, ’हेडऑफ़िस के गिरगिट’ और ’शेष अगले अंक’ में। ’हेडआफ़िस के गिरगिट’ शिक्षा विभाग के दफ़्तरी पक्ष की विसंगतियां को रोचक ढंग अंदाज में पेश करता है तो ’शेष अगले अंक’ एक छोटे कस्बे नागौर अखबारी दुनिया के किस्से के बहाने अपने समाज की पड़ताल करने वाला उपन्यास है। दोनों उपन्यास चर्चित , प्रशंसित और पुरस्कृत हैं। लेकिन इन दोनों उपन्यासों की नींव की ईंट अरविन्द तिवारी जी का पहला उपन्यास – ’दिया तले अंधेरा’ है जिससे उन्होंने उपन्यास लिखना शुरु किया।
उपन्यास किसी स्थानीय प्रकाशन से छपा है। किसी बड़े प्रकाशन से छपा होता तो इसकी ऑनलाइन प्रति मंगवाता। पढने की रुचि जाहिर करने पर अरविंद जी ने फ़ोटोकॉपी करके भेजा। भेजने के साथ ही ’आराम से पढना, कोई जल्दी नहीं’ कहकर फ़ौरन पढने का दबाव भी बना दिया। संयोग कि उपन्यास मिलने के अगले दिन ही शनिवार , इतवार भी मिल गया। पढना शुरु करने के साथ ही १७२ पेज पढ भी गये। यह तथ्य उपन्यास की रोचकता का प्रमाण है।
’दिया तले अंधेरा’ हिन्दुस्तानी के हिन्दी पट्टी के आम स्कूलों में होने वाले क्रिया कलापों की कहानी है, कच्चा चिट्ठा है। बदहाल शिक्षा व्यवस्था, क्लास से गायब शिक्षक, हर काम में कमीशन, पुरस्कारों में सेटिंग और समाज में व्याप्त तरह-तरह के भ्रष्टाचार की झलक इस उपन्यास में दिखा देते हैं अरविंद तिवारी जी।
इस उपन्यास की कथा मास्टर कृपाराम के इर्द गिर्द घूमती है। कृपाराम की काबिलियत की बानगी का नमूना आप देखना चाहते हैं तो उनके चयन का किस्सा पढिये:
“लोक सेवा आयोग के एक सदस्य ने कृपाराम से पूछा-“ आपको एक हायर सेकेंडरी स्कूल का संस्था प्रधान बना दिया जाये और कोई अतिरिक्त स्टाफ़, उपकरण आदि न दिये जायें तो आप उस हायर सेकेंडरी स्कूल को मल्टीपर्पज हायर सेकेंडरी स्कूल कैसे बना दोगे?
कृपाराम ने सहज होकर (जो उनकी प्रतिभा का एकमात्र परिचायक गुण है) उत्तर दिया –’मैं उस विद्यालय के नाम पट्ट पर हायर सेकेंडरी के स्थान पर चॉक से मल्टापर्पज हायर स्कूल लिखवा दूंगा।’
इंटरव्यू लेने वाले सदस्य कृपाराम की ’विट पावर’ पर लट्टू हो गये और उनका चयन मेरिट लिस्ट में दूसरे स्थान पर कर लिया गया।“
कृपाराम ने जो अपने इंटरव्यू में हायर सेकेंडरी स्कूल को मल्टी परपज स्कूल बनाने का जो उपाय बताया उस पर ताजिन्दगी अमल भी किया। बिना काम के ग्रांट खपाई, बिना पढाई के स्कूल चलवाया, अफ़सरों को सहज भाव से पटाया , चेले बनाये, मारपीट करवाई, निपटारा करवाया, पिटने और छिपाने से भी गुरेज नहीं किया। इस तरह साधारण अध्यापक से शिक्षा विभाग के उपनिदेशक पद तक की यात्रा की।
उपन्यास में अध्यापकों को पीटने वाले छात्र हैं, पिटकर भी चुप रह जाने वाले अध्यापक हैं, ट्यूशन के जलवे हैं, ले-देकर या पट-पटाकर जांच रफ़ा-दफ़ा कर देने वाले अधिकारी हैं, मफ़ली , मिस फ़तनानी जैसे महिला पात्र भी हैं जिनके बहाने छात्रों, अध्यापकों और अन्य लोगों के चरित्र का भी लिटमस टेस्ट होता रहता है।
अरविंद तिवारी जी उपन्यास लेखन की खासियत है कि जिस विषय पर लिखते हैं उस पर डूबकर लिखते हैं। दायें-बायें नहीं देखते –कहीं ध्यान न भटक जाये। कभी-कभी लगता है कि कुछ इधर-उधर भी दिखाया जाये।
उपन्यास पढते समय कुछ पंच वाक्य भी छांटे। शुरुआती दौर में लिखा गया उपन्यास होने के नाते कुछ पंच वाक्य उतने चुस्त नहीं बने जितने बाद के उपन्यासों के हैं।
अरविंद जी ने शिक्षा व्यवस्था पर दो उपन्यास लिखे, पत्रकारिता पर लिखा। सभी में जो विषय लिया उसी पर केंद्रित रहे। अगला उपन्यास आने वाला है – ’लिफ़ाफ़े में कविता’। इसमें कवि सम्मेलनों के किस्से पढने को मिलेंगे।
कुल मिलाकर ’दिया तले अंधेरा’ एक रोचक उपन्यास है। पढने लायक। अरविंद जी ने इसकी फ़ोटोकॉपी भेजकर हमको इसे पढवाया इसके लिये उनका आभार। आभार इस बात का भी कि बहुत दिन बाद एक उपन्यास पूरा पढकर पढने का आत्मविश्वास भी फ़िर से जगा।
’दिया तले अंधेरा’ के कुछ पंच वाक्य यहां पेश हैं।
१. जिन दिनों परीक्षायें होतीं, उन दिनों यह श्मशान घाट ’नकल कराओ अभियान’ का आधार शिविर बन जाया करता था। यहां बैठकर गुंडेनुमा छात्र विषय-अध्यापकों को मुरगा बनाकर उनसे पेपर हल करवाया करते थे और फ़िर उन्हें पूरी अध्यापकीय अस्मिता के साथ , मुरगे से पुन: अध्यापक बनाकर छोड़ देते थे। श्मशान घाट से पुलिस भी दूर रहती थी, छात्रों ने भूत होने की अफ़वाह फ़ैला रखी थी।
