Monday, June 20, 2022

स्कूल जाते बच्चे समाज की ख़ुशहाली का पैमाना



सुबह आज भी निकल ही लिए। साइकिल पर। हवा बढ़िया। मौसम सुहाना।
मार्निंग वाकर क्लब के लोग जमे हुए थे। कोई एक्सरसाइज में। कोई बतकही में। जो भी आता उसका स्वागत करते हुए। थोड़ी देर रुक गए तो फोटो भी हो जाती।
लोग टहलते हुए , बतियाते हुए मजे में घूम रहे थे। दोनों मैदान लोगों से गुलजार थे। एक बेंच एक मियां बीबी बैठे थे। उनके बीच की दूरी देखकर लग रहा था कि शायद पास-पास बैठने के संकोच से उबरने में अभी समय है।
आगे चार-पांच लोग बीच सड़क पर सड़क का लगभग 70 फीसदी हिस्सा अपने कब्जे में लेकर तसल्ली से टहल रहे थे।उनमें से एक अपनी मुट्ठी में सेव पकड़े था। अधखाया सेव देखकर लगा एप्पल कम्प्यूटर और घड़ी का विज्ञापन हो रहा हो। लगने को लग तो यह भी रहा था कि सेव को हाथ मे रखने के पीछे मकसद अपनी सुरक्षा का भाव है। कोई बोलेगा तो फेंक के मारेंगें। सेव को हाथ में रखने से कोई टोकेगा भी नहीं। सेव कोई पत्थर थोड़ी है।
एक जगह जूस की गुमटी दिखी। लिखा था -बरेली जूस कार्नर। साइकिल मोड़कर वापस पहुंचे। पूछा -'शाहजहांपुर में बरेली जूस कार्नर का क्या मायने हैं।' बताने के पहले मुस्कराए जूस वाले। बोले-' एक मुल्ला जी से खरीदी थी यह गुमटी। उन्होंने लिखवाया था यह। हमने नाम वही रहने दिया।'
जूस वाले भाई की बात से एक आम आदमी और संस्था/सरकार में अंतर का एहसास हुआ। कोई संस्था/सरकार होती तो सबसे पहले नाम बदलती। बाकी भले कुछ और न होता। नाम जरूर बदल जाता।
गोविंद गंज क्रासिंग के पहले बने मंदिर के सामने खड़ा एक भक्त सड़क पार से प्रणाम निवेदित कर रहा था। वाई-फाई प्रणाम। पहुंच गया होगा देवी-देवताओं तक। वे भी खुश होकर खुशहाली का टोकन जारी कर देते होंगे।
क्रासिंग के पार दो घोड़े आते दिखे। देश के आम आदमी की तरह कमजोर, दुर्बल। खुद के एक्सरे की तरह सड़क पर टहलते हुए। एक घोड़े की पीठ पर घाव के निशान थे। सुबह का समय होने के कारण शायद मक्खियां ड्यूटी पर न आई हों वर्ना पीठ घोड़ों की पीठ पर बिना किराए की सवारी कर रहीं होती, खून अलग से पी रही होंतीं।
कोतवाली के पास बंदरो का झुंड भगाता हुआ आ गया। पूरी सड़क सहम कर थम गई। उनमें से कुछ मादा बन्दर भी थीं जो अपने बच्चों को पेट से भाग रहीं थीं। बन्दर किसी बात और खौरीयाये हुए थे। शायद उनकी आपस में कोई कहासुनी हो गयी हो। अब बंदर कोई माफिया तो हैं नहीं जो उनके बीच गैंगवार हो रहा हो। न ही यह कह सकते हैं कि उनके यहां उनकी भलाई के लिए कोई योजना की घोषणा हुई हो जिससे नाराज होकर वे सड़क पर उतर आए हों। बंदरो की भाषा जानते नहीं थे वरना रोककर पूछते।
मंदिर के सामने मांगने वाले अपना ठीहा सजा रहे थे। एक भिखारी अपनी ट्राई साइकल से सामान समेटते हुए पहले से जमे भिखारियों से बतिया रहा था। सामने मोटरसाइकिल पर झुके पुलिस के सिपाही आपस में बतियाते हुई सुरक्षा व्यवस्था पर कड़ी नजर रखे हुए थे।
तिराहे पर शाहजहांपुर के तीन वीर रस के कवियों की मूर्ति पर के गले पर पड़ी सूखी गेंदे की माला उनके हाल बयान कर रही थी। कभी अपनी आवाज से पूरे मंच को हिला देने वाले कवियों की मूर्तियां चुपचाप सहमी सी , सावधान मुद्रा में खड़ी थीं।
पुल से उतरकर डॉमिनोज की दुकान दिखी। बन्द थी। दुकान के सामने ही कई मोटरसाइकिलें डॉमिनोज का बक्सा लादे चुपचाप खड़ीं थीं। बिन आर्डर सब सून। दुकान खुलने पर ये गुलजार होंगी। बकिया दुनिया में आज जो अर्श पर है कल वो फर्श पर होते हुए हड़प्पा काल में पहुंचेगा। इसमें कोई शक नहीं है।
फल की दुकानें अभी खुलीं नहीं थीं। एक केले के ठेले पर अलबत्ता केले बिक रहे थे। एक लड़के ने केले खाकर छिलका दूर फेंक दिया। छिलका केले से बिछुड़कर जमीन पर छिपकली की तरह औंधे मुंह पड़ा चुपचाप केले को लड़के के मुंह में जाते देख रहा होगा। उसको लग रहा होगा कि किसी नई जगह, नए देश चला गया उसका साथी केला। उसको क्या पता केला अब लुगदी बनकर पचने की मुद्रा में आ गया होगा।
एक बच्चा उचकते हुए साईकिल चलाते जा रहा था। हम बगल में लग लिए। पता चला कि केवी-1 में पढ़ता है फोर्थ-सी में। बच्चे क्लास पूछने पर सेक्सन जरूर बताते हैं। कनैजिया अस्पताल के पास से आता है। 630 से 930 तक स्कूल। स्कूल में मजा आता है।
खेल कौन से खेलते हो पूछने पर बताया -'छुपन-छुपाई, पकड़म-पकड़ाई।'
जिन लोगों ने बचपन में यह खेल खेले हैं उनको यह मालूम हो कि आज भी ये खेल बदस्तूर खेले जा रहे हैं।
पिता के बारे में पूछने पर बताया -'फार्मर हैं।'
किसान कोई नहीं बताता अपने पिता के पेशे को। सारे किसान फार्मर हो गए हैं।
इस बीच एक लड़का शायद अपने पिता के साथ मोपेड पर गुजरा बगल से। बच्चे ने उसका नाम पुकारा। बच्चा शायद सुन नहीं पाया।
लड़के ने मोपेड पर जाते बच्चे के बारे में बताया-'इसकी हाइट नहीं बढ़ रही।'
अनायास बिना पूछे लड़के ने अपने दोस्त के बारे में बताते हुए जो बताया वह उसकी कद के कम होने के बारे में बताया। यह शायद आजकल का चलन हो रहा है। पीठ पीछे किसी के बारे में बताते हुए हम यह ख्याल रखते हैं कि अगले की कमियां बिन बताई न रह जाएं।
लड़के ने मुझसे पूछा -'आप किधर जाओगे, केवी-1 या केवी-2 ? हमने कहा -हम न केवी-1 जाएंगे न केवी-2 हम अब घर जाएंगे।
घर जाते हुए रास्ते में कुछ बच्चे स्कूल जाते दिखे। स्कूल जाते बच्चे देखकर लगता है दुनिया में कुछ अच्छा हो रहा है। स्कूल जाते बच्चे किसी भी समाज की खुशहाली का पैमाना है।किसी समाज में जितने अधिक बच्चे नियमित स्कूल जा रहे हैं, वह समाज उतना ही खुशहाल है।

