ये हमारे छुटके साहबजादे Anany का सर्फिंग करता हुआ फोटो है। लिखते हैं इस सप्ताहांत में वह करिये जिससे आप अपने आप के नजदीक महसूस कर सकें। आप बताइए कौन सा ऐसा काम है जिसे करते हुए आप अपने को अपने नजदीक महसूस करते हैं।
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Saturday, October 02, 2021
अनन्य की सर्फ़िंग
मने पूछ रहे हैं। कोई कम्पलसरी वाला सवाल थोड़ी है जिसको न करने पर आपके नम्बर कट जाएंगे। मन करे तो बताइए न मन करे तो मुस्करा के निकल लीजिए। अब यह न पूछियेगा कि मुस्कराना कोई जरूरी है। 
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जब भी ये दिल उदास होता है
गाना बज रहा है। जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है।
गाने का मुखड़ा दो अनिश्चितताओं का गठबंधन है। 'जब भी ये दिल उदास होता है' से भनक नहीं मिलती किसका दिल उदास है। अपना की पराया। इनका कि उनका। मतलब न जाने किनका। दूसरा मुखड़ा तो पक्का अन्जाना है -'जाने कौन आसपास होता है।'
पता नहीं किसका दिल उदास है, कौन आसपास है लेकिन गाना हमको सुनाई दे रहा है। जो उदास है उसके दिल पर क्या बीत रही होगी इससे बेखबर हम गाने के सुरीलेपन का आनन्द उठा रहे हैं। 'आसपास' होने वाले की तो कोई खबर ही नहीं। क्या पता कहीं भीग रहा हो, क्या पता कहीं कोने में दुबका खड़ा हो। स्टेच्यू बना। उसको आसपास ही रहना है, सामने आने की मनाही है। सिर्फ उदास के आसपास रहना है। एकदम सुरक्षा गार्ड की तरह।
जब उदास और आसपास का तरन्नुम बिठा रहे थे तो सोच रहे थे कि 'उदास' के 'आसपास कोई' होने से उसकी उदासी दूर हो जाती होगी। मतलब ' किसी' को देखकर उदासी कहती होगी -'तुम्हारे आसपास वाले आ गए। अब हम चलें।'
लेकिन ये उदास के आसपास सुरक्षा गार्ड वाली बात से नया एंगल दिखा। मतलब यहां आसपास जो है वह उदासी भगाने के लिये नहीं बल्कि उदासी की रक्षा के लिए तैनात है। मतलब उसके आसपास रहते उदासी को कोई खरोंच न आये। मामला जनता की भलाई के लिए लगाए कुछ पुलिस वालों की तरह हो गया जिनके कारण जनता को पुलिस से डर लगता है।
लेकिन सोचने की बात यह कि कोई उदास क्यों होता है? अब इसका क्या बताया जाए। उदास होने के खिलाफ कोई कानून तो है नहीं। संविधान में भी उदासी की आजादी पर कोई रोक नहीं है। इसलिए लोगों को कुछ समझ नहीं आता तो उदास हो जाते हैं। उदास होना आजकल आम बात हो गयी है। लोग जब देखो तब उदास हो जाते हैं। उदासी भी फैशन टाइप हो गयी है। कई दोस्तों ने बताया -'उनका मन उदास हैं। कारण पता नहीं लेकिन उदास हैं।'
कुछ समझ में नहीं आया तो उदास हो लिए। खाये-पिये-मस्ती किये फिर उदास हो गए। कुछ लोग पहले उदास होते हैं , फिर खाते-पीते हैं। कुछ तो हर समय उदासी का झंडा उठाये रहते हैं। सर्वव्यापी टाइप हो गयी है उदासी।
कभी-कभी हमारा मन भी होता है उदास हो जाएं। लेकिन जैसे ही उदास होने की कोशिश करते हैं तो या तो नींद आ जाती या कोई काम। उदासी डिस्टर्ब हो जाती है। कई बार डिस्टर्ब होने के बाद वह भन्नाकर चली जाती है। पता चलता है किसी दोस्त के पास चली गयी। दोस्त से हमको बात करते देखती है तो वहां से भी फूट लेती है। बहुत गुस्सा है हमसे।
उदासी के साथ अकेलापन भी रहता है। लगता है उदासी और अकेलापन में चक्कर चल रहा है। बहुत दिनों से दोनों साथ देखे जा रहे हैं। क्या पता किसी दिन सगाई की घोषणा कर दें।
ये अकेलापन भी बड़ा बहुरूपिया है। न जाने किस-किस रूप में घुस जाता है मन में। बैठ गया तो फिर निकलता नहीं। लोग भीड़ में भी अकेले रहते हों। अकेले में तो अकेले हैं ही। लगता है गुरु, कोई हमारा है नहीं इस दुनिया में। 'इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ' टाइप।
