Saturday, April 09, 2022

लिखत-पढ़त की दुनिया बहुत अनोखी है

 कृष्ण बलदेव वैद की डायरी जारी है। रोचक हिस्सों को अंडरलाइन करने का मन करता है। लेकिन उठकर पेन, पेंसिल लाने का आलस्य मन पर हाबी हो जाता है। इस चक्कर में वह रोचक अंश दाएं-बाएं हो जाता है। आलस्य से जुड़ा यह अंश देखिए:

"आज अपने काम में आ गयी रुकावट के कारणों को फिर कुरेदना चाहता हूँ। मुख्य कारण तो शायद आलस्य ही है और निरन्तरता का टूट जाना, टूटते रहना। एक नागा, अपने पीछे अनेक नागों की संभावना छोड़ जाता है।'
डायरी में अनेक ऐसे लेखकों के जिक्र जिनके अपन ने नाम ही नहीं सुने। कितने कुपढ़ हैं अपन। कोशिश भी तो नहीं की कभी पढ़ने की।
पढ़ने की बात कहें तो कल एक बातचीत (रेतसमाधि के बुकर के लिए नामांकित किये जाने पर आयोजित चर्चा में) एक नामचीन रचनाकार ने जानकारी दी कि श्रीलाल शुक्ल जी के बारे में उनको तब पता चला जब उनके निधन के समाचार आये।
लब्बो-लुआब यह कि दुनिया और उसमें भी लिखत-पढ़त की दुनिया बहुत अनोखी है। दुनिया जहान में जिनका डंका मचा होय, हो सकता है पड़ोस में उनके बारे में जानकारी न होय। इसलिए किसी को अपने बारे में मुगालता नहीं पालना चाहिए। चुपचाप अपना काम करना चाहिए। मस्त रहना चाहिए। निरन्तरता बनाये रहे तो अच्छा। बाकी सफलता-असफलता के लिए बहुत हुडकना नहीं चाहिए।
असफलता के लिए भी काम तो जरूरी है। बिना काम के असफल भी तो नहीं हुआ जा सकता। (वैद जी की डायरी से लिये भाव)
कल किताबों की लिस्ट बनानी शुरू की। कुल जमा पन्द्रह-बीस किताबों की लिस्ट बनी। पुरानी किताबों से मुलाकात रोचक है।
रोचक तो अपने परिवेश से मिलना भी है। इसी लालच में कल दफ्तर से पैदल वापस आये। आये तो परसों भी थे।
आते हुए देखा एक बन्दरिया सड़क किनारे पीठ के बल चित्त लेती हुई थी। दूसरी उसको दुलरा रही थी। मां-बेटी हों शायद। हमको बगल से गुज़रते देखकर भी अनदेखा किया। अपन उसको निहारते हुए निकल लिए।
फैक्ट्री के बाहर निकलते हुए गेट पर दरबान ने जोर से जयहिंद साहब कहा तो हम चौंक गए। हमारी चुप टूट गयी। रुककर हाल-चाल लिए। बोले बतियाये। कई बार बोल-बतिया चुके हैं। अगली बार फिर पूछते हैं मिलने पर वही सवाल तो सोचते होंगे -'अजीब भुलक्कड़ है साहब भी। कल पूछा आज फिर वही बात पूछ रहे हैं।' लेकिन मुझे लगता है कि किसी से तसल्ली से बोल-बतिया लेना भी सुकून की बात है। है कि नहीं ?
फैक्ट्री के बाहर सड़क के पेड़ को देखकर लगा मानो कोई मजदूर काम से लौटकर घर में कपड़े उतारकर चरपैया पर लेटा है। तसल्ली से थकान मिटाते हुए। क्या पता घर पहुँच कर घरैतिन से कहता हो -'अजी सुनती हो, थोड़ी कार्बन डाई आक्साइड लाओ। ताजी, ताजी।' हो सकता है घरैतिन झिड़क देती हो -'सबहन (सब जगह) तो पसरी है कार्बनडाइआक्साइड , जित्ती मन आये खाओ-पियो। आजकल आदमी लोग धड़ल्ले से यही तो छोड़ रहे हैं। हल्ला मचाये हो फालतू मां।'
पेड़ के तसल्ली से लेटने के अंदाज में सूरज भाई का विदा होना भी शामिल है। दफ्तर में बॉस के निकल जाने पर लोग आराम मुद्रा में आ जाते हैं, वही भाव।
आगे कुछ हरे पेड़ दिखे। उसके बगल में थोड़ा दूर एक गंजा होता टाइप पेड़। पेड़ की पत्तियां कम होती दिखीं। ऐसे जैसे डाई करते हुए बुजुर्गों के बाल कम होते जाएं। पेड़ हरे-भरे पेड़ों से थोड़ा दूर खड़ा अकेले में हवा की कंघी से अपने पत्तियों को संवार रहा था। ऐसे जैसे कम बालों वाले लोग जरा सा मौका मिलते ही पीछे वाली जेब से कंघा निकाल कर बचे-खुचे बाल संवारने लगते हैं।
कल शाम सोचा था तसल्ली से कुछ और लिखा जायेगा। लेकिन फिर किताब पढ़ते हुए सो गये। सुबह लेटे-लेटे किताब पढ़ते रहे। सोचा टहलने जाएं, लेकिन आलस्य ने फिर जकड़ लिया।
अब्बी देखा तो सामने सूरज भाई ड्यूटी ज्वाइन कर चुके हैं। किरणें मुस्कराते हुए गुडमार्निंग कर रही हैं। कई क्यारियों के बीच खड़ा पेड़ किसी संयुक्त परिवार के एकमात्र बेटे की तरह प्रफुल्लित, प्रमुदित ऐंठ में खड़ा है। क्यारियां अनुशासित बच्चियों की तरह चुपचाप नाटे कद के पेड़ को ऐंठते देख रही हैं। लिंग भेद लगता है प्रकृति पर भी हावी है।
लिंग भेद की बात लिखते हुए अभी एक समाचार का निटिफिकेशन देखा :
"जितनी देर में मैगी नहीं बनती, मर्द उससे कम देर में किसी को बदचलनी का प्रमाणपत्र दे देते हैं।"
इसी से याद आया वैद जी ने आदमियों की मनोवृत्ति का जिक्र करते हुए अपनी डायरी में लिखा -'कुछ मर्दों की आंखों में उनका लिंग लहराता है।'
दूसरों के बारे में धारणाएं हम अपने सोच के हिसाब से ही बनाते हैं। अपनी कमी का ठीकरा हम दूसरों पर फोड़ देते हैं। तमाम पढ़े-लिखे समझदार लोग भी बिना समझे कई बार जो बयान जारी करते हैं , उनको एहसास नहीं होता कि वह क्या कह रहे हैं।