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Sunday, June 19, 2022

टेंशन में बाल उड़ गए



आज साइकिलिंग के लिए कुल जमा चार लोग थे।आर्मी गेट पहुंचे तो मार्निंग वाकर फोटोबाजी में लगे हुए थे। हमको देखा तो हमको भी लपेट लिया, आइए फ़ोटो खिंचाए। हमने बताया –‘आप लोगों से साइकिल क्लब वाले परेशान हैं। उनकी शिकायत है कि उनके कार्यक्रम आप लोग हाइजैक कर लेते हैं।‘
‘ऐसा कुछ नहीं। हम लोग तो सबके साथ फोटो खिंचाते हैं। ये लोग तो हमारे लिए बच्चे सरीखे हैं’ –डाक्टर त्रेहन जी ने सबको शामिल करके फ़ोटो लेते हुए कहा।
संक्षिप्त फोटोग्राफी के बाद हम लोग साइकिलिंग के लिए निकले। साथ में चलते हुए डाक्टर विकास खुराना शाहजहांपुर से जुड़ी कुछ ऐतिहासिक जानकारी देते रहे।
बस्ती से गुजरते हुए लोग अपने दरवाजे पर बैठे हम लोगों को गुजरते हुए देखते रहे। एकाध जगह लोग बीड़ी फूंकते हुए तसल्ली से गपियाते दिखे। बीड़ी की बुराइयों को छोड़ दिया तो जाए तो यह मिलन-जुलन के लिए अच्छा और सस्ता उपाय है। बीड़ी से बीड़ी जलती है। लेकिन ऐसे देखा जाए हर नशा लोगों को जोड़ता है। यही सब बहाने बताकर लोग नशे से जुड़े रहते हैं। बीड़ी , तंबाकू ऐसे ही सस्ते नशे हैं जिनके बारे में कहावतें प्रचलित हैं। तंबाकू के बारे में पुरानी बात याद आई:
कृष्ण चले बैकुंठ को , राधा पकड़ी बांह ,
हियाँ तंबाकू खाय लेव, हुवाँ तंबाकू नाय।
लोगों के बगल से गुजरते हुए लोग हमको देखते। उनकी निगाहें गोया पूछ रही होती हैं –‘ये सब सुबह-सुबह कहाँ निकल लिए साइकिल पर। इनको और कोई काम नहीं है क्या ?’
बस्ती के बाहर एक आदमी अपनी बिटिया को कंधे पर बिठाए जा रहा था। साथ में बच्चा साइकिल पर। साइकिल रोक कर उससे बतियाने लगे। वे अपनी बच्चे को कंधे पर बिठाकर पुल तक ले जाते हैं। जाते समय पुल तक साइकिल बच्चा चलाता है। लौटते में बच्ची चलाती है। बच्ची केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ती है। बच्ची की माँ ने दौड़-धूपकर फार्म भरवा कर एडमिशन करवाया है। इसके पहले बच्ची महिला कल्याण समिति के स्कूल में पढ़ती थी। पिछले साल कोरोना काल में स्कूल न खुलने के बावजूद पूरी साल भर की फीस मांगी गई तो एडमिशन केवी में करा दिया।
खुद आटो चलाते हैं कमर। शहर भर में चलते हैं। चार भाई हैं। पिता राज मिस्त्री का काम करते थे। कोरोना काल में मां नहीं रहीं। बीमार हुयी तो किसी डाक्टर ने देखा नहीं कोरोना के चलते। लखनऊ ले गए त तक शांत हो गयीं। उनके जाने के बाद पिता उनके गम में बीमार हो गए। लड़कों ने काम छुड़ा दिया। घर में रहो। हालांकि ठेकेदार कहता है काम पर आने के लिए लेकिन बच्चे जाने नहीं देते।
बात करते हुए कंधे पर सवार बच्ची अपने पिता के बाल पर प्यार से हाथ फिरा रही थी। इस बात का जिक्र करने पर कमर बोले –‘ सर के बाल सब टेंशन में उड़ गए। ‘
‘ किस बात का टेंशन ?’ हमारे पूछने पर बोले कमर –‘ बच्चों को अच्छी तालीम दिला सकें, उनको अच्छे से प पोस सकें इसी बात का टेंशन रहता है।‘
हमारी बातचीत से बेपरवाह बच्ची अपने पिता के सर के बालों में उँगलियाँ फिराती रही। आज पिता दिवस है। इस मौके की अनूठी तस्वीर बन गई। हालांकि वह तो रोज ही ऐसा करती होगी। उसका तो रोज ही ‘फादर्स डे’ मनता होगा।
बेटी का नाम बताया इफरा। हमने मतलब पूछा तो बताया –‘नाम का मतलब तो पता नहीं। मौलवी साहब ने रखा है। गुगलबाबा ने नाम का मतलब बताया – माहिर, होशियार। कमर ने कहा –‘होशियार तो है यह। सब काम फौरन समझकर कर लेती है।‘
इफरा के भाई का नाम भी पूछा गया-‘उजैर’। उजैर मतलब कीमती। बातचीत के क्रम में पता चला –दोनों बच्चे जुड़वां हैं।‘
चलते हुए हम लोग खन्नौत नदी के पुल पर आ गए। नीचे पुराने पुल की रेलिंग पर एक भाई जी तसल्ली से बीड़ी पी रहे थे। कमर भाई भी अपने बच्चों के साथ वहाँ पहुँच गए थे। हमने नीचे बैठे भाई जी से पूछा –‘क्या हो रहा है उधर?’
भाई जी ने जवाब दिया –‘मछली पकड़ रहे हैं।‘