अकेलेपन को आजकल लोग बुरी नजर से देखने लगे हैं। लगता है अकेलापन महसूस करने वाला निरीह होता है। लोगों को पता नहीं कि किसी जमाने में अकेलापन राजसी ठाढ वाले लोगों को ही नसीब होता था। नवाब लोग तखलिया बोलते थे तो उनके आसपास जमा लोग सर झुकाकर कमरा खाली कर देते थे। नवाब लोग अकेलेपन के मजे लूटते थे। आज वही अकेलापन बेचारा ख़राब माना जाता है। समय के साथ गुणों के भाव बदलते हैं। कभी के उद्दात माने जाने वाले गुण आज बेवकूफी माने जाते हैं।
हम भी गाना सुनते हुए कहाँ की कहां हाँकने लगे। गाना खत्म हो गया। अगला गाना बज रहा है -'मेरे पिया गए रंगून , किया है वहां से टेलीफोन, तुम्हारी याद सताती है।'
गाना सुनते ही हमारा मन हुड़कने लगा फोन करने का। हम जा रहे फोन करने। तब तक आप बताइए कि आपका दिल विल उदास तो नहीं होता। आपके आसपास तो कोई नहीं रहने आ जाता ? आजकल जमाना बड़ा खराब है। किसी का भरोसा नहीं। पता नहीं 'आसपास रहने' के बहाने कौन आ जाये। सम्भलकर रहने की जरूरत है। बता दिया हमने। अमल में लाना न लाना आपकी मर्जी।
लेकिन एक बात नोट कीजिये। बात 'दिल की उदासी' और 'किसी के आसपास' होने से शुरू हुई थी। लेकिन बीच में घुस गया अकेलापन। मुद्दे इसी तरह भटकाये जाते हैं आजकल दुनिया में। क्या पता इसीलिए दिल उदास होता हो। 
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Friday, October 01, 2021
आलोक पुराणिक को हरिशंकर परसाई सम्मान
आज उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पुरस्कार घोषित हुए। व्यंग्यकार मित्रों में से Subhash Chander जी को ढाई लाख रुपये का श्री नारायण चतुर्वेदी सम्मान, Alok Puranik जी को 75000/- का हरिशंकर परसाई सम्मान और Snehlata Pathak जी को 40000/- रुपये का शरद जोशी सम्मान मिला। मतलब कुल जमा 3,65,000/- की चपत व्यंग्यकारों ने उत्तर प्रदेश सरकार को लगाई। सभी साथियों को बधाई।
आलोक पुराणिक जी को इनाम जो मिला उसमें हमारा भी हाथ है। वो ऐसे कि उन्होंने हमको अपनी किताब समर्पित की थी -व्हाट्सएप के पढ़े लिखे। हमारे नाम समर्पण देखकर हिंदी संस्थान वालों ने बिना कुछ सोचे-समझे इनाम थमा दिया। यह उन लेखकों के लिए सूचना है जो अच्छा लिखते हैं और इनाम पाने की मंशा रखते हैं। हमारे नाम का जलवा चलता है हिंदी संस्थान में।
लोग भले आलोक पुराणिक को बढ़िया लेखक मानते हैं लेकिन उनके नाम से इनाम नहीं मिलते। हमने अपनी किताब 'झाड़े रहो कलट्टरगंज' आलोक पुराणिक जी को समर्पित की थी लेकिन उस पर कोई इनाम नहीं मिला। जबकि हमको समर्पित किताब पर उनको इनाम मिला। यह सूचना खासकर उन लोगों के लिए है जो किताब छपवाने के लिए एकदम तैयार हो चुके हैं और समर्पण के लिए नाम तय करने की उहापोह में हैं।
सुभाष जी के बारे भी कुछ ऐसा ही है लेकिन हम बताएंगे नहीं खोलकर काहे से कि सुभाष जी नाराज बहुत जल्दी हो जाते हैं। और नाराजगी उनकी सेहत के लिए फिलहाल उचित नहीं। दूसरी बात हमको हिंदी व्यंग्य के इतिहास वाली किताब में अपना जरा और ज्यादा जिक्र करवाना है। इसीलिए उनको बधाई देते हुए अब और बड़े इनाम के लिए भारत-भारती के लिए बधाई।
लेकिन सुभाष जी के पहले यह भारत-भारती सम्मान मिलने के लिए Arvind Tiwari जी को शुभकामनाएं। बहुत दिन से उनको भी कोई तगड़ा इनाम नहीं मिला। जल्द ही उनके 'लिफाफे में कविता' की जगह उनके हिस्से 'लिफाफे में इनाम' आये। ऐसा शायद इसलिए कि इनाम देने वाले सोचते होंगे कि अभी तो तिवारी जी नियमित लिख रहे हैं और बढ़िया लिख रहें हैं। दे देंगे उनको भी इनाम जब लिखना बन्द कर देंगे या फिर किसी गुट में शामिल हो जाएंगे।
