Saturday, September 11, 2021

खुला खेल फरुक्खाबादी

 


उस दिन प्लेटफार्म के बाहर फर्श पर बैठी महिला आलपिन से दांत खोद रही रही थी। बहुत दिन बाद आलपिन से दांत खुदाई दिखी। महिला तसल्ली से कुछ सोचती हुई, सामने जमीन ताकती हुई आलपिन दाँतों में टहला रही थी। बीच-बीच में आलपिन को देखती भी जा रही थी। देखकर फिर से दांत में घुसा देती। उसके चेहरे पर अनिर्वचनीय तसल्ली पसरी हुई थी।
ऐसी अनिर्वचनीय तसल्ली की खोज में न जाने कितने लोग फर्जी बाबाओं, गुरुओं के आगे-पीछे घूमते हैं। जीवन जीने की कला के सीखने के झांसे में समय-पैसा बर्बाद करते हैं।
उसकी तसल्ली देखकर मन के तार अनायास अफगानिस्तान में महिलाओं के हाल से जुड़ गए। वहां की नई हुकूमत ने महिलाओं को घर और पर्दे तक सीमित करने के फरमान जारी कर दिया है यह कहते हुए कि महिलाओं का काम घर में रहना है, बच्चे पैदा करना है।
महिलाओं की स्थिति से 'वोल्गा से गंगा' का 6000 ईसा पूर्व का इतिहास याद आ गया। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार उस समय परिवार की मुखिया स्त्रियां होती थीं। उस समय के एक परिवार का बयान :
"निशा की भांति ही दूसरे परिवारों पर भी उनकी माताओं का शासन था, पिता का नहीं। वस्तुत: वहां किसका पिता कौन है , यह बतलाना असम्भव था। निशा को आठ पुत्रियां और छह पुत्र पैदा हुए जिनमें चार लड़कियां और तीन पुत्र अब भी उसकी पचपन वर्ष की अवस्था में मौजूद हैं। इनके निशा सन्तान होने में संदेह नहीं, क्योंकि इसके लिए प्रसव का साक्ष्य मौजूद है; किंतु उनका बाप कौन है, इसे बताना सम्भव नहीं। निशा के पहले जब उसकी बूढ़ी दादी का राज्य था, तब बूढ़ी दादी-उस वक्त प्रौढ़ा -के कितने ही भाई पति, कितने ही पुत्र पति थे जिन्होंने कितनी ही बार निशा के साथ नाचकर, गाकर उसके प्रेम का पात्र बनने में सफलता पाई थी, फिर स्वयं रानी बन जाने पर निशा की निरन्तर बदलती प्रेमाकांक्षा को उसके भाई या सयाने पुत्र ठुकराने की हिम्मत नहीं रखते थे।"
3600 वर्ष पूर्व स्त्री वर्चस्व वाले से समाज से हालात यहां तक पहुंच गए कि उनको घर तक सीमित कर दिया जाए। अफ़ग़ानिस्तान में समाज हज्ज़ारों साल पीछे जाने को अभिशप्त होता दिख रहा है।
जब अफगानिस्तान में महिलाओं का बाहर निकलना बंद करने के फरमान जारी हो रहे हैं उसी समय हिन्दुतान में महिलाओं की फौज में भर्ती के रास्ते खुल रहे हैं। इस बार महिलाएं सेना में भर्ती के लिए कम्पटीशन देंगी इस आशय की सूचना आई पिछले दिनों अखबार में।
अगल-बगल के दो देश महिलाओं की स्थिति के बारे में हजारों साल के फासले की सोच रख सकते हैं। शायद आलपिन से दांत खोदती महिला इसी स्थिति पर विचार कर रही हो।
हाल में बगल के देश में घटी घटना दुनिया की सारे विकास की पोलपट्टी खोलती है। दुनिया के सबसे विकसित कहे जाने वाले देश और समाजों की कुल जमा कोशिश अपने फायदे के हिसाब से दूसरे देशों से सम्बंध रखने की होती है। इसके पहले सरकारें बनाने-गिरने में का पर्दे में होता था अब जरा खुलकर हो गया है। खुला खेल फरुक्खाबादी।
कितना भी आधुनिक हो गयी हो दुनिया लेकिन जोर आदिम प्रवृत्तियों का ही है। सब कुछ ताकत से तय होता है। फिलहाल तो यही दिख रहा है।