मछली पकड़ने के नाम पर कोई औजार , जाल न देखकर हमको अचरज हुआ और पूछा –‘कैसे पकड़ रहे हैं मछली?’
‘अभी दिखाते हैं’ कहते हुए भाई जी ने बीड़ी बगलिया कर अपने पास की एक छुटकी सी बोतल में कुछ लगाकर डोरी के सहारे नदी के पानी में उतार दी। बताया यही औजार है। मछली पकड़ जाएगी तो पता चल जाएगा।
‘हमने पूछा कितनी देर में फँसेगी मछली?’ बोले –‘पता नहीं?’
‘नहीं फँसेगी तो क्या करेंगे ?’- हमने पूछा।
बोले –‘फँसेगी तो ठीक , नहीं फंसी तो भी कोई बात नहीं। घंटे-दो घंटे इंतजार करेंगें। फिर घर चले जाएंगें।‘
‘काम क्या करते हैं ?’ के जबाब में भाई जी ने बताया –‘कुछ नहीं।‘
हम कुछ और पूछें तब तक कमर ने बताया –‘ग्राम प्रधान थे इसके पहले। 15 साल लगातार प्रधान रहे। हमेशा जीतते रहे। इस बार खेल हो गया , हार गए।‘
‘क्या खेल हो गया?’ के जबाब में बताया कमर ने –‘इस बार जो प्रधान बना उसने तमाम सारे वायदे कर दिए। ये कराएंगे, वो कराएंगे। लोगों ने उसको वोट दे दिया। अब सब पछता रहे हैं। साल भर में ही परेशान हो गए। कह रहे हैं –‘बेकार चुना इसको’। पहले वाले प्रधान अच्छे थे।‘
मछली पकड़ते प्रधान जी की तारीफ करते हुए बोले कमर –‘कोई और होता इनकी जगह तो करोड़ों कमाता पंद्रह साल में। कोठी में रहता। इन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। अगली बार यही जीतेंगे।‘
आजकल हर जगह यही हो रहा है। चुनाव वायदे करके जीते जाते हैं। चुनाव के बाद वायदे बिसरा दिए जाते हैं।
नदी के दूसरी तरफ भी कुछ बच्चे मछली पकड़ रहे थे। उनके पास मछली पकड़ने का जुगाड़ अलग तरह का था। एक थपली टाइप औजार में नीचे थोड़ा छेद करके उसमें आटा लगाकर नदी में उतार दिया जाता है। आटे के लालच में मछली छेद में फंस जाती है।
कई बच्चे मछली पकड़ रहे थे। एक बच्ची देखते-देखते हुए पानी में उतर गई। अपना मछली पकड़ने के औजार पानी से उठाया और उसको हिलाते हुए पानी निकालते हुए जमीन में गिराने लगी। पानी के साथ मछलियाँ भी बाहर गिरती दिखीं।
नदी का पानी मछली , उनको पकड़ने वालों और हम से भी बेपवाह बहता रहा।
हम लोग आगे बढ़ गए।
आगे चलते हुए हम मुख्य सड़क पर आ गए। इसके बाद हथौड़ा बुजुर्ग चौराहे की तरफ से होते हुए लौटने लगे।
रास्ते में एक जगह तालाब जैसी जगह मिट्टी से पटते दिखी। आधा तालाब पट गया था। आधा तेजी से भर रहा था। कुछ दिन बाद तालाब सड़क की तरह बराबर हो जाएगा और वहाँ नए मकान बन जाएंगे। इसके बाद कभी-कभी शहर में तालाबों के खतम होने का स्यापा होता रहेगा।
एक जगह नदी किनारे योग कार्यक्रम हो रहा था। योग करने वाले लोगों के पीछे धोबी नदी में कपड़े धो रहे थे। कपड़े साफ हो रहे थे , नदी मैली हो रही थी।
शहर पहुँचने पर सब लोग अलग –अलग हो गए। हम भी वापस हो लिए। लौटते हुए पंकज की चाय की दुकान देखने गया । बंद थी दुकान। आगे नाले की मुंडेर पर बैठे उनके पिता एक दोस्त के साथ गपिया रहे थे। बताया –‘पंकज सो रहा है अभी। आठ बजे उठेगा , तब खोलेगा दुकान।‘
चाय की दुकाने भी अब दफ़तरों की तरह खुलने लगी।
आगे एक जगह एक महिला बैठी सूप बिनने के लिए तैयारी कर रही थी। सूप बीनते हुए देखकर लगा कि यह भी एक अनूठी कला है। कुछ देर उसको सूप बीनते देखते रहे। इस बीच एक और बुजुर्ग महिला एक छोटे बच्चे के साथ आई और वह भी सूप बीनने लगी। बच्चे को कई टाफियाँ दिलाकर लाई थी वह बुजुर्ग महिला। बच्चा टाफी खोलकर जमीन में रखकर उसको खाने का तैयारी कर रहा था। बुजुर्ग महिला ने बच्चे को टाफी जमीन से उठाकर ऊपर रखने का इशारा किया और काम में जुट गई।
लौटते में एक साइकिल की दुकान पर एक बुजुर्ग पंचर बनवाते दिखे। पंचर बनाने के बाद हवा भरते हुए फ़ोटो लेने की कोशिश की लेकिन पता चला मोबाइल की बैटरी खतम हो गई थी। हम मन मारकर आगे बढ़ गए और पैडलियाते हुए घर वापस आ गए। बिना मोबाइल कैसी घुमाई।
लौटते हुए भी तमाम नजारे देखे। देखना कोई मोबाइल का मोहताज थोड़ी है !