डॉ स्नेहलता पाठक जी को भी इनाम मिला। व्यंग्य संग्रह -'एक दीवार सौ अफसाने पर।' उनको इनाम उनकी खालिस लिखाई का मिला। हर इनाम में जुगाड़ थोड़ी चाहिए होता है। स्नेहलता जी को भी बधाई। अगली बार उनको 75000/- का इनाम मिले इसके लिए शुभकामनाएं।
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Tuesday, September 28, 2021
बच्चा डिलीट कर दिए
हमारे दोस्त Saif Aslam Khan बेहतरीन आर्टिस्ट हैं। उनके बनाये स्केच उनके हुनर की कहानी कहते हैं। कैंट इलाके की #benchnumber7 उनकी पसंदीदा बेंच है। इस बेंच से जुड़े कई किस्सों और खुशनुमा पलों की कहानी उन्होंने अपनी पोस्ट्स में लिखी है।
इतवार को टहलते हुए बेंच नम्बर 7 की तरफ गए। वहां बैठे विवेक उर्फ पिंकू ने हमको नमस्ते ठोंक दिया। हम अचकचा गए। अचकचाने का कारण यह कि हमको लगा कि अगला हमको जानता है और हमारे दिमाग के साफ्टवेयर में उनका डेटा निल है। उम्र के चलते भूलने की बीमारी पर हक तो जायज है लेकिन इतना भी जबरदस्ती ठीक नहीं भूलने की बीमारी पर।
बहरहाल हमने भी नमस्ते ठोंका और बतियाना शुरू किया। पता चला कि पिंकू पास के गांव के रहने वाले हैं। यहां क्रिकेट खेलने आये हैं। बैटिंग करते हुए 50 रन बनाए हैं और दो विकेट हासिल किए हैं। अब मैच खत्म हो गया तो वापस लौटने की तैयारी में हैं। रन और विकेट की मेहनत का पसीना और थकान अलबत्ता पिंकू के पास से बरामद नहीं हुआ।
बातचीत की शुरूआत पिंकू ने जमीन खरीदने से की। अंकल जी जमीन तो नहीं खरीदनी आपको?
जिस चीज से इंसान को कोई मतलब नहीं होता उसमें वह ज्यादा दिलचस्पी दिखाता है। जिस रास्ते जाना नहीं होता उसके कोस सबसे ज्यादा गिने जाते हैं। उपरोक्त दो बहानों की आड़ में अपन ने विवेक उर्फ पिंकू से जमीन के बारे में पूछना शुरू किया।
पता चला करीब 40 बीघा जमीन बिकाऊ है। 25 लाख प्रति बीघा के हिसाब से। मतलब करीब 10 करोड़ की खरीद। हमने खरीद से तो मना किया लेकिन पूछ लिया कि तुमको क्या मिलेगा जमीन बिकवाने का?
बोले -'2 % मतलब करीब 20 लाख।' हम विवेक के 20 लाख की कमाई पर पानी फेर दिया। मना कर दिया जमीन खरीदने से।
बाद में पता चला कि विवेक हमको पहले से जानते नहीं थे। वहां फालतू टहलते देखकर जमीन ऑफर कर दी। हमारे जेहन से भूलने की बीमारी का अपराध बोध हवा हो गया।
बातचीत से पता चला कि विवेक खुद 100 बीघा की जमीन के मालिक के परिवार से हैं। तीस साल की उम्र है। कक्षा 9 पास हैं। तीन बच्चों के पिता हैं। तीनो लड़के। बड़े भाई भी हैं। उनकी चार लडकियां हैं। खेती में सहयोग करते हैं लेकिन हिसाब-किताब पिता जी ही देखते हैं।
कक्षा 9 की पढ़ाई से हमको रागदरबारी के रुप्पन बाबू याद आ गए जिनको पढ़ने का और कक्षा 9 में पढ़ने का शौक था। इसलिए कई सालों तक कक्षा 9 में ही पढ़ते रहे। विवेक को पढ़ने का इतना शौक नहीं रहा होगा इसलिए निकल आये स्कूल के झमेले से।
बात बच्चों की चली तो हमने कहा ये रोचक है कि तुम्हारे सब लड़के और भाई के सब लड़कियां। तीस साल की उम्र, 7 साल में तीन बच्चे, बढ़िया प्रोगेस है।
बच्चा तो एक और होने को था लेकिन उसको 'डिलीट' करवा दिए। बताया 2 महीने का था जब ' डिलीट' करवाये।
गर्भपात के लिए 'डिलीट' शब्द पहली बार सुने थे। मतलब बच्चा भी कोई डाटा है जिसे डिलीट कर दिया गया। इसमें गर्भपात का ऑपरेशन सहज और आसान हो जाने का भाव तो है ही साथ ही अजन्मी सन्तति के प्रति उसके सम्भावित पिता की सम्वेदनाओं के तार भी जुड़े हैं।
गर्भ और गर्भपात से जुड़ी सम्वेदना उसके 'डिलीट' होने से खत्म हो गयीं।
तीन बच्चे हो गए । ऑपरेशन करवा लेना चाहिए तुमको।
'करवा देंगे अब मिसेज का।'- पिंकू ने कहा।
हमने कहा -'तुम अपना क्यों नहीं करवाते ऑपरेशन?'