https://www.facebook.com/share/p/XBNRXTmEn4tAvPvb/

अंधविश्वास के खिलाफ़, उनको लिखनी है एक गजल

 अंधविश्वास के खिलाफ़, उनको लिखनी है एक गजल

सुबह से कर रहे इंतजार, पंडित का मुहूरत के लिये।

-कट्टा कानपुरी

https://www.facebook.com/share/p/mhXyXvHEuDULFj9f/

Friday, September 10, 2021

सुबह से मेरी तारीफ़ों के पुल

 सुबह से मेरी तारीफ़ों के पुल उसने बांध रखे हैं

इतना उतर गये हैं हम, उसकी निगाह से ! 🙂
-कट्टा कानपुरी

https://www.facebook.com/share/p/2kQyJoVHh6TriW4e/

Monday, September 06, 2021

मैं जो कभी नहीं था, वह भी दुनिया ने पढ़ डाला


कल सबेरे स्टेशन गए| बच्चे को लेने| ट्रेन करीब एक घंटा लेट थी| इंटरनेट ट्रेन के हाल मिनट दर मिनट , किलोमीटर दर किलोमीटर बताता रहा| देरी और दूरी भले न कम हुई लेकिन पता चलता रहा कि दूसरी कित्ती है| ट्रेकिंग सिस्टम के जलवे|
मन किया इसी तर्ज पर खुशहाली, विकास और अच्छे दिन का भी कोई ट्रेकिंग सिस्टम होता तो पता कर लेते कहां तक पहुंचे, कित्ती दूर हैं। लेकिन हमने मन को हड़का दिया इस बेवकूफी की बात पर।
स्टेशन के बाहर लोग डिवाडर पर लोग लेटे हुए बतिया रहे थे| उनकी धज बता रही थी कि वे यहीं सोये रात को| कुछ लोग जागकर बतिया भी रहे थे| किसी परिवार के आपसी झगड़े की कहानी बयान हो रही थी , जोर-जोर से| आसपास के लोगों से बेपरवाह वे लोगों की बुराई-भलाई करते थे| बिना इस चिंता के कि बाहरी लोग उनकी घरेलू बाते सुन रहे हैं| अपने जनप्रतिनिधि भी तो इसी तरह बिंदास हरकतें करते हैं संसद, विधानसभाओं में बिना यह सोचे कि कोई उनकी बात सुन रहा है| डिवाइडर पर झगड़ा-बयानी करते लोग फिर भी इस मायने में शरीफ लगे कि वे छीना झपटी और मार पीट पर उतारू नहीं दिखे|
स्टेशन पर बंदर दौड़ रहे थे| किसी पर भी खौखियाने लगते, किसी पर दांत किटकिटाकर बन्दरियाने लगते| किसी पर भी झपटने लगते| पिछले दिनों एक समुदाय के लोगों द्वारा दूसरे समुदाय के लोगों को पीटने की खबरें आईं| कल एक खबर यह भी आई जिसमें एक समुदाय के लोगों ने अपने ही समुदाय के आदमी को दूसरे समुदाय का समझकर पीट दिया| इस मामले में बंदर इंसान से बेहतर है| बंदर कम से कम बंदरों को तो नहीं पीटते |
ऊपर नजर गई तो देखा सूरज भाई की सवारी निकल रही थी| एक आदमी नींद से जागकर अपना तहमद फटकार रहा था| सामने टैक्सी स्टैंड पर लोग देश के हाल पर बहस कर रहे थे| आम इंसान आपस में बहस के अलावा और कर भी क्या सकता है?
घर लौटकर फिर साइकिल से टहलने निकले| सड़क पर लोग तेजी से टहलते दिखे| कुछ लोग बेंचों पर बैठे योग कर रहे थे| एक बुजुर्ग आंख और कान दबाये भ्रामरी प्राणायाम कर रहे थे| ज्यादातर लोग मोबाइल में मुंडी घुसाये थे| लग रहा था घर से मोबाइल करने यहां आते हैं| एक महिला लोगों की भीड़ से अलग फुटपाथ पर बैठी ताली कसरत में जुटी हुई थी| कुछ लोग पुलिया पर बैठे गपिया रहे थे| बैडमिंटन खेलते और कुत्तों को टहलाते लोग भी दिखे|
मैदान पर बच्चे क्रिकेट खेलते दिखे| मैदान की घास पर ओस की बूंदे सूरज की रोशनी में आशा की किरण सरीखी चमक रहीं थीं| जिन हिस्सों की घास को लोग कुचल गए थे उन हिस्सों की ओस की बूंदों का कतल हो गया था| आम जमात के अरमानों की तरह वे ओस की बूंदे कुचल दी गयीं थीं| हज्जारों-लाखों की संख्या में ओस की बूंदों के कुचले जाने की खबर किसी अखबार में नहीं दिखीं| उन पर कोई बहस किसी टीवी चैनल पर नहीं होती| न ही सोशल मीडिया पर इस बारे में कोई बात करता है| यह सिर्फ और सिर्फ इसलिए क्योंकि ओस की बूंदे वोट नहीं देती हैं| आज की सारी राजनीति वोट तक सिमटकर रह गई है|
एक बेंच पर बैठे तीन बच्चे भी मोबाइल में डूबे हुए थे| एक बच्चा सेल्फ़ी ले रहा था| बात की तो पता चला कि बच्चे शहर से आए हैं| तीनों बच्चे कक्षा 9 में पढ़ते हैं| एक बच्चा हमारे हर सवाल पर मुस्करा रहा था गोया कह रहा हो –‘क्या बच्चों जैसी बातें करते हो|’ उसके दोस्तों ने बताया कि यह इसी तरह बात करता है , कम बोलता है|
बंदर यहां भी गदर काटे हुए हैं| एक जगह सड़क पार करके फुटपाथ पर पड़े दाने चुगने लगे| एक बुजुर्ग बंदर ने एक नौजवान बंदर को डपट जैसा दिया| वह भागता हुआ सड़क की तरह चला गया| दाना चुगने के बाद वे आगे चल दिए| बंदर आगे , बंदरिया और बच्चे पीछे| बच्चे बंदरियों के पीठ पर ही दिखे| बंदरों में भी जिम्मेदारी का काम उनकी मादाएं ही करती हैं शायद| बंदर इंसानों की तरह सिर्फ रोआब दिखाने , लड़ने भिड़ने का काम करते हैं| क्या पता महिला दिवस की तर्ज पर उनके यहां भी बन्दरियां दिवस मनाया जाता हो|
मैदान के पास ही मिले चना बेचते सुरजीत। चालीस रुपये का चना बेंच चुके। शाम तक तीन-चार सौ बचा लेते हैं। पत्नी मायके आती-जाती रहती हैं। पिछली बार जब मिले थे पत्नी मायके चली गईं थीं। दो दिन पहले वापस आ गईं। बच्चा आठ साल का है, केजी में पढ़ता है। आजकल स्कूल बंद है। मोबाइल खरीदना है बच्चे की पढ़ाई के लिए। पैसे के जुगाड़ करना है।
आजकल ऑनलाइन पढ़ाई के चलते मोबाइल जरूरत हो गई है। पैदा होने वाले बच्चों की अगर कोई यूनियन होती तो पैदा होने से पहले मोबाइल की मांग इत्ती जोर से उठाती कि बच्चों को पैदा करने वाले ईश्वर या देवी जो भी हों उनके पसीने छूट जाते। बच्चे बिना मोबाइल के पैदा होने से इनकार कर देते- 'रिफ्यूज टू टेक बर्थ विदाउट मोबाइल।'
बहरहाल बात हो रही थी चने बेचने वाले सुरजीत की। उनकी पत्नी अक्सर मायके चली जाती है। उसकी खर्चे की जरूरत रोज 200 रुपये की है। इसके अलावा माँ, बहन हैं घर में। बहन की शादी होनी है।
पिता बीड़ी पीते थे, मना करने के बावजूद। कैंसर हो गया। नहीं रहे। घर के सब पैसे खर्च हो गए। अब घूम-घूमकर चने बेचते हैं सुदर्शन। पैर कमजोर है।
सुरजीत को पैसे की कमी है लेकिन पान-मसाला बेंचने से परहेज है क्योंकि पिता इसीलिए नहीं रहे। जिस दुकान में बैठते थे उनके पिता वह नगरपालिका की थी। जिसके नाम से थी दुकान उनकी गैरजिम्मेदारी के कारण बन्द हो गयी। सुरजीत का कहना है कोई उनको दुकान दिला दे तो उनको सहूलियत हो जाएगी। लेकिन लाख टके का सवाल कि दिलाये कौन?
इतनी कम उम्र में इतनी समस्याएं झेल चुके हैं सुरजीत कि अपनी परेशानियों के प्रति दार्शनिक जैसे हो चुके हैं। न कोई आवेग, न कोई आक्रोश। सिर्फ नियति को सर झुककर स्वीकार करने का भाव। एक असंपृक्त उदासी भरा भाव बातचीत में। लेकिन इसके बावजूद निराशा और अवसाद जैसा भाव नहीं।
यह तो हमने कुछ देर की बातचीत में वह है। हाल-समाचार क्या पता इससे अलग हों। हम किसी को भी अपनी समझ के हिसाब से ही जानते हैं। किसी के बारे में राय बनाने में हमारे पूर्वाग्रहों का बड़ा हाथ होता है।
दूसरों के बारे में पूर्वाग्रहों के चलते राय बनाते हुए उसी हिसाब से उनके साथ व्यवहार करते हुए लोग अपनी जिंदगी गुजार देते हैं, देश समाज शताब्दियां गुजार देते हैं। कहा भी गया है:
"मैं जो कभी नहीं था
वह भी दुनिया ने पढ़ डाला,
जिस सूरज को अर्घ्य चढ़ाया
वह भी निकला काला।" --- कन्हैयालाल नन्दन
बहुत हुआ इतना। और कहेंगे तो आप न जाने क्या सोचने लगो मेरे बारे में। आपके भी तो पूर्वाग्रह होंगे।