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Friday, April 08, 2022

कृष्ण बलदेव वैद की डायरी

 'तितलियों की बेकरारी और खामोशी के इनाम के तौर पर ही उनको उनके रंग दिए गए हैं, उनके परों पर नक्कासी की गई है।'

'कोई भी लम्बा सहवास कई प्रकार की आपसी तल्खियों, शिकायतों, चिड़चिड़ाहटों, बेवफ़ाइयों के बावजूद और कारण ही बना रह सकता है। सिर्फ आपसी लगाव के कारण नहीं।'
ऊपर के दो पैरा कृष्ण बलदेव वैद की डायरी के हैं। डायरी का शीर्षक है -'अब्र क्या चीज है? हवा क्या है?'
डायरी के कई पन्ने पढ़ गए। फिर कवर पेज देखा तो पता चला हमको तो अब्र का मतलब ही नहीं पता। पता किया तो पता चला कि 'अब्र' का मतलब बादल।
वैद जी की डायरी पढ़ते हुए लगा कि हमको भी डायरी लिखनी चाहिए। वैसे फेसबुक में हम जो लिखते हैं वो डायरी ही तो है। फेसबुक पूछता है -'आपका दिमाग में क्या है?' जबाब में हम जो लिखते हो वही पोस्ट होता है।
कृष्ण बलदेव वैद जी का लेखन अलग तरह का रहा। उनके लेखन पर अश्लीलता का आरोप लगता रहा। अपनी एक बातचीत में उन्होंने कहा जो कहा उसका मतलब यही निकलता है कि उनके लिए अभिव्यक्ति का स्थान सबसे ऊंचा है।
अपने ऊपर अश्लीलता के आरोपों की फिक्र उनकी डायरी में इस बयान से पता चलती है:
'बिमल इन बाग' के प्रूफ तो पढ़ डाले, लेकिन उसके प्रकाशन को लेकर उत्साहित कम हूँ, चिंतित अधिक। उत्साह की कमी का कारण प्रकाशक 'नेशनल'। वहां से प्रकाशित होकर पुस्तक शायद ही कहीं पहुंचे। चिंता का कारण यह कि लोग फिर उसकी अश्लीलता को पकड़कर बैठ जाएंगे: वैद यौन ग्रंथियों का कथाकार है, बीमार है.....। जब तक कोई प्रकाशक तैयार नहीं हुआ मैं कोशिश करता रहा। अब वह मिल गया है तो मैं ठंडा हो गया हूँ।'
कृष्ण बलदेव वैद की डायरी पढ़ना रोचक है। अभी तो शुरू की है।