'हम क्यों करवाएंगे उनका ही करवाया जाएगा।आदमी थोड़ी ऑपरेशन करवाते हैं।'- कुछ ऐसी ही बात कही विवेक ने।
तकनीकी शब्दों के आम बोलचाल में शामिल होते जाने से इंसान की भावनाओं पर नियंत्रण भी आसान हो जाता है। इराक, वियतनाम, अफगानिस्तान में हुई लाखों इंसानों की मौतों को उनकी मौत के खेल में शामिल देश ' प्रोग्रामिंग में मानवीय भूल के चलते कुछ लाख लोग डिलीट हो गए' वाले भाव में लेकर मस्त हो जाते होंगे। इंसान का आंकड़ों में बदलते जाना प्रगति का मापदंड है।
देर हो गयी थी बतियाते हुए। हम लौटने लगे तो विवेक ने फिर कहा -'कोई खरीदार मिले तो बताइएगा जमीन का।'
आपको तो नहीं खरीदनी है जमीन।
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Monday, September 27, 2021
कोरियर डिलीवरी के फुटकर किस्से
कल कुछ कोरियर डिलीवरी करने वाले बालकों से मुलाकात हुई। आर्मी गेट के सामने की बेंच पर बैठे ग्राहकों से मोबाइल फोन पर सम्पर्क करके उनके कोरियर की जानकारी देते हुए सामान कलेक्शन के लिए सूचना दे रहे थे। आर्मी गेट कोरोना के समय से कोरियर के लिए बन्द हो गया है। इससे लोगों को भले परेशानी होती हो लेकिन कोरियर वालों को आराम हुआ है। अंदर जाकर मकान-दर/मकान भटकना नहीं पड़ता। सामान आने की सूचना देकर गेट पर कलेक्शन के लिये बुला लेते हैं। कोई-कोई तो सामान गेट पर रखवा लेते हैं। इसके बाद आते-जाते हुए कलेक्टकर लेते हैं सामान।
कोरियर का सामान लिए बच्चा मोटरसाइकिल से उतरा। कुछ सामान आगे कंगारू के बच्चे की तरह सम्भाले हुए बाकी ज्यादातर सामान पीठ पर पर्वतारोहियों की तरह लादे हुए था बालक। बेंच पर बैठकर बैग से सामान निकालते हुए नियमित सामान मंगाने वालों के बारे में कुछ-कुछ जानकारी भी देते जा रहे थे। अमेजन, फ्लिपकार्ट आदि कम्पनियों की डिलीवरी करने आये थे कोरियर।
'ये चिरायंध आदमी है। सामान पे आन डिलीवरी पर मंगवाता है लेकिन डिलीवरी कभी नहीं लेता। या तो मोबाइल स्विच ऑफ आता है या कहता है कि बाहर हैं बाद में आना।'
नाम सुनकर दूसरे कोरियर डिलीवरी वाले ने बताया। अरे इसको आई डी तो हमारे यहां हमने डिलीट करवा दी। कभी सामान नहीं लेता। अब हमारी साइट से 'पे आन डिलीवरी' पर सामान नहीं ले सकता। बहुत चिरकुट है।
हमने सोचा कि कहीं किसी भले आदमी को चिरकुट न कह रहे हों। इस अन्याय को रोकने के लिहाज से अपने सामने उनसे फोन मिलवाया। फोन बंद था। कोरियर ब्वाय के वक्तव्य की रक्षा हुई। हम गलत साबित हुए।
'ये डॉक्टर मैडम तो आज लेंगी नहीं सामान। आज इतवार है। अस्पताल बन्द होगा। कल अस्पताल में ही लेंगी डिलीवरी। कभी गेट पर आती नहीं सामान कलेक्ट करने।'
'ये मैडम भी फैक्ट्री में ही लेती हैं डिलीवरी। आज नहीं लेंगी सामान।'
इसी तरह अन्य कई नियमित ग्राहकों के बारे में जानकारी इकट्ठा है इनके दिमाग में। बातचीत के दौरान साझा करते जा रहे थे बालक।
'आपके मोबाइल नम्बर में ओटीपी आया होगा। बता दीजिए।'- एक ग्राहक से पूछा बालक ने।
'कोई ओटीपी नहीं आया है मोबाइल में।' -उधर से झल्लाती हुई आवाज आई।
बालक ने फिर बताया कि इस मोबाइल पर आया होगा देखिए। देखा गया तो पता चला वह मोबाइल दूसरा था जिस पर आया था ओटीपी। बताया तो फिर बालक ने बताया कि जो ओटीपी बताया वह गलत है। तीसरी कोशिश में मामला वेरिफाई हुआ। यह तो तो तब जब फोन मिल गया और बात हो गयी। न मिला होता फोन तो क्या होता।