https://www.facebook.com/share/p/8mBTRphxyyAiffne/

हमारी हर बेवकूफी को 'बड़ी समझदारी' का नाम मिला

 हमारी हर बेवकूफी को 'बड़ी समझदारी' का नाम मिला,

बेवकूफ कहलाये हमने जब भी अकल की बात कही।
-कट्टा कानपुरी

https://www.facebook.com/share/p/jgM5ckNg4kMa4P5Y/

Tuesday, August 31, 2021

शहीदों की मजारों पर



शाहजहांपुर बलिदानी शहर कहलाता है | पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह के अलावा अन्य अनेक शहीद आजादी की लड़ाई में कुर्बान हुए हैं| बलिदानी शहर के बारे में ओज कवि स्व राजबहादुर विकल कहते थे :
“पांव के बल मत चलो अपमान होगा,
सर शहीदों के यहां बोए हुए हैं|”
बीच शहर में इन तीनों शहीदों की प्रतिमा लगी हैं। शहीद पार्क है| अशफाक उल्ला खां की मजार पर स्मारक है| ठाकुर रोशन सिंह और पंडित राम बिस्मिल के स्मारक देखने के बारे में बहुत दिन से सोच रहा था| कल बिस्मिल जी के स्मारक की खोज में निकले| इस बारे में सुधीर विद्यार्थी जी से जानकारी ली तो बिस्मिल जी के जन्मस्थान की जानकारी मिली| पता चला की गोविंदगंज आगे सदर बाजार में बद्री प्रसाद मुरलीधर का प्रेस और मकान था। उसी के पीछे वाले हिस्से में बिस्मिल के मां-पिता रहते थे| वहीं वे पैदा हुए थे| बाद में बिस्मिल के शहीद होने पर पास में एक घर में बिस्मिल की मां और बहन रहीं| उसी घर को जाने वाली सड़क पर बिस्मिल द्वार बना हुआ है| यह बिस्मिल द्वार शहर के काली मंदिर के सामने है|
काली मंदिर पहुंचे तो सामने बिस्मिल द्वार दिख गया| बिस्मिल के घर के बारे में पूछा एक नौजवान हमको वहां तक ले गया| पतली गली में पुरानी ढब का मकान| उस मकान में कश्यप परिवार रहता है| जिस हिस्से में बिस्मिल की बहन रहती थीं उसमें रविशंकर कश्यप रहते हैं| हलवाई का काम करते हैं| बगल के हिस्से में उनके चाचा राम कुमार कश्यप रहते हैं जो कि कचहरी से 2010 में चपरासी के पद से रिटायर्ड हैं|
कश्यप परिवार को सिर्फ यह जानकारी है की यहां बिस्मिल का परिवार रहता था| इसके अलावा उनको और कोई जानकारी नहीं है| जो है वो भी सुनी-सुनाई के आधार पर| जिस हिस्से में बिस्मिल की बहन रहती थीं वह हिस्सा कमोवेश वैसा ही है अभी| पुराने तरह का कुंडी वाला दरवाजा, महराब वाली बनावट वाला बरामदा | मकान का पुरानापन बरकरार है| उस हिस्से को देखकर लगा समय यहीं आलथी-पालथी मारकर बैठ गया है| ऊपर का हिस्सा अलबत्ता कुछ नया बना है| शौचालय भी| वहीं पर एक कुंआ भी था जो अब बंद हो गया है|
साथ में आए बालक ने बताया कि बिस्मिल के पत्र भी इनके पास हैं| पूछने पर मुस्कराए रामकुमार कश्यप| बोले – ‘ न जाने कहां रखे हैं|’ फिर बताया कि उनकी बहन के पास हैं शायद| लेकिन उनके बताने के लहजे से पता चला कि शायद इनको कुछ पता नहीं होगा|
बिस्मिल की बहन के घर से निकलकर उनका जन्मस्थान खोजने निकले| जिस जगह बद्री प्रसाद मुरलीधर का प्रेस था उसके एक हिस्से में एक कार्ड्स की दुकान है| दूसरे हिस्से में नया निर्माण हो रहा है| वहां के लोगों से पूछा तो किसी को पता नहीं था कि यहां बिस्मिल का जन्म हुआ था| विद्यार्थी जी से पता किया तो उन्होंने फिर गाइड किया कि पिछले हिस्से में गली में वैद्य जी की दुकान है उसके सामने वाले हिस्से में (प्रेस के पिछले हिस्से में) घर था बिस्मिल का| प्रेस के पिछले हिस्से में गए और रवि वैद्य का मकान पूछा तो देखा कि मकान चुका था| ऊपर की मंजिल टूट चुकी थी , नीचे की मंजिल में दवाखाना खुलने का समय उसके दवाखाना होने की गवाही दे रहा था|
बहरहाल जगह का अंदाजा लगने के बाद उस हिस्से में गए जो प्रेस का पिछला हिस्सा है| वहां आजकल बाथम परिवार रहता है| अनिल बाथम जी मिले| पूछने पर बताया –‘हां, पिताजी लोग बताया करते थे कि इस हिस्से में कभी बिस्मिल परिवार रहता था|’
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का नाम आजादी की लड़ाई के प्रमुख क्रांतिकारियों में लिया जाता है| देश-दुनिया में उनका बड़ा नाम है| तुर्की में उनके नाम पर बिस्मिल शहर बसा है| लेकिन जिस शहर में वे पैदा हुए उसी शहर में उनके जन्मस्थान के बारे में लोगों को जानकारी नहीं|
शहीदों को नमन करते हुए शेर जो बहुत पढ़ा जाता है वह है :
“शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा|”
पहले शेर पढ़कर लगता था कि इसमें शायर कहना चाहता है कि शहीदों को लंबे समय तक याद किया जाएगा| उनकी कुर्बानियां लोगों को प्रेरित करेंगी| लेकिन कल शहर के बीचो-बीच स्थित बिस्मिल के जन्मस्थान के बारे में लोगों का अनजानापन और उदासीनता देखकर शेर का मतलब समझ में आया| शायर का मतलब यह रहा होगा कि जिन शहीदों की मजारे बन जाएंगी उनको लोग याद करेंगे| उनमें मेले लगेंगे| मजार इसलिए कहा होगा शायद कि मजार में जगह कम लगती है| कम जगह में हो जाएगा काम| पैदाइश वाली जगह पर मेले लगाने में ज्यादा जगह लगेगी| अब तो माल-संस्कृति में मेले भी लगाने बंद हो गए| लिहाजा अब शहीदों के नामों-निशान की गुंजाइश काम ही होती जाएगी|
वैसे भी क्रांतिकारियों ने आजादी के आंदोलन में अपनी कुर्बानी यह सोचकर तो दी नहीं थी कि इससे उनको क्या मिलेगा ? उनके परिवार के साथ कैसा व्यवहार होगा?
बिस्मिल के शहीद होने के बाद उनके परिवार का जीवन बहुत कष्ट में बीता | छोटा भाई बीमारी में इलाज के अभाव में नहीं रहा| पिता भी अभाव में कमजोर और चिड़चिड़े होकर नहीं रहे| इसके बाद मां और फिर बहन भी उसे राह गई| कहीं से उनको ऐसा सहयोग न मिला कि वे तसल्ली से जी सकें|
सुधीर विद्यार्थी अपनी किताब 'अपने हिस्से का शहर' में लिखते हैं:
“कहां थे तब बिस्मिल के शहर के राजनेता और समाजसेवी | किसी ने बिस्मिल की मां और उनके पिता को सहारा नहीं दिया| वे कब ,कहां और कैसे मरे यह भी किसी को नहीं पता| कोई यादगार नहीं बनी शाहजहांपुर की धरती पर पिता मुरलीधर और मां फूलमती की| इस शहर के किसी सभागार में इनकी तसवीरें नहीं लटकाई गईं|
बिस्मिल के मां और पिता के अंतिम दिन इस शहर के माथे पर कलंक की तरह लगते हैं मुझे| आखिर कौन माफ करेगा हमें| क्या हम बिस्मिल के एक भाई और उनके मां-पिता को स्वाभिमान से जीने और मरने लायक सुविधा देने लायक भी नहीं थे|”
इसका जबाब शायद किसी के पास नहीं है !
बिस्मिल की शहादत के बाद उनके परिवार की स्थिति