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'लिफ़ाफ़े में कविता' के पंच



पिछले साल Arvind Tiwari अरविन्द तिवारी जी का चौथा व्यंग्य उपन्यास आया – ‘लिफ़ाफ़े में कविता।‘ इसके पहले अरविन्द जी के तीन उपन्यास आ चुके हैं –दिया तले अंधेरा, हेड ऑफिस के गिरगिट और शेष अगले अंक में। ‘लिफ़ाफ़े में कविता’ का इंतजार काफी दिनों से थे। 'लिफ़ाफ़े में कविता' के बाद अब अरविन्द तिवारी जी के अगले उपन्यास का इंतजार है जो उन्होंने होटलों पर केंद्रित करके लिखना शुरू किया है !
हिन्दी के मंचीय कवि सम्मेलनों पर केंद्रित उपन्यास 'लिफ़ाफ़े में कविता ' की तमाम समीक्षाएं आ चुकी हैं। हमने भी एक ड्राफ्ट लिखा है। जब तक उसको फाइनल करें तब तक आप इस उपन्यास के पंच वाक्य पढ़ें । उपन्यास के बारे में भी जल्दी ही लिखने की कोशिश की जाएगी!
1. आज मंच पर कवि नहीं होते हैं। सरल भाषा का प्रयोग करूँ तो नौटंकीबाज कवि ज्यादा रुपए कमाते हैं।
2. आजकल गीतकार या वीर रस का कवि तभी मंच पर जमता है ,जब वह चुटकुलों से शुरुआत करता है।
3. सड़कें बहुउद्देशीय थीं, बरसात में नाले की भूमिका में आ जाती थीं।
4. सूअर और बंदरों का इलाज था ,मगर ये कवि लाइलाज बीमारी की तरह पूरे कस्बे में फैलते जा रहे थे।
5. जगतपुर के अधिकांश कवि ’हूट’ होने में अपनी सार्थकता समझते थे।
6. कवि सम्मेलन में कविता से बड़ी दारू है।
7. कवि सम्मेलन में कवि आदमी नहीं रहता, वह दारू में तब्दील हो जाता है।
8. कवि-सम्मेलनों की दुनिया की लिमिट बस सम्मान और अपमान के बीच रहती आई है। ये कवि-सम्मेलन की दुनिया के ओर-छोर हैं। इन्ही दोनों सीमाओं के भीतर उठा-पटक ,राजनीति, साहित्य वगैरह समाए हुए हैं।
9. मंचीय कवि की सीमा ‘अर्थ’ तक सीमित है। दोहा बड़ा न चौपाई,सबसे बड़ी कमाई।
10. मंच पर नए प्रयोग या नई लिखी कविता ,रक्षा विभाग के मिसाइल परीक्षण की तरह होती है।
11. भारत देश की यह विशेषता है कि यहाँ काम कोई भी हो, बिना सियासी ‘अप्रोच’ के संभव ही नहीं होता।
12. कविता की तरह रेलवे के टाइम-टेबल को रटना मंचीय कवियों के लिए जरूरी होता है।
13. कोई कवि जब चार मंचीय गीत लिख लेता है तो सबसे पहले रेलवे टाइम-टेबल खरीदता है।
14. मंदबुद्धि व्यक्ति नौकरी में तो चल जाता है, कवि सम्मेलन में चालक और शातिर होना पड़ता है।
15. दुनिया का हर कारोबार झूठ की बुनियाद पर खड़ा है। हर धंधे में मार्केटिंग करनी पड़ती है। कवि सम्मेलन भी इससे अछूते नहीं हैं।
16. मंच के कवि को अपमान की परवाह नहीं होनी चाहिए। यदि आप स्वाभिमान के चक्कर में पड़े तो कार्यक्रमों से हाथ धो बैठेंगे।
17. मंचीय कवि के लिए सबसे बड़ा पैसा होता है। वह पैसे के अलावा किसी के आगे नहीं झुकता। पैसे के आगे वह अपना परिवार, मित्र, गाँव-जवार, सिद्धांत आदि को छोड़ देता है।