पता चला कम्पनियां 8000 रुपये देती हैं महीने भर के सामान की डिलीवरी के। कनवेयन्स के लिए 3 रुपया प्रति किलोमीटर अलग से। महीने में 1000 डिलीवरी से अधिक होने पर 5000 रुपये का इंसेंटिव अलग से। यह अलग बात कि इंसेंटिव कभी मिलता नहीं क्योंकि जैसे ही किसी के 1000 सामान होने लगते हैं किसी के वैसे ही कम्पनी किसी और कोरियर ब्वाय को उस लाइन में जोड़ देती हैं ताकि इंसेंटिव न देना पड़े।
'लकड़ी लगाने से कम्पनियां कभी नहीं चूकती'- बालक ने इंसेटिव बचाने के प्रयासों पर अपनी राय जाहिर की।
डिलीवरी का काम साइड बिजनेस के रूप में अच्छा है। कोरोना काल में जब सब जगह काम ठप्प हो रहे हैं तो कोरियर का काम चल रहा है यही अच्छा है।
3-4 घण्टे में निपट जाता है काम। के कभी-कभी देर भी हो जाती है। जैसे किसी को दस बजे फोन करो और वह जबाब दे दो बजे आना डिलीवरी के लिए तो इंतजार करना होता है।कभी-कभी शाम भी हो जाती है।
'इसके साथ पुलिस की भरती की तैयारी भी चल रही है।पढ़ाई प्रैक्टिस दोनों जारी हैं।' -एक बालक ने बताया। इसके बाद सामान की डिलीवरी के लिए डीएम कम्पाउंड चला गया। थोड़ी देर में डिलीवरी करके आया तब तक दूसरे बालकों से बतियाये।
उन बालकों में से एक से पढ़ाई के बारे में पूछा तो बताया -' सब पढ़ाई कर चुके हैं।'
सब का मतलब पूछने पर बताया -'बी ए, एम ए. , कम्प्यूटर डिप्लोमा, एक्सल, टैली और भी कुछ डिग्री। लेकिन काम नहीं मिला कहीं पढ़ाई के हिसाब से तो कोरियर का काम कर रहे हैं।
बताने के बाद मूंछे ऐंठते हुए आराम करने लगे अनूप सिंह। पता चला पास ही गांव है। खेती है। शादी हो गईं। बच्चा भी है।
इसके बाद नौकरी पर अपना ज्ञान भी दिया अनूप सिंह ने। नौकरी चाहे 40000 हजार की हो लेकिन होती तो नौकरी ही है। आदमी दूसरे के अधीन रहता है। इसके मुकाबले अपने काम में भले चार पैसे कम मिलें लेकिन आदमी किसी का गुलाम तो नहीं रहता। दो आदमियों को रोजगार अलग से देता है।
हमारे बारे में पूछते हुए कहा अनूप सिंह ने -'आप फैक्ट्री में काम करते हो। स्टाफ में होंगे। वहां अभी दरबान की ठेके में भर्ती हुई है। 12000 रुपये मिलते हैं। हम आपसे कहें वहां लगवा दो तो अभी आप कहोगे पता करेंगे। कुछ दिन बाद कहोगे -हो नहीं पाया। हर जगह यही हाल है।
हमने तर्क दिया किसी को हटाकर लगवाने की बात तो ठीक नहीं न।
वही तो। लेकिन देखिए आजकल पढ़ाई के हिसाब से काम कहाँ मिलता है। इसीलिये नौकरी की बजाय अपना काम करना बढ़िया। बेफिक्री से मूंछो पर ताव देते हुए बोले -अनूप सिंह।
हमारे कहने को कुछ बचा भी नहीं था। हम अच्छा चलते हैं कह कर चले आये।
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Sunday, September 26, 2021
ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आंखे
सुबह सड़क पर मिले ये भाई जी। नाम बताया राजू। साथ में इनके बड़े भाई राकेश भी थे। राजू को रोककर उनसे बतियाने लगे। राकेश आगे निकलकर इंतजार करने लगे।
राजू-राकेश बाल खरीदने का काम करते हैं। गली-मोहल्ले घूम-घूमकर बाल खरीदते हैं। कीमत 2000 रुपये किलो। बाल खरीदकर शहर में थोक खरीद वालों को देते हैं। दो बड़े खरीदार हैं शहर में। वे बालों को आगे कोलकता भेजते हैं। वहां बालों से विग बनाने का काम होता है।
दस साल से कर रहे बाल खरीदने का काम। पहले बालों की जगह चूरन, चटपट चीजें देने का चलन था। अब बर्तन देने का चलन है। दिन भर में हजार -डेढ़ हजार रुपये करीब के बाल मिल जाते हैं। खाने-पीने भर की कमाई हो जाती है।
बाल की खरीद के अलावा गर्मी में आइसक्रीम बेचने का काम करते हैं। और भी एकाध काम बताए राजू ने जो वे रोजी-रोटी के लिए करते हैं। गरीबी इंसान को कमाई के मामले में ऑल राउंडर बना देती है।