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Thursday, April 07, 2022

किताबें

 कल किसी सिलसिले में एक किताब खोज रहा था। किताब नहीं मिली लेकिन खोजने की प्रक्रिया में तमाम अनपढी , अधपढी किताबों से मुलाकात हुई। किताबें कुछ बोलीं भले नहीं लेकिन हमको लगा कि कह रही हों, क्या हमको अलमारी में रखने भर के लिए लाए थे? मन किया किताबों की अलमारी के पास खड़े होकर एक भावुक वक्तव्य रिकार्ड करके पोस्ट कर दें। लेकिन भावुकता का कोरम पूरा नहीं हुआ। स्थगित हो गया मामला।

तमाम अनपढी, अधपढी किताबें ऐसे जिगरी दोस्तों जैसी होती हैं जिनसे मिलने , बतियाने का बहुत मन करता है। लेकिन सोचते हैं तसल्ली से बैठेंगे। लेकिन फुरसत है कि मिलकर नहीं देती।
पिछले दिनों गीतांजलि श्री जी के उपन्यास रेतसमाधि को बुकर पुरस्कार के लिए नामित करने की खबर आई। मन किया उपन्यास खोजकर देंखे, पढ़ें। लेकिन किताबों की किस रैक में है, याद नहीं आया।
नामवर जी के बारे में संस्मरण लिखते हुए काशीनाथ जी ने लिखा है कि वे अपने बनारस में अपने घर में रखी किताबों के बारे में जानकारी देते हुए कहते थे -'फलानी रैक के फलाने नम्बर पर रखी होगी किताब। भेज देना।' अक्सर उनका अंदाज सही ही निकलता था।
एक सच्चे पाठक और किताब के संग्रही मात्र में यह अंतर होता है।
अब सोचा है कि घर में मौजूद किताबों की लिस्ट बनाएंगे। किताबें कहाँ रखीं हैं और पढ़ी हैं कि अधपढी हैं कि अनपढी इसके भी सूची। पढ़ें भले न सब लेकिन जब मन करें तब मिल तो जाएं।
वैसे भी पढ़ने की रफ्तार बहुत कम हो गयी है। कुल जमा एक-दो घण्टे पढ़ पाते हैं। दफ्तर और दीगर व्यस्तताएं किताबों से दूर रखती हैं।
इसके बावजूद कल दूधनाथ सिंह की 'नमो अंधकारम' जिसमें कुल जमा 116 पेज हैं दो दिन में खत्म की।
किताब की शुरुआत में पिकासो का कथन है -'यथार्थ के अनेक रंग होते हैं और उन सबको समेटने का अंत एक अंधेरे में होता है।'
किताब में गुरु के माध्यम से समाज के धतकरम के कुछ किस्से हैं। गुरु के किस्से बयान करते हुये कालिदास के बारे में निम्न जानकारी दी हुई है:
"तब धर्मप्राण ऋषिकुल ने उस शाप दिया-'तूने गुरु महेश्वर के संगोपन क्षणों का वर्णन किया है। तूने अदृश्य को देखा और अलेख्य को लिखा। तेरी उंगलियों में कोढ़ फूटेगा। अब तुझे कभी चैन नहीं मिलेगा। मित्रहीन , अकेला, बौराया हुआ तू किसी वनपथ पर मरेगा। तुझे चीलकौवे भी नहीं खाएंगे।'
उपरोक्त बात कालिदास रचित कुमार सम्भव के बारे में कही गयी है। इसमें शिवपार्वती के संगोपन क्षणों का वर्णन है। इसके बारे में हरिमोहन झा की खट्टरकाका में बीस-पच्चीस साल पहले पहले पढा था। हाल ही में कुमार सम्भव पढ़ने की उत्सुकता के चलते कालिदास ग्रँथवली मंगाई। किताब आते ही फटाक से कुमार सम्भव वाले अंश देखे। कुछ संगोपन क्षणों का वर्णन पढ़ते ही लगा कालिदास जी के लिए 'उपमा कालिदासस्य' क्यों कहा जाता है।
सोचा था आराम से पढ़ेंगे कालिदास ग्रंथावली। लेकिन तसल्ली मिली नहीं। यह भी अधपढी किताबों में शामिल हो गयी।
किताबें और भी पढ़ी हैं इस बीच। उनके बारे में भी लिखेंगे। जल्द ही। फिलहाल तो किताबों की सूची बनाने का मन है। देखिए कब तक बनती है।

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Wednesday, April 06, 2022

 साहित्य में वरिष्ठ लोगों के आपस के भ्रम एक दूसरे की तारीफ , सम्मान और पुरस्कारों से दूर होते हैं।