18. इतिहास गवाह है, जब किसी मंचीय कवि ने पैसे के अलावा किसी से दोस्ती की है तो वह बरबाद होकर ही रहा।
19. बड़ा गुंडा बनने के लिए मरणासन्न पिटाई अपरिहार्य है ,जबकि बड़ा कवि बनने के लिए साधारण पिटाई से काम चल जाता है।
20. अगर आपको कोई पुरस्कार मिला है, तो अखबार में कहबर छपने के बावजूद मित्र आपकी उपलब्धि से अनजान रहेंगे।
21. अच्छी खबर मित्रों को फोन करके बतानी होती है ,जबकि बुरी खबरों को मित्र अपने आप सूंघ लेते हैं।
22. बुरी खबारे सूंघने के बरक्स ही कवियों को प्रतिभाशाली कहा जाता है।
23. साहित्यिक कवि के लिए जहां भावुक होना सद्गुण माना जाता है, वहीं मंचीय कवि के लिए दुर्गुण। विचार-विमर्श और गोष्ठी के चक्कर में पड़ा मंचीय कवि, अंतत: बरबाद हो जाता है।
24. साहित्यिक कवि पुन: आदमी बन सकता है, मगर मंचीय कवि के लिए आदमी बनने की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं।
25. मंचीय कवि तभी तक कवि है ,जब तक वह मंच पर बुलाया जा रहा है। बुलाया जाना बंद होते ही मंच का कवि मर जाता है।
26. मंच की सियासत दिल्ली की सियासत से कहीं ज्यादा जटिल है।
27. बुढ़ापा जवानी के कुकृत्यों को ढक देता है।
28. घर में जब पैसा आता है तो विचारधाराएं बदल जाती हैं।
29. एक ही तरह के भ्रष्टाचार से भ्रष्टाचारी ऊब जाता है , तो वह भ्रष्टाचार के अभिनव तरीके ईजाद कर लेता है।
30. साहित्य अकादमी का अध्यक्ष जिस विधा का साहित्यकार होता है ,वही विधा अकादमी पर हावी हो जाती है।
31. सरकारी पैसे को अधिकारियों से प्राप्त करना बेहद मुश्किल और जोखिम भरा काम होता है।
32. हर बड़े कवि-सम्मलेन में लोकल कवि को उसी तरह पहले पढ़वाया जाता है ,जैसे नक्सली क्षेत्र में महत्वपूर्ण ट्रेन के आगे ‘पायलट इंजन’ चलाया जाता है।
33. जब कोई कवयित्री श्रंगार के साथ ओज और हास्य भी पढ़ने लगती है, तो वह बड़ी बन जाती है।
34. मंचीय कवि जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है ,उसकी इंद्रियाँ बेलगाम होने लगती हैं।
35. कवि-सम्मलेन के कवि के पास अगर उपनाम नहीं है तो समझ लो वह सरकार के उस मंत्री के समान है ,जिसके पास कोई विभाग नहीं होता।
36. जिस दफ्तर का अधिकारी कवि होता है ,उसका चपरासी तक समीक्षक हो जाता है। उस दफ़तर के छोटे बाबू अपने को गुलाबराय और बड़े बाबू रामचन्द्र शुक्ल मानने लगते हैं।
37. अधिकारी कवि हो तो कर्मचारी को सिरदर्द के अलावा कोई दर्द नहीं होता।
38. वीरों का रक्त देश की सीमाओं पर बहता है ,जबकि वीर रस के कवियों का दारू के ठेके पर।
39. प्रकाशक कवि की कविता को नहीं, हैसियत को देखता है।
पुस्तक का नाम : लिफाफे में कविता (व्यंग्य उपन्यास) ;
लेखक : अरविंद तिवारी
विधा – उपन्यास ; संस्करण – 2021 ;
पृष्ठ संख्या – 192 ; मूल्य – 400/- रुपए
प्रकाशक – प्रतिभा प्रतिष्ठान, 694- बी, चावड़ी बाजार, नई दिल्ली 110006