https://www.facebook.com/share/p/pM93Mv7qrnDtFT9n/

Monday, August 30, 2021

वजह-बेवजह जैसे मन करे मुस्कराते रहिये



आज सुबह टहलने निकलते-निकलते सात बजे गए। देर हो गयी तो एकबारगी मन किया छोड़ दें। लेकिन फिर चल ही दिए।
साइकिल की हैंडल पर जंग लग गया है। यह लिखते हुए Surendra Mohan Sharma शर्मा जी की याद आ गयी। वे इसे पढ़ते तो जरूर लिखते-'कंजूसी न करें, साइकिल नई ले लें।' पुरानी पोस्ट्स पर उनकी टिप्पणी देखता हूँ तो बरबस उनके साथ बातचीत की याद और मथुरा आने के वायदे पर बात होती थी। आज तो जन्माष्टमी है। आज तो जरूर वे कोई फोटो लगाते मथुरा के मंदिर का। क्या पता कल मथुरा में हुई मारपीट के बारे में भी कुछ लिखते-कहते-बताते। सच क्या है पता नहीं लेकिन कल खबर आई थी कि मथुरा में मिठाई की दुकान किसी गैर हिन्दू की थी इस बात पर कुछ लोगों ने दुकान वाले को धमकाया।
इसी क्रम में कल Asghar Wajahat असगर वजाहत जी ने पाकिस्तान यात्रा का संस्मरण लिखा था। वहां के कई हिंदुओ ने अपने नाम मुस्लिम जैसे रखे हैं। (https://m.facebook.com/story.php...)
लगता है कि दुनिया के सभी धर्म जैसे-जैसे पुराने और बुजुर्ग होते जाते हैं वैसे-वैसे उनके कुछ अनुयायी धर्म की मूल भावनाओ से दूर होते जाते हैं। कट्टर होते जाते हैं।
असगर वजाहत जी और अन्य लोगों के यात्रा संस्मरण पढ़ते हुए लगता है कि सब कुछ छोड़-छाड़कर दुनिया घूमने निकल लें। पूरा हिंदुस्तान से शुरू करके फिर ईरान, तूरान, यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड , अमेरिका सब घूम डालें। मंझा डालें। लेकिन बात लगने तक ही रह जाती है। अमल में नहीं आ पाती। दो-ढाई साल की बची नौकरी कहती है -'हमको निपटा के तब जाओ।' हम ठिठक जाते हैं। जबकि हमारे छोटे साहबजादे Anany Shukla दो-ढाई साल नौकरी करने के बाद घुमक्कड़ी के लिए इतना उत्साहित हुए कि कोरोना काल में नौकरी न छोड़ने की हर समझाइश को दर किनार करते हुए आ गए। कुछ दिन घर में दाना-पानी के बाद लेह, लद्दाख, कश्मीर टहल आये। इसके बाद अब फिर हरिद्वार और ऋषिकेश में फ़ोटो बाजी हो रही है। अनन्य के फोटो-वीडियो और कविताएं इधर देख सकते हैं।
घुमक्कड़ी का एक और मॉडल कल देखने को मिला। कल हमारी मुलाकात हमारे एक फेसबुक पाठक मित्र से हुई। वे और उनकी पत्नी भी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं। हफ्ते में पांच दिन काम करते हैं और वीकेंड के दो दिन जमकर घूमते हैं। पत्नी और बच्चे समेत। 'वर्क फ्राम होम' की सुविधा का लाभ उठाते हुए दनादन घुमाई कर रहे हैं। इस बीच अपने कार्यस्थान से 3000 किलोमीटर दूर यात्रा कर चुके हैं। इरादा पूरा हिंदुस्तान नापने का है।
मजे की बात पाठक मित्र हमारे फेसबुक मित्र भी नहीं थे। कल सन्देशा आया और मुलाकात हुई। फेसबुक मित्र भी बने। जमकर बतकही हुई। खूब बातें भी। फोटोबाजी भी। लेकिन फोटो यहां लगा नहीं रहे। क्या पता उनके दफ्तर वाले पूछने लगे कि बिना बताए कैसे घूम रहे। 🙂