साइकिल पर लाउडस्पीकर के उपयोग के बारे में भी बताते हुए विज्ञापन सुनाया। पेन ड्राइव पर विज्ञापन बजने लगा। शुरुआत गाने से -'ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आंखे।' गाने के बाद बालों की कीमत -एक किलो के 2000 रुपये, आधा किलो के 1000 रुपये, दो सौ ग्राम के 400 रुपये। बाल भी वे वाले जो कंघी करते हुए गिरते हैं। जो लोग बाल झड़ने की समस्या से परेशान हैं उनको यह सोचना चाहिए कि उनके सर से बाल नहीं, पैसे झड़ रहे हैं।
बाल की विग बनती हैं तो उसमें अलग-अलग लोगों के सर के बाल लगते होंगे। एक ही विग में लगे बाल अलग-अलग धर्म, जाति के लोगों के होते होंगे। जो लोग आपस में एक दूसरे को देखना, छूना नहीं पसन्द करते हों, हो सकता है उनके सर के बाल एक ही विग में सटे हुए रहते हों। बालों की बिग सर्वधर्म सद्भाव की प्रतीक है।
राजू तसल्ली से बतिया रहे थे। इस बीच उनके बड़े भाई राकेश भी अपनी साइकिल आगे खड़ी करके आ गए। फोटो खींची तो सावधान मुद्रा में खड़े हो गए गोया हमारे कैमरे में राष्ट्रगान बज रहा हो।
बालों के विग की बात से याद आया कि हमारे एक दोस्त ने हमारे बालों की बनावट देखकर पूछा था -'क्या आप विग लगाते हो?'
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Friday, September 24, 2021
झूठ बोलने का मन
आज थोड़ा झूठ लिखने का मन हुआ। एक से बढ़कर एक झूठ हल्ला मचाने लगे- 'हम पर लिखो, हम पर कहो।'
हमने सब झूठ को हड़काते हुए कहा -'अनुशासन में रहो। लाइन लगाकर आओ। सबका नम्बर आएगा। हल्ला मत मचाओ।'
एक झूठ हल्ला मचाते हुए बोला-'हम लाइन लगाकर आएंगे तो हमारा तो वजूद ही निपट जाएगा। हम तो एक के ऊपर एक लदफद कर आते हैं। इसीलिए जब तक पहचाने जाते हैं, तब तक अपना काम करके निकल जाते हैं।'
हम जब तक उसकों कुछ कहें तब तक वह पलटकर फूट लिया। भागते हुए दिखा उसकी शर्ट पर 'सत्यमेव जयते लिखा' था।
हमको झूठ की कमीज पर लिखे लिखे 'सत्यमेव जयते' से आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि आजकल झूठ बोलने का यही फैशन चलन में है। बड़े झूठ सच के लिबास में ही बोले जाते हैं। देश सेवा के नाम पर स्वयंसेवा का चलन है। हमको अचरज उसकी स्पीड पर था। जितनी तेज वह भागा उतनी तेज ओलंपिक में भागता तो गोल्ड मेडल मिल जाता ।
हमने उसकी स्पीड पर ताज्जुब किया तो उसकी जगह ले चुके झूठ ने बताया -'उसकी 'सत्यमेव जयते' वाली ड्रेस किराए की है। घण्टे भर के लिए लाया था। देर करता तो अगले घण्टे का किराया भी ठुक जाता। बहुत मंहगा होता जा रहा है झूठ बोलना भी आजकल। आप समझते हो सिर्फ पेट्रोल ही ऊपर जा रहा है।'
हम कुछ और कहें तब कुछ और झूठ हल्ला मचाने लगे। हल्ला मचाने वाले 'मूक विरोध' की कमीज पहने थे। हमें लगा कि कुछ देर और ठहरे यहां तो सब मिलकर हमको पीट देंगे। हमारे शक की वजह उनकी कमीजों पर लिखा नारा था। सबकी छाती पर लिखा था -'अहिंसा परमों धर्म:। '
हम फूट लिए कहकर कि अभी आते हैं। सारे झूठ हमारी बात सुनकर खुश हो गए। वे आपस में धौल धप्पा करते हुए बोले -'ये तो अपना ही आदमी निकला। हमारी ही तरह झूठ बोलता है। इसको अब लौटकर आना नहीं। चलो फालतू टाइम क्या खोटी करना।'
हमको लगा कि समय सही में कीमती है। झूठ बोलने वाले तक इसको बर्बाद नहीं करते। बिना समय बर्बाद किये झूठ बोलते रहते हैं।
https://www.facebook.com/share/p/HEfeS8untXtr7QtQ/
Thursday, September 23, 2021
मठाधीश और सम्पन्न साधु तो भोगी होते हैं - परसाई
प्रश्न: संन्यास लेकर जो मठाधीश , महंत, या धर्म के उपदेशक हो जाते हैं क्या उनकी इच्छायें वास्तव में मर जाती हैं?