२. स्कूल भवन विशाल था तथा परंपरागत स्कूलों की भांति उसका पलस्तर दीवारें छोड़ रहा था। स्कूल की दीवारें देखकर यह आसानी से कहा जा सकता था कि नई शिक्षा नीति हो या पुरानी , स्कूलों को बदलना असंभव है।
३. यह प्लास्टिक का जूता था, थप्प की आवाज के साथ कामतानाथ की कनपटी पर उसी तरह लगा जैसे कभी-कभी सरकार बढे हुये मंहगाई भत्ते को प्राविडेंट फ़ंड में जमा करा लेती है।
४. कामतानाथ की कनपटी पर जूता गुरुत्वाकर्षण के कारण अधिक देर तक रुक नहीं सका और नीचे गिर गया। कक्षा के छात्रों ने इस घटना को गौर से देखा और गुरुत्वाकर्षण को समझा।
५. जूते मारना शिक्षा में नवाचार नहीं है। शिक्षा का इतिहास गवाह है कि अनेक बार छात्रों ने अपने पुराने जूतों का उपयोग कांच का सामान न खरीदकर, उनसे शिक्षकों का सम्मान किया है।
६. केमेस्ट्री में ट्यूशन अधिक आती थी , क्योंकि गणितवाले छात्र भी केमेस्ट्री पढते थे। इस दृष्टिकोण से केमेस्ट्री के सामने बायोलॉजी पानी भरती थी।
७. जो प्रधानाचार्य अपनी जेब से अधिकारियों को खिलाता है , वह महामूर्ख होता है।
८. शिक्षा विभाग में व्यक्ति को आदर्शवादी और भ्रष्टाचारी , दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है तभी शिक्षा के लिये उपयुक्त वातावरण बनता है।
९. भ्रष्टाचारी और आदर्शवादी उसी तरह शिक्षा विभाग में शामिल होते हैं , जैसे पढाई के साथ-साथ छुट्टियां होती हैं। पूरे वर्ष पढाई और पूरा आदर्शवाद दोनों ही शिक्षा को उबाऊ बना देते हैं।
१०. कोई भी प्रशिक्षण महिला संभागियों के बिना अधूरा होता है।
११. शिक्षा अधिकारियों की जो नई पीढी आई थी , उसमें अंग्रेजी बोलने की बात तो दूर समझने की क्षमता भी नहीं थी। ये शिक्षा अधिकारी उस कथन को झुठलाना चाहते थे, जिसके अनुसार अंग्रेजी विश्व ज्ञान की खिड़की खोलती है।
१२. शिक्षा सेवा के अधिकारियों अधिकारियों का प्राय: अपमान होता रहता है और वे हर बार यह तय करते हैं –बदला लेंगे, लेकिन जब बदला लेने का समय आता है तो वे महामानव बन जाते। यही गुण शिक्षा अधिकारियों को अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से अधिक महत्व प्रदान करता है।
१३. आज के युग में राष्ट्रभक्ति पेट की गैस के साथ बनती है और जब पेट की गैस का इलाज हो जाता है , राष्ट्रभक्ति अपने आप गायब हो जाती है।
१४. शिक्षा विभाग के अधिकारी बिना किसी खेमे में रहे नौकरी नहीं कर सकते।
१५. जब वे पढते थे तो संस्कृत के शिक्षक के मुंह से स्पष्ट आवाज नहीं निकलती थी। जब छात्रों ने मिलकर गुरु जी को कहा कि साफ़ बोला करें तो उन्होंने कहा-’ मेरी बत्तीसी नहीं है। आप लोग चंदे से लगवा दो।’ हम लोगों ने चंदे से बत्तीसी लगवाना गलत समझा, इसलिये आगे पढाई नहीं हो पाई।
१६. शिक्षा मंत्री जी की धोती खुल गई। सौभाग्य से वे अंडरवियर पहने हुये थे, यद्यपि राजनेताओं के लिये यह अपवाद था।
१७. राजनेता शिक्षाविदों से अधिक शक्तिशाली होते हैं और जिधर वे चाहते हैं, शिक्षा उधर ही खिंचती है।
१८. हमारे देश की यह विशेषता है कि यहां किसी समस्या का समाधान करने की कोशिश की जाए तो राजनीति ऐसा होने नहीं देती और यदि समस्या से आंखें मींच ली जायें तो समस्या अपने आप हल हो जाती है।
१९. शिक्षा विभाग के अधिकारियों को वीआईपी कहते रहो तो वे बैठने के लिये कुरसी की मांग नहीं करेंगे।
२०. शिक्षा विभाग में अपने बॉस को खुश करने की बीमारी अन्य विभागों से छूत के रूप में लगी है। यही कारण था कि शिक्षा विभाग में हर अफ़सर अपने से ऊपर वाले अफ़सर को खुश रखना चाहता था।
२१. ....डी.पी.सिंह गुस्से में तमतमा गये , परन्तु बड़े बाबू के आगे बड़ा शब्द लगा था, अत: उन्हें चुप हो जाना पड़ा।
यह भी पढ सकते हैं:
१. अरविंद तिवारी के उपन्यास - ’ ऑफ़िस का गिरगिट’ पर मेरी टिप्पणी- https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10208904124333837
२. अरविंद तिवारी के उपन्यास - ’ शेष अगले अंक में ’ पर मेरी टिप्पणी-https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209738832441018