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Wednesday, June 15, 2022

किताबें पढ़ते हुए अक्सर हम बहुत कुछ सीखते हैं

 किताबें पढ़ते हुए अक्सर हम बहुत कुछ सीखते हैं। ‘कई चाँद थे सरे –आसमां’ इस मामले में अनूठी किताब है। जबरदस्त किस्सागोई वाली इस किताब में उर्दू के कुछ शब्द हैं जिनके मतलब पता न होने के चलते थोड़ा अटक भले हुयी लेकिन इसी बहाने तमाम नए शब्दों के बारे में पता चला। ऐसा ही एक शब्द पता चला – नस्साब।

नस्साब के बारे में जानने के लिए उपन्यास का यह मौजू होगा:
“मैं पेशे से आंखों का डाक्टर हूं। शेरो-शायरी का कुछ शौक मैं भी रखता हूं, लेकिन अगर मैं पुराने जमाने में होता तो मुझे नस्साब कहा जाता, इस मानी में कि मुझे खानदानों के हालात मालूम करने, उनके शिजरे बनाने और दूर-दूर के घरानों की कड़िया से कड़ियां मिलाने का शौक है और अब हालांकि मेरी उम्र बहुत ज्यादा नहीं है, मैंने डाक्टरी का पेक्षा छोड़ दिया है , मेरा ज्यादातर वक्त शिजरे बनाने और बनाए हुए शिजरों को और भी व्यापक और पेचीदा बनाने में गुजारता है।“
रोचक शब्द पता चला - नस्साब।
यह इस मामले में भी रोचक है कि आज देश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो अपना मूल पेशा छोड़कर नस्साब का काम अंजाम दे रहे हैं। खानदानों के मनचाहे शिजरे बना रहे हैं और उनको व्यापक और पेचीदा बना रहे हैं। खानदानों के शिजरे बनाने के साथ लोग तमाम इमारतों के नस्साब भी बन रहे हैं।
एक और शब्द पहली बार पढ़ा –म्यूज। म्यूज के बारे में बताते हुए लिखते हैं फारुकी साहब :
“अच्छे मकान यहाँ आम रास्तों पर लबे-सड़क होते हैं। ऐसे मकानों के पीछे एक तंग गली होती है ,जिनमें इन मकानों के गैराज (पहले समय में कैरिज हाउस) बने होते हैं। इन्हें म्यूज कहा जाता है। बाद में कुछ लोगों ने गाड़ीखाने को शागिर्दपेशा बना लिया तो जिन घरों में शागिर्दपेशा का इंतजाम घर के अंदर ही था, उन्होंने अपने म्यूज को गैराज बना लिया और कुछ ने उन्हें अपेक्षाकृत सस्ते किराये पर नौजवानों के लिए एक कमरे का फ्लैट बना दिया। सेंट्रल लंदन के इलाके में ये म्यूज को बेहद लोकप्रिय और रिहाइश का दर्जा रखते थे।“
लंदन में न्यूज की तर्ज पर दिल्ली में घरों की छत पर बने छोटे कमरों में तमाम लोग किराये पर रहते हैं। इनको ‘बरसाती’ के नाम से जाना जाता है। तमाम लोग इन बरसातियों में जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजारते हैं।
इसके अलावा दाईपिलाई( बच्चे को दूध पिलाने वाली) , दाईखिलाई( बच्चे को खान खिलाने वाली) भी पढ़ने को मिले।
किताबों को पढ़ते हुए जब हम शब्दों के बारे में जो जानकारी होती है वह शब्दकोश में शब्दों के बारे में मिली जानकारी से अलग तरह की होती है।
ऐसे ही याद हावर्ड फ्रास्ट के मशहूर उपन्यास के अमृत राय द्वारा किए हिन्दी अनुवाद आदि विद्रोही को पढ़ते हुए ग्लेडीएटर शब्द से परिचय हुआ। रोमन साम्राज्य में गुलामों की प्रथा थी। ग्लेडीएटर उन गुलामों को कहते थे जिनको रोमन लोग अपने मनोरंजन के लिए अखाड़े में तब तक लड़ाते थे जबतक उनमें से एक की मौत नहीं हो जाती थी। ग्लेडीएटर को मरते-तड़पते देखकर रोमन अपना मनोरंजन करते थे।
ग्लेडीएटर शब्द की शुरुआत भले ही रोमन समय में हुई लेकिन लगता है समय के साथ इसका पूरी दुनिया में विस्तार ही हुआ है। सम्पन्न, समृद्ध, ताकतवर लोग जिनके हाथ में सत्ता है बाकी जनता को ग्लेडीएटर की तरह अपने बनाए अखाड़े में तब तक लड़ाते रहते हैं जब तक उनमें से एक की मौत नहीं हो जाती है। लोग भी सब कुछ जानते समझते हुए आपस में मारकाट में लगे हुए हैं।
आदि विद्रोही अपने आप में अनूठा उपन्यास है। इसको फिर से पढ़कर इसके बारे में विस्तार से लिखेंगे।