-नरसिंहपुर से विजय बहादुर
उत्तर: मेरा ख्याल है, जब तक कोई ऐसा कार्य या ऐसा चिन्तन या ऐसा कर्म न हो जो आदमी की चेतना को पूरी तरह डुबा ले और उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को उठने न दे तब तक संन्यास लेने या मठाधीश हो जाने से आदमी की तृष्णा नहीं जाती। सेक्स और भूख पर विजय पाना सबसे कठिन है। आमतौर पर साधारण संन्यासी भोजन-लोलुप और स्त्री-लोलुप होते हैं। ये बड़े दयनीय भी कभी-कभी लगते हैं। दमन से आदमी दुखी होता है। मठाधीश और सम्पन्न साधु तो भोगी होते हैं। मैंने भी कई स्वामियों को रबड़ी पीते देखा है।
रायपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार देशबन्धु में ’पूछो परसाई से’ श्रंखला के अंतर्गत 12 अक्टूबर, 1986 को प्रकाशित।
https://www.facebook.com/share/p/ejaZemberhqHdQ7Q/
फिर नई सुबह होगी
फिर नया रास्ता होगा,
फिर नई दास्तान होगी,
हो उदास न मेरे मुसाफिर,
दुखों की इमारत तबाह होगी।
फिर नई सुबह होगी।
Monday, September 20, 2021
बनावटी अक्ल के साइड इफेक्ट
सबेरे जल्दी जगे। जल्दी कहें तो मुंह अंधेरे। मुंह अंधेरे शायद उस सुबह को कहते होंगे जब जगने पर मुंह न दिखाई दे। जैसे पड़ोस में फरमान हुआ है कि महिलाएं मुंह ढंक के रहें। तो इस लिहाज से वहां की महिलाओं के लिए सबेरा हुआ है- 'मुंह अंधेरा सबेरा।'
कहां की बात कहां ले गए अपन भी। बात यहां मुंह अंधेरे जगने की हुई और पहुंच गए परदेश। परदेश मतलब पराया देश। कुछ जनप्रतिनिधि अपने प्रदेश को भी परदेश समझकर काम करते हैं। इसी लिए उनके प्रदेश पिछड़ जाते होंगे।
फिर बहक गए। हां तो सुबह जगे तो सोचा कि जिन लोगों ने जन्मदिन की बधाई दी थी उनको व्यक्तिगत रूप से भी धन्यवाद दे दिया जाए। कल करीब 400 लोगों को धन्यवाद दिया। करीब 200 लोग बच गए थे। रात को ही टिप्पणी जानी बन्द हों गयीं। शायद ज्यादा हो गयीं इसलिए। हमने सोचा होगी कोई लिमिट एक दिन में टिप्पणियों की। सुबह करेंगे।
सुबह जब टिप्पणी की तो वही लफड़ा। फेसबुक बोला -'बहुत टिप्पणी कर चुके। अब और नहीं।' मतलब आभार प्रदर्शन में भी राशनिंग। शराफत पर बैन।
तकनीक और कृत्तिम बुद्धि के उपयोग से फेसबुक ने व्यवस्था की होगी कि अधिक कमेंट न कर सकें। दुरुपयोग न हो। लेकिन सोचिए तो कितना गड़बड़ है यह 'धन्यवाद नियोजन'। हमारे धन्यवादों की नशबंदी कर दी नामुराद फेसबुक ने। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं। फेसबुक हमारा कोई मातहत तो है नहीं जिसे हम हड़का सकें -'अबे फेसबुक के बच्चे, ये हमारा धन्यवाद क्यों नहीं पहुंचाता दोस्तों तक?' वैसे यह भाषा तो हम मातहत के लिए भी इस्तेमाल नहीं करते। फेसबुक के लिए भी कर थोड़ी रहे हैं बस ऐसे ही बता रहे हैं।
कृत्तिम बुद्धि संवेदना के स्तर पर धृतराष्ट्र होती है। दृष्टि दिव्यांग। उसको टिप्पणियों की भावना नहीं दिखी होगी। यही दिखा होगा चार सौ कमेंट आ रहे इस खाते। इत्ते कमेंट एक साथ उसको अपनी तरफ आती मिसाइलों की तरह लगे होंगें। उसका मिसाइल रोधी सिस्टम सक्रिय हो गया होगा और उसने रोक दी होंगी हमारी टिप्पणियां।