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10218875016959921

Friday, February 14, 2020

सूरज भाई का फोन इंगेज्ड

 बिस्तर पर अलसाये से लेटे हुये हैं। खिड़की से देख रहे हैं कि #सूरज भाई अभी तक पधारे नहीं हैं। फ़ोन इंगेज्ड जा रहा है। अब पलट के फोन किया #सूरज भाई ने। बोले जरा आराम से आयेंगे आज। ये किरणें, उजाला, रश्मियां , प्रकाश , रोशनी सब कह रहे हैं -"पापा जरा सबको 'वैलेंटाइन डे ' विश कर दें तब चलें। "

सूरज भाई बता रहे हैं -- "यहां सब तरफ़ रोशनी के पटाखे छूट रहे हैं। तारे एक दूसरे को मुस्कराते हुये देख रहे हैं। आकाश गंगायें इठला रहीं हैं। एक ब्लैक होल ने ऊर्जा और प्रकाश को धृतराष्ट्र की तरह जकड़ लिया है और फ़ुल बेशर्मी उनको "हैप्पी वेलेंटाइन डे" बोल रहे हैं। ऊर्जा को ब्लैक होल की जकड़ में कसमसाते देख आकाशगंगा ने एक बड़ा तारा फ़ेंककर ब्लैकहोल को मार दिया। उसके कई, अनगिन टुकड़े हो गये। ब्लैक होल का पांखड खंड-खंड हो गया है। अनगिनत रोशनी मुक्त होकर चहकने लगी है। क्या तो सीन है भाई! काश हम तुमको इसका वीडियो दिखा पाते।"
हमें कुछ न देखना सूरज भाई जल्दी आओ। चाय ठंढी हो रही है। देर करोगे तो फ़िर दुबारा बनवानी पड़ेगी। -हमने #सूरज भाई को बुलाकर फ़ोन रख दिया। क्या फ़ायदा पैसा फ़ूंकने से फ़ालतू। आयेंगे तब आराम से बतियायेंगे।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10218848197969463