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Monday, April 04, 2022

परदेसियों से न अखियां लड़ाना



सूरज भाई भन्नाए हुए हैं। कुछ किरणें अभी तक धरती पर नहीं पहुंचीं हैं। सज-संवर रही हैं। इठलाती हुई एक-दूसरे से 'देख री, कैसी लग रही हूँ' पूछते हुए फिर-फिर तैयार हो रही हैं। दूसरी भी बिना उनकी तरफ देखे -'जम रही है, एकदम बिंदास' कहते हुए तैयार हो रही है।
सूरज भाई किरणों की लेट लतीफी से सुलग रहे हैं। धरती पर गर्मी बढ़ रही है। एक बच्ची किरण फूल तैयार है। मुंह फुलाये हुए कोने में बैठी है। सूरज भाई की लाड़ली है। वह गुस्सा है कि जिस फूल पर बैठने के लिए वह जाने वाली थी आज वह उसको एलॉट नहीं हुआ है। सूरज भाई उसको मना रहे हैं लेकिन वह मान नहीं रही। मनौना ले रही है।
असल में बच्ची किरण का फूल से 'वो' टाइप का हो गया है। कल दिन भर फूल ने हवा के सहारे हिल-हिलकर झूला झुलाया था। किरण का मन गुदगुदा गया। आज फिर वह उसी फूल पर जाना चाहती है। लेकिन सूरज भाई ने जब उसको कोई दूसरी जगह एलॉट की तो वह बमक गयी। मनमाफिक सीट न मिलने पर चुनाव न लड़ने की धमकी देते जनप्रतिनिधियों की तरह हरकतें कर रहीं। अब सूरज भाई कोई हाईकमान तो हैं नहीं जो बच्ची पर अनुशासन की कार्यवाही कर दें। बाप हैं बच्ची के। प्यार करते हैं अपनी लाड़ली को। प्यार मजबूत बनाता है तो मजबूर भी करता है।
सूरज भाई बच्ची किरण को समझाने में जुट गए। बताया ''जिस फूल पर जाने की तू बात कर रही उसको कल बंदरों ने नोच कर फेंक दिया। इसीलिए दूसरी जगह एलॉट की है तुझे।"
बच्ची किरण सूरज भाई की बात मान नहीं रही। उसका दिल 'टूट' टाइप का गया है। वह बिफर गयी-"आप झूठ बोल रहे हैं। वह वहीं होगा। कल विदा किया था उसने मुझे हिल-हिलकर। मुझे जाना है उसके पास। नहीं जाऊंगी तो वह मुझे बेवफा समझेगा। मैंने उससे प्रॉमिस किया था। मैं कोई नेता थोड़ी हूँ जो वादा करके मुकर जाऊं। मुझे जाना है उसके पास। वह मेरा इंतजार कर रहा होगा। "
सूरज भाई मजबूरन बच्ची किरण को साथ लेकर आये। वह जगह दिखाई जहां कल फूल खिला था। आज उसकी जगह एकाध पत्तियां थीं। फूल को बंदरों ने नोच डाला था। किरण दुखी हो गयी। कुछ देर गुमसुम खड़ी रही। फिर पास में खिली कली को गले प्यार करती हुई फूल के साथ बिताए समय को याद करती रही। रेडियो पर गाना बज रहा है -'परदेशियों से न अखियां मिलाना।'
किरण का मन किया रेडियो को उठाकर पटक दे। थूर दे बदमाश को जो ऐसा फालतू गाना बजा रहा है। परदेशी बता रहा है फूल को। बदनाम कर रहा उसको। लेकिन जगह छोड़कर जाने का मन नहीं हुआ उसका। कली को गले लगाए वहीं रही वह।
हमारे साथ चाय पीते किरण को कली के साथ खेलते देख सूरज भाई ने सुकून की सांस ली। सारा किस्सा सुनाया मुझे। हम लोग बातों में मशगूल थे इस बीच एक बंदर आया और चुपके से मेज पर रखा बिस्कुट का पैकेट उठा ले गया। एकदम सर्जिकल टाइप। सिर्फ पैकेट उठाया। चाय का कप हिला तक नहीं। हमने दौड़ाया तो आंखे दिखाने लगा।
एक हाथ में बिस्कुट का पैकेट लिए दूसरे हाथ से वह दूसरे बंदरो को भगाने में लगा था। बाकी के बंदर भी उस पर झपट पड़े। सब एक-दूसरे पर राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं की तरफ खौखियाने लगे। अंततः बन्दर के हाथ से बिस्कुट का पैकेट छूट गया। उस पर दूसरे मुस्टंडे बन्दर का कब्जा हो गया। वैसे ही जैसे एक पार्टी के एजेंडे को दूसरी शातिर पार्टी अपना बना लेती हैं।
कुछ देर बाद बंदरों के दोनों गुट चले गए। क्या पता दोनों गुट सारी घटना का वीडियो बनाकर अपने-अपने हिसाब से अपने लोगों में दिखाएं। अपने को दूसरे से बेहतर बताएं। उनके यहाँ भी चुनाव होते हों तो क्या पता इसी आधार पर वोट भी मांगे जाए । आखिर हमारे पूर्वज हैं वो। हमारी ही तरह तो हरकतें करेंगे।
बंदरों के ऊधम से कुचली हुई घास अपने जख्म पर सूरज की किरणों का मरहम लगा रही है। रिक्शे में बैठा हुआ रिक्शेवाला अखबार में चुनाव की खबरें पढ़ रहा है। उससे उतरकर बच्ची स्कूल जा रही है। सूरज भाई चाय खत्म करके वापस चमकने लगे।
सुबह हो गयी है।