https://www.facebook.com/share/p/TgRHW7JuUkHn1kb1/
बहरहाल, बात टहलने की हो रही थी। सुबह के समय रामलीला मैदान में लोग टहल रहे थे। कुछ लोग गाड़ी चलाना सीख रहे थे। कुछ लोग सड़क किनारे बेंचों पर तसल्ली से बैठे बतिया रहे थे। कुछ लोग तेज-तेज और कुछ आहिस्ते- आहिस्ते टहलते हुए दिखे।
रामलीला मैदान के बगल में कैंट मैदान पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। हमारे देखते हुए एक बाल को हिट करने के चक्कर में एक खिलाड़ी पूरा घूम गया। गेंद उसके बल्ले पर आई नहीं। अलबत्ता वह इतनी तेज घूमा था कि विकेट गिरते हुए बचा। बचने के चक्कर में जमीन पर बैठकर मुस्कराया जिसके जबाब में लोग हंसे। वह थोड़ा और झेंपते हुए मुस्कराया और अगली गेंद को खेलने के लिए तैयार हो गया।
साइकिल के आगे एक बुजुर्गवार दाएं हाथ में एक बेंत लिए सड़क को ठोंकते चले जा रहे थे। उनके सड़क ठोंकने के अंदाज से लगा मानो पता लगा रहे हों कि कहीं कोई विस्फ़ोटक सुरंग तो नहीं है इधर।
गोविंदगंज क्रासिंग के पहले 'कामसासू काम्प्लेक्स' में काम करने वाले टेलर ओपी मिले। उनके हाल-समाचार लिए। ओपी घाटमपुर के पास एक गांव के रहने वाले हैं। दिन में पांच ओवरऑल सिल लेते हैं। खुद के खर्चे के बाद घर भेजते हैं सात-आठ हजार। सिलाई के अलावा जगह की रखवाली, देखभाल अलग से-जिसका कोई मेहनताना नहीं मिलता।
घर-परिवार की बात करते हुए हम विदा हुए। आगे एक मिठाई की दुकान पर लोग बतियाते हुए यूपी-बिहार के लोगों को गरिया रहे थे। बातचीत और भाषा के कॉन्फिडेंस से वे लोग यूपी-बिहार के ही लग रहे थे। शायद इसीलिए उनके गरियाने से कोई बवाल नहीं हुआ।
क्रासिंग पार की दुकानें बंद थीं। कुछ दूध वाले अपने डब्बों में लाया दूध बेंच रहे थे। दाम पूछने पर बताया -' जौन भाव चाहो तौंन भाव मिल जैहै दूध।'
बातचीत करने पर खुलासा हुआ कि दूध के दाम 30 रुपये लीटर से 55 रुपये लीटर तक हैं। कुछ लोग शुध्द दूध पचा नहीं पाते वो लोग पतला दूध लेते हैं। पतला मतलब पानी मिला। पानी दूध वाले घर से मिलाकर लाते हैं। इतनी ईमानदारी से पानी मिला दूध बिकते देखकर आश्चर्य होना चाहिए लेकिन उनकी सहजता के आगे आश्चर्य टिका नहीं।
एक दूध वाले के मुंह पर चेचक के दाग थे और एक आंख रोशनी विहीन। पता चला कि बचपन में चेचक के कारण हुआ था ऐसा। गांव में किसी को कोरोना हुआ नहीं। टीके शुरू में नहीं लगे लेकिन अब लगवा रहे हैं लोग।
आगे मिठाई की दुकानों के आगे दूधियों की भीड़ लगी थी। वे आपस में चुहल करते हुए दूध नाप-बेंच रहे थे।
हम यह सब देख ही रहे थे कि एक सज्जन अपनी मोपेड बीच सड़क रोककर हमसे बतियाने लगे। हमने खुदको और उनको मोपेड समेत किनारे किया और तसल्ली से बात की। सज्जन यशपाल कुकरेजा जी हैं। उनकी डबल स्टोरी मार्केट में किराने की दुकान है। पिछले दिनों उनकी दुकान में चोरी हुई। उसी सिलसिले में चौकीदार के तैनात किए जाने की बात हुई।
यशपाल कुकरेजा जी निर्माणी के रामलीला मंचन से जुड़े रहे हैं। रावण का रोल करते थे। इसके अलावा जनक, दशरथ, मेघनाथ के रोल भी करते रहे हैं। रावण का रोल के लिए स्व. महेंद्रूजी प्रसिद्द थे। शाहजहांपुर के रंगमंच की शुरुआत करने में महेंद्रू जी का काफी योगदान है। महेंद्रू जी के शिष्य हैं कुकरेजा जी। इसके अलावा भी और खूब बातें हई सड़क पर खड़े-खड़े। यह भी कि तनाव के चलते डायबिटिक हो गए हैं कुकरेजा जी।
निष्कर्ष निकला कि आजकल जो डायबिटीज की बीमारी हो रही है बहुतायत में लोगों को उसकी जड़ में लोगों की जिंदगी में बढ़ता तनाव है। तनाव कम, सुगर खत्म।
कुकरेजा जी मिलने के बाद एक गली में मुड़े। वहां एक बुजुर्गवार कुर्सी पर बैठे स्टूल पर रखे रामचरित मानस का पारायण कर रहे थे। बातचीत से पता सिचाई विभाग से रिटायर्ड असिस्टेंट इंजीनियर हैं। रामदास नाम। उम्र 87 साल। रामचरित मानस के अलावा गीता आदि का पारायण करते हैं। रामदास जी के अनुसार -'भगवानों में सबसे श्रेष्ठ भगवान राम हैं।'
जम्माष्टमी के दिन मथुरा वाले यह सुन लेते तो कम से कम टोंकते तो जरूर। लेकिन किसी ने सुना नहीं। इसके अलावा रामदास जी ने रामनाम का विविध तरह से महत्व बताया। यह भी बताया कि राम जी को भक्त पसन्द हैं। भक्त से भी अधिक दास प्यारे हैं। हनुमान जी ने स्वयं को राम का दास माना इसीलिए वे राम जी के प्रिय हैं।
रामदास जी की बात सुनते हुए मैं आजकल समाज में बढ़ते भक्तों और भक्तिभाव में तारतम्य बिठाने की कोशिश कर ही रहा था कि पीछे से मोटरसाइकिल ने तेज हॉर्न बजाते हुए सड़क खाली करने का आदेश दिया। हम आगे बढ़ लिए।
लौटते हुए कैंट में तिकोनिया पार्क के पास दूरी का पुराना पत्थर देखा। उसमें लिखा था बरेली 46 मील, पुवायां 17 मील। यह पत्थर जब लगा होगा तब भारत में दूरियां मील में नापी जाती होंगी। पार्क में बन्दर कबड्डी खेल रहे थे। किनारे एक नाई की कुर्सी पड़ी थी। लेकिन हज्जाम और हजामत बनवाने वाले दोनों नदारद थे।
लौटते में कैंट मैदान पर मैच बदस्तूर जारी था। बेंचों पर बैठे लोग और तसल्ली में होकर अधलेटे से हो गए थे।
सूरज भाई हमको इतने दिन बाद सड़क पर देखकर मुस्करा रहे थे। देखादेखी हम भी मुस्करा दिए। वैसे भी मुस्कराने में अभी कोई ख़र्च नहीं लगता न कोई टैक्स। हंसी जीएसटी फ्री है इसलिए मुस्कराते रहने में कोई हर्जा नहीं है। वजह-बेवजह जैसे मन करे मुस्कराते रहिये। आगे जो होगा देखा जाएगा।