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Tuesday, June 07, 2022

जनप्रतिनिधि भी समझदार हो गए हैं

 सुबह की साइकिल सैर से लौटते हुए विचार बना चाय पी जाए। मोहित जी ने साइकिल रोकी खिरनी बाग के पास स्थित चाय की दुकान पर। बताया पूरी कचहरी में चाय यहाँ से जाती है। दुकान का नाम पप्पी टी स्टॉल।

कचहरी की बाउंडरी से करीब आधा किलॉमीटर दूर तो होगी ही दुकान।
पता चला 1984 से चल रही है दुकान। पिताजी फ़ैक्ट्री से रिटायर हुए उसके बाद खोल ली दुकान। तब से चल रही है।
मतलब 38 साल हो गए दुकान खुले।
मुँह में मसाला बराबर करते, बग़ल ने अदरक कूटते और खौलती चाय को चम्मच से दुलराते हुए अपनी दुकान और चाय के किससे मुस्कुराते हुए सुनते रहे पप्पी।
शाहजहाँपुर की दो चीज़ फ़ेमस हैं। यहाँ की क़ालीन और दूसरी पप्पी की चाय। बाद में बताने वाले ने प्रसिद्ध नेता , बाबा साहब के नाम से प्रसिद्ध, स्वर्गीय जितेंद्र प्रसाद जी का नाम जोड़ दिया।
हमने क्रांतिकारी शहीदों बिस्मिल, अशफ़ाक और रोशन सिंह जी की याद दिलाई तो वे बोले - वे तो सबसे पहले हैं।
बात घूमते हुए राजनीति पर आ गयी। तमाम उठापटक के बाद तय हुआ -“आज का वोटर बहुत चालाक हो गया है। अपना वोट ख़राब नहीं करना चाहता। उसी को वोट देता है जिसकी सरकार बनने की गुंजाइश हो या जो जीतने वाला हो । “
इसी बात से यह भी निष्कर्ष निकला -“जनप्रतिनिधि भी समझदार हो गए हैं। वे विचारधारा और जनता से जुड़ाव जेब में रखकर उसी पार्टी से जुड़ते हैं जहां से उनको टिकट मिल सके और वे कोई मंत्री पद पा सकें।”
एक चाय पर इतना ज्ञान मिलना बहुत है ।