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Sunday, April 03, 2022

मुस्कराओ , खिली रहो हमेशा



कानपुर में हमारे एक साथी थे –होदा जी। बातचीत के दरम्यान वे उर्दू शब्दों का इस्तेमाल करते। बाकी शब्द तो और लोग भी इस्तेमाल करते थे। उन पर ध्यान नहीं जाता। लेकिन वे ‘अलग’ की जगह ‘अलहदा’ कहते तो ध्यान जाता उस पर। ‘ये अलहदा है, इसको अलहदा रखना होगा’- इसी तरह से अलहदा आता उनकी बातचीत में। बीस साल पहले प्रयोग किए एक शब्द के जरिए उनके साथ की तमाम बातें अनायास याद आ जाती हैं। उनकी शक्ल, उनका हुलिया,उनकी दाढ़ी। एक शब्द ‘अलहदा’ के जरिए ‘होदा जी’ की यादों की पूरी फ़ाइल यादों की स्क्रीन में भक्क से खुल जाती है।
बोलचाल के दरम्यान हम जिन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं उनमें से ही कुछ हमारे व्यक्तित्व का एक्सरे होते हैं। हमारे द्वारा बोला गया कोई एक वाक्य हमारी पूरी समझ, सोच और नजरिए का श्वेतपत्र होता है। हो सकता है हम उसे अनजाने में, लोगों की देखा-देखी प्रयोग करते हों, लेकिन सुनने वाला अपनी समझ से उससे हमारे बारे में एक समझ बनाता है। हमारे द्वारा बोले शब्द हमारे राजदूत होते हैं।
आजकल अक्सर बातचीत में सुनते हैं –‘देखना पड़ेगा।‘ कोई सूचना मांगने पर अक्सर जबाब मिलता है –‘देखना पड़ेगा साहब।‘ तीन शब्द का यह जबाब एकसाथ अनेक सूचनाएं देता है जबाब देने वाले के बारे में –‘जानकारी नहीं है’, ‘इसका अंदाज नहीं है’,’ देखने का मूड नहीं है’, ‘कहोगे तो देखेंगे’ और भी कई कोण हो सकते हैं इस जबाब के। कुल मिलाकर एक अनुत्साह की मुद्रा में दिया जबाब है यह।
इसी के बरक्स कोई अगर यह जबाब मिलता है – ‘अभी बताते हैं ’, ‘दो मिनट/थोड़ी देर का समय दीजिए बताते’ – इसी तरह का कोई भी जबाब सुनकर लगता है अगला कितना धनात्मक है। हो सकता है ‘देखना पड़ेगा’ जबाब देने वाला ‘अभी बताते हैं’ की तुलना में ज्यादा कर्मठ, समर्पित और कुशल हो लेकिन उसका जबाब पहली नजर में उतना अच्छा नहीं लगेगा जितना कि ‘अभी बताते हैं।
बातचीत, लिखा-पढ़ी के दरम्यान कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनको सुनते ही मन खुश हो जाता है। कई बार उनका सही-सही मतलब भी नहीं पता होता लेकिन उनके सुनते, बोलते, लिखते, पढ़ते मन अनायास गदगद हो जाता है, गुलगुल, प्रफुल्लित, प्रमुदित, किलकित और भी न जाने क्या-क्या।
ऐसे ही एक शब्द है- कायनात। कायनात का मतलब Universe, ब्रह्मांड। लेकिन Universe, ब्रह्मांड के मुकाबले मुझे कायनात कई गुना ज्यादा प्यारा शब्द लगता है। ज्यादा क्यूट, ज्यादा खूबसूरत। शायद ऐसा ‘कायनात’ के Universe, ब्रह्मांड के मुकाबले स्त्रीलिंगी ध्वनि के चलते हो लेकिन सम्पूर्ण ब्रह्मांड, whole Universe के मुकाबले ‘समूची कायनात’ मुझे इतना आकर्षक लगता है कि बार-बार इसे प्रयोग करने का, पढ़ने का, मन करता है।