कभी शिकायत करेंगे और उसको मिल भी जाएंगी तो सॉरी बोलकर छुट्टी कर लेगा जैसे अभी अमेरिका ने अफगानिस्तान में किया। कई मासूम बच्चे आतंकवादी समझकर मार दिए ड्रोन हमले से। वाहवाही लूटी फिर जब पता चला और हल्ला हुआ कि मरने वाले आतंकवादी नहीं बच्चे थे तो सॉरी बोल दिया। एक सॉरी के साबुन के टुकड़े से कई बच्चों के खून के दाग धूल गए।
जिस तरह कृत्तिम बुद्धि का हल्ला और प्रयोग बढ़ता जा रहा है उससे लगता है कि आने वाले समय में दुनिया कृत्तिम बुद्धि के हवाले हो जाएगी। सब कुछ कृत्तिम बुद्धि से चलेगा। किसी देश के कम्प्यूटर सिस्टम को लगेगा कि कोई दूसरा देश उस पर हमला करने वाला है तो फौरन मिसाइल चलने लगेंगी। इसी तरह की तमाम बातें और भी होंगी।
कल्पना कीजिये कुछ लोग खुशी में नाच रहे हों तो उस देश की कृत्तिम बुद्धि के भरोसे वाली सुरक्षा व्यवस्था यह समझकर कि ये हाथ ऊपर करके रॉकेट लांचर फेंकने वाले हैं उनपर मिसाइल से हमला कर दे। तमाम लोगों के निपटने के बाद उस देश का प्रवक्ता बयान जारी करके मामला निपटा दे -'हमें अफसोस है, कम्प्यूटर सिस्टम की गलती से कुछ लोग मारे गए।'
इसके बाद शायद इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए बिना अनुमति और पूर्वसूचना के नाचने पर प्रतिबंध लग जाये। प्रगति की कीमत तो चुकानी पड़ेगी भाई।
कृत्तिम बुद्धि मने बनावटी अक्ल के चलते हमारे 399/- रुपये अटके हुए हैं। दैनिक हिंदुस्तान अखबार अपने शहर का तो हम मंगा के पूरा पढ़ लेते हैं। लेकिन बाकी शहरों का ऑनलाइन केवल तीन पेज पढ़ पाते हैं। आगे के लिए पैसे मांगता है। हम सोचते हैं कि क्या खर्चना। लेकिन पिछले हफ्ते हमने ताव में आकर 399/- खर्च कर दिए। पइसे जमा करने के बाद सन्देश आया -'अखबार पढ़ना शुरू करिये।' किया तो फिर तीन पेज पर अटक गया। बोला -'पैसे देव तो आगे पढ़ो।' कितनी बार दें भाई पैसा।
मेल किया तो बोला मेल ब्लॉक है। मने पैसा झटककर गोल हो गयी कृत्तिम बुद्धि। कृत्तिम बुद्धि मतलब बनावटी अक्ल के साइड इफेक्ट हैं ये। अब लगना पड़ेगा पीछे कि क्या लोचा है।
बात हिंदुस्तान अखबार की हो रही है तो बताते चले कि सोमवार को जीने की राह स्तम्भ हम जरूर पढ़ते हैं। इसमें अक्सर पूनम जैन Poonam Jain के लेख आते हैं। कई बार वे बहुत अच्छी सलाह देती हैं। उनको अपने इन लेखों का संकलन छपवाना चाहिए ।
आज उन्होंने आराम की महत्ता पर लिखा है। वे बताती हैं -"जब काम व्यवस्थित होते हैं तो थोड़ी देर का आराम भी हमें तरोताजा कर देता है। शोध कहते हैं कि एक घण्टे पर हमें करीब 17 मिनट का ब्रेक लेना चाहिए।"
अगर इस शोध की माने तो 8 घण्टे के काम में 136 मिनट मतलब करीब सवा दो घण्टे ब्रेक लेना चाहिए। कुछ जगह तो यह व्यवस्था उलटे रूप में लागू है। घण्टे भर में 17 मिनट काम।
बहरहाल घण्टे भर हो गए टाइप करते हुये। अब अपना तो ब्रेक बनता है।
आपका दिन चकाचक बीते।
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