बदतमीजी जो है वो गॉडगिफ्टेड है

 बदतमीजी जो है वो गॉडगिफ्टेड है।

खाना पकाना एक मजबूरी है।
हम लोगों की बात पर बिलीव नहीं करना, हम बोलता कुछ है, करता कुछ है ।
71 के पहले हम नार्मल जबाब देता था लेकिन तुम लोग को समझ नहीं आता था - क्या बोले।
सरकारी अफसर खाली खाता है, हम खाली पकाता है।
पढा- लिखा है इसीलिए खानसामागिरी कर रहा है, पढ़ा-लिखा नहीं होता तो जाने क्या करता।

बातचीत का लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=kVSWGjKG5do

https://www.facebook.com/share/p/ssXrNHB2TdcoacUy/

Saturday, August 28, 2021

प्लेटफार्म टिकट और न्यूटन का तीसरा नियम

 

प्लेटफार्म टिकट के दाम कुछ साल पहले 2 रुपये थे। कभी-कभी चिल्लर न होने के कारण खरीद में मुश्किल होती थी। फिर दस रुपये हुए। देखते-देखते 30/- रुपये हो गए। 15 गुने दाम बढ़ गए। लेकिन रोज तो जाना नहीं होता स्टेशन इसलिए पता नहीं चलता। कल पता चला।
बहुत दिन बाद गए कल स्टेशन। खाली स्टेशन, लगभग खाली प्लेटफार्म लेकिन टिकट तो लेना है। लिया। एक को छोड़ टिकटघर के बाकी काउंटर खाली थे। अंदर कोई बैठा नहीं था। एक जो दिखा वह कोहनी में सर रखे हुए अराममुद्रा में जाग रहा था। टिकट के लिए कहा तो बोला -30/- ।
हमने पर्स टटोला। चिल्लर को छोड़कर कुछ था नहीं। चिल्लर गिनना शुरू किया तो बमुश्किल 30/- । सिक्के ऐसे बटोरे जैसे बहुमत से कम सीट पाई पार्टियां सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाती होंगी। पैसे इकट्ठा करने के दौरान ही एक सिक्का सरककर सरककर नीचे चला गया, ऐसे ही जैसे अक्सर कोई निर्दलीय समर्थन वापस लेने की धमकी देता है। लेकिन हम सजग थे। तुरन्त सिक्का खोज लिया।
ऊपर हमने जिनको चिल्लर लिखा वो सब एक, दो, पांच और दस रुपये के सिक्के थे। जबकि चिल्लर एक रुपये से कम की रेजगारी को कहते हैं। रुपयों को चिल्लर कहने पर वे मानहानि का दावा कर सकते हैं। लेकिन यह भी लगता है कि जिनका अस्तित्व ही दांव पर लगा हो वे अपनी जान बचाएंगे कि मानहानि का दावा करेंगे।
यहीं पर यह भी लगा कि अपन की औकात भी तो इस कायनात में चिल्लर सरीखी ठहरी।
टिकट लेकर अंदर तरफ चले। स्टेशन ने अपना गौरव सम्भालकर रखा था। ऐसा कि कहीं से कोई नएपन की तोहमत नहीं लगा सकता था।
बाहर डिवाइडर पर एक महिला अपने बच्चों के साथ बैठी थी। देखकर लगता था हफ्तों से नहाए नहीं होंगे। छोटे-छोटे बच्चे पालीथिन से निकालकर लैया-चना खा रहे थे। हमें उनकी हालत दयनीय लगी, गरीबी का मारा परिवार। लेकिन बच्चे हमारी सोच से बेपरवाह मुंह उठाकर मुट्ठी लैया-चना खाते रहे।
अंदर भीड़ कम थी। कुल जमा तीन प्लेटफार्म है। गाड़ियां तसल्ली से आ रहीं थीं। उनके आने की सूचना साफ सुनाई दे रही थी। लोग तसल्ली से उन पर बैठ थे। कोई आपा-धापी नही, धक्कममुक्का भी नहीं। बलिदानी शहर का स्टेशन शांत ही रहता है।
ट्रेन का इंतजार करते लोग जितना आपस में बतिया रहे थे उससे कुछ ज्यादा ही लोग मोबाइल में डूबे हुए थे। मोबाइल तप करते हुए लोगों के चेहरे पर अनिवर्चनीय सुख की छटा पसरी हुई थी। कहीं-कहीं संयुक्त घराने की तर्ज पर एक मोबाइल में तीन-चार मुंडिया भी झुकी दिखीं।
ऊपर झुकी लिखते ही गाना याद आ गया -'झुकी-झुकी सी नजर....।' यादें भी बड़ी बदमाश होती हैं, कहीं भी घुस जाती हैं बिना परमिशन लिए। कभी-कभी तो मन करता है -'कारण बताओ नोटिस थमा दें।' लेकिन छोड़ देते हैं। अपनी ही तो हैं यादें।
स्टेशन पर पीसीओ, किताबों की दुकान और सब बिक्री वाली दुकाने बन्द थीं। केवल एक नल खुला दिखा। उससे एक बंदर पानी पी रहा था। हमारे देखने तक पानी पी चुका था। हमारे देखते-देखते वह नल खुला छोड़कर प्लेटफार्म पर टहलता हुआ आहिस्ते से पटरी पर आया। कुछ देर दो पटरियों के बीच वाली जगह पर बैठा रहा। इसके बाद उचककर दूसरे प्लेटफार्म पर चढ़ गया और टहलने लगा।