इसी तरह के अनेक शब्द युग्म अनायास आकर्षक लगते हैं। ‘रोशनी की मीनार’, ‘रोशनी की कंदील’, ‘घाटियों में फूल’। अपन को पता नहीं कि घाटियों में फूल खिले हुए कैसे लगते हैं लेकिन अनजाने जेहन में यह ख्याल गहरे धंसा है कि घाटियों में खिले फूल बहुत खूबसूरत लगते होते होंगे। Anurag Aryaअनुराग आर्य की न जाने कब की एक पोस्ट ‘उम्मीद की साढ़े पाँच फुटी लौ ’ ( http://anuragarya.blogspot.com/2009/04/blog-post_28.html ) के चलते याद है। विनीत Vineet Kumar से जब भी बात होती है तो उनकी ‘दियाबरनी ’ (http://taanabaana.blogspot.com/2009/10/blog-post.html )का जिक्र जरूर होता है।
कोई शब्द, कोई शब्द युग्म किसी को पसंद आने के अनेक कारण होते होंगे। हम अपने सोच के हिसाब से शब्दों को पसंद करते हैं। जबलपुर रहने के दौरान सीखा शब्द ‘अपन’ मुझे जबलपुर प्रवास की तमाम उपलब्धियों में से एक लगता है। मैं, हम में थोड़ा अहं का भाव सा लगता है । 'अपन' में समरस और मिलजुल का भाव है।
‘उजास’ शब्द भी बहुत प्यारा लगता है मुझे। जैसे घर का बड़ा होता बच्चा। इसी को प्रयोग करने के लिए हमने एक कविता भी लिख मारी –तुम मेरे जीवन का उजास हो। इंसान अपने प्यार का इजहार करने के तरीके भी खोज ही लेता है।
दयानंद पाण्डेय जी Dayanand Pandey द्वारा अक्सर प्रयोग किया जाने वाला शब्द ‘बादबाकी’ मुझे इतना आकर्षक लगता है कि उनकी उनकी तमाम सोच, तेवर, बातों, धारणाओं से असहमत और 'अलहदा' विचार होने के बावजूद उनके लेख पढ़ने का मन करता है।
बातें तो बहुत हैं कहने को। लेकिन दीगर काम भी बहुत सारे हैं लिहाज फिलहाल इतना ही। ‘बादबाकी’ एक पुरानी कविता यहां पेश है जिसमें कायनात भी है, रोशनी भी है, सूरज भाई भी हैं, मुस्कान भी है मतलब वह तमाम कुछ जिनका प्रयोग मुझे अच्छा लगता है। कविता मेरे आवाज में सुनने का मन हो तो लिंक टिप्पणी बक्से में है।
बताते चलें कि कल से इस लेख का शीर्षक तय कर रखा था -अलहदा, कायनात और बादबाकी। लेकिन अभी कविता दिख गई तो शीर्षक बदलकर हो गया -मुस्कराओ, खिली रहो हमेशा। यह होता प्रभाव पसंदीदा शब्दों का।
तुमको मुस्कराते देखा
तो मन किया
स्टेच्यू बोल दूँ तुमको
ताकि मुस्कान बनी रहे
तुम्हारे चेहरे पर हरदम।
पर फिर सोचा
फिर तो तुम बनकर
रह जाओगी मैनिक्वीन
जिसमे चस्पा रहती है
हमेशा एक सी मुस्कान।
अब यह चाहता हूँ
कि हमेशा मुस्कराओ
नए नए अंदाज में
हर अंदाज पहले से अलग।
मुस्कराओ
खिली रहो हमेशा
जैसे खिलते हैं घाटियों में फूल
बगीचे में फूलों पर इतराती हैं तितलियाँ
और मुस्कराती है कायनात सूरज की किरणों के साथ।
-अनूप शुक्ल

https://www.facebook.com/share/p/YwE5raoPfSGSeTLJ/

Saturday, April 02, 2022

कहां से चले और कहां पहुंच गए

 कल पहली अप्रैल थी। मूर्ख दिवस। हमने सोचा कोई बेवकूफ बनाएगा। लेकिन दिन बीत गया। किसी ने नहीं बनाया। हो सकता है किसी ने बनाया हो लेकिन बताया न हो। यह भी एक तरीका है बेवकूफ बनाने का। इस तरीके से तो जिंदगी भर बेवकूफ़ बनाते रहते हैं। लोग उन गुणों की तारीफ कर देते हैं जो हममें हैं ही नहीं। यह डंके की चोट पर बेवकूफ बनाना है।