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Saturday, June 04, 2022

साइकिल दिवस के बहाने



कल साइकिल दिवस था। अंतर्राष्ट्रीय साइकिल दिवस। चार साल पहले से (२०१८) शुरु हुआ साइकिल दिवस । यूनाइटेड नेशन की जनरल असेम्बली में तय हुआ कि ३ जून को मनाया जाएगा साइकिल दिवस तो मनाया जाने लगा।
साल की हर तारीख़ पर किसी न किसी ’दिवस’ का क़ब्ज़ा होता जा रहा है। जल्द ही ऐसा होगा कि साल की हर तारीख़ पर कोई न कोई दिन मनाया जाएगा। जो दिन ख़ाली होगा उसको ‘नो दिवस डे’ मनाया जाएगा।
सुबह शाहजहाँपुर साइकिल क्लब की तरफ़ से साइकिल दिवस मनाया गया। कैंट गेट पर इकट्ठा हुए। फूल, गुलदस्ता, फोटोबाज़ी की भरमार। एक बच्ची ने मुझे गुलदस्ता दिया। हम उसका नाम भी न पूछ पाए। मार्निंग क्लब के साथी डाक्टर अनिल त्रेहन जी और इंद्रजीत सचदेव जी ने भी गुलदस्ता दिया। फ़ोटो हुए। सड़क पर साइकिल वालों का ही क़ब्ज़ा जैसा हो गया। कारें बेचारी सहमी सी , बगलिया के निकल रहीं थीं। एक एम्बुलेंस भी देर में निकल पाई।
इंसान जब बहुमत में होता है तो अपने हर कदम को जायज़ मानता है, भले ही वह दूसरे के लिए नागवार हो या ग़ैर क़ानूनी।
फ़ोटो के बाद साइकिल दिवस के बारे में कुछ बोलने के लिए कहा गया। अचानक मोबाइल मुँह के सामने। हम साइकिल के बारे में सब भूल गये। २०१८ याद नहीं रहा। यूनाइटेड नेशन दिमाग़ से दफ़ा हो गया। फिर क्या कि विदेशी चीजें मौक़े पर साथ नहीं देतीं।
वो तो कहो सेहत, पर्यावरण , बचत सब इफ़रात में याद था तो भी बोल दिया अटकते हुए। सब टेप होकर इधर-उधर टहल रहा। आपको भी सुनना हो तो यहां दिए लिंक में है। देखिए। सुनिए।
बड़े-बड़े लोग जो इतिहास को भूगोल में और विज्ञान को अंधविश्वास में मिला देते हैं वो इसीलिए कि अचानक पूछने पर उनके दिमाग़ का फ़्यूज़ उड़ जाता होगा। रटा हुआ याद नहीं आता होगा। पुराना श्लोक है न
पुस्तक स्था तु या विद्या पर हस्तगतम धनम,
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम।
पुस्तक में स्थित विद्या और दूसरे के हाथ हुआ धन मौक़ा पड़ने पर काम नहीं आता।
आजकल पुस्तक की जगह गूगल लिखना उचित होगा।
बहरहाल विस्तृत फ़ोटो ग्राफ़ी के बाद साइकिल चलाने के लिए निकले। क़रीब आठ किलोमीटर साइकिल चलाई। लौट के आए तो साइकिलों का जमावड़ा लगा था। अपर पुलिस निरीक्षक टी सरवन जी ने भी साइकिल चलाने से जुड़ी अच्छी बातें बताईं।यहाँ तक तो ठीक। लेकिन फिर पता चला कि उनकी टीम ने कुछ मोटर साइकिल वालों के चालान कर दिए। किसी की नम्बर प्लेट ग़ायब थी कोई एक में पाँच। हेलमेट न लगाना तो आम चलन है शहर में।
लौटते हुए वहीं एक आदमी दिखा। पटरे वाले जाँघिये के अलावा क़तई दिगम्बर। दीन-हीन कमजोर आवाज़। हमको देखते हुए चुप था। पहली बार दिखा वह वहाँ। कुछ बात करने की कोशिस की लेकिन समझ नहीं आया।
इस बीच किसी ने कहा -पचास रुपया कमा लिए अब तक।
हम कुछ समझ न पाए कि क्या कहें। साइकिल चलाते हुए घर आ गए।

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Sunday, May 29, 2022

एवरेस्ट दिवस पर एवरेस्ट बेस कैंप



आज का दिन हमारे छोटे साहबजादे Anany और उनके दोस्तों के लिए खास रहा। आज वे घुमक्कड़ी की मंजिलें तय करते हुए 'एवरेस्ट बेस कैंप' पहुंचे। कठिन रहा सफर। आज का दिन बहुत मेहनत भरा रहा। खासकर अनन्य और उसके दोस्त मोहित के लिए। आज उनको दो दिन के बराबर चढ़ाई करनी पड़ी। थकान इतनी जितनी, बकौल अनन्य, जिंदगी में कभी हुई नहीं।
हुआ यह कि कल इनकी टीम की एक साथी को आक्सीजन की कमी महसूस हुई। बाकी साथी आगे बढ़ गए थे। साथी का आक्सीजन लेवल 44 बता रहा था। ये लोग वहीं रूके। अपनी समझ से साथी की देखभाल की। फोन पर यहां डॉक्टर से सलाह ली। आखिर में साथी को नीचे भेजा। वहां वह अब ठीक है। अनन्य और मोहित वहीं रुक गए। एक दिन साथियों से पिछड़ गए।
आज ही एवरेस्ट बेस कैम्प पहुंचने का सभी का प्रोग्राम था। अनन्य और मोहित एक दिन पिछड़ गए थे। लेकिन अंततः आज ही चढ़ाई पूरी करके एवरेस्ट बेस कैंप पहुंच गए।
संयोग से आज एवरेस्ट दिवस भी था। आज के ही दिन 69 साल पहले 1953 को शेरपा तेनसिंह और सर एडमंड हिलेरी ने पहली बार एवरेस्ट पर कदम रखे थे। जिस शिखर पर आज के दिन ये दो महान पर्वतारोही पहुंचे, उसकी तलहटी पर आज के ही दिन पहुंचना अपने में खास, खुशनुमा एहसास रहा होगा।
अनन्य , काजल और उनकी टीम को बधाई। फिरगुन ट्रेवेल्स की शानदार शुरुआत के लिए बधाई। सभी बच्चों को प्यार।
अनन्य और उनकी टीम की घुमक्कड़ी से जुड़े फोटो और वीडियो देखने के लिए ananyshukla के इंस्टाग्राम खाते पर पहुंचे।
हमारे बच्चे हमको भी घुमक्कड़ी के लिए उकसा रहे हैं।

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Wednesday, May 18, 2022

जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे



जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा ।
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह।
-विनोद कुमार शुक्ल
सौजन्य से Pankaj Chaturvedi जी जिनकी फ़ेसबुक पोस्ट पर पहुँचकर बहुत प्यारा संस्मरण पढ़ सकते हैं।

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