बिना कपड़े के टहलते बन्दर के हाथ में ऐसा कोई कागज नहीं दिखा जिसे प्लेटफार्म टिकट कहा जा सके। बन्दर होने का फायदा उठा रहा था बन्दर। दिन में कई बार बिना प्लेटफार्म टिकट के आता जाता होगा, घूमता रहता होगा। प्लेटफार्म टिकट 2 घण्टे के लिए मान्य होता है। इस तरह कम से कम 240 रुपये का चूना तो लगता होगा रेलवे को। एक बंदर इतने का चूना लगाता है तो हज्ज़ारो बन्दर मिलकर तो लाखों का चूना लगाते होंगे। लेकिन ऐसे सोचें तो फिर तो हो चुका। हर चीज को पैसे से थोड़ी हो जोड़ना चाहिए। जोड़ेंगे तो क्या पता बन्दर और दूसरे जानवर हमारे खिलाफ जंगल, पेड़ काटने का हर्जाने का दावा कर देंगे तो जबाब नहीं देते बनेगा।
बाहर निकलते हुए एक परिवार दिखा। पति-पत्नी और तीन बच्चे। पता चला मैगलगंज से आये हैं, दिल्ली जा रहे हैं। प्लम्बर का काम करता है आदमी। डेढ़ महीने पहले घर आया था , इस बीच पिता नहीं रहे तो रुकना पड़ा। प्लम्बर के काम के अलावा गाड़ी भी चला लेता है लेकिन लाइसेंस नहीं है। जिस दिन लाइसेंस के लिए जाना था, किसी की मौत हो गई जा नहीं पाए।
पत्नी भी मैगलगंज की ही है। 12-13 साल के हुए। पूछने पर कि ' लड़ते तो नहीं तुम्हारे पति तुमसे?' जुबली हंसने लगी। इसपर राजेन्द्र बोले -'बताओ, बताती काहे नहीं?' यह सुनकर वह और जोर से हंसने लगी।
पति का नाम राजेन्द्र और पत्नी का नाम जुबली। इससे हीरो राजेन्द्र कुमार की याद आ गई जो 'जुबली स्टार' कहलाते थे। बच्चों के नाम वरुण, वैष्णवी और अरुण । वरुण सबसे बड़ा है।
उनके तीन बच्चों में जो बच्चा सबसे छोटा दिखा पता चला वही सबसे बड़ा है। कुछ अविकसित और कुछ दिव्यांग दो-तीन का लगता बच्चा 11-12 साल का था। बहुत दिन तक तो हाथ-पैर सीधे नहीं हुए। अब सुन लेता है, लेकिन बोलता बहुत कम है।
कमजोर, दिव्यांग होने के बावजूद बच्चा बहुत संवेदनशील है। 'कोई इसकी मम्मी और भाई बहन को छू नहीं सकता इसके देखते'- राजेन्द्र ने बताया। इलाज चल रहा है। डॉक्टरों ने बताया है धीरे-धीरे ठीक होगा।
बच्चे को देखकर पी पिछले दिनों देखी पिक्चर मिमी याद आ गई। उसमें एक अमेरिकन जोड़ा हिंदुस्तान में एक महिला के पेट में अपना बच्चा पालने का कांट्रैक्ट करते हैं। बाद में डॉक्टर के बताने पर कि बच्चा अविकसित हो सकता है, वो लोग वापस चले जाते हैं। लोग उस महिला से बच्चा गिरवाने के लिए कहते हैं। लेकिन वह बच्चे को पैदा करती है। बच्चा सामान्य और स्वस्थ होता है। पता लगने पर अमेरिकन दम्पत्ति बच्चा लेने आते हैं। लेकिन अंततः बच्चा उस महिला के पास ही रहता है जिसने उसे जन्म दिया।
सम्बन्धों और भावनाओं का कोई मूल्य नहीं होता यह भी इस फ़िल्म का संदेश है। मजे की बात यह जब सब चीजें मूल्य आधारित हो रहीं हैं तब उसके खिलाफ सन्देश देने वाली फिल्में भी बन रहीं हैं। अतः सिद्ध हुआ कि न्यूटन का तीसरा नियम सत्य है (प्रत्येक क्रिया के विपरीत बराबर प्रतिक्रिया होती है)।
बताओ शुरू हुए थे प्लेटफार्म टिकट से और पहुंच गए न्यूटन के तीसरे नियम पर। यादों के प्लेटफार्म पर इत्ती देर टहल लिए बिना कोई टिकट लिये। कोई देखेगा तो शिकायत कर देगा। लफड़ा होगा। इसलिए फूटते हैं।

https://www.facebook.com/share/p/KGpxeMkKBoQAHweB/

Friday, August 27, 2021

तारीफ इंसान के लिए बहुत खतरनाक चीज होती है

 तारीफ इंसान के लिए बहुत खतरनाक चीज होती है। तारीफ आग की तरह होती है। यह रोटी भी बनाती है, घर भी जलाती है। तारीफ से इंसान का हौसला बढ़ता है, लेकिन यह इंसान को पागल भी बनाती है।

तारीफ दुधारी तलवार होती है। इससे बहुत सावधान रहना चाहिए।
- क्लब हाउस के एक कमरे से प्राप्त ज्ञान

Thursday, August 26, 2021

जहां भी खाई है ठोकर निशान छोड आये

 जहां भी खाई है ठोकर निशान छोड आये,
हम अपने दर्द का एक तर्जुमान छोड आये.