लिखना-पढना सब स्थगित सा है आजकल। आइडिये जितने आते हैं वो अमल के इंतजार में बूढ़े होते जाते हैं, किसी सफल लोकतंत्र में नौकरी की तलाश में बूढ़े होते युवाओं की तरह। हम आइडियों से कहते हैं -'अमल में लाएंगे तुमको भी जल्दी ही'। आइडिये मेरे इस आश्वासनों पर हर बार यकीन कर लेते हैं। पूरी दुनिया आश्वासनों के भरोसे जी रही है। आशा है तो जीवन है।
मेरा मन करता है कि उपन्यास लिखा जाए। शुरू करके पांच-सात ड्राफ्ट घसीट दिए जाएं। इसके बाद फाइनल करके पोस्ट कर दें किसी ऑनलाइन साइट में। लेकिन लिखें कैसे यह पता नहीं। लोग कहते हैं अज्ञानता वरदान है। लेकिन इस मामले में अज्ञानता का फल मिल नहीं रहा है। उपन्यास लिखा नहीं जा रहा है।
श्रीलाल शुक्ल जी ने एक बातचीत में कुछ ऐसा कहा था कि हर लेखक के साथ एक “लेखन संगिनी” होनी चाहिए। लेखन के लिए न्यूनतम सुविधा की तरह चाहत थी उनकी।तमाम लोग जिनका लेखन ठहर गया है, यह टोटका आजमा कर देखें।
हमारे पास तो मूल कमी समय और अनुभवों की है। समय तो खैर किसी के पास होता नहीं, निकालना पड़ता है। अनुभव के लिए मेहनत करनी होती है। अनुभव के लिए दुनिया से जुड़ना पड़ता है। पढ़ना, घूमना, मिलना, जुलना, साझा करना , सोचना, विचारना यह सब अनुभव हासिल करने के जरिये हो सकते हैं।
लेकिन खाली अनुभव से ही क्या होगा। अनुभव को पका कर अच्छे से पेश करना ही तो हुनर है लेखन का। वो कहां से आएगा। वो नन्दन जी कहते हैं न :
मैं कोई तो बात कह लूं कभी करीने से,
खुदारा मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।
पता नहीं हुनर कब आएगा। क्या पता कभी आएगा भी कि नहीं। लेकिन जब आएगा तब आएगा । जब आएगा तब करीने से कह लेंगे। अभी बेकरीने से कहने से कोई रोकता थोड़ी है। करीने से कहने के इंतजार में रहेंगे तो कह ही नहीं पाएंगे। अभी तो भवानी प्रसाद मिश्र जी की बात का सहारा लेते है:
जिस तरह हम बोलते हैं
उस तरह तू लिख
और इसके बाद भी
हमसे बड़ा तू दिख।
पता नहीं भवानी जी कैसे सोचते थे। जैसे भी सोचते होंगे लेकिन उनसे बड़ा दिखने की तो अपन सोच भी नहीं सकते।
कहां से चले और कहां पहुंच गए। बेवकूफी कुछ इससे अलग होती है क्या ?

https://www.facebook.com/share/p/iXdeF58MuYz9HYaT/

Thursday, March 24, 2022

धर्म छोटे बड़े नहीं होते

 धर्म छोटे बड़े नहीं होते
जानते तो लड़े नहीं होते

चोट तो फूल से भी लगती है
सिर्फ़ पत्थर कड़े नहीं होते।
यह सबसे पहला मुक्तक था जो मैंने सुना था विनोद जी का। सुनिए आप भी।

https://www.facebook.com/share/v/wQvp5N4PENDcx53o/

Wednesday, March 23, 2022

अगर रूठ भी गया तो क्या

 कानपुर के हमारे प्रिय गीतकार विनोद श्रीवास्तव जी कुछ दिन पहले शाहजहाँपुर आए। उनसे मिलना भी हुआ । विनोद जी के कुछ गीत रिकार्ड किए। उनमें से एक मुक्तक यहाँ पेश है।

अगर रूठ भी गया तो क्या
मैं अगर छूट भी गया तो क्या
तुमको मिल जाएँगे कई दर्पण
मैं अगर टूट भी गया तो क्या ?

https://www.facebook.com/share/v/nyxV2TsRPo6FiCyT/

Wednesday, March 16, 2022

समय होत बलवान

 