Thursday, February 06, 2020

आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर के उत्पाद का पेटेंट

 आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर 1914 में स्थापित हुई। यह फैक्ट्री कम्बल, जर्सी, मोजे,कॉम्बैट यूनिफार्म और अन्य तमाम तरह की वर्दियां बनाती है।

निर्माणी बहुत ठंडे मौसम (ECC extreme cold climate) के लिए कपड़े बनाने के लिए जानी जाती है। बहुत पहले हमको एक ग्लेशियर सूट दिखाकर बताया गया था कि यही कोट पहनकर शेरपा तेनसिंग ने एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया था।
106 साल के अपने इतिहास में निर्माणी ने अनगिनत उत्पाद बनाये। बनाकर सप्लाई किये और भूल गये। कभी किसी उत्पाद को पेटेंट जैसा कुछ कराने की नहीं सोची। लेकिन अब जमाना पेटेटिंग का है। जो बनाओ उसका पेटेंट कराओ वरना बनाएंगे हम नाम और दाम कमाएगा कोई और। हल्दी और दूसरे भारतीय उत्पादों का हाल पता है सबको।
इसी पेटेटिंग की कड़ी में हमारी निर्माणी के एक उत्पाद 'कैप बालाकलावा' का पेटेंट हुआ। कैप बालाकलावा शून्य डिग्री तापमान के आसपास पहनने के काम आती है। कैप बालाकलावा मतलब ऐसी टोपी जिसमें सर, गर्दन और दूसरे हिस्से (आंख ,नाक और मुंह छोड़कर) ढंके रहें।
निर्माणी ने यह उत्पाद डिजाइन किया। बनाया और सेना को सप्लाई किया। 2016 से शुरू होकर लाखों कैप बालाकलावा आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर बना चुकी है। बनाने के बाद इसके पेटेंट के लिए आवेदन किया। पिछले महीने ही इसका पेटेंट आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर के नाम हुआ।
पेटेंट होने का मतलब यह कि अब इस उत्पाद को हमारी ही निर्माणी बना सकती है। अगर कोई दूसरा बनाएगा तो उसको हमारी अनुमति लेनी होगी और हमको इसकी रॉयल्टी देनी होगी।
यह कैप सेना को सप्लाई की जाती है। इस वर्ष हमारी निर्माणी को 92000 कैप सप्लाई करनी है। अगले साल का आर्डर अभी आना है। हमारा पेटेंट होने के चलते हमारे अलावा दूसरा कोई इस उत्पाद हमारी अनुमति के बिना इसको बना नहीं सकता।
इस साल हमारी निर्माणी का लक्ष्य 10 आइटम पेटेंट कराने का है। इस दिशा में काम जारी है।
निर्माणी का महाप्रबन्धक होने के चलते इस उपलब्धि पर प्रसन्न होने, निर्माणी पर गर्व करने और आपसे साझा करने के हक का उपयोग किया जा रहा है।

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Monday, February 03, 2020

मुझे भी अपना समझ कर पुकारता कोई

 मेरी भी बाहों में ख़ुद को पसारता कोई

मेरी भी शाम की ज़ुल्फें संवारता कोई
मिले थे विरसा में कुनबा के रंजिश और वादे
सुकूँ से जिन्दगी कैसे गुज़ारता कोई
ये दुनिया काग़ज़ी नाव पे है सवार, यही
गली से निकला दिवाना पुकारता कोई
भले ही दिल की नज़र से न ताकता लेकिन
दिली तमन्ना थी मुझको निहारता कोई
हर एक फैसला मन्ज़ूर ही मुझे होता
निगाहे नाज़ से करता जो बारता कोई
जवानी गुज़री इसी आरज़ू की बाहों में
मुझे भी अपना समझ कर पुकारता कोई।
ख़ुदा से अपनी दुआ अब तो है यही जर्रार
चढ़े दिमाग़ को उन के उतारता कोई।
विरसा...पैदाएशी
बारता...बात चीत
कुनबा...ख़ानदान
जर्रार तिलहरी
आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर।

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