हमारी उम्र तो शायद सफर में गुजरेगी,
जमीं के इश्क में हम आसमान छोड आये.
किसी के इश्क में इतना भी तुमको होश नहीं
बला की धूप थी और सायबान छोड आये.
हमारे घर के दरो-बाम रात भर जागे,
अधूरी आप जो वो दास्तान छोड आये.
फजा में जहर हवाओं ने ऐसे घोल दिया,
कई परिन्दे तो अबके उडान छोड आये.
ख्यालों-ख्वाब की दुनिया उजड गयी 'शाहिद'
बुरा हुआ जो उन्हें बदगुमान छोड आये.
शाहिद रज़ा , शाहजहांपुर

https://www.facebook.com/share/p/YfkNBjYkGUCWWUhm/

Wednesday, August 25, 2021

समय होत बलवान

 


कल हमने फेसबुक पर दो पोस्ट लिखी। पहली पोस्ट में करीब आधे घण्टे की मेहनत लगी। दूसरी में दो मिनट । पहली में लिखाई थी। दूसरी में डीपी बदलाई।
लिखाई वाली पोस्ट पर सुबह तक 34 कमेंट आये और डीपी वाली पर सौ से ऊपर। लब्बो लुआब यह कि जिस काम में पंद्रह गुना मेहनत लगी उसमें एक चौथाई कमाई हुई (लाइक और टिप्पणी को कमाई माने तो)। मतलब सोशल मीडिया में लिखाई और फोटो चिपकाई में एक के बदले 60 का अंतर है। लगता है इसीलिए लोग फोटोबाजी पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
ब्लागिंग से शुरू करके सोशल मीडिया में करीब 17 साल के सफर के दौरान अपन ने जितनी डीपी बदली बदली होंगी उनकी संख्या दस से कम ही होगी। डीपी बदलना मुझे लफड़े का काम लगता है। लगता है बेफालतू गड़बड़ शक्ल की नुमाइश करके दोस्तों की लिहाजी तारीफ झटकने की साजिश है।
बहरहाल कल जो डीपी लगाई वह मुझे अच्छी लगती है। गोवा के समुद्र तट पर प्रतापगढ़ के रहने वाले चाय बेचने वाले की साइकिल के साथ की फोटो मुझे ज्यादा सहज लगती है। इसके पहले की फोटो हमारे आफिस की थी। जब 2019 में शाहजहांपुर आये थे तब की। फोटो देखकर हमेशा लगता कि दफ्तर में ही बैठे हैं। पिछले समय का बड़ा हिस्सा कोरोना की चपेट में रहा। उसमें 'वर्क फ्राम होम' की भी भरमार रही। यह बात अलग है कि बकिया लोगों के 'वर्क फ्राम होम' के समय भी हमारा काम 'वर्क फ्राम आफिस' ही रहा।
कुछ दोस्त अक्सर डीपी बदलते रहते हैं। हर इंसान की अलग फितरत होती है। हमने भी कई बार फोटो बदलने की सोची लेकिन कोई फोटो जँची नहीं। जो बहुत अच्छी लगी वह फोटो प्रायोजित टाइप लगने के कारण डीपी वाले इम्तहान में फेल हो गयी।
फोटो और व्यक्तिगत सूचना वाली पोस्ट में लफड़ा यह भी होता है कि तमाम दोस्तों की बधाई, शुभकामनाएं आती हैं। उनका जबाब भी देने का मन होता है लेकिन उनकी संख्या अक्सर इतनी ज्यादा होती है कि कई लोगों की टिप्पणियों के जवाब नहीं दे पाता। अटपटा सा लगता है। कुछ दिन तक उधारी चुकाने टाइप लगता है मामला। लेकिन बाद में सब बराबर हो जाता है। बिसरा देते हैं कि कोई धन्यवाद भी देना था। इस तरह हज्जारों धन्यवाद हजम कर चुके हैं अपन अब तक।
अब तो मामला लिखाई , डीपी बदलाई से आगे वीडियो बनवाई तक पहुंच गया है। Alok Puranik जी तो नए वीडियोबाज से शुरू होकर वरिष्ठ वीडियोग्राफर होने के रास्ते पर हैं। घर वालों के सहयोग से शुरू हुआ कुटीर उद्योग अब पब्लिक लिमिटेड कम्पनी बनने की राह पर हैं। Samiksha Telang के भी जुड़ने से लगता है मामला और आगे बढ़ेगा।
बहरहाल बात लिखाई, फ़ोटो बदलाई से शुरू होकर विडियोबाजी तक पहुंच गई। इस चक्कर में पढ़ाई पीछे छूट गयी। पिछले दिनों करीब दो दर्जन से ज्यादा किताबें मंगाई हमने। उनमें से कई तो 'मस्ट रीड' घराने की हैं। लेकिन उनमें से एकाध छोड़कर कोई पूरी नहीं पढ़ पाये। यह उन सैकड़ों किताबों से अलग हैं जो काफी दिनों से अपने पढ़े जाने का इंतजार कर रही हैं।
कुल मिलाकर बात पहुंची समय के पाले में। समय सीमित है, काम असीमित। अब यह हम पर निर्भर है कि हम अपने समय का उपयोग कैसे करते हैं। समय भौत बड़ा कारसाज होता है। ऐसे ही थोड़ी कह गए हैं रागदरबारी वाले ठाकुर दूरबीन सिंह :
"कि पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान,
भिल्लन लूटी गोपिका, वहि अर्जुन वहि बान। "
तो कवि यहाँ कहना चाहता है कि जो कुछ है वह समय ही है। बीस साल जिन तालिबानों को अमेरिकियों ने उनके घर में घुसकर खदेड़ दिया था अब वही उनको अल्टीमेटम दे रहे हैं कि चुपचाप निकल लो नहीं तो हम नहीं जानते क्या होगा।

https://www.facebook.com/share/9dbEFdGMYrNaVYyT/