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सुबह होती है, शाम होती है,
जिंदगी तमाम होती है।
देखते-देखते समय गुजर जाने का भाव है इस शेर में। कुछ असहायता का भी कि समय पर बस नहीं। नामुराद बिना पूछे बीत जाता है। परमिशन भी नहीं लेता गुजर जाने की। इससे लगता है कि समय किसी की नौकरीं नहीं करता। उसकी अपनी दुकान है, जिस पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता। ऐसे थोड़ी कहा गया है -
'पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान।'
समय भी अलग-अलग छटा दिखलाता है। कोई सोचता है किसी तरह कट जाए। आगे बढ़े। बवाल कटे। लोग कहते भी हैं -'बस किसी तरह काट रहे हैं समय। जित्ता कट जाए उत्ता बढिया।' समय ऐसे लोगों को घाव में नमक की तरह लगता होगा। वैसे तो घाव अपने आप में कम बवाल नहीं, लेकिन घाव में नमक तो और बड़ा बवाल। ऐसे जैसे लोकतंत्र में विरोधी पार्टी की सरकार।
बाकी तमाम ऐसे लोग भी हैं जिनको लगता है काश समय इफरात में होता। खूब सारा समय होता तो खूब मजे करते। ऐसे लोग वे लोग होते होंगे जिनको खाने-पीने-जीने की बुनियादी सुविधाएं सहज उपलब्ध होती होंगी। 'तिनहि न व्यापत जगत गति' वाले घराने के लोग होते होंगे।
कभी-कभी लगता है कि काश खूब सारा समय होता तो ये करते, वो करते। खूब घूमते, पढ़ते-लिखते, बतियाते-गपियाते। तमाम हसरतें समय न होने के चलते स्थगित हो गईं। तमाम किताबें समय के कारण अनपढी, अधपढी रह गईं। तमाम पिक्चरें अनदिखी रह गईं। तमाम लोगों से बातें अधूरी रह गईं।
कभी यह भी सोचते हैं कि जब समय इफरात में होता है तो क्या करते हैं। पता चलता है कि जब भी समय मिला तो उसको जमकर बर्बाद किया। पुरानी दुश्मनी का हिसाब बराबर किया। जब जरूरत थी तब आये नहीं, अब आये हो तो हम तुम्हारा जनाजा निकालेंगे। जो काम करना चाहते थे, समय मिलने पर, उनकी तरफ आंख उठाकर देखना तो दूर, उनके बारे में सोचा तक नहीं। इफरात समय भी गुजर गया बेचारा। समय बीत जाने पर हम फिर इंतजार करते हैं कि इफरात समय मिलता तो हम मनचाहे काम करते।
सही बात तो शायद यह है कि हम भरपूर समय का इंतजार करते हैं ताकि समय को कायदे से बर्बाद कर सकें।
समय को बर्बाद करने की आदत इतनी सहज हो जाती है कि लगता है :
सबेरा अभी हुआ नहीं है
लेकिन लगता है
यह दिन भी गुजर गया हाथ से
हथेली में जकड़ी बालू की तरह।
अब सारा दिन फिर इसी एहसास से जूझना होगा।
अब बताओ जब दिन की शुरुआत ही इसके बीत जाने के एहसास से हो कि दिन गुजर गया तो ऐसे के लिए क्या दिन, क्या महीना, क्या साल। दशक भी मिलेगा तो भी ऐसे ही बर्बाद कर देगा। है कि नहीं।
समय की बात तो ऐसे ही करने लगे। न जाने कहाँ से आ गया समय दिमाग में। उसकी बात करने लगे। वैसे तो हम नीचे दिख रही फोटो देख रहे थे। इसमें सूरज भाई दिन के बाद विदा होते दिखें। झाड़ियों के ऊपर दिखते सूरज भाई ऐसे दिख रहे थे , गोया झाड़ियों ने उन्हें अपने ऊपर तान रखा हो। वेटलिफ्टिंग करते हुए झाड़ियों ने सूरज भाई को उठा लिया। जर्क के साथ छोड़ेंगी तो फिर अगले दिन ही दिखेंगे सूरज भाई।
झाड़ियां सूरज भाई को उठाये हैं यह कल्पना भी देखिए। धरती पर लाखों-करोड़ों झाड़ियां होंगी इस तरह की। सूरज भाई आकार में इत्ते बड़े हैं कि साठ हजार धरती समा जाएं उनमें। ऐसे अपने से करोड़ों-अरबों-खरबों गुना वजन वाले सूरज भाई को झाड़ियां अपने ऊपर उठाएं हैं यह सोचना कितना बेफालतू है। लेकिन सोचने पर कोई पाबंदी थोड़ी है।
वैसे भी आजकल तो बेफिजूल की बातें करने का चलन है। जब सब लंतरानी हांकने में लगे हैं तो हम काहे पीछे रहें।
अब आप हमारी बात का कोई मतलब निकाल रहे हैं तो इसका मतलब आपके पास समय इफरात में है और आप समय से दुश्मनी निभा रहे हैं।

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